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Feb 19, 2017

गुरुजी का सर होते जाना

गुरुजी का 
सर होते जाना
- बी. एल. आच्छा
'गुरुजीऔर 'सरमें फेब्रिक का अन्तर है। वैसे ही जैसा नवजागरण और उत्तर-आधुनिकता में। गुरुजी बड़े आत्मीय और सीधे सच्चे सांस्कारिक प्राणी लगते हैं और 'सरका प्रशासकीय तबका 'पर्सनेलिटीबनकर चौंकाता है। गुरुजी तो पुराने संस्कारों के जीवित संस्करण हैं। मगर 'सरतकनीकी दुनिया के असरदार पुरजे।
यों तो वे भी 'सर ही हैं,  मेरे पड़ोसी भी। पर उनकी सादगी का कायल होकर मैं उन्हें आत्मीयतावश 'गुरुजीही कहता हूँ। उम्र में 7-8 बरस बड़े हैं, पर आदर के साथ जरा दोस्ताना अंदाज भी मेरे उनके बीच रचा बसा है। अकसर किताबों में डूबे रहते हैं, पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहते हैं। पर न दिखावा, न प्रदर्शन। फिर भी न जमाने के शिक्षाशास्त्र पर भी उनसे बहसबाजी हो जाती है। एक दिन मैंने उनसे कहा -'गुरुजी, यह जमाना तो स्मार्ट मोबाइल से लेकर स्मार्ट सिटी तक स्मार्ट ही स्मार्ट है। अब तो पुराने जमाने के सम्राट को भी स्मार्ट होना पड़ता है। अब छठा वेतनमान भी खत्म होने को है, सातवाँ लागू हो जाएगा। थोड़ा आप भी तो स्मार्ट हो जाएँ।चाय पर अनौपचारिक चुहल के साथे मैंने कहा। उन्होंने ठहाका लगाया। बोले - अरे भई,  साठ का पाठ तो उम्र ही पढ़ा रही है। फिर लिखना-पढऩा तो चलता ही रहता है। किताबें भी छपी है। भाषण भी दे ही आता हूँ। अब बताओ, और कैसे स्मार्ट हुआ जाए ?
मैंने मुस्कुराते हुए कहा - एक दिखनौटी सी कार और स्मार्ट सा मोबाइल भी ले लीजिए। अच्छी सी कार से उतरेंगे तो लगेगा कि कोई प्रोफेसर आया है। दमदार है। ऐकेडमिक हैं और फु र्सत में, मोबाइल या माउस पर अँगुलियाँ चलाते रहेंगे तो भी 'लेपटॉपसरीखे टिपटॉप हो जाएँगे। फिर आप नहीं पढ़ाएँगे तब भी इम्प्रेशन तो बना ही रहेगा।
वे फिर पुराने गुरुजियों सरीखा ठहाका मारते हुए बोले - 'अरे भई मुझसे एक अखबार के संवादाता ने पूछ लिया था। यही कि नये वेतनमान से शिक्षा में क्या बदलाव आएगा? मैंने उनसे कहा कि जो बोलूँगा वह आप वह छाप नहीं पाएँगे । पत्रकार ने कहा कि जो आप बोलेंगे, वह हम जस का तस सचित्र छाप देंगे। मैंने कहा कि इतनी बड़ी बिरादरी को आप नाराज नहीं कर पाएँगे। पत्रकार ने कहा - 'चलो न सही, पर आखिर आप कहना क्या चाहते हैं ?’ मैंने कहा 'अब लोग किताब नहीं कार ही बदलेंगे।पत्रकार इस गुणात्मक अंतर की बात सुनकर चुपचाप चल दिये। अब आप हैं कि गुणवत्ता बढ़ाने के लिए मुझसे इस बुढ़ापे में कार खरीदवा रहे हो।
हँसी तो मुझे भी आई। हँसा भी। पर मैंने कहा - 'गुरुजी यह ज़माना जितने दिखने का है उतना होने का नहीं।कपड़े-लत्ते तो क्या आपकी शर्ट ही एकेडेमिक दिखनी चाहिए, नये जमाने की स्मार्टनेस से पुरानेपन को धता बताती हुई। चलो न सही नये फैशन। पर पुराने सांसारिक टीचर भी धोती-कुर्ते के साथ एक उत्तरीय कंधे पर लटकाकर कार से आते हैं। पुराने बाबा लोग भी कितने नये फेशियल के साथ कार से उतरते हैं और अध्यक्षता की खास जगह बना लेते हैं। आखिर पुरानेपन को भी नये जमाने के रंगरोगन और टीम-टाम तो चाहिए ही न ? फिर मुद्राएँ भी ऐसी हों, तो भीतर के खालीपन को भी चुस्त अंदाज़ दे जाएँ। नये जमाने के नये छापा-तिलक तो सघने ही चाहिए न ?’ वे बोले- 'गुरुजी करके तो देखिए। कितने डायनेमिक और रैंक में ए-प्लस हो जाएँगे।वे हँसते-हँसते चुप हो ग
एक दिन उन्होंने मुझे कहा- 'देखो, हमारा शोध पत्र 'एकलव्यपत्रिका में छपा है।मैंनें कहा - 'गुरुजी यह तो बहुत अच्छा है। काफी छपे होंगे अब तक।वे बोले- बारह तो प्रकाशित पुस्तकें हैं। कई सारे शोध पत्र हैं। मैंने कहा - 'इन्हें पढ़ने वाले भी होते होंगे या अपने को ही बताना पड़ता है कि मेरा शोध पत्र छपा हैं।  वे बोले - अकसर बताना पड़ता है और इसकी सांख्यिकी भी नम्बर देती हैं। मैंने यों ही पूछ लिया - अच्छा गुरुजी यह बताइए कि आपने एक दो प्लॉट-मकान भी ले लिये हैं या...। वे बोले- 'यही तो हमारी दिक्कत हैं, लिखने-छपने के चक्कर में यह कोना तो सूना ही रह गया।  मैंने कहा- गुरुजी, ले लेते तो साठ-सत्तर लाख के आसामी तो हो ही जाते। हाँ,  पर इतना तो छपने-छपाने से मिल ही गया होगा?’ वे आक्रोश में बोले- 'अरे प्रकाशक कुछ देता है क्या? कई बार तो गाँठ का चन्दन घिसना पड़ता है।मैंने कहा - 'यह तो सरस्वती के प्रति ज्यादती है। चलो प्लॉट न सही, मकान न सही, कुछ शेयर वगैरह तो हैंडल करते ही होंगे।वे बोले - 'अरे किस पराये मुहल्ले की बात करते हो। यह तो अजनबी दुनिया है।मैंने कहा - 'गुरुजी फिर ग्रोथ कैसे होगी ?’ वे बोले -'ग्रोथ क्यों नहीं हुई ? देखो, मैं कोई आत्ममुग्ध तो हूँ नहीं, योग्यताएँ तो मेरे पास हैं ही।
            मैंने कहा- गुरुजी आपकी योग्यता पर तो जरा भी संदेह नहीं है। पर आज के जमाने में लोग योग्यता से ज्यादा योग्यता के लक्षणों से ही काम चला लेते हैं और बाकी समय 'ग्रोथमें लगा देते हैं। जिनके पास और कोई तरीका न हो तो वे अध्यक्षताओं से ही अखबारों में अपनी 'ग्रोथउपजा लेते हैं। शिक्षा तो लक्षण माँगती हैं और डिग्रियाँ उनको मानक बना ही देती हैं। पर पुराने खाँटी विद्वानों जैसा स्वाद अब कहाँ खो गया है ? पहले सब्जी मण्डी जाते थे तो देशी धनिये की गंध दूर से ही आती थी और अब धनिये की ढेरी को हिलाते हैं;  फिर भी नाक जस की तस रह जाती है। पर चलो वह न सही, पर नये जमाने के तेवर तो चाहिए ही न ?’ वे बोले - 'पता नहीं मुझे क्या समझाना चाहते हो ?’ मैंने कहा - गुरुजी आप में पुराना स्वाद तो हैं, पर नये जमाने की स्टाइल...। अब आप किसी समाज या कार्यक्रम में जाएँगे तो स्कूटर और कार का अंतर तो समझ में आ ही जाएगा। फिर समाज यह थोड़े ही पूछेगा कि आपके बायोडाटा में कितनी किताबें हैं और कितने शोध पत्र। न क्लास में ही ये सब बताने पड़ते हैं।
गुरुजी थोड़े कसमसा गये। बोले - 'भई तुम्हारी बातें मुझे आउट ऑफ  कोर्स लगती हैं। मैंने कहा - 'गुरुजी, इस पुरानेपन के चलते लोग ही अपने को आउटडेटेड किए जाते हैं। देखिए न स्मार्ट लोग लक्षणों के सहारे ही हर कहीं ठस जाते हैं और आप हैं कि योग्यताओं को छिपाते हुए दरकिनार होते जाते हैं। उन्होंने थका-सा जवाब देते हुए कहा - 'अरे भई अब जिन्दगी इतनी बेरंग निकल गई हैं। न प्लाट, न शेयर न कार। अब ये कारोबार कभी समझ में नहीं आए। लोगों को देखता हूँ तो लगता है कि लक्षण ही उगा लेने चाहिए । पर करें क्या, बचपन में गुरुजी ने डंडा बरसाया और त्याग के संस्कार डाल दि। समझ में ही नहीं आया कि कॅरियर और पर्सनेलिटी क्या होते हैं? पर अब जले पर नमक क्यों छिडक़ रहे हो। चुप भी करो।
मैंने कहा - 'गुरुजी अब तक तो पावर ही था। अब 'पावर-पाइण्टमें पावर है। जमाना नयी टेकनीक में उतर आया है। कमाई भी किताबों से निकलकर नए अंदाज पकड़ रही है। वे बोले- 'अरे भई हमने तो धोती वाले गुरुजी को देखा था। अलबत्ता हम पतलून में आ गए। अब तुम्हारी नयी फैशन टेक्नालॉजी हमसे सने से रही।मैंने भी हार नहीं मानी। बोलो- 'गुरुजी, अस्सी साल का बूढ़ा बरमूडा पहनकर नए जमाने में फिट हो रहा है। आप भी सारे लक्षण उगाते हुए 'कॅरियरकी राह पर पर्सनेलेलिटी में हो जाइए।वे बोले- 'अरे भई, तुमने कैसा तनाव पैदा कर दिया है। मेरा शोध पत्र छपता है, तो लगता है कि सुन्दर- सा गुलाब इस पत्रिका के प्लॉट में खिल गया है। पर तुम्हारे लुभावने कीमती प्लॉट खरीदने या इधर उधर करने का कौशल तो तनाव पैदा कर रहा है। लगता है कि मैंने जिन्दगी अकारथ कर दी है।
मैंने कहा - 'गुरुजी मेरा मकसद तनाव देना नहीं हैं।वे बोले- 'फिर मुझे क्यों उस मायावी दुनिया में उलझा रहे हो ?’ मैंने कहा- 'गुरुजी, मैं तो आपके भाषण को सुनकर ही यह बात कह रहा हूँ। आपने कहा था कि जो नए के अनुसार नहीं चल पाता वह खत्म होता जाता है। जो वर्तमान को देखकर नयी गति पकड़ लेता है, वो बाद नदी के पानी की तरह नयी गति से बहने लगता है।इस बार गुरुजी ने कुछ नहीं कहा। पर उनके चेहरे से लग रहा था कि किताबें भी खरीदते रहेंगे, पर कार तो प्रायोरिटी से खरीदेंगे, गुणवत्ता के विकास के लिए। और गुरुजी नवजागरण की सांस्कारिकता से निकलकर भूमंडलीकृत हो जाएँगे।
सम्पर्क: 25, स्टेट बैंक कालोनी, देवास रोड़, उज्जैन, मो. 094250-83335
ईमेल- e-mail- balulalachha@yahoo.com

चार लघुकथाएँ

1. ज़रूरत
सीमा सिंह
शूटिंग की तैयारी थी। सेट लग चुका था। बस निर्देशक महोदय के आने की प्रतीक्षा थी। उनके आते ही सब सचेत हो उठे।
'सब रेडी है?’ आते ही अपने असिस्टेंट से पूछा।
'जी सर!उसने मुस्तैदी से उत्तर दिया।
'एक बार सीन ब्रीफ करो।
'जी, सीन है, माँ-बाप का लाड़ला बेटा रूठ गया है, तो माता पिता तरह-तरह की खाने पीने की चीको लाकर उसको मना रहे हैं और बच्चा गुस्से में फेंक रहा है।
'और वो बाल कलाकार? उसका क्या हुआ? अस्पताल से छुट्टी मिल गई?’
'नहीं सर, पर दूसरे बच्चे का इंतजाम कर लिया है ! यहीं पास की बस्ती से अरेंज किया है। सिर्फ दो सीन हैं बच्चे के, दो सौ रुपये रोज़ पर बुलाया है।
'काम कर सकेगा?’
'जी सर, मैंने सब समझ दिया है।
'ओके, चलो फिर, लाइट, कैमरा एक्शन!
'कट, कट, कट!
'हाथ से रखना नहीं है, उठाकर फेंकना हैं,’ असिस्टेंट ने झुँझलाहट काबू करते हुए कहा, 'पहले केक और पेस्ट्री हाथ मारकर दूर गिराओ, फिर दूध का गिलास गिरा दो। ठीक?’
'चलो, फिर से,’ डायरेक्टर ने खीजकर कहा- 'एक्शन!
'ओहो! कट! कट! कट! अबे, तुझको समझाया था ना? फेंक दे, नीचे गिरा दे! ये इतना सँभालकर क्यों रख रहा है?’
बच्चे ने सुबकते हुए कहा, 'न अंकल ने कहा था शूटिंग के बाद खाने का सारा सामान मैं घर ले जा सकता हूँ।
2. जूठन 
निशा इस घर की नौकरानी नहीं थी, मगर उससे ज्यादा भी कुछ ना थी। कहने को तो उसके चाचा-चाची का ही घर था, परन्तु माँ-पापा के जाने के बाद निशा कभी परिवार के सदस्य का सा सम्मान ना पा सकी।
'निशा...!चाची ने पुकारा, 'कहाँ थी? चल तैयार हो जा कुछ माँग ले मुदिता से अच्छा सा पहनने को, लडक़े वाले आते ही होंगे।फिर मुदिता से उन्मुख होकर कहा, 'बेटा तू तैयार है? जल्दी कर ले.. और हाँ इसको भी कुछ दे दे ठीक-ठाक सा पहनने को।
'इसको क्या देना, ये तो हमेशा से उतरन में ही जँचती है... पहन ले ना मेरी कोई भी साड़ी। देख सामने पड़ी हैं।फोन में घुसी अपने मंगेतर से चैट करती मुदिता ने निशा को व्यंग्यात्मक दृष्टि से देखा।
निशा भीतर तक बिंध गई।
कमरे से निकलते हुए मुदिता अपनी जूठी प्लेट उसके हाथ में थमा गई, 'ले खा ले। मैं चली जाऊँगी , तो मेरी जूठन नहीं मिलेगी
पत्थर बनी निशा जाती हुई मुदिता और जूठी थाली को देखती रही। अचानक उसके चेहरे पर कुटिल मुस्कान बिखर गई। विद्रुप हँसी के साथ निशा बुदबुदाई, 'तू क्या जाने मुदिता, तुझको तो मेरी उतरन के साथ जीवन बिताना है
निशा के मन की सारी कड़वाहट शांत हो चुकी थी।
 3. तीर्थ-यात्रा
'सब कुछ रख लिया है ना?’ प्रफुल्लित स्वर में पत्नी के हाथ से सामान का बैग लेते हए मोहित ने पूछा।
'कितनी बार पूछोगे, जी?’ पत्नी ने भी मुस्कुरा कर प्रश्न के उत्तर प्रश्न किया।
'बस आ गई है न, मोड़ पर दिख रही है। सब होंगे तो देर लगाना अच्छा नहीं लगेगा।
मोहित बहुत खुश था। दफ्तर से एक मिनी बस जा रही थी गौरीकुंड। वहाँ से सिर्फ दो घंटे लगते हैं केदारनाथ तक के। सरकारी खर्च पर जाना आना, और परिवार को भी साथ ले जाने की अनुमति। अनुमति क्या, सब परिवार के साथ ही जा रहे थे; इसीलिए उस पर भी ज़ोर डाल रहे थे। थोड़ी सी खुशामद से पत्नी मान गई, और बच्चे, वो बेचारे तो कहीं जा ही नहीं पातें हैं। तो उनकी खुशी का पारावार न था।
बस माँ नहीं जा रही थीं, इसका दुख था। माँ भी जाती तो अच्छा रहता, पर उनके घुटनों की तकलीफ और डॉक्टर की हिदायत दोनों ने अनुमति न दी। वो तो परिवार के जाने से ही खुश थी। उन्होंने भगवान पर चढ़ाने के लिए वस्त्र, मेवा-माला, और भी ना जाने क्या-क्या बाँध कर दे दिया था, उनकी ओर से भगवान को अर्पित करने के लिए।
वहाँ की सर्दी की सोच, सामान थोड़ा अधिक हो ही गया था। एक झोला भर तो खाने-पीने का सामान ही बाँध लिया था पत्नी ने, ये कह कर कि सब साथ होंगे तो सिर्फ अपना अपना तो नहीं खा सकते ना।
बच्चों ने भी कॉमिक्स और वीडियो-गेम रख लिये थे, इस दलील के साथ जब रास्ते में बड़े अपनी बातों में लग जाएँगे, तो वे क्या करेंगे।
बच्चों की बात सुन मोहित ने भी ताश की गड्डी जेब में डाल ली थी।
सब बस में चढऩे को हुए, कि एक मित्र ने मोहित से कहा, 'वहाँ ठण्ड बहुत होती है, बंधु, अपना भी कुछ इंतजाम किया है? ये खाली स्वेटर-कोट काम नहीं आते हैं।।।
मोहित तुरंत उतरकर सर्दी का इंतजाम भी निकाल लाया था। बस चलते ही पत्नी से कहा, 'सामान चैक कर लो कुछ छूटा तो नहीं हैं।
पत्नी ने एक नज़र घुमाते हुए देखा, कपड़ों का बैग, खाने का बैग, पीने का पानी, बच्चों के रैकेट और स्नैक्स, सब थे।
केवल माँ का भगवान को चढ़ाने वाले सामान का झोला नहीं था और उसका छूटना किसी को याद भी नहीं था।
4. तोहफा
सुबह से घर की सफाई और किचन में जुटी नीना चौंक गई, 'बाप रे ! अतुल के आने सिर्फ दो घंटे बचे हैं और मैं भूत जैसी घूम रही हूँ! माँ, आप ज़रा गैस बंद कर देना, प्लीज, मैं नहाने जा रही हूँ!
अतुल की पसंद की पीली साड़ी में तैयार होकर आई तो माँ अर्थ पूर्ण ढंग से मुस्कुरा रही थी। 'वाह, जी! खाने से लेकर सजावट तक सब अतुल का मनपसंद, अब तो साड़ी भी,’ माँ ने कहा तो नीना शरमा गई।
'क्या बात हुई थी वैसे तेरी?’ माँ ने उत्सुकता से पूछा।
'आवा्ज़ कट रही थी, माँ, अतुल की। वो अमेरिका से पिछले ही सप्ताह लौटा है। मुझसे मिलने तो सीधे यहीं आना चाहता, था मगर माता-पिता सबसे पहले हैं। तो अब आ रहा है। उसकी माँ को अब शादी की बहुत जल्दी है!
शादी के नाम पर नीना की रंगत और गुलाबी हो गई। माँ ने दुलार से नीना के सिर पर हाथ फिराते हुए कहा, 'बेटा तूने बहुत तपस्या की। पाँच साल बहुत होते हैं।
'दीदी आपके लिए तो गिफ्ट-शिफ्ट भी आ रहें होगे ना?’ छोटे भाई ने बहन को छेड़ते हुए कहा।
'वो खुद आ गया वापस, इस से बड़ा क्या तोहफा होगा?’ माँ ने कहा।
तभी बाहर घंटी बजी नीना ने दौड़ कर दरवाज़ा खोला। हाँ अतुल ही था, हाथ में बड़ा सा पैकिट पकड़े।
'अरे! रुक क्यों गए? अंदर आओ ना!
'नहीं, बहुत जल्दी में हूँ! ये सारे बाँटने हैं, फिर कभी जरूर आऊँगा। अभी ये पकड़ो; सबको आना है, बहाना नहीं चलेगा!
नीना को कार्ड थमाकर चला। वापस मुडक़र आँख दबाते हुए कहा, 'गज़ब लग रही हो! अब तो तुम भी शादी कर ही डालो
सम्पर्क: 111 A /39 अशोक नगर, कानपुर - 208012

आनंद -वर्षा को चित्रित करते हाइगा

आनंद-वर्षा को चित्रित करते हाइगा
-डा.सुरेन्द्र वर्मा

हाइगा आनंदिका (हाइगा- संग्रह ) -डॉ.सुधा गुप्ता
निरुपमा प्रकाशन, मेरठ/2016/ मूल्य रु. 240 /- पृष्ठ, 88

हाइगा एक चित्रित और सुलेखित हाइकु है। आदर्श स्थिति यह है कि स्वयं हाइकुकार ही अपनी रचना को चित्रित और सुलेखित करे। एक चित्रमय हाइकु रचे; लेकिन ऐसा बहुत कम हो पाता है। कभी हाइकुकार चित्रकार नहीं होता और कभी चित्रकार हाइकुकार नहीं होता; इसलिए हाइगा को प्राय: अपनी आदर्श स्थिति के
साथ समझौता करना पड़ता है। हाइकु के अनुरूप कोई चित्र ढूँढा जाता है और उसपर हाइकु चस्पाँ कर दिया जाता है। या, किसी कवि के हाइकु को देखकर कोई चित्रकार उस पर एक चित्र बनाने के लिए प्रेरित हो जाता है और हाइकु को हाइगा में तब्दील कर देता है। हिन्दी में अभी तक कम से कम मेरे देखने में कोई भी हाइगा संग्रह नहीं आया जिसे रचनाकार ने स्वयं ही चित्रित और सुलेखित किया हो।
नहीं, हम जल्दबाजी में ऐसा न कहें। डॉ. सुधा गुप्ता के अक्षर बहुत ही सुन्दर और सुडौल होते हैं । उनके एकाधिक हाइकु संग्रह उनकी खुद की हस्तलिपि में प्रकाशित हुए हैं। सभी खुश-ख़त हैं । और एक हाइकु-
संग्रह 'खुशबू का सफ़र 'न सिर्फ उनकी हस्तलिपि में है; बल्कि इसमें हर हाइकु के साथ रचना को दर्शाताएक चित्र भी है। यह 1986 में प्रकाशित हुआ था।  वे तो बस अपने हाइकुओं को अधिक आकर्षक बनाने के लिए उन्हें चित्रित भर कर रहीं थीं ।
हाइगा से मेरा परिचय 2007 में हुआ था। अमेरिका से अंग्रेजी में एक, वर्ष में केवल दो बार moonset, the newspaper निकलता है । इसी पत्रिका के 2007 के अंक में मैंने सबसे पहले हाइगा के बारे में जाना । इसमें कुछेक हाइकु, हाइगा के रूप में, प्रकाशित किए गए जिनपर चित्र मूनसेट के कला सम्पादक ने बनाए थे ।
डा. सुधा गुप्ता की हाइगा आनंदिका में आनंद प्रदान करने वाले हाइकु तो हैं ही, इन्हें प्रकाशक और चित्रकार निरुपमा जी ने बड़े प्रेम से चित्रित भी किया है। जो आँखों और मन को भाए वही चित्र अच्छा है।  चित्रकारी के बारे में मेरा बस इतना ही ज्ञान है। इस कसौटी पर  हाइगा आनंदिका   खरी ही उतरती है -ऐसा मैं दावे के साथ कहा सकता हूँ।
ऐसा प्रतीत होता है कि डॉ. गुप्ता की इस आनंदिका में चित्रकार ने मुख्यत: उन्हीं हाइकु रचनाओं को सम्मिलित किया है ,जो प्रकृति विषयक हैं। इसमें कुछ हाइकु काफी पुराने भी हैं। पुराने या नए कोई भी हों डॉ. सुधा गुप्ता के हाइकु, खासतौर पर प्रकृति रूपों को रची गई हाइकु कविताएँ लाजवाब होती हैं। एक उनका बड़ा पुराना लेकिन चिरनवीन हाइकु है-
चिडिय़ा रानी/चार कनी बाजरा/दो घूँट पानी
इसे भी आनंदिका में सम्मिलित कर लिया गया है। लेकिन ऐसे पुराने हाइकु बार बार पढ़ऩे का जी चाहता है। आनंद देते हैं।
अनार झाड़ी/नन्हें फलों से भरी/लाज से झुकी
युवा वैष्णवी/जोगिया भेष धारे/वन में खड़ी
नीले घाघरे/घटाओं की छोरियाँ/इतरा रहीं
गुलमोहर/खिला, खुला है छाता/वन कन्या का
कछौटा कसे/शीशम सी युवती/धान रोपती 
झरोखे बैठी/फुलकारी काढ़ती/प्रकृति -वधू
इससे अच्छा प्रकृति का नारी-सुलभ वर्णन और क्या हो सकता है ? पढ़ते ही कभी प्रकृति का नारी के बहाने और कभी नारी का प्रकृति के बहाने जीवंत चित्र खिंच जाता है। सुधा जी ने शायद ही प्रकृति का कोई ऐसा पहलू हो जिसे अपने काव्य में छुआ न हो! फूलों और फलों से तो उनका प्यार देखते ही बनता है।
चैती फूल, ट्यूलिप, अनार की कलियाँ, शिरीष की शाखें, लाल करौंदे, कचनार, गुलमोहर, हरित दूर्वा, गेंदे का ठाठ, खूबानी, नारंगी, गेहूँ के धान, आलूचा, निम्बुआ, कनेर, आदि। संक्षेप में सुधा जी की-
आमोद प्रिया/धरा खिलखिलाई/फूलों की हँसी
कनेर खिले/होंगे शिव अर्पित/इस आशा में
फूले निबुआ/फैल गई खुशबू/दूर दराज़
गेंदा के ठाठ/स्वर्ण जागीर बख्शी/ऋतु रानी ने 
हरित दूर्वा/चट्टानों पर बिछी/स्पर्श कोमल
गुलमोहर/धूप छतरी खुली/आग रंग की
ये काँचनार/फूलों से ऐसे लदे/पत्ते गायब 
तुलसी चौरा/घर के आँगन/सजे महके
फूल तो फूल, पक्षी और तितलियाँ भी सुधा जी की निगाह से उड़कर भाग नहीं सकतीं। उन्होंने अपने काव्य में इन्हें भी बखूबी पिरो दिया है। डा. सुधा गुप्ता के यहाँ फूलों का रसपान करने इन्द्रधनुषी पंखों से सजी फूल से फूल तक उड़ती रहती है तितली। (पृष्ठ 28) । सुबह सुबह चिडिय़ाँ बच्चों की तरह शोर मचाती हुई अपने  बस्ते’  खोलती हैं  (30)। मैंना और गिलहरियाँ पेड़ों की शाखाओं पर अपनी उमंग में उछलते कूदते हैं (32-33)।  बाड़ कितनी ही काँटेदार क्यों न हो युवा बकरियाँ उसे बड़े  चाव से’  खा जाती हैं (34)। नदी किनारे बगुला एक पाँव पर  मन मारे’   खडा रहता है (38)। टोंटी में दो बूँद पानी पाकर गौरैया खुश हो जाती है(41)। गोरी गोरी बत्तखें अपनी अलमस्तीमें तालाब में तैरती रहती हैं। किंगफिशर खूब ठण्डे, 'हिम-शीतलपानी में भी अपनी चोंच डुबाने से बाज़ नहीं आता। और तो और, शौकीन भालू को भी सुधा जी चटकारे लेकर बेरियाँ खाते हुए पकड़ ही लेती हैं (56)। गाँव में रहने वाली कोई लड़की जब शहर आती है तो वह एक डरी सहमी हिरनी ही तो कही जाएगी (65)।
डॉ. सुधा गुप्ता, धरती जो सारी प्रकृति का अधिष्ठान है, का गुणगान करने में कोई कोताही नहीं बरततीं -
जीवन देती/बाटती खुशहाली/माँ वसुंधरा
आमोद प्रिया/धरा खिलखिलाती/फूलों की हंसी
पवित्र गन्धा/अक्षत यौवना है/क्वारी (ये) धरा
लौटाती श्रम/रसवंती वसुधा/ब्याजसमेत और बदले में
फागुन आया/धरती का सोहाग/लौटा के लाया
वर्षा हँसती/ओढा हरी चूनरी/वसुंधरा को
चारों ओर/प्रकृति की चूनर/फैली पडी है
धरती पर भी और सुधाजी के काव्य पर भी प्रकृति का ही बोलबाला है। यहाँ नदियाँ है और ठहरे हुए पहाड़ हैं -
जल धाराएँ/करती अभिषेक/वासुदेव का
गाती चट्टाने/सरस जल गीत/निश्छल प्रीत   
रस की झारी/है नाना रूप धारी/मायावी जल
प्रकृति की यह काव्यमय छटा सुधा जी की हाइकु रचनाओं में यत्र-तत्र-सर्वत्र बिखरी पड़ी है। आनंदिका है यह छटा!
सम्पर्क: डा. सुरेन्द्र वर्मा ,10, एच आईजी / 1. सर्कुलर रोड , इलाहाबाद -211001

अभिजात की बू

अभिजात की बू
- मीना गुप्ता
 अवकाश पर जब भी घर जाती हूँ। तो छत पर खड़े होकर सुबह दस बजे की गाड़ी से आयी सब्जीवालियों को देखना दिनचर्या में शामिल हो जाता है। उनकी संघर्षपूर्ण दिनचर्या मुझे प्रेरित करती है। सुबह होते ही घर से निकलती हैं तो दस बजे यहाँ पहुँचती है और शाम छह बजे यहाँ से निकली तो रात दस बजे घर...
बस इतनी ही दिनचर्या और इतनी ही जिन्दगी। तरस आता है इन पर।
एक दिन सुबह-सुबह एक सब्जी वाली ने दरवाजे पर दस्तक दी। माँ ने दरवाजा खोला।
आते ही बोली 'अम्मा लाव चाय पियाव... आज मैं चाय नहीं पिए हौं
माँ ने उसे चाय पिलाई... चाय के प्रति उसकी तन्मयता देख मैं ताज्जुब में थी, अत: मैंने उसे नजरअंदाज किया कहीं वह संकुचित न हो जाए मगर कप रखते हुए बोली-दीदी कबे आये रहौ... मैंने उस अपरिचिता के मुख से अपने लिए दीदी सम्बोधन सुन समझ न पाई क्या कहूँ ?
कल ही तो। बोली तुम हमें नहीं जनतियु मैं तुम पंचन को जानथों।
अच्छा ..!
मेरे अच्छा बस सुनकर जब वह चली गई।
माँ से पूछा 'वह मुझे कैसे जानती है। मैं तो उसे नहीं जानती
सब्जी वाली थी पहले हरपालपुर से आती थी अब यहीं रहती है। तुमने पहचाना नहीं ?
नहीं माँ।
बहुत पुरानी सब्जी वाली है ...जब तुम लोग बहुत छोटे थे तबसे ठाकुर जी की दुकान के सामने सब्जी लगाती थी।
माँ ने मेरी याद को खंगालना शुरू किया... तुम लोग जब ठाकुर जी के यहाँ खेलने जाती थी, तो परेशान होकर चिल्लाती थी कि मेरी सब्जियों की टोकरी में छिपकर ये लोग सारी सब्जियाँ बर्बाद कर देती हैं।
माँ की बातों ने मेरी स्मृति में कौंध डाल दी... मुझे बचपन की वह रामप्यारी याद आ गई...कसे बदन पर कसा फुल बाहों का ब्लाउज... लम्बे काले घने बालों का कसा हुआ जूड़ा ... रंगबिरंगी बाँह -भरी चूडिय़ाँ और उज्ज्वल पैरों में एड़ी भर आलता... जिसे देख लगता कि वह अभी कल ही ब्याह कर आई है और जालिम पति ने काम पर भेज दिया है। थी तो वह अहीरिन... मगर लगती किसी ठकुराइन से कम नहीं... मेरी याद का वह हिस्सा मेरे और माँ के बीच दो घंटे तक चर्चा का विषय बना रहा।
माँ बोली 'अरे ठाकुर जी की हवेली के सामने बैठती थी और उन्हीं का घर बर्बाद कर गई
कैसे ?
उनके बेटे को बर्बाद कर गई।
माँ साफ़ बताओ क्या हुआ ?
ठाकुरजी के बेटे जगत सिंह की पत्नी का निधन हो गया ..भरी जवानी में वह अकेला हो गया... यह दूकान के सामने बैठती थी। थी तो सुन्दर फिर क्या... ठाकुर जी ने एक दिन दोनों को एक साथ देख लिया और जगत सिंह को कुछ पैसा देकर बेदखल कर दिया। घर से बाहर कर दिया।
फिर क्या हुआ?
जगत ने इसके नाम घर खरीद लिया और यह हरपालपुर छोड़ इसी के साथ रहने लगी।
मगर अब... अब जगत सिंह को छोड़ दिया है वह बेचारा मारा- मारा घूमता है। कहीं भी सो जाता हैं कहीं भी खा लेता है।
क्यों ?
 पता नहीं... कहकर माँ चुप हो गई।
मगर मेरी उत्सुकता ने मुझे बेचैन कर दिया...दूसरे दिन वह पालक  साग लेकर आ गई... लो अम्मा ताजी है। कहकर डलिया में डाल जाने लगी...
जगत चाचा की बेकद्री की कहानी रात में माँ से सुनी तो आँसू आ गए थे...मेरी उत्सुकता जो रात भर सो न सकी थी ने  उसे रोका और पूछा चाची एक बात पूछूँ।
हाँ पूछो दीदी...
तुमने जगत चाचा को क्यों छोड़ा...जबकि उसने अपना घर छोडक़र तुम्हे अपनाया था ?
उसने इधर-उधर देखा और बोली  वैसे दीदी तुम हमरे बच्चा जैसे हो, लेकिन अब बड़े हो गए हो तो सुनो -
 दीदी वा रहे ठाकुर और मैं अहीरिन ..जबे नहीं तबे मोही धमकावत रहे और कहे देखा अहीरिन जैसे रहे... मोर आदमी कबहूँ मोहि अहीरिन नहीं कहे रहिस दीदी... मगर वा बात-बात माँ अहीरिन कही के गरिआवत रहे... ठाकुर रहे दीदी... ठकुरन की बात औरे होत है... और
और क्या? धीरे धीरे मोही वही के पास से बदबू आवें लाग.
कैसी  बदबू ? '’
ठकुरैसी की बदबू ..इतना कहकर वह चली गई।
मैं अवाक् थी... एक अहीरिन को अभिजात की बू !
चेतना ने जोर पकड़ा एक अहीरिन ने अभिजात को पटक दिया।
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