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Jun 12, 2009

सीनियर राइटर्स

सीनियर राइटर्स
- कैलाश मंडलेकर
हर शहर में एक न एक सीनियर राइटर जरूर होता है। वह लेखन के क्षेत्र का डॉन अथवा सरगना होता है। जिस शहर में यह डॉन नहीं होता वह शहर दो कौड़ी का होता है। सीनियर राइटर नगर की शान होता है। वह नगर की साहित्यिक गोष्ठियों और सभाओं का स्थाई अध्यक्ष होता है।
सीनियर राइटर को हिन्दी में वरिष्ठ साहित्यकार कहते हैं। वह लेखक के अलावा कवि भी हो सकता है और आलोचक तो वह होता ही है। दरअसल उम्र के साथ वह विधाओं की संकीर्णता से ऊपर उठ जाता है और जरूरत तथा मौसम के हिसाब से सभी विधाओं को ओढ़ता बिछाता रहता है।
सीनियर राइटर ज्यादातर बूढ़े होते हैं उनका बुढ़ापा दरिद्र और असहाय नहीं होता। वे अपनी वृद्धावस्था को एक तरह का रौब और रेस्पेक्टेबिलिटी दिए हुए रहते हैं, तथा जमाने पर लगभग थूकते हुए जमाने को तुच्छ और हेय दृष्टि से देखते हैं। हर शहर में एक न एक सीनियर राइटर जरूर होता है। वह लेखन के क्षेत्र का डॉन अथवा सरगना होता है। जिस शहर में यह डॉन नहीं होता वह शहर दो कौड़ी का होता है। सीनियर राइटर नगर की शान होता है। वह नगर की साहित्यिक गोष्ठियों और सभाओं का स्थाई अध्यक्ष होता है। यदि किसी गोष्ठी में उसे न बुलाया जाए तो उस गोष्ठी को वह निकृष्ट एवं फूहड़ घोषित कर देता है।
कतिपय शहरों में एक के बजाए दो-तीन सीनियर राइटर होते हैं। आयोजनकर्ताओं और संयोजकों को प्राय: मुसीबत में डाल देते हैं। आयोजनकर्ता आखरी तक तय नहीं कर पाते कि सबसे ज्यादा सीनियर कौन है। एकदम वरिष्ठतम!! किससे अध्यक्षता कराएं? शर्माजी से या वर्माजी से?? वैसे दिखने में शर्माजी ज्यादा वरिष्ठ हैं। उनके दांत भी गिर गए हैं। मुंह भी एकदम पोपले टाइप का है। बोलते हैं- तो मुंह से हवा निकल जाती है। लेकिन वरिष्ठ वे फिर भी नहीं हैं। असली 'वरिष्ठ' वर्माजी हैं। खाते-पीते घर के हैं इसीलिए कृशकाय नहीं दिखते। लेकिन शर्माजी पर भारी पड़ते हैं। कारण कि परसों उनको कलेक्टर ने शांति समिति की मीटिंग में बुलाया था। ऐसा करो!! एक से अध्यक्षता करो लो, दूसरे को (साले को) मुख्य अतिथि बना दो। फिर नगर के विधायक क्या भूट्टे सेंकेंगे?? वरिष्ठ साहित्यकारों के कारण आयोजनकर्ताओं की जान सांसत में रहती है।
स्थानीय स्तर पर वरिष्ठ साहित्यकारों के आपसी रिश्ते प्राय: ईष्र्यापूर्ण रहते हैं। वे अमूमन एक दूसरे की हत्या करने की फिराक में रहते हैं। लेकिन आपस में मिलने पर बहुत सौहार्दपूर्ण व्यवहार करते हैं।
'कैसे हैं??'
'इधर कई दिनों से दिखाई नहीं दिए??'
स्वास्थ्य तो ठीक है?? इत्यादि!
सीनियर राइटर अनुभव से पका होता है इसलिए प्राय: अडिय़ल होता है, तथा नई पीढ़ी के पिछवाड़े पर हमेशा लात जमाने को उद्यत रहता है। यह अलहदा बात है कि वक्त पडऩे पर वह नए लेखकों की किताबों के ब्लर्ब और भूमिकाएं आदि लिखता है तथा उनका विमोचन भी करता है। विमोचनार्थ प्रस्तुत की गई कृतियों के रैपर खोलने में उसकी निर्बल उंगलियां बहुत प्रवीण होती हैं। नए लेखकों की कहानियों और कविताओं पर वह धारा प्रवाह बोलता है, देर तक बोलता है और तब तक बोलता है जब तक कि पीछे से कोई उसका कुर्ता अथवा धोती न खींच ले। नए लेखकों, कवियों तथा खासतौर से नई उम्र की कवियत्रियों को आकाशवाणी एवं दूरदर्शन के कार्यक्रम दिलाने में भी सीनियर राइटर मदद करता है।
आओ शालिनी तुम्हारी कविताएं रेडियो से प्रकाशित करवा दें!!
पिछली दफे सरिता की करवाई थी!!
सीनियर राइटर संस्मरण सुनाने, लिखने आदि की कला में बहुत पारंगत होता है। हर सीनियर राइटर अपने जीवन में एकाधिक बार पंत, प्रसाद अथवा निराला जी से जरूर मिला होता है। अपने संस्मरणों में वह विस्तार से बताता है, कि कब कहां और कैसे वह उपरोक्त साहित्यकारों से मिला और देर तक बातें की। वह यह भी बताता है कि निरालाजी ने या पंत जी ने उससे क्या कहा- कितनी देर तक कहा और तब तक कहा जब तक कि उस साहित्यकार विशेष की गाड़ी नहीं निकल गई। ज्यादातर सीनियर राइटर पंत, प्रसाद, बच्चन आदि महामना साहित्याकारों के साथ खिंचाई गई तथा एनलार्ज की गई ब्लैक एंड व्हाइट फोटो अपनी बैठक में लगाकर रखते हैं ताकि वक्त जरूरत काम आ सके। फोटो उस स्थान पर लगाई जाती है जहां से सबको दिखाई दे सके। कोई मूरख यदि फिर भी न देखे, तो सीनियर राइटर स्वयं भी बता देता है कि 'ये बच्चन जी हैं और उनके बाजू में 'मैंÓ हूं!!

सीनियर राइटर यदि गंजा हो (जो कि प्राय: होता ही है) तो अधिक ग्रेसफुल और विद्वान दिखाई पड़ता हैं। कुछ सीनियर राइटर अपने कपाल पर तीन-चार सलवटें बनाकर रखते हैं जिनकी वजह से वे अधिक विद्वान और चिंतनशील दिखाई देते हैं। सीनियर राइटर यदि दाढ़ी बढ़ा ले तो वह सोने में सुहागा जैसा हो जाता है। सुहागा किस वस्तु को कहते हैं इस बावत मुझे ज्यादा जानकारी नहीं है। इसके बारे में किसी सीनियर राइटर से ही पूछा जा सकता है।
सीनियर राइटर अक्सर ढीली पैंट पहनता है जो बार-बार फिसलती है लेकिन इतनी भी ढीली नहीं पहनता कि कमर से नीचे ही फिसल जाए। पैंट के मामले में वह सावधान रहता है। सीनियर राइटर के टेलर्स और नाई आदि फिक्स रहते हैं। ज्यादातर मामलों में नाई उसकी कटिंग करने घर पर ही आता है।
 सीनियर राइटर कभी नाई की दुकान पर नहीं जाता। कटिंग कराने के दौरान वह नाई से बातचीत करते रहता है। वह नाई की बातों में कविता तलाशता है। पक्का साहित्यकार नाई से भी कविता झटक लेता है। देखने में यह भी आया है कि सीनियर राइटर प्राय: गर्म पानी से नहाता है और यदि गर्म पानी नहीं मिले तो कई-कई दिनों तक नहीं नहाता। उनके बदन से अक्सर वरिष्ठता की बदबू आती रहती है।
सीनियर राइटर का एकांत बहुत भयावह होता है। बात-बात पर उपदेश देने वाली आदत के कारण लोग प्राय: उससे बिदकते हैं। सीनियर राइटर अमूमन अकेला ही रहता है, तथा अपने घरेलू किस्म के अकेलेपन को पत्नी से लड़ते हुए काटता है। सार्वजनिक जीवन में सीनियर राइटर आदर्शवादी होता है तथा अकेले में वह इन आदर्शों को तोड़ता जाता है। सुबह के नाश्ते के वक्त जो सीनियर राइटर परंपरा का पुजाती होता है, लंच तक आते-आते वह उन परंपराओं का भंजक बन जाता है। परंपरा भंजन की कला, साहित्य में क्रांतिकारिता कहलाती है। सीनियर राइटर एक दिन में चार पांच बार क्रांति करता है। खटिया पर पड़ा हुआ, बीमार और जर्जर साहित्यकार अधिक क्रांतिकारी
होता है।
वरिष्ठ साहित्यकारों को अपनी षष्ठीपूर्ति अथवा नागरिक अभिनंदन करवाने में बहुत चिंता रहती है। षष्ठीपूर्ति के दौरान यदि अभिनंदन ग्रंथ भी छप जाए तो फिर कहने ही क्या। नागरिक अभिनंदन करवाने के लिए वरिष्ठ साहित्यकारों ने अनेक तरीके ईजाद किए हैं। सबसे उत्तम तरीका है कि हर मिलने जुलने वालों से कहो कि यह नगर मेरा, (अर्थात सीनियर राइटर का) नागरिक अभिनंदन करना चाहता है। धीरे-धीरे इस मिथ्या प्रचार के भपके में नगर की कोई संस्था सचमुच उनका अभिनंदन करवा डालती है। कतिपय सीनियर राइटर अपने अभिनंदन का खर्चा उठाने को भी तैयार रहते हैं। ये लोग अभिनंदन ग्रंथ की सामग्री भी आनन फानन जुटा देते हैं।
ऐसे भी सीनियर राइटर देखने में आए हैं जो अपनी टांग साहित्य में तथा दूसरी समाज सेवा के क्षेत्र में डाले रखते हैं। समाजसेवा का क्षेत्र बाज- दफे साहित्य की सेवा से ज्यादा व्यापक होता है। आदमी कालोनी की नाली सुधारते-सुधारते देश की नदियों को जोडऩे की बात करने लगता है। इस क्रिया को राष्ट्रीय चेतना का विकास होना कहते हैं। ज्यादातर राष्ट्रीय चेतना वार्ड की गटर से शुरु होती है। कतिपय सीनियर राइटर राजनीति के फटे में भी पांव फंसाना चाहते हैं। कई सीनियर राइटर सरकारी पदों, पीठों अथवा समितियों के मानद सदस्य बनकर गौरवान्वित हो लेते हैं। मैं एक ऐसे साहित्यकार को जानता हूं जो रेल्वे की राजभाषा सलाहकार समिति के सदस्य थे। वे जिंदगी भर बिना टिकट रेल में सपरिवार सफर करते रहे। जब भी टीटी उनसे टिकट मांगता, वे चिरौरी करते हुए कहते - 'मैं एडवाइजरी कमेटी में हूं। ये मेरी बीवी हैं। वे साहित्य का 'अमृत' छोड़कर जिंदगी भर प्लेटफार्म की गंदी चाय पीते रहे।
वरिष्ठ     साहित्यकार, साहित्यिक मूल्यों में गिरावट, देश की गरीबी, भ्रष्टाचार तथा हिंसा आदि के लिए चिंतित दिखाई देते हैं लेकिन उनकी असली चिंता, ज्ञानपीठ और पद्मश्री पुरस्कारों के लिए होती है। दरअसल सीनियर राइटर कबीर के ब्रह्म की तरह होता है, वह चाहे तो 'पुहुपवास' से पातरा होकर सारे ब्रह्माण्ड में व्याप्त हो जाए। और चाहे तो नई पौध के सिर पर लादकर गुरुडम के बोझ से उसे रसातल में बिठा दे। सीनियर राइटर का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
कैलाश मंडलेकर
अमूमन लेखक अपने कथ्य के आधार पर ऊंचाई को प्राप्त करता है। पर ऐसे भी लेखक महत्वपूर्ण हैं जो अपनी भाषा और शैली के आधार पर साहित्य में अपनी जगह बना लेते हैं। हमारी पीढ़ी के लेखकों में कैलाश मंडलेकर हैं जिनसे कथ्य के आधार पर और भी कुछ कहे जाने की अभी प्रतीक्षा है लेकिन भाषा के स्तर पर हिंदी व्यंग्य साहित्य में उन्होंने अपनी उपस्थिति दर्ज कर ली है और अच्छे से दर्ज की है। यह कमाल उन्होंने अपने पहले ही संग्रह 'सर्किट हाउस में लटका चांद' से ही कर दिखाया और व्यंग्य के अपने पाठक व लेखक संसार का ध्यान बरबस ही अपनी ओर खींच लिया है। कैलाश मंडलेकर के पास बड़ी आत्मीय और घरेलू किसम की भाषा है जिनसे वे अपने पाठकों के साथ आत्मीय सम्बंध बना लेते हैं और पाठक को बड़ी निजता सें बांधे रखते हैं। उनकी रचनाएं इस तरह झरती हैं जैसे वे पाठकों को कोई कहानी सुना रहे हों। या प्रेम से किसी घटना का बयान कर रहे हों। उनके इस प्रेमपूर्ण बयान को यहां उनकी प्रस्तुत व्यंग्य रचना 'सीनियर राइटर्स' में भी देखा जा सकता है। जिसमें कस्बे में रहने वाले अहमक किस्म के स्वनामधन्य लेखकों की खिंचाई की गई है। सार्थक और सक्रिय लेखन से परे रहकर वरिष्ठता बोध से ग्रसित और अपना मिथ्या प्रचार कर हरदम अभिभूत रहने वाले लेखकों का बढि़या खाका खींचा गया है।

श्रम की गरिमा का सम्मान

श्रम की गरिमा का सम्मान
'श्रम सभ्यताओं की प्राण शक्ति है। यदि श्रम को उपेक्षित किया जाता है तो हर समाज में आलस्य का कैंसर पैदा हो जाता है।' श्रम की इसी गरिमा को पूरा सम्मान देते हुए एकलव्य द्वारा 'कुम्हार, धोबी, बुनकर, मोची- हमारे समय में श्रम की गरिमा' नामक नई पुस्तक का प्रकाशन किया गया है। 
 इस किताब में समाज के निचली कही जाने वाली जातियों के द्वारा किये जाने वाले कामों पर बड़ी गहराई से, न केवल प्रकाश डाला गया है बल्कि  इन जातियों को ऐसे कामों के दौरान जिन परेशानियों को आत्मसात करना पड़ता है उसका भी खुलासा किया गया है।
आधुनिक लाइफ स्टाइल में जीने वाले शहरी बच्चों के लिए लिखी गयी इस किताब में लेखक की यही अपेक्षा है कि बच्चे इन लोगों के जीवन को पास से देखें। इससे बच्चों का ही नहीं बल्कि बड़ों का भी नजरिया बदलेगा और सदियों से शोषित इन जातियों के परिश्रम का सही आंकलन हो सकेगा।
आदिवासी, पशु पालक, चर्मकार, किसान,  कुम्हार, बुनकर, धोबी, नाई के जीवन क्रम, मान्यताएं, उनका सामाजिक दर्जा आदि पर विस्तार से लिखते हुए प्रो.कांचा आइलैया ने इन समुदायों के कौशल को भी दर्शाया है। अकुशल श्रमिक कहे जाने वाले श्रमिकों के श्रम को समाज ने किस तरह से उपयोग करने के बाद इनको उपेक्षित किया है इसको बखूबी लिखा गया है।
एकलव्य द्वारा प्रकाशित इस किताब के लेखक प्रो. कांचा आइलैया हैं। चिंत्राकन दुर्गा बाई व्याम ने
किया है। 
 धूप में गुलाबी होती  कहानियाँ
यह पुस्तिका हिमाचल के उन सभी खूबसूरत इंद्रधनुषी मौसमों को समर्पित है जो इन कहानियों के गवाह बनें। प्रिया आनंद की इन कहानियों में पहाड़ी देवियों की रहस्यमयता ने बहुत सारे द्वार खोले हैं। वे अपनी कहानियों के बारे में स्वयं कहती हैं कि 'पहाड़ की किसी भी सड़क से आती इन देवियों को देखने का जो अलौकिक अहसास मैंने पाया है वह भी मेरी कई कहानियों का आधार बना हैं।'
पुस्तक की इन कहानियों को लेकर इमरोज ने अपनी कवितामय टिप्पणी दी  है जैसे वे 'मैदानÓ कहानी के बारे में कहते हैं कि सारे रंगों से रंग-रंग भी होती है, भीगती है और गुलाबी धूप में गुलाबी होती रहती है।  'नीली यमुना' तरंग नाम की अहसासमंद औरत की खूबसूरत कहानी है। जिसमें यमुना का नीला रंग भी है गंगा का सफेद रंग और सरस्वती का गुलाबी रंग भी। वे कहते हैं कि अपनी कहानियों में प्रिया खुद ही एक सवाल बन जाती है और खुद ही एक जवाब।
 कहानी संग्रह की लेखिका प्रिया पिछले 36 वर्षों से लेखन में सक्रिय हैं। उनकी 250 के लगभग कहानियां एवं लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। उनका यह दूसरा कहानी संग्रह है। पहले कहानी संग्रह का नाम है 'मोहब्बत का पेड़'। पिछले आठ वर्षों से पत्रकारिता से जुड़ी प्रिया वर्तमान में हिमाचल प्रदेश के 'दैनिक दिव्य हिमाचल' में कार्यरत है।
पूनम प्रकाशन दिल्ली द्वारा प्रकाशित इस संग्रह का मूल्य 150/- है।

इस अंक के रचनाकार

अविनाश वाचस्पति
14 दिसंबर 1958 का जन्म। दिल्ली विश्वविद्यालय से कला स्नातक। सभी साहित्यिक विधाओं में समान रूप से लेखन। व्यंग्य, कविता एवं फिल्म पत्रकारिता विषयक आलेख प्रमुखता से पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। हरियाणवी फीचर फिल्म 'गुलाबो' 'छोटी साली' और 'जर, जोरू और जमीन' में प्रचार और जनसंपर्क । नेत्रदान पर बनी हिंदी टेली फिल्म 'ज्योति संकल्प' में सहायक निर्देशक के तौर पर कार्य । वर्तमान में फिल्म समारोह निदेशालय, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, नई दिल्ली से संबद्ध। पता- साहित्यकार सदन, पहली मंजिल, 195 सन्त नगर, नई दिल्ली 110065  मोबाइल 09868166586
ईमेल-avinashvachaspati@gmail.com
मुकुन्द कौशल
7 नवम्बर 1947 को दुर्ग के एक गांधीवादी गुजराती परिवार में जन्में मुकुन्द कौशल हिन्दी, छत्तीसगढ़ी एवं उर्दू सहित गुजराती में भी लेखन करते हैं। देशभर की पत्र-पत्रिकाओं में 1960 से शताधिक रचनाएं प्रकाशित जिसमें प्रमुख सात काव्य संग्रह सहित 20 समवेत काव्य संकलनों में रचनाएं सम्मिलित। धारावाहिकों, टेलीफिल्मों व फीचर फिल्मों सहित 30 से अधिक ऑडियो एलबम्स के लिए गीत लेखन। 25 से अधिक पुरस्कार व सम्मान। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन
पता - एम-516, पद्मनाभपुर, दुर्ग- 491001 छत्तीसगढ़, मोबाइल - 093294-16167
नाजि़म नकवी
उत्तर प्रदेश के जिला रायबरेली, ऊंचाहार में जन्म। बीए इलाहाबाद से, शायरी का चस्का इसी शहर ने लगाया। अपने क़स्बे के नाम पर नाजि़म मुस्तफ़ाबादी के तख़ल्लुस से लिखना शुरू किया। पत्रकार बनने का सपना कभी नहीं टूटा, घरवालों की नाराजग़ी के बावजूद भी नहीं। छोटे से साप्ताहिक समाचार-पत्र इलाहाबाद केशरी के संपादन से जेब ख़र्च की कमी को पूरा किया। अपने क़स्बे से एक शाम का दैनिक समाचार 'ऊंचाहार मेलÓ की शुरूआत की जो सिर्फ 45 अंक के बाद बंद करना पड़ा।  दिल्ली आए जहां विनोद दुआ की शरण में जगह मिल गई, स्क्रिप्ट राइटर के तौर पर। तब से लेकर आजतक, पिछली एक दहाई से टीवी और फि़ल्मों की दुनिया में कुछ सार्थक कर पाने की जुगत में हैं।
पता- 2nd Floor, Plot No. 634, Sector 1, Vaishali, Ghaziabad
   Blog - http://awaazkepremi.blogspot.com
नितीन जानकीदास देसाई
27 जुलाई 1967 को जन्म। पुणे विद्यापीठ से एम ए हिंदी (अनुवाद), बैंकिग और सूचना तकनीक विषयों पर लेखन, मानव संबंध और स्वभाव पर कविताएं, वर्तमान में बैंक में अधिकारी।
 ईमेल- nitin67j@gmail.com

डॉ. सिद्धार्थ खरे


1977 से पत्रकारिता (प्रिंट व टेलीविजन) 2002 में बेस्ट रिपोर्टिंग के लिए माधव राव सप्रे स्मृति समाचार पत्र संग्रहालय- शोध संस्थान भोपाल द्वारा स्थापित राज्य स्तरीय जगदीश प्रसाद चतुर्वेदी अवार्ड। मध्यप्रदेश असेंबली प्रेस एडवाइजरी गैलरी के पूर्व सदस्य। मध्यप्रदेश श्रमजीवी पत्रकार संघ के पूर्व जनरल सेके्रटरी ।
ईमेल-  khare.siddhartha@gmail.com

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वाह भई वाह

एक आईसक्रीम वाला बार-बार चिल्ला रहा था, 'एक बार खाएगा तो हजार बार खाएगा'।
यह सुन कर पास खड़े लड़के से रहा नहीं गया। वह उसकी नकल करते हुए बोला, 'मुफ्त में खिलाएगा तो लाख बार खाएगा'।
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आत्मीय प्रस्तुति

आत्मीय प्रस्तुति
उदंती का नया अंक पढ़कर ख़ुशी हुई । हमेशा की तरह यह अंक भी अच्छी साज-सज्जा, बेहतर रचनाओं और आत्मीय प्रस्तुति के कारण दिल को छू गया । बधाई ।
- देवमणि पांडेय, मालाबार हिल, मुम्बई
ब्लाग की असामयिक मौत
संजय तिवारी के लेख में इस बात का कोई जिक्र ही नहीं है कि ब्लाग की यह असामयिक मौत कैसे हो रही है। हां मैं इस बात से सहमत हूं कि बहुत सारे ब्लाग केवल नाम के लिए चल रहे हैं। उनमें कुछ गिने चुने लोग ही टिप्पणी करते हैं। मैं लिखूं तो तुम टिप्पणी करो और तुम लिखो तो मैं टिप्पणी करूं। संयोग से मैंने भी एक ब्लाग बनाया है। पर बहुत उत्साह का माहौल दिखता नहीं है। अगर हम सचमुच ब्लाग को जिंदा देखना चाहते हैं तो कुछ विचारवान लोगों को आगे आना पड़ेगा और इसमें भागीदारी करनी पड़ेगी। केवल दूर से बैठकर देखने या कहने से काम नहीं चलेगा। उदंती के इस अंक में वंदना से परिचय कराने के लिए आपको सौ-सौ सलाम। इतने अद्भुत चित्र मैंने पहली बार देखे हैं। खासकर चोटी में लिपटी बच्ची को देखकर मैं बेहद रोमांचित हूं। छत्तीसगढ़ की संस्कृति और कला पर सामग्री देखकर खुशी हुई। वंदना के चित्रों ने पत्रिका में चार चांद लगा दिए हैं। वंदना को भी बधाई।
- राजेश उत्साही, बैंगलोर
सराहनीय प्रयास
    यू हीं नेट को छानते हुए आपके उदंती.कॉम पर नजर पड़ी। पत्रिका का प्रयास और विचार सराहनीय है। शुभकामनाएं।
- अशोक कुमार, असिस्टेंट एडिटर, bhadas4media.com
नयनाभिराम कलेवर
उदंती के दो अंक देखें। सच कहूं, छत्तीसगढ़ की यह एक उपलब्धि है। इतनी सुंदर, सुरुचिपूर्ण, सुसज्जित पत्रिका मैंने अब तक नहीं देखी। खुद एक पत्रिका का प्रकाशन करता हूं लेकिन इस पत्रिका के नयनाभिराम कलेवर बाकी पत्रिकाओं को फीकी कर देती हैं। उदंती में छत्तीसगढ़ की महक है। साहित्य-संस्कृति एवं समकालीन विषयों का संस्पर्श करने वाली यह बहुरंगी पत्रिका निरंतर प्रकाशित होती रहे यही मेरी शुभकामना है।
- गिरीश पंकज, संपादक, सद्भावना दर्पण, रायपुर
पठनीय
उदंती का मार्च अंक मिला। प्रकाशन, गुणवत्ता की प्रशंसा पहले ही कर चुका हूं। रचनाएं इस बार भी पठनीय हैं। इस अंक में प्रकाशित  कविताएं पत्रिका के महत्व को बढ़ाती हैं।
- त्रिभुवन पाण्डेय, सोरिदनगर, धमतरी
संस्कृतियों का परिचय
उदंती अच्छी निकल रही है। इसमें बीच बीच में आप विभिन्न संस्कृतियों से परिचय कराने वाले लेख प्रकाशित करती हैं जो बहुत अच्छे व जानकारी प्रधान होते हैं।  ऐसे लेख हमेशा प्रकशित करने की कोशिश करें।    
                 - शेली खत्री, जबलपुर
आजाद भारत की भयावह हकीकत
उदंती का मार्च अंक आनलाइन पढऩे को मिला। नक्सलग्रस्त इलाके का यात्रावृतांत- मैंने देखा एक समृद्ध संस्कृति को विलुप्त होते... काफी अच्छा लगा। पढ़कर ताज्जुब हुआ कि वहां के हालात इतने जटिल हैं। बिना किसी लागलपेट के यह वृतांत लिखा गया है। दाद देनी होगी अंजीव जी के हिम्मत की जिन्होंने हमें आजाद भारत के इस भयावह हकीकत से अवगत कराया। उदंती के प्रकाशन के लिए संपादकीय टीम को कोटिश: बधाई। 
- श्वेता शर्मा, कवयित्री, यू.एस.ए.

तिनके नहीं मिलेंगे तब बाल ही काम आएँगे, उम्र को भूल जाइए...

तिनके नहीं मिलेंगे तब
बाल ही काम आएँगे

चिडिय़ा अपना घोंसला बनाने के लिए तिनकों का सहारा लेती है, लेकिन जिस रफ्तार से हम अपनी प्रकृति के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं एक दिन ऐसा न हो कि चिडिय़ों को तिनके का सहारा भी न मिलें। तब हो सकता है   उन्हें  दूसरी वस्तुओं से उन्हें अपना आशियाना सजाना पड़े। बिल्कुल उसी तरह जिस तरह इन चिडिय़ों ने जोएन के सफेद बालों से अपना घोंसला बनाया। 
जाब्रियान विलियम्स ने जब बाल कटाए तो इसका फायदा उनके अलावा उन चिडिय़ों को भी हुआ जिन्हें इसकी बदौलत आशियाना मिल गया। ब्रियान के बाल हर महीने उनकी पत्नी जोएन काटती थी।
  जोएन कटे बालों को एक कागज में इकट्ठा कर बगीचे में डाल आती। वहीं अपना घोंसला बना रही कुछ चिडिय़ा तिनके की जगह इन बालों को इस्तेमाल करतीं। 68 वर्षीय सेवानिवृत शिक्षक विलियम्स ने बताया कि एक दिन में मैंने देखा कि गोल्डफिंच, ग्रीनफिंच और राबिन चिडिय़ों ने मेरे सफेद बालों का एकत्रित कर घोंसला बना लिया है तो हैरान रह गया। मेरे बालों का इतना अच्छा इस्तेमाल देखकर मुझे बड़ी खुशी मिली।
बार्नस्टेपल के रहने वाले इस दंपति ने बताया कि सबसे पहले हमने राबिन का घोंसला देखा। लेकिन बाद में पाया कि गोल्डफिंच और ग्रीनफिंच ने भी बालों से अपने घोंसले बना लिए हैं। जोएन ने बताया कि बालों को फेंकते समय मैंने बिल्कुल नहीं सोचा था कि इनका इतना अच्छा इस्तेमाल भी हो सकता है।
उम्र को भूल जाइए...
जैसे- जैसे हमारी उम्र बढऩे लगती है हमारा शरीर भी थकने लगता है। इसके साथ ही कई शारीरिक समस्याएं शुरु हो जाती हैं। लेकिन दक्षिण-पूर्व आस्ट्रेलिया की 83 वर्षीय योग प्रशिक्षक बेट्टी काल्मैन ने तो जैसे उम्र को मात दे दी है। इस उम्र में वह जहां चुस्त दुरुस्थ बनी हुई है वहीं आज भी वह कठिन से कठिन योगासनों को सहजता से कर लेती हैं। उनके चेहरे पर योग की चमक व फिटनेस साफ नजर आती है।
अपनी जिंदगी योग को समर्पित कर चुकी बेट्टी पिछले 40 सालों से लोगों को योग सिखा रही हैं। उनका कहना है योग आपको रबर की तरह लचीला बनाए रखता है। कमलासन हो, शीर्षासन या कठिन योगमुद्रा, बेट्टी के लिए यह सब इतना सहज है जैसे किसी के लिए पैदल चलना। बेट्टी का कहना है कि 50 साल पहले मैं जितना योग कर सकती थी आज उससे ज्यादा कर सकती हूं। यह कभी आपको बूढ़ा नहीं होने देता। उनका कहना है कि आपका शरीर एक अद्भुत उपकरण है। आप इसे जितना चाहे खींच सकते हैं। हर बार आपको बेहतर परिणाम ही मिलेगा।
काल्मैन योग पर तीन किताबें भी लिख चुकी हैं। इन दिनों वह सप्ताह में 11 क्लास लेती हैं। मुस्कुराते हुए वह इतना जरूर कहती हैं कि योग कर रहे हैं तो उम्र को भूल जाइए।