मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।

Jun 7, 2017

पर्यावरण

            कटते जंगल,पटते तालाब,
                     प्रदूषित नदियाँ 
                और बंजर होती जमीन

                            -प्रो. अश्विनी केशरवानी
गाँव अब शहर में तब्दिल होते जा रहे हैं। आज यहाँ बड़ी बड़ी इमारतें, मोटर-गाड़ी देखे जा सकते हैं। गाँव का गुड़ी/ चौपाल और अमराई आज देखने को नहीं मिलता... नई पीढ़ी के लोगों को मालूम भी नहीं होगा कि गाँवों में ऐसा कुछ रहा भी होगा। हमारे पूर्वजों ने गाँव में अमराई लगाना, कुँआ खुदवाना और तालाब खुदवाना पुण्य कार्य समझा और उसे करवाया। रसीले और पक्के आम का स्वाद भी हमने चखा। आज नई पीढ़ी के बच्चे बोतल में बंद मेंगो जूस, फ्रूटी और आमरस का जेली आदि को सर्वोत्तम भले मान ले लेकिन पलाई आम को चूसने और आम का अमसरा खाने का मजा कुछ और ही था।
मुझे मेरे घर में हमारे पूर्वजों के द्वारा कुँआँ और खुदवाने सम्बन्धी कागजात मिले हैं जिसके एवज में डिप्टी कमिश्नर, रायपुर के द्वारा प्रशस्ति पत्र दिये गये हैं। अर्थात! उस काल में कुँआँ और तालाब खुदवाना अत्यंत पुण्य कार्य था। तालाबों के किनारे बरगद, पीपल और नीम के पेड़ लगवाये गए थे जिसकी छाँव में हमारा बचपन गुजरा था। मेरी दादी बताती है कि उनका 5-6 वर्ष का बच्चा खत्म हो गया जिसकी याद में उनके ससुर ने छुइया तालाब के किनारे पाँच पेड़ लगवाए थे जिसकी छाया आज भी सबको मिलती है। प्राय: सभी गाँवों में अनेक तालाब, तालाब के किनारे पेड़ और शिव मंदिर अवश्य होते थे। इसी प्रकार धर्मार्थ कुँएँ खुदवाए जाते थे। तालाब वाटरहार्वेस्टिंगका बहुत अच्छा माध्यम था।
आज गांवों की तस्वीर बदली हुई है। लोगों ने घरों के फर्नीचर के लिए अमराई के पेड़ों को कटवा डाला है। आज वहाँ पेड़ों के ठूँठ ही शेष हैं। अमराई के आमों की बातें किस्से कहानियों जैसे लगता है। तालाब अब जाना नहीं होता क्योंकि घरों में बोरिंग हो गया है, पंचायत द्वारा पानी सप्लाई भी की जाती है... अर्थात् घर बैठे पानी की सुविधा हो गयी है। इसलिए तालाब की उपयोगिता या तो मछली पालन के लिए रह गयी है या फिर उसे पाटकर इमारत बनाये जा रहे हैं। गाँव से शहर बन रहे कस्बों के तालाबों में घरों का गंदा पानी डाला जा रहा है। रतनपुर, मल्हार, खरौद और अड़भार में कभी 120 से 1400 तालाब होने की बात कही जाती है। रायगढ़ में इतने तालाब थे कि उसे खइया गाँवके नाम से संबोधित किया जाने लगा था। लेकिन आज वहाँ कुछ ही तालाब शेष हैं बाकी सबको पाटकर बड़ी बड़ी इमारतें, स्कूल-कालेज और सिनेमा हाल बना दिया गया है। कहना न होगा कि तालाब और नदियों के किनारे लगे पेड़ों के जड़ मिट्टी को बांधे रखता था, जिसके कटने से नदियों का कटाव बढ़ते जा रहा है और आने वाले समय में समूचे गाँव के नदी में समा जाने का खतरा बनने लगा है।
 गाँव के बाहर प्राय: सभी छोटे-बड़े किसानों का घुरवाहोता था जिसमें गाय और भैंस का गोबर डाला जाता था। भविष्य में यही उत्तम खाद बन जाता था और बरसात के पहले उसे खेतों में डाला जाता था जिससे खेतों की उर्वरा शक्ति बढ़ जाती थी और पैदावार अच्छी होती थी। तब दुबराज चावल की खुशबू पूरे घर में फैल जाती थी। आज गाँवों में ऐसा कुछ नहीं होता क्योंकि आज हल की जगह ट्रेक्टर, गोबर खाद की जगह यूरिया खाद ले लिया है। पानी नहीं बरसा तो नहर से लिया जाता है जब नहर से पानी नहीं मिला तो ट्यूबबेल खोदकर पानी खींचकर सिंचाई की जाती है। फसल में कीड़े हो जाते हैं तो कीट नाशक दवाइयाँ डाली जाती है। भले ही अब दुबराज चावल में खुशबू नहीं है लेकिन सरकार द्वारा कम समय में अधिक पैदावार वाले धान के बीज उपलब्ध करा दिया जाता है। 
किसानों की  चिन्ता  है कि उनके बच्चे खेतों में जाना नहीं चाहते। वे तो पान ठेला, होटल और अन्य दुकान खोलकर जीने के आदी होते जा रहे हैं। नई पीढ़ी के खेती-किसानी के प्रतिअरुचि से खेत बंजर होते जा रहे हैं, यह  चिन्ता  की बात है। घर में खाने को कुछ हो या न हो लेकिन एक मोटर साइकल अवश्य होना चाहिये। इसके लिए बैंक और फ़ाइनेंसिंगकंपनियाँ लोन देने को तैयार बैठे हैं। लोन के कर्ज में घर भले ही डूब जाए, इससे किसी को कुछ लेना देना नहीं होता। लोगों का मानना है कि कर्ज में हम जन्म लेते हैं, कर्ज में जीते हैं और कर्ज लिये मर जाते हैं...।

खुशी की बात है कि नदी किनारे वाले गाँवों में औद्योगिक प्रतिष्ठान लगते जा रहे हैं। लोगों को उम्मीद है कि औद्योगिक प्रतिष्ठानों के लगने से उन्हें रोजगार मिल जाएगा, व्यापारियों का व्यापार बढ़ जायेगा, मकान मालिकों को किरायेदार मिल जायेगा.....। छत्तीसगढ़ शासन औद्योगिक समूहों को प्रतिष्ठान लगाने के लिए आमंत्रित कर रही है, यहाँ उन्हें भूमि मुहैया करा रही है तो स्वाभाविक है कि यहाँ औद्योगिक प्रतिष्ठान लगेंगे ही... लगते जा रहे हैं। अकेले रायगढ़ जिले के आसपास लगभग 150 आयरन और पावर प्लांट लग चुके हैं। छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा जिंदल स्पंज और स्टील प्लांट लग चुका है और जल्द ही उनका पावर प्लांट लगने वाला है। इसके लिए केलो नदी में उनका पावर प्लांट लगने वाला है। इसी प्रकार अनेक औद्योगिक प्रतिष्ठान लग चुके हैं और लगते जा रहे हैं। स्वाभाविक रूप से इन सभी प्रतिष्ठानों को पानी की आवश्यकता होगी जिसकी पूर्ति नदियों के ऊपर बने बाँधों से की जा रही है। बाँध के बनने से नदियों में पानी ही नहीं है और है भी तो औद्योगिक प्रतिष्ठानों से निकला रासायन युक्त गंदा पानी है जिससे नदियाँ प्रदूषित हो गईहै।
प्रदेश में औद्योगिक प्रतिष्ठानों के लगने से राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजार में विकास का ग्राफ अवश्य बढ़ा है। लेकिन विकास के साथ साथ अनेक प्रकार की बुराइयाँ भी आती हैं जिसे प्रत्यक्ष रूप से देखा जा सकता है। औद्योगिक प्रतिष्ठानों से निकला धुँआँ जहाँ पेड़ों के चक्रीय जीवन को प्रभावित कर रहा है, वहीं उसके धुएँ से खेत की उर्वरा शक्ति खत्म होती जा रही है और खेत बंजर होते जा रहे हैं। अधिकतर नदियों में बाँध बनाये जा चुके हैं जिससे नदियाँ सूख गयी है। उसमें जो थोड़ा बहुत जल है उसमें औद्योगिक प्रतिष्ठानों का रसायन युक्त गंदा पानी प्रवाहित हो रहा है। इससे जन जीवन अस्त व्यस्त होते जा रहा है।
आज फसल चक्र की बात की जाती है... फ सल चक्र तो नहीं बदला लेकिन जलवायु परिवर्तन अवश्य हो गया है। एक ही नगर में कहीं बरसात होती है तो कहीं नहीं होती। जल का चक्र के प्रभावित होने से ऐसा होता है। जलवायु परिवर्तन विकसित और विकासशील देशों के बीच वाद विवाद का विषय जरूर बना है लेकिन सच्चाई यह है कि हवा, पानी, भोजन, स्वास्थ्य, खेती, आवास आदि सभी के ऊपर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ने वाला है। समुद्री जल स्तर केबढ़ने से प्रभावित होते तटीय क्षेत्र के लोग हों या असामान्य मानसून अथवा जल संकट से त्रस्त किसान, विनाशकारी समुद्री तूफान का कहर झेलते तटवासी हों अथवा सूखे से त्रस्त और असमान्य मौसम से जनितअजीबो-गरीब बीमारियां झेलते लोग या फिर विनाशकारी बाढ़ में अपना सब कुछ गवाँ बैठे और दूसरे क्षेत्रों में पलायन करते तमाम लोग जलवायु परिवर्तन की मार झेल रहे हैं।
प्रकृति के तीन उपकार: मिट्टी पानी और बयार
  औद्योगिक क्रांति की भट्ठी में हमने अपना जंगल झोंक दिया है। पेड़ काट डाले और सडक़ें बना डालीं। कुल्हाड़ी-आरी से जंगल काटने में देर होती थी, तो पावर से चलने वाली आरियाँ गढ़ डालीं। सन् 1950 से 2000 के बीच 50वर्षो में दुनिया के लगभग आधे जंगल काट डाले, आज भी बेरहमी से काटे जा रहे हैं। जल संग्रहण के लिए तालाब बनाये जाते थे जिससे खेतों में सिंचाई भी होती थी। लेकिन आज तालाब या तो पाटकर उसमें बड़ी बड़ी इमारतें बनायी जा रही है या उसमें केवल मछली पालन होता है। मछली पालन के लिए कई प्रकार के रसायनों का उपयोग किया जाता है जिसका तालाबों का पानी अनुपयोगी हो जाता है। इसी प्रकार औद्योगिक धुँएँ से वायुमंडल तो प्रदूषित होता ही है, जमीन भी बंजर होती जा रही है। इससे प्रकृति का संतुलन बिगड़नेलगा है और दुष्परिणाम हम भुगत रहे हैं। आखिर जंगल क्यों जरूरी है? पेड़ हमें ऐसा क्या देते हैं, जो उन्हें बचाना जरूरी है? पेड़ हमें फल, फूल, जड़ी-बूटी, भोजन, इंधन, इमारती लकड़ी, गोंद, कागज, रेशम, रबर और तमाम दुनिया के अद्भुत रसायन देते हैं। इसलिए हमने उसका दोहन (शोषण) तो किया, पर यह भूल गये कि वृक्षों के नहीं होने से यह धरती आज वीरान बनती जा रही है। वनों के इस उपकार का रुपयों में ही हिसाब लगायें तो एक पेड़ 16 लाख रुपये का फायदा देता है। घने जंगलों से भाप बनकर उड़ा पानी वर्षा बनकर वापस आता है और धरती को हरा भरा बनाता है। पेड़ पौधों की जड़ें मिट्टी को बाँधे रहती है। पेड़ों की कटाई से धरती की हरियाली खत्म हो जाती है। धरती की उपजाऊ मिट्टी को तेज बौछारों का पानी बहा ले जाती है। पेड़ों की ढाल के बिना पानी की तेज धाराएँपहाड़ों से उतर कर मैदानों को डुबाती चली जाती है। हर साल बाढ़ का पानी अपने साथ 600 करोड़ टन मिट्टी बहा ले जता है। मिट्टी के इस भयावह कटाव को रोकने का एक ही उपाय है-वृक्षारोपण। मिट्टी, पानी और बयार, ये तीन उपकार हैं वनों के हम पर। इसलिए हमारे देश में प्राचीन काल से पेड़ों की पूजा होती आयी है।                           
सम्पर्क: राघव, डागा कालोनी, चाम्पा (छ.ग.)         

उदास है नदी

उदास है नदी 

- गोर्वधन यादव

(1)
सूख कर काँटा हो गई नदी
पता नहीं, किस दुख की मारी है बेचारी?
न कुछ कहती है, न कुछ बताती है।
एक वाचाल नदी का -
इस तरह मौन हो जाने का -
भला, क्या अर्थ हो सकता है?
(2)
नदी क्या सूखी
सूख गए झरने
सूखने लगे झाड़-झंखाड़
उजाड़ हो गए पहाड़
बेमौत मरने लगे जलचर
पंछियों ने छोड़ दिए बसेरे
क्या कोई इस तरह
अपनों को छोड़ जाता है?.
(3)
उदास नदी
उदासी भरे गीत गाती है
अब कोई नहीं होता
संगतकार उसके साथ
घरघूले बनाते बच्चे भी
नहीं आते अब उसके पास
चिलचिलाती धूप में जलती रेत
उसकी उदासी और बढ़ा देती है
(4)
सिर धुनती है नदी अपना
क्यों छोड़ आयी बाबुल का घर
न आयी होती तो अच्छा था
व्यर्थ ही न बहाना पड़ता उसे
शहरों की तमाम गन्दगी
जली-अधजली लाशें
मरे हुए ढोर-डंगर
(5)
नदी-
उस दिन
और उदास हो गई थी
जिस दिन
एक स्त्री
अपने बच्चों सहित
कूद पड़ी थी उसमें
और चाहकर भी वह उन्हें
बचा नहीं पाई थी।
(6)
नदी-
इस बात को लेकर भी
बहुत उदास थी कि
उसके भीतर रहने वाली मछली
उसका पानी नहीं पीती
कितनी अजीब बात है
क्या यह अच्छी बात है?
(7)
घर छोडक़र
फिर कभी न लौटने की टीस
कितनी भयानक होती है
कितनी पीड़ा पहुँचाती है
इस पीड़ा को
नदी के अलावा
कौन भला जान पाता है?
(8)
दुखियारी नदी
अपना दु:ख बतलाने से पहले ही
मनमसोसकर रह जाती है, कि
जब लोग-
देश की ही कद्र नहीं करते
तो फिर भला कौन-
उसकी कद्र करेगा?
(9)
नदी
महज इसलिए दु:खी नहीं है,
कि लोग उसमें कूड़ा डालते हैं
महिलाएँ गंदे कपड़े धोती है,
और विसर्जित की जाती हैं
आदमकद प्रतिमाएँ
फूल मालाएँ और
न जाने क्या-क्या
वह दु:खी होती है
तो इस बात पर, कि
लोग यह जानना ही नहीं चाहते,
कि किस बात का
दु:ख है नदी को?
(10)
बैठकर नदी के किनारे
कितने ही ग्रंथ रच डाले थे
अनाम ऋषि-मुनियों ने।
नदी तो अब भी बह रही है-
जैसे की कभी बहा करती थी
क्या कोई यह बता सकता है
आज किसने क्या लिखा -
कब लिखा और
कितना सार्थक लिखा?
(11)
नहीं जानती नदी
अपना जनम दिन
और न ही जानती वह
किसी तिथि और वार को
जनमी थी वह।
वह तो केवल
इतना भर जानती है, कि
उसे बहते ही रहना है-
हर हाल में।

वेदों में पर्यावरण

हमारे विकास का 
प्रतीक है
वनों की हरीतिमा
- डॉ. प्रणब

जैसे-जैसे मनुष्य अपनी वैज्ञानिक शक्तियों का प्रयोग करता जा रहा है, वैसे-वैसे प्रदूषण की समस्या बढ़ती जा रही है। विकसित देशों में वातावरण का प्रदूषण सबसे अधिक बढ़ रहा है और यह ऐसी  चिन्ता  एवं समस्या है, जिसे किसी विशिष्ट क्षेत्र या राष्ट्र की सीमाओं में बांधकर नहीं देखा जा सकता। यह विश्वव्यापी समस्या है, इसीलिए सभी राष्ट्रों का संयुक्त प्रयास ही इस समस्या से मुक्ति दिलाने में सहायक हो सकता है। वेद शब्द से वह ज्ञान अभिप्रेत है, जिसको सर्वप्रथम ऋ षि-महर्षियों ने खोजा अथवा साक्षात्कृत किया। वेद संपूर्ण वाङ्मय का बोधक शब्द है। ऋ षियों ने जिस परमात्मास्वरूप ज्ञान का साक्षात्कार किया, वह दीप्तिपुंज, वेद, भारतीय ज्ञान गंगा का उत्स है, जो अपनी दिव्य आभा से स्वयं भासित है।
वेद अपौरुषेय और अनादि हैं, इसलिए वे स्वयंभू, स्वयं प्रकाश और स्वत: प्रमाण हैं। भारतीय संस्कृति के इतिहास में वेदों का स्थान अत्यंत गौरवपूर्ण है। अपने प्रातिम चक्षु के सहारे साक्षात्कृत धर्म ऋ षियों द्वारा अनुभूत अध्यात्म शास्त्र के तत्वों की विशाल शब्दराशि का ही नाम वेद है। लौकिक वस्तुओं का साक्षात्कार करने के लिए जिस प्रकार नेत्र की उपयोगिता है, उसी प्रकार अलौकिक तत्वों का रहस्य जानने के लिए वेद की उपादेयता है। इष्टप्राप्ति तथा अनिष्ट परिहार के लिए कि वह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष के द्वारा दुर्बोध तथा अज्ञेय उपाय का ज्ञान स्वयं कराता है।
प्रकृति, भारतीयों के लिए सदा से पूजनीय रही है, चाहे कांति प्राप्ति के लिए सूर्य का पूजन हो, चाहे नारी को स्वामी की दीर्घायु का वरदान मांगना हो या निर्धन को कुबेर बनने का स्वप्न अथवा विद्यार्थी को विद्या प्राप्ति की कामना अथवा हमें जीवन प्रदान करने वाली नदियों की उपासना हो, इन सबके लिए हमें वेदों की शरण में ही जाना पड़ता है। वेदों में वर्णित नदी, सागर, सूर्य, चंद्र, जल और वायु- ये सभी हमारी आस्था के स्रोत रहे हैं। हमने तो वृक्षों से वरदान मांगना भी अपनी संस्कृति में समाहित कर लिया है। प्रकृति के अनेक वृक्षों का समय-समय पर पूजन करके हम यश और कीर्ति के अनुगामी बनते हैं।
अथर्ववेद में वृक्षों एवं वनों को संसार के समस्त सुखों का स्रोत कहा गया है। वृहदारण्यकोपनिषद् में बताया गया है कि वृक्षों में जीवनी शक्ति है। वन में व्याप्त महर्षियों के गुरुकुलों और आश्रम ने ही भारतीय ज्ञान-प्रणाली ने संसार की संपन्नता को विकसित किया। वनों में पले भरत जैसे वीरों ने शेर के दांत गिने। वृक्षों की अपूर्व जीवनदायिनी शांति के कारण वृक्षों को काटना वैदिक धर्म में पातक माना गया है, क्योंकि वृक्ष स्वयं बड़े परोपकारी होते हैं। वन हमारी संपदा रहे हैं और उसके पोषक तत्वों की रक्षा करते हैं। वृक्ष पर्वतों को थामे रखते हैं, वे तूफानी वर्षा को दबाते हैं तथा नदियों को अनुशासन में रखते हैं तथा पक्षियों का पोषण कर पर्यावरण को सुखद, शीतल एवं नीरोग बनाते हैं। अत: वृक्षों को वर्षा का संवाहक कहा जाता है। वन वर्षा के जल को सोखकर अपनी जड़ों द्वारा पानी की धार की बजाए घटाने के बढ़ाते रहते हैं। वेदों तथा पुराणों में दस गुणवान पुत्रों का यश उतना ही है, जितना एक वृक्ष लगाने का सांस्कृतिक विकास ही वनों की प्राकृतिक हरियाली में हुआ है। वनों की हरीतिमा हमारे विकास की प्रतीक है, यह नेत्रों को अपूर्व स्फूर्ति एवं चेतना प्रदान करती है।
पद्मपुराण में लिखा है जो मनुष्य सड़क के किनारे तथा जलाशयों के तट पर वृक्ष लगाता है, वह स्वर्ग में उतने ही वर्षों तक फलता-फूलता रहता है, जितने वर्षों तक वह वृक्ष फलता-फूलता है।
स्वार्थ के वशीभूत होकर बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण लोगों ने पेड़ों को काटना आरंभ कर दिया। वन के वन नष्ट हो गए, इससे देश में अनावृष्टि होने लगी, रेगिस्तान के चरण बढऩे लगे, धूल भरी आँधियाँ चलने लगीं। वातावरण और पर्यावरण प्रदूषित होने लगा।
वेदों में पर्यावरण का वर्णन अनेक स्थानों पर मिलता है। पर्यावरण का अर्थ है- पृथ्वी पर विद्यमान जल, वायु, ध्वनि, रेडियोधर्मिता एवं रासायनिक पर्यावरण। जब ये समृद्ध होते हैं तो हमें जीवन एवं नीरोगता प्रदान करते हैं। जब ये पर्यावरण के आवश्यक तत्व दूषित हो जाते हैं तो हमारी  चिन्ता  का विषय बन जाते हैं। यही पर्यावरण  चिन्ता  प्रदूषण का प्रयोग बन गया है। चारों ओर पर्यावरण में विकृति ही प्रदूषण को जन्म देती है।
आज हमारा वायुमंडल अत्यधिक प्रदूषित हो चुका है, जिसके कारण मानव का जीवन खतरे में आ गया है। दुनिया के प्रसिद्ध यात्री इब्नेबतूता ने भारत आने पर चौदहवीं शती के शासक मुहम्मद तुगलक के जीवनकाल के संस्मरणों में गंगा की पवित्रता एवं निर्मलता का उल्लेख करते हुए प्राथमिकताओं में अपने लिए गंगा के जल का प्रबंध भी सम्मिलित था। गंगाजल को ऊँट, घोड़े, हाथियों पर लादकर दौलताबाद पहुँचाने में डेढ़-दो महीने लगते थे। कहा जाता है कि गंगाजल तब भी साफ एवं मीठा बना रहता था, तात्पर्य यह है कि गंगाजल हमारी आस्थाओं और विश्वासों का प्रतीक इसी कारण बना था क्योंकि वह सब प्रदूषणों से मुक्त था, किंतु अनियंत्रित औद्योगीकरण, हमारे अज्ञान एवं लोभ की प्रवृत्ति ने, देश की अन्य नदियों के साथ गंगा को भी प्रदूषित किया है। वैज्ञानिकों का विचार है कि तन-मन की सभी बीमारियों को धो डालने की उसकी औषधीय शक्तियाँ अब समाप्त होती जा रही हैं। यदि प्रदूषण इसी गति से बढ़ता रहा तो गंगा के शेष गुण भी शीघ्र नष्ट हो जाएँगे और गंगा तेरा पानी अमृतवाला मुहावरा निरर्थक हो जाएगा।
पर्यावरण  चिन्ता  में जल, वायु एवं स्थल की भौतिक, रासायनिक और जैविक विशेषताओं में होने वाला वह अवांछनीय परिवर्तन है, जो मनुष्य और उसके लिए लाभदायक दूसरे जंतुओं, पौधों, औद्योगिक संस्थानों तक दूसरे कच्चे माल इत्यादि को किसी भी रूप में हानि पहुँचाता है।
वेदों में कहा गया है कि जीवधारी अपने विकास और व्यवस्थित जीवन-क्रम के लिए एक संतुलित पर्यावरण एवं वातावरण पर निर्भर रहते हैं। संतुलित पर्यावरण में प्रत्येक घटक एक निश्चित मात्रा में उपस्थित रहता है। वातावरण में कुछ हानिकारक घटकों का प्रवेश हो जाता है, परिणामत: समस्त जीवधारियों के लिए किसी-न-किसी रूप में हानिकारक सिद्ध होता है जो पर्यावरणीयचिन्ता को जन्म देता है।
पर्यावरण के प्रति  चिन्ता  की समस्या का जन्म जनसंख्या वृद्धि के साथ हुआ है। विकासशील देशों में औद्योगिक, रासायनिक कचरे ने जल ही नहीं, वायु और पृथ्वी को भी प्रदूषित किया है। भारत जैसे देशों में घरेलू कचरे और गंदे जल की निकासी ने विकराल रूप ले लिया है।
सभी जीवधारियों के लिए जल बहुत महत्त्वपूर्ण एवं आवश्यक है। पौधे भी अपना भोजन जल के माध्यम से ही प्राप्त करते हैं, यह भोजन पानी में घुला रहता है। जल में अनेक प्रकार के खनिज तत्व, कार्बनिक-अकार्बनिक पदार्थ तथा गैसें घुली रहती हैं, यदि जल में आवश्यकता से अधिक पदार्थ एकत्र हो जाते हैं तो जल प्रदूषित होकर हानिकारक हो जाता है और वह प्रदूषित जल उदर एवं यकृत के पीलिया जैसे भयंकर रोग को जन्म देता है।
वायुमंडल में विभिन्न प्रकार की गैसें एक विशेष अनुपात में उपस्थित रहती हैं। जीवधारी अपनी क्रियाओं द्वारा वायुमंडल में ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड का संतुलन बनाए रखते हैं। अपनी श्वसन प्रक्रिया द्वारा हम ऑक्सीजन ग्रहण करते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ते रहते हैं। हरे पौधे प्रकाश की उपस्थिति में कार्बन डाइऑक्साइड लेकर ऑक्सीनज निष्कासित करते रहते हैं। इससे दोनों गैसों का संतुलन बना रहता है, किंतु मानव अज्ञानतावश अपनी आवश्यकता के नाम पर वनों को काटकर इस संतुलन को बिगाड़ता है। मिलों की चिमनियों से निकलने वाले धुएँ के कारण हानिकारक गैसों में सल्फर डाइऑक्साइड गैस का प्रदूषण में प्रमुख योगदान है।
वायु प्रदूषण से मनुष्य के स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है, वायु में विकसित अनेक धातुओं के कण जैसे सीसा, कैडमियम, नाइट्रोजन, ओजोन और प्रदूषित वायु शरीर संस्थान में अनेक विकृतियाँ ला देते हैं। अनेक प्रकार के वाहन, मोटर-कार, बस, जैट विमान, ट्रैक्टर आदि तथा लाउड-स्पीकर, बाजे एवं कारखाने के साइरन व विभिन्न प्रकार की मशीनों आदि से ध्वनि-प्रदूषण उत्पन्न होता है। ध्वनि की लहरें जीवधारियों की क्रियाओं को प्रभावित करती हैं।
अधिक तेज ध्वनि से मनुष्य की सुनने की शक्ति का ह्रास होता है और अनिद्रा रोग सताता है। इससे स्नायुतंत्र विकृत होकर पागलपन को जन्म देता है। कुछ ध्वनियाँ छोटे-छोटे कीटाणुओं को नष्ट कर देती हैं, परिणामत: बहुत से पदार्थों का प्रकृतिक, रूप से अपघटन नहीं होता।
प्राय: कृषक अधिक पैदावार के लिए कीटनाशक और रोगनाशक दवाओं तथा रसायनों का प्रयोग करते हैं। इनका स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। आधुनिक पेस्टीसाइडों का अंधाधुंध प्रयोग भी लाभ के स्थान पर हानि ही पहुँचा रहा है। जब ये रसायन जल के साथ बहकर नदियों द्वारा सागर में पहुँच जाते हैं तो वहाँ पर रहने वाले जीवों पर घातक प्रभाव डालते हैं। इतना ही नहीं, किसी-न-किसी रूप में मानव-देह भी इनसे प्रभावित होती है।
परमाणु शक्ति उत्पादन केंद्रों और परमाणु परीक्षणों के फलस्वरूप जल, वायु तथा पृथ्वी का प्रदूषण निरंतर बढ़ता जा रहा है। यह प्रदूषण आज की पीढ़ी के लिए ही नहीं, वरन् भावी पीढ़ी के लिए हानिकारक सिद्ध होगा। विस्फोट के समय उत्पन्न रेडियोधर्मी पदार्थ वायुमंडल की बाह्य परतों में प्रवेश कर जाते हैं। जहाँ वे ठंडे होकर संघनित अवस्था में बूंदों का रूप ले लेते हैं, बाद में ओस की अवस्था में बहुत छोटे-छोटे धूल के कणों के रूप में वायु में फैलकर वायुमंडल को दूषित करते हैं। पर्यावरण में होने वाले प्रदूषण को रोकने एवं उसके समुचित संरक्षण के लिए गत कुछ वर्षों से समस्त विश्व में एक नई चेतना उत्पन्न हुई है एवं इसे रोकने के लिए व्यक्तिगत और सरकारी दोनों ही स्तरों पर पूरा प्रयास आवश्यक है। जल-प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण बोर्ड गठित किए गए हैं। इन बोर्डों ने प्रदूषण नियंत्रण की अनेक योजनाएँ तैयार की हैं। उद्योगों के कारण उत्पन्न होने वाले प्रदूषण को रोकने के लिए भारत सरकार ने एक महत्त्वपूर्ण निर्णय यह लिया है कि नए उद्योगों को लाइसेंस दिए जाने से पूर्व उन्हें औद्योगिक कचरे की निस्तारण की समुचित व्यवस्था करनी होगी और इसके लिए विशेषज्ञों से स्वीकृति प्राप्त करनी होगी।
वनों की अनियंत्रित कटाई को रोकने के लिए कठोर नियम बनाए गए हैं। इस बात के लिए प्रयास किए जा रहे हैं कि नए वन क्षेत्र बनाए जाएँ और जन सामान्य को वृक्षारोपण के लिए प्रोत्साहित किया जाए। पर्यावरण के प्रति जागरूकता से हम आने वाले समय में और अधिक अच्छा एवं स्वास्थ्यप्रद जीवन व्यतीत कर सकेंगे और आने वाली पीढ़ी को प्रदूषण के अभिशाप से मुक्ति दिला सकेंगे।
जैसे-जैसे मनुष्य अपनी वैज्ञानिक शक्तियों का प्रयोग करता जा रहा है, वैसे-वैसे प्रदूषण की समस्या बढ़ती जा रही है। विकसित देशों में वातावरण का प्रदूषण सबसे अधिक बढ़ रहा है और यह ऐसी  चिन्ता  एवं समस्या है, जिसे किसी विशिष्ट क्षेत्र या राष्ट्र की सीमाओं में बांधकर नहीं देखा जा सकता। यह विश्वव्यापी समस्या है, इसीलिए सभी राष्ट्रों का संयुक्त प्रयास ही इस समस्या से मुक्ति दिलाने में सहायक हो सकता है।  (पर्यावरण विमर्श से)  
संदर्भ- 1. पद्मपुराण, 2. अथर्ववेद
सम्पर्क: कृष्ण विहार, थानसिंह, पीलीभीत- 262001 (उ.प्र.)

औद्यौगिक कचरों की गिरफ्त

           औद्यौगिक कचरों की गिरफ्त में

           अस्तित्व खोती हमारी नदियाँ 
                               - ज्ञानेन्द्र रावत
आजकल देश में नदियों की शुद्धि का सवाल चर्चा का मुद्दा बना हुआ है। कोई ही ऐसा दिन जाता हो जबकि राष्ट्रीय हरित अधिकरण यानी एनजीटी देश की नदियों के भविष्य के बारे में कोई टिप्पणी न करता हो। कारण अभी देश की नदियाँ औद्यौगिक कचरे कहें या उनके रसायनयुक्त अवशेष से मुक्त नहीं हो पाई हैं। जो प्रदूषण मुक्त हो भी सकी हैं या पुनर्जीवन की ओर अग्रसर हैं, वह सरकार नहीं बल्कि निजी प्रयासों के बल पर ही संभव हो सका है। असलियत में देश की अधिकांश नदियाँ अब नदी नहीं बल्कि नाले का रूप अख्तियार कर चुकी हैं। कुछ का तो अब अस्तित्व ही शेष नहीं है। अब केवल उनका नाम ही बाकी रह गया है। जबकि हमारी सरकार यह दावे करती नहीं अघाती कि हम देश की गंगा-यमुना सहित सभी नदियों को शीघ्र ही प्रदूषण मुक्त कर देंगे। नदियों की शुद्धि जितनी जल्दी हो उतना ही अच्छा है। लेकिन जब गंगा ही अभी तक साफ नहीं हो पाई है जो सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता में है, उस दशा में यमुना और देश की बाकी नदियों की शुद्धि की बात बेमानी प्रतीत होती है।
बीते दिनों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक ने नर्मदा नदी के माध्यम से देश की नदियों की स्थिति पर  चिन्ता  जाहिर करते हुए कहा कि आज देश के अन्य राज्य नर्मदा नदी संरक्षण कार्ययोजना से सीख लें। उन्होंने मध्य प्रदेश में अमरकंटक में नर्मदा सेवा यात्रा के समापन समारोह में इस तथ्य को स्वीकारा कि आज देश में ऐसी कई नदियाँ हैं जो अपना अस्तित्व खो चुकी हैं, उनमें अब पानी नहीं रह गया है और उनका नाम केवल नक्शे पर ही बाकी रह गया है। यही नहीं अपनी सरकार की महत्त्वाकांक्षी परियोजना नमामिगंगेकी समीक्षा बैठक में परियोजना की धीमी गति और जनभागिता की कमी पर भी वे गहरी  चिन्ता  व्यक्त कर चुके हैं। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड में भाजपा की सरकार बनने के बाद नमामिगंगे मिशन की यह पहली समीक्षा बैठक थी।
इसमें प्रधानमंत्री कार्यालय, नीति आयोग, जल संसाधन, पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय, राष्ट्रीय गंगा स्वच्छता मिशन और केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे। सबसे बड़ी बात यह है कि अब तो केन्द्र सरकार के नमामिगंगे मिशन से जुड़े मंत्रालय उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड से सहयोग न मिलने का बहाना भी नहीं कर सकते। बैठक में अधिकारियों का इस सम्बंध में हरिद्वार, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी, पटना, भागलपुर, हावड़ा और कोलकाता जैसे प्रमुख शहरों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है और प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों की गहन निगरानी की जा रही है, केवल इतना भर कह देने से तो काम नहीं बनने वाला। यह तो जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने जैसा है। इसके सिवाय कुछ नहीं। जबकि असलियत में गंगा आज भी मैली है। उसकी शुद्धि का दावा बेमानी है। कानपुर से आगे तो गंगा का जल आचमन लायक भी नहीं है।
दरअसल गंगा की शुद्धि का सवाल आस्था के साथ-साथ प्रकृति और पर्यावरण से जुड़ा है। यह राष्ट्र से जुड़ा है। इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता। अहम सवाल यह है कि गंगा की निर्मलता गंगा की अविरलता के बिना असंभव है। इस बारे में बीते दिनों हुए सम्मेलन में मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित राजेन्द्र सिंह सहित नदी-जल संरक्षण में लगे विद्वानों, विशेषज्ञों ने एकमत से कहा कि गंगा हमारी माँ है। वह हमारी पौराणिकता, आस्था और राष्ट्र के सम्मान की प्रतीक है। गंगा की शुद्धि का सवाल राजनीतिक मुद्दा नहीं, वरन राष्ट्रीय मुद्दा है। इसके लिए सभी को नि:स्वार्थ भाव से आगे आना होगा। गंगा के सवाल पर पूरा देश एक है। जब तक गंगा में गाद की समस्या का समाधान नहीं हो जाता, गंगा की अविरलता की आशा करना बेमानी है। क्योंकि गंगा की अविरलता में गाद सबसे बड़ी बाधक है। गाद के कारण गंगा उथली हो गई है। नतीजतन गंगा के प्रवाह की गति बेहद धीमी हो गई है। ऐसी स्थिति में गंगा में केन्द्र सरकार द्वारा नौवहन की योजना समझ से परे है।
हर साल गंगा की स्थिति बिगड़ रही है। गंगा की निर्मलता का डॉल्फिन,जिसे मीठीसौंस भी कहते हैं, से सीधा सम्बन्ध है। जिस तरह जंगल में बाघ होने से उसकी जीवंतता का पता चलता है, उसी तरह डॉल्फिन से गंगा की जीवंतता, निर्मलता का पता चलता है जो अब संकट में है। बैठक में सभी वक्ताओं ने कहा कि फरक्का बांध के कारण गंगा के बिहार वाले क्षेत्र में गाद लगातार जमा हो रही है। इसके चलते गंगा हर साल घाट से सैकड़ों मीटर दूर होती जा रही है। गाद की समस्या का समाधान सभी को निकालना होगा। हर साल बरसात में पश्चिम बंगाल और बिहार की हालत गाद के चलते बिगड़ती है। गौरतलब है कि फरक्काबैराज42 साल पुराना है। यह बिहार के साथ पश्चिम बंगाल व बांग्लादेश से जुड़ा मुद्दा भी है। गंगा में नौवहन भी तभी कामयाब हो सकता है जबकि गाद की समस्या का समाधान हो। क्योंकि हर बार गाद निकालने पर ही हजारों करोड़ की राशि खर्च होगी। उसके बाद भी इस बात की गारंटी नहीं है कि केन्द्र सरकार की नौवहन नीति कामयाब ही हो।
यमुना को लें, यमुना के पूरे यात्रा पथ को छोड़ दें, वहाँ तो बदहाली की इंतहां है। केवल दिल्ली की ही बात करें तो पाते हैं कि अकेले दिल्ली में 21 नालों से 850 मिलियन गैलनसीवर का पानी आज भी रोजाना यमुना में गिरता है। 67 फीसदी गंदा पानी तो अकेले नजफगढ़ नाले से यमुना में गिरता है। बीते दिनों मैली से निर्मल यमुना पुनरुद्धार परियोजना - 2017 के क्रियान्वयन की निगरानी की मांग करने वाली याचिका की सुनवाई करते हुए एनजीटी ने अपने आदेश में दिल्ली सरकार और तीनों निगमों से कहा है कि वे आवासीय इलाकों में चल रहे उन उद्योगों के खिलाफ कार्यवाही करें जो यमुना नदी के प्रदूषण का प्रमुख कारण हैं। एनजीटी का यह हरसंभव प्रयास है कि यमुना में पहुँचने से पहले दूषित जल दिल्ली गेट और नजफगढ़ स्थित दूषित जल शोधन संयंत्रों द्वारा साफ हो जाये। इसके लिये उसने जल बोर्ड के अधिकारी की अध्यक्षता में एक समिति भी गठित की है जो यमुना की सफाई से जुड़े काम की देखरेख करेगी। उसने यमुना किनारे शौच करने और कचरा फेंकने पर पाँच हजार रुपये बतौर पर्यावरण जुर्माना वसूले जाने का आदेश दिया है। गौरतलब है कि तकरीब दस-बारह साल पहले यमुना को टेम्स बनाने का वायदा किया गया था।
दुख है कि यमुना आज भी मैली है और पहले से और भी बदतर हाल में है। विचारणीय यह है कि जब गंगा और यमुना का यह हाल है, वे मैली हैं और वे अपने उद्धार की बाट जोह रही हैं, उस हाल में गुजरात की अमलाखेड़ी, खारी, हरियाणा की मारकंडा, मध्य प्रदेश की खान, उत्तर प्रदेश की काली, हिंडन, आंध्र की मुंसी, महाराष्ट्र की भीमा आदि दस नदियाँ जो सबसे ज्यादा प्रदूषित हैं, उनकी शुद्धि की कल्पना ही व्यर्थ है। आज देश में तकरीब70 फीसदी नदियाँ प्रदूषित हैं। गोमती और पांडु जैसी तो असंख्य हैं। भले नदियों को देश में देवी की तरह पूजा जाता हो, उन्हें माँ मानते हों, पर्वों पर उनमें डुबकी लगाकर खुद को धन्य मानते हों, लेकिन दुख इस बात का है कि उनका कोई पुरसाहाल नहीं है। यदि यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब उनका अस्तित्व ही न रहे। (इंडिया वॉटर पोर्टल से)

खुद का मूल्यांकन

 खुद का मूल्यांकन 

- विजय जोशी
पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल भोपाल

जीवन में केवल विपत्ति ही नहीं अपितु अच्छे समय में भी खुद का मूल्यांकन बेहद जरूरी है। आप कैसा काम करते हैं उसके बारे में दूसरे आपसे बेहतर ढंग से बता सकते हैं। सच पूछा जाये तो आप एक स्वस्थ एवं स्वच्छ फीडबेक प्राप्त कर तथा उस पर अमल करके स्वयं में आश्चर्यजनक सुधार कर सकते हैं। पर उसके लिये आपको अपना सोच बड़ा और किसी हद तक कमी हो सहर्ष स्वीकार कर सकने का माद्दा अपने व्यक्तित्व में अंगीकार करना होगा।
एक छोटा बच्चा एक स्टोर के कैश काउंटर पर पहुँचा तथा एक नंबर मिलाया। दुकानदार ने उसका संवाद सावधानीपूर्वक सुना।
बालक- मैडम क्या आप मुझे लॉन की सफाई का कार्य दे सकती हैं।
महिला (दूसरी ओर से)- मेरे पास पहले से ही यह सुविधा है।
बालक बोला - मैं आपका लॉन उस आदमी से आधे वेतन में साफ कर दूँगा और वह भी अधिक  अच्छी तरह से।
महिला बोली- मेरे यहाँ अभी जो काम कर रहा है, मैं उससे पूरी तरह संतुष्ट हूँ।
बालक ने और अधिक विनम्रतापूर्वक कहा- मैडम मैं आपके घर की साफ सफाई भी उसी आधे  दाम में कर दूँगा।
महिला बोली- नहीं धन्यवाद।
चेहरे पर प्रसन्नता के भाव के साथ बालक ने फोन नीचे रख दिया। दुकानदार जो यह सब सुन रहा था बालक से बोला- मैं तुम्हारी जरुरत के मद्देनकारतुन्हें काम दे सकता हूँ।
बालक ने कहा- नहीं धन्यवाद।
लेकिन तुम तो काम के लिये गिड़गिड़ा रहे थे- दुकानदार ने कहा।
बालक बोला- मैं तो जहाँ पर इस समय कार्य कर रहा हूँ उनका मेरे कार्य के प्रति क्या सोच है उसके बारे में फीडबेक ले रहा था। उस भद्र महिला के यहाँ कार्य करने वाला व्यक्ति मैं ही हूँ। जिससे वह पूरी तरह संतुष्ट है।
इसी को कहते हैं स्वमूल्यांकन। स्वयं पर आत्ममुग्ध होने के बजाय हम यह सोचें कि दूसरे हमारे बारे में  क्या सोचते हैं। जीवन में सुधार का यह सबसे शर्तिया सूत्र है। उत्कृष्टता निरंतर चलनेवाली प्रक्रिया है। इसका सुख वही जानता है जो उसका अनुपालन सच्चे अर्थों में करता है। सपने और उसे सच्चा करने या लक्ष्य प्राप्ति के बीच बस यही फर्क है। सपना जहाँ चाहता है शोर रहित निद्रा वहीं लक्ष्य की चाहत है निद्रारहित प्रयत्न उपलब्धि के लिए।

सम्पर्क: 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास) भोपाल- 462023, मो. 09826042641, E-mail- v.joshi415@gmail.com