मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।

Nov 17, 2018

प्रेरणा लें हर एक से

प्रेरणा लें हर एक से
- विजय जोशी
जीवन में प्रेरणा हर एक से ली जा सकती हैं, बशर्ते आप खुले मन मस्तिष्क से उसका स्वागत कर सकें। ऊँच - नीच, श्रेष्ठ - कनिष्ठ, गरीब - अमीर के मकड़जाल में उलझे हम भ्रम के चश्मे से संसार देखने के आदी हो जाते हैं। हर व्यक्ति हर काम में निपुण हो यह संभव नहीं। हर एक अपनी विशेषता का धारक और वाहक होता है और हमारा भला भी इसी में है कि व्यक्ति की विशेषताओं का आदर करते हुए  उनको अपने व्यक्तित्व में अपनाएँ। इसका सबसे बड़ा फायदा तो यही है कि आपका व्यक्तित्व बहुआयामी हो जाता है।
इसका प्रत्यक्ष साक्षात्कार तो मुझे अपने सेवाकाल के दौरान हुआ। मेरा तत्कालीन नया विभाग अनेक जगहों पर विस्तार लिये हुए था। विभाग के कामोबेश हर आदमी से मिलना मेरी आदत रही है ; लेकिन व्यस्तता के मद्देनजर यह तत्काल संभव नहीं पाया। शनैः- शनैः लोग भी खुद आकर अपना परिचय देते रहे, लेकिन एक व्यस्ततम उपविभाग के प्रमुख कभी नहीं आए।
थोड़े अंतराल के बाद जब अधिक कार्यभार से लदे ; लेकिन बहुत सुंदर तरीके से प्रबंधित उनके कार्यस्थल मैं खुद पहुँचा, तो देखा कि उसे कोई अधिकारी नहीं : अपितु एक फोरमेन जो उस समय भी व्यस्त थे, अपने काम को बखूबी अंजाम दे रहे थे।
मुझे आश्चर्य भी हुआ और पूछा - सब लोगों से मिलना हुआ, लेकिन आप से नहीं। मैं न सही आप भी एक बार आ तो सकते थे।
और उनका उत्तर अद्भुत था - मेरे लिये जीवन का दूसरा नाम काम है और काम छोड़कर फुर्सत मिलतीतो ही आ पाता। वैसे भी बगैर काम के मिलकर क्या करता।
बात बहुत गहरी थी। मेरा राग दरबारी संस्कृति से बिलकुल निरपेक्ष एक ऐसे आदमी से साक्षात्कार हुआ, जो काम का पूरक नहीं, अपितु पर्याय था।
आगे की बात बहुत संक्षिप्त है।  जरूरी कागजी डिग्री के अभाव में नियम कानून से परे जाकर वे यानी श्री राम बरन सिंह भदौरिया पहले प्रयास में ही फोरमेन से अधिकारी बने, जो लगभग असंभव था। उनका ध्येय के प्रति अद्भुत समर्पण मुझे आज तक छूता और प्रेरणा देता है।
आदमी ऊपरी आवरण, चमक- दमक और ताम- झाम से नहीं अपितु कार्य के प्रति समर्पण से ऊपर उठता हैं। कर्तव्य के प्रति सच्चाई आपके चरित्र को न केवल ऊॅचाई देती हैं, अपितु गहन आत्मसंतोष भी। उपरी चमक तो धोखा है। किसी भी भवन के मेहराब सुंदर तो हो सकते हैं, लेकिन स्थायी नहीं, जबकि नीव के पत्थर उबड़ - खाबड़ होने के बावजूद जमीनी सच्चाई से वाकिफ़  और अपने दम पर दूसरों का भार उठाने की क्षमता रखते हुए अपनी जगह पर कायम रहते हैं।
यही है जीवन का वह समग्र सत्य जिसे यदि एक बार आपने समझकर चरित्र में अंगीकार कर लिया और आपके सामने उपलब्धियों के असीमित अवसर और ऊँचाई दोनों है बशर्ते आपका समर्पण कार्य के प्रति हो  न कि अवसरवादित या इंसान के प्रति। 
       
सम्पर्कः 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास)भोपाल- 462023, मो. 09826042641,

दिया टिमटिमा रहा है

दिया टिमटिमा रहा है


विद्यानिवास मिश्र

लोग कहेंगे कि दीवाली के दिन कुछ अधिक मात्रा में चढ़ाली है, नहीं तो जगर-मगर चारों ओर बिजली की ज्‍योति जगमग रही है और इसको यही सूझता है कि दिया, वह भी दिए नहीं, दिया टिमटिमा रहा है, पर सूक्ष्‍म दृष्टि का जन्‍मजात रोग जिसे मिला हो वह जितना देखेगा, उतना ही तो कहेगा। मैं गवई-देहात का आदमी रात को दिन करनेवाली नागरिक प्रतिभा का चमत्कार क्‍या समझूँ? मै जानता हूँ, अमा के सूचीभेद्य अंधकार से घिरे हुए देहात की बात, मैं जानता हूँ, अमा के सर्वग्रासी मुख में जाने से इनकार करने वाले दिए की बात, मै जानता हूँ बाती के बल पर स्‍नेह को चुनौती देनेवाले दिए की बात और जानता हूँ इस टिमटिमाते हुए दिए में भारत की प्राण ज्‍योति के आलोक की बात। दिया टिमटिमा रहा है! स्‍नेह नहीं, स्‍नेह तलछट भर रही है और बाती न जाने किस जमाने का तेल सोखे हुए है कि बलती चली जा रही है, अभी तक बुझ नहीं पाई। सामने प्रगाढ़ अंधकार, भयावनी निस्‍तब्‍धता और न जाने कैसी-कैसी आशंकाएँ! पर इन सब को नगण्‍य करता हुआ दिया टिमटिमा रहा है-
सुनना चाहेंगे इस दिए का इतिहास? तो पहले रोमक इतिहासकार प्लिनी का रुदन सुनिए। भारतवर्ष में सिमिट कर भरती हुई स्‍वर्ण-राशि को देखकर बेचारा रो पड़ा था कि भारत में रोमक विलासियों के कारण सारा स्‍वर्ण खिंचा जा रहा है, कोई रोक-थाम नहीं। उस दिन भी भारत में श्रेष्‍ठी थे और थे श्रेष्ठिचत्‍वर, श्रष्ठि-सार्थवाह और बड़े-बड़े जलपोत, बड़ी-बड़ी नौकाएँ और उनको आलोकित करते थे बड़े-बड़े दीपस्‍तंभ। स्कंदगुप्‍त का सिक्‍का 146 ग्रेन का था, कब? जब‍कि भारतवर्ष की समस्‍त शक्ति एक बर्बर बाढ़ को रोकने में और सोखने में लगी हुई थी। 146 ग्रेन का अर्थ कुछ होता हैआज के दिए को टिमटिमाने का बल अगर मिला है तो उस जल-विहारिणी महालक्ष्‍मी के आलोक की स्‍मृति से ही, और भारत की महालक्ष्‍मी का स्रोत अक्षय है, इसमें भी संदेह नहीं। बख्तियार खिलजी का लोभ, गजनी की तृष्णा, नदिरशाह की बुभुक्षा और अंग्रेज पंसारियों की महामाया के उदर भरकर भी उसका स्रोत सूखा नहीं, यद्यपि उसमें अब बाहर से कुछ आता नहीं, खर्च-खर्च भर रह गया है। हाँ, सूखा नहीं, पर अंतर्लीन आवश्‍य हो गया है और उसे ऊपर लाने के लिए कागदी आवाहन से काम न चलेगा। कागदी आवाहन से कागदों के पुलिंदे आते हैं, सोने की महालक्ष्‍मी नहीं। आज जो दिया अपना समस्‍त स्‍नेह संचित करके यथा-तथा भारतीय कृषक के तन के वस्‍त्र को बाती बनाकर टिमटिमा रहा है, वह इसी आशा से कि अब भी महालक्ष्‍मी रीझ जाए, मान जाए। उसका आवाहन कागदी नहीं, कागद से उसकी देखा-देखी भी नहीं,जान-पहचान नहीं, भाईचारा नहीं; उसका आवाहन अपने समस्‍त हृदय से है, प्राण से है और अंतरात्‍मा से है। इस मिट्टी के दिए की टिमटिमाहट में वह शीतल ज्‍वाला है, जो धरती के अंधकार को पीकर रहेगी और बिजली के लट्टुओं पर कीट-पतंग जान दें या न दें, यह शीतल ज्‍वाला समस्‍त कीट-पतंगों की आहुति ले के रहेगी। चलिए, केवल शहर के अंदेशे से दुबले न बनिए, तनिक देहात की भी सुधि लीजिए।
आज देहात में क्‍या है और क्‍या नहीं है, यह बात दूँ? देहात में है वयस्‍क मताधिकार के अनुसार चुनी गई गाँव-सभाएँ और न्‍याय-पंचायतें, जिनमें बकरी और मुर्गी तक पर कर लगाया जा चुका है और 'सरवा ससुरा' कहने पर भी अंतिम अर्थ-दण्‍ड, पर वसूली इनकी कुल दस प्रतिशत हुई है, अधिक नहीं। देहात में हैं, बिखरे हुए सफेदपोश, जिसके कारण हाट में साग-भाजी भी वही ला पाते हैं, जिनका पेटा बड़ा है, टुटपुँजिए लोग साग-भाजी भी बेचकर अपनी गुजर नहीं कर सकते हैं। देहात में है, झिनकू साह की फूलती-फलती हुई बिरादरी जिनकी बाँस की पेटी तक मोटे-मोटे भुजाओँ से, हँसुलियों से और कंठहारों से लेकर हलकी नकबेसर, लौंग कनफूल, बेंदी और झूमर से ठसाठस भर गई हैं और मैली पैबंदी लगी हुई चौबंदी को बिदाई मिल गई है, उसके स्‍थान पर बँगला कुर्ते ने अपना आलोक दिखाया है। देहात में आपको नहीं मिलेगी हँसती-खेलती जवानी, क्‍योंकि धरती की लक्ष्‍मी रूठ गई है, और अब पेट आधा-तीहा भरने के लिए उसे मलेरिया के विलास-काननों में जाकर आराकसी करना पड़ता है, या कचरापाड़ा तथा जमशेदपुर की भट्ठियों में तपना पड़ता है। देहात में आज आपको नहीं मिलेगी अलाव की अलमस्‍त चर्चा और अलाव के आलोक में उज्जवल मुखाभा, वहाँ आगम का अँधेरा है, गहरी निराशा है और अत्यंत क्षीण साहस। जहाँ एक और आनेवाले आम चुनाव के लिए अभी से देश के हितैषियों में सीटों की बंदरबाँट की धूम मची हुई है और अखबारों में सिद्धांतों की धमाचौकड़ी भी, वहाँ जिनके लिए यह सब कुछ हो रहा है, जिनके नाम पर यह सब कुछ किया जा रहा है, वे अकाल की छाया में घिरते चले जा रहे हैं बेहोशी और बेकसी के साथ।
चलिएगा इस देहात में? वहाँ इस समय दूध की धार नहीं मिलेगी, पेड़ की पत्ती से बना हुआ तरल-सा रक्‍त मिलेगा, कुछ सफेदी लिये हुए! वहाँ 'सजाव दही' परोसने वाले 'बाँके नैन' नहीं मिलेंगे, वहाँ मिलेंगे छाछ के लिए तरसनेवाले, छीना-झपटी करनेवाले मुरझाते हुए दूध के दाँत। भारतवर्ष में हथिया खाली हाथ आई है और खाली हाथ गई है, इसका परिणाम बैठे-बैठे आप नहीं समझ सकते, वहाँ चलकर देखिए कि कातिक आ गया, अभी डीभी उचम्‍हती नहीं नजर आती, अगहनी में भैंसों की दावन पड़ी हे, उस अगहनी में आदमी की हँसिया नहीं लग सकती। बाजरा ईंधन की समस्‍या शायद हल कर दे पर उदर की समस्‍या हल करने से वह भी इंकार कर रहा है। वहाँ गऊचोरी का सुसं‍गठित व्‍यवसाय करनेवाले भी आज दिन प्रसन्‍न नहीं, क्‍योंकि आज कोई अपने बैल को किसी भी दाम पर चोर के यहाँ से वापिस लाने के लिए उत्‍कंठित ही नहीं है, क्‍योंकि भूसा चूक  गया है, आगे कोई आशा नहीं, खरीफ की फसल बाढ़ में गई, बची-खुची सूखा में गई, रबी जनमते ही पाथर हो गई। पर दिया टिमटिमा रहा है!
बंकिम बाबू ने यमुना की सीढ़ियों पर इसी अमा की अँधेरी रात में भारत की राजलक्ष्मी को नूपुर उतारकर चुपचाप उतरते देखा था। सुना कि राजलक्ष्‍मी भारत की इंद्रपुरी में लौट आई है,; किंतु माइक की प्रसारित ध्‍वनि संभवत: उन वधिर कान तक नहीं पहुँची है, जो युद्धोत्‍तर भारत में किसी नए परिवर्तन का आभास भी नहीं पा सके हैं। उनके लिए संभवत: राजलक्ष्‍मी अभी नहीं आई है। कुम्‍हार का चक्‍का अब नहीं घूमता और माटी की घंटी अब नहीं बजती, पटवारी को चुटकी भर चीनी के लिए चाँदी चढ़ाने कोई नहीं जाता, क्‍यों? इसीलिए कि राजलक्ष्‍मी के आने का डिंडिम-नाद अभी इन अभागों के कानों में नहीं पहुँच सका है, पता नहीं उस डिंडिम-नाद का दोष है या इन कानों का, इसकी मीमांसा करने की आवश्‍यकता भी नहीं। पर सच बात यह है कि राजलक्ष्‍मी के पधारने के शुभ-संदेश उनके पास पहुँचाया भी जाए, तो वह इनके हृदय में उतर नहीं सकता। ये उस राजलक्ष्‍मी के आने की प्रतीक्षा में हैं जो अमावस्‍या के गहन अंधकार में ही आ सकती है, जो घर पर ही आ सकती है और जो गोबर का गोवर्धन बन कर छोटी से छोटी अन्‍न की डेहरी में ही जा सकती है। ये अभ्रंलिह प्रासादों की विद्युत्द्योतित सौधपंक्तियों पर मणिनूपुरों की झंकार के साथ उतरनेवाली राजलक्ष्‍मी को नहीं जानते, उनसे इनका कोई सामान्‍य परिचय भी नहीं।
इन बेचारों के छोटे-से हृदय में इतनी बड़ी रूपहुली राजलक्ष्‍मी का चित्र बस नहीं पाया, यह इनका दोष नहीं, इनके उन जले अतीत के संस्‍कारों का दोष है, जो अपने राजाराम और उनके रामराज्‍य का पल्‍ला क्षण भर के लिए भी नहीं छोड़ना चाहते। राजाराम जो बाती उकसा गए, वह किसी के भी बुझाए बुझना नहीं चाहती और दिया टिमटिमा रहा है, स्‍नेह के बल पर नहीं, बाती के बल पर नहीं, किसी नई आशा के बल पर नहीं, बल्कि उस उकसान के बल पर जो इसे राजाराम के हाथों से मिल चुकी है। इन दिए को गुल करनेवाले सपूत भी मौजूद हैं, जो नए इंसान के लिए सबसे बढ़िया जग मसान मानते हैं, जिन्‍हें अतीत के ध्वंस में मंगल की सृष्टि दिखाई पड़ती है। वे सपूत भी भर आँख इस दिए की ज्‍योति निहारें तो उनकी आँखें जुड़ा जाएँ।
तो राजलक्ष्‍मी को अगर सौ बार गरज है‍ कि अपने आने का संदेश उसे इन वधिरों तक, इन अंधों तक भी पहुँचाना है और वे अगर यह समझती हैं कि बिना इन तक संदेश पहुँचे उनके आने का कोई महत्त्व नहीं है, तो मैं कहता हूँ कि उन्‍हें उसी रूप में आना होगा, जो इनकी कल्‍पना में सरलता से उतर सके। ये डॉलर-क्षेत्र नहीं जानते, ये पौंड-पावना से सरोकार नहीं रखते, इन्‍हें मुद्रास्फीति का अर्थ नहीं मालूम, पर इतना समझते हैं कि कागदों का अंबार राजलक्ष्‍मी का शयन-कक्ष नहीं बना सकता। इनकी लक्ष्‍मी गेहूँ-जौ के नवांकुरों पर ओस के रूप में उतरती है, इनकी लक्ष्‍मी धान की बालियों के सुनहले झुमकों में झूमती है और इनकी लक्ष्‍मी गऊ के गोबर में लोट-पोट करती है उस लक्ष्‍मी के लिए वन-महोत्‍सव से अधिक कृषि-महोत्‍सव की आवश्यकता है, कृषि महोत्‍सव से अधिक कृषि-प्रयत्‍न की तथा कृषि-प्रोत्साहन की आवश्यकता है।
जब तक इन देहातियों की लक्ष्‍मी नहीं आती, तब तक हमको भी इस लक्ष्‍मी से कुछ लेना-देना नहीं है। हमारे ऊपर वैसे ही अकृपा बनी रहती हैं, हम ठहरे लक्ष्‍मीपति की छाती पर श्रीवत्‍सचिह्न देने वाले महर्षि भृगु की संतान, समुद्रपायी अगस्‍त्‍य के वंशज और लक्ष्‍मी के धरती के निवास बेल की डाली छिनगाने वाले परम शैव, हम लक्ष्‍मी की सपत्‍नी के सगे पुत्र, हमें उनसे दुलार की, पुचकार की आशा नहीं, आकांक्षा नहीं। पर विमाता होते हुए भी माता तो हैं ही वे, कौशल्‍या से कैकेयी का पद बड़ा हुआ, तो थोड़ी देर के लिए इनका पद भी सरस्‍वती से बड़ा मान ही लेता हूँ, सो भी आज के दिन तो इनका महत्त्व है ही, ये भले ही उस महत्त्व को न समझें। इसलिए मैं अपना कर्तव्‍य समझता हूँ कि मैं अपनी इस विमाता को चेताऊँ कि जिनके चरणों की वे दासी हैं, उनकी सबसे बड़ी मर्यादा है, निष्किंचनता। सुनिए उन्‍हीं के मुख से और लक्ष्‍मी को ही संबोधित करके कही गई इस मर्यादा को… "निष्किचना वयं शश्र्वन्निष्किंचनजनप्रिया तस्‍मात्‍प्रायेण न ह्याढ्या मां भजन्ति सुमध्‍यमे" (हम सदा से ही अकिंचन हैं और अकिंचन जन ही हमें प्रिय हैं, इसलिए धनी लोग प्राय: हमें नहीं भजते)।
निष्किंचन को चाहे आप 'हैव-नाट' कहिए चाहे खेतिहर किसान, परंतु कृषि और कृष्‍ण की प्रकृति एक है, प्रत्‍ययमात्र भिन्‍न है भगवान और कर्म से भारत के भगवान कृषिमय हैं, इसमें कोई संदेह नहीं। इसलिए उनकी राजलक्ष्‍मी को उनका अनुगमन करना आवश्‍यक ही नहीं परमावश्‍यक है।
आज जो दिया टिमटिमा रहा है वह उसी लक्ष्‍मी की स्‍मृति में, उसी लक्ष्‍मी की प्रतीक्षा में और उसी लक्ष्‍मी की अतृप्‍य लालसा में। इस दिए की लहक में सरसों के वसंती परिधान की आभा है, कोल्‍हू की स्थिर चरमर ध्‍वनि की मंद लहरी है, कपास के फूलों की विहँस है, चिकनी मिट्टी की सोंधी उसाँस है, कुम्‍हार के चक्‍के का लुभावना विभ्रम है और कुम्‍हार के नन्‍हे-नन्‍हे शिशुओं की नन्‍ही हथेलियों की गढ़न। इसमें मानव-श्रम का सौंदर्य है उसके शोषण की विरूपता नहीं। इसी में घट-घट व्‍यापी परब्रह्म की पराज्‍योति है, तथा स्‍वार्थ और परमार्थ की स्‍व और पर की, पार्थिव और अपार्थिव की, ताप और शीत की, नश्‍वर और अनश्‍वर की, नाश और अमरता की मिलन-भूमि एवं उनकी परम अद्वैत-सिद्धि है। भारतीय दर्शन जीवन का आभरण नहीं है, वह तो उसका प्राण है, आदि-स्रोत है और है अनंत महासागर, मानो इसी सत्‍य को जगाने के लिए ही दिया टिमटिमा रहा है।

एक दीपक तुम जलाना

एक दीपक तुम जलाना
रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

काल की गहरी निशा है
दर्द भीगी हर दिशा है।
साथ तुम मेरा निभाना
नहीं पथ में छोड़ जाना।
छोड़ दे जब साथ दुनिया
कंठ  से मुझको लगाना 
एक दीपक तुम जलाना।।

गहन है मन का अँधेरा 
दूर मीलों है सवेरा।
कारवाँ  लूटा किसी ने
नफ़रतों ने प्यार घेरा ।
यहाँ अंधों में  नगर  में   
क्या इन्हें दर्पण दिखाना।
एक दीपक तुम जलाना।।

एक अकेली स्फुलिंग थी
दावानल बन वह फैली।
थी ऋचा-सी पूत धारा
ईर्ष्या-तपी,  हुई मैली।
कालरात्रि का  है पहरा
ज्योति बनकर पथ दिखाना।
एक दीपक तुम जलाना।।

सम्पर्कः सी -1702, जे एम अरोमा , सेक्टर-75, नोएडा, 201301 ( उत्तर प्रदेश)

प्रेमदीप बन जाना

प्रेमदीप बन जाना
-डॉ.कविता भट्ट

मन में तम के हैं स्पंदन
घृणा-द्वेष के हैं सहवास
भीतर तो जड़ता के बंधन
नित अहंकार के मोहपाश
अहं जलाना, मधुरता भरकर,
प्रेमदीप बन जाना।

गहन अँधेरे उस आँगन में
बाहर ही दीपक हैं जलते
मद के उस प्रकम्पन में
द्वेष-भाव भीतर हैं पलते
विषकन्या की बाँहे तजकर,
मेरे स्वप्न सजाना।

प्रत्येक दीपावली में तुमने
दीपक बहुत जलाये होंगे
काली अमावस में तुमने
ज्योतिकलश छलकाये होंगे
इस बार मुझे आलिंगन में ले,
विरह-व्यथा हर जाना।

FDC, PMMMNMTT,II floor , Administrative Block ll, H.N.B. Garhwal Central University Srinagar, Garhwal Uttarakhand 246174

ज्योति दुर्गा जब तू होगी

ज्योति दुर्गा जब तू होगी
-डॉ.ओमप्रकाश गुप्ता

द्वापर युग की बात है, कल की जैसे बात है.
धृतराष्ट्र दरबार सजा, दुर्योधन ने द्यूत रचा.
शकुनि ने माया फैलाई, द्रुपद सुता तब बुलबाई.
दुशासन करने निर्वस्त्र लगा, मानवता का हृदय फटा.

भीष्म पिता ने मोड़ी आँखे, द्रोण गुरु बगले झांकें.
मानवता का नाश हुआ, मानव पापों का दास हुआ.
कृष्णा ने केशव याद किये, प्रभु ने आकर चीर दिए.
द्रुपद सुता की लाज रखी, मानवता की रक्षा की.

द्वापर कब का बीत गया, दुर्योधन-दुशासन अब भी राजा.
नारी अब भी लज्जित होती, होता द्वापर फिर से ताजा.
अंतर अब केवल इतना है, कृष्ण नहीं अब आते हैं.
दुष्टों से मिलने में अब तो, भगवान स्वयं कतरातें हैं.

नारी, तू माता पुत्री, दुष्टों के पापों को पड़ता सहना.
पुरुष वर्ग धृतराष्ट्र हुआ, रक्षा कौन करे तेरी बहना.
अपनी रक्षा तुम स्वयं करो,  माँ दुर्गा का रूप धरो.
लो खड्ग हाथ में तुम अपने,  दुष्टों का संहार करो.

दुष्ट दृष्टि जो भी डाले, दृष्टिहीन कर दो उसको.
अपशब्द यदि कोई बोले, गिराहीन कर दो उसको.
हाथों से पापी स्पर्श करे, भुजाहीन कर दो उसको.
नारी तू बनकर चंडी, पुरुषत्वहीन कर दो उसको.

तेरे भीतर है शक्ति अपार, आह्वान करो उसका बहना.
युग-युग से अत्याचार सहे, और नहीं तुझको सहना.
माता बहना वह दिन दूर नहीं, तेरी पूजा फिर से होगी,
खोया सम्मान मिले तुझको, 'ज्योति' दुर्गा जब तू होगी.

सम्पर्कः ह्युस्टन, अमेरिका, 7१३४७१७८२२ (मोबाइल)