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Oct 1, 2024

लघुकथाः बुद्ध

 -  पूनम कतरियार 

महाबोधि मंदिर को दूर से ही प्रणाम करते हुए, उन्होनें अपनी मनोकामना पूर्ण होने की मन्नत माँगी। कुछ ही देर में वे रघुआ के कच्चे-घर के बाहर खाट पर बैठे थे। दूर तक फैले विशाल खेतिहर ज़मीन को देखते हुए उन्होंने सोचा– “अब सब झमेला ख़त्म हो जाएगा। बार-बार फ़सल बुआने-बेचने में छुट्टी बर्बाद होती है। अभी दो महीने पहले ही तो धान की फ़सल कटवा-बेचकर गए थे। अच्छा है, अब बिल्डर को रिसॉर्ट बनाने देकर, करोड़ों में खेलेंगें!”
बिल्डर का इंतज़ार करते हुए, उनकी आँखों में रिसॉर्ट का स्वरूप झिलमिलाने लगा–दूर तक फैले रि रिसॉर्ट में लॉन टेनिस, वॉलीबॉल, टेबुल-टेनिस आदि अनेक प्रकार के खेलों के शानदार कोर्ट, कृत्रिम झील में तैरते छोटे-बड़े, जल-नौकाएँ ...चीन, जापान, श्रीलंका, थाईलैंड आदि अनेक देशों के बौद्ध-धर्मावलंबियों और पर्यटकों से गुलजार रिसॉर्ट!
उनके चेहरे पर अभिमान का भाव झलका तो गर्दन थोड़ी अकड़ने लगी। रौबदार आवाज़ में रघुआ को आवाज़ दी-
“का रे रघुआ, यहाँ से बुद्ध-भगवान का मंदिर दस-बारह किलोमीटर ही होगा न? बिदेशी लोग तो इधर ख़ूब आते होंगें?”
“जी हुजूर, मंदिर तो ज़्यादा दूर नहीं है। बाक़ी बिदेसी सबका हमको नहीं पता। हमनी का तो दिन आप मालिक लोगन के खेती-बारी और गाय-गोरू में बीत जाता है...बच्चा सब सरकारी स्कूल में पढ़-लिख रहा है और जिनगी में का चाही।”
रघुआ ने ताजे दही की छाछ उन्हें थमाते हुए जिस निस्पृह भाव से कहा, उसके सामने उन्हें अपना करोड़ों का सपना बड़ा ओछा लगा।
ताजे छाछ के स्वाद में घुली उनकी ज़ुबान लटपटा गई और वे फ़ोन पर कह रहें थें- “सॉरी, मुझे वह प्रोजेक्ट कुछ ख़ास नहीं लग रहा।”
फोन काटते ही उन्हें बोध हुआ कि उनके सिर से एक बड़ा बोझ उतर गया है। चारों ओर नज़र घुमाई तो रघुआ और आस-पास रह रहे अपने खेतों में काम करनेवाले भूमिहीन परिवारों को अपने दैनिक कार्यकलापों में व्यस्त देखा, उनकी आँखें ख़ुशी से भर आईं और वे असीम आनंद में डूब गए।

अर्चना राय की दो लघुकथाएँ

1. डोरियाँ

अस्पताल के बेड पर पड़े -पड़े दुख और ग्लानि से उनका दिल बैठा जा रहा था। जब से उन्हें पता चला कि उनके आपरेशन के लिए बेटे ने घर गिरवी रख पैसे जुटाए हैं, उनके आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। वे उस घड़ी को कोस रहे थे, जब उन्होंने बेटे से मिलने गाँव से शहर आने का फैसला किया था।

न आता तो कम- से- कम यह एक्सीडेंट न होता, न ही बेटे के सिर पर मुसीबतों का पहाड़ टूटता। सोच- सोचकर उनका बुरा हाल था। पैर टूटने से कहीं ज्यादा, उन्हें घर गिरवी रखने का दर्द हो रहा था।

बेटे- बहू को सामने से आते देख उनका जी चाहा कि अभी धरती फट जाए और वे उसमें समा जाएँ। मैं अपने बेटे से कैसे नजरें मिला सकूँगा, बहू मेरे बारे में क्या सोच रही होगी? 

पिता तो वह होता है जो बच्चों के दुख- तकलीफ दूर करता है। और एक वह है, जिसने अपने बच्चों को ही तकलीफ में डाल दिया है। एक्सीडेंट में मैं मर क्यों न गया, मन- ही- मन अपने आप को लानतें दे रहे थे।

“बेटा मनीष,..बहू मुझे मा..आ. फ..करना” - हाथ जोड़कर वे हिलककर रो पड़े।

“अरे! पिताजी यह आप क्या कर रहे हैं..” -बेटे ने झट उनके हाथों को थाम लिया।

“बेटा, मुझे पता ही नहीं चला, कब पीछे से आकर  कार ने टक्कर मार दी।”

“पिताजी, सड़क  हादसा तो किसी के साथ भी हो सकता है... इसमें आपकी कोई गलती नहीं है।” बहू ने  कहा।

“पर बेटा... मेरी वजह से घर....” -कहते हुए उनकी हिचकियाँ बँध गईं।

 “कोई बात नहीं पिताजी आपके साथ और आशीर्वाद से ऐसे कई घर बना लेगें।”  बेटे ने  ढा़ढस बँधाया।

“हम्म...”- बेटे  की बातों ने उनके मन पर पड़े बोझ को हल्का कर दिया।

 दर्द और कमजोरी की वजह से उनकी आँखें मुँद रहीं थीं, इसलिए वे उन्हें बंद कर शांत भाव से लेट गए। 

“पिताजी!...आप बिल्कुल भी चिंता मत कीजिए .... सब ठीक हो जाएगा।” -आगे बढ़कर बहू ने ससुर के माथे पर प्यार से हाथ फेरकर सहलाते हुए कहा।

ममता- भरा नर्म स्पर्श पाकर उन्होंने आँखें  खोलीं। सामने देखकर वे चकित रह गए ! अचानक उन्हें बहू के चेहरे में अपनी माँ की छवि दिखाई दे रही थी।

वह भी तो ऐसे ही उनके सिर पर हाथ फेर सारी तकलीफें हर लेती थी।

वहाँ खड़ी नर्स की आँखें बरबस भीग गईं। 

 एक तीस साल की माँ का साठ साल के बेटे को दुलार करते देखकर ! 


2. मोबाइल है न!

"हैलो।"

"...... "

 "हाँ माँ।"

"..... "

 "शादी से?...मैं तो कल ही आई हूँ। "

".... "

"शादी तो अच्छी थी; पर माँ मैं शादी में गई जरूर थी पर मेरा मन तो यहाँ घर पर बेटे में ही अटका रहा।"

".... "

 "क्यों? अरे! पहली बार जो उसे घर पर अकेला छोड़ कर गई थी। वह भी तीन दिनों के लिए।"

".... "

"हाँ! आप सही कह रही हैं, कि शायद अब वह सच में बहुत बड़ा हो गया है।"

".... "

"क्या हुआ?..मुझे तो लगा था कि, इतने दिनों बाद मेरे घर आने पर मुझे देखकर वह लिपट जाएगा, लाड़ लड़ाएगा,  कुछ शिकवे- शिकायत करेगा, पर उसने ऐसा कुछ नहीं किया। बस वह तो अपने मोबाइल में ही बिजी रहा।"

"..... "

 "जब मैंने उससे पूछा कि बेटा मेरे घर पर न रहने पर तुम्हें बहुत अकेला फील हुआ होगा। तो जानती हो उसने क्या कहा बोला? "

".... "

 "उसने कहा, नहीं मॉम! मोबाइल है न मेरे पास।"

".... "

 "फिर ?...मैंने उससे पूछा, रात को तो मेरी याद जरूर आई होगी? तो वह बोला नहीं मॉम मोबाइल है न!...दोस्तों के साथ चैटिंग करने और अमेजन प्राइम पर फिल्म देखते देखते सो गया था। माँ, न जाने क्यों उसकी बातें सुनकर मेरा दिल टूट- सा गया।"

"..... "

 "फिर भी मैंने पूछा, क्या खाना खाते समय भी मेरे हाथ के खाने की याद नहीं आई? "

".... "

"क्या बोला? मेरे पास मोबाइल है न, स्विग्गी और जोमैटो से अपने फेवरेट खाने को ऑर्डर कर दिया था। कहते हुए बेटा अपने मोबाइल में ही बिजी रहा।

 अच्छा हुआ माँ जो हमारे समय में मोबाइल नहीं था पर हमेशा माँ थी।"

सम्पर्कः  भेड़ाघाट जबलपुर म. प्र.

कविताः आदर्श स्त्री

 -मंजूषा मन

हर ख़्वाहिश के साथ

थोड़ा मर जाती है स्त्री।

स्त्री के भीतर का थोड़ा हिस्सा

हर बार मर जाता है,

ख़्वाहिश के मरने से।

 

ऐसे ही थोड़ा- थोड़ा मरकर

एक दिन

स्त्री पूरी मर जाती है।

फिर स्त्री में

कहीं नहीं बचती स्त्री।

 

रह जाती है बस

एक मिट्टी की गुड़िया

संवेदनाओं से रिक्त।

नहीं करती

किसी बात का विरोध,

नहीं रूठती कभी,

न कभी करती है जिद,

कुछ माँगती भी नहीं,

जो कहो सब करती है।

 

आदर्श स्त्री

समझी जाती है

मरी हुई स्त्री।

किताबेंः सवेदनाओं से साक्षात्कार

 -  अंजू खरबन्दा 

 संवेदनाओं का डिजिटल संस्करण (लघुकथा-संग्रह): डॉ. सुषमा गुप्ता, पृष्ठः 120 , मूल्य पेपर्बैकः 260 रुपये, संस्करणः 2024 , प्रकाशकःप्रवासी प्रेम पब्लिशिंग इंडिया, 3/186, राजेन्द्रनगर,सेक्टर-2, साहिबाबाद, गाज़ियाबाद-201005

निशांतर के अनुसार श्रेष्ठ लघुकथाएँ वे ही हैं,  जिनको पढ़ने के बाद पाठक चौंकें नहीं; वरन् सोचने को मजबूर हो। हो सकता है, कभी-कभी लघुकथाएँ पाठकों को अपनी समाप्ति पर स्तब्ध कर जाएँ; परंतु यह स्तब्धता की स्थिति सहज और स्वाभाविक ढंग से आनी चाहिए; क्योंकि सहज स्तब्धता ही पाठकों को गंभीर चिंतन में परिवर्तित कर सकेगी।
सुषमा गुप्ता का सद्य प्रकाशित लघुकथा-संग्रह मेरे सामने है। ‘दहलीज’ के अन्तर्गत ‘संवेदनाओं का डिजिटल संस्करण’ पढ़ते हुए मन भीग गया। सोशल मीडिया हमारे जीवन में इतना अधिक प्रवेश कर गया है कि रिश्तों से अधिक हम उसे महत्त्व देने लगे हैं। वास्तविकता की दुनिया से दूर एक झूठी दुनिया बसा ली गई है, जिसमें सहानुभूति पाने के लिए पिता की जलती चिता की फोटो तक अपलोड कर दी जाती है। जीवित माँ की दवाइयों से अधिक चिंता सोशल मीडिया पर आए लाइक कमेंट्स की होने लगी है। डायरी शैली में लिखी ये लघुकथा गहरे तक मन को बींध जाती है। 
‘अंतिम विदा’ लघुकथा पढ़ते हुए मन बेहद भावुक हो उठा। सत्तर बरस का साथ जब छूटता है, तो खुद को सँभालना कितना मुश्किल हो जाता है न! दादाजी का यह कहना- “साड़ी सुंदर- सी लाए हो न!” यह वाक्य मन को गहरे तक भिगो देता है। आज के युग में नई पीढ़ी को ये बातें शायद अजीब लगें; पर मन से जुड़े रिश्ते मिठास से भरपूर होते हैं। ये समाज के लिए एक आदर्श स्थापित करते हैं।  ‘दर्द के पंख’  केवल लघुकथा नहीं, बल्कि दर्द को उकेरती एक टीस है, जो गहरे तक ह्रदय में धँसी है। भाई का यूँ एकाएक चले जाना! जैसे एक युग का समाप्त हो जाना। वह भाई, जिसके अंग- संग एक-एक पल बीता, जिसकी हँसी-ठिठोली से घर गुलज़ार था, जिसकी कमाई के एक हिस्से पर साधिकार कब्जा था, जिसके हर राज़ में शरीक थी बहन! उस बहन के सामने जवान भाई का चले जाना! यह लघुकथा पढ़ते हुए कब  आँसू छलक आए, पता ही नहीं चला!
‘मोहपाश’ लघुकथा का अंत पढ़ते हुए जी धक्क से रह गया। माता पिता के सामने उनकी औलाद चली जाए, तो माता पिता जीते-जी मर जाते हैं। यह सदमा इतना गहरा होता है कि इससे उबरना नामुमकिन-सा लगने लगता है। हर पल आँखें दरवाज़े पर ही टिकी रहती है इंतज़ार में!उसका इंतज़ार, जो अब कभी नहीं आएगा। मोहपाश में बँधा इंसान एक पल को भी इससे निकल ही कहाँ पाता है!
‘परिपक्व बचपन’ लघुकथा में बिन माँ की दो नन्ही सी बच्चियाँ है। बिन माँ के बच्चे अपना बचपन बहुत जल्दी खो देते हैं। इस लघुकथा में मुझे मेरा अक्स दिखलाई पड़ा। बड़ी बेटी कब छोटे भाई बहनों की माँ बन जाती है वह खुद भी कहाँ जान पाती है। बचपन की शरारतें कब उसे छूकर चुपचाप निकल जाती हैं, पता ही नहीं चलता।
‘कैमिस्ट्री’ लघुकथा मोहनदास और रामदीन के वार्तालाप से से शुरु होती है। दोनों के वार्तालाप में कोई तालमेल नहीं दिखता। मोहनदास जी कमर दर्द से परेशान हो अपनी व्यथा सुना रहे है और रामदीन मोची चमड़ा महँगा होने की बात कर रहा है। दोनों बस अपना अपना राग आलाप रहें हैं। दूर खड़ी बहू ससुर मोहनदास को मोची के पास बैठा देख नाराजगी जताती है, तब पुत्र जिस केमिस्ट्री की बात बताता है, उसे सुन एकाएक हँसी आ जाती है, जिसके साथ एक गम्भीरता भी लिपटी है-खुद को अभिव्यक्त करने की। इस लघुकथा की खुशबू फ़िज़ा में बिखर जाती है। 
‘आत्मा का गठजोड़’ लघुकथा पिता और बेटी के खूबसूरत रिश्ते को उकेरती लघुकथा है। बेटियों को हमेशा माता-पिता की चिंता ही लगी रहती है। बेटी विदेश में हो तब यह चिंता और अधिक बढ़ जाती है। बीमार पिता की चिंता में बेटी उन्हें अपने साथ विदेश ले जाना चाहती है पर पिता! वे अंतिम समय तक इसी घर में रहना चाहते हैं क्योंकि यहाँ उनकी पत्नी की प्यारी यादें उनके अंग संग हैं। सबसे बड़ी बात अब वे अधिक जीना ही नहीं चाहते; ताकि जल्द से जल्द अपनी प्रिया तक पहुँच सकें। अकेलेपन की व्यथा को दर्शाती एक मार्मिक लघुकथा है यह! 
‘दरकती उम्मीद’ लघुकथा वृद्ध विमर्श को चित्रित करती देती हृदयस्पर्शी रचना है। दादा अस्पताल में भर्ती है और आज जनके पोते का जन्मदिन है। वह नर्स से बार-बार अनुरोध करते हैं घर में बात करवाने के लिए। साथ वाले बेड के मरीज की बहू आशा उन्हें किसी तरह बहलाकर खाना खिलाती है। बाद में नर्स से सच्चाई जानकर वह अचंभित है कि वृद्ध का बेटा अपने बेटे के जन्मदिन में इतना मगन है कि अस्पताल में पड़े पिता के लिए उसके पास फुरसत ही नहीं।
अब  बात करूँगी सुषमा गुप्ता की मानवेतर लघुकथाओं की। ‘जात’ में लैबरो और शैफर्ड के बीच हुई बातचीत गहरे तक सोचने को विवश करती है। लैबरो का यह कहना- “पागल हो गया है क्या बे। हम इंसान हैं क्या?  जो ऐसी बातों पर अपनी ही प्रजाति को नोचें मारें! खबरदार ऐसा कुछ किया तो।! हम कुत्ते हैं…’’   यह मनुष्य जाति पर गहरा कटाक्ष  है।
‘अपनी अपनी बरसात’ लघुकथा गहरे तक मन को छूती है। इसका सीधा प्रभाव पाठक पर पड़ता है। रोजमर्रा की बातचीत में किसी न किसी बात पर हम नेताओं के बारे में बात करते ही रहते हैं; लेकिन इस लघुकथा में फौजी और नेता के बारे में दो ‘छतों’ में आपस में हुई बातचीत गहरे तक अपना प्रभाव छोड़ती है। यह लघुकथा यहाँ खत्म होकर भी खत्म नहीं होती। पाठक देर तक इस लघुकथा में ही डूबता-उतराता रहता है और यही है लघुकथा का असली प्रभाव! इस तरह हम देखते है कि प्रभावोत्पादकता कथ्य व शिल्प दोनों के आधार पर होती है। कथ्य प्रकटीकरण का यह कौशल, जो सुषमा गुप्ता में है, कम ही लेखकों में देखने को मिलता है।
यह लघुकथा संग्रह पढ़ते हुए मन कभी उद्वेलित हुआ कभी व्यग्र हुआ, कभी विक्षुब्ध हुआ कभी बेचैन! इस संग्रह ने कई रंग समेटे है। कभी आँखें भर- भर आती हैं कभी होंठों पर मुस्कान तिर आती है।

जीवन दर्शनः श्री कृष्ण से सीखें : सफलता के सूत्र

 - विजय जोशी . - पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)

कृष्ण का जीवन अद्भुत था। वे सामाजिक समरसता के श्रेष्ठ उदाहरण हैं। उन्होंने अपने लिए कभी कुछ नहीं चाहा। निर्बल के पक्ष में न केवल खड़े रह कर न केवल उसे सबल बनाया, बल्कि समाज में पुनर्स्थापित भी किया। उनके जीवन से सफलता अर्जन के 10 सूत्रीय बिंदुओं पर प्रकाश का विनम्र प्रयास : 
1. प्रेम में निःस्वार्थता : निर्मल, निश्छल वासना रहित औदार्य पूर्ण प्रेम। सम्बंधों को बगैर किसी चाहत या प्रतिदान के साथ जीवन जिया। प्रेम में  दिया ही अधिक लिया कुछ भी नहीं।
2. सुदृढ़ मित्रता एवं निष्ठा : इसका सबसे बड़ा उदाहरण तो यही है कि जहाँ एक ओर वे कंस के अत्याचारों के विरुद्ध ग्वाल बाल सखाओं के साथ खड़े रहे, तो दूसरी ओर अन्याय झेल रहे पांडवों के पक्ष में खड़े रह उन्हें न्याय प्रदायगी के सोपान बने।
3. भरोसा एवं समर्पण : आस्था, वफ़ादारी और विश्वास एक विश्वसनीय मित्र की सर्वोच्च पहचान है, जिसमें वे खरे उतरे।
4. धार्मिकता से परिपूर्ण : उदार धर्म भाव सहित सबके साथ उचित व्यवहार। सबसे प्रेम, वैर रहित आचरण।
5.  समानता एवं आदर : सामाजिक प्रतिष्ठा को परे रखते हुए हर एक से समान भाव से आदरपूर्ण व्यवहार।
6.  करुणा एवं दया : किसी से कोई शत्रुता का भाव नहीं। शत्रु को भी मित्र मानते हुए पहले संवाद, समझाइश और फिर समस्या निराकरण के पश्चात क्षमा कर देने वाला भाव।
7.  मोह रहित  संबंध : जिन्हें हम प्रेम करते हैं उनसे पूरा स्नेह और उचित देखभाल, लेकिन सीमा से परे का लगाव या अधिकार भाव नहीं।
8.  संवाद में स्पष्टता : अपने अनुभव या ज्ञान को तरीके से साझा करने के साथ- साथ अपनी बात को सटीक तथा सार्थक तरीके से समझाने की कला।
             कहने को तो हर बात कही जाती है,  कहने का सलीका हो तो हर बात सुनी जाती है। 
9. आनंद और उत्सव : जीवन के हर पल को आनंदपूर्वक जीने की कला। मित्र परिवार सगे सम्बंधियों के साथ एकजुटता का भाव
10.  शाश्वत प्रेम : रिश्तों में शर्त रहित स्नेह प्राप्त करने के लिए निर्मल मन से प्रयास।
निष्कर्ष : जीवन का सत्व और तत्त्व :
 - छोटी उँगली पर पूरा गोवर्धन पर्वत उठाने वाले श्री कृष्ण। 
- छोटी- सी बाँसुरी को दोनों हाथों से पकड़ते हैं।
- बस इतना ही अंतर है- ‘पराक्रम और प्रेम’ में।
-  इसलिए रिश्तों में ‘पराक्रम’ नहीं ‘प्रेम’ होना चाहिए।

सम्पर्क: 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास), भोपाल-462023,  मो. 09826042641, E-mail- v.joshi415@gmail.com