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Sep 10, 2020

रंगमंच

महान चित्रकार विन्सेंट वॉन गांग
विन्सेंट ए फ्लैश बैक

-  विनोद साव 

चित्रकार और हमारे फेसबुक फ्रेंड गिलबर्ट जोसेफ और उनके कलाकार बेटे पंकज, 4 मार्च 2020 को अपनी कार लेकर आ गए और बड़े आग्रहपूर्वक मुझे रायपुर मुक्ताकाशी में ले गए; जहाँ अंतरराष्ट्रीय चित्रकार वॉन गॉग पर निर्देशित एक नाटक खेला गया, जो एक दमदार रिसर्च प्ले था।
     19 वीं सदी के मशहूर डच आर्टिस्ट विन्सेंट वॉन गॉग के जीवन पर आधारित नाटक है ‘विन्सेंट ए फ्लैश बैक यह रायपुर में प्रदर्शित इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालयखैरागढ़ के कलाकारों की बड़ी उम्दा प्रस्तुति थी। यह उनकी पाँचवीं प्रस्तुति थी। इसके पहले मुम्बई में सल प्रस्तुति हो चुकी है और अगली प्रस्तुति बीकानेर में किए जाने की घोषणा मंच पर की गई।
वॉन गांग की एक 
मशहूर पेंटिंग 'गेहूं का खेत'
     अमूमन नाटकों की सबसे बड़ी समस्या उनकी माइक व्यवस्था होती है, जिसके कारण नाटकों के संवाद दर्शकों तक नहीं पहुँच पाते हैं। पर यहाँ निर्देशक ने इस बात का ध्यान रखा और ध्वनि प्रसारण की ऐसी व्यवस्था रखी कि दर्शकों/श्रोताओं ने इसे सुना और इसकी प्रस्तुति को सराहा व सफल बनाया। नाटक में ध्वनि के साथ-साथ प्रकाश एवं संगीत सज्जा भी कथा के अनुकूल थी इसलिए भी इस दुखांत नाटक का सीधा असर दर्शकों पर हुआ, जो उनके मन-मस्तिष्क को झकझोर गया।
नाटक का सूत्रधार
 पंडवानी गायक
     पिछले दिनों रायपुर फिल्म फेस्टिवल में कुछ लघु-फिल्में दिखलाई गई थीं। उनके लिंक रायपुर की एक प्रशंसिका ने भेजे थे। इनमें लेखिका अमृता प्रीतम और उनके चित्रकार पति इमरोज पर बनी एक लघु-फिल्म थी। इसमें पति-पत्नी के अंतर-सम्बन्धों के बीच पति, पत्नी और वह यानी साहिर की अंतरंग कथा को आधार बनाया गया था। इसमें कलाकार की कला और रोमान के मध्य उपजे द्वन्द्व का प्रयोगात्मक चित्रण हुआ था।
      इसे देखने के थोड़े दिनों बाद किसी चित्रकार के जीवन पर बनी यह दूसरी कथा देखने को मिली- नाटक विन्सेंट ए फ्लैश बैकमें। मैंने निर्देशक से पूछा था कि विन्सेंट के जीवन पर एक उपन्यास भी लिखा गया था इरविंग स्टोन द्वारा लस्ट फॉर लाइफ’ (जीवन लिप्सा).. क्या आपके नाटक का कथानक उससे प्रभावित है?’ उन्होंने सहमति व्यक्त की और बताया कि यह उपन्यास मुझे खैरागढ़ विश्वविद्यालय के ग्रंथालय में प्राप्त हो गया था। इस उपन्यास पर फिल्म भी बन चुकी है।
       नाटक के आरंभ में अपने मकान मालिक की बेटी जेनी पर आसक्त होने के दृश्य हैं। विन्सेंट जेनी द्वारा नकारे जाने पर क्रोध और
नाटक में लाइट एंड साउंड का कमाल
उत्तेजना में उसका गला पकड़कर चिल्लाता है जेनी! मैं तुम्हें प्यार करता हूँ और तुमसे शादी करना चाहता हूँतब अपना गला छुड़ाते हुए जेनी भी गुस्से से कह उठती है कि तुम मुझे प्यार करते हो, तुम्हारा दोष है। मैं हर प्यार करने वाले आदमी से शादी तो नहीं कर सकती।नहीं अपनाने पर चोट खाया प्रेमी विन्सेंट एक दिन दुनिया का महान चित्रकार बनता है। उसके जीवन में आईं एक अन्य विवाहित महिला के साथ भी नाटक में विन्सेंट के जन्मदिन पर मद्यपान करने के कुछ दृश्य हैं। इन दृश्यों के जरिए विन्सेंट के जीवन के अनेकों पृष्ठ खुलते चले जाते हैं।
एक दृश्य में अपने
 चित्रकार मित्रों से परामर्श
     विन्सेंट की कला और उसके दर्द को उसके छोटे भाई थियो ने समझा और उसने दिलासा दी और उसकी पेंटिंग्स के ग्राहक बनाकर उसे आर्थिक मजबूती दिलाई। विन्सेंट की मुलाकात अपने देश हालैण्ड के वरिष्ठ चित्रकार अंतव माउव से हुई, जिन्होंने उन्हें आगे बढ़ाया। माउव ने उसे कहा कि विन्सेंट.. कला वाहवाही पाने के सतही प्रयोगों से नहीं बल्कि गंभीर रचनाकर्म से ऊँचाई को हासिल करती है। तुम्हारे भीतर अपनी कला को ऊँचाई देने की पूरी क्षमता है। तुम अब ड्राइंग और स्केच से बाहर निकलकर ऑइल पेंटिंग्स और पोर्ट्रेट पर काम करो।
विन्सेंट वॉन गांग मुख्य अभिनेता
 विन्सेंट के कलाकर्म के प्रति समर्पण और अपने समय से आगे निकल जाने के कारण पॉल गॉगा जैसे कुछ कला-समीक्षकों से उनके जमकर मतभेद हुए, तब क्रोध में आकर विन्सेंट ने उन्हें अपने घर से बाहर का रास्ता दिखाया। संभव है मूल्यांकन के अभाव में या यह किसी सृजनशिल्पी के अपने समय से आगे निकल जाने की व्यथा होगी, जब नाटक के अंत में विन्सेंट ने अपने सिर में गोली मारकर आत्महत्या कर ली। इस तरह उन्होंने सैंतीस बरस की कम उम्र में अपने जीवन का अंत तो कर लिया; पर अपने कला कर्म के केवल एक दशक की अल्पावधि में बड़ी कामयाबी हासिल कर ली थी। सूरजमुखी, तारों भरी रात, गेहूँ के खेत पर कौव्वेआइरिस, आलूहारी जैसी उनकी कई पेंटिंग्स हैं, जिन्हें हम यदा कदा देख तो पाते हैं ,पर इस बात से अजान होते हैं कि ऐसे दुर्लभ पेंटिंग्स के विलक्षण कलाकार विन्सेंट वॉन गॉग थे। इनमें सूरजमुखी ज्यादा जाना हुआ चित्र रहा।            विन्सेंट कला के शहर पेरिस में रहे। उन्हें पेरिस की धूप पसंद थी। इस धूप के पीलेपन का उनके चित्रों पर गहरा असर रहा। उनकी पेटिंग्स सूरजमुखीऔर गेहूँ के खेतमें यह पीला रंग पूरे चटकपन के साथ चमकता है। 
मुक्ताकाशी मंच रायपुर में नाटक के 
प्रदर्शन के बाद परिचय देते कलाका
     विन्सेंट वॉन गॉग के मुख्य किरदार की भूमिका में डॉ. चैतन्य अठलावे अपने अभिनय से जान डाल देते हैं। उनमें अभिनय क्षमता इतनी कूटकर भरी है कि वे फिल्मों के भी एक अच्छे चरित्र अभिनेता सिद्ध हो सकते हैं। अपनी नुकीली नाक के कारण वे दिखते भी वॉन गॉग की तरह हैं। नाटक में अनेकों स्थान पर झूमती हुई आकृतियों के माध्यम से चित्रकार के द्वंद्व और उसकी मानसिक उथलपुथल को दर्शाया गया है। नाटक के युवा निर्देशक डॉ. आनंद कुमार पाण्डेय हैं। यह उनके नाट्य-निर्देशन की विशेषता कही जा सकती है कि नाटक का सूत्रधार छत्तीसगढ़ी में पंडवानी गाते हुए एक महान चित्रकार की दुखांत जीवन कथा को कहता है। रागी के साथ इसके संवाद बड़े चुटीले बन पड़े हैं। मूल उपन्यास से लिए कुछ संवाद मार्मिक हैं। नाटक के सभी पात्र प्रभाव छोड़ते हैं।
सम्पर्क: मुक्तनगरदुर्ग छत्तीसगढ़-491001मो.9009884014, Email- vinod.sao1955@gmail.com

आलेख

हर घड़ी बदल रही है, रूप जिंदगी
-डॉ. महेश परिमल
हर घड़ी बदल रही है, रूप जिंदगी,
छाँव है कभी, कभी है धूप जिंदगी
लोग कहते हैं कि गति ही जीवन है। इसका आशय यही हुआ कि यदि जीवन में गति नहीं है, तो आपका जीवन संतुलित नहीं है। आप यदि ठहर गए, तो जीवन भी ठहर जाता है। ठहरना  या थम जाने को ठहरे हुए पानी की संज्ञा देते हुए कहा गया है कि ठहरा हुआ पानी गंदा होता है, जबकि बहता हुआ पानी हमेशा निर्मल होता है। पर क्या गति हमेशा ही होनी चाहिए? क्या ठहराव में जीवन नहीं होता? जीवन में कई पल ऐसे भी आते हैं, जब हम कहते हैं कि काश... समय कुछ ठहर जाता। यानी उस वक्त भी गति होती है। कई बार ठहरना लाभकारी होता है। वह भला कैसे....
छत्तीसगढ़ी में एक शब्द है अगोरना यानी ठहरकर प्रतीक्षा करना। रास्ते पर कुछ दूरी से दो लोग जा रहे होते हैं, तो पीछे वाला उसे अगोरने के लिए कहता है। यानी तुम कुछ ठहर जाओ, तो मैं भी तुम्हारे साथ हो लूँगा। इस तरह से कुछ पल का यह ठहराव व्यक्ति को एक साथी दिला देता है। दूसरी ओर आज गति को ही जीवन मान लिया गया है। आज जो भी बाइक बाजार में आ रही है, उसमें गति ही केंद्रीय पक्ष होता है। कितनी जल्दी स्पीड पकड़ती है। कब वह हवा से बातें करने लगेगी? यानी गति वह भी तेज। इस तेज गति में ठहराव का कोई स्थान नहीं है। वैसे भी बाइक और युवा के जीवन में ठहराव तो होता नहीं है। उसे सड़कों पर भागते वाहनों पर देखा ही जा सकता है। गति में हम कई बार जीवन के सौंदर्य का रसपान नहीं कर पाते। गति हमें ठहराव की सीख नहीं देती। कई बार हम दिखावे के लिए जो ठहराव पैदा करते हैं, वह वास्तव में ठहराव नहीं होता। उसमें दिखावे का भाव होता है। इसे समझने के लिए हमें उस घटना को याद करना होगा, जब 2016 में मई महीने के अंतिम सप्ताह में सोनू निगम  एक भिखारी का वेश बनाकर सड़क किनारे हारमोनियम के साथ गाने लगे-हर घड़ी बदल रही है, रूप जिंदगी, छाँव है कभी, कभी है धूप जिंदगी। वे पूरी तल्लीनता से इस गीत को गा रहे थे, पर लोग उन्हें अनसुना-अनदेखा कर आगे बढ़ रहे थे। कई लोगों ने उसे एक नजर देखा, फिर आगे बढ़ गए। हाँ, कुछ आम लोगों ने उसके गीत को सुना। बाद में सोनू निगम ने बताया कि इस दौरान एक युवक मेरे पास आया, पहले तो उसने मेरा गाना रिकॉर्ड किया, फिर हाथ मिलाने के बहाने चुपके से बारह रुपये देकर पूछा कि बाबा, नाश्ता किया या नहीं।
अपनी भीगी आँखों से सोनू निगम बताते हैं कि वे रुपये को मैंने फ्रेम करवाकर रख लिये हैं। वे बारह रुपये मेरे लिए लाखों रुपए से कम नहीं हैं। ऐसी अनजानी जगह पर बिना किसी तामझाम के मैंने अपनी गायकी का प्रदर्शन किया, जहाँ मुझे कोई पहचानता भी नहीं था। भीतर से मैं डरा हुआ भी था कि कहीं कोई मुझे पहचान लेगा, तो मैं कहाँ भागूँगा? शुक्र है, मुझे किसी ने नहीं पहचाना। बाद में मैंने उस व्यक्ति से भी मुलाकात की। उससे मिलकर मुझे बहुत ही खुशी हुई। सोनू बताते हैं कि संगीत एक ऐसी विद्या है, जो बहुत कम लोगों को मिलती है। मैं संगीत का एक विद्यार्थी हूँ, मुझे लगा कि मैं आप लोगों के बीच आऊँ और अपने संगीत को प्रस्तुत करूँ; इसलिए एक भिखारी के रूप में आप सबके सामने आया। यह मेरे जीवन का यादगार अनुभव था, जिसे मैं कभी भूल नहीं सकता। इसका एक सामान्य अर्थ यह निकलता है कि एक तरफ हम उसी सोनू निगम का शहर में होने वाले कार्यक्रम में हजार-दो हजार का टिकट लेकर उसे सुनने के लिए पहुँचना अपनी शान समझते हैं, पर यदि वही आदमी रास्ते में वेश बदलकर गा रहा है, तो हम उसकी तरफ देखना भी नहीं चाहेंगे। वजह साफ है गंदे कपड़ों वाला  यह आदमी भला क्या गाएगा? यहाँ यदि हम दिखावे से दूर होकर ठहराव का भाव पैदा करते, तो हम उसके संगीत का आनंद ले सकते थे। कई बार हमें रास्ते पर भी कुछ अच्छी चीजें मिल जाती हैं, पर एक ठहराव के बाद। गति से हम रास्ते की अच्छी चीजों को भी स्वयं से दूर कर लेते हैं।
एक लेखक कहते हैं कि मैंने जीवन को दिशा देने वाली किताबें फुटपाथ से ही खरीदी है। फुटपाथ यानी वही ठहराव। हर शहर में फुटपाथ होते हैं। वहाँ किताबें ही नहीं, जीवन को संवारने की कई आवश्यक चीजें मिल जाती हैं। इसके लिए ठहराव का होना आवश्यक है। जीवन की आपाधापी में केवल भागते रहने को गति मानने वाले कभी ठहरकर स्वयं को परखें। क्या गति से ही सब कुछ पाया जा सकता है? गति बहुत कुछ दे सकती है, पर दिल का सुकून नहीं दे सकती। सुकून तो हमें ठहराव से ही मिलेगा। बाइक पर तेज गति से भागने वाला युवा कभी सड़क किनारे खेलते बच्चे की चंचलता को नहीं देख पाता। जहाँ बच्चा बिंदास होकर अपने साथियों के साथ मस्ती कर रहा होता है। 
यह सच है कि चलना जीवन की कहानी, रुकना मौत की निशानी पर कब तक चलना है हमें? चलते रहने के लिए रुकना भी तो आवश्यक है ना? तो क्यों न रुककर जीवन की परिभाषा को ही समझने की कोशिश की जाए। ट्रेन में बैठकर यदि डूबते सूरज को निहारा जाए, तो यह गति में ठहराव का अद्भुत समन्वय होगा। हम गति में हैं, उधर सूरज ठहरा हुआ लगता है। तेजी से भागती ट्रेन से पल-पल डूबते सूरत को देखना कितना आनंददायक होगा, कभी कल्पना की है आपने? खुशियाँ तो हमारे ही आसपास बिखरी पड़ी है। हम ही उसे अनदेखा कर जाते हैं। आगे बढ़ने की चाह में हम अपना सुनहरा वर्तमान खो रहे हैं। वर्तमान को अनदेखा कर हम भविष्य की ओर भाग रहे हैं, हमारा वर्तमान ही हमारे साथ रहकर हमारी प्रतीक्षा कर रहा है, उसके पास है बेइंतहा खुशियाँ, आपका काम है उन खुशियों को पकड़ना, उसमें डूबना और उसे आत्मसात कर लेना। तो कहाँ चले आप, पहले खुशियाँ तो बटोर लो….

Dr. Mahesh Parimal, T3-204 Sagar Lake View, Vrindavan Nagar, Ayodhya By pass, BHOPAL 462022, Mo.09977276257

कविता

शृंगार है हिन्दी

 - रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

खुसरो के हृदय का उद्गार है हिन्दी।
कबीर के दोहों का संसार है हिन्दी।।
मीरा के मन की पीर बनकर गूँजती घर-घर।
सूर के सागर- सा विस्तार है हिन्दी।।
जन-जन के मानस में, बस गई जो गहरे तक।
तुलसी के मानसका विस्तार है हिन्दी।।
दादू और रैदास ने गाया है झूमकर।
छू गई है मन के सभी तार है हिन्दी।।
सत्यार्थ प्रकाशबन अँधेरा मिटा दिया।
टंकारा के दयानन्द की टंकार है हिन्दी।।
गाँधी की वाणी बन भारत जगा दिया।
आज़ादी के गीतों की ललकार है हिन्दी।।
कामायनीका उर्वशी का रूप है इसमें।
आँसूकी करुण, सहज जलधार है हिन्दी।।
प्रसाद ने हिमाद्रि से ऊँचा उठा दिया।
निराला की वीणा वादिनी झंकार है हिन्दी।।
पीड़ित की पीर घुलकर यह गोदानबन गई।
भारत का है गौरव, शृंगार है हिन्दी।।
मधुशालाकी मधुरता है इसमें घुली हुई।
दिनकर की वाणी है, हुंकार है हिन्दी।।
भारत को समझना है तो जानिए इसको।
दुनिया भर में पा रही विस्तार है हिन्दी।।
सबके दिलों को जोड़ने का काम कर रही।
देश का स्वाभिमान है, आधार है हिन्दी।।

किताबें

बनजारा मन: 

प्रवहमान रचनाशीलता की द्योतक 

- डॉ. कविता भट्ट

हिन्दी साहित्य की विविध विधाओं पर निरन्तर अपनी उत्कृष्ट लेखनी चलाने वाले तथा नवोदित रचनाकारों को प्रोत्साहित करने वाले वरिष्ठ एवं वरेण्य साहित्यकार रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी का काव्य-संग्रह ‘बनजारा मन’ पढ़ा।  आख़िर मन बंजारा ही तो होता है। अपने डेरे बदलता है और प्रतिदिन आशा-निराशा से इसका संघर्ष एक अनन्त विषय है। इस विषय को शब्दों में समायोजित और शृंखलाबद्ध करने का एक अभिनव प्रयास है-बनजारा मन। इस संग्रह को इन  तीन विभागों में सुनियोजित ढंग से प्रस्तुत किया गया -तरंगमिले किनारे और निर्झर। इनमें से अधिकतर काव्यकृतियाँ विभिन्न अन्तर्राष्ट्रीय व राष्ट्रीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैंये कविताएँ साक्षी हैं-रचनाकार के जीवन के विविध पक्षोंप्रवाहमान चिन्तनशीलतासंघर्ष और सामाजिक चैतन्य की। पहले खंड की ही एक कविता बनजारा मन को शीर्षक के रूप में चयनित किया गया है। यह शीर्षक पूरे संग्रह की रचनाओं को समाहित किए हुए है। यह प्रतिबिम्बित करता है-आत्मबोधविस्तारचेतनाजागृति और अनन्त आत्मज्ञान को भी। साथ ही इसमें व्यावहारिक जगत् के क्रिया-कलाप से फलीभूत मन के ज्वार-भाटाउतार-चढ़ाव और आकर्षण-विकर्षण इत्यादि को भी भली प्रकार लिपिबद्ध किया गया है। यह संग्रह आधुनिक काल की कशमकश से व्युत्पन्न विसंगतियोंविद्रूपताओंविरक्ति और वितृष्णा को भी शब्दचित्र में बाँधता है।

 तरंग की सभी रचनाएँ अत्यंत सुन्दर हैंकिन्तु तूफान सड़क परइस शहर मेंमन की बातेंप्यासे हिरनछोटी-सी अँजुरीसारे बन्धन भूल गए तथा सहे नदी इत्यादि रचनाएँ मुझे भीतर तक छू गईं। इन रचनाओं में वर्तमान परिदृश्य के बहुविध पक्ष परिलक्षित होते हैं। वैयक्तिक और सामाजिक विषयों के कथ्य हैं ये कविताएँ- पत्थरों के / इस शहर में / मैं जब से आ गया हूँ,/ बहुत गहरी / चोट मन पर / और तन पर खा गया हूँ।

ये भाव आज प्रत्येक व्यक्ति के मन के हैं। कोई ऐसा साथी नहींजिससे हम अपना दुःख कह सकें। जो हमारे घावों पर मरहम लगा सके। यह कविता इस बात को बहुत ही सुन्दर ढंग से विवेचित करती है।

छोटी-सी अँजुरी कविता अथाह आत्मविश्वासआशावाद और सकारात्मकता से ओत-प्रोत भावों को समाहित किए हुए है। कवि की कल्पना और विश्वास कहाँ तक पहुँच सकते हैंयह पठनीय है इस कविता में।

दूसरा खण्ड मिले किनारे शीर्षक से है। बहुत ही सुन्दर उपशीर्षक के द्वारा रचनाकार सत्योंकथ्यों और तथ्यों को प्रस्तुत करने में सफल हुए हैं।  जितनी कीलें-कविता में रचनाकार ने मन के भावों और मर्मों को अत्यंत गहन ढंग से अभिव्यक्त किया है। यह कविता प्रत्येक दिन हर किसी व्यक्ति के मन में उठने वाले भावों का भी शब्द-चित्रांकन है।

इसके साथ ही शीर्षक हेतु प्रयुक्त कविता मन बनजारा अत्यंत सुन्दर ढंग से लिखी गयी प्रेम की कविता हैयह उन्मादसमर्पण और रोमांच का सम्मिश्रण है-दर्पण में तुमने जब रूप निहारा होगा / तब माथे पर चमका वह ध्रुव तारा होगा।

निर्झर इस काव्य-संग्रह का तीसरा खण्ड है। इसमें हार नहीं मानती चिड़िया अतिसुन्दर दृश्य प्रस्तुत करती है- तिनका तिनका चुनकर / नीड़ बनाती है चिड़िया/

अब बच्चे-बच्चे नहीं रहे। मशीनीकरण व भौतिकता पर गहरा तंज है यह कविता-अब बच्चेबच्चे नहीं रहे / बूढ़े हो गए हैं।

एक और बहुत ही सुन्दर कविता है- बीमार ही होती हैं लड़कियाँ- मैं नहीं रहूँगी- / लेकिनफिर भी जीवित रहूँगी- / गुलाबों की क्यारी में /  तुलसी-चौरे में।

सभी कविताएँ उत्कृष्ट हैंकिन्तु सरल भाषा में लिखी गई प्रवहमान रचनाशीलता कि द्योतक हैं। भावपक्ष एवं कलापक्ष दोनों की कसौटी पर खरा उतरता पठनीय एवं संग्रहणीय संग्रह हैं- बनजारा मन।

पुस्तक- बनजारा मन (काव्य-संग्रह) : रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, पृष्ठः 148, मूल्यः 300 /-रुपयेप्रथम संस्करणः 2020, अयन प्रकाशन, 1/20, महरौलीनई दिल्ली-110030

कविता

आखि़री कविता

- अशोक शाह

सूरज ने लिखी जो ग़ज़ल
वह धरती हो ग

धरती ने जो नज़्म कही
नदी बन ग

नदी-मिट्टी ने मिलकर
लिख डाले गीत अनगिन
होते गये पौधे और जीव

इन सबने मिलकर लिखी
वह कविता आदमी हो ग

धरती को बहुत उम्मीद है
अपनी आखि़री कविता से

बाकी सब शोर

शाम का दीया जलाया
अँधकार के माथे पर
जैसे तिलक लगाया

जलती हुई बाती ने
गीत जो गुनगुनाया
टिमटिमाती लौ में
नाच उठा अँधियारा

मैंने देखा, तुमने भी
फैला जो अँजोर
इतना-सा ही जीवन होता
बाकी सब शोर
-0-

लेखक के बारे में- बिहार के सीवान में जन्म। शिक्षा आई.आई.टी कानपुर एवं आई.आई.टी, दिल्ली से प्राप्त करने के उपरांत एक वर्ष तक भारतीय रेलवे इन्जिनियरिंग सेवा में कार्य। 1990 में भारतीय प्रशासनिक सेवा में पदार्पण कर मध्यप्रदेश के 10 से अधिक जिलों में विभिन्न पदों पर कार्य। अब तक ग्यारह कविता संग्रह प्रकाशित।
अनियतकालीन लघु पत्रिका ‘यावत् का सम्पादन
देश की तकरीबन सभी पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ, कहानियाँ प्रकाशित।
सम्प्रति- भारतीय प्रशासनिक सेवा में, सम्पर्क- डी-एक्स, बी-2, चार     इमली, भोपाल, मो. 9981816311