- रमेश कुमार सोनी
लोगों की दुनिया
आज सिमटी हुई है-
दड़बों जैसे फ्लैटनुमा मकानों में
जहाँ से उसकी दौड़
कार्यालयों तक में खप जाती है
संचार उपकरणों के साथ
झुंझलाकर लौटता है वह
बाज़ार की महँगाई को कोसते हुए।
थक गया है वह
इसी चकरघिन्नी- सी दौड़ में
और फँस चुका है
नमक,शक्कर और दिल के रोगों से,
इ एम आई की दौड़
बहुत थका चुकी है-शहरों को
लोग अब तलाश में है-
अमराई की छाँव और
माँ के आशीर्वाद की।
रिश्तों की पाठशाला में भी
अब उसके नाम की
नारियल भी कोई बाँधता नहीं
डराता है उसे समाचारों का मकड़जाल
वह सत्य की खोज में निकलना चाहता है
बुद्ध बनने की राह में
लेकिन जिम्मेदारियों का झोला
उसका बेताल हो चुका है।
लोग कुछ और हैं और
बनना कुछ और चाहते हैं लेकिन
दिखना कुछ और के साथ जी रहे हैं
यस सर और यस मैडम के साथ
ख़त्म हो जाती है उनकी दुनिया एक दिन
श्मशान प्रतीक्षा में है सदा से
इस ख़त्म होती दुनिया में,
उन चार लोगों की भीड़ लौट रही है
कुछ ज़रूरी फाइल निपटाने।

हृदयस्पर्शी कविता
ReplyDeleteसमसामयिक मर्मस्पर्शी कविता। सुदर्शन रत्नाकर
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