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Sep 3, 2021

शोध- बड़े शहर अपने बादल खुद बनाते हैं

लोग अक्सर यह कहते हैं कि बड़े शहरों का माहौल खुशनुमा नहीं लगता। हम यह भी जानते हैं कि शहरों में, कांक्रीटी निर्माण और इमारतों के कारण वहाँ का तापमान शहरों के आस-पास के इलाकों की तुलना में अधिक होता है। लेकिन हाल ही में पता चला है कि ये बड़े शहर अपने बादलों के आवरण को देर तक बाँधे रख सकते हैं और इनके ऊपर गाँवों की तुलना में अधिक बादल छाए रहते हैं।

विभिन्न मौसमों के दौरान लंदन और पेरिस के आसमान के उपग्रह चित्रों के अध्ययन से पता चला कि वसंत और गर्मी की दोपहरी व शाम में शहरों के ऊपर आसपास के छोटे इलाकों की तुलना में अधिक बादल छाए रहे। ये बादल आसपास के इलाकों की तुलना में 5 से 10 प्रतिशत तक अधिक थे। ये नतीजे हैरान करने वाले थे क्योंकि आम तौर पर बड़े शहरों में पेड़-पौधे कम होते हैं जिसके कारण वहाँ का मौसम काफी खुश्क रहता है। इस स्थिति में पानी कम वाष्पीकृत होगा और बादल भी कम बनना चाहिए।

मामले को समझने के लिए युनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग की नताली थीउवेस ने ज़मीनी आँकड़ों पर ध्यान दिया। ऐसा क्यों हुआ इसके स्पष्टीकरण में शोधकर्ता बताती हैं कि दोपहर तक इमारतें (और कांक्रीट के निर्माण) काफी गर्म हो जाती हैं, और उसके बाद ये इमारतें ऊष्मा छोड़ने लगती हैं जिसके कारण वहाँ की हवा ऊपर उठने लगती है जो हवा में रही-सही नमी को भी अपने साथ ऊपर ले जाती है, फलस्वरूप बादल बनते हैं। और खास बात यह है कि ये बादल आसानी से बिखरते भी नहीं हैं।

 शोधकर्ताओं की यह रिपोर्ट एनपीजे क्लाइमेट एंड एटमॉस्फेरिक साइंस में प्रकाशित हुई है। (स्रोत फीचर्स)

बातचीत- मस्तानी आवाज़ की मलिका "उल्लास की नाव" में

उषा उथुपविकास झा और सृष्टि से एक खास बातचीत

 - रचना श्रीवास्तव 

हिन्दी फिल्म संगीत के स्वर्णिम इतिहास में किशोररफ़ीमुकेशलता और आशा जी का युग अद्भुत था और इन महान हस्तियों के बीच अपने आप को स्थापित करना एक दुरूह काम था। इतिहास गवाह है की वे संगीत के कई दशक अपने नाम कर पाए क्योंकि उन सबकी अपनी-अपनी विशेषता थी। रफ़ी साहेब जहाँ ऊँचे सुरों में बड़ी सहजता और मिठास से गाते थेकिशोर दा की गंभीर आवाज़ और उसका चुलबुलापन उनको अनोखा बनाता था और मुकेश जी की मीठी आवाज़ आत्मा तक पहुँचती थी। लता जी की शहद में डूबी आवाज़ और पक्के रागों में उनकी पारंगताउनको विशेष बनाती थी और आशा जीमस्ती भरे गानों की रानी थीं। ऐसे में कुछ नया लेकर आना और इन सबके बीच अपनी पहचान बना पाना बहुत मुश्किल था पर 1971 में एक फिल्म आयी "हरे रामा हरे कृष्णा" और इसका टाइटल सॉन्ग गायाएक नयी गायिका नेजिनका नाम था "उषा उथुप"। हरे रामा हरे कृष्णाबहुत जल्दी सबकी ज़ुबान पर चढ़ गया और आरडी बर्मन की धुन और ऊषा जी की आवाज़ देश विदेश के लोगों पर सर चढ़कर बोलने लगी। इस आवाज़ में एक अलग बात थी और जो इस आवाज़ के दीवाने हुएबस इसी आवाज़ के दीवाने बनकर रह गए। कभी-कभी मुझे लगता है की उषा उथुप लेडी किशोर कुमार हैं क्योंकि उनकी आवाज़ में वही रौब हैवही शरारत है और वही अल्हड़पन और मस्ती है। उषा जी का "हरे रामा हरे कृष्णा" से शुरू हुआ संगीतमय सफर, "शालीमार", "शान"  और सात खून माफ़ से अब तक ज़ारी है। उनके गानों की दीवानगी आज भी बदस्तूर ज़ारी है। हर कलाकार का जीवन विविध रंगों से भरा होता है और हम जितना जानते हैंदरअसल वही पूरा सच नहीं होता। उषा उथुप को एक इंसान और एक कलाकार के तौर पर और बेहतर समझने का प्रयास किया विकास झा जी ने उनकी आत्मकथा "उल्लास की नाव" के द्वारा। उषा जी की आत्मकथा "उल्लास की नाव" के बारे में मैंने उषा जी और विकास जी दोनों से बात की। बड़ी दिलचस्प बातें हुईं और बड़ा मज़ा आया इन दोनों से बात करके और मैं वही आप सबसे बाँट रही हूँ-               

विकास जीउषा जी पर किताब लिखने का विचार आपको कैसे आया ?

मैं किशोरावस्था से ही उषा जी के गाने सुनता था। उस समय मुझे यह नहीं पता था कि मैं एक पत्रकार बनूँगा। उषा जी मेरे लिए बहुत पहले से ही सम्मानीय थीं। उनकी ऊर्जाउनके सुर मुझको बहुत ही प्रभावित करते थे। जब मैंने पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा तो मुझे लगा कि मैं उनका एक लम्बा सा साक्षात्कार लूँ। मैंने कई बार उषा जी के ऑफिस में फ़ोन किया पर अंजन दा हमेशा फ़ोन उठाते और कहते "दीदी बिजी हैंया कहते दीदी रिकॉर्डिंग में हैं। मैं कलकत्ता आता और हर बार निराश होता। हर बार उषा जी से मिलना नहीं हो पाता तब मैं किसी और का साक्षात्कार ले कर या कोई और स्टोरी लिख कर वापस चला जाता। ऐसा करते-करते २० साल निकल गए। इसी समय में मैंने बहुत सी किताबें लिखीं। एंग्लो इंडियन का एक गाँव है उन पर मैंने एक किताब लिखी "माक्सेके गंज"। इसके बाद मैं फिर एक बार कलकत्ता आया और फिर उषा जी के ऑफिस में फ़ोन किया। इस बार नोबिन दा ने फ़ोन उठाया। उनको मैंने अपने २० साल की दास्तान सुनाई। उन्होंने कहा कि आप दीदी का नंबर लीजिये और उनसे बात कर लीजिये। बस यहीं से प्रारम्भ हुआ लिखने का सिलसिला। यहाँ मैं यह कहना चाहूँगा की भगवान जो करता हैअच्छा ही करता है क्योंकि इस इंतजार के समय में मैंने जो किताबें लिखी उससे मेरा आत्मविश्वास बहुत बढ़ गया। मुझे लगा ३००-४०० पन्ने की किताब तो मैं लिख सकता हूँ और शायद यही कारण है कि मैं 'उल्लास की नावलिख सका।

उषा जीजब विकास कुमार जी आपके पास आये और उन्होंने कहा कि वह आपकी जीवनी लिखना चाहते हैं तो आपकी क्या

उषा जी के साथ किताब के लेखक विकास झा

प्रतिक्रिया थी
?


विकास जी ने जब यह कहा तो मुझे बहुत ख़ुशी हुयी थी। जब विकास जी ने मुझे बताया कि वह पिछले २० सालों से मुझसे  मिलने की कोशिश कर रहे थे तो इस बात का मुझे बहुत दुःख हुआ। मैंने उनको सॉरी भी बोला क्योंकि मुझको तो मालूम ही नहीं था कि कोई लेखक मुझसे मिलने की कोशिश कर रहा है। क्या था कि उस समय मोबाइल नहीं होते थेमात्र एक लैंड लाइन था तो उस समय जो भी वहाँ बैठता था वही फोन उठाता था। उस समय वहाँ पर अंजन दास जी रहे होंगे और उन्होंने ही फ़ोन उठाया होगा और बात मुझ तक नहीं पहुँचाया होगा। शायद उन्होंने अपने मन में ही सोच लिया होगा कि क्यों करना है इतना सारा इंटरव्यू और वो वहीं पर इनको मना कर देते होंगे। वैसे मैं ऐसी नहीं हूँ कि आप सिर्फ मेरे मैनेजर से ही बात करें पर मेरे सभी मैनेजर बहुत अच्छे रहे हैं। यहाँ मैं यह भी सोचती हूँ कि समय-समय की बात हैजब तक भगवान नहीं चाहते हैं तब तक कोई काम नहीं होता है।

उषा जीकिताब बनने की यह पूरी यात्रा कैसी रही?

इसकी पूरी यात्रा बहुत ही सुखद रही। जब मैं विकास जी से जुड़ीउसके बाद हमारे साक्षात्कारों का सिलसिला प्रारम्भ हुआ। हमने बहुत से विषयों पर बात की और मुझे इस किताब पर बहुत गर्व है। शायद विकास जी को ऐसा नहीं लग रहा होगा जैसा मुझको लग रहा है क्योंकि मुझ जैसी साधारण गायिका की किताब आयी और वो भी हिन्दी में। मेरी किताब का हिन्दी में आना मेरे लिए बहुत ही ख़ुशी की बात है।

विकास जी जब आपसे प्रश्न पूछ रहे थे तो जीवन का कौन सा ऐसा लम्हा था जिसको बताने में आपको कष्ट हुआ ?

मैं ५१ सालों से गा रही हूँ। बहुत से लोगों ने मेरा साक्षात्कार लिया है। बहुत सी बातें थीं जिनको मैंने किसी को नहीं बताया। परन्तु जब मैं इनके साथ बात कर रही थी तब बहुत सहज लगा। विकास जी मुझसे हिंदी में बात करते थे
इनसे मैंने बहुत कुछ सीखा है। विकास जी नोटबुक निकालते थे और उस पर लिखते जाते थे। जब पहली मुलाकात हुई तो मैंने उनसे कहा क्या आप डिक्टोफोन में रिकॉर्ड करेंगेतो इन्होंने कहानहीं मैं पूरा हाथ से लिखूँगा। उनकी बात सुन कर मुझको बहुत ही अच्छा लगा क्योंकि मुझको भी लिखना बहुत अच्छा लगता है। कागज़ और कलम से मुझको बहुत प्रेम है। आजकल कोई नहीं लिखता तो मुझको इनका लिखना बहुत अच्छा लगा। साक्षात्कार के प्रारम्भ में बहुत ही उबाऊ हिस्सा आया जहाँ मैंने साधारण प्रश्न जैसे कब काम करना प्रारम्भ कियाकहाँ से काम करना प्रारम्भ कियाकैसे शुरू किया इत्यादि। फिर मैंने कहा कि क्या मैं उन विषयों पर भी बात करूँ जिन पर आज तक मैंने बात नहीं किया हैजैसे अपने व्यक्तिगत जीवन में या व्यवसायिक जीवन में किन संघर्षों का सामना किया हैमैं हमेशा कहती थी की नहीं मैंने नहीं किया है परन्तु कभी भी मैंने यह नहीं बताया कि पोलियो के बुखार के बाद मुझको बहुत परेशानी हुई थी। मुझे लकवा हो गया था। जिसको कहते हैं हैमिपैरासिस।

इस बारे में कोई नहीं जानता। बहुत से लोगों को अपनी परेशानियों के बारे मैं बात करना बहुत ही अच्छा लगता है परन्तु मुझको नहीं लगता हालाँकि मुझे बहुत सी परेशानियों का सामना करना पड़ा पर मैंने उन परेशानियों में भी अच्छाई ढूंढने की कोशिश की। जब आपकी कोई जीवनी लिख रहा हो तो सबसे महत्त्वपूर्ण होता है उस पर विश्वास करना। मैंने विकास जी से अनुरोध किया कि आप इसको सेंसेशनल नहीं बनाएँगे। मुझको सेंसेशनल बाते करना अच्छा नहीं लगता। मुख्यमंत्री जतिन चर्टजी ने मुझे गाने से बैन कर दिया था पर आप कभी नहीं देखेंगी कि मैंने कभी उस घटना के बारे में बात की हो पर विकास जी से मैंने सारी बातें की क्योंकि मैं उन पर विश्वास करती हूँ। जो भी आपकी जीवनी लिख रहा है उस पर आपको विश्वास होना चाहिए, उसका आदर करना चाहिए और उसको आपसे और आपको उससे ईमानदार होना चाहिए।

मैंने और मेरी बहन इन्दिरा ने एक ही परिवार में शादी की है पर मेरी शादी ठीक नहीं चली पर मैंने कभी इस बारे में बात नहीं की। मुझे अच्छा नहीं लगता है ऐसी बातें करना पर विकास जी से बात की मैंने। मुझे उनसे बात करना बहुत सहज लगा। इस किताब में उन्होंने मेरे पूरे परिवार के बारे में बहुत ही गहराई से लिखा है।

आप हिन्दी इतनी अच्छी कैसे बोल लेती हैं ?

मुझे भाषाएँ अच्छी लगती है। मैं मुम्बई मैं पली बढ़ी हूँवहाँ मेरी दूसरी भाषा हिन्दी थी और हमारी पड़ोसी थीं ज़मीला। उनसे भी मैंने बहुत सीखा। उनके साथ ही पली हूँ। उनके साथ रह कर मैंने बहुत उर्दू भी सीखी है।

विकास जीउषा जी की हिन्दी के बारे में आप क्या कहना चाहेंगे?

इस विषय में मैं एक घटना का ज़िक्र करना चाहूँगा। "उल्लास की नाव" के विमोचन के लिए पटना में एक कार्यक्रम रखा गया था। कार्यक्रम के बाद इनके सम्मान में एक छोटी सी पार्टी रखी थी। उस पार्टी में बिहार के चीफ सेक्रेटरी त्रिपुरारि शरण जी भी आये थे और बोले आपकी किताब हिन्दी में आयी है तो आप एक कागज़ पर हिन्दी में मेरा नाम लिख दीजिये। क्योंकि जब आप किताब पर हस्ताक्षर कीजियेगा तो मेरा नाम सही लिखा हो इसलिए कह रहा हूँ। मैं सोच में पड़ गया कि पता नहीं उषा जी लिख पाएँगी या नहीं पर यकीन मानिएउषा जी ने एकदम सही लिख दिया तो त्रिपुरारि जी ने कहावाह मान गया आपको उषा जी आपके चरण छूता हूँ। तो देखिये इनकी हिन्दी कितनी अच्छी है।

विकास जीआपने अपनी किताब में अलग-अलग विषय लिया है और उसका शीर्षक बहुत ही सुन्दर दिया है। क्या आपने नाम देकर चैप्टर लिखा है या चैप्टर लिख कर नाम दिया है ?

जवाब में हँसते हुए वे पूछते हैंये बताइयेमाता-पिता बच्चे का नाम उसके जन्म से पहले रखते हैं या बाद मेंबाद में ही नतो मैंने भी शीर्षक बाद में ही रखा था। हमारी किताब का एक विषय है "पतंग उड़ाती लड़कीआप शायद नहीं जानती होंगी की उषा जी पतंग उड़ाने में बहुत माहिर हैं।

आपने किताब का नाम 'उल्लास की नावकैसे सोचा?

मैंने उषा जी को दो नाम भेजे थे, "उल्लास की नौका" तथा "उल्लास की नाव" और इन्होंने तुरंत कहा बस "उल्लास की नाव" ही ठीक है और किताब का नाम "उल्लास की नाव" पड़ गया।

विकास जीइस किताब की विशेषता क्या है ?

जब मैंने किताब लिखने का विचार किया था तो ऊषा जी को पहले ही कह दिया था आप बहुत बड़ी और मशहूर गायिका हैं और ये बात सबको मालूम है। आपके इतने सारे प्रशंसक हैं और लोग यह जानते हैं इसलिए यदि यही मैं भी लिखूँ तो कोई खास बात नहीं होगी। लोगों को कमल में रूचि नहीं होती। उनको जानना होता है कि यह कमल जो खिला है उसके नीचे कितना कीचड़ है। कहने का मतलब यह कि जो कमल खिला है उसका संघर्ष कहाँ से प्रारम्भ हुआ है। मैंने उषा जी से यह भी कहा था कि आम तौर पर जीवनी एक अभिनन्दन ग्रंथ बन जाता है। मैंने कहा था कि मैं ऐसा नहीं कर सकता हूँ। यदि आप इस बात के लिए राजी हैं कि इसमें उस कीचड़ की बात आये और इस कमल के संघर्ष की कहानी आये तो ही मैं इसको लिखूँगा। ऊषा जी बहुत ही ईमानदार हैंउन्होंने मेरी बात के बारे में सोचा और फिर कुछ दिनों बाद मुझसे कहा कि मैं बहुत परेशान हूँ। तो मुझको लगा क्या मैंने कोई ऐसा प्रश्न पूछ लिया जो मुझको नहीं पूछना चाहिए थाक्या मुझसे कोई गलती हो गयीतब इन्होंने कहानहीं आपसे कोई गलती नहीं हुई है और इसके बाद उषा जी ने ऐसी-ऐसी बातें बताई जो उन्होंने कभी किसी भी साक्षात्कार में नहीं कहा और वे सारी दुर्लभ बातें इस किताब में हैं। उषा जी ने सारी बातें खुल कर मुझको बताया और कहा कि यह अब आप पर है कि अब आप इसको कैसे लिखते हैं।

कुछ खट्टी-मीठी बातों का पिटारा है ये किताब मसलन इनके घर के प्रांगण में एक अमरुद का पेड़ था। उषा जी जब स्कूल से लौटती थीं तो घर से तकिया लाकरअमरुद की जो वी बनाती हुयी डाल होती है उस पर लेट कर कॉमिक्स पढ़ती थीं। इसमें उषा जी से जुड़े सभी चरित्रों की कथा है और जब उन सब को आप जोड़ेंगे तो उषा जी की जीवनी बन जाएगी। इसमें जानी उथुपब्रिग्रेडियर उथुपसासु माँ हैंतुलसी अम्माहम्बी मामामद्रास पातुबा और मामा बलराम नादर इत्यादि सभी लोगों के बारे में लिखा है। मेरे लिए यह सभी लोग उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं जितनी की उषा जी। एक चिन्नी का चरित्र है जो उस समय मालगोट सिगरेट पीती थी और कहानियाँ सुनाती थीं। उषा जी बताती हैं कि वह उनके ननिहाल में आतीं थींउषा जी छोटी सी थीं और जब चिन्नी सिगरेट का छल्ला बनाती थीं तो ऐसा लगता था कि कहानी वहीं से निकल रही है और चिन्नी हर बार नयी कहानी सुनाती थी। उषा जी के गाने नौजवानों को बहुत पसंद हैं और उन नौजवानों में मैं भी था और इनके तराने गाते गाते मैंने "उल्लास की नाव" लिख दी।

अभी आपने "पतंग उड़ाती लड़की" के बारे में कुछ कहा थाउसके बारे में कुछ बताइये।

उषा जी पतंग का माँझा बनाने में बहुत उस्ताद हैं। उषा जी के पिता स्वर्गीय बैद्यनाथ सोमेश्वर स्वामी जी पुलिस कमिशनर थे। जिनका बहुत बड़ा बंगला था। दोपहर में जब सभी लोग सोते थे तो उषा जी अपने भाई बहनों के साथ खेलती थीं और घर में से कोल्ड ड्रिंक्स की काँच की बोतल को ला कर पीस कर उसका चूरा बनाती थींउसको धागे पर घिसती थीं। "नेवर नो हाउ मच आई लव यू" ये उषा जी का गाना है जिसे उन्होंने मद्रास में गाया था। वह इनका शुरूआती दौर था और उसी को लेकर यह चैप्टर बना।

उषा जीआप इस बारे में क्या कहना चाहेंगी ?

जी विकास जी सही कह रहे हैं। मेरे जैसा माँझा कोई नहीं बना सकता था। मैं काँच को चूरा बना के उसको मैदे के साथ मिला कर धागे पर घिसती थी। मेरे भाई कहते थे कि एक चरखी भर का माँझा बन गया और बनाओ। मेरे द्वारा बनाये गए माँझे से सारी पतंग कट जाती थी। सोच के देखिये क्या आज की कोई माँ अपने बच्चे को माँझा बनाने देगी?

उषा जी, "मल्लिगई पू मल्लिगई पू" एक चैप्टर है इसके बारे में कुछ बताइये।

"मल्लिगई पू" तमिल शब्द है। मेरा पहला तमिल गाना है पर है वो इंग्लिश में '
उषा जी के साथ सृष्टि झा
अंडर द मैंगो ट्री।।।।स्वीट मल्लिगई पू" बस इसी के
  नाम पर इस चैप्टर का नाम है। मल्लिगई का मतलब होता है मोगरा/बेला और पू का मतलब होता है फूल।

उषा जीइस किताब का अंग्रेजी में अनुवाद भी हो रहा है क्या आप उसके बारे मैं कुछ बताना चाहेंगी ?

जी हाँ इस किताब का अंग्रेजी में अनुवाद विकास जी की बेटी सृष्टि करने जा रही हैं। जब मैं पहली बार इनकी बिटिया से मिली तो मुझे बहुत अच्छा लगा और उसका नाम भी बहुत अच्छा लगा। आगे की बात सृष्टि आपको बताएंगी-

सृष्टिइस किताब का अंग्रेजी में अनुवाद करने के लिए किस बात ने आपको प्रेरित किया ?

जब मेरे पापा कोई चैप्टर समाप्त करते थे तो मुझको पढ़ने के लिए देते थे तो यह कहना गलत न होगा कि मैंने इस किताब को सबसे पहले पढ़ा है। मैं उषा जी की कहानी सुनती थी और मुझको इससे लगाव हो गया था। जब मैं पहली बार उषा दीदी से मिली तो ऐसा लगा कि एक दोस्त हैं। हम दोनों में उम्र का बहुत अन्तर है पर यदि आप हमको साथ देखेंगी तो लगेगा की दो सहेलियाँ हैं। जब इस किताब का प्रचार हो रहा था तो उसी समय इस किताब के अंग्रेजी अनुवाद की चर्चा शुरू हो गयी थी। एक दिन मैं अपने कार्यालय से वापस आ रही थी तो मैंने पापा को कॉल किया और कहा कि मैं इस किताब का अनुवाद अंग्रेजी में  करना चाहूँगी। मुझे पापा के लिखने के तरीका का पता है तो मुझे लगा कि इस किताब की खुशबू बची रहे और अनुवाद भी हो जाये इसलिए मैंने "उल्लास की नाव" का अनुवाद करने का सोचा। जब मैं इसका अनुवाद कर रही थी तो पढ़ कर अकेले में हँसती थी।

अंग्रेजी की किताब का शीर्षक क्या होगा ?

जी अभी इस बारे में बात चल रही है। कुछ निर्णय नहीं लिया है परन्तु "उल्लास की नाव" के आस पास ही कुछ होगा।

उषा जी, "उल्लास की नाव" पढ़ने के बाद आपको लोगों की क्या प्रतिक्रिया मिली ?

बहुत से लोगों की प्रतिक्रिया मिली। मेरे ज्यादातर लोग अंग्रेजी बोलने वाले हैं पर मेरे ऐसे दोस्त जो हिन्दी जानते हैं उन्होंने यह किताब पढ़ी और बहुत खुश हुए। उन्होंने कहा कि किताब पढ़ कर उनको बहुत कुछ पता चला। उनको यह नहीं मालूम था कि मैं ब्राह्मण परिवार से आयी हूँ। मैं सभी भाषाओँ में गाने गाती हूँ तो उनको पता ही नहीं चलता था कि मैं कहाँ से हूँ। लोगों ने यह भी कहा की किताब का वह हिस्सा जहाँ मेरे ग्रैंडपैरंट्स के बारे में बाते की गयीं हैं उनको बहुत अच्छा लगा। एक व्यक्ति ने लिखा कि वो अपनी दोस्त के साथ मेरा शो देखने आता था। उस समय उनकी शादी नहीं हुई थी पर आज उनके पोते-पोतियाँ है। उन्होंने लिखा कि आपके संगीत के कारण ही हम इतने पास आये थे।

विकास जीआपकी भाषा शैली बहुत ही प्रवाहवान है। उषा जी की जीवन इतनी सहजता से लिखना कितना आसान था और कितना कठिन?

भाषा के सन्दर्भ में मैं ऐसा मानता हूँ कि यह नदी-नाव संयोग है क्योंकि उषा जी का पूरा व्यक्तित्व बहुत अद्भुत है। मेरा उपन्यास है "मैकलेकसी गंज" उसमें भाषा कल्प कुछ अलग है। कर्नाटक के एक गाँव की कहानी है जिसमें भाषा एकदम विभिन्न है। एक लेखक के रूप में मेरा मानना है कि जो भी विषय होता हैउसके हिसाब से ही भाषा अपने रूप बदलती है।

"उल्लास की नाव- भाग २" लिखने का विचार है क्या ?

मैं तो उषा जी के लिए कहता  हूँ  जीवेत् वर्षम् शतम्। उषा उथुप जी १०० वर्ष की हों और मैं भी इस दुनिया में रहूँ कि भाग-२ लिख सकूँ:)

बस इसी अनुरोध के साथ बातचीत का सिलसिला यही रुकता है की आप सब पाठक "उल्लास की नाव" में आप एक बार ज़रूर बैठिये और कौन जानेइसी नाव का एक यात्रीएक और उषा उथुप बनने के गुर सीख जाएँ! 

दो कविताएँ

-शिखा सिंह

1. खामोश हवाएँ

खामोश हवाएँ अपनी
ताकत की पहचान जानती है।
जब चले  गर्म होके
अपने प्रलय का ईमान जानती है।
झुककर  चलती है वो हमेशा
अपने हदों का मान जानती है।
मोहब्बत जब करती है सब से
जिस्म छूने की शरारत जानती हैं।
हर मौसम में कैसे है बदलना
अपने हुनर का काम जानती है।

2. सोच की लड़ाई

बादलों का रुख और नरिया कभी नहीं बदलता
चाहे विदेश में हो चाहे अपने देश में हो
न बदलती है कभी फितरत चाँद तारों की
चाहे मंदिर में हो चाहे मस्जिद में हो
न बदलती आदत कभी दिन और रात की
चाहे गरीब का शियाना हो या अमीरों का महल
न बदली कभी बारिशों की बूँद की ठंडक
चाहे मिट्टी के घरों में हो चाहे संगमरमर की हवेली में हो
न बदलता कभी हवाओं का चलन
चाहे शहर में हो चाहे गाँव में हो
न बदलती कभी भूख
चाहे अमीर की हो चाहे गरीब की हो
न बदलता कभी चलना बैठना
चाहे सवर्ण की हो चाहे दलित की
न बदलती कभी बोलने की आवाज़
चाहे बच्चे की हो चाहे बूढ़े की हो
न बदलते कभी इंसान के अंग
चाहे जवान के हो चाहे बुजुर्ग के
बदलता है तो बस आदमी
आदमी के लिये स्र्वार्थ के लि
इच्छा पूर्ति के लिए
फिर भी अकेला जाता है दुनिया के लि


सम्पर्कः जे एन वी रोड फतेहगढ़ , निकट आर एस प्लाजा
फतेहगढ़ फर्रुखाबाद- 209601
मो.  9415 236 990

कहानी - देवी

-माला वर्मा

बूढ़ी माँ को सब पता, उसके बाल यूँ ही धूप में सफेद नहीं हुए। मंदिर, ठाकुर देवता का चक्कर न होता तो बेटा-बहू, माँ के पास इस तरह अल्ल-सुबह न धमकते, वो भी महीनों बाद। घर में पैर रखते बेटे ने माँ से कहा, "हमें काली दर्शन के लिए मंदिर जाना है। तुम भी चली चलो, बड़ी मुश्किल से छुट्टी मिली है। आज दर्शन नहीं हुए तो जाने कब मौका मिले। इतनी दूर से आया हूँ, खास इसी काम के लिए। आज का दिन भी शुभ है। माँ, जल्दी तैयार हो जाओ, रसोई की चिन्ता पीछे करना।"

माँ ने बेटे का उतावलापन देखा और कह उठी, "बेटा, मैं मंदिर जाकर क्या करूँगी, और इस उमर में मुझसे इतनी सीढ़ियाँ भी तय न होंगी। वर्षों हो गए काली मंदिर देखे, अब न इतना भक्तिभाव रहा न शारीरिक शक्ति बची है। तुम दोनों हो आओ, मैं पोती को घर में सँभाल लूँगी। इतनी छोटी बच्ची वहाँ जाकर क्या करेगी। न खुद सीढ़ियाँ चढ़ पागी, न ही तुम दोनों उसे लेकर चल पाओगे। आज रविवार है, बहुत भीड़ मिलेगी।"

"नहीं माँजी, हम देवी दर्शन के लिए ही आ हैं और बिटिया क्या मंदिर नहीं जागी! माँ काली के पैर उसे भी तो छुआने हैं। आप जल्दी तैयार हो जाएँ, वरना हमें देर हो जागी- हमें शाम तक लौटना भी है अपने घर। कितने दिनों से प्लान हो रहा था पर कमबख्त इन्हें नौकरी से फुर्सत नहीं।" बहू ने झुंझलाहट दिखाई।

आखिरकार, अनिच्छा ही सही माँ को भी मंदिर जाने के लिए तैयार होना पड़ा। उनका दिल अच्छी तरह समझ रहा था कि माँ को ले जाने की जिद क्यों हो रही है। जाने कब, कैसे, किस बात के लिए माँ की जरूरत पड़ जाए। और वही हुआ जिसका अंदेशा था।

सीढ़ियों पर दर्शनार्थियों का रेला-पेला लगा था। बेटा-बहू माँ पोती कुछ सीढ़ियाँ चढ़ीं ज़रूर पर ऊपर जाकर देवी दर्शन करता दुरूह कार्य था। माँ ने आगे बढ़ने से हार मान ली नीचे उतर एक बेंच पर बैठ गई। मरता क्या न करता। बेटे ने बहू को अंग्रेज़ी में समझाया, छोटी बच्ची को ऊपर लेकर जाना संभव नहीं, उसे माँ के पास यहीं नीचे छोड़ देते हैं। हम दोनों का दर्शन करना ज़्यादा ज़रूरी है। बच्ची के साथ-साथ हमारे जूते-चप्पल और गाड़ी की भी रखवाली हो जायेगी। वरना तो मन तनाव में पड़ा रहता। स्साले... ड्रावर को भी आज ही छुट्टी लेनी थी।"

बहू इतनी जल्दी बेटे की बात सुन-समझ-मान लेगी, इस बात की उम्मीद माँ को न थी और सुझाव पसंद क्यों न आता इसमें उनका ही तो फायदा था। बच्ची व चीज़ सामान की देखभाल भी हो रही थी।

बहू ने चटपट बेटी को माँ के पास छोड़ा और ढेरों नसीहतें बच्ची को ये खिला देंगी, पिला देंगी, सू-सू करने पर नैपी चेंज कर देंगी आदि-आदि सुझाव देते हुए सीढ़ियाँ चढ़ने लगी। माँ ने खुशी-खुशी बेटे-बहू का आदेश शिरोधार्य किया और दीन-दुनिया भुला पोती के साथ बात करने लगी। अनायास उन्हें जैसे ज़माने भर की खुशियाँ मिल गई हों। पोती के साथ बात करने को तरस गई थी। चाहते हुए भी उन्हें संग साथ नहीं मिलता। उधर पोती दादी-दादी करके बेहाल हुई रहती तो इधर दादी मजबूरी में अपनी घर-गृहस्थी में सिमटी रहती। खैर, अभी जो वक्त मिला है उसका आनन्द वह प्रतिक्षण उठा लेना चाहती थीं। ईश्वर तो कहीं भी मिल सकता है पर इस पोती का साथ दुर्लभ है।

घंटे भर वे पोती के साथ बैठी बच्चों जैसी बातें करती रहीं। दादी निहाल तो पोती भी मम्मी डैडी को भुला दादी के साथ चिपक उन दोनों की बातें बचकाना थीं, उसमें कोई ज्ञान दर्शन, जटिलता, बड़ी-बड़ी बातें न थीं;  लेकिन दोनों आपस में मगन। चेहरे पर कभी मुस्कान तो कभी खिलखिलाहट। भीड़ में रहकर भी दोनों अपने में गुम। भावनात्मक खुशियों का आदान-प्रदान चल रहा था, तभी उनके एक परिचित पड़ोसी दम्पति करीब आ और कह उठे, “माँजी, आप मंदिर जाना चाहती हैं तो हो आयें, हम बच्ची को देख लेंगे। शायद आप इसकी वजह से ऊपर नहीं जा पा रहीं। चिन्ता न करें हम ग्रुप में हैं और कहें तो हम भी संग हो जाएँगे। बच्ची को मैं गोद में उठा लूँगा। देवी का दर्शन जितनी बार हो उतना ही सौभाग्य।"

दादी ने झट पोती को अपने करीब किया और उसके कोमल नन्हें पैरों को बार-बार छूकर प्रणाम किया और कह उठीं, “मेरी असली देवी तो मेरे पास है। मंदिर की देवी तो काली है, मेरी देवी- देखो कितनी गोरी कितनी सुन्दर है। क्या तुम्हें इसके चेहरे में किसी देवी माँ का दर्शन नहीं हो रहा? इसे त्याग तो मैं यमराज के पास भी न जाऊँ, फिर माँ काली क्या बला है। बड़ी किस्मत से हाड़-माँस की देवी हाथ लगी है, इसे कैसे छोड़ दूँ...!"

पड़ोसी दम्पती चकित थे। वाकई जहाँ पोती के निष्पाप, भोले मनभावक खूबसूरत चेहरे पर सूरज की छन कर आती स्वर्णिम किरणें उजास फैला रही थीं वहीं दादी बच्ची को सीने से लगा मंत्रमुग्ध, मानों ऊपर वाले लौ लगा बैठी हों। विलक्षण था यह दृश्य !

सम्पर्कः हाजीनगर, उत्तर 24 परगना, पश्चिम बंगाल, 743135, मोबाइल : 9874115883

नवगीत - होम करते हाथ जलें

-क्षितिज जैन अनघ


यज्ञ नहीं रुकना

चाहिए, चाहे होम

करते हाथ जलें।

 

पूरी प्रजा का डाल

दिया, कुछेक

अभागों पर भार

और मढ़ दिए

माथे पर,दान

और परोपकार।

 

समझ नहीं आता

बेचारें, भार उठाएँ

या आगे चलें?

 

जिनका धर्म बन

चुका, जीवन

भर त्याग

उन्हें मिलती बस

ताड़ना, दूभर

कोई अनुराग।

 

देश के स्तम्भ

बनकर,गए हैं

केवल छलें।

 

सरकार आजतक

एक ही, बात  

कहती है आई

समाज की संपत्ति

है बस,उनकी

गाढ़ी कमाई।

 

मुफ्तखोरों से तो

लेकिन, ये लाख

गुना हैं भलें।