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Jul 1, 2022

मालवी लोककथाः तीन प्रश्न

- चंद्रशेखर दुबे

एक भाई ने अपनी बहन को बहुत दिनों से देखा नहीं था, इसलिए वह उससे मिलने के लिए उसकी ससुराल गया। भाई बेहद गरीब था, और बहन इत्तफाक से एक अमीर से ब्याह दी गई थी। भाई को देखकर बहन का जी भर आया । वह पीहर के हाल-चाल जानने के लिए बेचैन हो उठी। किन्तु प्रयत्न करने पर भी दोनों एकान्त में मिल नहीं सके। इसलिए बहन के सामने बड़ी विकट परिस्थिति पैदा हो गई । सबके सामने पीहर के हाल-चाल पूछकर, वह अपने पीहर की भी हँसी नहीं उड़वाना चाहती थी । उसका स्वाभिमान उसे ऐसा नहीं करने दे रहा था। साथ-ही-साथ पीहर के समाचार जाने बिना भी उससे रहा नहीं जा रहा था। इस विकट परिस्थिति पर उसने अपनी चतुराई से विजय प्राप्त की।

उसने भाई से एक के बाद एक कुल तीन प्रश्न किए। ये प्रश्न जाहिर में बड़े भोले-भाले व पीहर के गौरव को बढ़ाने वाले थे। किन्तु अपने सांकेतिक अर्थ में ये प्रश्न भाई से पीहर की वास्तविक स्थिति का परिचय प्राप्त करने के लिए ही किए गये थे।

भाई भी बहन की इस चतुराई को ताड़ गया।

बहन ने अपने पुराने दिन याद करते हुए पहला प्रश्न किया- आंगण मोर चुगेरे दादा?

प्रश्न का शाब्दिक अर्थ था- क्यों भैया, क्या अपने आँगन में अभी भी मोर चुगते हैं ?

यह प्रश्न इस सरल अर्थ में पीहर के वैभव को प्रदर्शित करता था; किंतु भाई के लिए इसका सांकेतिक अर्थ था- क्या अपने घर में बच्चे-बच्ची अभी भी मोर की तरह दाने चुगा करते हैं ?

रोटी बनाकर खिलाते इतने दाने बेचारों के यहाँ थे कहाँ ? इसलिए अनाज के दाने आँगन में बखेर दिए जाते थे और घर के मोर-बच्चे-उन्हें चुगकर पेट भर लेते थे।

भाई ने प्रश्न के इस सांकेतिक अर्थ को समझकर उत्तर दे दिया-हाँ वो जीजी।

बहन ने दूसरा प्रश्न किया- डूंगर दीवो वलेरे दादा?

प्रश्न का शाब्दिक अर्थ था- क्यों भैया, अभी भी अपने यहाँ डूंगर पर दीये जलते हैं न ?

इस सरल अर्थ में यह प्रश्न पीहर की सम्पन्नता की ओर इंगित करता था। डूंगर पर का दीया उसके पीहर के कारोबार की अधिकता एवं प्रसार को बतलाता था।

इसके विपरीत सांकेतिक अर्थ में इस प्रश्न का आशय था- क्या अभी भी दीये का इंतजाम डूंगर पर की लकड़ियों से ही होता है?

भाई इस सांकेतिक अर्थ को समझ गया। उसने पहले की ही तरह उत्तर दिया- हाँ वो जीजी ।

अब बहन ने तीसरा प्रश्न किया- भाभी घूघर माल रे दादा?

इसका भी सरल अर्थ था- क्यों भैया, क्या भाभी अभी भी घूघरों की माला की तरह गहनों से लकदक फिरती है?

इस सरल अर्थ में यह प्रश्न घर की सम्पन्नता को चार चाँद लगा रहा था।

किन्तु भाई के लिए सांकेतिक अर्थ था- क्या भाभी अभी भी वही चीथड़े पहनती हैं, भैया। जिनके जगह-जगह से फट जाने के कारण, भाभी को लाज बचाने के लिए, कपड़े में गठान पर गठान लगानी पड़ती है। ऐसी गठानों की माला ही मानो भाभी है। यह गठानों की माला घूघर माल से मिलती जुलती ही है।

भाई ने बहन के इस इशारे को भी समझ कर सर नीचा कर कह दिया--हाँ वो जीजी!

कहानीः माँ से मायका….

- डॉ. रंजना जायसवाल

रात का घना अँधेरा पसरा हुआ था, रात के चादर तले इन्सानों के साथ-साथ अब तो सारे सितारें भी सो चुके थे पर ईशा की आँखों में नींद कहाँ... एक अजीब सी बेचैनी ईशा महसूस कर रही थी। अंकुर नींद के आगोश में डुबे हुए थे।  घड़ी की सुई की टिक-टिक से भी उसे झुंझलाहट महसूस हो रही थी।  पता नहीं क्यों कुछ छूटता हुआ महसूस हो रहा था। अंशु भाभी का अभी थोड़ी देर पहले ही फोन आया था।

नाना जी नहीं रहे…’

कब…?’

अभी थोड़ी देर पहले उन्होंने अंतिम साँस ली।’

दिल में कहीं कुछ चटक सा गया, शायद ननिहाल से जुड़ा हुआ वो अंतिम धागा ...क्योंकि उनके जाने के साथ ही ननिहाल शब्द जीवन से खत्म हो गया।  ईशा को ननिहाल हमेशा से बहुत पसंद था, ये वो जगह थी जहाँ लोग उसकी माँ को उनके नाम से पहचानते थे।  यहाँ वह राम गोपाल जी की बहू नहीं, रमेश की पत्नी नहीं और न ही ईशा की माँ थी। यहाँ वो कमला थी सिर्फ कमला…जहाँ उनके आगमन का लोगों को इंतजार रहता था, जिनकी वापसी के नाम पर लोगों के चेहरे पर उदासी पसर जाती थी।

इतनी जल्दी…कितने दिनों बाद आई हो, कुछ दिन तो रुको…

माँ का चेहरा जितनी तेजी से खुशी से चमकता उतनी ही तेजी से धप्प भी पड़ जाता।  खुशी इस बात की कुछ लोग आज भी उसके आने का इंतज़ार करते हैं, गम इस बात का जो दूसरे ही पल इस बात का इज़हार कर देता है कि अब वह पराई हो चुकी है। सिर्फ अपनों के लिए ही नहीं इस शहर के लिए भी...

दीदी क्या सोचा है आपने...कब चलेंगी। उनकी बहू कह रही थी, बीमार चल रहे थे सबका इंतज़ार करेंगे ,तो कैसे चलेगा मिट्टी खराब हो जाएगी।’

मिट्टी...एक जीता-जागता इंसान पल भर में मिट्टी हो गया। महीनों तक गर्मी की छुट्टी का इंतज़ार करने वाले नाना जी को आखिर बार देखना भी नसीब न होगा।  माँ के जाने के बाद उन्होंने ही तो सहेजा था हम दोनों भाई-बहन को...माँ जब इस दुनिया से गई बच्चे नहीं थे हम पर प्यार के दो मीठे बोल, ममता भरा हाथ तो हर उम्र में चाहिए होता है। माँ बहुत कष्ट में थी, हर बार की किमियोथरिपी निराशा की ओर धकेल रही थी...डॉक्टर हर बार कहते अब वो ठीक है पर माँ जानती थी सब कुछ ठीक नहीं था। डॉक्टर से मिलने के बाद पापा हमेशा हम भाई-बहन के सामने मुस्कराने का प्रयत्न करते, ‘सब कुछ ठीक है चिंता की कोई बात नहीं’ पर हर बार पापा के माथे की लकीरों को अनपढ़ माँ न जाने कैसे पढ़ लेती थी। आज सोचती हूँ तो लगता है पापा के लिए कितना मुश्किल रहा होगा सब कुछ... हम सब के चेहरे पर खुशी के कुछ हसीन पल देखने के लिए वो मुस्कुराने का प्रयत्न करते थे...पर मुस्कुराते रहना कोई आसान बात नहीं बहुत दर्द से गुजरती थी उनकी वो हँसी हम सब के चेहरे पर खुशी के चंद लम्हें देखने के लिए... ईशा को आज वो दिन बार-बार याद आ रहा था। माँ का शरीर कैंसर से दिन पर दिन कमजोर होता जा रहा था पर उससे ज्यादा कमजोर होती जा रही थी उनके जीने की इच्छा शक्ति… पर न जाने क्यों मायके की दहलीज उन्हें बार-बार खींच रही थी। पापा के बार-बार मना करने के बावजूद माँ हमें समेटे नाना-नानी से मिलने चली गई थी।  नानाजी ने बार-बार कहा भी था, ‘तुम चिंता न करो हम तुमसे मिलने आएँगे’ पर उस दहलीज उन दीवारों का मोह उनसे छूट नहीं रहा था।  छूटता भी क्यों जीवन की न जाने कितनी यादें जुड़ी थी उन दीवारों से, उन गलियारों से...उन्हें हमेशा लगता था शहर के चौराहे, वो नुक्कड़ उनका राह आज भी तक रहे हैं।

 एक-एक चीज का हिसाब रखने वाली माँ नानी के घर जाकर न जाने क्यों भुलक्कड़ हो जाती थी।  नानी के बार-बार कहने पर भी कुछ न कुछ सामान हर बार छूट ही जाता था। हर समय हर चीज़ को सहेजने वाली माँ खुद को सहेजना भूल जाती थी। जिसकी उँगलियों पर एक-एक चीज़ होती वो न जाने क्यों मायके से लौटते समय चीज़ें रखकर भूल जाती, शायद वो उस घर में अपनी वजूद की खूशबू बनाये रखना चाहती थी पर उस बार वो सामान नहीं शायद अपने आप को भूल आई थी। कभी-कभी इंसान मौत से पहले ही मर जाता है...माँ शायद अपना अंत जानती थी

हमेशा बोलने वाली माँ अचानक से चुप हो जाती या फिर बहुत बोलने लगती। बहुत कुछ कहना था। उन्हें पर शायद हम ही उन्हें सुन नहीं पाए। कुछ था जो माँ के साथ ही अनकहा रह गया। अबकी बार वो लौट कर आई तो कुछ था जो उन से छूट रहा था पर माँ मुँह से कुछ भी न कहती। रिश्तों और संबंधों को हमेशा सहेजने और समेटने वाली माँ सूख रही थी। माँ हमेशा कहती थी-  ‘वृक्षों से हमें संबंधों को गहराई की कला सीखनी चाहिए, कुल्हाड़ी की एक चोट से सिर्फ जड़ें नहीं मरती पेड़ भी मर जाता है।’

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।

न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः। ।’

अंतिम आहुति के साथ पूजा सम्पन्न हुई।  ईशा अपनी सोच के दायरे से बाहर आ गई।  नाना जी तस्वीर में मुस्कुरा रहे थे।  स्वागत करने वाले हाथ, दुलारने वाले हाथ आज तारीख़ बन चुके थे।  सभी लोग प्रसाद ग्रहण कर आँगन में ही बैठ गए। बड़े मामा जी के लड़के ने नाना जी के जीवन पर एक छोटा सी वृत्तचित्र बनाया था।  ईशा हर कोने में बिखरी बचपन की यादों को आँचल में समेट रही थी। पता नहीं अब कब आना हो, हो भी या शायद...नाना जी का मुस्कुराता चेहरा आँखों में समा गया।  ऑफिस जाते नाना जी, पोते की शादी में नाचते नाना जी, परिवार के साथ खाना खाते नाना जी, ईशा की आँखों के आँसू रुक नहीं रहे थे। अंशु भाभी ने धीरे से उसके हाथों पर हाथ रखाl पर स्नेह और आश्वासन का स्पर्श भी उन आँसुओं को रोक न सका। अंकुर ने धीरे से रुमाल ईशा की तरफ सरक दिया।

कुछ था जो ईशा किसी से भी बाँट नहीं पा रही थी।  पूजा संपन्न हो चुकी थी। धीरे-धीरे घर से सभी पड़ोसी, दोस्त और रिश्तेदार प्रसाद लेकर अपने-अपने घरों की ओर लौटने लगे। अंकुर ने भी धीरे से इशारा किया, ‘अगर अभी निकल लेंगे तो रात तक घर पहुँच जाएँगे।’ रुकने का कोई मतलब भी नहीं था और रोकने वाला भी दूर-दूर तक कोई नहीं था।  रोकने और मनुहार करने वाले हाथ तो न जाने कब का हाथ छुड़ाकर इस दुनिया से जा चुके थे। ईशा ने सबसे इजाजत माँगी, मामी जी ने अंकुर और ईशा का टीका किया और घर के लोगों के लिए डिब्बे में प्रसाद बाँधकर दे दिया।  ईशा ने एक भरपूर नजर घर पर डाली, कितना कुछ समेट लेना चाहती थी वो... शायद रिश्ते, शायद घर या फिर शायद ये शहर सब कुछ तो छूट रहा था। गाड़ी धूल उड़ाती आगे बढ़ गई।  रास्ते भर ईशा ने किसी से कोई बात नहीं की पर अंशु कुछ-कुछ समझ रही थी। वो उसके चेहरे को पढ़ने का प्रयास कर रही थी, उम्र में उससे छोटी ही थी पर दुनिया की उसे बड़ी अच्छी समझ थी।

जीजाजी! बड़ी देर से गाड़ी चल रही है, कहीं ढाबा देखकर गाड़ी रोक लीजिए। चाय पीने का मन कर रहा है।’

अंशु समझ चुकी थी, कुछ ऐसा था जो ईशा को चुभ रहा था।  ईशा बेचैन थी अंशु ये अच्छी तरह समझ रही थी।  नाना के घर से हमेशा के लिए नाता कहीं न कहीं टूट रहा था, सब लोग ढाबे की ओर चल पड़े।  ईशा भरे हुए कदमों से कुर्सी की तरफ बढ़ ही रही थी कि अंशु ने हाथ पकड़कर उसे रोक लिया।

दीदी! आप बुरा ना माने तो एक बात कहूँ।’

हाँ बोल न..’

नाना जी का जाना हम सब के जीवन में एक खालीपन भर गया है ; पर इस दुनिया में जो आया है, उसे एक दिन तो जाना ही है। नाना जी अपनी सारी जिम्मेदारियाँ पूरी करके गए हैं, मुझे ऐसा लगा, आपके आँसुओं का कारण सिर्फ नाना जी का जाना नहीं था।  ऐसा कुछ था जो आपको कचोट रहा था, आप के आँसू थम नहीं रहे थे।’

ईशा चुपचाप अंशु के चेहरे पर देखती रही, अंशु न जाने कैसे उसके दिल के दर्द को समझ गई थी।

अंशु! तुमसे आज तक कुछ भी छिपा नहीं है, आज भी तुमसे मैं कुछ भी नहीं छुपाऊँगी।  जिस घर में मेरी माँ पली-बढ़ी जिसकी हर सांस मायके से शुरू होती थी और मायके पर ही खत्म होती थी।  आज नाना जी के घर जब वह वृत्तचित्र चला,  तो मामा जी के बेटे, बहू, नाती-पोते सब की तस्वीरें थी;  पर मेरे पापा और मेरी माँ की एक तस्वीर भी नहीं थी। नाना जी की सन्तान, मेरी माँ उस घर की बेटी भी थी । किसी की बहन, किसी की बुआ भी थी। आज न जाने क्यों मुझे ये महसूस हुआ- माँ का वजूद उनकी मृत्यु के साथ ही खत्म नहीं हुआ, बल्कि उस घर में तो उनका अस्तित्व कब का ख़त्म हो चुका था। माँ से जुड़ा हुआ यह नाता शायद उसी दिन खत्म हो गया था, जिस दिन माँ मरी , पर इसका एहसास मुझे आज हुआ। अंशु लोगों की थोड़ी सी अनदेखी सिर्फ रिश्ते को ठंडा नहीं करती इंसान को भी ठंडा कर देती है। आज मैंने महसूस किया, कुछ साल पहले मेरी माँ मरी तो सिर्फ उनका शरीर मरा था पर लोगों की नजरों में उनका अस्तित्व तो बहुत पहले ही मर गया था।  जानती हो अंशु छोटी चाची गरीब परिवार से थी, दादी ने उनकी सुंदरता देखकर चाचा से शादी की थी। माँ बताती थी, चाची के मायके वाले इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं हो रहे थे, क्योंकि उन्हें लगता था, जीवन भर वो इतने सम्पन्न परिवार के साथ अपने कर्तव्यों का निर्वाह नहीं कर पाएँगे।’

कर्तव्य…?’

कर्तव्य… मतलब लेन-देन। भारतीय परिवारों में हर मौके तीज-त्योहार पर आने वाला नेग, न्योछावर,लेन-देन बहू के घर वालों और समधियानें का कर्तव्य ही तो है।’

ईशा की बात सुन अंशु मुस्कुरा दी।

अंशु! उस पर से तुर्रा ये कि इसमें नया क्या है, दुनिया करती है।  दादी ने चाची की सुंदरता पर मोहित होकर उन्हें दो कपड़ों में लाना मंजूर तो किया था पर शादी होते ही दादी यह बात भूल चुकी थी कि चाची के परिवार के लोगों की ऐसी स्थिति नहीं है कि वह हर मौके पर नेग-न्योछावर भेजते रहें पर चाची ने अपने मायके वालों की इज्जत रखने के लिए न जाने कितनी बार चाचा जी से बचा-बचा कर रखे पैसों से कभी मिठाई तो कभी कपड़े खरीद कर मायके की इज्जत रखी।  दादी इंसान के तौर पर बहुत अच्छी थी पर सास…दादी समझ जाती थी कि ये सारा सामान किस तरह से एकत्र किया गया हैं।  ‘सैंया का दाम और भैया का नाम’ दादी का ये एक वाक्य चाची को नश्तर की तरह चुभता पर वह बेचारी क्या करती। घर में जेठानी भी थी, एक अनदेखी सी प्रतिद्वंद्विता बनी ही रहती। आश्चर्य की बात ये प्रतिद्वंद्विता उन दोनों के मन में कभी नहीं उपजती। माँ के चाची से हमेशा से अच्छे संबंध रहे पर दादी, बुआ और नाते- रिश्तेदारों तुलना कर ही देते थे।

एक बार चाची ने मन की गाँठों को माँ के सामने खोलकर रख दिया था।  उन्होंने रोते-रोते माँ को बताया था कि भाई भाभी के आने के बाद बिल्कुल ही बदल गए हैं पर मायके की इज्जत रखने के लिए मन पर पत्थर रखकर वहाँ जाना ही पड़ता है।  औरत का जीवन कभी ससुराल में मायके की इज्जत रखने तो कभी मायके में ससुराल की इज्जत रखने में ही बीत जाता है। माँ अच्छी तरह से समझती थी कि विदाई में मिली चाची की साड़ियाँ ,उनकी खुद की खरीदी हुई होती थी, पर आज समझ में आता है कहीं ना कहीं माँ भी तो मायके की इज्जत ही रख रही थी।  नाना-नानी अपने सामर्थ्य अनुसार सब कुछ कर ही रहे थे पर आज मामा के परिवार का व्यवहार देखकर यह महसूस हुआ कि मायके की दहलीज माँ के हाथ से कब की निकल चुकी थी। जिस परिवार के पास नाना के परिवार के नाम पर उनकी बेटी और उसके परिवार की एक तस्वीर भी उपलब्ध न हो सकी, वो भला माँ से जुड़े हुए रिश्तों की क्या कद्र करेगा।

माँ बस नाना- नानी का मुँह देख कर आती- जाती रही, शायद ससुराल में मायके का सम्मान बचाए रखने के लिए…

अंशु ईशा के चेहरे को देख रही थी और ईशा आसमान में बिखरे उन बादलों के बीच डूबते सूरज को… रिश्तों की भीड़ में आज एक रिश्ता कहीं डूब गया था। 0

सम्पर्कः लाल बाग कॉलोनी, छोटी बसही, मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश -231001, Email- ranjana1mzp@gmail.com

क्षणिकाएँ- मेरे कमरे की खिड़की

- प्रीति अग्रवाल,  कैनेडा

1.

मैं नदिया होकर भी प्यासी,

तुम सागर होकर भी प्यासे,

गर ऐसा है

तो ऐसा क्यों,

दोनों पानी...

....दोनों प्यासे!

2.

उनींदी अँखियाँ

तलाशती सपनें

जाने कहाँ गए

यही तो हुआ करते थे....

उनके पूरे होने की आस में

हम दोनों जिया करते थे....।

3.

करिश्में की चाहत में

कटते हैं दिन,

हम ज़िंदा हैं

करिश्मा ये

कम तो नहीं....!

4.

मेरी कमरे की खिड़की

छोटी सही....

उससे झाँकता जो सारा

आसमाँ, वो मेरा है !

5.

यूँ तो होते हो

पास, बहुत पास

हर पल....

शाम होते ही मगर

याद आते हो बहुत।

6.

जानती हूँ मुझसे

प्रेम है तुम्हें,

दोहरा दिया करो

फिर भी,

सुनने को जी चाहता है....!

7.

चलना सँभलके

इश्क नया है...

सँभल ही गए

तो, इश्क कहाँ है!

8.

रिश्ते

बने कि बिगड़े

सोचा न कर,

थे सिखाने को आए

सिखाकर चले....।

9.

तुम्हारे कहे ने ही

दिल को

छलनी कर दिया,

अनकहे तक तो हम

अभी पहुँचे ही नहीं....!

10.

गिनवाते रहे

तुम अपने गिले,

हम इस कदर थके

कोई शिकवा न रहा...।

11.

एक बार बचपन में

चाँदी का सिक्का उछाला था

चित-पट तय हो ही न पाई

वो जाकर

आसमान में जड़ गया,

वही तो है

जो चाँद बन गया!

व्यंग्यः पद्मश्री और मैं

 - यशवन्त कोठारी

हर काम बिल्कुल सुनिश्चित पूर्व योजना के अनुरूप हुआ। इसमें कुछ भी अप्रत्याशित नहीं था। मुझे यही उम्मीद थी, और मेरी उम्मीद को उन्होंने पूर्ण निप्ठा के साथ पूरा किया था। किस्सा कुछ इस तरह है, उन्होंने इस बार अपने काँटे में एक बड़ा केंचुआ बाँधा, जाल डाला और किनारे पर बैठकर मूँगफली का स्वाद चखने लगे। मैं भी पास ही खड़ा था। पूछा तो उन्होंने बताया, इस बार उन्होंने इस बड़े केंचुए को इसलिए बाँधा है कि कोई बहुत बड़ी मछली उनके जाल में फँसे; और उन्हें इस बात का विश्वास था कि केंचुआ उन्हें निराश नहीं करेगा ।

मैंने उनको मन-ही-मन प्रणाम किया और किनारे पर बैठकर मूँगफली के छिलके कुतरने लगा, क्योंकि अब छिलके ही उपलब्ध थे ।

कुछ समय बाद उनके काँटे में झटका लगा और मुझे करेण्ट लगा। मैं समझ गया- उनके काँटे में कोई बहुत ही बड़ी मछली फँसी है। उन्होंने विजयी भाव से इधर से उधर तक, यानी उत्तर से दक्षिण तक अपनी अकड़ी हुई गर्दन घुमाई । मगर अफसोस, उनकी इस विजयी मुस्कान को देखने वाला मेरे सिवाय और कोई नहीं था। उन्हें इसका हार्दिक दुःख हुआ तथा इस महान दुःख से दुःखी होकर उन्होंने जाल समेटा और काँटा ऊपर खींचा।

दुनिया के आठवें आश्चर्य की तरह उनके काँटे में कुमारी पद्मश्री फँसी हुई थी । मैं उसे फटी- फटी आँखों से देखने लगा- वह मुस्करा रही थी, उसके हाथ में वरमाला थी ; और यह माला उसने बड़े प्रेम से उनके गले में डाल दी मैं टापता रह गया ।

निश्चित बात है कि इस सम्मान के बाद उनके पैर धरती पर पड़ने बन्द हो गए ; उन्होंने मुझे भुला दिया । लेकिन गरीबी की तरह मैंने उनका दामन नहीं छोड़ा और लगातार उनके पीछे लगा रहा ।

यह उनका सौभाग्य था कि वे इतनी जल्दी इस सम्मान को प्राप्त का गए। जो लोग कई दशकों से कलम घसीट रहे हैं, उन्हें इनसे ईर्ष्या हुई और मेरे -जैसे नवोदित खुश हुए ।

कुछ नवोदितों ने कहा- ‘‘देखा, ‘जीनियस’ इसे कहते हैं ! एक डुबकी मारी और पद्मश्री । बेचारे वर्षों से कलम रगड़- रगड़- कर बुड्ढे हो गए । अब कई तो आत्महत्या के लिए राष्ट्रीयकृत बैंकों से ऋण ले रहे हैं’’

पुरानी पीढ़ी के साहित्यकारों को यह बुरा लगा; कहने लगे- ‘‘किसी को शुरू में ही एकदम ऊपर उठाकर बैठा देना, उसके उत्साह को कम करना है। देख लेना, अब इसकी साहित्य- साधना खत्म ! कई लोग इसी तरह प्रतिभाहीन हो गए । बेचारा!’’ उन सम्पादकों की आफत आई, जो उनकी रचनाएँ वापस कर देते थे; तथा वे खुश हुए, जिन्होंने इनकी निरर्थक रचनाएँ भी छापीं, कहेंगे, हमीं ने इनको प्रकाशित किया- मानो वे सूर्य हों !

चूँकि ये मेरे पड़ोसी हैं तथा मैं इनका पड़ोसी; अतः पड़ोसी-धर्म के नाते इनको बधाई देने पहुँचा। वे अपने ड्राइंगरूम में बनियान पहने बैठे थे; एक तरफ कुछ अंग्रेजी व्याकरण की पुस्तकें थीं, दूसरी तरफ सोफा था, जो बेटे की शादी में दहेज में आया था ।

उनकी श्रीमतीजी अब ‘श्रीमती पद्मश्री’ के अन्दाज में पड़ोसी की श्रीमती खन्ना से बतिया रही थीं । श्रीमती खन्ना को यह पद्मश्री- पुराण अच्छा नहीं लग रहा था अतः उन्होंने अपना क्लिटन काण्ड का अड्डा कहीं दूसरी ओर लगाया, और श्रीमती पद्मश्री कहीं और चल दीं ।

मैंने उन्हें गम्भीर देखकर कर्णप्रिय आवाज में बधाई दी । वे पहले शरमाए, फिर मुस्कराए ओर अन्त में इतराए । मेरे पास कैमरा नहीं था, नहीं तो इस वक्त अत्यन्त उत्तम चित्र आते, जो किसी भी अन्तरराष्ट्रीय फोटो प्रतियोगिता में पुरस्कृत होते । खैर, मैंने उनकी अभ्यर्थना की ।

 उन्हें अभिनन्दन के लिए  ‘नगर साहित्य सभा ’ की ओर से आमन्त्रित किया। वे दुःखी नहीं हुए; क्योंकि वे जानते हैं, यह सब अनिवार्य है ।

कुछ अन्य बुद्धिजीवियों ने दबे स्वर में इस सभा में कहा- ‘‘देखो, बेचारे को सरकार ने पद्मश्री दे दी । अच्छा- खासा बुद्धिजीवी था, पढ़ता-लिखता था; मगर सरकार तो सिर उठाते ही कुचल देती है। परिणाम देख लो, पढ़ना- लिखना बन्द, जैसे साठोत्तरी अभिनन्दन हो गया हो ! इसे कहते हैं साहित्यिक हत्या!’’

पद्मश्री खुश है  कि वह पद्मश्री है , मैं खुश हूँ कि मैंने इनका अभिन्दन कर दिया , बुद्धिजीवी खुश हैं;  क्योंकि अब उनकी बारी है- बेचारे अपनी जेाड़-तोड़ में लगे हैं, कभी तो लहर किनारे पर आएगी । बेचारे कुछ वर्षों में पद्मश्री हो ही जाएँगे । सरकार ने एक खैरातखाना खोल रखा है, वह किसी को निराश नहीं करती। जो पद्मश्री की माँग करते हैं ,उन्हें कम-से-कम एक राज्यस्तरीय पुरस्कार तो दिया ही जाता है। वे समझदार थे, बड़े केंचुए की मदद ली और बातचीत ‘भारत रत्न’ से शुरू की; और सरकार ने समझौते के रूप में पद्मश्री दे दी।

 वे कस्बे में वी. आई. पी. की हैसियत से घूमते हैं, और मैं उनके चमचे की हैसियत से। वे जिधर से गुजरते हैं, लोग कहते हैं,‘‘देखो, सरकारी पद्मश्री जा रहा है!’’ ऐसा सम्मान तो आयकर- अधिकारी को भी नहीं मिला होगा ! कोई उन्हें अब शक की निगाहों से नहीं देखता; वास्तव में पद्मश्री थानेदारी से भी ऊँची चीज है ।

मित्रों ! किसी भी साहित्यकार को पद्मश्री न मिलना उनका अपमान, देश व साहित्य का दुर्भाग्य तथा समाज व समाजवादी सरकार की कृतघ्नता है । अतः हे मेरे देश- बन्धुओं, पद्मश्री बाँटो- जितनी जल्दी बाँट सको, बाँटो, ताकि पुराने पद्मश्री लिखना बन्द करें ओर नयों को मौका मिले । और जो लिखते - लिखते सो गये हैं, उन्हें पद्मश्री की चादर से ढक दो! यही न्यायसंगत है अपने काँटों में केंचुआ फाँसो और पद्मश्री लूटो !  0

 सम्पर्कः  86, लक्ष्मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर- 302002 मो. 09414461207

कविताः परिंदा

-
स्वाति शर्मा     


बन जा परिंदों की तरह

भर ले कामयाबी की उड़ान

जो दिखे सबसे बड़ा पर्वत

लगा दे उस से छलांग

 

डरना नहीं गर विश्वास हो खुद पर

और अपने उस रब पर

वो साथ ज़रूर देगा

हर मुसीबत में थाम लेगा

 

थकना नहीं रुकना नहीं

बाधाएँ तो आएँगी

बाधाओं को लाँघकर ही तो

तुझे मंज़िल मिल जाएगी

 

कोशिश तू करता चल

अंजाम तक वो पहुँचाएगा

मंजिल तो चुनकर देख

वो तेरी सीढ़ी बन जाएगा

 

बन जा परिंदों की तरह

भर ले कामयाबी की उड़ान

जो दिखे सबसे बड़ा पर्वत

लगा दे उस से छलांग