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Apr 27, 2009

लोकनाट्य

पारसी थियेटर से प्रभावित छत्तीसगढ़ के लोक नाट्य
-प्रो. अश्विनी केशरवानी

छत्तीसगढ़ में लोकनाट्य दो रूपों में विकसित हुआ। एक तो निम्न वर्ग के देवार, नट, भट ने आल्हा उदल, ढोला मारू जैसी परंपरा तथा पंडु, कंवर और संवरा जाति ने पंडवानी और पंथी को विकसित किया। छत्तीसगढ़ में इसका प्रचार-प्रसार लगभग 16 वीं और 17 वीं शताब्दी के मध्य हुआ।
अभिनय मनुष्य की सहज प्रवृत्ति है। हर्ष, उल्लास और खुशी से झूमते, नाचते-गाते मनुष्य की सहज अभिव्यक्ति है अभिनय। छत्तीसगढ़ के लोक जीवन की झांकी गांवों के खेतों, खलिहानों, गली, चौराहों और घरों में स्पष्ट देखी जा सकती है। इस ग्रामीण अभिव्यक्ति को 'लोक नाट्यÓ कहा जाता है। छत्तीसगढ़ में लोक नाट्य की प्राचीन परंपरा रही है। यही आगे चलकर नाटक के रूप में विकसित हुआ। 'नाट्य शास्त्रÓ जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथ का प्रणयन दूसरी सदी में हुआ। भरत मुनि ने ऋग्वेद से पाठ्य, सामवेद से गान, यजुर्वेद से अभिनय, और अथर्वेद से रस लेकर इसकी रचना की। भरत मुनि के समक्ष लोकधर्म का आदर्श सर्वोपरि था। कदाचित् इसी कारण उन्होंने लोकधर्म के प्रति अपना अनुराग दर्शाया है।
छत्तीसगढ़ में लोकनाट्य दो रूपों में विकसित हुआ। एक तो निम्न वर्ग के देवार, नट, भट ने आल्हा उदल, ढोला मारू जैसी परंपरा को तथा पंडु, कंवर और संवरा जाति ने पंडवानी और पंथी को विकसित किया। छत्तीसगढ़ में इसका प्रचार-प्रसार लगभग 16 वीं और 17 वीं शताब्दी के मध्य हुआ। उत्तर भारत के रासलीला और रामलीला मथुरा, वृंदावन, काशी और इलाहाबाद से सतना, रीवा, अमरकंटक होते हुए पेंड्रा, रतनपुर, शिवरीनारायण, अकलतरा, सारंगढ़, किकिरदा, मल्दा, नरियरा, बलौदा, कवर्धा, कोसा और राजिम आदि में फैल गया। इसलिए छत्तीसगढ़ी भाषा में ब्रज और अवधी का पुट मिलता है। दूसरी ओर बंगाल की जात्रा, उड़ीसा की पाल्हा, जगन्नाथपुरी से सुंदरगढ़, संबलपुर, सारंगढ़, चंद्रपुर, पुसौर, रायगढ़, और तमनार आदि जगहों मेंं फैल गया। यहां की नाट्य परंपराओं में इसका स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है। पं. हीराराम के गीत गाये प्रचलित थे -
कृष्ण कृपा नहिं जापर होई दुई लोक सुख ताहिं न होई।
देव नदी तट प्यास मरै सो अमृत असन विष सम पलटोई।।
धनद होहि पै न पावै कौड़ी कल्पद्रुम तर छुधित सो होई।
ताको चन्द्र किरन अगनी सम रवि-कर ताको ठंढ करोई।।
द्विज हीरा हरि चरण शरण रहु तोकू त्रास देइ नहिं कोई।।
डॉ. बल्देव से मिली जानकारी के अनुसार रायगढ़ के राजा भूपदेवसिंह के शासनकाल में नगर दरोगा ठाकुर रामचरण सिंह जात्रा से प्रभावित रास के निष्णात कलाकार थे। उन्होंने इस क्षेत्र में रामलीला और रासलीला के विकास के लिए अविस्मरणीय प्रयास किया। गौद, मल्दा, नरियरा और अकलतरा रासलीला के लिए और शिवरीनारायण, किकिरदा, रतनपुर, सारंगढ़ और कवर्धा रामलीला के लिए प्रसिद्घ थे। नरियरा के रासलीला को इतनी प्रसिद्घि मिली कि उसे 'छत्तीसगढ़ का वृंदावनÓ कहा जाने लगा। ठाकुर छेदीलाल बैरिस्टर, उनके बहनोई कोसिरसिंह और भांजा विश्वेश्वर सिंह ने नरियरा और अकलतरा के रासलीला और रामलीला के लिए अथक प्रयास किया। उस काल में जांजगीर क्षेत्रान्तर्गत अनेक गम्मतहार सुरमिनदास, धरमलाल, लक्ष्मणदास चिकरहा का नाचा पार्टी में रास का यथेष्ट प्रभाव देखने को मिलता था। उस समय दादूसिंह गौद और ननका रहस मंडली, रानीगांव रासलीला के लिए प्रसिद्घ था। वे पं. हीराराम त्रिपाठी के श्री कृष्णचंद्र का पचरंग श्रृंगार गीत गाते थे-
पंच रंग पर मान कसें घनश्याम लाल यसुदा के।
वाके वह सींगार बीच सब रंग भरा बसुधा के।।
है लाल रंग सिर पेंच पाव सोहै,
अंखियों में लाल ज्यौं कंज निरखि द्रिग मोहै।
है लाल हृदै उर माल कसे जरदा के।।1।।
पीले रंग तन पीत पिछौरा पीले।
पीले केचन कड़ा कसीले पीले।।
पीले बाजूबन्द कनक बसुदा के ।। पांच रंग ।।2।।
है हरे रंग द्रुम बेलि हरे मणि छज्जे।
हरि येरे वेणु मणि जडि़त अधर पर बज्जे।।
है हरित हृदय के हार भार प्रभुता के।। पांच रंग।। 3।।
है नील निरज सम कोर श्याम मनहर के।
नीरज नील विसाल छटा जलधर के।।
है नील झलक मणि ललक वपुष वरता के।। पांच रंग।।4।।
यह श्वेत स्वच्छ वर विसद वेद जस गावे।
कन स्वेत सर्वदा लहत हृदय तब आवे।।
द्विज हीरा पचरंग साज स्याम सुखदा के।। पांच रंग।।5।।
इसी प्रकार छत्तीसगढ़ में नाट्य लेखन की परंपरा रही है। भारतेन्दु युग में हिन्दी रंगमंच का निर्माण हुआ और अधिक से अधिक अभिनय, नाटक और प्रहसन आदि लिखे और प्रस्तुत किये गये। हालांकि यह रंगमंच सामाजिक परिस्थितियों के कारण चिरस्थायी न रह सका और उसका स्थान पारसी थियेट्रिकल कम्पनियों ने ले लिया। इसके अवसान काल में सिनेमा का प्रादुर्भाव हुआ। इसके बावजूद लोग सजीव व्यक्ति को अपने सम्मुख उनके और उनकी समस्याओं का अभिनय करते देखना चाहते थे। इस युग में अंग्रेजी और संस्कृत नाटकों के अनुवाद का प्रचलन था।
सुप्रसिद्घ साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चंद्र के बाल सखा, कवि और सुप्रसिद्घ आलोचक ठाकुर जगमोहन सिंह के प्रिय शिष्य और शिवरीनारायण के मालगुजार पंडित यदुनाथ भोगहा के सुपुत्र पं. मालिकराम भोगहा ने रामराज्यवियोग, प्रबोध चंद्रोदय, और सती सुलोचना नाटक लिखा। इन नाटकों का शिवरीनारायण के अलावा कई स्थानों में सफलता पूर्वक मंचन किया गया। भोगहा जी ने शिवरीनारायण में एक नाटक मंडली बनायी थी।
छत्तीसगढ़ के अनेक साहित्यकारों ने नाटक लिखा है। इनमें साहित्य वाचस्पति जगन्नाथ प्रसाद 'भानु' के पिता श्री बक्षीराम ने 'हनुमान' नाटक लिखा था। रायगढ़ के पं. अनंतराम पांडेय ने सन 1903 में 'कपटि मुनि' नाटक लिखा था जिसे मंचित भी किया गया। द्विवेदी युगीन साहित्यकार पंडित शुकलाल पांडेय ने 1930 में मातृमिलन नाटक लिखा था। पंडित लोचन प्रसाद पांडेय ने सन 1994 में 'साहित्य सेवा' प्रहसन लिखा था। डॉ. बल्देव प्रसाद मिश्र ने शंकर दिग्विजय, वासना वैभव, समाज सेवक, दानी सेठ, असत्य संकल्प और क्रांति आदि नाटक लिखा है। उनके नाटकों के कथोपकथन काव्यमय और चमत्कारपूर्ण हैं। उनके कुछ नाटकों की शैली पारसी नाट्य परंपरा पर आधारित है।
छत्तीसगढ़ी में व्यवस्थित नाट्य लेखन की शुरूवात डॉ. खूबचंद बघेल से होती है। उन्होंने सन 1930 से 1950 के बीच अनेक नाटक लिखा जिसमें ऊंच नीच, करम छटहा, जनरैल सिंह, बेटवा बिहाव, किसान के करलई और काली भाटो आदि प्रमुख हैं। वे अपने इन नाटकों का उपयोग छत्तीसगढ़ में जनजागरण के लिए करते थे। पंडित शुकलाल पांडेय ने छत्तीसगढ़ी में भूल भुलईया, गींया, छत्तीसगढ़ी ग्राम गीत, कलिकाल, उपसहा दामाद, सीख देवैया, केकरा धरैया आदि लिखा है। डॉ. प्यारेलाल गुप्त ने छत्तीसगढ़ी नाटक 'दू सौत' लिखा है। इसी प्रकार श्रीरामगोपाल कश्यप ने 'माटी के मोल', डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा ने सोनहा बिहान, गुरू चेला, भोला बनाइले, महेत्तर साहू ने 'राजा बेटा', नारायणलाल परमार ने 'भुल सुधार' और भुवनलाल मिश्र ने 'रतिहा मदरसा' नामक छत्तीसगढ़ी नाटक लिखकर नाट्य परंपरा को पुष्ट किया है।
छत्तीसगढ़ी नाटकों को लोकनाट्य के बजाय हिन्दी और एकांकी से प्रभावित समस्या मूलक नाटक कहा जाना अधिक उपयुक्त होगा। क्योंकि इनमें समसामयिक चेतना तो है लेकिन गांव की अल्हड़ता नहीं है। इनमें समसामयिक लोक भाषाओं का उद्दाम आवेग, लोकधर्मी प्रस्तुतियां नहीं होती और न ही इन्हें खुले मंच पर खेला जा सकता है। रंगकर्मी चाहे तो इन्हें आधार बनाकर लोकनाट्य के रूप में प्रस्तुत कर सकता है। जैसे डॉ. खूबचंद बघेल ने काली माटी, रामचंद्र देशमुख ने सरग अऊ नरक, जनम अऊ मरन, हबीब तनवीर ने चरनदास चोर, मोर गांव के नाम ससुराल मोर नाम दामद और महासिंह चंद्राकर ने सोनहा बिहान को सफलता पूर्वक प्रस्तुत किया है।
लोकनाट्य की स्वाभाविक भावधारा को श्री रामचंद्र देशमुख द्वारा निर्देशित 'चंदैनी गोंदा' ने आज के सिनेमाई युग में संबल प्रदान किया है। इनसे प्रभावित होकर अनेक कला मंडलियों, नाट्य संस्थाओं और कला पथकों का निर्माण हुआ मगर सिनेमाई युग की मार, उसमें प्रदर्शित पश्चिमी अंग प्रदर्शन के दृश्य ने कुछ ही समय में उसे धराशायी कर दिया। यह अत्यंत चिंता का विषय है कि हमारी सांस्कृतिक परंपराएं धीरे-धीरे लुप्त होने लगी हैं। इसके संरक्षण की दिशा में प्रयास किया जाना उचित होगा।
बहुत कम लोगों को मालूम है कि शिवरीनारायण का अभिनय संसार केवल छत्तीसगढ़ में ही नहीं वरन् देश के कोने-कोने में प्रसिद्घ था। हालांकि हर गांव में नाचा, गम्मत, रामलीला और रासलीला पार्टी होती थी लेकिन यहां की रामलीला और नाटक मंडली की बात ही कुछ और थी। 'छत्तीसगढ़ गौरव' में पंडित शुकलाल पांडेय ने लिखा है-
ब्रज की सी यदि रास देखना हो तो प्यारों
ले नरियर नरियरा ग्राम को शीघ्र सिधारों
यदि लखना हो सुहृद ! आपको राघव लीला
अकलतरा को चलो, करो मत मन को ढीला
शिवरीनारायण को जाइये लखना हो नाटक सुघ्घर
बस यहीं कहीं मिल जायेंगे जग नाटक के सूत्रधार।
प्राचीन साहित्य में उल्लेख मिलता है कि पंडित मालिकराम भोगहा ने एक नाटक मंडली यहां बनायी थी। इस नाटक मंडली द्वारा अनेक धार्मिक और सामाजिक नाटकों का सफलता पूर्वक मंचन किया जाता था। भोगहा जी भी छत्तीसगढ़ के एक उत्कृष्ट नाटककार थे। उन्होंने अनेक नाटक लिखे जिसमें राम राज्य वियोग, प्रबोध चंद्रोदय और सती सुलोचना प्रमुख हैं। इन नाटकों का यहां सफलता पूर्वक मंचन भी किया गया था।
इस सदी के दूसरे दशक में महंत गौतमदास के संरक्षण में पंडित विश्वेश्वर तिवारी के कुशल निर्देशन में एक नाटक मंडली संचालित होती थी जिसे उनके पुत्र कौशलप्रसाद तिवारी ने 'महानद थियेट्रिकल कम्पनी' नाम से कुशलता पूर्वक संचालित और निर्देशित किया। इसी प्रकार श्री भुवनलाल शर्मा 'भोगहा' के निर्देशन में नवयुवक नाटक मंडली और विद्याधर साव के निर्देशन में केशरवानी नाटक मंडली संचालित थी। कौशलप्रसाद तिवारी ने भी एक बाल महानद थियेट्रिकल कम्पनी का गठन किया था। आगे चलकर इस नाटक मंडली को उन्होंने महानद थियेट्रिकल कंपनी में मिला दिया। पंडित कौशलप्रसाद तिवारी पारसी थियेटर के अच्छे जानकार थे। उनको नाटकों का बहुत अच्छा ज्ञान था। वे नाटक मंडली के केवल निर्देशक ही नहीं बल्कि एक अच्छे कलाकार भी थे। कलकत्ता के नाट्य मंडलियों और निर्देशकों से उनका सतत् संपर्क था।
नाटकों का मंचन पहले केशवनारायण मंदिर प्रांगण में होता था। फिर मठ के गांधी चौरा प्रांगण में और बाद में बाजार में, कुआं के बगल में होता था। महानद थियेट्रिकल कम्पनी के कलाकारों को कलकत्ता के डॉ. अब्दुल शकूर और खुदीराम बोस रिहर्सल कराने आते थे। तब उन्हें 'बाजा मास्टर' कहा जाता था।
कौशलप्रसाद तिवारी, रथांग पांडेय और गुलजारीलाल शर्मा के द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार सन् 1944-45 में अंग्रेज सरकार के सहायतार्थ नाटकों का मंचन मेला के मैदान में किया गया था। इसे देखने के लिये सारंगढ़ के राजा, भटगांव, बिलाईगढ़, अकलतरा, पिथौरा के जमींदार और अनेक गांव के मालगुजार, अंग्रेज अधिकारी और बिलासपुर जिले के कलेक्टर सहित बहुत लोग आये थे। तब सिनेमा और सर्कस खाली रहते थे और पूरी भीड़ नाटक देखने के लिये उमड़ पड़ी थी। नाटक के एक ट्रिक सीन को देखकर अंग्रेज अधिकारी बहुत उत्तेजित हो गये थे जिन्हें बड़ी मुश्किल से शांत किया जा सका था। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार महानद थियेट्रिकल कंपनी का निर्माण और नाटकों का पहला मंचन सन् 1925 में हुआ और अंतिम नाटक सन् 1952 में खेला गया था।
महानद थियेट्रिकल कम्पनी के द्वारा मंचित नाटकों में प्रमुख रूप ये धार्मिक और सामाजिक नाटक होते थे। धार्मिक नाटकों में सीता वनवास, सती सुलोचना, राजा हरिश्चंद्र, वीर अभिमन्यु, दानवीर कर्ण, सम्राट परीक्षित, कृष्ण और सुदामा, भक्त प्रहलाद, भक्त अम्बरीश आदि सामाजिक नाटकों में आदर्श नारी, दिल की प्यास, आंखों का नशा, नई जिंदगी, महाराणा प्रताप, वीर शिवाजी, आदि प्रमुख थे।
 इस थियेट्रिकल कम्पनी के प्रमुख पात्रों में श्री कौशलप्रसाद तिवारी, पंडित श्यामलाल, पंडित गयाराम, पंडित ओंकारप्रसाद, विशेशर चौबे, बनमाली भ_, प्यार पठान, गुलजारीलाल शर्मा, लक्ष्मण चौबे, रामगुलाम साव, जवाहर जायसवाल, भीम साव, बोधी पांडेय, दीनबंधु पोद्दार, मोहन भट्ट, रथांग पांडेय, भूषण तिवारी, मातादीन सेठ, हरि महाराज, सीताराम हलवाई, याकूब पठान, भालचंद्र तिवारी, तिजाऊ प्रसाद केशरवानी, केदार मुकिम, लादूराम पुजारी आदि प्रमुख थे। इनमेें गयाराम पांडेय अर्जुन और कंस, गुलजारीलाल शर्मा हिरण्य कश्यप, मातादीन केडिया दुर्योधन, लादूराम पुजारी द्रोणाचार्य और शंकर, तिजाऊ प्रसाद केशरवानी राणाप्रताप और भालचंद्र तिवारी प्रमुख नायक के रूप में तथा विशेशर चौबे, लक्ष्मण शर्मा, केदार मुकिम प्रमुख नायिका के अभिनय के लिये बहुत चर्चित थे। श्यामलाल शर्मा, बनमाली भट्ट और विश्वेश्वर चौबे हास्य कलाकार थे।
 इन नाटक मंडलियों के कलाकार प्रतिष्ठित परिवारों के बच्चे थे और केवल मनोरंजन के लिये नाटक मंडलियों से जुड़े थे। क्योंकि उस समय मनोरंजन का कोई दूसरा साधन नहीं था। महंत लालदास के जीते जी महानद थियेट्रिकल कम्पनी के कलाकारों को आर्थिक सहयोग मठ से मिलता रहा उसके बाद पूरी नाटक मंडली बिखर गयी। यहां के नाटकों में अल्फे्रड, कोरियन्थर और पारसी थियेटर का स्पष्ट प्रभाव था। यह यहां के साहित्यिक पृष्ठभूमि का मजबूत अभिनय पक्ष है। केशरवानी नाटक मंडली तो कालकवलित बहुत पहले हो चुकी थी, भोगहा नाटक तो काफी दिनों तक नाटकों का मंचन करती रही है बाद में वह भी बंद हो गया।
पंडित शुकलाल पांडेय ने छत्तीसगढ़ की गौरवशाली नाट्य परंपरा के बारे में लिखा है-
हैं शिवलाल समान यहीं पर उत्तम गायक।
क्षिति गंधर्व सुरेश तुल्य रहते हैं वादक।
विविध नृत्य में कुशल यहीं हैं माधव नर्तक।
राममनोहर तुल्य यहीं हैं निपुण विदूषक।
हैं गयाराम पांडेय से अभिनेता विश्रुत यहीं।
भारत में तू छत्तीसगढ़ ! किसी प्रान्त से कम नहीं।।

जंगली भैंसा संसार का सबसे खतरनाक प्राणी

जंगली भैंसा संसार का सबसे खतरनाक प्राणी
-बिमल श्रीवास्तव
भारत की भैंसें तो पालतू भैंसे अर्थात वॉटर बफैलो हैं। किन्तु अफ्रीका के भैंसे किंग बफैलो अथवा केप बफैलो हैं जो कभी पालतू नहीं बनाए जा सकते और बहुत ही खूंखार होते हैं। मौका पडऩे पर तो ये शेर को भी पछाड़ देते हैं।
कुछ वर्ष पूर्व मुझे केन्या की राजधानी नैरोबी के राष्ट्रीय उद्यान में जाने का अवसर मिला था। राष्ट्रीय उद्यान के गाइड नें हमें बताया कि अफ्रीका के पांच बड़ेे पशुओं में शेर, तेंदुआ, हाथी, गैण्डा तथा भैंसे का नाम आता है। इन्हें देखने के लिए यूरोप, अमरीका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया आदि के पयर्टक टूट-से पड़ते हैं। ये सारे पशु मात्र आकार के कारण नहीं बल्कि इसलिए बड़े कहलाते हैं कि ये अत्यंत खतरनाक होते हैं और यदि ये किसी के पीछे पड़ जाएं तो उसका बच पाना मुश्किल होता है। शुरू के दिनों में जब शिकारी लोग अफ्रीका में शिकार के उद्देश्य से आते थे, तो जो शिकारी इन बड़े पशुओं का शिकार कर लेता था उसे बहुत बहादुर माना जाता था और इन पांच बड़े पशुओं में भी सबसे खतरनाक भैंसे होते हैं।
यह जान कर तो मुझे बहुत आश्चर्य हुआ। मैंने बताया कि भारत में तो भैंसों को हम लोग पालते हैं, उन पर सवारी करते हैं, और तो और उनका दूध भी पीते हैं। अफ्रीकी गाइड ने फौरन टोका। उसने बताया कि भारत की भैंसें तो पालतू भैंसे अर्थात वॉटर बफैलो हैं। किन्तु अफ्रीका के भैंसे किंग बफैलो अथवा केप बफैलो हैं जो कभी पालतू नहीं बनाए जा सकते और बहुत ही खूंखार होते हैं। मौका पडऩे पर तो ये शेर को भी पछाड़ देते हैं। यह सुनकर इन पशुओं के बारे में मेरी जिज्ञासा बढ़ गई। अफ्रीकी भैंसा या केप भैंसा ये जंगली भैंसे मुख्यत: अफ्रीका के मध्य भाग में (सहारा के दक्षिण तथा दक्षिण अफ्रीका के उत्तर में) पाए जाते हैं। जैसे इथोपिया, सोमालिया, जिम्बाब्वे, नमीबिया, बोत्सवाना, मोज़ाम्बिक, दक्षिण अफ्रीका, केन्या, तथा तंज़ानिया आदि। चरने के लिए ये प्राय: जंगल के आसपास का खुला मैदान पसन्द करते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि अफ्रीकी भैंसे और भारतीय भैंस रंग-रूप, आकार, खानपान तथा बनावट में एक-दूसरे से बहुत मेल खाते हैं, किन्तु वास्तव में ये दो अलग-अलग प्रजाति के जीव हैं जिनका जीव विज्ञान के अनुसार सम्भवत: निकट का सम्बंध नहींं है। इनकी आदतें भी एकदम अलग-अलग होती हैं। जहां भारतीय भैंस सीधी-साधी, शान्त तथा पालने योग्य होती है, वहीं केप भैंसा अत्यंत बलशाली, खूंखार, हिंसक प्रकृति का तथा बदले की भावना से ग्रस्त होता है। अनुमान है कि पूरे विश्व इतिहास में शिकार के दौरान हिंसक पशुओं द्वारा मारे गए सर्वाधिक शिकारी भैंसों के शिकार हुए हैं। इनसे टक्कर लेने की हिम्मत शेर भी नहीं कर पाता। जब भी शेर इनका शिकार करता है तो उसका निशाना केवल बूढ़े, बीमार या छोटे बच्चे या नौसिखिया भैंसे ही होते हैं। अन्यथा ये अपने नुकीले सींगों तथा शक्तिशाली प्रहार से शेर को गम्भीर रूप से घायल कर सकते हैं, मार भी सकते हैं। इस प्रकार अफ्रीकी भैंसे को संसार का सबसे खतरनाक प्राणी माना जा सकता है। किन्तु यदि इन्हें छेड़ा ना जाए तो सामान्यत: ये नुकसान नहीं पहुंचाते तथा रास्ता छोड़कर अन्दर चले जाते हैं।
अफ्रीकी भैंसे का जीव वैज्ञानिक नाम सिन्सेरस काफर है। इसका भार लगभग 750-900 किलोग्राम (नर) तथा 400- 750 किलोग्राम (मादा) होता है। इनकी ऊंचाई लगभग 1.7 मीटर तक होती है। इनके सींग एक मीटर या उससे भी अधिक लंबे हो सकते हैं। नर लगभग 8 वर्षों में तथा मादाएं लगभग 5 वर्षों में युवा हो जाते हैं। लगभग 11 महीने के गर्भ धारण के बाद मादा एक बच्चे को जन्म देती है। इनका जीवन काल 15 से 23 वर्षों का होता है। ये 15-20 से लेकर 300 या अधिक के विशाल समूहों में रहते हैं तथा घास पर अपना गुज़ारा करते हैं।
किसी ज़माने में अफ्रीकी भैंसों का बहुत अधिक शिकार किया गया था, जिसका प्रमुख प्रयोजन शिकारी की बहादुरी का प्रदर्शन हुआ करता था। ये शिकारी लोग भैंसों के विशाल सींगों को अपने ड्राइगं रूम की शोभा बढ़ाने के काम में लाते थे। अब तो इस प्रकार के शिकार पर प्रतिबन्ध है, किन्तु अभी भी चोरी छुपे अफ्रीका में इनका शिकार होता रहता है। इसके अलावा खेती के लिए भूमि का अधिक उपयोग किए जाने के कारण इनके प्राकृतिक वास भी सिकुड़ गए हैं। इन सभी कारणों से अफ्रीकी भैंसों की संख्या काफी कम हो गई है। फिलहाल इसे कम जोखिम (लो रिस्क) श्रेणी के प्राणियों (श्रेणी सी, डी) में रखा जाता है। अफ्रीकी भैंसे को पालतू बनाने तथा उनका समागम घरेलू भैंसों से कराने के प्रयास भी असफल रहे हैं।
भारतीय भैंस
जब हम भारतीय भैंसों की बात करते हैं, तब तो सारा वातावरण ही बदला नजऱ आता है। कहां वे अफ्रीकी खूंखार भैंसे, और कहां ये पालतू, सीधी-सादी जुगाली करती हुई घरेलू भैंसें, जिनकी पीठ पर बैठे-बैठे छोटे बच्चे, उन्हें हांकते हुए ले जाते हैं। लगभग वही शक्ल, वही आकार, वही रंग-रूप किन्तु फिर भी अलग प्रजाति। वास्तव में भारत में रहने वाले किसी ग्रामीण बच्चे को अफ्रीकी भैंसा दिखाया जाए तो संभवत: वह उसकी पीठ थपथपाने को आगे बढ़ जाए और दूसरी तरफ यदि किसी अफ्रीकी वनवासी को भारतीय भैंस दिखाई जाए तो सम्भवत: वह उससे दूर भागने का प्रयास करे। वैसे केप भैंसों तथा घरेलू भैंसों में प्रमुख अन्तर यह होता है कि केप भैंसों के दोनों सींगों की जड़ें सिर पर लगभग जुड़ी रहती हैं, जबकि एशियाई भैंसों में सींगों की जड़ें काफी दूर-दूर होती हैं। वास्तव में भैंसों का मानव के साथ सदियों पुराना नाता रहा है। सम्भवत: मानव ने भैंसों को ईसा से तीन सदी पूर्व पालना शुरू किया था। भारत की भैंस का वैज्ञानिक नाम बुबालिस है, तथा मुख्यत: ये भारत, पाकिस्तान तथा दक्षिण पूर्व एशिया के अनेक देशों से लेकर मिस्र आदि तक पाई जाती हैं। यदि इनकी एक और प्रजाति (जिन्हें दलदली भैंसे कहते हैं) को भी शामिल कर लें तो ये भैंसें इन्डोनशिया, चीन, ताईवान, थाईलैण्ड, मलेशिया, फलीपीन्स, बर्मा वगैरह में भी बहुतायत से पाई जाती हैं। भारतीय भैंस का भार 300-400 से लेकर 700-1200 किलोग्राम तक होता है। इनकी ऊंचाई 1.5 से 1.8 मीटर तक होती है तथा रंग अधिकतर काला (या भूरा) होता है। इनके सींग प्राय: वक्राकार होते हैं, जिनकी लम्बाई एक मीटर तक होती है। इनकी पूंछ लम्बी होती है तथा उसके अन्त में बालों का घना गुच्छा होता है।
भैंस लगभग 18 महीने के बाद युवावस्था को प्राप्त कर लेती है तथा लगभग 10 महीने की गर्भावस्था के पश्चात एक या दो बच्चों को जन्म देती है। इन भैंसों को पानी या कीचड़ बहुत पसन्द है। उत्तर भारत में प्रचलित एक मुहावरे (अब गई भैंस पानी में) का अर्थ है कि यदि भैंस एक बार पानी में चली जाए तो उसे बाहर निकालना बहुत ही कठिन है। पानी में घुसकर तथा कीचड़ में लोटकर यह मच्छरों, पिस्सुओं तथा परजीवियों से अपनी रक्षा करती है। भैंस भारत तथा दक्षिण पूर्व एशियाई देशों का एक लोकप्रिय पशु है, क्योंकि यह कठिन परिस्थितियों को सहने में सक्षम होती है। इन देशों में भैंस को दूध के लिए पाला जाता है। इसके अलावा इनका उपयोग खेती, बोझ ढोने, हल जोतने तथा सवारी, दौड़ आदि के लिए भी किया जाता है। इनकी खाल उत्तम श्रेणी के जूते बनाने के काम आती है। भैंस के मांस को काराबीफ कहते हैं तथा इसमें कम कैलोरी होती है। दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में इसका भी बहुत अधिक उपयोग होता है। अधिक चर्बी के कारण भैंस के दूध से मोजरेला चीज़ का निर्माण किया जाता है। वर्ष 1992 में सम्पूर्ण विश्व में भैंसों की कुल संख्या लगभग 14.8 करोड़ आंकी गई थी। इनमें से 95 प्रतिशत केवल एशिया में थीं। इनकी सबसे अधिक संख्या भारत में (8.2 करोड़) और चीन (2.2 करोड़) थी। पाकिस्तान तीसरे स्थान पर था। भारत की प्रसिद्ध भैंसों में मुर्रा, नीली रावी, जफ़राबादी, सूरती, मेहसाना, कुण्डी, नागपुरी आदि हैं। इनमें सबसे अधिक दूध देने वाली मुर्रा भैंस होती है। वैसे सबसे अधिक प्रचलित तो यहां की देशी भैंस है। भारत में भारतीय बाइसन (अरना भैंसा) नामक जंगली भैंसे की एक प्रजाति पाई जाती है, जिसका वैज्ञानिक नाम बूबलिस है। यह अधिकतर असम तथा देश के अन्य उत्तर-पूर्वी राज्यों, और भूटान व नेपाल में पाया जाता है।
जल भैंसें
दक्षिण-पूर्व एशिया, इन्डोनेशिया, मलेशिया, फिलीपीन्स, म्यांमार, चीन, लाओस, वियतनाम, ताईवान आदि में एक अलग प्रजाति की भैंस पाई जाती है, जिसे दलदली भैंस या स्वैम्प बफैलो कहते हैं। इसका जीव वैज्ञानिक नाम बुबालुस काराबान्सिस है। इसका रंग भूरा, पीठ चौड़ी, तथा सींग सीधे तथा पीछे की ओर फैले होते हैं। ये भैंसें खेती तथा बोझा ढोने के लिए उपयुक्त होती हैं मगर दूध कम देती हैं। इन देशों में भैसों से शारीरिक श्रम का बहुत काम लिया जाता है।
दलदली भैंस
फिलीपीन्स में दलदली भैंस जिसका स्थानीय नाम काराबाओ है - की बहुत महत्ता है तथा इसे वहां का राष्ट्रीय पशु घोषित किया गया है। इसे विभिन्न पर्यटन पुस्तिकाओं, डाक टिकटों तथा प्रचार सामग्री में दर्शाया जाता है। ऑस्ट्रेलिया में भी भैंसें पाई जाती हैं, जो पिछली सदी में बोझा ढोने तथा मांस के लिए आयात की गई थीं। इसके अलावा कई पालतू भैंसें ऑस्ट्रेलिया में पुन: जंगली भैंसों में परिवर्तित हो गई हैं। उत्तरी अफ्रीका तथा पश्चिमी एशिया के देशों (जैसे, ईरान, मिस्र, ट्यूनीशिया आदि) में भी थोड़ी भिन्न प्रकार की जल भैंसें पाई जाती हैं। भैंस का आयात अफ्रीका तथा यूरोप में भी किया गया है। वहां पर इसके पशु फार्म स्थापित किए गए हैं। वर्ष 1978 में अमरीका में लगभग 50 भैंसों का आयात किया गया था। इसके बाद वहां पर कम कैलोरी युक्त मांस तथा मोजरेला चीज़ के उत्पादन के उद्देश्य से इनका प्रजनन कराने का प्रयास किया गया। आजकल अमरीका में लगभग 3500 भैंसें पल रही हैं।
उत्तरी अमरीका में एक और प्रकार का भैंसा पाया जाता है जिसे बाइसन कहते हैं। यह अन्य भैंसों से भिन्न होता है। जीव विज्ञान की भाषा में यह बाइसन (मैदानी भैंसा) तथा अथाबास्क (जंगली भैंसा) कहलाता है। यह एक विशाल प्राणी है, जिसके कन्धों पर एक कूबड़ होता है, सींग छोटे तथा सिर बड़ा होता है। इसकी ऊंचाई 2 मीटर, लम्बाई 2.7 से 3.7 मीटर तथा भार 850 से 1100 किलोग्राम होता है। इसके शरीर पर घने बाल होते है तथा नर के मुंह पर लगभग 30 से.मी. दाढ़ी होती है। यह प्राणी भैंस की बजाय गौवंश का निकट सम्बंधी माना जा सकता है, यद्यपि इसे अमरीका मे भैंसा ही कहते हैं। लगभग 8-9 महीने की गर्भावस्था के पश्चात मादा एक बच्चे को जन्म देती है।
उन्नीसवीं सदी तक अमरीका, कनाडा तथा मेक्सिको में इन प्राणियों के विशाल समूह पाए जाते थे, जिनकी कुल संख्या 6 करोड़ तक आंकी गई थी। किन्तु इनके मांस, खाल तथा अन्य कारणों से इनका अंधाधुन्ध शिकार किया गया जिससे इनकी संख्या में बहुत कमी आई और वर्ष 1839 तक वह घट कर 1000 से भी कम रह गई थी। आज कल संरक्षित क्षेत्रों तथा निजी उद्यानों में इनकी संख्या लगभग दो लाख तक पहुंच गई है। (स्रोत)

नदी है भाषा

- अशोक सिंघई
(1)
भाषा को साधना
उतना ही कठिन है
जितना पोटली में
प्रकाश को बांधना
भाषा के तिलिस्म में
कैद हो गई है कविता
या कविता खुद ही तिलिस्म है
भाषा की.
(2)
भाषा मिट्टी है जिसे रौंदकर
गढ़ता है कवि कुछ नया-नया
 रचता नहीं कवि, मूल है मिट्टी
किसी ने नहीं बनाई आज तक
घनानन्द ने कहा है
 कविता ने रचा है उसे
कविता रचने के अहम् से
कविता द्वारा रचे जाने के
विनय तक की यात्रा है
कवित्व की पहली सीढ़ी
और कविता का आधार
होती है भाषा.
(3)
जंगल में पेड़
चाहे हो किसी भी जाति
गुण-धर्म का झाड़ी हो
या हो फूलों की बेल
बालियां हों धान की
या जीवन सी दूब
सबकी जड़ें मिट्टी में होती हैं.
(4)
पानी थमा तो / सड़ा पानी
पथ हुए पग-विहीन तो / खो गए
मिट जाती है वह संस्कृति/सभ्यता और भाषा
जो बदलती नहीं
सीखती नहीं, सदा चलते रहना.
(5)
बने रहने के लिए
अनिवार्य है गत्यात्मकता
कहा है एक महान् चित्रकार ने
ठहर गया धर्म / खो गया ईश्वर
सो गया राज्य / खो गया इंसान
भाषा मिट्टी है / नदी है भाषा
जो रहती है बनती, जो रहती है बहती.
(6)
ईश्वर के समक्ष पहली उद्घोषणा है भाषा
मनुष्य के नियंता और रचयिता होने की
समूची सृष्टि में अपने श्रेष्ठ होने की.

लाइनमैन की नौकरी

श्याम ट्रेन के लाइनमैन की नौकरी के लिए इन्टरव्यू देने गया।
अफसर : मान लो तुम्हें पता चलता है कि तुम्हारे ट्रेक पर दो रेलगाडिय़ां
विपरीत दिशा से आ रही है और उनमें टक्कर होने वाली है तो तुम क्या करोगे?
श्याम : मैं किसी एक ट्रेन को दूसरी लाइन पर स्विच कर दूंगा।
अफसर : अगर लीवर काम नहीं कर रहा हो तो?
श्याम : तो मैं हाथ से लीवर को खींचने की कोशिश करूंगा।
अफसर : अगर वो भी काम नहीं किया तो?
श्याम : मैं दोनों तरफ़ के स्टेशन मास्टर को खबर करूंगा।
अफसर : अगर फोन भी काम नहीं कर रहा हो तो?
श्याम : मैं लाल कपड़ा लेकर ट्रेक पर खड़ा हो जाऊंगा।
अफसर : अगर उस समय कोई लाल कपड़ा नहीं मिला तो?
श्याम : फिर मैं अपनी बीबी प्रीतो, को बुलाऊंगा।
अफसर: क्यों? क्या वो कोई इन्जीनियर है?
श्याम : नहीं, उसने कभी रेलगाडिय़ों की टक्कर नहीं देखी ना!!

बस, अध्ययन की सुविधा के लिए


बीसवीं सदी में हिंदी व्यंग्य की समृद्ध परंपरा रही है जिसे अंतिम और निर्णायक रूप से परसाई युग माना गया। इस बीते युग ने हिंदी व्यंग्य की जो पुख्ता जमीन तैयार की है उस जमीन पर खड़े रहना भी बाद की पीढ़ी के व्यंग्य लेखकों के लिए एक बड़ी चुनौती है। आज जब इक्कीसवी सदी का एक दशक निकलने को है तब आज के सक्रिय व्यंग्यकारों के लिए लिखने का मतलब है अपनी दमदार पुरखौती के सामने खड़े होना। कविता की ही तरह यह विकट चुनौती व्यंग्य लिखने वालों के सामने भी है। कुछ इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर व्यंग्य का यह स्तंभ '21 वीं सदी के व्यंग्यकार' शुरु किया जा रहा है, जिसमें हम आज के सक्रिय व्यंग्य कर्मियों को लगातार छापने के बहाने व्यंग्य की आगे की संभावनाओं को तलाशने का भी यत्न करेंगे। हर लेखक की रचना हमें चर्चित व्यंग्यकार विनोद साव के सौजन्य से प्राप्त होगी, उनकी अपनी माकूल टिप्पणी के साथ। इसकी दूसरी कड़ी में प्रस्तुत है गौतम सान्याल की व्यंग्य रचना।

बस, अध्ययन की सुविधा के लिए
 - गौतम सान्याल
हिन्दी के आलोचकों को दो भागों में बांटा जा सकता है- धातु और अधातु।
भाई लोग अन्यथा न लें। बस, अध्ययन की सुविधा के लिए। तो दो भागों में बांटा जा सकता है।
 जो धातु हैं, वे प्राय: चमकीले और कीमती हुआ करते हैं। ये छूते ही टन्न से बोलते हैं। ये ताप और विद्युत के सुचालक हुआ करते हैं। दूसरों की ऊर्जा दूसरों तक पहुंचाने में इनका जवाब नहीं। कभी-कभी ये आपस में लड़कर फ्यूज उड़ा देते हैं, जैसा कि पिछले दिनों नई कहानी को लेकर हुआ।
धातु साधारणत: ठोस और कठोर हुआ करती है। कौन कितना कठोर है, इसे मोह जला की खुरचाऊ विधि से परखा जाता है। उदाहरण के लिए अगर दिल्ली का धातु 'क' भोपाल का धातु 'ख' को खुरच देता है तो देश की असंख्य लिटमैग प्रयोगशालाओं व प्रेस क्लबों में 'क' धातु 'ख' की तुलना में अधिक घनत्व की मान ली जाती है। ध्यान रहे कि इन लिटमैग कार्यशालाओं में ही अधिकतर स्क्रैप, चिप्स या चूरन खपते हैं। संक्षेप में- जो धातु जितनी खुरचाऊ है, वह उतनी ही ठोस मान ली जाती है।
धातुओं में लौह प्रकार सबसे ज्यादा पाया जाता है। इनमें से जो कीलें या बटखरे बनते हैं, उनकी हालत सबसे टै्रजिक होती है। अक्सर कीलों को दूरदर्शन या आकाशवाणी की किसी दीवार पर ठोंककर उस पर देश के महान नेताओं के चित्र टांग दिए जाते हैं। जब कमरों की पुताई होती है तब चित्रों को उतार
लेने के बाद कीलों को उखाड़कर बाहर फेंक दिया जाता है और गड्ढों में डिटो फिक्स भर दिया जाता है। फिर पुताई के बाद पता ही नहीं चलता कि वहां कोई गड्ढा था। बाहर फेंक दिए गए कीलों में जंग लग जाता है। तब ये कीलें घातक हो जाती है और अपने अंदर टिटनेस के अदृश्य जीवाणु संजोए सदैव किसी नंगे पैर की ताक में रहती हैं। जो बटखरे बनते हैं, वे अपने वजन से हल्के हो जाते हैं। दिल्ली में मैंने ऐसे कई बटखरे देखे जो अपने वजन से हल्के थे। हुआ यह है कि सेठजी ने इनके पीछे का मोम निकालकर इनको पीछे से ही घिस डाला है।
ये अक्सर तीन-पांच वाली कथा शिविरों की तराजू में चढ़ते हैं और आम पाठकों को भरमाते हैं। संक्षेप में, इन्हें चोरबट्टा कहा जा सकता है।
जो धातु जितनी कीमती होती है, वह उतनी ही लचीली होती है और उसके उतने ही लंबे सूक्ष्म तार खींचे जा सकते हैं। लेकिन तन्यता- सामथ्र्य से अधिक खिंच जाने पर ये टूट जाते हैं। आपको पिछला पूर्वाग्रह-प्रसंग याद होगा, भोपाल से सुदूर यूरोप तक और फिर फटाक।
एक धातु प्लेटिनम भी है जो अत्यंत चमकीली और कीमती होती है, किन्तु साधारणत: दिखती नहीं है। मैंने प्लेटिनम को कभी नहीं देखा है। प्लेटिनम मोटे-मोटे और जटिल-तकनीकी उत्पादन के काम आता है। उदाहरण के लिए, 'भारत के भाषा परिवार और हिंदी या 'माक्र्सवाद और पिछड़े हुए समाज' जैसा उत्पादन।
जो टीन हैं, उनके कनस्तर-डिब्बे आदि बनाए जाते हैं। ये खाली होने पर ठनठन और घी भर देने पर भद्भद् बजते हैं। ये दबाने पर पिचक जाते हैं। टीन विज्ञापित साज-सज्जा से युक्त होने पर आकर्षक हो उठते हैं। पैकिंग के बाद इन पर एगमार्क दाग दिया जाता है। डिब्बों पर एहतियात के तौर पर मेन्यूफैक्चरिंग और एक्सपायरी डेट साफ-साफ लिखी होती है। मजे की बात तो यह है कि ये डे्टस माल के संदर्भ में होते हैं, जिनके साथ टीनों की किस्मत जुड़ जाती है।
आजकल पीतल कम दिखते हैं। राष्ट्रपति के अंगरक्षकों की वर्दियों में, हकीम-हुक्काम के यहां पानदान, पीकदान या मंदिरों में दीपथाल-घंटाल-ये आज के जीवन में यदाकदा लुकपुकाते है। गांधी जी के जमाने के तमाम पीतल कहां लुप्त हो गए, यह शोध का विषय हो सकता है। कई पीतल हिंदी एकादमी, हिंदी प्रचारक संस्थान आदि के गेट पर बेबस ताले की शक्ल में देखे जा सकते हैं, जिनकी चाबी गुम हो गई है। पीतल के महाकाय भोंपू भी बनाए जाते हैं जो कि लंबी बैंड के पीछे की परित्यक्त-सी पंक्तियों में किन्ही कन्धों पर होता है और रुक-रुककर भों-भों बजता है। पीतलों का सबसे बड़ा नस्ली दोष यह है कि कुछ दिनों बाद ये द्युतिहीन हो जाते हैं। तब इन्हें चमत्कृत करने के लिए राख, इमली, ब्रासो इत्यादि से रगड़कर चमकाना पड़ता है।
कुछ धातुओं के सिक्के बनाए जाते हैं। जहां ये बनते हैं, उसे टकसाल कहा जाता है। देश के कुछ प्रमुख टकसाल इन स्थलों पर हैं- बहादुरशाह जफर मार्ग, नई दिल्ली, दादा भाई नौरोजी रोड, बंबई, प्र्रफुल्ल सरकार स्ट्रीट, कलकत्ता, दरियागंज नई दिल्ली आदि। यहां के ढाले गए संविधान-सम्मत सिक्के देश-भर में चलते हैं। सिक्के तो बस वित्तीय संकेत हैं, जिसके दो पहलू हैं- सिक्कों के एक तरफ 'सत्यमेव जयते' तो दूसरी तरफ 'इति असत्या' अर्थात मूल्य अंकित होता है जो कि सिक्कों के धातव मूल्य से सदैव अधिक हुआ करता है। सिक्कों को कुछ दिनों तक बाजार में चलाने के बाद वापस ले लिया जाता है और तब इन्हें गला दिया जाता है।
अधातु, ठोस, तरल व गैस- तीनों रूप में पाए जाते हैं। जो ठोस हैं, वे भंगुर होते हैं और हथौड़े से पीटने पर चकनाचूर हो जाते हैं। इस प्रकार की अधातु के सबसे अच्छे नमूने विश्वविद्यालयों में देखे जा सकते हैं। ठोस प्रकार की अधातु का घनत्व कम होता है। अधातु का संसार कार्बनमय है। इनमें विरल किस्म की अधातु जैसे कि हीरा इत्यादि यदाकदा दिखता है, लेकिन अधिकतर तो सब कोयला, ग्रेफाइट या चूना ही है। वैसे तो हीरा भी कार्बन का एक संशोधित रूप ही है।
तरल प्रकार की अधातुओं का अपना कोई निश्चित आकार नहीं हुआ करता। बर्तन बदलते ही ये झट से अपनी आकृति बदल लेते हैं, लेकिन इनका आयतन वही रहता है। गर्म करने पर ये गैस में परिणत होकर गायब हो जाते हैं। प्रत्येक तरल प्रकार की अधातु का गायबांक अलग-अलग होता है जोकि इनकी विशिष्ट पहचान है। उच्च-गायबांक वाले अधातु के विशिष्ट नमूने सरकारी संस्थानों में देखे जा सकते हैं। निम्न गायबांक वाले अधातु का प्रमुख विचरण-क्षेत्र प्रतिष्ठित पत्रिकाओं की डेढ़ पेजी पुस्तकीय-समीक्षा के कालम हैं।
गैस प्रकार की अधातु बड़ी बेचैन और फुसफुस हुआ करती है। इनका न तो कोई निश्चित आकार होता है और न ही कोई निश्चित आयतन। इनमें से कई भारी होती हैं तो कई हल्की, कई गंधाती है तो कई गंधहीन हुआ करती है। प्रतिक्रिया के आधार पर इन्हें दो भागों में बांटा जा सकता है- सक्रिय और निष्क्रिय गैसें। सक्रिय प्रकार की गैसों की प्रतिक्रिया- पद्धति के लिए एक उदाहरण पर्याप्त होगा। आपको पिछले दिनों का 'कामरेड का कोट' प्रसंग शायद याद हो कि बहस बड़ी बेचैनी से कहानी से पैदा हुई कि कहानी से बाहर चली गई और लौटकर कहानी में अभी तक वापस नहीं आई। कहानी वैसे भी काफी गैसयुक्त थी।
निष्क्रिय प्रकार की गैसें गांधी-टोपी पहनती हैं और रामधुन गाती हैं। ये इस देश और इस काल में रहती हुई एस्किमोज के इगलू के दरवाजों की डिजाइन या कि शिवशिष्य भंगोड़े नदी-भृंगी की लंगोट के कपड़ों की क्वालिटी जैसी महान् समस्याओं में उलझी रहती है। इनमें से कुछेक इस वायुमंडल में बस, यूं ही रहती हैं और उदास दंडायन की भांति सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरणें सोखती रहती हैं। उदाहरण के लिए - विनम्र निवेदन है कि इन पंक्तियों के लेखक को देखें।
कुछ हैं - जो धातु हैं न अधातु। ये इधर-उधर डोलते रहते हैं। ये धातु की तरह चमकदार और अधातु की तरह तरल होते हैं, जैसे पारा, जैसे जादुई यथार्थवादी। अब अधिक और क्या कहें, बाकी आप समझदार हैं।
संपर्क - विभागाध्यक्ष (हिंदी विभाग), बध्र्दमान विश्वविद्यालय गुलाब बाग, बध्र्दमान (प. बंगाल) मो. 09434182184
गौतम सान्याल
गौतम सान्याल कम लिखते हैं पर बहुत कुछ लिखते हैं। वे व्यंग्य के अतिरिक्त कहानी और आलोचना में भी दखल रखते हैं। यद्यपि उन पर भ्रमित होने का आरोप लगता है पर वे जहां भी होते हैं अपने पूरे वजूद में होते हैं। गौतम सान्याल की व्यंग्य रचनाएं व्यंग्य के परम्परागत शिल्प को तोड़ती हैं। व्यंग्य लिखते समय उनके विषय का चुनाव भी व्यंग्य के चिरपरिचित मसाले और उनकी गंध से अलग आस्वाद देते हैं। अपनी अलग खुशबू बिखेरते हैं। गौतम जितना लिखते हैं उससे कई गुना ज्यादा वे पढ़ते है। वे अपनी तीन मातृ भाषाएं बतलाते हैं - बंाग्ला, भोजपुरी और हिंदी.. और उनकी रचनाओं में इन तीनों भाषाओं की विरासत की अनुगूंज को देखा जा सकता है। वे साठोत्तर हिंदी बांग्ला कहानियों पर शोधरत भी हैं। अपनी रचनाओं में उनमें हास्य पैदा करने की भी अद्भुत क्षमता है। परिहास की नई नई भंगिमाओं के जरिये वे अपनी रचना के रस में पाठक को डुबोए रखते हैं। अमूमन व्यंग्य की तल्खी उसके लिखने वाले के व्यवहार में भी दीख जाती है.. पर गौतम आहिस्ता बोलते हुए और शालीन दिखते हुए बड़ी विनम्रता से व्यंग्य कर जाते हैं। उनमें बांग्ला बौद्घिक पन है। यहां प्रस्तुत है उनकी एक व्यंग्य रचना 'बस, अध्ययन की सुविधा के लिए' जिसमें खेमेबंदी करने और उछाड़-पछाड़ में लिप्त आलोचकों पर निशाना साधा गया है। यह रचना विनोद कुमार शुक्ल की कहानी 'गोष्ठी' की याद दिलाती है।