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Apr 16, 2018

लघुकथाएँ: शिक्षा-जगत्

1-मैं कैसे पढ़ूँ? 
-सुकेश साहनी
पूरे घर में मुर्दनी छा गई थी। माँ के कमरे के बाहर सिर पर हाथ रखकर बैठी उदास दाई माँ... रो-रोकर थक चुकी माँ के पास चुपचाप बैठी गाँव की औरतें । सफेद कपड़े में लिपटे गुड्डे के शव को हाथों में उठाए पिताजी को उसने पहली बार रोते देखा था...
शुचि!” टीचर की कठोर आवाज़ से मस्तिष्क में दौड़ रही घटनाओं की रील कट गई और वह हड़बड़ाकर खड़ी हो गई।
तुम्हारा ध्यान किधर है? मैं क्या पढ़ा रही थी... बोलो?” वह घबरा गई। पूरी क्लास में सभी उसे देख रहे थे।
बोलो!” टीचर उसके बिल्कुल पास आ गई।
भगवान ने बच्चा वापस ले लिया...।” मारे डर के मुँह से बस इतना ही निकल सका।
कुछ बच्चे खी-खी कर हँसने लगे। टीचर का गुस्सा सातवें आसमान को छूने लगा।
स्टैंडअप आन द बैंच!”
वह चुपचाप बैंच पर खड़ी हो गई। उसने सोचा--- ये सब हँस क्यों रहे हैं, माँ-पिताजी, सभी तो रोए थे-यहाँ तक कि दूध वाला और रिक्शेवाला भी बच्चे के बारे में सुनकर उदास हो गए थे और उससे कुछ अधिक ही प्यार से पेश आए थे। वह ब्लैक-बोर्ड पर टकटकी लगाए थी, जहाँ उसे माँ के बगल में लेटा प्यारा-सा बच्चा दिखाई दे रहा था । हँसते हुए पिताजी ने गुड्डे को उसकी नन्ही बाँहों में दे दिया था। कितनी खुश थी वह!
टू प्लस-फाइव-कितने हुए?” टीचर बच्चों से पूछ रही थी ।
शुचि के जी में आया कि टीचर दीदी से पूछे जब भगवान ने गुडडे को वापस ही लेना था ,तो फिर दिया ही क्यों था? उसकी आँखें डबडबा गईं। सफेद कपड़े में लिपटा गुड्डे का शव उसकी आँखों के आगे घूम रहा था। इस दफा टीचर उसी से पूछ रही थी । उसने ध्यान से ब्लैक-बोर्ड की ओर देखा। उसे लगा ब्लैक-बोर्ड भी गुड्डे के शव पर लिपटे कपड़े की तरह सफेद रंग का हो गया है। उसे टीचर दीदी पर गुस्सा आया । सफेद बोर्ड पर सफेद चाक से लिखे को भला वह कैसे पढ़े?
2-ग्रहण
पापा! राहुल कह रहा था कि आज तीन बजे...” विक्की ने बताना चाहा ।
चुपचाप पढ़ो!” उन्होंने अखबार से नजरें हटाए बिना कहा, “पढ़ाई के समय बातचीत बिल्कुल बंद !”
पापा कितने बज गए?” थोड़ी देर बाद विक्की ने पूछा।
तुम्हारा मन पढ़ाई में क्यों नहीं लगता? क्या ऊटपटांग सोचते रहते हो? मन लगाकर पढ़ाई करो, नहीं तो मुझसे पिट जाओगे।”
विक्की ने नजरें पुस्तक में गड़ा दीं ।
पापा! अचानक इतना अँधेरा क्यों हों गया है?” विक्की ने खिड़की से बाहर ख़ुले आसमान को एकटक देख़ते हुए हैरानी से पूछा। अभी शाम भी नहीं हुई है और आसमान में बाद्ल भी नहीं हैं! राहुल कह रहा था...”
विक्की!!” वे गुस्से में बोले-ढेर सारा होमवर्क पड़ा है और तुम एक पाठ में ही अटके हो!”
पापा, बाहर इतना अँधेरा...” उसने कहना चाहा ।
अँधेरा लग रहा है ,तो मैं लाइट जलाए देता हूँ। पाँच मिनट में पाठ याद न हुआ, तो  देखना मैं तुम्हारे साथ क्या सुलूक करता हूँ?”
विक्की सहम गया। वह ज़ोर-ज़ोर से याद करने लगा, “सूर्य और पृथ्वी के बीच में चंद्र्मा आ जाने से सूर्यग्रहण होता है... सूर्य और पृथ्वी के बीच...”


3-शिक्षाकाल
सर,मे आय कम इन?” उसने डरते-डरते पूछा।
आज फिर लेट? चलो, जाकर अपनी सीट पर खड़े हो जाओ।
वह तीर की तरह अपनी सीट की ओर बढ़ा...
रुको!” टीचर का कठोर स्वर उसके कानों में बजा और उसके पैर वहीं जड़ हो गए। तेजी से नज़दीक आते कदमों की आवाज़, “जेब में क्या है? निकालो ।”
कक्षा में सभी की नज़रें उसकी ठसाठस भरी जेबों पर टिक गई। वह एक-एक करके जेब से सामान निकालने लगा... कंचे,तरह-तरह के पत्थर, पत्र-पत्रिकाओं से काटे गए कागज़ों के रंगीन टुकड़े, टूटा हुआ इलैक्ट्रिकटैस्टर, कुछ जंग खाए पेंच-पुर्जे...
और क्या-क्या है? तलाशी दो।” उनके सख्त हाथ उसकी नन्ही जेबें टटोलने लगे। तलाशी लेते उनके हाथ गर्दन से सिर की ओर बढ़ रहे थे, “यहाँ क्या छिपा रखा है?” उनकी सख्त अँगुलियाँ खोपड़ी को छेदकर अब उसके मस्तिष्क को टटोल रहीं थीं ।
वह दर्द से चीख पड़ा और उसकी आँख खुल गई।
क्या हुआ बेटा?”माँ ने घबराकर पूछा ।
माँ, पेट में बहुत दर्द हैं” -वह पहली बार माँ से झूठ बोला, “आज मैं स्कूल नहीं जाऊँगा ।”
सम्पर्कः 185,उत्सव,महानगर पार्ट–2,बरेली–243122 (उ.प्र.)

Apr 15, 2018

रक्षक

रक्षक
-सत्या शर्मा कीर्ति
शिप्रा का रिजर्वेशन जिस बोगी में था उसमें लगभग लड़के ही लड़के भरे थे। टॉयलेट जाने के बहाने शिप्रा पूरी बोगी घूम आई थी, मुश्किल से दो या तीन औरतें होंगी। मन अनजाने भय से काँप-सा गया।
पहली बार अकेली सफर कर रही थी इसलिए पहले से ही घबराई हुई थीअतः खुद को सहज रखने के लिए  चुपचाप अपनी सीट पर मैगजीन निकाल कर पढ़ने लगी।
शायद किसी केम्प जा रहे नवयुवकों का झुंड जिनकी हँसी-मजाक, चुटकुले उसकी हिम्मत को और भी तोड़ रहे थे।
शिप्रा के भय और घबराहट के बीच अनचाही सी रात धीरे - धीरे उतरने लगी।
सहसा सामने के सीट पर बैठे लड़के ने कहा –“हेलो! , मैं साकेत और आप?
भय से पीली पड़ चुकी शिप्रा ने कहा –“जी मैं----
“कोई बात नहीं नाम मतबताइए।वैसे कहाँ जा रहीं हैं आप?
शिप्रा ने धीरे से कहा –“इलाहबाद।
“क्या इलाहाबाद-?वो तो मेरा नानीघर है। इस रिश्ते से तो आप मेरी बहन लगीं”-खुश होते हुए साकेत ने कहा।
और फिर इलाहाबाद की अनगिनत बातें बताता रहा कि उसके नाना जी काफी नामी व्यक्ति  हैं, उसके दोनों मामा सेना के उच्च अधिकारी हैंऔर ढेरों नई-पुरानी बातें।”
शिप्रा भी धीरे-धीरे सामान्य हो उसके बातों में रुचि लेती रही।
रात जैसे कुँवारी आई थीवैसे ही पवित्र कुँवारी गुजर गई।
सुबह शिप्रा ने कहा- “लीजिए मेरा पता रख  लीजिए। कभी नानीघर आइए तो जरूर मिलने आइएगा।”
'कौन सा नानीघर बहन? वो तो मैंने आपको डरते देखा तो झूठ-मूठ के रिश्ते गढ़ता रहा। मैं तो कभी इलाहबाद आया ही नहीं.”
“क्या--!” चौंक उठी शिप्रा।
“बहन ऐसा नहीं है कि सभी लड़के बुरे ही होते हैं कि किसी अकेली लड़की को देखा नहीं कि उस पर गिद्ध की तरह टूट पड़ें। हम में ही तो पिता और भाई भी होते हैं.” कहकर प्यार से उसके सर पर हाथ रख मुस्कुरा उठा साकेत।
सम्पर्कः डी-2,सेकेण्डफ्लोर, महाराणा अपार्टमेन्ट, पी. पी. कम्पाउण्ड राँची-834001

बच्चों के लिए चित्रमयी झाँकी

बच्चों के लिए चित्रमयी झाँकी
एकलव्य प्रकाशन-- 10 शंकर नगर बीडीए कॉलोनी, 
शिवाजी नगर, भोपाल-462016 (.प्र.)
फोन- 91- 7552550976, 267 1017
 www.eklavya.in / books@eklavya.in
एकलव्य द्वारा बच्चों के लिए प्रकाशित पुस्तकें हमेशा ही उपयोगी, रचनात्मकता लिये हुए और कहानी, कविता तथा विभिन्न घटनाक्रमों के माध्यम से शिक्षा देने के साथ प्रेरक होती हैं।  पुस्तकों में उकेरे गए चित्र अपने आप में पूरी कथा का बिम्ब प्रस्तुत करते हैं। बच्चों को जिन्हें पढऩा नहीं पड़ता, वे सिर्फ चित्र देखकर जानकारी हासिल करते हैं। यूँ भी बच्चों को चित्रों के माध्यम से सिखाना- पढ़ाना ज्यादा आसान होता है, बनिस्तपत शब्दों के। रंग- बिरंगे चित्र बच्चों को सबसे पहले आकर्षित करते हैं।  एकलव्य से प्राप्त सभी किताबें रंग- बिरंगे चित्रों से भरी हुईं हैं। ऐसी किताबें जिनमें चित्र बोलते हैं, शब्द नहीं।
सिर का सालन-
सिर का सालन खदीर के परिवार में इतवार के दिन भोजन पकाने की ऐसी कहानी है कि मुँह में पानी आ जाए। इसके लेखक हैं मोहम्मद खदीर बाबू और चित्रकार हैं गुलाम मोहम्मद शेख।
मितवा-
परिवार के रिश्तों से जूझती और उसमें अपने लिए जगह तलाशती एक लड़की मितवा की कहानी। इसके लेखक हैं कमला भसीन और चित्र बनाए हैं शिवांगी।
खत-
 खत लिखने से उनके गंतव्य तक पहुँचने की यात्रा की बात करती एक किताब। इसके लेखक और चित्रकार हैं सुमित पाटिल व रुपाली बर्गें।
पतंग-
 सपनों को उडाऩ देती पतंग। बचपन में रंग भरती पतंग। पुस्तक के लेखक हैं राजेश जोशी और चित्र बनाए हैं सुविधा मिस्त्री ने।
आओ बादल-
बारिश और बादलों पर आधारित एक कविता। इसके लेखक हैं श्याम सुशील और चित्रों से संजोया हिै प्रोइती रॉय ने।
क्या बात हो गई-
साँझ का वर्णन करती एक कविता। इस किताब के रचनाकार हैं प्रभात औतर चित्र बनाए हैं हीरा धुर्वे ने।
लाल पहाड़-
 यह कहानी है एक कछुए और लाल पहाड़ की। यह बिना शब्दों की चित्रमय कहानी है । जिसके चित्रकार हैं- वासवी ओज़ा।
अच्छा मौसी अलविदा-
चिडिय़ा और बिल्ली के बीच हो रहे खट्टे मीठे संवादों को बयाँ करती एक किताब. मय माड़ की लोककथा है जिसका पुनर्लेखन किया है प्रभात ने औतर मांडना शैली के चित्र बनाए है सुनीता ने।
कुत्ते का एक दिन-
यह एक कुत्ते के एक दिन की चित्रमय कहानी है जो बच्चो को बहुत पसंद आने वाली है। इतसके चित्र बनाए हैं नरेन्द्रन आर नायर ने।
जब पुरुषों ने शिकार किया, तब महिलाओं ने क्या किया?-
जब पुरुष  शिकार के लिए जाती थीं तो महिलाएँ क्या करती थीं। पाषाणकाल में मिले शैल चित्रों में इस सवाल का जवाब तलाशती एक किताब। इसके लेखक हैं सी.एन.सुब्रह्मण्यम्।
जब महिलाओं ने शिकार किया, तब पुरुषों ने क्या किया-
मध्यकालीन शिल्पों में महिला शिकारियों की मज़ेदार कहानियाँबयाँ करती एक छोटी-सी चित्र किताब। इसके लेखक हैं सी,एन. सुब्रह्मण्यम्।
अकाल और उसके बाद-
यह किताब नागार्जुन की एक चर्चित कविता में से एक है। कविता को चित्रों से सँजोया है कैरनहेडॉक ने।
कहानियों का पेड़-
इस किताब की कहानियाँ सबरी और उसके दोस्तों की है। सबरी जिसको चित्र बनाना बेहद पसंद है। इन कहानियों को लिखा है रिनचिन ने और चित्र बनाए हैं कनक शशि ने।
कक्कु के कारनामे -
 कक्कु का पढऩे में बिलकुल मन नहीं लगता था पर खेलना और दोस्त बनाना उसे बेहद पसंद था । उसकी शरारतों को बयाँ करती खूसबसूत किताब है यह। इसके लेखक हैं पीके बसन्त।
अकम से पुरम तक-
 एक कहानी जब जन्म लेती है तो क्या होती है? उसमें कहने सुनने वाले कितना कुछ जोड़ते और बदलते हैं। इससे कहानी एक विस्तार पाती है। कहानी के इसी सफर को दर्शाती है यह किताब। इसकी लेखिका हैं तेजी ग्रोवर।
जंगली सरसों के उपहार-
एक फसल से दूसरी फसल का विकास कैसे हुआ? प्राकृतिक और कृत्रिम चयन क्या है? उन्हीं सवालों पर चर्चा करती है यह किताब। इस किताब के कहानीकार और चित्रकार हैं कैरन हेडॉक।
चलों चलें पक्षी देखने-
बच्चों को आसपास के पक्षियों से रूबरू कराती एक चित्रकथा है यह किताब। पक्षियों को चित्रों में उकेरा है श्रद्धा किरकिरे ने।
मैं ढूँढ़ रहा हूँ-
दूसरे विश्व युद्ध के समय जापान के हिरोशिमा शहर में अमरीका द्वारा परमाणु बम गिराया गया। इस किताब में प्रस्तुत कविताएँ जापान के शान्ति संग्रहालय में परमाणु बम से प्रभावित हुए लोगों की प्रदर्शित वस्तुओं पर लिखी गई हैं। इसके लेखक हैं आर्थर बिनार्ड और जापानी से हिन्दी में अनुवाद किया है तोमोको किकुचि ने।