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Aug 1, 2026

चार लघुकथाएँ

 - स्नेह गोस्वामी

1. काम

दफ़्तर में पैर रखते हुए उसे घबराहट हो रही थी। पता नहीं ऑफिसर कैसा होगा। बात सुनेगा भी या बाहर से ही भगा देगा। काम हो भी जाएगा या डाँट ही मिलेगी। इन्हीं चिंताओं में वह दफ़्तर में काग़ज़ हाथ में पकड़कर खड़ी थी। पति की मौत के बाद पेंशन के पेपर जमा करने थे पर हर बार आकर भी अंदर जाने की हिम्मत ही नहीं हो रही थी। उसकी परेशानी देख एक क्लर्क को आखिर दया आ गई।

“जी बहन जी! क्या काम था? आप कबसे यहाँ खड़ी हैं?”

उसने बिना बोले काग़ज़ आगे बढ़ा दिए। मन में सोचा- ये कौन है? पता नहीं काम करवाने के कितने पैसे माँग लेगा। पता नहीं काम करवाएगा भी या चक्कर ही कटवाएगा? ऐसा ही कितना कुछ सोच गई वे एक मिनट में।

क्लर्क ने काग़ज़ देख लिए थे। “बस इतना ही काम है? हो जाएगा जी। आप ये सब मेरे पास छोड़ जाइए। मैं ख़ुद करवा दूँगा, आपको आने की ज़रूरत नहीं है बस यहाँ साइन कर दीजिए।”

उसने अविश्वास से देखा था, “पैसे कितने देने पड़ेंगे?”

“पैसे कैसे? कोई पैसा नहीं।” वह हँस पड़ा, “मुझे कोई पैसा नहीं चाहिए बहन जी। बस आपका काम हो जाए। जब हो गया तो आपको फोन कर दूँगा। आप निश्चिंत होकर घर जाइए।”

उसके मन से दुआएँ निकली थी। लोग झूठ ही डरा रहे थे, या फिर शायद सभी लोग एक जैसे नहीं होते। उसने साइन करके काग़ज़ पकड़ा दिए थे।

2. कोशिश

सास और जेठानियों के सितम सहते हुए उसने हर बार अपने-आप से वादा किया था कि वह अपनी बहू को बेटी से ज़्यादा प्यार देगी।
बेटे की शादी में उसने अपनी सारी फ़िक्स डिपॉज़िट तुड़वाकर बहू के लिए कपड़े और गहने बनवाए थे। सौ तरह के शगुन किए थे। हर रस्म चाव से पूरी की। रसोई की शक्ल तो दो महीने नहीं देखने दी।
बहू को अंदर बेड पर लेटे देख उसने बड़े लाड़ से पूछा,
“बेटे ठीक है न। कुछ दुख तो नहीं रहा।”
वह चौंककर उठकर बैठ गई,“नहीं मम्मी जी।”
उससे रहा नहीं गया। तुलसी, लौंग और इलायची डालकर चाय बनाई और बहू को देने के लिए गई। अंदर बहू पता नहीं किस सहेली से बता रही थी,“इतनी मीठी बातें करती हैं कि पूछ मत। पक्का कोई तगड़ा प्लान बना रही है वरना सास ऐसी… मुझे तो डर लग रहा है।”
सुनकर एक बार तो पाँव वही अटक गए। फिर सोचा कि इतने सालों से सैकड़ों सच्ची- झूठी कहानियों के चलते सदियों से मन पर जमी बर्फ़ इतनी आसानी से कहाँ पिघलने वाली है। वह कप लेकर अंदर आ गई थी, ग़लतफ़हमी दूर करने के लिए।

3. कोटा

“सुधा! ओ सुधा!”
दरवाज़े पर मिश्रा की आवाज़ सुनते ही सुधा हिलक उठी और दरवाज़ा खोलने भागी। बाहर सत्यनारायण मिश्रा ही थे। उसने वहीं से पुकारा,
“माँ... माँ! अंकल आए हैं।”
दुर्गा ने सिर पर आँचल धर कैलेंडर में छपे बाँसुरी बजाते कृष्ण को हाथ जोड़ सिर नवाया।
“तूने आज सुन ली। सच कहते हैं, ईश्वर के घर देर है, अँधेर नहीं।”
उसने एक बार फिर माथा झुकाया और प्लेट में मिठाई सजा ड्राइंगरूम में आई,“लो भैया मुँह मीठा करो।”
“नहीं नहीं बेनजी इसकी ज़रूरत न ....”
“ऐसा कैसे, लो भैया बरफी लो।”
“मैं तो कहने आया था...”
“हमें तो पहले ही पता था भाई साहब। आपके होते सौरभ को नौकरी न मिले ऐसा कैसे हो सकता है।”
“लेकिन बहनजी....”
“हमें तो जिस दिन पता चला था, आपके जीजाजी इंटरव्यू कमेटी के मैंबर हो गए हैं, मैंने सौरभ को कह दिया था कि अब तू चिंता मत करै। तेरे फूफा बएठेंगे इंटरव्यू में, बस तू अपनी 
तैयारी कर।” वह अपनी ही रौ में बोले जा रही थी कि उसका 
ध्यान परेशान से मिश्रा के चेहरे पर गया।
“क्या हुआ?“
“आपका काम नहीं हुआ भाभी। मैं इतनी देर से कहने की कोशिश कर रहा था।”
“आपके जीजा ...बोर्ड में...”
“बोर्ड में ही थे भाभी, पर दो ही पोस्ट की सैंक्शन आई लास्ट में। एक तो अपने शिक्षामंत्री के बेटे को मिलनी ही थी, दूसरी के लिए था जीजा का भतीजा ..“
“तो क्या सौरभ के एम.बी.ए.. के अस्सी प्रतिशत कम थे? एक क्लर्क की नौकरी भी नहीं?” मिठाई की प्लेट हाथ से छूटकर नीचे बिखर गई थी।
“ऐसा नहीं भाभी, दो महीने बाद फिर निकलेंगी न नौकरी।” कहते-कहते मिश्रा उठकर दहलीज़ पार कर गए।

4. कथा चलती रहे

चेले ने संदूक़ में झाँका तो ख़ुशी से उछल पड़ा,
“गुरुजी इतनी पोथियाँ? वो भी इस ट्रंक में ताला मार के।”
उसने जल्दी-जल्दी पोथियाँ प्रवचन हॉल के कोने में पड़ी मेज़ पर सजानी शुरू कर दीं।
“ओए नालायक! ये क्या कर रहा है? धंधा बंद कराएगा क्या?”
“वो कैसे जी?”
“गधे! जब तक हम ये पोथियाँ अपने हिसाब से पढ़कर सुना रहे हैं, तभी तक लोग आ रहे हैं। जिस दिन लोगों ने ये किताबें पढ़ लीं, उसी दिन यहाँ आना-जाना छोड़ देंगे इसलिए इन पढ़े-लिखे लोगों को अनपढ़ ही रहने दे।”
चेले ने फटाफट सारे पोथियाँ संदूक़ में बंद कर दीं और माईक सेट करने लग गया।

11 comments:

  1. Anonymous03 August

    सभी लघुकथाएं समसामयिक और सराहनीय हैं. -रीता प्रसाद

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  2. Anonymous12 August

    चारों लघुकथाएँ बहुत सुंदर और समसामयिक हैं । स्नेह गोस्वामीजी को सादर नमन। सुदर्शन रत्नाकर

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  3. Anonymous18 August

    चारों लघुकथा बहुत सुंदर लिखी हैं। वर्तमान समाज का आईना है। भाषा भी सहज सरल है। कुछ किरदार फिल्मों द्वारा इतने नकारात्मक दिखाये जाते हैं जैसे सास का, नई दुल्हन मन में डर और आशंका लिए रहती है। जबकि हाथ की पांचों अंगुली बराबर नहीं होती।

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  4. Anonymous18 August



    लघु कथा समीक्षा: "काम" - लेखिका: स्नेह गोस्वामी

    पति की मृत्यु के बाद पेंशन के लिए दफ़्तर के चक्कर काट रही एक विधवा महिला की लघु कथा है "काम"। दफ़्तर के डर, अफसर की डाँट, दलालों के पैसे मांगने के डर से वो कई बार काग़ज़ लेकर लौट जाती है। पर एक दिन एक क्लर्क की छोटी सी मदद और बिना पैसे लिए काम करने की बात उसके सारे डर तोड़ देती है।

    भाषा बहुत सरल, सहज और आम बोलचाल की है। की भारी-भरकम शब्द नहीं। बिल्कुल ऐसा लगता है जैसे कोई अपने पास बैठकर किस्सा सुना रहा हो। संवाद बहुत स्वाभाविक हैं - "पैसे कितने देने पड़ेंगे?" ये एक लाइन ही समाज की सच्चाई दिखा देती है।

    डरी हुई, असहाय, पर उम्मीद न छोड़ने वाली महिला हर विधवा का प्रतिनिधित्व करती है।
    क्लर्क लघु कथा का हीरो। वो दिखाता है कि सिस्टम में भी इंसानियत बाकी है। लालच के इस जमाने में "कोई पैसा नहीं" कहना सबसे बड़ा आदर्श है।


    इस लघु कथा की सबसे बड़ी ताकत इसकी "सच्चाई" है। ये कोई काल्पनिक किस्सा नहीं लगता। हर छोटे शहर, हर दफ़्तर में ऐसी 10 महिलाएं मिल जाएंगी। लेखिका ने सरकारी दफ़्तरों के डर को बहुत अच्छे से दिखाया है। और साथ में ये भी बताया कि एक अच्छा इंसान पूरी व्यवस्था का चेहरा बदल सकता है।


    लघु कथा अंत में उपदेश नहीं देती, पर संदेश बहुत बड़ा देती है:
    "सभी लोग एक जैसे नहीं होते।"
    डर के मारे काम टालने से बेहतर है हिम्मत करके एक बार पूछ लेना। और जो सक्षम हैं उन्हें असहायों की मदद करनी चाहिए।




    "काम" छोटी लघु कथा है पर असर बहुत बड़ा छोड़ती है। ये हमें शर्मिंदा भी करती है और उम्मीद भी देती है। शर्म इस बात की कि हमने सिस्टम को इतना डरावना बना दिया है। और उम्मीद इस बात की कि अभी भी कुछ लोग बिना स्वार्थ के जी रहे हैं।

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    समीक्षा: "कोशिश"


    ये लघु कथा एक ऐसी सास की है जिसने खुद सास-जेठानी का जुल्म सहा था। इसलिए उसने ठाना कि वो अपनी बहू को बेटी बनाएगी। FD तुड़वा दी, रसोई नहीं करने दी, लाड़ से चाय बनाकर ले गई। पर बदले में उसे मिली बहू की पीठ पीछे की बात - "पक्का कोई प्लान बना रही है"।


    "सदियों से मन पर जमी बर्फ़" - ये एक लाइन पूरी लघु कथा समझा देती है। सास-बहू के बीच अविश्वास सदियों पुराना है। एक दिन की मोहब्बत से नहीं पिघलेगा।
    संवाद बिल्कुल रियल हैं। "मम्मी जी" से लेकर सहेली वाली बात तक।


    सास: पीड़िता से मुक्तिदाता बनना चाहती है। पर समाज ने उसे "खलनायिका" का टैग दे रखा है।
    बहू डरी हुई, शक्की। उसे प्यार पर भी यकीन नहीं। इसमें उसकी गलती नहीं, समाज की पाली हुई सोच है।


    लघु कथा का नाम "कोशिश" बहुत सटीक है। रिश्ते एक दिन में नहीं बनते। सास को "कोशिश" करनी होगी और बहू को भी "भरोसा" करने की कोशिश।
    गलतफहमी एक कप चाय से नहीं, कई कप चाय से दूर होगी।



    "कोशिश" आईना है। ये न सास को गलत कहती है न बहू को। ये कहती है कि नफरत की विरासत को प्यार की विरासत से तोड़ना पड़ेगा। और वो तोड़ने वाली "कोशिश" करनी पड़ेगी।
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    समीक्षक डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली


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  5. Anonymous18 August

    कोटा" नाम सुनकर लगता है आरक्षण की बात होगी, पर लघु कथा का वार सीधा "सिफारिश और भ्रष्टाचार" पर है। एक मां दुर्गा अपने बेटे सौरभ की नौकरी के लिए खुशी से मिठाई लेकर बैठी है क्योंकि "जीजाजी इंटरव्यू कमेटी में हैं"। पर सच्चाई ये है कि 2 पोस्ट में से एक मंत्री के बेटे को और दूसरी जीजा के भतीजे को मिली। एम.बी.ए. 80% वाला सौरभ लायक होते हुए भी रह गया।


    लेखिका ने बहुत नाटकीय तरीके से सच दिखाया है। शुरुआत में "ईश्वर के घर देर है अंधेर नहीं" वाली खुशी, और अंत में "मिठाई की प्लेट हाथ से छूटकर बिखर जाना" - ये एक दृश्य में पूरा सिस्टम गिरा देता है।
    संवाद बहुत तीखे हैं। "तेरे फूफा बैठेंगे इंटरव्यू में" लाइन आम घरों की सच्चाई है।

    दुर्गा: हर उस मां का चेहरा है जो सोचती है "जान-पहचान" से बेटे का भविष्य बन जाएगा। उसकी खुशी और टूटना दोनों एक साथ आते हैं।
    मिश्रा जी:मजबूर सिस्टम का हिस्सा। वो सच बताने आए हैं पर बता नहीं पा रहे।
    लघु कथा बताती है कि "कोटा" के नाम पर असली लूट "कोटा-सिफारिश" की होती है। गरीब, बिना जान-पहचान वाला मेरिट वाला बच्चा सबसे पहले कटता है।


    "कोटा" शब्द यहां दोहरा अर्थ रखता है। एक सरकारी आरक्षण, दूसरा "नेताओं-अफसरों का अपना कोटा"। लेखिका ने बिना नाम लिए बहुत बड़ा तंज कसा है।
    लघु कथा अंत में उपदेश नहीं देती, चोट करती है। सीख यही है:
    मेहनत + डिग्री काफी नहीं। सिस्टम में जगह बनानी हो तो या तो पावर चाहिए या सिफारिश।"
    "मिठाई का बिखर जाना" इस देश के लाखों सौरभों के सपनों का बिखरना है।

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    लघु लेख समीक्षा: "कथा चलती रहे"


    नाम में "कथा" और अंदर "पोथियों पर ताला"। ये लघु कथा धर्म, प्रवचन और गुरु-चेले के नाम पर चल रहे धंधे पर करारा तंज है। चेला खुशी से पोथियाँ निकालता है कि लोग पढ़ें, पर गुरु डांटकर कहता है - "इन पढ़े-लिखे लोगों को अनपढ़ ही रहने दे। जिस दिन इन्होंने खुद पढ़ लिया, हमारा धंधा बंद।"


    "धंधा बंद कराएगा क्या?" - ये एक लाइन पूरी व्यवस्था का सच खोल देती है।
    भाषा तीखी, व्यंग्यात्मक और बिना लाग-लपेट की है। संवाद ही पूरी कहानी है।


    पोथियाँ/संदूक: ज्ञान है जो बंद करके रखा गया है।
    गुरु:वो लोग जो ज्ञान के ठेकेदार बनकर बैठे हैं।
    चेला: भोली जनता जो सोचती है गुरु ज्ञान दे रहे हैं।
    शीर्षक "कथा चलती रहे" व्यंग्य है। कथा इसलिए चलती रहे ताकि "धंधा" चलता रहे।

    ये लघु कथा आज के समय में 100% खरी उतरती है। हर क्षेत्र में यही हो रहा है - शिक्षा, धर्म, राजनीति। लोग खुद पढ़-समझ लें तो "बीच के दलाल" बेकार हो जाएंगे। इसलिए जानबूझकर भ्रम, अंधविश्वास और "बस सुनो, सवाल मत करो" वाली सोच पाली जाती है।


    ज्ञान बांटने से बढ़ता है, बंद करने से धंधा चलता है।"
    पढ़ो, सवाल करो, खुद समझो। वरना कोई न कोई तुम्हारे लिए "पोथी पर ताला" लगा देगा।

    लघु कथा पढ़कर झटका लगता है और हंसी भी आती है। यही एक अच्छी व्यंग्य कथा की पहचान है।

    समीक्षक डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली

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  6. चारों कथाएं एक से बढ़कर एक हैं। सामाजिक सरोकार की कथाएं हैं सभी। सरकारी दफ़्तरो की बदनामी इतनी हो चुकी है कि आसानी से किसी पर विश्वास नहीं नहीं हो पाता। वही स्थिति परिवार में रिश्तों की है सास बहू का रिश्ता इतना बदनाम कर दिया है कि आपस में एक दूसरे का भरोसा नहीं होता। बहुत बधाई स्नेह जी इन बेहतरीन लघुकथाओं के लिए

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  7. चारों ही लघुकथाएं गंभीर कटाक्ष से भरी हैं। समाज की अनीति को कहती हैँ।
    किसी अच्छाई से भी विश्वास का डिग जाना दुर्भाग्य और पीड़ादायी स्थिति का चित्र है, चाहे वह दफ्तर का चपरासी हो या सास बहुत का बदनाम रिश्ता उफ़!
    पोथियां वाकई संदूक में रखी गई हैं हमेशा।कोटा कथाभी एक कड़वी सच्चाई है।
    बहुत बधाई साधुवाद लेखिका को

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  8. 'कोटा' और 'पोथियाँ' यथार्थ का चित्रण करती प्रभावी लघुकथाएँ हैं, एक भ्रष्टाचार का चिर परिचित चेहरा सामने लाती है, वहीं दूसरी धर्म के फलने-फूलने के लिए अनपढ़ बनाए रखने की साज़िश को बेनक़ाब करती है। इन दोनो लघुकथाओं की तुलना में 'काम' और कोशिश लघुकथाएँ अधिक प्रभावी लगीं क्योंकि दोनो ही अंधेरे में प्रकाश की किरणों की भाँति आश्वस्त करती हैं कि समाज में अच्छाई बाकी है। लेखिका को बहुत बहुत बधाई।

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  9. चारों लघुकथाएं बहुत अच्छी हैं।समसामयिक और यथार्थ का चित्रण करती हुई।

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  10. लाजवाब लघुकथाएँ

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  11. Shashi Padha20 August

    समसामयिक लघुकथाएँ हैं और सच को उजागर करती हुईं । बधाई लेखिका को ।

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