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Aug 1, 2026

शौर्यः सिपाही बबलू सिंह - सेना मेडल (मरणोपरांत)

   - हरी राम यादव, सूबेदार मेजर (ऑनरेरी)

वीरता शब्द मनोभावों की वह पराकाष्ठा है जिसके आगे दुनिया का हर बल बौना हो जाता है । इस मनोभाव के पैदा होते ही सामने खड़े प्रतिद्वंद्वी की शक्ति, साहस सब कम पड़ जाते हैं, हर वह शक्ति क्षीण हो जाती है जो स्वयं को शक्तिशाली समझती है । इस मनोभाव से आच्छादित व्यक्ति एकाएक इतना बलशाली हो उठता है कि उसके सामने खड़ा पहाड़ भी कम्पित हो उठता है, वह उसके मनोभावों को आँखों में देखकर थर्रा उठता है । आज कृष्णनगरी के एक ऐसे ही योद्धा का वीरगति दिवस है, जिन्होंने अपने साहस और वीरता के बल पर एक अमित वीरगाथा लिखी , जिसे आने वाली पीढ़ियों को जानना चाहिए ।

वर्ष 2016 में सिपाही बबलू सिंह 61 राष्ट्रीय राइफल्स में तैनात थे और 61 राष्ट्रीय राइफल्स जम्मू और कश्मीर के आतंकवाद प्रभावित क्षेत्रों में आतंकवाद-विरोधी अभियानों में लगी हुई थी। 29/30 जुलाई 2016 की रात में नौगाम सेक्टर में आतंकवादियों द्वारा सीमा पर कर भारतीय इलाके में घुसने की कोशिश की गई थी। 61 राष्ट्रीय राइफल्स  की टुकड़ियाँ पहले से सतर्क थीं । । 30 जुलाई 2016 को लगभग 0030 बजे, नायक बिजेंद्र सिंह और सिपाही विशाल चौधरी एंटी-इंफिल्ट्रेशन ऑब्स्टिकल सिस्टम के साथ गश्त कर रहे थे।  आतंकवादियों ने इस गश्ती दल पर फायरिंग की। इस गश्ती दल पर फायरिंग के बाद  सिपाही  बबलू सिंह और नायक राकेंद्र सिंह को गश्ती दल की सहायता  के लिए एम्बुश इलाके में भेजा गया।

इसी बीच एक आतंकवादी आड़ में बड़े पत्थरों के पीछे छिप गया। सिपाही बबलू सिंह उस आतंकवादी को खोजते हुए दूसरे आतंकवादी के सामने आ गए ।  लगभग 15 मीटर की दूरी से उस आतंकवादी ने उन पर फायर कर दिया, जिससे वह  गंभीर रूप से घायल हो गए।  घायल होने के बावजूद, सिपाही बबलू सिंह ने साहस और वीरता का प्रदर्शन करते हुए जवाबी कार्रवाई की और आतंकवादी को मार गिराया  । घाव गहरा होने और तेजी से होते रक्तस्राव के कारण वह वीरगति को प्राप्त  हो गए। सिपाही बबलू सिंह ने 29 साल की उम्र में अपने कर्तव्यों को सर्वोपरि रखते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया । उनकी असाधारण वीरता और साहस के लिए उन्हें मरणोपरांत  'सेना मेडल' से सम्मानित किया गया।

सिपाही बबलू सिंह का जन्म कृष्ण नगरी मथुरा की सदर तहसील के फरह ब्लॉक के गांव झंडीपुर में 10 जुलाई 1987 को श्रीमती मुन्नी देवी और  श्री मलूक सिंह के यहाँ हुआ था । उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा दीन पब्लिक स्कूल से पूरी की और हाई स्कूल की शिक्षा  जवाहर इंटर कॉलेज और  इंटर की शिक्षा सेठ प्रेम सुखदास भगत इंटर कॉलेज से पूरी की ।  18 साल की उम्र में सन 2005 में सेना की जाट रेजिमेंट में भर्ती हो गए । प्रशिक्षण के पश्चात  18 जाट रेजिमेंट में तैनात  हुए ।  लगभग 11 साल की सेवा पूरी करने के पश्चात वह सन  2016 में  61 राष्ट्रीय राइफल्स  में तैनात हुए। ।  सिपाही बबलू सिंह के परिवार में उनके माता पिता के अलावा उनके चार  भाई - श्री निर्भय सिंह, श्री हरिओम सिंह और चौधरी सतीश सिंह और एक बहन श्रीमती अंजना सिंह , उनकी पत्नी श्रीमती रविता देवी, बेटी गरिमा चौधरी और बेटे द्रोण चौधरी हैं।

सिपाही बबलू सिंह की याद में उनके गांव में एक स्मारक का निर्माण किया गया है, जिसमें उनकी  प्रतिमा स्थापित की गयी है । इस स्मारक की सबसे खास बात यह है कि इस स्मारक के ठीक सामने टी – 55  टैंक (वॉर ट्राफी) स्थापित किया गया है ।  यह स्मारक उत्तर प्रदेश में अपनी तरह का पहला स्मारक है, जिस पर टी – 55  टैंक लगा हुआ है । यह टी – 55  टैंक भाइयों में आपसी प्रेम और समर्पण की भी निशानी है । इस टैंक  को अपने भाई के स्मारक पर लगवाने के लिए एडवोकेट सतीश चौधरी ने जो प्रयास किया वह अवर्णनीय और अपने आप में एक इतिहास है । इस टैंक को हासिल करने के लिए सिपाही बबलू सिंह के भाई चौधरी  सतीश ने पिछले कई सालों तक मेहनत की, उन्होंने राज्य सरकार से लेकर केंद्र सरकार तक, सम्बंधित नेताओं और अधिकारियों का दरवाजा खटखटाया, अनगिनत पत्र व्यवहार किया, तब जाकर सन 2023 में यह टी - 55  टैंक उन्हें मिला ।

सम्पर्कः अयोध्या, लखनऊ, मो. 7087815074

लघुकथाः दूसरा सरोवर

 - रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

एक गाँव था। उसी के पास में था स्वच्छ जल का एक सरोवर। गाँववाले उसी सरोवर का पानी पीते थे। किसी को कोई कष्ट नहीं था। सब खुशहाल थे।

एक बार उजले-उजले कपड़े पहनकर एक आदमी गाँव में आया। उसने सब लोगों को मुखिया की चौपाल में इकट्ठा करके बहुत अच्छा भाषण दिया। उसने कहा-"सरोवर आपके गाँव से एक मील की दूरी पर है। आप लोगों को पानी लाने के लिए बहुत दिक्कत होती है। मैं जादू के बल पर सरोवर को आपके गाँव के बीच में ला सकता हूँ। जिसे विश्वास न हो वह मेरी परीक्षा ले सकता है। मैं चमत्कार के बल पर अपना रूप-परिवर्तन कर सकता हूँ। गाँव के मुखिया मेरे साथ चलें। मेरा चमत्कारी डंडा इनके पास रहेगा। मैं सरोवर में जाऊँगा। ये मेरे चमत्कारी डंडे को जैसे ही जमीन पर पटकेंगे, मैं फिर आदमी का रूप धारण कर लूँगा।"

लोग उसकी बात मान गए। उजले कपड़े किनारे पर रखकर वह पानी में उतरा। मुखिया ने चमत्कारी डंडा जमीन पर पटका। वह आदमी खौफनाक मगरमच्छ बनकर किनारे की ओर बढ़ा। मुखिया सिर पर पैर रखकर भागा। डंडा भी उसके हाथ से गिर गया।

अब उस सरोवर पर कोई नहीं जाता। उजले कपड़े आज तक किनारे पर पड़े हैं। गाँववाले चार मील दूर सरोवर पर जाने लगे हैं।

प्रसंगः लड़का और आयरिश टोपी

 - आदित्य पाधा,  अनुवाद- शशि पाधा 

"हवा को सुनो, वह बातें करती है। मौन को सुनो, वह बोलता है। अपने हृदय को सुनो, वह जानता है।"
— एक नेटिव अमेरिकन कहावत
यह कहानी पुनर्जन्म की है- यदि आप ऐसी बातों पर विश्वास करते हैं। या शायद यह केवल अपनी जड़ों की कहानी है।
उन अदृश्य धागों की कहानी, जो पीढ़ियों को महासागरों, दशकों और कभी-कभी जन्मों के पार भी जोड़ देते हैं।
हाल ही में मुझे काम के सिलसिले में स्पेन के बार्सिलोना जाने का अवसर मिला। मेरे बेटे शिव ने पूछा –“क्या मैं आपके  साथ चल सकता हूँ।”
पहले तो मैं थोड़ा झिझका। मेरा कार्यक्रम अक्सर व्यस्त और अनिश्चित रहता है और किसी विदेशी देश के होटल के कमरे में बारह वर्षीय बच्चे को अकेला छोड़ना मुझे उचित नहीं लगा। लेकिन शिव अपनी जिद पर अड़ा रहा और सच कहूँ, तो मुझे भी उसके साथ कुछ निर्बाध समय बिताने का अवसर अच्छा लगा।
मैंने कल्पना की थी कि यह यात्रा पिता-पुत्र की यादों से भरी होगी—बार्सिलोना की घुमावदार गलियों में घूमना, स्थानीय व्यंजनों का स्वाद लेना, छोटी-मोटी खरीदारी करना, अनिवार्य रूप से एक एफ.सी. बार्सिलोना की जर्सी खरीदना और सग्रादा फ़मीलिया की भव्यता को निहारना।
और अधिकांशतः ऐसा ही हुआ।
शिव के साथ यात्रा करना आनंददायक था। बच्चे दुनिया को एक अलग दृष्टि से देखते हैं। उनकी जिज्ञासा साधारण क्षणों को भी रोमांचक बना देती है। एक ही दिन में वह यात्री से मार्गदर्शक बन गया। मैं उसके पीछे-पीछे चलता, और वह तय करता कि हमें कहाँ जाना है, क्या देखना है और सबसे महत्त्वपूर्ण- क्या खाना है। उसके अनुसार हर अवसर पर जिलेटो खाना चाहिए!
और यदि आसपास जिलेटो न मिले, तो मैकडॉनल्ड्स हमेशा मौजूद था। उसके लिए चिकन नगेट्स एक ऐसी भाषा थे जिसे पूरी दुनिया समझती है।
लेकिन शहर में घूमते हुए मैंने एक और बात पर ध्यान दिया।
हम जहाँ भी होते, जिस विषय पर भी बात कर रहे होते, शिव किसी न किसी तरह बातचीत को भारत की ओर मोड़ देता। पहले मुझे लगा कि यह केवल सामान्य बातचीत का हिस्सा है; लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते गए, मुझे महसूस हुआ कि बात इससे कहीं गहरी है।
यह एक ऐसा लड़का था, जिसका जन्म और पालन-पोषण अमेरिका में हुआ था। जिसकी दुनिया अमेरिकी स्कूलों, उपनगरीय मोहल्लों, खेल के मैदानों और आधुनिक जीवनशैली से बनी थी। फिर भी वह भारत के बारे में जिस आत्मीयता और अपनत्व से बात करता था, वह बात उसकी उम्र से कहीं अधिक परिपक्व लगती थी।
वह भारतीय इतिहास, संस्कृति, प्राचीन राजवंशों, युद्धों, स्वतंत्रता संग्राम और हमारे पारिवारिक वंश के बारे में बातें करता। उसे यह जानने में गहरी रुचि थी कि हमारे पूर्वज कौन थे, उन्होंने कैसा जीवन जिया और हम कहाँ से आए।
हर शाम, जिलेटो के कप हाथ में लिये, हमारी बातचीत सदियों और महाद्वीपों की यात्रा करने लगती। वह इतिहास के तथ्य सुनाता, विचारोत्तेजक प्रश्न पूछता और अपने खोजे हुए नए-नए प्रसंग साझा करता।
जितना अधिक मैं उसे सुनता, उतना ही महसूस करता कि यह केवल जिज्ञासा नहीं थी। यह एक संबंध था।
उसके भीतर कुछ ऐसा था, जो एक ऐसी भूमि से बँधा हुआ था जिसे उसने वास्तव में कभी जाना ही नहीं था। भारत उसके लिए केवल एक देश नहीं था। वह एक ऐसा घर था जिसे मानो उसका मन कहीं गहराई से पहचानता था।
यात्रा की अंतिम शाम तक मैं सोचने लगा था कि यह गहरा लगाव आया कहाँ से। ऐसा कैसे हो सकता है कि अमेरिका में पला-बढ़ा एक बालक उस देश से इतना जुड़ाव महसूस करे, जहाँ उसने जीवन के केवल कुछ दिन बिताए हों?

उत्तर मुझे अगले दिन मिला।
हमारी अंतिम दोपहर थी। हम ‘ला राम्बला’ सड़क पर टहल रहे थे कि अचानक शिव रुक गया। वह मुड़ा और एक छोटी-सी दुकान में चला गया।
जिज्ञासावश मैं भी उसके पीछे हो लिया।
दुकान में न कोई फुटबॉल जर्सी थी, न कोई स्मृति-चिह्न, न ही जिलेटो।
शिव बिना कुछ कहे सीधे विक्रेता महिला के पास गया और शो-केस की ओर इशारा किया।
महिला मुस्कुराई और कोने की एक शेल्फ से एक विशेष टोपी निकाल लाई।
एक बहुत विशेष टोपी।
जैसे ही उसने वह टोपी शिव को थमाई, उसका चेहरा खुशी से खिल उठा।
और उसी क्षण मुझे सब समझ में आ गया।
मेरे दादाजी- जिन्हें हम सब प्यार से पिताजी कहते थे- लगभग हर दिन एक आयरिश टोपी पहनते थे। शिव ने उन्हें कभी नहीं देखा था। वह उन्हें केवल एक पुरानी श्वेत-श्याम तस्वीर में जानता था, जो मेरे पिता के लैपटॉप में सुरक्षित थी।
फिर भी, वर्षों बाद और घर से हजारों मील दूर बार्सिलोना की एक दुकान की खिड़की में उसने वही टोपी पहचान ली।
और वह उसे चाहता था; इसलिए नहीं कि वह फैशन में थी।
इसलिए नहीं कि वह आकर्षक दिखती थी; बल्कि इसलिए कि वह उसे उसके परदादा की याद दिलाती थी।
दुकान से बाहर निकलते ही शिव अपनी खुशी छिपा नहीं पा रहा था।
“पापा,” उसने कहा, “जब से मैंने वह तस्वीर देखी है, मैं ऐसी ही टोपी चाहता था।”
उसे याद था…
एक तस्वीर…
एक चेहरा जिसे उसने कभी नहीं जाना।
एक व्यक्ति, जो उसके जन्म से बहुत पहले इस दुनिया से जा चुका था।
और फिर भी, वह उनसे जुड़ाव महसूस करता था।
हम आगे बढ़ते रहे। मैं उसे देखता रहा। वह गर्व से टोपी को अपनी बाँह के नीचे दबाए चल रहा था। उसके चेहरे पर वही मुस्कान थी जो बच्चों के चेहरे पर क्रिसमस की सुबह दिखाई देती है।
मैंने आसमान की ओर देखा। अचानक मुझे अपने गाल पर पानी की एक बूँद महसूस हुई। शायद बारिश थी।
शायद नहीं।
और उस शांत क्षण में, बार्सिलोना के हृदय में खड़ा, मैं पिताजी के बारे में सोचने लगा-
 चार पीढ़ियाँ।
एक तस्वीर।
एक टोपी।
एक अदृश्य धागा, जो एक अमेरिकी जन्मे बालक को उस व्यक्ति से जोड़ रहा था, जिसने अपना पूरा जीवन भारत में बिताया था।
लेकिन जब मैंने शिव को अपने आगे चलते देखा, अपने परदादा की स्मृति को साथ लिये हुए, तो मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गई।
पिताजी, शिव से मिलिए।
आपका परपोता।
उसका जन्म महासागर के उस पार हुआ है, लेकिन किसी रहस्यमय ढंग से वह आपका एक अंश अपने भीतर लिये हुए है।
और बिल्कुल आपकी तरह, वह भी उस टोपी में बहुत अच्छा लगता है।

सम्पर्कः  वर्जीनिया, यू एस ए, Email: shashipadha@gmail.com

कविताः टूट रही है डोर

 - कृष्णा वर्मा

कई बार बाँधने का प्रयास किया

मन के आवारा पैरों को

लेकिन दिल है कि टिकने ही नहीं देता


सतत भटकाता है दिशा-दिशा

मासूम मन बड़ी ताबेदारी से सिर झुकाकर

मान लेता है उसकी बात

दिमाग परेशान रहता है सोच-सोचकर

क्यों मचा है हर ओर पैसे-पैसे का शोर

रिश्ते-नातों रस्मों-रिवाज़ों की

क्यों टूट रही है डोर

संबंधों को नाम तो दे देते हैं

पर निभाने की रस्म क्यों हो गई है ग़ायब

प्रेम प्यार नफ़रत की दुनिया में

नफ़रत हो गई है ठेकेदार और

दूरियाँ हो गई हैं वफ़ादार

प्यार जताते हैं पर दूरियाँ मिटाने से

करते हैं परहेज़  

मिट्टी कि दुनिया में जब

सबका अंत है मिट्टी

तो फिर क्यों औकात की

नुमाइश करने से बाज़ नहीं आते लोग।

दो नवगीतः

 - रमेश गौतम 

1. गाँव की पगडंडियाँ

गीत

गाँव पर लिखो तो

दंश भी लिखना समय के।

 

किस तरह

पाटे गए हैं ताल

छीनी धूप छाया

घेरते ही  जा  रहे  हैं

गाँव की अनमोल काया

अश्व रुकते

ही कहाँ अब

लालची इस दिग्विजय के।

 

हम बहुत लिखते रहे

हल, बैल

खेतो की कथाएँ

लिख नहीं पाए नगर

होती हुई अंतर्व्यथाएँ

कुछ कहो

इन चुप्पियों के छंद,

कुछ टूटे हृदय के।

 

चल रही

बैसाखियों पर

गाँव की पगडंडियाँ हैं

खुल गईं  सीमेन्ट  की

कच्चे घरों में मंडियाँ है

हाशिए पर

शब्द फेंके हैं

सभी अनुनय-विनय के।

2. उजालों का झरना

धुंध जाओ

छोड़ कर आकाश सारा

अब सुबह की गोद में सूरज रहेगा।

 

तोड़ डाला

मौन व्रत अब आइनों ने

बोलना सीखा

डरे सहमे दिनों ने

धूप ने

खोले अधर काँपा कुहासा

फिर उजालों का यहाँ झरना बहेगा।

 

ज़िंदगी ने आज

अपना मूल्य आँका

हर हिमानी देह में

अंगार टाँका

जाल पिघलेगा

हमारी ही तपन से

मछलियों का तन मछेरों से कहेगा।

 

बस्तियाँ, पगडंडियाँ

या हो घना वन

बाँध ली सामर्थ्य

तो होगा अभय मन

भाल पर

जब बिंब

दिनकर का दमकता

तन भला क्यों तामसी चाबुक सहेगा।