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Jul 18, 2016

ऊँच-नीच

             ऊँच-नीच  
                   - कमला निखुर्पा

उत्तरांचल के कुमाऊँ का सुन्दर सा गाँव, चीड़, बाँज, बुराँश के पेड़ों से घिरी हरी-भरी पहाडिय़ों प्राकृतिक सुन्दरता से भरपूर  घाटी में बसा है कलावती का गाँव। सुबह सूरज की  पहली किरण के साथ सामने ऊँची पहाड़ी पर स्थित नंदा मैया के मंदिर का कलश जगमग करने लगा। घर की छत पर झुक आए आडू के पेड़ पर घुघूती गाने लगी ... घुर घुघूती घुर घुर ....
ईजा (माँ) चिल्लाई- कलावती, अरी ओ कला ! बाबा उठ, इस्कूल नहीं जाना तुझे? ... देख  घाम (धूप) निकल आई, आज फिर आन सिंह मास्टर ने तेरी डंडे से पिटाई करनी है। अरे निहुनी संतान! अब उठ जल्दी से ...
कलावती, थुलमे (ऊनी रजाई) से सर ढकते हुए कुनमुनाई- ईजा बस थोड़ी देर और सोने दे ना
 तू ऐसे नहीं उठेगी-  कहते हुए माँ ने थुलमा खींचकर कला को उठा दिया ।
कला आँखें मलते हुए रसोई में जाकर दादी के गोद में पसर गयी ।
सर पे हाथ फेरती हुई दादी ने दुलार करते हुए कहा -उठ गई मेरी पोथी! चल हाथ-मुँह धो ले देख आज मैंने तेरे लिए क्या बनाया है ? कला ने उनींदी आँखों से देखा लोहे की बड़ी सी कढ़ाई में जम्बू के छौंक लगे आलू के पीले-पीले गुटके ... पीतल की परात में मीठे-मीठे पुए ...
खुशी से किलक कर कला बोली -ओ हो पकवान !! आमा आज कौन सा त्योहार है?
 बाबा! आज श्री पंचमी है, आज से बैठ होली शुरू हो जाएगी प्रधानजी  के ठुल खौल (बड़े आँगन) में, अब तू जल्दी से खेत जौ के तिनके ला ... पूजा के लिए फूल लाने हैं फिर दर्जी के यहाँ से नए कपड़े की कतरन भी लाना है तुझे। जल्दी कर बहुत सारा काम पड़ा है।
मनुहार करती हुई कला बोली - दादी आज मेरी इस्कूल की छुट्टी कर दो ना.. अर्जी देदो परुली के हाथ ... मैं नहीं जाऊँगी इस्कूल आज।
ठीक है मत जा, तेरी ईजा मारेगी तुझे तो मत रोना, अब जल्दी से पूजा की तैयारी कर ... वो डाला (टोकरी)  ले जा बाबा ... फूल तोड़ ला ।
 फूलों की डलिया लेकर सीढ़ीदार खेतों से उतरती कला स्वछन्द पंछी की तरह उड़ रही थी... स्कूल जाती अपनी सहेलियों को हाथ हिलाकर छेड़ती हुई, मंद मंद मुस्कराती सोच रही थी, जाओ, पको तुम दिनभर इस्कूल में , खाओ डंडे ... रमेशचंद मासाब, आन सिंह मास्साब से, मैं तो आज आजाद हूँ ... उसे लगा, खेतों के किनारे खिले प्योंली के फूल भी उसके साथ हँस रहे हैं। वह गुनगुनाने लगी, घाटी के सारे पंछी मिलकर उसके सुर में सुर मिलाने लगे ।
फूलों से भरी डलिया लेकर कला घर पहुँची, देखा  बड़ी सी नथ, सोने की मटर माला .. नौ पाट वाला छींट का घाघरा पहन देवी मैया- सी बनकर दादी पूजा के स्थान पर बैठी है, दादी की नथ को छूकर कला हमेशा की तरह हैरान होकर कहती है, अम्मा! तेरी नाक नहीं दुखती, इतनी बड़ा नथ! कितने तोले का है ये ?
दादी गर्व से कहती, नहीं रे क्यों दुखेगी भला, पूरे पाँच तोले की है, जितना बड़ा खानदान, उतनी बड़ी नथ, तेरी शादी में इससे बड़ी नथ देंगे, पहनेगी ना
-नहीं मैं शादी नहीं करूँगी, मैं तो डॉक्टर बनूँगी।
डाकदर बनने के लिए रोज इस्कूल जाना पड़ेगा। ऐसे छुट्टी करके थोड़े ही डाकदर बनते हैं !
अरे अम्मा, डाकदर नहीं डॉक्टर। मैं कल से रोज इस्कूल जाऊँगी पर शादी नहीं करुँगी।
छोटी सी कलावती भरे-पूरे परिवार का लाड़-दुलार पाकर अव्वल नंबरों से प्रथम श्रेणी से दसवीं पास कर स्कूल से इंटर कालेज में पढऩे जाने लगी ।कालेज दूर था,पाँच किलोमीटर पैदल चलकर कला पढऩे जाती, कंधे पर किताबों का झोला लटकाए ,आसमानी कुरते  सफ़ेद दुपट्टा पहने कला जब अपने कालेज को निकलती तो अक्सर घास काटने के जाती घसियारिने बहुएँ रोक कर कहती...
अरे बाबु कैकी चेली छे तू , कि नाम छ तेरु ? (अरे बिटिया किसकी बेटी है तू ? क्या नाम है तेरा ?)
नाम बताने पर वो हँसने ने लगती- अरे पोथी तेरा नाम कला नहीं गोरी गंगा हुन चैछीजैकी घर माँ जाली, उजाला कर देली (अरे बिटिया तुम्हारा नाम कला नहीं गोरी गंगा होना चाहिए  जिसके घर जायेगी, उजाला कर देगी)
पहाड़ी ऊँचे-नीचे कच्चे रास्ते पर रोज मीलों चलकर कला  थककर चूर होकर कालेज से वापस आती पर उसके सपने कभी नहीं  थकते। छोटे भाई-बहिनों के साथ  प्यार-तकरार, दादी के गोद की गर्माहट, दादा का रौबीला व्यक्तित्व, घर कभी-कभी आने वाले पिताजी सब तो थे  कला के साथ ! कि एक दिन सब कुछ बदल गया । 
    उस दिन, कैमिस्ट्री का प्रेक्टिकल कैंसिल हो गया था , कला के क्लास की जल्दी छुट्टी हो गई, स्कूल से जल्दी वापस आना पड़ा, अकेले पहाड़ियों को पार करते उसे लगा जैसे कोई उसके पीछे आ रहा है ...चुपके से मुड़कर देखा तो आवारा लड़का शराब के नशे में धुत उसके पीछे चला आ रहा है ..जाने क्यों चेहरा जाना पहचाना-सा लग रहा था , शायद  कहीं न कहीं देखा है, शायद पीछा कर रहा  है, ओह आज मैं अकेली हूँ, वो तेज़ी से कदम बढ़ाने लगी, तो वो भी ते-तेज़ चलने लगा, अपना बस्ता थाम वो दौड़ पड़ी ... हाँफते-हाँफते पहाड़ी  चढ़ने लगी, हे भगवन ! कोई मिल जाए, हे देवी मैया ! किसी को भेज दो, देखा सामने मोड़ पर पड़ोस के गाँव के बुजुर्ग बैठकर सुस्ता रहे थे , बेबस कबूतरी की तरह कला उनके बगल में जाकर दुबककर बैठ गयी ।
-बुबू! आप कसार गाँव रहते हो न ?
-हाँ पोथी! मैं तेरे गाँव आया था, मैं दीबा का काका हूँ।
 -अरे हाँ, दीबा दीदी कहाँ है आजकल?
-लखनऊ गई थी, कल ही घर आई है वो।
-अच्छा!
 काका के साथ बतियाते साथ-साथ चलते हुए कला पीछा करने वाले शराबी को भी तिरछी नजर से देखती हुई सोच रही थी , अगले मोड़ से काका के गाँव का रास्ता अलग हो जाएगा, फिर वो क्या करेगी ?
अच्छा  बेटी!  मैं चलता हूँ ... तू अच्छे से जाना हाँ ।
कला ने शराबी को देखा वह सुरक्षित दूरी बनाकर चल रहा था; ताकि काका को संदेह न हो .. उसकी लाल आँखों को देख कला ने मन में ठान लिया, वो अपने गाँव के बीहड़ रास्ते पर अकेली नहीं जाएगी ...काका से कैसे कहे कि वो शराबी पीछा कर रहा है, शर्म और संकोच ने जुबान पर ताला जड़ दिया। अचानक उसने कुछ सोचा और काका से बोली, -
-काका मैं भी आपके साथ आऊँगी, मुझे भी दीबा दी से मिलना है।
-ठीक है बेटी चल।
शराबी हैरान -सा उसे काका के गाँव की ओर जाते हुए देखता रहा ।
काका के साथ आशंकित मन से कला उस अनजान गाँव की ओर चल पड़ी। गाँव में प्रवेश करते ही दीबा दी मिल गई, उसके रुआँसे चेहरे और उड़े रंग को देख दीबा ने सब कुछ पूछ लिया, दीबा साक्षात् दुर्गा का रूप धर, हाथ में घास काटने वाली बड़ी दरांती लेकर बोली, चल मेरे साथ अभी, मैं अभी तुझे घर छोड़कर आती हूँ।
 -नहीं दीदी अभी नहीं, थोड़ी देर में चलते है अभी वो आसपास ही होगा।
 -तू मत डर, चल मेरे साथ।
 उसका  डर सच था, वो अभी भी कला के गाँव जाने वाले रास्ते पर रुक कर इन्तजार कर रहा था। दीबा के हाथ में हँसिया देखते ही वो रफूचक्कर हो गया॥ घर जाकर उसने रोते-रोते दादी को सब कुछ बताया। दादी उस लड़के पर खूब गुस्सा हुई, क्रोधित दादा कुल्हाड़ी लेकर पूरे दिन आसपास के गाँव में चक्कर लगा उसे ढूँढ़ते रहे, कई दिन तक सारा काम छोड़- छाड़कर दादी उसे स्कूल छोडऩे-लेने जाती रही... पर कब तक?
पास-पड़ोस के लोग ताने मारने लगे
-कब तक पीछे-पीछे जाओगी इसके
-अरे! दसवीं पास हो ग अब शादी कर दो इसकी।
-पर अभी वो पढ़ रही है, उसकी पढ़ाई?                     
-अरे पढाई तो शादी के बाद भी कर सकती है, कहीं कोई ऊँच-नीच हो गयी तो गले में पत्थर बाँध कर  डूब मरना अपनी पोती के साथ।
दादी सोच में डूबी रहती, दादा गुस्से में भुनभुनाते रहते, शादी के लिए रिश्ते आने लगे। लड़के वालों से कहा गया कि बिटिया शादी के बाद पढाई जारी रखेगी, सो चट मंगनी पट ब्याह होगा। ब्याह के दिन कला को रँगीली पिछौड़ी ओढ़ाकर उसकी छोटी सी नाक में बड़ी सी नथ पहनाई गयी, नाक सूज कर लाल हो गयी।  विदा होते समय वह  फूट-फूट कर रोई, जबरदस्ती पहनाई गयी लाल चंदक वाली भारी नथ से दुखती नाक का दर्द, स्कूल छूट जाने का दर्द, ईजा (मां), बौज्यू (पिताजी), बूढ़ी आमा (दादी), बूबू (दादा) छोटे-छोटे  भाई-बहन से बिछुडऩे का दर्द और हाँ गोठ (गौशाला) में धौलीगाय, नन्हीं-सी बछिया बिनुली’,जिसके गले में वह फूलों की माला पहनाती थी; उनसे कभी न मिल पाने का दर्द। आम, अमरूद के बगीचे में डाली में  झूलते हुए  गीत न गा पाने का दर्द। 
दर्द में भीगे सारे जख्मों को अपने आँचल में छुपा परिवार की खातिर कला, बेटी से ब्वारी (बहू) बन गई।
सासू माँ और उनकी भी सास यानी ददिया सास.. दो-दो सासों के बीच अकेली सोलह साल की निरीह अबोध कला ।
भोर होते ही अब कोई पोथी, बाबा पुकार के मनुहार करके नहीं जगाता... अब सुनाई पड़ता -
-ओ ब्वारी! गोरु के लिए घास काट ला।
-ब्वारी! तेरी सास गौशाला की सफाई कर रही है तुझे तो शर्म नहीं ?
-दिनभर घर पे बैठके तूने क्या किया? गाय को भी नहीं दुहा, सारा दूध खुद पी गई होगी।
कैसे कहे कला कि उसे इस तीखे सींग वाली काली मरखनी गाय और हमेशा नारा रहने वाली सास दोनों से बहुत डर लगता है, दूध दुहना तो दूर वह उसे घास भी देने से डरती है ।
गधेरे के उस पार उबड़-खाबड़ रास्ते पर चलते-चलते पानी के धारे से ताँबे के गागर में पानी भरते-भरते अचानक कला को घुघूती की सुरीली आवाज आती है... घुर घुघूती घुर घुर.. उसके आँखों के सामने नाचने लगते हैं आडू के पेड़, आम के बगीचे, दादी की मीठी पुकार, बाँज (ओक) के जंगलों की ठंडी हवा, लाल बुराँश के फूलों से सजा जंगल, चट्टान के सीने को तोड़ कर  बहता मीठे पानी का सोता-
 उसे लगा, उसके अन्दर भी कुछ टूट कर बहने लगा है.. पलकों से निकल बहते-बहते कपोलों को भिगो गया है... भरी गागर सर पर रख खाली मन से चलते-चलते वह ठिठक गयी देखा, किनारे पर पथरीली जमीन में प्योंली के पीले-पीले फूल खिल गए हैं। चटख रंग के फूलों ने मन को उमंगित कर दिया, ओह वसंत आ गया! पूरा साल बीत गया! फिर से नयी कोंपलें  फूटने लगीं, प्योंली तू फिर खिल गई और मैं? मैं कब खिलूँगी! क्या मैं भी खिलूँगी? कला के सपने जाग उठे, पंख फैलाकर उडऩे  लगे, तभी पदम् के पेड़ पर बैठी न्योली चहक उठी-नीहू नीहू- घाटियाँ गूँजने लगी। कला के मन की घाटियों में भी गूँज रही है ..अधूरे सपनों की पुकार ..वह पढ़ेगी, खुद डॉक्टर नहीं बन पाई, तो क्या, अपने बच्चों को खूब पढ़ाएगी उन्हें डॉक्टर बनाएगी। उन्हें ऊँच-नीच का डर नहीं दिखाएगी, उसकी आँखों में नए सवेरे- सी चमक थी।
 घर आकर उसने पानी से भरा गागर रसोई में रखाबाहर आले पर पड़ी कलम उठाई, पोस्टकार्ड लिया और पत्र  लिखने लगी। कागज पे ढेरों फूल खिलने लगे।
सम्पर्क: प्राचार्या केन्द्रीय विद्यालय क्रमांक 2कृभको, सूरत (गुजरात) 394515

आधारशिला

           आधारशिला  
                            - सुधा भार्गव
जिसे एक ही धुन थी शिक्षित होकर उसके प्रसारण से ज्ञानोदय-भाग्योदय करे।
सुखिया जिस दिन से ससुराल आई, सुख ही सुख बरसने लगा। इतना सुख की लोगों की आँखों में खटकने लगा। सुबह से शाम तक जी तोड़ मेहनत करती, सास ससुर की सेवा कर अपने को धन्य समझती। गाँव के मुखिया की बेटी होते हुए भी न खाने का नखरा न पहनने का। सलीके से रखे घर को देखते ही उसके सुघड स्वभाव का परिचय मिल जाता।
शादी से पहले दसवीं पास करने के बाद उसने पढऩे के लिए बड़े हाथ-पाँव मारे पर उसकी दाल न गली। गाँव में तो उसकी यही शिक्षा बहुत मानी जाती। मुखिया ने स्वस्थ, सीधे-सादे हरिया से उसकी शादी कर दी। कई एकड़ जमीन का वह अकेला वारिस, सुखिया राज करेगी यही उसके बाप का सोचना था।
सुखिया ने विवाह के बाद भी हिम्मत न हारी। वह नून -तेल की दुनिया से बाहर भी झाँकना चाहती थी। दूसरे, घर में एक कमाए और चार खाएँ वाली बात उसे जमती न थी। आधी जमीन पर खेती होती और आधी जमीन बेकार पड़ी रहती। पुराने ढर्रे से हरिया खेती करता। इतना पैसा भी अंटी में न था कि कृषि करने के आधुनिक यंत्रों को खरीदा जा सके। उधारी से इन्हें खरीद भी लेता तो अज्ञानता के कारण उनका उपयोग भी न कर सकता था।
पिछले वर्ष ही उस गाँव में कृषि विद्यालय खुला था। सुखिया के पास सोचने का वक्त न था। उसने उसमें दाखिला लेकर हरिया की मदद करने का निश्चय किया। हरिया अपनी पत्नी की बात सुनकर अति हर्षित हुआ। वह तो अपनी निरक्षरता पर खुद ही खीज उठता। पग-पग पर उसके सामने रुकावटें आतीं। सुखिया के आने पाए उसे संतोष हुआ कि चलो घर के दरवाजे सरस्वती के लिए खुले तो सही।
उस दिन रात के समय घर के काम-काज से निपटकर पूरा परिवार एक साथ बैठा था। सुखिया सास के पैरों में तेल की मालिश कर रही थी। वृद्धा गठिया की रोगिणी जो ठहरी। तभी हरिया ने बात उठाई- माँ, सुखिया कृषि विद्यालय में जाकर पढऩा चाह रही है ,ताकि हम नए तरीके से फसल उगाएँ।
- बाप-दादा के जमाने से मैं खेती करता चला आ रहा हूँ। अब यह क्या नई सूझ। भूखे मरने की नौबत तो न आई और न आएगी। बहू लड़कों के साथ पढ़ेगी , तो गाँव भर में थू-थू अलग होगी। सुखिया के ससुर उबल पड़े।
- अगर हम इस चिंता में रहे कि दूसरे क्या कहेंगे , तो उनको प्रसन्न करने के चक्कर में हमारे ऊपर परेशानियों के बादल छा जाएँगे। हमारे पास कोई हुनर होगा ; तो सब पूछेंगे वरना कोई घास भी न डालेगा। विद्यालय जाकर मैं चार बातें सीखूँगी, तो किसान भाइयों को भी बताऊँगी। अपने भले के साथ उनका भी भला होगा। सुखिया ने शांत स्वर में कहा।
बहू की चातुर्यपूर्ण वाक्पटुता के आगे हरिया के बाप ने मौन होकर स्वीकृति दे दी।
सास को बहू की आजादी कुछ जँची नहीं और बोली- घर का काम-धंधा कैसे चलेगा ? मैं तो कुछ कर नहीं सकती। मुझ से कुछ आशा भी न करना।
- तुम चिंता न करो। मैं घर के काम में हाथ बटाऊँगा। सुबह की ही तो बात है। दो बजे तक तो यह घर लौटकर आ जाएगी।
- बेटा, तू कहाँ-कहाँ काम करेगा। घर में भी और बाहर भी। कुछ दिनों में ही मुरझा जाएगा। ममता का सागर कुछ ज्यादा ही उमड़ पड़ा।
- मिलकर भार उठाने से काम हल्का ही नजर आगा। माँ तुम्हें भी हिलना-डुलना चाहिए। पिछली बार वैद्य जी बता रहे थे एक जगह बैठे रहने से जोड़ दर्द करने लगते हैं।
- ले, तू तो अभी से अपनी बहू की तरफदारी करने लगा।
बात बढऩे के डर से हरिया वहाँ से तुरंत भाग खड़ा हुआ।
अगले दिन से पति-पत्नी की तपस्या शुरू हो गई। सुखिया बड़े सवेरे खाना बनाने में जुट जाती, हरिया ऊपर का काम समाप्त करता। दौड़ते-भागते एक गिलास दूध कंठ से उतारती और विद्यालय पहुँचती। दोपहर को अपना पाठ दोहराती और डट जाती कार्यक्षेत्र में। गोबर- थापना, गाय-बैल की जुगाली का प्रबन्ध करना, शाम को दूध दूहना सभी तो उसे करना था। चाहती थी हरिया के लौटने से पहले चूल्हे-चक्की से फुर्सत पा ले, ताकि दो मिनट उसके पास भी बैठ ले मगर इतना शायद उसके नसीब में न था।
एक दिन हरिया खेतों से कुछ जल्दी आ गया। माँ सो रही थी, बाबू उसके चौपाल गए थे। मौका देखकर वह सीधा सुखिया के पास चला गया। वे बातों में इतने तल्लीन हो गए कि पता ही न चला कब आकाश में तारों की बारात निकल आई। हरिया का इंतजार करते-करते वृद्ध-वृद्धा थक गए। कमरे से आती धीमी आवाज को सुनकर उनके दिमाग में एक ही बात घूमने लगी-शादी के बाद बेटा उनके हाथ से निकला जा रहा है। इतने में हरिया कमरे से बाहर निकला।

- अरे हरिया तू आ गया क्या? हम लोग न जाने कब से भूखे बैठे हैं। 
सास की ऊँची आवाज सुनकर सुखिया चौंक पड़ी और पल्लू सँभालती चौके में घुस गई। हरिया हँसते हुए बाप से बड़ी आत्मीयता से मिला। उनके हाथ अपने हाथों में लेकर बोला-चलो बाबा गरम-गरम रोटी खाएँ।
- तवे की गरम रोटी अब मेरी तकदीर में कहाँ ? दोपहर के लिए बहू दाल बना गई। उसमें नमक बड़ा तेज था। आलू भी बड़े और कड़े थे। बूढ़ी ही सही-दो रोटी तो सेक ही लूँगी।
 सुखिय़ा तूने कुछ सुना! अब मैं माँ के हाथों की रोटियाँ खाऊँगा,  जिसमें उसका प्यार समाया होगा। अच्छा, बोल महतारी, कल कब खेत से रोटी खाने आ जाऊँ।
बूढ़ी माँ ने तो गुस्से में ताना मारा था ; पर हरिया ने बात का रुख ही दूसरी तरफ मोड़ दिया। हारकर दूसरे दिन उसे फुल्के सेंकने ही पड़े। हरिया ने माँ की बात का बुरा नहीं माना। उसे क्रोध भी नहीं आया। जानता था बीमारी और ढलती उम्र के कारण माँ चिड़चिड़ी हो गई है। उसे वे दिन भी याद हैं ,जब माँ ने हर तूफान का सामना करके उस पर संताप की छाया भी न पडऩे दी। इसी कारण माँ की आँख में पड़ा धूल का कण ही  उसे व्याकुल करने को पर्याप्त था। वह माँ के शब्द बाण हँसकर छाती पर झेलता। वैसे इसी में सबका भला था।
सुखिया की परीक्षा निकट थी। सुबह से ही किताबों में दिमाग पड़ा था। सास-ससुर को जल्दी से खाना खिलाकर न जाने कब-कब में बिस्तर पर लुढ़क गई। संध्या धीरे-धीरे घर -आँगन में उतार आई पर उसकी नींद न टूटी।
खेतो से लौटकर हरिया ने पूछा-माँ सुखिया कहाँ है?
-रूखी-सूखी रोटी खिलाकर न जाने कहाँ गायब हो गई।
-देख माँ, बहू तेरा कितना ध्यान रखती है। मसालेदार सब्जी से तो तेरा पेट खराब हो जाता है। ज्यादा नमक बाबू जी को ब्लडप्रेशर के कारण नुकसानदायक है। खुद भी वह बेस्वाद खाती है।
-वह क्यों खाने लगी?
-कहती है जो मेरे बड़े खाएँगे ,मैं भी वही खाऊँगी। गांधारी ने तो अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली थी कि मेरा पति अँधा है ,तो मैं भी अँधी बन कर रहूँगी। कुछ इसी प्रकार का सोचना उसका है।
हरिया अनपढ़ होते हुए भी बेवकूफ नहीं था। इसकी विनोदप्रियता और हाजिरजबावी को देखकर उसके पिता को अहसास होने लगा कि उन्होंने अपने बेटे को पढ़ाया क्यों नहीं?
सुखिया के आने से इसकी पीड़ा उसे ज्यादा सालती। एक दिन वे सुखिया से पूछ बैठे -बहू, मेरा बेटा क्या इस उम्र में पढ़ नहीं सकता?
-बाबूजी, पढऩे लिखने की कोई उम्र नहीं होती। वे और आप दोनों पढ़ सकते हैं।
-मैं भी- आश्चर्य से आँखें फैल गईं।
-हाँ, आप भी।
-लेकिन पढ़ाएगा कौन? प्रौढ़ों को साक्षर बनाने के लिए रात में कक्षाएँ लगती हैं पर वहाँ आन-जाने में काफी समय लगेगा। हरिया तों खेत से काफी थका-माँदा लौटता है। उसके लिए जाना असंभव है। इतना कहकर बाबूजी गहरी उदासी में डूब गए।
-असंभव  को संभव बनाया जा सकता है यदि
-हाँ-हाँ बोलो बहू, तुम हमें जरूर कोई रास्ता दिखाओगी।
-यदि मैं आपको अक्षर ज्ञान दूँ तों कैसा रहे ?
-तुम तो बेटा मेरे घर के अँधेरे में ज्योति बनकर आई हो। उनकी आँखों में रंग-बिरंगे हजार दीप झिलमिला उठे।
सास ने पहली बार अपनी पढ़ी बहू की कदर जानी। अगले दिन से घर का वातवरण ही बदल गया। सुखिया स्कूल से लौटी थी कि सास बोली-जल्दी से कुछ खाकर आराम कर ले। आज तो तुझे पढऩे के साथ पढ़ाना भी है। और हाँ शर्बत हमने पी लिया है, बनाने की जरूरत नहीं।
- बहू सास की सहृदयता पर हैरान थी। उसे स्नेहिल लहरें छू-छूकर जा रही थीं। उदात्त भावनाओं के झोंकों में शीघ्र ही वह घोड़े बेचकर सो गई । उठने पर तरोताज़ा थी। उल्लास और उमंग ने उसे नवजीवन प्रदान किया। सास सब्जी काट चुकी थी, बस उसे लौकी छौंकनी थी। गाय की सानी करके दूध दूहने उसके ससुर खटाल गए थे। भोजनोपरांत घर के सदस्य एक पंक्ति में आज्ञाकारी बच्चे की तरह कागज-पेंसिल लेकर बैठ गए । इधर वर्णमाला शुरू हुई ,उधर उसके स्कूल की परीक्षाएँ। लेकिन वह संघर्ष मार्ग पर अविराम डटी रही । उसे तो रिश्तों को अटूट विश्वास, असीमित प्यार के धागों में बाँधना था। शिक्षा के प्रसारण से ज्ञानोदय- भाग्योदय करना था। सुखिया के सतत प्रयास से हरिया और उसके माँ -बाप अँगूठे छाप से कलम के मालिक हो गए। सास हनुमान चालीसा गुनगुनाने लगी। ससुर को चंदा मामा पढ़ने का शौक चर्रा गया। खेत पर जाते तो किताब ले जाना न भूलते, आते तों अपनी अर्द्धांगिनी को उपदेश देना शुरू कर देते और फिर होती पति- पत्नी की मीठी नोंक-झोंक।
कृषि विद्यालय में एक अध्यापक सेवा निवृत्त  हुए। उनका पद रिक्त होते ही सुखिया ने प्रार्थना पत्र प्राचार्य के हाथों में थमा दिया। वे उसके मृदुल व्यवहार से पहले से ही प्रसन्न थे। अत: शीघ्र ही उसे स्वीकार कर लिया गया। अगले माह की पहली तारीख से उसे शिक्षिका पद ग्रहण करना था  और आज 20 हो गई थी। इतने कम समय में घर वालों से नौकरी करने की मंजूरी पाना टेढ़ी खीर था। उसकी गर्दन अधर में लटक गई।
ससुर और पति की उपस्थिति में एक दिन उसने कहा  आधुनिक प्रणाली से मुझे खेती करना आ गया है। उसके लिए यंत्र, छोटे औज़ार और धन की जरूरत है।

-धन हम साहूकार से ले सकते है। हरिया बोला।
-उसके फंदे में एक बार उलझे तो उलझ कर ही रह जाएँगे। सुखिया ने अपनी असहमति जताई।  
-बैंक से उधार ले सकते हैं ;मगर ब्याज देना पड़ेगा-ससुर ने सलाह दी।
-जब तक खेती-बाड़ी में मुनाफा न हो ब्याज देना बहुत चोट पहुँचाएगा। सुखिया ने गहराई से सोचते कहा।
-कुछ दिनों के लिए मैं नौकरी कर लूँ तो कैसा रहेगा ? उससे ब्याज चुका देंगे। बड़े साहस ने सुखिया ने कहा।
सब सुखिया की बुद्धिमानी के कायल हो गए और इतना समझ गए थे  कि समय के साथ उन्हें भी अपनी रफ्तार तेज करनी पड़ेगी, रुकने के लिए वक्त नहीं है। लेकिन हर दृष्टि में प्रश्न था। नौकरी कहाँ मिलेगी?
उनका संशय दूर करती हुई सुखिया पुन: बोली- नौकरी मैंने ढूँढ ली है। एक विजय मुस्कान उसके होठों पर छा गई।
-ना बाबा, बहू से इतना काम लेना ठीक नहीं। एक जान हजार काम! कुछ हो गया तो दुनिया यही कहेगी, ससुराल में बहू को कोल्हू का बैल बना रखा है।
-हरिया के बाबू, चिंता न करो। घर का काम तो हम-तुम मिलकर सँभाल लेंगे। खेतों का काम हरिया करता ही है। सुखिया आराम से नौकरी करके भविष्य बनाएगी।
साक्षरता सहयोगिता की आधारशिला पर निर्णय एक पल में हो गया और सुखिया के सुनहरे सपने झर-झर उसकी झोली में आन पड़े।
 सम्पर्क: जे. 703, स्प्रिंग फील्ड्स, 17/20 अम्बालिपुरा   विलेज, बल्लान्दुर गेट, सर्जापौरा रोड, बंगलौर 560102

फोन- 09731552847, subharga@gmail.com

तीन कविताएँ


 - अनुपमा त्रिपाठी
1 छाया है अब बसंत


मन ने उमंग भरीतूलिका ने भरे रंग,
कोयलिया कूक रहीबाजे है मन मृदंग !!




फूलों की चिटकन है, रंगों की छिटकन है,
भँवरे की गुंजन है, छाया जो रंजन है !!

धूप में निखार आया रंग की बहार छाई ,
अमुआ की मंजरिया देखो कैसी बौराई !!
 
पीत वसना धरती है, धाती जो पीत वसन ,
धरती से अम्बर तक आया है अब बसंत !!

कंचन -सी धूप खिली छाया है अब बसंत !!
सतरंगी चूनर, लहराया है अब बसंत

 राग है बहार संग मनवा है यूँ मगन !
छेड़ो अब तान कोई ,लागी कैसी लगन,

प्रकृति में बिखरा चहुँ ओर उन्माद है ,
हरस रही सरसों है प्रीति का आह्लाद है,

रंग है बहार है रूप का शृंगार है ,
खिलती हुई कलियों पर आया जो निखार है...!!

सतरंगी...पुष्पों  पर छाया है अब बसंत
मदमाती सुरभि लहराया  है अब बसंत...!!

रोम रोम पुलकित, मदमाया है अब बसंत
छाया है अब बसंत!! छाया है अब बसंत...!!

2 मणि -सी कविता ...!!

किसलय का डोलता अंचल ,
नदी पर गहरी स्थिर लहरें चंचल
झींगुर का रुनक- झुनक- सा नाद ...
करता  हैं कैसा संवाद
पग  धरती विभावरी ,
धरती श्यामल आशा -भरी,
कोलाहल से दूर का कलरव ,
मन शांत प्रशांत नीरव
अनृत से प्रस्थान करते ,
नीड़ की ओर उड़ते पखेरू ,
मणिकार की मणि- सा ...
स्निग्द्ध धवल मार्ग दर्शाता विधु
शब्द बुनते भाव इस तरह
फिर लरजती लाजवन्ती ज्यों ,
उतरती है मन में.
जैसे...,
कोई मणि -सी कविता ...!!
3 अभिनन्दन
नीलम नभ से ,
किरणों की पावस सरिता  ,
दिक् उज्ज्वल,
विचरण करती
अम्बर से धरणी तक,
नव छंदों में,
झर झर झर झर
स्वर्णिम अनिमेष अनश्वर
अंजुरी से शब्दों की ,
अभिनव,
चपल दिवस का नंदन ,
नव संवत्सर अभिनन्दन ,
मैं करती
नूतन भावों से
निज चेतन संवेदन ...!! 

mo. 09350210808, tripathi_anupama@yahoo.com

आलेख

 रिश्तों के बुलबुले 

- डॉ. आरती स्मित
घरमंदिर के घंटे की अनुगूँज -सा पावन शब्द। घरकहने मात्र से रिश्तों की सतरंगी डोर आँखों के सामने लहराने लगती है। कानों में चिंकी, सोनू, मम्मी, पापा, दादा-दादी, बुआ, चाचा, ताया आदि-आदि शब्द रिश्तों की मिठास के साथ गूँजने लगते हैं। कहीं किलकारी भरते शिशु का दृश्य उभरता है तो कभी बुजुर्ग के साँस की आहट; कभी पति-पत्नी की नोंकझोंक तो कहीं देवर-भाभी का हास -परिहास छलक पड़ता है। कुल मिलाकर प्रेममय वातावरण का दूसरा नाम है घर, जहाँ प्रेमिल रिश्ते अंकुरित होते हैं।
बड़े-बुज़ुर्ग मानते हैं कि वक्त तेज़ी से बदल रहा है। क्या सचमुच?.... क्या उस बदलाव की नींव की ईंट वर्षों पहले नहीं रख दी गई थी?... क्या आहिस्ते-आहिस्ते बदलती हमारी जीवनशैली ने हममें से  हरएक को लीक से ज़रा हटकर चलने पर विवश नहीं किया?... क्या हमारी मानसिकता पहले से अधिक बदल नहीं गई और इस बदलाव में क्या परिवेश का बहुत बड़ा हाथ नहीं है?
 अन्तर्मन टटोलते हुए हमें उत्तर मिलता है- हाँ! अन्तर्मन की गुहा में प्रवेश करने पर कुछ और उत्तर मिलते हैं- बढ़ती महत्त्वाकांक्षा, बढ़ती आबादी के साथ घटते रोजगार के अवसर, शहरीकरण के विकास के साथ अपेक्षाकृत सुसंस्कृत और
सुसभ्य बने रहने की कृत्रिम होड़ में छूटते गाँव, निश्छल परिवेश और संयुक्त परिवार।
 ग्राम समाज में आज भी बड़े-बुज़ुर्गों की छत्रछाया में परिवार विस्तार पाता है। आज भी पुरातन संस्कार गाँवों में सुरक्षित है। किंतु, यह कहना भी अनुचित या अतिशय नहीं होगा कि संयुक्त परिवार की टूटती रीढ़ के पीछे अनपढ़ या कम पढे- लिखे माता- पिता की यह आकांक्षा कि उनकी संतान पढ़- लिखकर, कहीं नौकरी पाकर इज़्ज़ की ज़िदगी बसर करे, वह न सहे, जो उन्होंने सहे हैं। इसी इच्छा ने पहले ग्रामीण माता-पिता के बेटों को शहर तक पहुँचाया; नगर से महानगर और महानगर से विदेश जाने के पीछे समान इच्छा ही कार्यरत है।
कृषि अर्थव्यवस्था का मूल आधार होते हुए भी वह जीवन देने में असमर्थ रही, जो नौकरीपेशा या व्यापारी वर्ग में देखने को मिलता रहा। इस लिप्सा ने यह भुलाने में योगदान दिया कि सुख-साधन की प्राप्ति के बाद अभाव में जीना कठिनतम है। मनोवृत्तियाँ बदल जाती हैं और अनदेखी खाई रिश्तों के बीच पनपने लगती है।
 शहरीकरण अपने साथ कुछ संस्कारों का बीजारोपण करता है। उसकी अपनी कुछ माँग होती है और निवासियों की अपनी कुछ विवशताएँ। बढ़ती महँगाई और जीवन -स्तर ऊँचा उठाने की, अपने हिस्से के आसमान को कुछ अधिक व्यापक बनाने की मनोवृत्तियाँ आज विवशता में परिणत हो चुकी है। इसका परोक्ष प्रभाव परिवार पर ही पड़ता है, ख़ासकर शहरों और महानगरों में रह रहे तथाकथित संयुक्त परिवार पर, जहाँ तीन पीढिय़ाँ एक साथ एक छत के नीचे रह रही हैं।
 पति-पत्नी का काम पर जाना, थके- हारे शाम को लौटना; ऐसे में उनसे एक ओर वृद्धावस्था की ओर अग्रसर/ सेवा निवृत्त या गाँव से आकर बसे माता- पिता और दूसरी ओर बच्चों की यह अपेक्षा वे उन्हें सुने-समझें और उनकी इच्छानुसार कार्य करें, ऐसे दम्पत्ति के लिए दुरूह हो जाता है। इसका असर सबसे अधिक घर की बहू पर पड़ता है, जो पत्नी और माँ भी है। उसकी बची-खुची शक्ति ममत्व के उबाल के साथ ही संतान के वर्तमान और भविष्य की चिंता में लग जाती है। बच्चे ने ठीक से खाया या नहीं; स्कूल में क्या पढ़ाई हुई; ट्यूटर हैं तो वे क्या पढ़ा रहे हैं। बच्चा सही ढंग से समझ पा  रहा है या नहीं, उसकी तैयारी, उसका रिजल्ट आदि-आदि । कहीं न कहीं यह भाव कि वह नौकरी तो इन्हीं की बेहतरी के लिए कर रही है, कहीं इस फेर में बच्चों की देखभाल में कमी न हो जाए और फिर वह अपने और बच्चों के बीच फैली समय की रिक्तता को भरने में लग जाती है। पति अपने ज़रूरी काम से फुरसत पाकर टीवी, नेट या फोन पर व्यस्त हो जाते हैं ,ताकि दिनभर का  बोझिलपन दूर हो सके। इस व्यस्त दिनचर्या में समय ही नहीं बच पाता माँ-बाप के लिए कि वह घंटों उनके साथ बिताए। माता-पिता चाहते हैं कि बेटा अपना दुख-सुख उन्हें सुनाए और उनका हाल जाने। उनकी सेवा के लिए बहू को कहे। आखिऱ किस दिन के लिए बेटे को ब्याहा उन्होंने। उनकी यही चाहत उनके अंदर पीड़ा भरने लगती है। वे घर में स्वयं को उपेक्षित महसूस करने लगते हैं। दफ़्तर से आकर बहू का बच्चों के साथ अपने कमरे में चले जाना उन्हें नागवार गुजरता है और वे अपने समय, बुज़ुर्गों के प्रति अपनी कर्तव्यनिष्ठा की दुहाई देने लगते हैं। नतीजा, माता-पिता और बेटे-बहू के बीच भावनात्मक खाई बढ़ती जाती है। एक छत के नीचे सगे अजनबी बनते चले जाते हैं और बाहरी लोग अपने। कारण, वही भावनात्मक रिक्तता की आपूर्ति।

कई घरों में, (ख़ासकर जो माता-पिता बेटे- बहू के साथ रहने आते हैं) यह भी देखा गया है कि सारी सुख- सुविधाओं के बीच बुज़ुर्ग स्वयं को इसलिए उपेक्षित महसूस करते हैं, क्योंकि परिवार के हर सदस्य की अपनी बँधी दिनचर्या से हटकर चलना उनके लिए मुमकिन नहीं होता, (बुज़ुर्ग के अनुसार बच्चे उनके कहे अनुसार अब चलते नहीं) वे स्वयं  को घर की बेकार वस्तु मानने लगते हैं और पीड़ा को चिड़चिड़ाहट में बदलने से रोक नहीं पाते और फिर घर में सुख- सुविधाओं के बीच कलह का जन्म हो जाता है। बुज़ुर्ग अपनी संतान का प्रत्यक्ष स्नेह चाहते हैं, जो मिल नहीं पाता और....।

दूसरी अवस्था उन बुज़ुर्गों की है, जिनकी छत के नीचे बेटे-बहू, बेटी रहते हैं। यहाँ उनके द्वारा फैलाए अनुशासन के जाल को जब बेटे-बहू तोड़ नहीं पाते तो चुपके से अलग रहने की व्यवस्था करते हैं। कुछ ऐसे परिवार भी हैं, जहाँ भाइयों और उनकी पत्नियों में इसलिए अधिक एकता है, क्योंकि वे वृद्ध माता -पिता के विचार , व्यवहार और अंकुश लगाने की प्रवृत्ति से समान रूप से परेशान हैं। इस तरह, माता-पिता के साथ होकर भी वे साथ नहीं होते और अपने ही घर में ये वृद्ध अजनबी -से बने रह जाते हैं। उन सबकी पीड़ा एक ही होती है कि युवा होने के बाद बच्चे उनकी भावना, उनकी जरूरतों को नहीं समझते , अपने में तल्लीन रहते हैं।
 पार्क में टहलते हुए एक वृद्ध दंपत्ति से मैंने बातचीत की। सुसभ्य, सौम्य व्यक्तित्व। बात ही बात में, जब मैंने पूछा बहू क्या करती है? उत्तर में वृद्धा के चेहरे पर क्षोभ उभरा, फिर जवाब, ‘अजी नौकरी करती है।
 ‘शाम को?’
शाम को करना क्याआकर चाय-वाय पीती है और फिर बच्चों को लेकर अपने कमरे में। हमारा हाल पूछने का समय कहाँ है उसके पास!
पोते-पोतियों में तो मन रमा रहता होगा?’ जवाब में बुजुर्ग ने सिर हिलाकर हामी भरी किंतु वृद्धा माताजी दुखी स्वर में सुनाने लगीं  अजी, दिनभर बच्चे परेशान करते रहते हैं, तनिक सुस्ताने भी नहीं देते, लेकिन माँ के आते ही बिल में घुस जाते हैं।
उनके जवाब से मैं ज़रा परेशान हुई कि पोते-पोतियों के साथ रहना भी इन्हें गवारा नहीं तो फिर? क्या इसे ही संयुक्त परिवार कहते हैं जहाँ एक साथ रहते हुए भी सभी अलग-थलग हैं।
 संयुक्त परिवार में बिखराव का मूल कारण करीब तीस घरों (मध्यमवर्गीय) में एक समान मिला, वह यह कि पीढिय़ों के वैचारिक अंतर के साथ ही माँ- बेटी और सास- बहू के रिश्ते  का झीना, मगर मजबूत अंतर, जो रिश्ते को धीरे- धीरे इतना कसने लगता है कि परिवार का हर सदस्य बंधन से मुक्ति की चाह रखने लगता है। घर का परिवेश बाहर के परिवेश पर हावी होना चाहता है, लेकिन बाहरी परिवेश में मिली आज़ादी का एहसास घर को मंदिर की जगह कैदख़ाना का रूप देने लगता है। घर लौटकर आना विवशता बन जाती है, चेहरे पर सुकून नहीं, थकान होती है कि फिर वही चिकचिक। आश्चर्य तो इस बात का है कि यह समानता कस्बाई शहरों से लेकर महानगरों तक में पाई गई। कहीं बेटे- बहू ने अलग रहने का निर्णय लिया, कहीं साथ रहने की ज़िद में बेटे-बहू का तलाक हो गया; बच्चे बिखर गए और समाज ने सारा दोष बहू के सिर मढ़ दिया।
दिल्ली में स्थित वृद्धावास के गार्ड ने जो बताया, वह सरकार की सूझबूझ का परिचायक है। वृद्धावास में सुविधा सम्पन्न परिवार की ऐसी महिलाएँ रहती हैं, जिनके बच्चे या तो विदेश में हैं, या देश में रहकर भी इतने व्यस्त हैं कि माँ की दिनचर्या के साथ उनकी दिनचर्या मेल नहीं खाती और एक घर में रहकर भी उनकी आपस में मुलाकात या बातचीत नहीं हो पाती और उन्हें या तो दाई के भरोसे या अकेले रहना पड़ता। ऐसे में वे अवसाद की शिकार होने लग रही थीं। माँ को मनचाहा समय न दे पाने की विवशता के साथ ही कैरियर बनाने की लगन में कमी या भटकाव होने की स्थिति में उन्हें यह फैसला लेना पड़ा। कुछ की सिर्फ बेटियाँ हैं जो अपने-अपने परिवार में मशरूफ हैं। यहाँ वृद्धाओं के रहने- खाने और स्वस्थ्य की देखभाल की उत्तम व्यवस्था है। बच्चे प्रतिमाह फीस जमा करने के साथ ही व्यक्तिगत खर्च के लिए पैसे दे जाते हैं और छुट्टियों में मिलने आते हैं। वृद्ध महिलाओं को हमउम्र मिल जाती हैं। मनोरंजन के लिए टीवी हर कमरे में लगा है। बैठने -टहलने के लिए पार्क भी है। ऐसे में यह कहकर सहानुभूति जताना कि जिस माँ ने पाल- पोसकर बड़ा किया, उनके प्रति बच्चे कठोर हो गए, पूरी तरह उचित नहीं होगा क्योंकि महानगरीय जीवन-शैली में यह आवश्यकता बन गई कि बुज़ुर्गों को घर में अकेले न छोड़ा जाए। आए दिन अखबार ऐसी खबरों से भरे पड़े हैं कि बुजुर्ग दंपत्ति की हत्या करके घर लूट लिया गया। कहीं ड्रावर और नौकरों की मिली भगत से यह सब होता है, कहीं बाहरी लोगों के द्वारा। सुरक्षात्मक दृष्टिकोण से सरकार के द्वारा उठाया गया यह कदम सराहनीय है।

दूसरी ओर कुछ ऐसे वृद्ध दंपत्ति या अकेले जीवन व्यतीत करते वृद्ध स्त्री-पुरुष भी मिले, जिन्होंने  संतान के प्रति अपने कर्तव्य को भली- भाँति निबाहा, किंतु उनसे सेवा की अपेक्षा न रखते हुए उन्हें उनके आसमान में पर फैलाने की स्वच्छंदता दी और स्वयं को साहित्यिक, सांस्कृतिक तथा समाज-कल्याण में संलग्न कर विश्व को परिवार बना लिया। पहले की ही तरह ऊर्जावान रहते हुए युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्रो बने हुए हैं। उनकी संतानें उन्हें बहुत प्यार करती हैं और उनपर गर्व करती हैं। वे अवकाश में इकट्ठे होते हैं और एक एक क्षण रसमय बना देते हैं और आपसी रिश्तों को इतनी प्रगाढ़ता दे देते हैं कि शरीर से अलग रहकर भी वे परस्पर मन के बहुत करीब रहते हैं। उनके मकान अलग और दूर हैं, मगर घर एक ही है -रिश्तों का पुंजस्वरूप; जहाँ रिश्ते बुलबुले की तरह क्षणभंगुर नहीं, वरन समुद्र के जल की तरह सदैव अस्तित्व कायम रखने वाले हैं और वृद्ध उनके संरक्षक भी हैं और मार्गदर्शक भी।
वर्तमान समय ऐसे ही वटवृक्षों को पुकार रहा है- नई संतति को छाया देने के लिए।
सम्पर्क: 622 (प्रथम तल), पश्चिम परमानंद कॉलोनी, दिल्ली- 9, मो- 8376836119, 8882868530, dr.artismit@gmail.com