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Apr 13, 2013

पुन: पुन: भव…



पुन: पुन: भव
- प्रेम जनमेजय
जैसे- किसी नेता को हारा चुनाव जीतने पर, किसी भ्रष्टाचारी को बेदाग भ्रष्टाचार करने पर, वकील को झूठा मुकदमा जीतने पर, पुलिसवाले को दोनों पार्टियों के 'सार्थक  सहयोग से कत्ल का केस निपटाने पर, विद्यार्थी को बिना पकड़े नकल द्वारा परचा पूरा करने पर, धर्मगुरु को काम और अर्थ का फल प्राप्त करने पर -आलौकिक सुख प्राप्त होता है, वैसा आलौकिक तो नहीं पर उसके सहोदर-सा सुख किसी मध्यवर्गीय ईमानदार जीव को मुफ्त की तसल्ली बख्श दावत खाने पर मिलता है। रात को सातवें आसमान के सुख में डूबे मन का सुख की ऐसी खुमारी चढ़ती है कि वो सुबह अक्सर दफ्तर के लिए लेट हो जाता है।
हमारे राधेलाल भी इसी खुमारी में डूबे हुए थे कि उनकी पत्नी ने, जो कम खुमारी में डूबी थी, दफ्तर के लिए उठा दिया- सात बजने वाले हैं,, दफ्तर नहीं जाना है क्या?
- अरे यार, बहुत दिनों बाद बढिय़ा नींद आ रही थी... कल की पार्टी बहुत जोरदार थी।
- जोरदार क्यों नहीं होगी, बढिय़ा शराब की नदियाँ जो बह रही थीं। मैं देख रही थी कि खूब गोते लग रहे थे तुम्हारे...
अपने पीने पर आक्रमण होता देख अच्छे-अच्छे पतियों की खुमारी टूट जाती है, राधेलाल की भी खुमारी टूट गई और उसने प्रत्याक्रमण की मुद्रा में कहा- और तुम जो चाट वाले स्टाल पर भुक्खड़ की तरह लगी हुई थी... गोलगप्पे, दही भल्ले, चीला और वो क्या टिकिया... कुछ छोड़ा तुमने...और उसके बाद खाने पर ऐसे टूटी कि...
-हम खा रहे थे, पी नहीं रहे थे...
- नशा चाहे जुबान का हो या गले का, नशा- नशा होता है।
पत्नी ने सुबह की चाय का कप पति को थमाते हुए कहा- उपदेशक जी चाय पियो,... यारब वो न समझे हैं, न समझेंगे मेरी बात...
पति ने मुस्कराकर चाय का कप पकड़ते हुए कहा- और तुम्हारे चचा गालिब ने ही कहा है, तौबा- तौबा शराब से तौबा... और मैडम जी, सुबह की चाय का भी एक नशा होता है... चाय मिलते ही वैसी ही ताजगी आ जाती है जैसी हाथ में गिलास आते... बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद... कुछ भी कहो कल मल्होत्रा ने दावत बहुत जोरदार दी... क्या नहीं था खाने को और एम्बियेंस...
- पंजाबियों की पार्टी होती जोरदार हैं।
- दिखावा भी जोरदार होता है। उसने दस डिश रखी है तो मैं बीस रखूंगा वाली प्रतियोगिता होती है। एक समय था जब भगवान को छप्पन भोग लगाए जाते थे और भक्त हाथ बाँधे प्रभु का भोग लगाते देख प्रसन्न होता था। आजकल प्रभु भक्तों के लिए विवाहोत्सव आदि में छप्पन भोग परोसते हैं और भक्त भोग लगाते हैं और हाथ जोड़कर भोग की तारीफ करते हैं।
- अरे बाप रे...पौने आठ हो गए... आपके चक्कर में मैं लेट हो जाउंगी... आज कामवाली भी अभी नहीं आई है...
- लगता है वो भी रात को किसी मल्होत्रा की पार्टी में गई होगी... ज़रा अखबार पकड़ा देना- कहकर राधेलाल हँसे पर अखबार पकड़ते ही हँसी नैतिक मूल्यों- सी गायब हो गई और वे ऐसे उछल पड़े जैसे  हिंदी फिल्मों की किसी हिरोन को पूरे कपड़े पहने देख लिया हो, इस प्रौढ़ावस्था में किसी सुंदरी का प्रेमपत्र सामने आ गया हो या फिर अपने विरोधी का प्रोमोशन-पत्र देख लिया हो। रसोई की ओर प्रगतिशील पत्नी के कदमों के लिए अवरोध उत्पन्न करते हुए चिल्लाए- से, सुनो, लो फिर रसोई गैस, मिट्टी के तेल और पेट्रोल के दाम बढ़ गए और इस बार तो बढ़े भी जेबफाड़ हैं...
पत्नी के प्रगतिशील कदम जनविरोधी नीतियों की घोषणा सुन लौटे तो नहीं, रुक अवश्य गए। सब्जियों और दालों ने लो फिर के अंदाज में पहले ही रसोई महँगी की हुई है, और उसपर पतिदेव की यह सूचना- सुनो, लो फिर रसोई गैस, मिट्टी के तेल और पेट्रोल के दाम बढ़ गए और इस बार तो बढ़े भी जेबफाड़ हैं... । दाम बढ़ाने वालों पर गुस्सा करके वह कर भी क्या सकती है, बस वोट नहीं देगी और जिसे देगी उसकी क्या गारंटी है कि लो फिर नहीं होगा। इसलिए उसे गुस्सा आता है पति पर जो गैस का खाली सिलेंडर समय से नहीं भरवाता है, गाड़ी में पेट्रोल की टंकी रिजर्व से भी नीचे ले आता है। इससे ज्यादा नहीं, ऊँट के मुँह में जीरा तो आ ही सकता है, बचत की एक मानसिक संतुष्टि तो मिल सकती है।  
 ये लो फिर आजकल के भारतीय जीवन में सामान्य घटना-सा हो गया है। कई बार ये लो फिर जागो मोहन प्यारे से आरंभ होता है और रात को आ जा री निंदिया के साथ समाप्त होता है। इस लो फिर में लेना कुछ नहीं होता है और न ही कुछ मिलता है और यदि कुछ मिलता भी हो तो उसके प्रति आपकी अनिच्छा ही होती है।
अभी तो पति ने अखबार पढ़कर इतना ही 'लो फिर  बताया है कि रसोई गैस, मिट्टी के तेल और पेट्रोल के दाम बढ़ गए, अभी यह 'लो फिर तो नहीं बताया कि दूध के दाम बढ़ गए हैं, बसों के किराए बढ़ गए हैं, बिजली के दाम बढ़ गए हैं, ,बच्चे की फीस बढ़ गई, हाउसिंग और कार लोन बढ़ गया है, किसी तीन साल की बच्ची का यौन शोषण हुआ है, ,किसी बलात्कारी ने सत्तर साल की बुढिय़ा को नहीं छोड़ा, किसी आतंकी पर लंबा मुकदमा चल रहा है आदि आदि 'लो फिर।
 कहते हैं कि इतिहास अपने को दोहराता और संभवत: ये इसी कहने का परिणाम है कि हमारे जीवन में 'लो फिरबहुत होता है। हर मनुष्य का अपना इतिहास होता है- कुछ का लिखा जाता है, कुछ लिखवाते हैं और बहुतों का अलिखित रहता है। अब इतिहास है तो जीवन में 'लो फिरआएगा ही। आप ध्यान से देखें तो जैसे आपके चारों ओर भ्रष्टाचार विद्यमान है वैसे ही जीवन को कोई कोना ऐसा नहीं है जहाँ लो फिर विद्यमान न हो।
 हमारी सर्वप्रिय राजनीति में लो फिर महिमा वर्णन- लो फिर उसे टिकट मिल गया, लो फिर दाम बढ़ गए, लो फिर विरोधी दल ने भारत बंद किया, लो फिर संसद पूरे सत्र नहीं चली, लो फिर मंत्रिमंडल में बदलाव हुआ, लो फिर नेता असंतुष्ट हुए, लो फिर नेता जी ने आत्मा की आवाज सुनी, लो फिर मंत्री जी पर सी बी आई इंक्वारी बैठी, लो फिर मंत्री जी निर्दोष पाए गए, लो फिर लाठी चार्ज हुआ, लो फिर सरकार ने चुनावी बजट पेश किया, लो फिर चुनाव आ गए, लो फिर मध्यावधि चुनाव आ गए, लो फिर घोटाला हो गया, लो फिर घोटाले में कोई नहीं फंसा।  
 साहित्य में देखें, लो फिर  महिमा- लो फिर उस साले को पुरस्कार मिल गया, लो फिर उसका एक और संकलन आ गया, लो फिर उसकी किताब कोर्स में लग गई, लो फिर साला अध्यक्ष बन गया, लो फिर उसकी पुस्तक चर्चित हो गई, लो फिर युवा लेखिका/लेखक उससे रात में मार्गदर्शन लेने चला गया, लो फिर प्रकाशक ने रॉयल्टी नहीं दी, लो फिर उसकी किताब बल्क परचेज में आ गई, लो फिर  वो संपादक बन गया, लो फिर मेरी रचना वापस आ गई और उसकी छप गई।
अथ न्यायालय लो फिर  महिमा- लो फिर मुकदमा बीस बरस से चल रहा है, लो फिर एक और बदमाश बरी हुआ, लो फिर पैसे की चल गई, लो फिर मंत्री जी को जेल में वी आई पी सुविधा मिली, लो फिर कैदियों ने सुपरिंटेंडेंट को मार दिया, लो फिर जेल में मोबाइल मिले, लो फिर काले कोट वालों ने हड़ताल की।
 सरकारी दफतर में लो फिर  महिमा- लो फिर बड़े बाबू नहीं आए, लो फिर उसे आउट ऑफ टर्न प्रोमोशन मिल गया, लो फिर उस पर सी बी आई इंक्वायरी बैठ गई, लो फिर साहब ने सेक्रेटरी को देर तक काम करने के लिए अकेले रोक लिया, लो फिर साले ने सी आर खराब कर दी।
 परिवार में लो फिर महिमा- लो फिर दहेज मांग रहे हैं, लो फिर लड़की पैदा हो गई, लो फिर बहू खाली हाथ आई, लो फिर कोई जला, लो फिर बहू ने मुकदमा कर दिया, लो फिर उनकी लड़की भाग गई, लो फिर मोहल्ले की नाक कट गई, लो फिर अपनी नाक कट गई।
अभी तो मैंने लो फिर का वर्णन- समुद्र में बूँद जितना, थाने में ईमानदारी जितना, नेता में सभ्य आचारण जितना, अमेरिकी प्रशासन में विनम्रता जितना, पाकिस्तान सरकार के सत्य वचन जितना, आतंकवादी की आंख में आँसू जितना, हिंदी फिल्मो की हिरोइन के शरीर में कपड़े जितना ही किया है। इसका और वर्णन करने के लिए मुझे समुद्र को स्याही, धरती को कागज यानी उतना ही करना पड़ेगा जितना भारत में भ्रष्टाचार के वर्णन के लिए करना पड़ता है।
 देश का और आपका इस लो फिर  के चक्कर में क्या होता है, आपके जीवन में लो फिर कितना लो अथवा हाई है, या आज क्या-क्या लो फिर हुआ, जानता नहीं पर इतना जानता हूँ कि इस लो फिर के कारण राधेलाल के घर में सुनामी आ गई। क्या-क्या लो फिर हुआ? पढि़ए- लो फिर बाई नहीं आई, लो फिर कार की बैटरी डाउन हो गई, लो फिर माँ -बाउ जी दो महीने के लिए आ रहे हें, लो फिर दिल्ली बंद हो गया, लो फिर छोटी को बुखार आ गया, लो फिर सोसायटी ने मेंटेनेंस बढ़ा दिया, लो फिर गीजर खराब हो गया, लो फिर पानी नहीं आ रहा है, लो फिर बिजली चली गई आदि आदि अनादि। 

 संपर्क: 73 साक्षर अपार्टमेंट्स, ए-3 पश्चिम विहार नई दिल्ली- 110063  E-mail- premjanmejai@gmail.com

बस्तर की लोकथाएँ



बस्तर की लोकथाएँ- अनुकरणीय सत्प्रयास
- डॉ. कौशलेन्द्र मिश्र
पुस्तक बस्तर की लोककथाएँ  में अविभाजित पूर्व बस्तर के वर्तमान सात जिलों के वनवासी अंचलों में प्रचलित आंचलिक भाषाओं, उन्हें बोलने वाले समुदायों, भाषायी विशेषताओं, आंचलिक भाषाओं के पारस्परिक संबन्धों-प्रभावों और इन आंचलिक भाषाओं की व्याकरणीय समृद्धता का विश्लेषण करता हुआ हरिहर जी का छब्बीस पृष्ठीय निवेदन अपने आप में एक संग्रहणीय आलेख हो गया है। न केवल भाषा प्रेमियों अपितु भाषाविज्ञानियों और शोधछात्रों के लिए भी यह प्राक्कथन बहुत ही उपयोगी बन गया है। संस्कृति, सभ्यता और परम्पराओं के संवहन की मौलिक विधा के रूप में वाचिक और श्रवण परम्पराओं ने लोककथाओं को जन्म दिया है। लिपि के विकास से बहुत पहले अपने अनुभवों, सन्देशों और शिक्षाओं के सम्प्रेषण तथा मनोरंजन के लिए पूरे विश्व के मानव समाज ने लोककथाओं की मनोरंजक विधा को अपनी-अपनी बोलियों में गढ़ा और विकसित किया। निश्चित ही लोककथाओं का उद्देश्य केवल मनोरंजन न होकर समाज की बुराइयों और शिक्षाओं को वाचिक परम्परा के माध्यम से अगली पीढिय़ों को सौंपना भी था। इसीलिए, इन लोककथाओं में मनुष्य की स्वार्थ और धूर्तता जैसी नकारात्मक प्रवृत्तियों के विरुद्ध बुद्धिमत्तापूर्ण उपायों से किए जाने वाले संघर्षों से प्राप्त होने वाली विजय की कामना के साथ-साथ आंचल की विविध समस्याओं के समाधान के लिए भी कहानियाँ गढ़ी जाती रही हैं। कहानियाँ अपने अंचल और समुदाय का प्रतिनिधित्व करती हैं। बस्तर की लोक कथाओं के माध्यम से बस्तर के जनजीवन, उनकी सरल परम्पराओं, जीवनचर्या और समस्याओं को प्रतिबिम्बित किया गया है। बस्तर की लोककथाओं की विशेषता इन कथाओं के भोलेपन और कथा कहने की शैली में दृष्टि गोचर होती है। इस नाते ये कथाएँ बस्तर के वनवासी समाज की अकिंचन जीवनशैली, उनकी सोच, और उनकी परम्पराओं का एक लेखा-जोखा प्रस्तुत करती हैं।
 इन सरल कहानियों के पात्र आम वनवासी के बीच से उठकर आते हैं इसीलिए कोस्टी लोककथा 'लेडग़ा' का राजकुमार भी शहर घूमने की इच्छा करता है और सम्पन्न होते हुए भी जीवन की आम समस्याओं से दो-चार होता है। लोक कथाओं में ऐसा भोलापन अकिंचन समाज से ही स्रवित होकर आ पाता है। राजघरानों की कुटिलताओं के किस्से भी आमआदमी के पास तक पहुँचते-पहुँचते हल्बी लोककथा राजा आरू बेल-कयना एवं पनारी लोककथा 'राजा की बेटी' के किस्सों की तरह कोई न कोई चमत्कारिक समाधान खोज ही लेते हैं। यह लोकजीवन की सरलता और जीवन में सुख की आकांक्षा का प्रतीक है। अतीन्द्रिय शक्तियों में आस्था, दैवीय चमत्कार, तंत्र-मंत्र और जादू-टोना पर विश्वास आदिम मनुष्य की भौतिक सामर्थ्य सीमा के अंतिम बिन्दु से प्रकट हुए वे उपाय हैं जो किसी न किसी रूप में सुसंस्कृत, सुसभ्य और अत्याधुनिक समाज में आज भी अपना स्थान बनाये हुए हैं। अबूझमाड़ी कथा 'गुमजोलाना पिटो' और दोरली कथा 'देवत्तुर वराम' के माध्यम से वनवासी समूहों द्वारा अतीन्द्रिय शक्तियों में आस्था प्रकट की गयी है जो मनुष्य को उसकी सीमित शक्तियों की आदिम अनुभूति की विनम्र स्वीकृति है।              
मानव समाज में धूर्तों के कारण मिलने वाले दु:खों और उनसे मुक्ति के लिए युक्ति तथा दैवीय न्याय की स्थापना हेतु पशु-पक्षियों के माध्यम से मनोरंजक शैली में 'सतूर कोलियाल' जैसी सरल-सपाट कहानियाँ गढ़ी गयी हैं जो बच्चों को मनोरंजन के साथ-साथ कुछ सीख भी देती हैं।   
 रक्त संबन्धों में विवाह किया जाना किसी भी विकसित और सभ्य समाज के लिए अकल्पनीय है तथापि कुछ जाति समूहों में रक्त सम्बन्धों में विवाह की परम्परा उन-उन समाजों द्वारा मान्य होकर स्थापित है। अबूझमाड़ की जनजातियों में ऐसे सम्बन्धों पर चिंता प्रकट करते हुए अबूझमाड़ी गोंडी लोककथा 'ऐलड़हारी अनी तम दादाल' के माध्यम से एक सुखद एवं वैज्ञानिक सन्देश देने का प्रयास किया गया है। रात में सोते समय दादी-नानी की सीधी-सरल कहानियाँ छोटे-छोटे बच्चों के लिए न केवल मनोरंजक होती हैं अपितु बालबुद्धि में संस्कारों का बीजारोपण भी करती हैं। मनोरंजन के आधुनिक साधनों ने हमारी नयी पीढ़ी को संस्कारों से वंचित कर दिया है, पारिवारिक आत्मीय सम्बन्धों की बलि ले ली है और समाज को दिशाहीन स्थिति में छोड़ दिया है। आधुनिक संसाधनों और सिमटती भौगोलिक सीमाओं के कारण विभिन्न सभ्यताओं के पारस्परिक सन्निकर्ष के परिणामस्वरूप हमारी प्राचीन विरासतें समाप्त होने के कगार पर हैं। हम अपनी नयी पीढिय़ों को कुछ बहुत अच्छा नहीं दे पा रहे हैं, ऐसे में लोककथाओं के संकलन के माध्यम से अपनी विरासत के संरक्षण का प्रयास निश्चित ही कई दृष्टियों से प्रशंसनीय एवं अनुकरणीय है।    
लोकसाहित्य समाज की सहज और भोली अभिव्यक्ति ही नहीं है वह लोक जागरूकता का भी प्रतीक है। आधुनिक जीवनशैली और जीवन को सुविधायुक्त बनाने वाले संसाधनों ने हमारी सामाजिक संवेदनाओं को कुंठित कर दिया है जिसका सीधा दुष्प्रभाव लोकसाहित्य पर पड़ा है। हम पुराने का संकलन भर कर रहे हैं, नवीन का सृजन नहीं कर पा रहे। यह एक दु:खद और निराशाजनक स्थिति है। छोटे-छोटे बच्चे जो अभी पुस्तकें पढऩे के योग्य नहीं हुए हैं उनके लिए तो लोक कथाएँ और लोकगीत ही उनकी जिज्ञासाओं का रुचिकर समाधान कर सकने और संस्कारों का बीजारोपण कर पाने में सक्षम हो पाते हैं। इसीलिए मेरा स्पष्ट मत है कि आज नयी पीढ़ी में संस्काराधान के लिये नये सन्दर्भों में लोकसाहित्य के नवसृजन की महती आवश्यकता है।   
बस्तर की लोककथाओं के इस संकलन में गुण्डाधुर और गेंदसिंह जैसे भूमकाल के महानायकों की निष्फल तलाश अपने उन पाठकों को निराश करती है जो तत्कालीन शासन व्यवस्था द्वारा किए जाने वाले शोषण के विरुद्ध वनवासी समाज में स्वत: स्फूर्त उठे विद्रोह और उनकी वीरता की कथाओं में न केवल रुचि रखते हैं अपितु अपने अतीत में अपने पूर्वजों के गौरव को भी तलाश करते हैं। लोककथाएँ इतिहास को आगे ले जाती हैं, हमें गुण्डाधुर और गेंदसिंह को जि़न्दा रखना ही होगा। यद्यपि, प्रत्येक कहानी के अंत में हिंदी के पाठकों के लिए हिन्दी अनुवाद दिया गया है किंतु इस संकलन को और भी उपयोगी बनाने की दृष्टि से अगले संस्करण में मूल कहानी के प्रत्येक पैराग्रा$फ के बाद उसका हिन्दी में अनुवाद दिया जाना उन स्वाध्यायी भाषाप्रेमियों के लिए सुविधाजनक होगा जो नई-नई भाषाओं को सीखने में रुचि रखते हैं।  कथाओं के साथ-साथ इस पुस्तक में यदि बस्तर के जनजीवन को प्रदर्शित करने वाले सन्दर्भित रेखाचित्र भी दिये गये होते तो बस्तर से दूर रहने वाले पाठकों को बस्तर और भी उभर कर दिखायी दिया होता।
त्रुटिहीन प्रकाशन और मुखपृष्ठ की साज-सज्जा ने पुस्तक में चार चाँद लगा दिए हैं जिसके लिये नेशनल बुक ट्रस्ट, इण्डिया साधुवाद का पात्र है। लोककथा के इस संकलन के लिए आदरणीय लाला जगदलपुरी जी एवं हरिहर वैष्णव जी का सद्प्रयास अनुकरणीय है।
पुस्तक: बस्तर की लोककथाएँ।
सम्पादक द्वय: लाला जगदलपुरी एवं हरिहर वैष्णव।
प्रकाशन: लोक संस्कृति और साहित्य श्रंखला के अंतर्गत  नेशनल बुक ट्रस्ट, इण्डिया द्वारा प्रकाशित। 


संपर्क: शासकीय कोमलदेव जिला चिकित्सालय, कांकेर, उत्तर-बस्तर, छ.ग. 494334

आपके पत्र



डर के आगे जीत है
मार्च अंक में प्रकाशित लोकेन्द्र सिंह का लेख विशेषाधिकार नहीं समान अधिकार चाहिए के संदर्भ में मेरी राय कुछ इस तरह है-

कहते हैं कि शिक्षित वर्ग समाज की सबसे सशक्त कड़ी है और यह एक सभ्य समाज की रचना करता है, पर क्या आज जो कुछ इस सभ्य कहे जाने वाले समाज में घटित हो रहा है... क्या ये शिक्षित वर्ग जनित है क्या यही शिक्षा प्राप्त कर रहा है हमारा समाज..?  इस पुरुष प्रधान देश में कोई ऐसा नियम पुरुषों के लिए क्यों नहीं बनाया जाता है जिससे इन पर अंकुश लगाया जा सके। कभी कोई नियम बना भी तो वह पूरी तरह लागू नहीं हो सका! एक टेलीविजन एड की ये पंक्तियाँ मुझे इसका एक मात्र हल लगती है कि डर के आगे जीत है और ये डर ही हमारे समाज से निकल-सा गया है, जब तक ये डर उस विकृत मानसिकता में घर नहीं करेगा कोई सुधार नहीं होगा। हमें कुछ ऐसे नियमों को कड़ाई से लागू करना होगा जो इस समाज में उन लोगों के लिए खौफ़ का पर्याय बन जाए जो अपनी विकृत मानसिकता से इस तरह के कृत्यों को सिर्फ अपने मजे के लिए अंजाम दे रहे हैं। पर ये सब लागू कौन करेगा?  शायद यह तब तक मुमकिन न होगा , जब तक भारतीय सविधान में संशोधन न हो।
    इसी अंक की अनकही में जो उदाहरण आपने दिया है, वह वास्तव में अपने आप में एक अनुकरणीय पहल है, इस पहल को मेरा सलाम! हम सब डबल स्टैंडर्ड में जीते हैं, दूसरों के लिए एक मापदंड होता है, अपने लिए दूसरा। जैसा की अपने लिए कहूँ तो- मेरा क्रोध परिस्थिति की वजह से हुई भूल है, और दूसरे के लिए कहूँ तो- वह है ही बड़ा क्रोधी। कोई चीज टूट गई, तो मैं अपने लिए कहूँगा कि मुझसे टूट गई और दूसरे के लिए उसने तोड़ दी। पहल की अपेक्षा सदैव हमें दूसरो से रहती है।
            - अमित वर्मा, लखीमपुर खीरी उ. प्र., avermaaa@gmail.com

दिखावटी व महँगी परम्पराएँ
मार्च अंक की साजा-सज्जा सदैव की तरह आकर्षक है और विषय वस्तु का चयन भी रोचक एवं सम-सामयिक है।
लोकेन्द्र सिंह का आलेख विशेष अधिकार नहीं सामान अधिकार-विचार मंथन के लिए पर्याप्त सामग्री देता है। वास्तव में विशेषाधिकार के कारण ही समाज के पिछड़े में आत्मविश्वास नहीं आ सका है समान अधिकार की ही बात करनी होगी पर समानता की व्याख्या उतनी आसान नहीं है जितनी कि दिखती है- जों बहुत पीछे हैं उन्हें अधिक साधन सम्पन्नता देनी ही होगी- इक्वीटेबल डिस्ट्रीब्यूशन आफ जस्टिस भी यही कहता है।
होली पर बच्चन जी की पंक्तियाँ आज के माहौल में और भी प्रासंगिक हो गईं हैं
'एक अनुकरणीय पहलमें संपादिका महोदया ने ठीक ही कहा है कि जों प्रथाएँ समाप्त हो जानी चाहिए या सादगी से संपन्न होना चाहिए वे ही और दिखावटी व महँगी होती जा रही हैं।
छत्तीसगढ़ की बारह मासी फाग पढ़कर बहुत अच्छा लगा- इस के लिए जी.के.अवधिया जी को धन्यवाद।
            - ब्रजेन्द्र श्रीवास्तव ग्वालियर, rijshrivastava@rediffmail.com

मैंने भी सोचा है बेटे के विवाह में धन 
का अपव्यय नहीं होने दूँगा
 8 मार्च विश्व महिला दिवस पर प्रकाशित बेला गर्ग का लेख औरत को हाशिया नहीं पूरा पृष्ठ चाहिए एक चिंतनीय विषय  है कि जिस देश में स्त्रियों को विशेष सम्मान के योग्य प्रतिष्ठित किया गया है ,उसी देश में आज स्त्रियों की स्थिति अपमानजनक बन गई है। कारण हमारे ही समाज में कहीं छिपे हुए हैं, कहीं पुरुष की पाशविकता तो कहीं इस पाशविकता के प्रतिरोध का अभाव। स्त्री को सशक्त होना होगा... किंतु इसका मार्ग भी स्वयं उसे ही चुनना होगा।
विशेषाधिकार नहीं समान अधिकार चाहिए पर मेरी राय है कि- अधिकारों की स्वतंत्रता को समझे बिना अधिकार और स्वतंत्रता की बात की जा रही है। मैंने कुछ महिलाओं से पूछा- युवती, प्रौढ़ा और वृद्धा से भी; कि क्या उन्हें अपने घर की बच्चियों/ किशोरियों/ बहुओं को कम कपड़ों में देखने में कोई ऐतराज़ है? सब का उत्तर एक ही था -'बिल्कुल ऐतराज़ है। मैंने तर्क दिया कि आदिवासी स्त्रियाँ तो बहुत कम कपड़े पहनती हैं। उत्तर मिला- 'किंतु वे भी जब शहर आती हैं तो कपड़े पहनकर ही आती हैं। तब ये कौन स्त्रियाँ हैं, जो अंगप्रदर्शन को अपनी स्वतंत्रता की राह में अवरोध मानती हैं? मैं समझ नहीं पाता हूँ कि नारी स्वतंत्रता को कम कपड़ों के पैमाने से क्यों देखा जा रहा है? क्यों इस बात पर बल दिया जा रहा है कि कम कपड़े पहनने से ही नारी स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति हो सकेगी? देह के केन्द्र से बाहर आए बिना सारी बहस निरर्थक है। स्त्रियों को बाजार और विज्ञापन की दुनिया से स्वयं को पहले मुक्त करना होगा। इसके पश्चात्  ही उसका पथ प्रशस्त हो सकेगा। इस विचारोत्तेजक लेख के लि लोकेन्द्र सिंह जी को साधुवाद!
अनकही अनुकरणीय पहल... टीवी सीरियल्स की तो बात ही मत कीजि। बौद्धिक प्रदूषण फैलाने में इनका प्रमुख योगदान है। विवाह/यज्ञोपवीत संस्कार में अपने मिथ्या वैभव प्रदर्शन से लोग गौरवांवित हो रहे हैं किंतु इससे कुप्रथाओं और धन के अपव्यय को ही बढ़ावा मिल रहा है। मैंने भी सोच रखा है, अपने बेटे के यज्ञोपवीत/विवाह संस्कारों में धन का अपव्यय नहीं होने दूँगा। प्रेरक प्रसंग देने के लिये सम्पादिका जी को साधुवाद!
                                   -कौशलेन्द्र, कांकेर, kaushalblog@gmail.com
समान अधिकार चाहिए लेकिन...
उदंती में 8 मार्च विश्व महिला दिवस पर लोकेन्द्र सिंह ने अपने लेख में जो मुद्दे उठाए हैं, यद्यपि वे सभी महत्त्वपूर्ण हैं किन्तु वर्तमान परिस्थितियों में यह भी जरूरी है कि जब तक समाज का चरित्र नहीं बदलता है, महिलाओं को हमें कतिपय विशेषाधिकार देने होंगे ताकि वह आने वाले वर्षों में उस स्थिति में पहुँच जाए, जहाँ वह यथार्थ में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा  मिलाकर चल सके। ऐसे सभी अधिकार महिलाओं की सुरक्षा से सम्बंधित होने चाहिए। मेरे विचार से अभी हमारे समाज का एक बड़ा हिस्सा जिसमें दुर्भाग्य से स्वयं महिलाएँ भी शामिल हैं, नारी पर यत्र-तत्र अंकुश लगाने में यकीन रखता है। उदहारण के तौर पर माँ यह कभी नहीं चाहती है कि उसकी बेटी उसी तरह से अपनी सहेलियों के साथ घूमती रही जैसे उनका बेटा अपने दोस्तों के साथ घूमता रहता है। घड़ी में शाम के आठ बजे नहीं कि हम सभी अभिभावक घर से अकेले बाहर गई बेटी के वापस आने की प्रतीक्षा व्यग्रता से करने लगते हैं।  हमारे देश में इस समय जो हालात हैं, उसमें बेटियाँ या बहुएँ ही नहीं, प्रौढ़ा महिलाएँ भी घर से अकेले बाहर जाने से पहले सौ बार सोचती हैं।
इस विषय पर विचार करते समय मुझे आधुनिक ओलंपिक खेलों के जन्मदाता कुबैर्तिन के वे शब्द याद आ रहे हैं जो उन्होंने अपनी पुस्तक  'रिव्यू ओलंपिक  में लिखे हैं- 'महिलाओं का सिर्फ एक ही कार्य है और वह है खेलों में विजयी पुरुषों को हार पहनाना..!दरअसल, मानव सभ्यता के प्रारंभ से ही महिलाओं को नैतिकता एवं अन्य दूसरे शारीरिक- सामाजिक कारणों की दुहाई देकर पशुओं की तरह एक बाड़े के भीतर रखने के प्रयास किए जाने लगे थे। इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता है कि इस सोच के पीछे कुछ हद तक वे कारण थे जो महिलाओं को पुरुषों से विशेषकर शारीरिक हिसाब से भिन्न बनाते हैं। सोचने की बात सिर्फ यह है कि अन्य सभी जीवधारियों में नर और मादा का जीवन एक जैसा नजर आता है। सिर्फ इस धरती पर मानव ही लिंग को आधार बनाकर नारियों को कतिपय बंधनों में रखना चाहता है। इसकी वजह भी हैं। मैंने विगत चालीस वर्षों में अनेक बार यह देखा है कि भीड़ भरी बसों में महिलाओं को क्या कुछ झेलना पड़ता है। हम अपने को आधुनिक तो कहते हैं किन्तु हमारी आधुनिकता का स्तर क्या है, इस सवाल का उत्तर देने के लिए इतना बताना काफी होगा कि आधुनिकता की प्रतीक दिल्ली मेट्रो में महिलाओं के लिए अलग से डिब्बे  लगाने पड़े। यथार्थ के धरातल पर उतरने पर पता चलता है कि तमाम सरकारी और गैर सरकारी कोशिशों के बावजूद आज भी हम पुरुषों का और यहाँ तक कि स्वयं महिलाओं का  महिलाओं  को देखने का नजरिया नहीं बदला है। भारतीय समाज में महिलाओं को पंच- सरपंच तो बनाया जाता है लेकिन उनके सारे अधिकार उनके पतियों की जेब में रहते हैं।
इस तर्क  में दम है कि विशेषाधिकार की माँग विकलांगता को जन्म देती है। निसंदेह, महिलाएँ और पुरुष, दोनों यदि एक ही  'क्यूमें खड़े होकर अपना काम निपटाएँ तो वह एक आदर्श स्थिति होगी। अमेरिका सहित कई देशों में ऐसा ही होता है। फर्क सिर्फ इतना है कि वहाँ 'क्यूमें खड़े लोग एक दूसरे से सम्मानजनक दूरी बनाये रखते हैं। अपने यहाँ ऐसा नहीं है। यहाँ लोग धक्का-मुक्की करने तक से परहेज नहीं करते हैं। नारी स्पर्श के लिए लालायित लोग कोई ऐसा मौका नहीं गँवाना चाहते जब उन्हें दूसरे की बहन, बेटी या बहू से किसी बहाने शारीरिक स्पर्श का मौका मिल रहा हो।
नारी सम्मान की हकदार है और उसे इसके लिए याचना करने की जरूरत नहीं है। हमारे यहाँ नारी को लेकर बहुत अच्छी बातें कही जाती हैं; किन्तु ऐसा सब मंचों/ लेखों/ धारावाहिकों या नाटकों तक सीमित रहता है। यथार्थ के धरातल पर हम उसे सदियों से भोग की वस्तु मानते चले आ रहे हैं।
कुल मिलाकर, सरकार और समाज, दोनों को अपने स्तर पर महिलाओं को कुछ ऐसे विशेषाधिकार देने होंगे जो उनकी सुरक्षा को सुनिश्चित करने में सहायक हों। साथ ही हमें ऐसे सामाजिक आन्दोलनों की जरूरत है जो हमारे समाज में महिलाओं को सम्मानजनक ढंग से जीने की आजादी दिलाने में सहायक हों।
                   - सुभाष लखेड़ा, नई दिल्ली, subhash.surendra@gmail.com

सराहनीय पहल
अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस और होली पर विशेष पठनीय समाग्री के साथ उदंती का मार्च अंक मिला। अनकही में विवाह में फिजूलखर्ची करने के बजाय उपहार के रूप में पुस्तक देना निश्चित रूप से सराहनीय और अनुकरणीय पहल है। माटी समाज सेवी संस्था का जन जागरण- होली खेलें पर पानी बचाएँ और होली में अपनाये जाने वाले उपायों पर सार्थक प्रयास की हम सराहना करते हैं। भाई जी. के. अवधिया का 'छत्तीसगढ़ में फाग परंपरा’, लोकेन्द्र  सिंह का 'विशेषाधिकार नहीं सामान अधिकार चाहिएऔर बेला गर्ग का 'औरत को हाशिया नहीं पूरा पृष्ठ चाहिएबहुत अच्छा लगा। 
    - प्रो. अश्विनी केशरवानी, ashwinikesharwani@gmail.com

डॉ. दीप्ति जी को साधुवाद
अनकही में कही गई बात एक अनुकरणीय पहल है...इसके लिए डॉ. दीप्ति जी को साधुवाद... आपने इस के बारे में हमें बताया, इसके लिए आप भी बधाई की हकदार हैं... और साथ ही वर-पक्ष भी, क्योंकि डॉ.साहब की इस पहल को उन्होंने भी अपना सहयोग दिया... और समस्त कार्यक्रम राजी- खुशी निपट गया। नव-विवाहित जोड़े को हार्दिक शुभकामनाएँ...।
तुहिना रंजन के 'हाइकुबहुत अच्छे लगे...बधाई...।
-प्रियंका गुप्ता, priyanka.gupta.knpr@gmail.com

बल्ले पर बस्तर की लोक चित्रकला

बल्ले पर बस्तर की लोक चित्रकला
खेम वैष्णव
आईपीएल मैच की टीम "दिल्ली डेयर डेविल्स" के लिए दिल्ली स्थित संस्था "आर्ट्स फॉर ऑल" ने देश के चुनिन्दा चित्रकारों से सम्पर्क किया और उन्हें अपनी कलाकृति से बल्लों को सजाने का अवसर प्रदान किया। इसी सन्दर्भ में कोंडागाँव निवासी और सुप्रसिद्ध लोक चित्रकार खेम वैष्णव से भी सम्पर्क किया गया। उनसे कह दिया गया कि वे बल्ले पर चित्रकारी के लिए स्वतन्त्र हैं। कोई दिशा-निर्देश नहीं दिया जाएगा। इससे खेम वैष्णव के कलाकार को बल मिला और उन्होंने 5.3 फीट तथा 1.5 फीट के दो बल्लों पर बस्तर की संस्कृति को लोकचित्र के माध्यम से उसकी समग्रता में उकेर दिया। उन्होंने इन बल्लों पर बस्तर की आदिवासी एवं लोक-संस्कृति को इस तरह रूपायित किया है कि वे बल्ले एक यादगार बन कर रह जाने वाले हैं। धार्मिक अनुष्ठान "जतरा" आदिवासी एवं लोक समुदाय के मन में प्रकृति एवं देवी-देवताओं के प्रति श्रद्धा एवं भक्ति का प्रतीक है। सूर्य-चन्द्र का अंकन उनकी शाश्वतता के प्रतीक हैं। इसी तरह "मोहरी" केवल एक वाद्य नहीं अपितु लोक जागरण का प्रतीक है। नृत्य और संगीत आदिवासी एवं लोक जीवन के आह्लादकारी क्षणों को प्रदर्शित करते हैं। वन्य-जीव, जन-जीवन, जीवन-चक्र और आदिवासी एवं लोक जीवन में महुआ वृक्ष की उपादेयता आदि का चित्रण इन बल्लों पर बखूबी किया गया है। चटख रंगों का प्रयोग इन बल्लों की एक अन्य
विशेषता है। उल्लेखनीय है कि श्री वैष्णव ने यह चित्रकला अपनी माता से सीखी और समय के साथ उसे परवान चढ़ाते ग। उनके लोकचित्रों की प्रदर्शनियाँ अब तक देश-विदेश के विभिन्न हिस्सों में हो चुकी हैं।