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Aug 26, 2010

विद्यालयों में शारीरिक दण्ड

विद्यालयों में शारीरिक दण्ड
- डॉ. राम प्रताप गुप्ता
इसी माह आंध्र प्रदेश के वारंगल जिले के जमंदला पल्ली गांव में एक प्राथमिक स्कूल के 11 बच्चों को शरारत करने पर उनकी प्रधानाचार्या ने जलती लकड़ी से जला दिया। इस तरह शिक्षकों द्वारा बच्चों को सजा के नाम पर शारीरिक दंड देने की खबरें जब- तब सामने आती रहती हैं। इस पर काबू पाने के लिए अब एक कानूनी मसौदा भी तैयार किया गया है। अब देखना यह होगा कि यह कानून बच्चों की कितनी सुरक्षा कर पाता है।
फरवरी माह में कोलकाता के एक स्कूल में प्राचार्य द्वारा एक छात्र को शारीरिक दण्ड दिए जाने पर उसके द्वारा आत्महत्या कर लेने के समाचार ने विद्यालयों में शारीरिक दण्ड पर प्रतिबंध की आवश्यकता को एक बार फिर सामयिक बना दिया है। कानूनी स्थिति जो भी हो, शासकीय और निजी, सभी विद्यालयों में शिक्षकों द्वारा अनुशासन के नाम पर छात्रों को शारीरिक रूप से प्रताडि़त किया जाना आम बात है।
महिला और बाल विकास विभाग द्वारा देश के 13 राज्यों के स्कूली बच्चों से पूछताछ करने पर 63 प्रतिशत छात्रों ने बताया कि उन्हें कभी न कभी प्राचार्य या शिक्षक द्वारा शारीरिक दण्ड दिया गया है। इनमें से 62 प्रतिशत दण्ड की घटनाएं शासकीय स्कूलों में और शेष 38 प्रतिशत निजी स्कूलों में हुई थीं। जब तक कोई गंभीर दुष्परिणाम न निकले, छात्र द्वारा अपेक्षित शैक्षणिक प्रगति न दिखाने या संस्था का अनुशासन तोडऩे पर शारीरिक दण्ड दिए जाने को पालकों की भी मौन सहमति है। कई बार तो विद्यालय से निरंतर शिकायतें मिलने पर परेशान पालक खुद भी अपने बच्चों को शारीरिक दण्ड देते हैं। ऐसे में स्कूल तथा घर, दोनों जगहों पर शारीरिक प्रताडऩा के चलते छात्र हमेशा के लिए स्कूल छोड़ देना ही उचित समझते हैं। पालक एवं अध्यापक अक्सर छात्रों को उद्दण्ड, अनुशासनहीन जैसे विशेषणों से विभूषित करते हैं जिसका उनके मस्तिष्क पर स्थाई दुष्प्रभाव पड़ता है।
कभी हमारे न्यायालय भी विद्यालय में अनुशासन बनाए रखने तथा विद्यार्थी की शैक्षणिक प्रगति के लिए शारीरिक दण्ड को उचित मानते थे। सन् 1964 में कोलकाता उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा था कि इंग्लैंड के कानूनों के अनुसार भी जब छात्र विद्यालय में होता है तो अध्यापक छात्र के पालक का स्थान ले लेता है और उसे पालक के अधिकार प्राप्त हो जाते हैं। छात्र को शारीरिक दण्ड देने का अधिकार भी उसे प्राप्त हो जाता है। इसी तर्क के आधार पर उसने छात्र को छड़ी से दण्डित करने पर निचले न्यायालय द्वारा अध्यापक को दिए गए दण्ड के फैसले को अनुचित माना था।
विगत वर्षों में न्यायालय के इस दृष्टिकोण में परिवर्तन आया है। अब न्यायालय का सोचना है कि शारीरिक दण्ड बच्चों के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है और यह बच्चों के अधिकारों का हनन है। बच्चों के अधिकार के संरक्षण हेतु बनाए गए आयोग ने हाल में घोषणा की है कि भारतीय दण्ड संहिता के उन प्रावधानों में संशोधन किया जाएगा जो बच्चों को शारीरिक दण्ड को उचित मानते हैं। 1 दिसम्बर 2000 को दिए गए एक निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि शारीरिक दण्ड भारतीय संविधान की धारा 14 (कानून के समक्ष समानता) और धारा 29 (जीवन एवं निजी स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन है। उसने राज्यों को निर्देश दिया था कि वे देखें कि शालाओं में बच्चों को शारीरिक दण्ड न दिया जाए और वे भयमुक्त एवं स्वतंत्र वातावरण में शिक्षा प्राप्त करें। परन्तु इस निर्णय के एक दशक बाद भी हमारे विद्यालयों में अनुशासन के नाम पर और समुचित अध्ययन करने की दिशा में बाध्य करने के लिए छात्रों को शारीरिक दण्ड दिया जाना आम बात है।
किशोर आयु में छात्र-छात्राओं में अनेक शारीरिक एवं मानसिक परिवर्तन आते हैं, परन्तु हमारे विद्यालय इन परिवर्तनों को न तो समझने में उनकी मदद करते है और न स्वयं समझने का प्रयास करते हैं। ऐसे में उनकी समस्याओं से उत्पन्न व्यवहार सम्बंधी परिवर्तनों को अनुशासनहीनता करार देकर उन्हें दण्डित करने का आसान तरीका अपना लेते हैं। अनुशासनहीनता के मामले में छात्रों को दण्डित करने के स्थान पर शिक्षकों को उनके भावना जगत में आ रही समस्याओं को समझने का प्रयास करना चाहिए। इसके लिए छात्रों एवं शिक्षकों के बीच खुले संवाद की स्थिति कायम की जानी चाहिए। शाला प्रशासन में भागीदारी देकर छात्रों को यह समझने का अवसर देना चाहिए कि व्यवस्था संचालन के लिए कोई नियम क्यों बनाया गया? उनकी भागीदारी के साथ ही यह तय भी किया जाना चाहिए कि किसी नियम के तोड़े जाने पर छात्र से कौन-कौन सी सुविधाएं छीनी जाएंगी।
शिक्षकों को किशोरावस्था में छात्रों में आ रहे शारीरिक एवं मानसिक परिवर्तनों की समझ के लिए विशेष प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। अगर ऐसी समझ विकसित हो सकी तो किसी छात्र द्वारा अनुशासन तोडऩे पर शिक्षक स्थिति को समझने का प्रयास करेगा। यह भी समझने का प्रयास करना चाहिए कि क्या छात्र उद्दंडता का व्यवहार कर छात्रों के बीच अपनी धाक जमाना चाहता है अथवा वह शिक्षक या स्कूल प्रशासन के किसी कदम से आहत है। अगर शिक्षकों में छात्रों की भावनाओं की समझ भी विकसित की जाती है तो कक्षा में ऐसा माहौल विकसित होगा जिसमें छात्र नया ज्ञान भी आसानी से ग्रहण कर सकेंगे।
शाला प्रमुखों को छात्रों की भावनाओं को समझने का प्रयास करना होगा। अनुशासन तोडऩे की प्रवृत्ति वाले छात्र को उद्दण्ड, जिद्दी, अनुशासनहीन, आलसी जैसे विशेषणों से संबोधित करने से उसके साथियों के बीच उसकी प्रतिष्ठा कम होती है और उसमें विद्रोह एवं प्रतिरोध की भावना जाग्रत होती है। बार-बार की शिकायतों से परेशान होकर माता-पिता भी उसे दोष देने लगते हैं। इससे उसके व्यवहार में सुधार की जगह बिगड़ाव आने लगता है। इसका दुष्परिणाम अंतत: स्वयं छात्र और उसके माता पिता को ही भुगतना पड़ता है। छात्र द्वारा किया जाने वाला असामान्य व्यवहार ही इस बात का प्रमाण है कि उसे मदद की जरूरत है।
समाज प्राय: किसी विद्यालय में प्रदत्त शिक्षा की श्रेष्ठता का आकलन उसके परीक्षा परिणामों से करता है। विद्यालय स्वयं भी पालकों, विद्यार्थियों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए इन्हीं परिणामों का प्रचार-प्रसार करते हैं। विद्यालय और पालक दोनों ही भूल जाते हैं कि शिक्षा का उद्देश्य छात्र की केवल शैक्षणिक क्षमता का विस्तार नहीं, बल्कि छात्र के व्यक्तित्व का समग्र विकास होता हैै। लेकिन आज के विद्यालय शिक्षा के इस उद्देश्य को भुलाकर ऐसे उपायों पर अपना ध्यान केन्द्रित करते हैं जिनसे परीक्षा परिणाम बेहतर हो सके। इस प्रक्रिया में छात्र का भावना पक्ष तो पूरी तरह उपेक्षित हो जाता है। शिक्षा में बच्चों का श्रेष्ठ परिणाम नहीं, उनमें भावनात्मक परिपक्वता विकसित करने का लक्ष्य लेकर चलना होगा, व्यक्तित्व का समग्र विकास भी तभी संभव होगा। जब कोई शिक्षक कक्षा में अनुशासन स्थापित करने के लिए छात्रों की भावनाओं का दमन करता है तो उसकी स्थिति एक आतंकवादी जैसी हो जाती है। हमारा संविधान हम सबको जीवन का अधिकार देता है, सम्मानपूर्वक जीवन का अधिकार इसमें निहित है। जब बच्चे को शारीरिक प्रताडऩा दी जाती है तो उसके संवैधानिक अधिकार का हनन होता है, यह तथ्य हमारी शैक्षणिक व्यवस्था को अच्छी तरह से आत्मसात् करना होगा।
कुल मिलाकर निष्कर्ष यही निकलता है कि शाला में अनुशासनहीनता अधिकांश मामलों में छात्रों की भावनाओं के दमन का परिणाम होती है। शाला के हर छात्र को अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के समुचित अवसर मिलना ही चाहिए। इसकी बजाय जब उसे किसी व्यवहार के लिए शारीरिक दण्ड दिया जाता है तो उसे भारी आघात पहुंचता है और वह आत्महत्या जैसा चरम कदम भी उठा सकता है। अगर स्कूल प्रशासन छात्रों की भावनाओं को समुचित दिशा देने में सफल होता है तो उसे तमाम तरह के प्रतिकूल परिणामों वाले शारीरिक दण्ड देने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। अगर किसी शाला में छात्रों को अनुशासित करने के लिए शारीरिक दण्ड दिया जाता है तो आवश्यकता छात्र के व्यवहार में सुधार की नहीं बल्कि शाला की प्रशासन प्रणाली और सोच में सुधार की है। (स्रोत फीचर्स)
स्कूल में पिटाई रोकने के लिए नए निर्देश जल्द
मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल के अनुसार स्कूलों में शारीरिक दंड पर लगाम लगाने के लिए सख्त दिशा निर्देश जारी किए जाएंगे। इस बारे में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) को स्कूलों में शारीरिक दंड से निजात के लिए सख्त दिशानिर्देश तैयार करने और जारी करने को कहा गया है। सरकार की यह पहल कोलकाता की घटना के मद्देनजर आई है जिसमें 13 साल के एक स्टूडेंट ने बेंत से प्रिंसिपल द्वारा पिटायी खाने के बाद कथित तौर पर आत्महत्या कर ली थी।
सिब्बल के अनुसार बच्चे हमारे लिए बेशकीमती हैं। किसी छात्र को परेशान नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि इससे वह हतोत्साहित होते हैं और व्यवस्था से अलग-थलग पड़ जाते हैं। उन्होंने कहा कि नए शिक्षा के अधिकार कानून में शारीरिक दंड पर रोक लगाई गई है।
एनसीपीसीआर आईपीसी में बदलाव की मांग पर भी विचार कर रही है ताकि सजा देने वाला कोई भी शख्स कानून के कुछ प्रावधानों के तहत बच न सके। एनसीपीसीआर का मानना है कि आईपीसी की धारा 88 और 89 बच्चों को शारीरिक दंड देने के मामले में टीचर और अभिभावक का बचाव करती है।
इन दो धाराओं के मुताबिक अगर 12 साल से छोटे बच्चे के फायदे के लिए अच्छी सोच से कुछ किया जाता है तो इसे अपराध नहीं माना जा सकता। आयोग अब इस मुद्दे को देखेगा और सरकार से सिफारिश करेगा। शारीरिक दंड रोकने के लिए एनसीपीसीआर ने 2007 में दिशा निर्देश जारी किए थे पर वे नियम इस समस्या को रोकने के लिहाज से नाकाफी थे।
अब गुरुजी की खैर नहीं
स्कूलों में शिक्षकों के अत्याचार से छात्रों को बचाने के लिए अब शिकायत बॉक्स लगाए जाएंगे। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के फरमान पर अमल करते हुए दिल्ली शिक्षा निदेशालय ने सभी स्कूलों को आदेश दिया है कि वह अपने यहां शिकायत बॉक्स लगाएं, जिनकी मदद से छात्र अपनी शिकायत बिना किसी डर के कर सकें। शिक्षा निदेशालय ने अपने आदेश में साफ कर दिया है कि इस सुविधा के तहत छात्र को अपनी पहचान सार्वजनिक करने की कोई जरूरत नहीं होगी यानी अब अत्याचारी गुरुजी की खैर नहीं है।
स्कूल में मेरी भी होती थी पिटाई
लेकिन अब मैं इसके खिलाफ हूं
- अमिताभ
स्कूलों में बच्चों को शारीरिक दंड दिए जाने पर इन दिनों मीडिया में उपजी बहस के बीच अमिताभ बच्चन ने इस बात का खुलासा अपने ब्लॉग में किया है कि स्कूल में बाकी बच्चों की तरह उनकी भी खूब पिटाई होती थी, लेकिन बड़े 'सभ्य और शालीन' तरीके से। हालांकि अमिताभ ने इस बात को स्वीकार किया है कि उस समय ऐसा दंड अनुशासन सिखाने और नियम-कानून के प्रति सम्मान व्यक्त करने के प्रशिक्षण के रूप में दिया जाता था और आज की परिस्थितियां उस समय की तुलना में पूरी तरह बदल चुकी हैं।
मैंने नैनीताल के शेरवुड में बोर्डिंग में रह कर पढ़ाई की है और मुझे ये स्वीकार करना पड़ेगा कि वहां पिटाई एक नियमित क्रिया थी। ऐसा कोई साल नहीं गया, जब हमारे प्राचार्य रेवरेंट आरसी लेवेलिन ने हमारी पीठ पर टेनिस खेलने वाले अपने हाथों का उपयोग न किया हो। हमारे अपराध कई तरह के होते थे, लंच ब्रेक के दौरान पहाड़ी के पास के एक पिकनिक स्पॉट पर जाना, डोरोथी सीट पर पहुंच जाना, पास के स्कूल ऑल सेंट्स की लड़कियों को देखना, चुइंगम चबाना या रात को लाइट बंद होने के बाद बिलियर्ड्स खेलना। ऐसे सभी काम, जिनमें उस उम्र के बच्चे शामिल होते हैं और बाद में सजा पाते हैं।
रेवरेंट लेवेलिन हमारी सजा की घोषणा बहुत ही शालीन तरीके से ऐसे करते थे, 'मैं आपको चार बेंत मारने जा रहा हूं मिस्टर बच्चन। क्या आप दूसरे कमरे में आएंगे? दूसरे कमरे में सजा का उपकरण चुना जाता था और आपको अहसास हो जाता था कि आपका 'अंत' नजदीक आ गया है। उसके बाद आपसे पूछा जाता था 'क्या आप तैयार हैं मिस्टर बच्चन?' जिसके जवाब में मासूम और अनसुनी-सी आवाज निकलती थी 'यस सर'। जिसके फौरन बाद एक ऐसी तेज झन्नाटेदार आवाज आती थी, जिसके बाद आपको कुछ और सुनाई नहीं देता था। इसके बाद बस, ऑपरेशन खत्म। आपको पीछे मुड़कर जाना होता था और इस दौरान एक बार भी अपनी पीठ को सहलाने की भी इजाजत नहीं होती थी। आपको कहना होता था 'थैंक यू सर', अगर आप ऐसा नहीं कहते तो आपको बड़ी नजाकत से याद दिलाया जाता था कि आपको ऐसा कहना है।
तो आपने देखा, जो कुछ भी होता था, बहुत ही सभ्य और अनुशासित तरीके से होता था। किसी पाठ की तरह ये एक सीख होती थी, जो हमें नियमों का पालन करना सिखाती थी। उन्होंने लिखा है 'लेकिन, वह 1956 था, अब 2010 है। अगर अब अभिषेक, श्वेता, अगस्त्य या नव्य-नवेली से कोई तेजी से बोल भी लें, तो इससे हमें गुस्सा आ जाता है। समय और परिस्थितियां दोनों बदल गई हैं और अब मैं स्कूलों में शारीरिक दंड के पूरी तरह खिलाफ हूं।

कौन ये तूफान रोके

कौन ये तूफान रोके
-हरिवंश राय बच्चन

हिल उठे जिनसे समुन्दर...
हिल उठे दिशी और अम्बर...
हिल उठे जिस्से घर के...
वन सघन कर सब्द हर हर...

उस बवंडर के झकोरे
किस तरह इंसान रोके
कौन यह तूफान रोके...

उठ गया लो पांव मेरा
छुट गया लो ठांव मेरा
अलविदा ऐ साथ वालों
और मेरा पंथ डेरा...

तुम न चाहो मैं न चाहूं
कौन भाग्य विधान रोके
कौन ये तूफान रोके...







Aug 25, 2010

डा. महेशचंद्र शर्मा 'शिरा'

आकाश को पक्षियों की उड़ान में समेटता चित्रकार
- डॉ. सुनीता वर्मा
अमूर्त चित्रों में रंगो का करिश्मा करते चित्रकार डॉ. महेशचंद्र शर्मा 'शिरा' कला समीक्षक, कला विशेषज्ञ के रुप में एक राष्ट्रीय शख्सियत हैं। वे इन दिनों इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ के 'दृश्य कला संकाय के प्रोफेसर तथा चित्रकला विभाग के अध्यक्ष के रूप में कायर्रत हैं।
संगीत और कला को समर्पित इस विश्वविद्यालय का शिक्षण वातावरण आज भी गुरू शिष्य परंपरा से स्पंदित है। इस परंपरा ने खैरागढ़ की चित्रकला संभावनाओं को आत्मविश्वास से भरपूर विकास और ऊंचाइयां प्रदान की है। 'शिरा' समकालीन कला के समुचित विकास के लिए देश प्रदेश में कला का वातावरण बनाने के लिए पिछले ढाई दशक से सक्रिय हैं। उनका प्रयास अब छत्तीसगढ़ में ललित कला अकादमी की स्थापना करना है। उन्होनें देश भर में सक्रियता से कार्य करते अनेक कलाकारों की फौज खड़ी की है जो विभिन्न प्रदेशों में फैले हैं।
छत्तीसगढ़ का गौरव, देश का एकमात्र कला एवं संगीत विश्वविद्यालय शान्त, खामोश इलाका है। प्रकृति वहां चारो ओर मुखर है निष्कपट, नि:श्पाप, सात्विक। इस परिसर में प्रवेश करते ही स्वर लहरियां, नृत्य रत नृत्यांगना के नुपुरों की छम-छम, इजल पर कैनवास रंगों में लीन अभ्यास करता कोई विद्यार्थी चुपचाप किसी कोने में दिख जायेगा। इसी परिसर में जब शिरा के निवास में प्रवेश करते हैं तो बैठक की दीवारों पर 10 से 15 पेन्टिग लगी हुई मिल जाएंगी। जहां गुरू को घेरे हुए 5-6 चित्रकला छात्र और शोधार्थी मिल जाएंगे। शिरा की पत्नी डा. मंजुशर्मा रसोई में या तो चाय बनाती मिलेंगी या खाना खिलाने की व्यवस्था में व्यस्त। शिरा दम्पति बाहर से आये पढऩे वाले छात्र- छात्राओं के संरक्षक या धर्म माता-पिता की तरह उनकी व्यक्तिगत असुविधाओं को सुलझाने तक के काम में लगे होते हैं। विश्वविद्यालय की कार्यालयीन अनेक जिम्मेदारियां तो होती ही हैं। इन सारी गतिविधियों के बीच वे चित्र बना रहे हैं और प्रदशर्नियां भी।
सृष्टि के पंच तत्व में आकाश, अग्नि, जल, पृथ्वी पर पेड़, पौधे, फूल, पक्षी पहाड़ आदि को अपने कैनवास पर विषय वस्तु के रूप में प्रस्तुत करते समय 'शिरा' मानव तथा प्रकृति की आंतरिक एकात्मकता के जीवन दर्शन को उद्घाटित करते हैं।
खैरागढ़ में उनके निवास की किसी भी खिड़की से दिखते अनंत पेड़ों के समूह पहाड़ी पर मंदिर, मंदिर की मुंडेर पर लहराती लाल सफेद पताकाओं ने उनके अंन्तमर्न को बहुत गहराई से प्रभावित किया है। साथ ही लोककला, पुरातत्व आदि ने उनकी कला समझ और दृष्टि पर पर्याप्त प्रभाव डाला है।
प्रसिद्ध चित्रकार मुश्ताक ने शिरा के चित्रों पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि 'शिरा के चित्रों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी रंगों का तीव्र संवेदन और समझ है। वे रंगों का पड़ोस इस तरह चुनते हैं कि उन रंगों के विरोधी स्वभाव उनके आपसी अन्र्तद्वंद्व को उजागर करते हुए भी एक दूसरे को समृद्ध करते हैं।
जल रंग हो या तैल रंग या एक्रेलिक रंग या अन्य कोई भी माध्यम हो, वे हमेशा ही नई संभावनाओं को तलाशते नजर आते हैं। इस तलाश में वे अपनी बनी हुई शैली के वजूद को बरकरार रखते हुए आगे बढ़ते हैं।
रंगों के बारे में स्वयं 'शिरा' का कहना है- 'मेरे चित्रों में रंगों को लाल, पीला, नीला कह देने से बात नहीं बनती। रंग सीधे आत्मा से जुड़ते हैं। चित्रों में ताजे रंगों को पूरी आजादी से स्वच्छ रूप से घूमते टहलते दौड़ते और एक दूसरे से मिलते हुए भी देख सकते हैं। यह मिलना सिर्फ रंगों का मिलना भर नहीं है बल्कि दो इंसानों की तरह मिलना है। यह मिलना हमारे जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है। नई सृष्टि के लिए भी और लगातार बढ़ती हुई दूरियों को कम करने के लिये भी। '
'शिरा' के काम की दूसरी विशेषता टैक्सचर है। इन चित्रों को जब आंखे छू रही होती हैं तो स्पर्श सुख के लिये हाथ स्वाभाविक रूप से कैनवास को छूने के लिए मचलने लगते हैं। ये टैक्सचर बचपन की उस स्मृति को भी ताजा करते हैं जब मैं धूल भरी धरती पर उंगलियों या काड़ी से खुरच कर चित्र बनाया करती थी। इन टैक्सचर को उत्पन्न करने के लिये वे कागज या कैनवास की सतह पर मोटा इम्पेस्टो करते हैं, उसके बाद रंगों को फैलाकर, फाड़कर, पोंछकर और कभी-कभी ब्लेड से घिस कर अनेक प्रभावों से अपना संसार सिरजते हैं।
उनके कैनवास पर एक और महत्वपूर्ण तत्व है 'ब्रश के स्ट्रोक्स'। कैनवास पर सफेद लयात्मक, गतिमान, प्रवाहपूर्ण शक्तिशाली स्ट्रोक्स को देखकर ऐसा लगता है जैसे ब्रश का खेल किसी सूफी नृत्य, गीत की लय में होता है, शांत, मौन,मध्यम, आध्यात्मिक ध्यान में लीन, जहां यात्रा पर निकली आंखे कुछ देर आराम करती हैं। कहीं ये उत्तेजना से भरे हैं कहीं ओजपूर्ण हैं कहीं बेचैनी को भी अभिव्यक्त करते हैं। इन कैनवास के साथ घंटों रहा जा सकता है। यह हर एक दर्शक की कल्पनाओं के लिये स्पेस और बिम्ब की रचना करती है। ये अमूर्त चित्र उस बीज जैसा है जिसमें से जीवन प्रस्फुटित, पल्लवित, पुष्पित होता है। यह विशाल वृक्ष बनने की प्रक्रिया में है उसमें से नया बीज फिर बनेगा।
'शिरा' के चित्रों को देखें तो पिन्सेन्ट वानगांग की यह उक्ति बरबस याद आ जाती है- 'चित्रकार का काम जीवन के उस परिदृश्य की रचना करना है जिसे देखा जाना चाहिये। लेकिन लोग उसे नहीं जानते।'
शिरा के अनेक चित्र आकाश में बने दिखाई देते हैं। उनपर रूपाकार आकाश से धरती की ओर बढ़ते मालूम पड़ते हैं। कहीं आकाश और पानी मिलते हैं, कहीं धरती और आकाश तो कहीं धरती आकाश पानी, फूल, मंदिर, चिडिय़ा, पहाड़ सब। सिक्किम में बर्फ के पर्वत, चंगू लेक, स्वच्छ पवित्र आकाश के बीच बिताया समय शिरा के चित्र में दिखाई देते हंै।
शिरा ने विश्व प्रसिद्ध चित्रकार जगदीश स्वामीनाथन के चित्रांकन एवं जीवन पर शोध प्रबंध लिखा है। लगता है स्वामीनाथन की चिडिय़ा से शिरा को भी लगाव हो गया है। शिरा की चिडिय़ा स्थिर नहीं है वे उडऩा चाहती है, शांति के प्रतीक के रूप में, जैसे वे विश्व को तनावमुक्त करने को आतुर हैं। धरती पर रहने वालों के लिए दूर आकाश रहस्यमयी लगता है। शिरा के पक्षी इसी रहस्य की पड़ताल करते समूचे आकाश को गतिशील दुनिया में बदलकर रख देते हैं।
साढ़े तीन दशक की कला यात्रा तय कर चुके शिरा के अमूर्त चित्रों पर एक स्थूल दृष्टि डालने पर लगता है चित्र में लाल- पीला हरा नीला भूरा सफेद रंग किसी ने यूं ही फैला दिया हो। यह फैलाना पूरी सजगता और संयम से की गई है। यह स्वछंदता मन को ज्यादा भाती है क्योंकि यह प्रकृति के बेहद नजदीक लगती है। लगता है प्रकृति में यत्र- तत्र मिट्टी में उगे ये पौधे सावन की फुहार पड़ते ही पूरी पृथ्वी को अपने सुन्दर आंचल में छुपा लेगी। ये रंग कोरे कैनवास को श्रृंगार से भर देते हैं। 'शिरा' के अमूर्त चित्र मन की फैन्टेसी के अनेक द्वार खोलते हैं।'
'शिरा के अमूर्त चित्रों में प्रकृति जैसे साक्षात उतर आई है। गर्मी की उमस से राहत देते उनके चित्र में पहाड़, पेड़- पौधे, फूल, पक्षी आधार हैं किन्तु यह मात्र फूल- पौधों का चित्र नहीं है इसमें फूल की कोमलता है, फूल का रंग है, फूल जैसी पवित्रता है, फूल की शीतलता है।'
प्रसिद्ध कला समीक्षक श्री मनमोहन सरल द्वारा जहांगीर आर्ट गैलरी बंबई में उनकी छठी एकल प्रदशर्नी के अवसर पर की गई उक्त टिप्पणी आज भी प्रासंगिक है।
उनके एक चित्र में घास पर खिले फूलों को देखकर जोश की पंक्तियां बरबस आ जाती हैं -
'गूचें तेरी किस्मत पे दिल हिलता है
बस एक तबस्सुम के लिये तू खिलता है
गूचें ने हंसकर कहा बाबा, ये तबस्सुम भी किसे मिलता है।'
उपरोक्त जीवन दर्शन को घास में खिले फूल के द्वारा अपनी ऊर्जा और प्यार डालकर 'शिरा' ने लंबा जीवन दे दिया।
पता: क्वा।नं. 8/सी, सड़क- 76, सेक्टर- 6, भिलाईजिला- दुर्ग (छ.ग.) 490006
मोबाइल: 09827934904, फोन: 0788-2223512
परिचय...
15 जुलाई सन् 1955 को शहवाजपुर उत्तरप्रदेश में जन्में महेशचंद्र शर्मा 'शिरा' की कलात्मक अभिरूचि को लखीमपुर के कला अध्यापक ब्रजमोहन लाल वर्मा ने प्रोत्साहन दिया, उन्होंने इस क्षेत्र में आगे बढऩे का रास्ता भी बताया। उनके कहने पर शिरा ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से पांच वर्षीय बी.एफ.ए. की उपाधि प्राप्त की और फिर एम.एफ.ए. भी बीएचयू. से किया। पी.एच.डी. उन्होंने इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ से किया। उन्हें उत्तरप्रदेश सरकार की छात्रवृत्ति मिलने के साथ, उत्तरप्रदेश राज्य कला प्रदर्शनी, मध्य प्रदेश राज्य कला प्रदर्शनी, कालीदास अकादमी उज्जैन का राष्ट्रीय पुरस्कार तथा अखिल भारतीय कला प्रदशर्नी महाकोशल कला परिषद, रायपुर आदि से भी अनेक पुरस्कार मिले हैं।
डा. महेशचंद्र शर्मा की एक चित्र प्रदशर्नी 13 से 19 मई 2010 को जहांगीर आर्ट गैलरी मुम्बई में लगाई गई थी। उन्होंने देश के विभिन्न महानगारों में 16 एकल प्रदर्शनियां की हैं जिनमें से 8 प्रदर्शनी मुंबई में ही लगाई गई। उनके चित्र देश विदेश के अनेक महत्वपूर्ण संग्रहालयों की शोभा बढ़ा रहे हैं। उन्होंने अनेक नेशनल पेन्टर्स केम्प में भागीदारी की है। कला विषय पर उनके कई लेख प्रकाशित हुए हैं। उन्होंने अनेक राष्ट्रीय संगोष्ठियों में शोध पत्र का पाठन एवं महत्वपूर्ण वक्ता के रूप में कला पर व्याख्यान दिये हैं। चित्रकारों पर लिखे उनके लेखों में यामिनी राय, अमृता शेरगिल, के.के. हेब्बार, एस.एच. रजा तथा जगदीश स्वामीनाथन प्रमुख हैं।

हिन्दी गजल को भारतीय काव्य की मुख्य धारा बनाने का जज्बा

- रामेश्वर वैष्णव
अब महत्वाकांक्षा का अर्थ शायद है यही लोग अपने मन में हाहाकर लेकर आ गए
तमाम विरोधों विसंगतियों एवं विद्रूपताओं के हिन्दी गजल ने जन मानस में अपना स्थान बनाने में सफलता पाई है। छंद विरोधी मानसिकता ने हिन्दी गजल को रिजेक्ट करने की हर संभव कोशिश की मगर अपनी सहज संप्रेषणीयता, लघुशिल्प में विराट अभिव्यक्ति की क्षमता एवं नई कविता के तेवर से लैस होने की सजगता ने हिन्दी गजल को युगीन काव्य की मुख्य धारा के आस-पास ला खड़ा किया है। जहीर कुरेशी इसी धारा के भागीरथी हैं। दुष्यंत कुमार के बाद जिन गजलकारों ने हिंदी गजल को सहज सरल स्वरूप प्रदान करने में कामयाबी पाई उनमें विनोद तिवारी, जहीर कुरेशी, अशोक अंजूम आदि का नाम अग्रणी है। 'पेड़ तनकर भी नहीं टूटा' जहीर कुरेशी की एक सौ एक गजलों का छठवां और ताजा संकलन है। हिन्दी जैसी स्वाभिमानी भाषा को गजल के शिल्प में ढालना कोई सहज कार्य नहीं था मगर अपनी 45 वर्षों की साधना से हिन्दी सोच, हिन्दी कहन एवं हिन्दी मुहावरों को दिशा देने में कुरेशी जी की अथक मेहनत स्पष्ट झलकती है।
ऐसे मोती करोड़ों में हैं
जो समंदर से निकले नहीं।
'स्वागतम' से भी अधिक
मूल्य होता है मुस्कान का।
युगीन सच्चाइयों को अभिव्यक्ति देने में जहां व्यंग्य ही कारगर है वहीं गजलों में विसंगतियों को स्वर देने का कुरेशी जी का तरीका अलग है।
घर लौटते ही, सीधा गया संगिनी के पास
मां और बूढ़े बाप से बेटा नहीं मिला।
खुशी मुख पर प्रवासी दिख रही है,
हंसी में भी उदासी दिख रही है।
इसी तरह आधुनिक जीवन की जटिलताओं को अभिव्यक्त देने में छंदों को रोड़ा समझने वाले शायद ऐसे शेरों से रूबरू नहीं हो पाए हैं।
कभी वो मन मुताबिक बह न पाए
जो जल की तेज धाराओं में उलझे।
प्रवेश रात में किसको दिया था माली ने।
बलात् झेल चुकीं क्यारियां बताती हैं,
हिन्दी गजल को नई कविता के तेवर देने में जहीर भाई पीछे नहीं रहे -
वो अब रहते हैं सीली कोठरी में
हैं वंचित घर के उत्सव से पिता जी।
उन्हें कविता में बौनी वेदना को
कुतुब मीनार करना आ गया है।
सूर्य की कोशिशें हुई नाकाम
हिम के पर्वत पिघल नहीं पाए।
कुरेशी जी का यह कहना कि 'मुझे लगता है अभी बहुत कुछ कहा जाना शेष है' उनकी चूकने तथा संभावनाओं की निस्सीमता का प्रतीक है। सजग और सही रचनाकार की यही पहचान है। हर भाषा की अपनी प्रकृति होती है और कोई भी शिल्प वह अपने अनुसार चयन करे तो उसमें ज्यादा निखार आता है।
जहीर कुरेशी अपने शेरों में अंग्रेजी शब्द का प्रयोग भी करते हैं। कुछ लोगों को यह नागवार गुजर सकता है परंतु यह भी तय है उसका विकल्प वे नहीं सुझा सकते। बहरहाल हिन्दी गजल की शानदार यात्रा जारी है और इसमें बहुत सारे सहयात्री अपनी तान छेड़ते हुए शामिल है।
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अनारकली

अनारकली
- सआदत हसन मंटो
नाम उसका सलीम था। मगर उसके यार-दोस्त उसे शहजादा सलीम कहते थे। शायद इसलिए कि उसका चेहरा मोहरा मुगलई था, खूबसूरत था। चाल ढाल से रईसी टपकती थी।
उसका बाप पीडब्लयूडी के दफ्तर में नौकर था। तनख्वाह ज्यादा से ज्यादा सौ रुपए होगी, मगर बड़े ठाठ से रहता था। जाहिर है कि रिश्वत खाता था। यही वजह है कि सलीम अच्छे से अच्छा कपड़ा पहनता। जेब-खर्च भी उसको काफी मिलता था, इसलिए कि वह अपने माता- पिता का इकलौता बेटा था।
वह बहुत बन-ठनकर रहता। उसके पास कई सूट, कई कमीजें थीं, जो वह बदल- बदल कर पहनता। शू कम से कम 20 के करीब होंगे।
जब कालेज में था तो कई लड़कियां उस पर जान छिड़कती थीं, मगर वह उनके प्रति बेपरवाह रहता। आखिर उसकी आंख एक शोख-चंचल लड़की से, जिसका नाम सीमा था, लड़ गई। सलीम ने उससे दोस्ती पैदा करनी चाही। उसे यकीन था कि वह उसकी दोस्ती हासिल कर लेगा। नहीं, वह तो यहां तक समझता था कि सीमा उसके कदमों में गिर पड़ेगी और उसकी एहसानमंद और शुक्रगुजार होगी कि उसने मुहब्बत की निगाहों से उसे देखा।
एक दिन कालेज में सलीम ने सीमा से पहली बार संबोधित करते हुए कहा, 'आप किताबों का इतना बोझ उठाए हुए हैं- लाइए, मुझे दे दीजिए। मेरा तांगा बाहर मौजूद है। आपको और इस बोझ को आपके घर तक पहुंचा दूंगा।'
सीमा ने अपनी भारी भरकम किताबें बगल में दबाए हुए बड़े खुश्क लहजे में जवाब दिया, 'आपकी मदद की मुझे कोई जरूरत नहीं, फिर भी शुक्रिया अदा किए देती हूं।'
शाहजादा सलीम को अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा सदमा पहुंचा। कुछ लम्हों के लिए वह अपनी झेंप मिटाता रहा। इसके बाद उसने सीमा से कहा, 'औरत को मर्द के सहारे की जरूरत होती है। मुझे हैरत है कि आपने मेरी पेशकश को क्यों ठुकरा दिया?'
सीमा का लहजा और ज्यादा खुश्क हो गया, 'औरतों को मर्द के सहारे की जरूरत होगी,मगर फिलहाल मुझे ऐसी कोई जरूरत महसूस नहीं होती। आपकी पेशकश का शुक्रिया मैं अदा कर चुकी हूं, इससे ज्यादा आप और क्या चाहते हैं?'
यह कहकर सीमा चली गई। शहजादा सलीम जो अनारकली के ख्वाब देख रहा था, आंखें झपकता रह गया। उसने बहुत बुरी तरह शिकस्त खाई थी।
इससे पहले उसकी जिंदगी में कई लड़कियां आ चुकी थीं जो उसकी आंख के इशारे पर चलती थीं, मगर यह सीमा क्या समझती है अपने को। इसमें कोई शक नहीं कि खूबसूरत है। जितनी लड़कियां मैंने अब तक देखी है, उनमें सबसे ज्यादा हसीन है। मगर मुझे ठुकरा देना- यह बहुत बड़ी ज्यादती है। मैं जरूर उससे बदला लूंगा- चाहे, कुछ भी हो जाए।
शाहजादा सलीम ने उससे बदला लेने की कई स्कीमें बनाई, मगर कामयाब साबित न हुई। उसने यहां तक सोचा कि उसकी नाक काट डाले। वह यह जुर्म कर बैठता, मगर उसे सीमा के चेहरे पर यह नाक बहुत पसंद थी। कोई बड़े से बड़ा चित्रकार भी ऐसी नाक की कल्पना नहीं कर सकता था।
सलीम तो अपने इरादों में कामयाब न हुआ, मगर तकदीर ने उसकी मदद की। उसकी मां ने उसके लिए रिश्ता ढूंढना शुरु किया। चुनाव की निगाह आखिर सीमा पर पड़ी जो उसकी सहेली की सहेली की लड़की थी।
बात पक्की हो गई, मगर सलीम ने इंकार कर दिया। इस पर उसके माता-पिता बहुत नाराज हुए। घर में दस-बारह दिन तक हंगामा मचा रहा। सलीम के वालिद जरा सख्त तबीयत के थे। उन्होंने उससे कहा, 'देखो, तुम्हें हमारा फैसला कबूल करना होगा।'
शाहजादा सलीम को अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा सदमा पहुंचा। कुछ लम्हों के लिए वह अपनी झेंप मिटाता रहा। इसके बाद उसने सीमा से कहा, 'औरत को मर्द के सहारे की जरूरत होती है। मुझे हैरत है कि आपने मेरी पेशकश को क्यों ठुकरा दिया?'
सलीम हठधर्मी था। जवाब में यह कहा, 'आपका फैसला कोई हाईकोर्ट का फैसला नहीं, फिर मैंने क्या जुर्म किया है जिसका आप फैसला सुना रहे हैं।'
उसके वालिद को यह सुनकर तैश आ गया, 'तुम्हारा यह जुर्म है कि तुम नाफरमाबरदार हो- अपने माता-पिता का कहना नहीं मानते। हुक्म-उदूली करते हो। मैं तुम्हें जायदाद से अलग कर दूंगा।'
सलीम का जोश थोड़ा-सा ठंडा हो गया, लेकिन अब्बाजान, शादी मेरी मर्जी के मुताबिक तो होनी चाहिए।
'बताओ, तुम्हारी मर्जी क्या है?'
'अगर आप ठंडे दिल से सुनें तो अर्ज करूं?'
'मेरा दिल काफी ठंडा है। तुम्हें जो कुछ कहना है, फौरन कह डालो। मैं ज्यादा देर इंतजार नहीं कर सकता।'
सलीम ने रूक-रूक कर कहा, 'मुझे-मुझे एक लड़की से मुहब्बत है।'
उसका बाप गरजा, 'किस लड़की से?'
सलीम थोड़ी देर हिचकिचाया, 'एक लड़की है।'
'कौन है वह? क्या नाम है, उसका?'
'सीमा- मेरे साथ कालेज में पढ़ती थी।'
'मियां इफ्तखाररुद्दीन की लड़की?'
'जी, हां। उसका नाम सीमा इफ्तखार है- मेरा ख्याल है, वही है।'
उसके वालिद बेतहाशा हंसने लगे, 'ख्याल के बच्चे- तुम्हारी शादी उसी लड़की से तय हुई क्या वह तुम्हें पसंद करती है?'
सलीम बौखला-सा गया। यह सिलसिला कैसे हो गया, उसकी समझ में नहीं आता था। कहीं उसका बाप झूठ तो नहीं बोल रहा था? सलीम से सवाल किया पूछा, सलीम, मुझे बताओं, क्या सीमा तुम्हें पसंद करती है?
सलीम ने कहा, 'जी नहीं।'
'तुमने यह कैसे जाना?'
'उससे- उससे एक बार मैंने थोड़े से शब्दों में मुहब्बत का इजहार किया, लेकिन उसने मुझे...'
'तुम्हें भरोसेमंद न समझा।'
'जी, हां-बड़ी बेरुखी बरती।'
सलीम के पिता ने अपने गंजे सिर को थोड़ी देर के लिए खुजलाया और कहा, 'तो फिर यह रिश्ता नहीं होना चाहिए। मैं तुम्हारी मां से कहता हूं कि वह लड़की वालों से कह दे कि लड़का रजामंद नहीं।' सलीम एकदम भावुक हो गया, 'नहीं, अब्बाजान- ऐसा न कीजिएगा। शादी हो जाए तो सब ठीक हो जाएगा। मैं उससे मुहब्बत करता हूं, और किसी की मुहब्बत बेकार नहीं जाती। लेकिन आप उन लोगों को- मेरा मतलब है सीमा को यह पता न लगने दें कि उसका ब्याह मुझसे हो रहा है, जिसके प्रति वह बेरूखी और लापरवाही प्रगट कर चुकी है।'
उसके बाप ने अपने गंजे सिर पर हाथ फेरा, 'मैं इसके बारे में सोचूंगा।' यह कहकर वह चले गए कि उन्हें एक ठेकेदार से रिश्वत वसूल करनी थी, अपने बेटे की शादी के खर्चों के सिलसिले में।
शहजादा सलीम जब रात को पलंग पर सोने के लिए लेटा तो उसे अनार की कलियां ही कलियां नजर आई। सारी रात वह इनके ख्वाब देखता रहा।
घोड़े पर सवार बाग में आया है- शाहाना लिबास पहने। घोड़े से उतरकर बाग की एक रविश पर जा रहा है। क्या देखता है कि सीमा अनार के बूटे की सबसे ऊंची शाख से एक नई कली तोडऩे की कोशिश कर रही है। उसकी भारी-भरकम किताबें जमीन पर बिखरी पड़ी हैं। जुल्फें उलझीं हुई हैं और यह उचक-उचककर उस शाख तक अपना हाथ पहुंचाने की कोशिश कर रही है। मगर हर बार नाकाम रहती है।
वह उसकी तरफ बढ़ा। अनार की झाड़ी के पीछे छुपकर उसने उस शाख को पकड़ा और झुका दिया। सीमा ने वह कली तोड़ ली जिसके लिए वह इतनी कोशिश कर रही थी, लेकिन फौरन उसे इस बात का अहसास हुआ कि वह शाख कैसे झुक गई।
वह अभी यह सोच ही रही थी कि शहजादा सलीम उसके पास पहुंच गया। सीमा घबरा गई। लेकिन संभलकर उसने अपनी किताबें उठाई और बगल में दबा लीं। अनारकली अपने जुड़े में खोंस ली और ये खुश्क शब्द कहकर वहां से चली गई, 'आपकी इमदाद की मुझे कोई जरूरत नहीं थी, बहरहाल शुक्रिया अदा किए देती हूं।'
तमाम रात वह इसी किस्म के ख्वाब देखता रहा- सीमा, उसकी भारी भरकम किताबें, अनार की कलियां और शादी की धूमधाम।
शादी हो गई। शहजादा सलीम को इस अवसर पर अपनी अनारकली की एक झलक भी नहीं दिख पाई थी। वह उस लम्हे के लिए तड़प रहा था जब सीमा उसके आगोश में होगी। वह उससे इतना प्यार करेगा कि वह तंग आकर रोना शुरु कर देगी।
सलीम को रोने वाली लड़कियां बहुत पसंद थी। उसका यह फलसफा था कि औरत जब रो रही हो तो बहुुत हसीन हो जाती है। उसके आंसू शबनम के कतरों की तरह होते हैं, जो मर्द की भावनाओं के फूलों पर टपकती हैं तो उनसे उसे ऐसी राहत, ऐसा संतोष मिलता है जो और किसी वक्त नसीब नहीं हो सकता।
रात के दस बजे दुल्हन को सुहागरात के कमरे में दाखिल कर दिया गया। सलीम को भी इजाजत मिल गई कि वह उस कमरे में जा सकता है। लड़कियों की छेड़छाड़ और रीति-रिवाज सब खत्म हो गए तो वह कमरे के अंदर दाखिल हुआ।
फूलों से सजी हुई सेज पर दुल्हन घूंघट काढ़े रेशम की गठरी-सी बनी बैठी थी। शहजादा सलीम ने खास इंतजाम किया था कि फूल अनार की कलियां हों। वह धड़कते हुए दिल के साथ सेज की तरफ बढ़ा और दुल्हन के पास बैठ गया।
काफी देर तक वह अपनी बीवी से कोई बात न कर सका। उसको ऐसा महसूस होता था कि उसकी बगल में किताबें होंगी जिनको वह उठाने नहीं देगी। आखिर उसने बड़ी हिम्मत से काम लिया और उससे कहा, 'सीमा....'
यह नाम लेते ही उसकी जबान खुश्क हो गई। लेकिन उसने फिर हिम्मत बटोरी और अपनी दुल्हन के चेहरे से घूंघट उठा दिया, और भौंचक्का रह गया। यह सीमा नहीं थी, कोई और ही लड़की थी। अनार की सारी कलियां, उसको ऐसा महसूस हुआ, मुर्झा गई हैं।