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Aug 15, 2014

हड़प्पा सभ्यता की तबाही का कारण

    हड़प्पा सभ्यता की तबाही का कारण 


 
सिंधु घाटी सभ्यता, जिसे हड़प्पा सभ्यता भी कहते हैं, एक सुविकसित सभ्यता थी जो वर्तमान उत्तर पश्चिमी भारत और पाकिस्तान में पनपी थी। हाल ही में किए गए अध्ययनों से संकेत मिलता है कि इस सभ्यता के विनाश का एक प्रमुख कारण करीब 200 वर्षों तक लगातार मानसून की नाकामी थी।
सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेषों से पता चलता है कि यह एक विकसित नगरीय सभ्यता थी जहां उम्दा व्यवस्थाएं थीं। इनमें शहरों में नालियाँ तथा निकास व्यवस्था प्रमुख थीं। मगर करीब 4000 साल पहले यह सभ्यता और इसके शहर धीरे-धीरे वीरान होते गए और अंतत: नष्ट हो गए। इस तबाही के कारण अस्पष्ट रहे हैं।
वैसे कांस्य युग की अन्य सभ्यताएं, जैसे मिस्र, यूनान और मेसोपोटामिया की सभ्यताओं के लोप का कारण 2000 ईसा पूर्व में पड़े लगातार सूखे को माना जाता है। अब पता चला है कि शायद यही हाल हड़प्पा सभ्यता का भी हुआ था। इस संदर्भ में खोज के मार्ग में एक बाधा यह थी कि हड़प्पा सभ्यता के क्षेत्र का जलवायु रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था।
इसी संदर्भ में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय की पुरा-जलवायु वैज्ञानिक यामा दीक्षित और उनके साथियों ने हड़प्पा सभ्यता के एक स्थल कोटला डहार से प्राप्त तलछटों का विश्लेषण करके अतीत की जलवायु का अनुमान लगाने की कोशिश की है। कोटला डहार हरियाणा में है और यह एक ऐसा स्थल है जहां पानी भर जाता है। निकासी का कोई मार्ग न होने की वजह से पानी सिर्फ वाष्पीकरण के द्वारा ही उतरता है।
दीक्षित व साथियों ने कोटला डहार से विभिन्न गहराइयों की तलछट की परतें एकत्रित कीं। इन विभिन्न परतों में उन्हें झील में पाए जाने वाले घोंघे (मेलानॉइड्स ट्यूबरकुलेटा) की खोलें प्राप्त हुईं। ये खोल कैल्शियम कार्बोनेट से बनी होती हैं। कैल्शियम कार्बोनेट में जो ऑक्सीजन पाई जाती है उसमें ऑक्सीजन का दो में से एक समस्थानिक यानी आइसोटोप हो सकता है - ऑक्सीजन-16 या ऑक्सीजन-18। समस्थानिक का मतलब होता है कि एक ही तत्व के ऐसे परमाणु जिनके परमाणु भार अलग-अलग होते हैं।
आम तौर पर देखा गया है कि सूखे के दिनों में जब पानी का वाष्पन होता है तो ऑक्सीजन-16 वाले पानी का वाष्पीकरण ऑक्सीजन-18 की तुलना में ज़्यादा तेज़ी से होता है। जब दीक्षित व उनके साथियों ने विभिन्न परतों में घोंघे की खोल के कैल्शियम कार्बोनेट में ऑक्सीजन-16 व ऑक्सीजन-18 के अनुपात की तुलना की तो पता चला कि करीब 4200 से 4000 वर्ष पूर्व की अवधि में वर्षा अचानक कम हो गई थी।
इसका मतलब यह निकलता है कि आज से करीब 4000-4200 वर्ष पूर्व की 200 साल की अवधि में बारिश बहुत कम हो रही थी।
इसी प्रकार का एक अध्ययन जर्मनी के जियोसाइंस रिसर्च सेंटर की सुषमा प्रसाद ने मध्य भारत में स्थित लोनार झील पर भी किया है। उनका निष्कर्ष है कि इस क्षेत्र में करीब 4600 वर्ष पूर्व सूखे की स्थिति शु डिग्री हुई थी। यानी यहां सूखे की स्थिति काफी पहले शुरू हो चुकी थी।
अभी यह स्पष्ट नहीं है कि 4000 वर्ष पूर्व यह जलवायु परिवर्तन क्यों हुआ था लेकिन इतना स्पष्ट है कि जलवायु के ऐसे परिवर्तन सभ्यताओं को तबाह कर सकते हैं। आजकल जलवायु परिवर्तन की स्थिति में यह चिंता का विषय होना चाहिए। (स्रोत फीचर्स)

काल की शिला पर अंकित क्रान्ति

                 1857 पर विशेष
      काल की शिला पर अंकित क्रान्ति


                         - कृष्ण कुमार यादव

1857 के वर्ष का भारतीय इतिहास में एक विशिष्ट स्थान है। यह वह वर्ष है, जिसे भारतीय वीरों ने अपने शौर्य की कलम को रक्त में डुबो कर काल की शिला पर अंकित किया था और ब्रिटिश साम्राज्य को कड़ी चुनौती देकर उसकी जड़ें हिला दी थीं। 1857 का वर्ष वैसे भी उथल-पुथल वाला रहा है। इसी वर्ष कैलिफोर्निया के तेजोन नामक स्थान पर 7.9 स्केल का भूकम्प आया था तो टोकियो में आए भूकम्प में लगभग एक लाख लोग और इटली के नेपल्स में आए6.9 स्केल के भूकम्प में लगभग 11,000 लोग मारे गए थे। 1857 की क्रान्ति इसलिए और भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है कि ठीक सौ साल पहले सन् 1757 में प्लासी के युद्ध में विजय प्राप्त कर राबर्ट क्लाइव ने अंग्रेजी राज की भारत में नींव डाली थी। विभिन्न इतिहासकारों और विचारकों ने इसकी अपने-अपने दृष्टिकोण से व्याख्याएँ की हैं। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री और महान चिन्तक पं.जवाहरलाल नेहरू ने लिखा कि- 'यह केवल एक विद्रोह नहीं था, यद्यपि इसका विस्फोट सैनिक विद्रोह के रूप में हुआ था, क्योंकि यह विद्रोह शीघ्र ही जन विद्रोह के रूप में परिणति हो गया था।बेंजमिन डिजरायली ने ब्रिटिश संसद में इसे 'राष्ट्रीय विद्रोहबताया। प्रखर विचारक बी.डी.सावरकर व पट्टाभि सीतारमैया ने इसे भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम, जॉन विलियम ने सिपाहियों का वेतन सुविधा वाला मामूली संघर्ष व जॉन ब्रूस नॉर्टन ने 'जन-विद्रोहकहा। मार्क्सवादी विचारक डा. राम विलास शर्मा ने इसे संसार की प्रथम साम्राज्य विरोधी व सामन्त विरोधी क्रान्ति बताते हुए 20वीं सदी की जनवादी क्रान्तियों की लम्बी शृंखला की प्रथम महत्त्वपूर्ण कड़ी बताया। प्रख्यात अन्तर्राष्ट्रीय राजनैतिक विचारक मैजिनी तो भारत के इस प्रथम स्वाधीनता संग्राम को अन्तर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में देखते थे और उनके अनुसार इसका  असर तत्कालीन इटली, हंगरी व पोलैंड की सत्ताओं पर भी पड़ेगा और वहाँ की नीतियाँ भी बदलेंगी।
 1857 की क्रान्ति को लेकर तमाम विश्लेषण किए गए हैं। इसके पीछे राजनैतिक-सामाजिक-धार्मिक-आर्थिक सभी तत्व कार्य कर रहे थे, पर इसका सबसे सशक्त पक्ष यह रहा कि राजा-प्रजा, हिन्दू-मुसलमान, जमींदार-किसान, पुरुष-महिला सभी एकजुट होकर अंग्रेजों के विरुद्ध लड़े। 1857 की क्रान्ति को मात्र सैनिक विद्रोह मानने वाले इस तथ्य की अवहेलना करते हैं कि कई ऐसे भी स्थान थे, जहाँ सैनिक छावनियाँ न होने पर भी ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध क्रान्ति हु। इसी प्रकार वे यह भूल जाते है कि वास्तव में ये सिपाही सैनिक वर्दी में किसान थे ,और किसी भी व्यक्ति के अधिकारों के हनन का सीधा तात्पर्य था कि किसी-न-किसी सैनिक के अधिकारों का हनन, क्योंकि हर सैनिक या तो किसी का पिता, बेटा, भाई या अन्य रिश्तेदार है। यह एक तथ्य है कि अंग्रेजी हुकूमत द्वारा लागू नए भू-राजस्व कानून के खिलाफ अकेले सैनिकों की ओर से 15,000 अर्जियाँ दायर की गयी थीं। डॉ0 लक्ष्मीमल्ल सिंघवी के शब्दों में- 'सन् 1857 की क्रान्ति को चाहे सामन्ती सैलाब या सैनिक गदर कहकर खारिज करने का प्रयास किया गया हो, पर वास्तव में वह जनमत का राजनीतिक-सांस्कृतिक विद्रोह था। भारत का जनमानस उसमें जुड़ा था, लोक साहित्य और लोक चेतना उस क्रान्ति के आवेग से अछूती नहीं थी। स्वाभाविक है कि क्रान्तिसफल न हो तो इसे 'विप्लवया 'विद्रोहही कहा जाता है।यह क्रान्ती कोई यकायक घटित घटना नहीं थी, वरन् इसके मूल में विगत कई सालों की घटनाएँ थीं, जो कम्पनी के शासनकाल में घटित होती रहीं। एक ओर भारत की परम्परा, रीतिरिवाज और संस्कृति के विपरीत अंग्रेजी सत्ता एवं संस्कृति सुदृ हो रही थी तो दूसरी ओर भारतीय राजाओं के साथ अन्यायपूर्ण कार्रवाई, अंग्रेजों की हड़पनीति, भारतीय जनमानस की भावनाओं का दमन एवं विभेदपूर्ण व उपेक्षापूर्ण व्यवहार से राजाओं, सैनिकों व जनमानस में विद्रोह के अंकुर फूट रहे थे।
कहा जाता है कि इस क्रान्ति के बीज जनमानस के बीच बोने हेतु प्रतीकात्मक रूप में 'कमलऔर 'चपातीबाँटी गयीं। कमल का फूल हर सैनिक रेजीमेंटो में घुमाया जाता था, जहाँ वह हर किसी के हाथ से गुजरता था। जिस सैनिक के हाथ में यह कमल सबसे अंत में जाता, वह अपने पास की रेजीमेंट तक यह कमल पहुँचा देता था और वहाँ भी यही प्रक्रिया होती थी। कमल का फूल स्वीकारने का कूट अर्थ यह था कि रेजीमेंट के सभी सिपाही क्रान्तिमें भाग लेने के लिए तैयार हैं। इस तरह के सहस्रों कमल पेशावर से बैरकपुर तक विभिन्न रेजीमेंटो के अन्दर घुमाए गए। इसी प्रकार चपातियों को घुमाने के लिए चौकीदारों का इस्तेमाल किया गया। एक गाँव का चौकीदार चपाती लेकर दूसरे गाँव के चौकीदार तक पहुँचाता। चपाती मिलने पर वह चौकीदार थोड़ी सी स्वयं खाकर बाकी गाँव के दूसरे लोगों को खिला देता और फिर उसी तरह की चपातियाँ बनवाकर अपने पास के गाँव के चौकीदार तक भिजवा देता। चपातियाँ स्वीकारने का कूट अर्थ था कि उस गाँव की जनता क्रान्ति में भाग लेने के लिए तैयार है। धीरे-धीरे इस पद्धति से गाँव-गाँव और नगर-नगर क्रान्ति का संदेश पहुँचाया गया। कुछेक इतिहासकारों के अनुसार तमाम रजवाड़ों, सिपाहियों  और जनमानस की भावनाओं को टटोल कर पूरे देश में एक ही दिन 31 मई 1857 को क्रान्ति आरम्भ करने का निश्चय किया गया और बहादुर शाह को सम्राट बनाकर नाना पेशवा को उनका प्रधानमंत्री बनाने की राजनीतिक व्यवस्था भी तय की ग। पर वक्त को कौन मुट्ठी में बाँध पाया है ... सो मंगलपांडे की शहादत ने सिपाहियों को समय से पूर्व ही क्रान्ति का बिगुल बजाने पर मजबूर कर दिया। चूँकि उस समय संचार साधन इतने उन्नत नहीं थे, सो 11 मई को दिल्ली में हुयी घटना को पूरे देश में फैलने में महीने भर का समय लग गया।
1857 की क्रान्ति की शुरूआत एक तरह से 29 मार्च 1857 को कलकत्ता से 16 किलोमीटर दूर स्थित बैरकपुर छावनी में 34वीं नेटिव इन्फेंट्री के सिपाही मंगल पांडे द्वारा गाय की चर्बी वाले कारतूसों को चलाने से मना करने से हुई। जोर-जबरदस्ती करने पर मंगल पांडे ने अंग्रेज सार्जेंट मेजर जेम्स थार्नटन हृासन को परेड ग्रांउड में गोली मार दी। उसी समय लेफ्टिनेंट एडजुटेंट बेम्पडे हेनरी वॉग घोड़े पर सवार होकर आया तो वह भी मंगल पांडे की बन्दूक का निशाना बना। इसकी प्रतिक्रिया में 8 अप्रैल 1857 को अंग्रेजी शासन ने मंगल पांडे को फाँसी दे दी तथा पूरी छावनी को भंग कर दिया। मंगल पांडे को इस क्रान्ति का पहला शहीद सिपाही कहा गया। इस घटना के कुछ दिन बाद ही 24 अप्रैल 1857 को मेरठ छावनी स्थित थर्ड लाइट कैवेलरी के 85 सिपाहियों द्वारा रंगून से आए गाय की चर्बी युक्त कारतूसों को हाथ लगाने से मना कर दिया गया। इन सभी सैनिकों को अंग्रेजी शासन ने बागी करार देकर 10-10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाकर जेल में डाल  दिया। 9 मई 1857 को उन्हें एक सभा में सार्वजनिक रूप से अपमानित कर व उनकी वर्दियाँ उतार कर हथकड़ी-बेडिय़ाँ पहनाकर जेल भेज दिया गया। इससे बौखलाए मेरठ छावनी की तीन रेजीमेंटों के सिपाहियों ने अगले दिन रविवार, 10मई 1857 को जब अंग्रेज चर्च जाने की तैयारी कर रहे थे कि अचानक अंग्रेजी शासन से बगावत कर क्रान्ति का बिगुल बजा दिया और वहाँ शस्त्रागार को लूटकर सिपाहियों को जेल तोड़कर छुड़ा  लिया। इसके बाद  इन विद्रोही सैनिकों ने दिल्ली की तरफ कूच किया जहाँ नेटिव इन्फेंट्री की तीन रेजीमेंट मौजूद थीं। 11 मई को दिल्ली पहुँचकर इन सैनिकों ने लाल किले पर धावा बोल कैप्टन डगलस को मार गिराया और बहादुरशाह जफर से नेतृत्व की अपील की। तब तक इनके साथ अंग्रेजी शासन से त्रस्त लोगों का कारवाँ भी जुड़ता गया था और देखते ही देखते मेरठ में विद्रोही सैनिकों से आरम्भ इस स्वाधीनता संग्राम में राजाओं-नवाबों सहित किसान, मजदूर, हिन्दू, मुसलमान, महिलाएँ व सामान्य जन सभी शामिल होते गए। मेरठ एवं दिल्ली से चली इस चिंगारी ने शीघ्र ही देश के तमाम हिस्सों में हलचल पैदा कर दी। इस संग्राम का आखिरी बड़ा युद्ध 21 जनवरी 1859 को राजस्थान के सीकर में हुआ। सिर्फ उत्तर भारत ही नहीं अपितु इसका प्रभाव महाराष्ट्र, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, गोवा, पांडिचेरी इत्यादि राज्यों में भी व्याप्त था।
12 मई 1857 को दिल्ली पर कब्जा पश्चात 1857 की क्रान्ति का नेतृत्व दिल्ली में बहादुर शाह जफर ने किया। बहादुर शाह जफर ने बख्त खाँ कौ सैन्य नेतृत्व सौंपा और कई राजाओं को पत्र भेजकर अंग्रेजों को देश से बाहर निकालने का आह्वान किया। लखनऊ में इस क्रान्ति के तारतम्य में 4 जून को अवध की बेगम हजरत महल ने अपने नाबालिग लड़के बिरजिस कादर को नवाब घोषित कर अंग्रेजों से लोहा लिया। ब्रिटिश सेना ने हारकर रेजीडेंसी में शरण ली, जिसमें क्रान्तिकारियों ने आग लगा दी। इसमें तमाम सैनिकों सहित ब्रिटिश रेजीडेंट हेनरी लारेंस की मौत हो गई। कानपुर में 5 जून को अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह हुआ और नाना साहब ने क्रान्ती की बागडोर संभाली। तात्या टोपे व अजीमुल्ला खान के सहयोग से नाना साहब ने अंग्रेजों को कड़ी टक्कर देकर आत्मसमर्पण करने पर मजबूर कर दिया। झाँसी में रानी लक्ष्मीबाई ने नेतृत्व करते हुए ब्रिटिश हुकूमत को चुनौती दी और जनरल ह्यूरोज द्वारा पराजित होने पर तात्या टोपे की सहायता से ग्वालियर पर कब्जा कर लिया। कानपुर में क्रान्ति के सूत्रपात के समय से कदाचित कोई कोई ही मास ऐसा गया होगा जबकि तात्या टोपे ने किसी नए स्थान पर जाकर क्रान्ति का सन्देश न सुनाया हो या उत्साहहीन पराजित क्रान्तिकारी सेना का सुसंगठन न किया हो या युद्धक्षेत्र में किसी सेना का संचालन न किया हो। तभी तो गुरिल्ला युद्ध में माहिर तात्या टोपे हेतु अंग्रेज़ों ने लिखा कि- यदि उस समय भारत में आधा दर्जन भी तात्या टोपे सरीखे सेनापति होते तो ब्रिटिश सेनाओं की हार तय थी। इसी प्रकार फैजाबाद में मौलवी अहमदुल्लाह, मथुरा में देवी सिंह, मेरठ में करम सिंह, इलाहाबाद में लियाकत अली व बरेली में खान बहादुर खान ने क्रान्ति का नेतृत्व करते हुए अंग्रेजों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। बनारस, आजमगढ़, इटावा, अलीगढ़, बुलन्दशहर, मुरादाबाद, रुहेलखण्ड जैसे क्षेत्र भी इस क्रान्ती से अछूते नहीं रहे। बिहार में इस क्रान्ती का नेतृत्व जगदीशपुर के जमींदार कुंवर सिंह ने किया और आरा के निकट ब्रिटिश सैनिकों को पराजित किया। सिर्फ उत्तर प्रदेश और बिहार ही नहीं पंजाब व हरियाणा के लोगों ने भी इस क्रान्ति में आहुति दी। मेवात में सदरुद्दीन नामक किसान ने नेतृत्व की बागडोर सँभाली तो पानीपत में बूअली कलंदर के इमाम के नेतृत्व में लोगों ने भाग लिया। पंजाब में इस क्रान्ति का असर तेजी से फैला और नतीजन अंडमान जेल में पहला क्रान्तिकारियों का जो जत्था भेजा गया, उसमें 206 पंजाब से थे।
महाराष्ट्र भी इस क्रान्ति से अछूता नहीं रहा और लगभग 20 स्थानों पर देशी सैनिकों व स्थानीय जनों ने इस क्रान्ति में बढ़-चढ़ कर भाग लिया। 1840 में सतारा के पूर्व राजा प्रताप सिंह के वकील रूप में लंदन जाने वाले रंगा बापूजी गुप्ते के नेतृत्व में 10 जून को सतारा व 13 जुलाई को पंढरपुर में क्रान्ति को प्रज्वलित किया गया। कोल्हापुर में इस बीच सैनिक विद्रोह हुए। हैदराबाद में सोनाजी पंत व रंगाराव पांडो, गंजम में राधाकृष्ण दण्डसेन, गोलकुंडा में चिंताभूपति व उनके भतीजे संन्यासी भूपति ने संघर्ष का आह्वान कर नेतृत्व किया। मछलीपट्टम व गुंटूर के इलाके भी क्रान्ति से अछूते नहीं रहे। कर्नाटक में जून 1857 में रामचन्द्र राव ने अंग्रेजों के विरुद्ध प्रचार किया। जुलाई में बंगलौर स्थित मद्रास सेना की 8वीं घुड़सवार सेना व अगस्त में बेलगाँव में 20वीं पैदल सेना की पलटन ने विद्रोह किया। कर्नाटक में मैसूर बीजापुर, शोरापुर, धारवाड़, कारवाड़, जमाखिंडी, नर्गुण्ड, कोप्पल, सतारा व बेलगाँव इत्यादि क्रान्ति के प्रमुख क्षेत्र रहे। प्रमुख क्रान्तिकारियों में राघोबा फडऩवीस, शाँता राम फडऩवीस, सिद्दि बेनोवे इत्यादि रहे। तमिलनाडु में मद्रास चिंगलपुर, उत्तरी, अरकाट, सेलम, तंजौर, मदुरई कोयम्बटूर, तिरुनेलवेली क्रान्ति के प्रमुख केन्द्र रहे। जून 1857 में प्रथम मद्रास सैनिक पल्टन ने कूच करने से इन्कार कर दिया तो 27 जुलाई 1857 को चिंगलपुर में अंग्रेजों के विरुद्ध क्रान्ति भड़क उठी। यहाँ तक कि दो प्रमुख मन्दिर मनिपकम व पल्लवरम भी क्रान्तिकारियों के अड्डे बने और अरनागिरि व कृष्णा ने ज्योतिषी के भेष में क्रान्ति की ज्वाला पैदा की। केरल में कोचीन, कालीकट, किणलोर व त्रावणकर में लोगों ने अंग्रेजों के विरुद्ध इंडा उठाया। गोवा में इस क्रान्ति का नेतृत्व दीपूजी राणा ने किया। कानपुर में अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती देकर क्रान्ति का नेतृत्व करने वाले नाना साहब अंत तक देश में स्थित अन्य क्रान्तिकारियों से सम्पर्क बनाए रहे। शोरापुर के राजा ने नाना साहब को विद्रोह के लिए संदेश भेजे और हैदराबाद के सोनाजी पंत ने एक पत्र रंगाराव पांडो के द्वारा नाना साहब को भेजा तो इसके जवाब में नाना साहब ने 18 अप्रैल 1858 को दक्कन के लिए एक घोषणा पत्र भेजा। इससे साफ है कि 1857 की क्रान्ति की ज्वाला समूचे देश में विस्तृत हुयी और इसमें सभी क्षेत्रीय, भाषायी, धार्मिक और जातीय सम्प्रदाय व वर्गों ने भाग लिया। उस समय के सरकारी दस्तावेजों में जानकारी मिलती है कि हिमालय की तराई अर्थात जम्मू से लेकर दक्षिण में हैदराबाद और पश्चिम में अफगानिस्तान से लेकर पूरब में त्रिपुरा तक क्रान्ति की ज्वाला फैली। 1857 की क्रान्ति बैरकपुर व मेरठ के रास्ते दिल्ली से चारों तरफ चिंगारी की भाँति फैल गयी। यद्यपि 20 सितम्बर 1857 को अंग्रेजों ने दिल्ली पर पुन: कब्जा कर लिया, पर देश के अन्य भागों में क्रान्ति का ज्वार खत्म नहीं हुआ था। जैसे-जैसे क्रान्ति की खबर फैलती जाती, वैसे-वैसे लोग इसमें शामिल होते जाते। इस संग्राम का आखिरी बड़ा युद्ध 21 जनवरी 1859 को राजस्थान के सीकर में हुआ। इस संग्राम के दौरान हजारों व्यक्ति शहीद हुए, हजारों को निर्वासित किया गया, कई नेतृत्वकर्ता छिपकर नेतृत्व करने के लिए पलायन कर गए और बड़ी संख्या में लोगों को कैद में ठूँस दिया गया।
1857 की क्रान्ति की सफलता-असफलता के अपने-अपने तर्क हैं पर यह भारत की आजादी का पहला ऐसा संघर्ष था, जिसे अंग्रेज समर्थक सैनिक विद्रोह अथवा असफल विद्रोह साबित करने पर तुले थे, परन्तु सही मायनों में यह पराधीनता की बेडिय़ों से मुक्ति पाने का राष्ट्रीय फलक पर हुआ प्रथम महत्त्वपूर्ण संघर्ष था। अमरीकी विद्वान प्रो.जी.एफ. हचिन्स के शब्दों में-'1857 की क्रान्ती को अंग्रेजों ने केवल सैनिक विद्रोह ही कहा, क्योंकि वे इस घटना के राजद्रोह पक्ष पर ही बल देना चाहते थे और कहना चाहते थे कि यह विद्रोह अंग्रेजी सेना के केवल भारतीय सैनिकों तक ही सीमित था; परन्तु आधुनिक शोध पत्रों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह आरम्भ से सैनिक विद्रोह के ही रूप में हुआ, परन्तु शीघ्र ही इसमें लोकप्रिय विद्रोह का रूप धारण कर लिया।वस्तुत: इस क्रान्ति को भारत में अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध पहली प्रत्यक्ष चुनौती के रूप में देखा जा सकता है। यह आन्दोलन भले ही भारत को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति न दिला पाया हो, लेकिन लोगों में आजादी का जज्बा जरूर पैदा कर गया। 1857 की इस क्रान्ति को कुछ इतिहासकारों ने महास्वप्न की शोकान्तिका कहा है, पर इस गर्वीले उपक्रम के फलस्वरूप ही भारत का नायाब मोती ईस्ट इण्डिया कम्पनी के हाथों से निकल गया और जल्द ही कम्पनी भंग हो ग1857 के संग्राम की विशेषता यह भी है कि इससे उठे शंखनाद के बाद जंगे-आजादी 90 साल तक अनवरत चलती रही।
 
सम्पर्क: भारतीय डाक सेवा, निदेशक डाक सेवाएँ, इलाहाबाद परिक्षेत्र, इलाहाबाद (उ.प्र.)-211001 मो.08004928599,     Emai - kkyadav.y@rediffmail.com

यात्रा

   
    यात्रा एक लैण्ड लॉक प्रदेश की

                                  - विनोद साव

सामने हरियाली थी। हरियाली निकलती जा रही थी। पता नहीं यह हरियाली कब से थी। न जाने रात भर में यह हरा भरा संसार कितना निकल गया होगा.. और हम बस सोते रहे होंगे। इन प्राकृतिक छटाओं को देखते हुए तो आँखें वैसे भी नहीं अघाती हैं और अगर ऐसी ही छटाएँ रही होंगी जैसी मेरी आँखों के सामने घंटे भर से है तब तो इन छटाओं के एक वृहत्तर क्षेत्र के निकल जाने का मलाल रहेगा।
रात बारह बजे बिलासपुर छोड़ा था तब तक तो कोई खास बात नहीं थी। वैसे ही मामूली शहर और कस्बे थे जो कहीं भी दिख जाते हैं- हर आते स्टेशन की एक चिरपरिचित बू, चढ़ते-उतरते मुसाफिरों की धकमपेल, मिनरल वाटर की अविश्वसनीय बोतलें, डडै़ल तेलों से गंधाते भजिये, पटरी के किनारे गजब ढाती जिन्दगी! पर यहाँ नजारा बिलकुल भिन्न था। मौसम में जुलाई महीने की खुशबू थी। फुहारों की तरह हो रही थी बारिश। मझोले पहाड़ों पर थे झूमते पेड़ों के झुण्ड। हसदो और रिहन्द जैसी सुन्दर नामों वाली नदियाँ मचलती हुई चली जा रहीं थीं कहीं।
 सन्नाटे के साथ आ जाने वाले एकदम साफ सुथरे स्टेशन थे ,जिनमें उतरते हुए साफ सुथरे लोग थे। न लोगों को उतरने की कोई जल्दी थी न ट्रेन को उतारने की।  स्टेशन का एक नाम बैकुण्ठपुर रोड है। एक दिन जाना तो सबको बैकुण्ठ ही है। पर क्या यही वह रोड है जो बैकुण्ठ धाम को जाता है। मानों उपवनों और सुरम्य स्थलों पर बने स्टेशन थे। आसपास कोई गाँव या कस्बा तो है नहीं पर इन सेनीटोरियम की तरह बने खूबसूरत स्टेशनों में उतरकर लोग जाते कहाँ हैं? हर स्टेशन के बाहर एक टैक्सी स्टैंड है ,जिसमें कारें हैं, जीप हैं और ऑटोरिक्शा हैं। जिनमें बैठकर लोग चुपचाप निकल जाते हैं अपने-अपने ठीहों की ओर जो इन्हीं सुरम्य पहाडिय़ों के बीच कहीं बसे होंगे।
एकबार ऐसा लगा था जैसे हम हिमाचल प्रदेश में चले जा रहे हों। वैसे इस नए  राज्य के गौरवगानों में से एक गान यह भी है कि यहाँ का मैनपाट छत्तीसगढ़ का शिमला है। यह छत्तीसगढ़ का एक हिल स्टेशन है जो सापूतारा पर्वत-शृंखला में बसा है। समुद्र तल से लगभग बारह सौ मीटर की ऊँचाई पर एक आयताकार पहाड़ी पर बसा है। झरने और हरियाली से भरपूर है। यहाँ तिब्बती शरणार्थियों को बसाया गया है, यहाँ शरणार्थी कैम्प और बौद्ध मंदिर हैं । तिब्बत पर चीन के आक्रमण के बाद ये शरणार्थी 1965 में यहाँ बसाए  गए  थे। यहाँ के कालीन और पॉमेरियल नस्ल के कुत्ते प्रसिद्ध हैं। यह हिमाचल प्रदेश के शिमला से कहीं ज्यादा यह धर्मशाला जैसा कुछ लगता है। हिमाचल का शिमला अगर अपने सेब फलों के प्रसिद्ध है तो सरगुजा का जशपुर अपने नाशपाती के लिए जाना जाता है। हिमाचल में धर्मशाला के पास बिलासपुर है और यहाँ मैनपाट जाने के लिए भी बिलासपुर है जो छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा जंक्शन है और आठ सौ करोड़ की आय वाला देश का सबसे बड़ा रेलवे जोन है। यहाँ से अम्बिकापुर होकर सड़क से मैनपाट जाया जा सकता है।
ऐसे कितने ही पाट हैं यहाँ - मैनपाट, जारंगपाट, सामरीपाट, जशपुरपाट - पाट का अर्थ उच्च समतल व पठारी स्थल है जो अपने शीर्ष में सपाट और पार्श्व में सोपान सदृश्य तीव्र ढालदार होता है.. भूगोल की भाषा में इसे अंतर-पर्वतीय पठार भी कहते हैं जिसमें पहाड़ों के पर समतल जमीन होती है... और बस ऐसा ही मनभावन दृश्य था जिसे तीन घंटों से हम देख रहे थे। यह छत्तीसगढ़ का उत्तरी क्षेत्र है जहाँ छुरी-उदयपुर, चांगभखार देवगढ़ और रामगढ़ की पहाडिय़ाँ हैं। यह पूरा अंचल सरगुजा कहलाता है जिसमें अब अम्बिकापुर, जशपुर, कोरिया, सूरजपुर और बलरामपुर नाम से और भी जिला मुख्यालय बन गए हैं। सरगुजा की अपनी अलग बोली है सरगुजिया जो छत्तीसगढ़ी से काफी-कुछ मिलती है। इसे भी अलगाने की कोशिश की जाती है, पर इसमें हिन्दी उर्दू की तरह साम्य है- जो बोली पाकिस्तान में बोलते हैं, वही हिन्दुस्तान में बोलते हैं।
यह पहली ही बार था जब हम किसी ट्रेन में रात आठ बजे छत्तीसगढ़ के एक शहर से निकले थे और रात भर ट्रेन में यात्रा करने के बाद भी दूसरे दिन सबेरे आठ बजे हम छत्तीसगढ़ के ही किसी शहर में उतरने वाले थे। वाह! विभाजन के बाद भी छत्तीसगढ़ कितना बड़ा है। क्षेत्रफल के हिसाब से यह देश का नवाँ बड़ा राज्य है और अब भी यह देश के सत्रह राज्यों से बड़ा है। मतलब साफ है कि अलग राज्य बनाना कोई गलत नहीं हुआ.. और अब पहले से बेहतर जा रहा है नहीं तो इसका सारा रेवेन्यू मध्यप्रदेश को जा रहा था, फिर भी न मध्यप्रदेश मोटाहो रहा था और न छत्तीसगढ़ फल- फूल रहा था। अब पानी, बिजली, सड़क और माइन्स के मामलों में यह अग्रिम पंक्ति पर है। इसके विकास के चरणों में एक चरण यही है कि इस लाइन पर दुर्ग-अम्बिकापुर एक्सप्रेस की शुरुआत हुई- जिस पर हम सवार थे।
इस ट्रेन के सहारे पहली बार हम छत्तीसगढ़ के पहाड़ों को ट्रेन में बैठकर देख रहे थे। जैसे कालका से शिमला जाते हुए हिमाचल प्रदेश को देखते हैं। इस तरह की एक रेल लाइन और है जो बस्तर के वनप्रांतर में चलती है कोट्टाविलासा से जगदलपुर-किरन्दुल रेल लाइन। अरकू घाटी उसी रेल लाइन पर स्थित है। उस लाइन के कई सुरम्य स्थल छत्तीसगढ़ क्षेत्र में आते हैं। यह भी माना जाता है कि दुनिया में ब्रॉडगेज रेल लाइन का सबसे ऊँचा स्थान भी उसी लाइन पर स्थित है ,बशर्ते रेल विकास के इन प्रतिमानों को वहाँ नक्सलाट्स से बचाया जा सके। छत्तीसगढ़ के सबसे सुरम्य अंचल बस्तर का पिछले तीन दशकों से वही हाल है, जो हाल देश में कश्मीर का है। नक्सलियों की आक्रामकता और सरकार की अक्षमता के कारण भय और आतंक के साये में कश्मीर की तरह बस्तर की घाटियाँ भी सिहर उठती हैं।
बस्तर और सरगुजा इन दोनों से छत्तीसगढ़ का मान है। सरगुजा इसके उत्तर में है तो बस्तर दक्षिण में। उत्तर से दक्षिण तक लगभग एक हजार किलोमीटर का लम्बा भू-भाग फैला हुआ है छत्तीसगढ़ में।  इस राज्य का पुराना बस्तर जिला ही केरल राज्य से बड़ा माना जाता था। विभाजन के बाद छत्तीसगढ़ के नक्शे को सीधे से आड़ा कर दिया जा तो यह हूबहू अमेरिका के नक्शे सा नजर आता है। इसकी सीमा न तो समुद्र को स्पर्श करती है न ही किसी विदेशी राष्ट्र को इसलिए यह एक लैण्ड लॉक प्रदेश कहलाता है।
ट्रेन के मुसाफिरों में आदिवासियों की संख्या भी कम नहीं है। यह सुखद है कि इस इलाके की अब वन्य जातियाँ भी आवागमन के सबसे सुगम और आधुनिक माध्यम रेलगाड़ी को पसंद कर रही हैं। वे भी अब रिजर्वेशन बोगियों में दिखने लगे हैं सबेरे-सबेरे बोगी में लगे वाशबेसिन में टूथब्रश करते हुए और दाढ़ी बनाते हुए। उनके पहनाव-ओढ़ाव में आधुनिकता आ गई है। शारीरिक सौष्ठव उन्हें नैसर्गिक रुप से मिला है उस पर जीन्स और टी-शर्ट में उनकी सुगठित देह खिल उठती है वेस्टइंडीज के खिलाडिय़ों की तरह। संभव है उनकी जीवनशैली में यह तामझाम उनके मसीहीकरण के बाद आई हो। सरगुजा में जशपुर नगर है, जिसके पास स्थित 'कुनकुरीमें एशिया का दूसरा सबसे बड़ा कैथोलिक चर्च है ,जिनके पीछे धनुषबाण लेकर मूँछ ऐंठते हुए लोग पड़े है। घर वापसी कार्यक्रम के बहाने। पर जो हिन्दू किन्हीं परिस्थितियों में ईसाई बन गए हैं , वे फिर से हिन्दू अगर बन भी जाते हैं, तब क्या शेष हिन्दू समाज उन्हें स्वीकारेगा? उनसे रोटी-बेटी का रिश्ता जोड़ेगा?
बिश्रामपुर स्टेशन आ गया था किसी चर्च का घण्टा गूंजा था और गूंजे थे जीसस के वचन 'हे सब बोझ से थके और दबे हुए लोगों मेरे पास आओ.. मैं तुम्हें विश्राम दूँगा।
स्टेशनों के नामों से भी कुछ-कुछ कौधता है। सवेरे के आठ बजने जा रहे हैं। सूरजपुर स्टेशन के पार हो जाने के बाद भी सूरज का अता पता नहीं है। एक स्टेशन का नाम 'कटोराथा और समूचा छत्तीसगढ़ 'धान का कटोराकहलाता है। सरगुजा में भी कुछ धान होते हैं ,जिनमें सबसे स्वादिष्ट चावल होता है जीराफूल चावल। यह बासमती की तरह लम्बा और उससे अधिक स्वादिष्ट है।
स्टेशन बेहद साफ सुथरा था और इसका भवन बिलकुल नया और चमचमाता हुआ सा। आजकल साहित्यकारों में स्थानीयता को लेकर बड़ा हल्ला होता है। हर लेखक में उसकी स्थानीयता खोजी जा रही है। यह स्थानीयता बोध भारतीय रेलवे में भरपूर विद्यमान है जो स्थानीयता को चिह्नित करने के अपने प्रयासों में लगा ही रहता है। इसे उनके स्टेशन भवन के वास्तुशिल्प और उसके रखरखाव में कहीं भी देखा जा सकता है। इसका उदाहरण अम्बिकापुर में भी है। यह एक पुराना रजवाड़ा है ,जहाँ आज भी एक विशाल महल है। संभवत: इस कारण ही अम्बिकापुर रेलवे स्टेशन की नई इमारत को महलनुमा बनाया गया है। कहा जा सकता है कि अब इस नए  राज्य का यह सबसे नया और भव्य स्टेशन है।  बाहर से यह हवामहल की तरह दिखता है।
बीस साल पहले आया था इस शहर में ,तब यह मध्यप्रदेश में था और बिहार सीमा पर होने के कारण यह इलाका पूरा बिहारीमय दिखता था। नए  राज्यों के गठन के बाद अब यहाँ छत्तीसगढ़ और झारखण्ड राज्यों की सीमा मिलती है। इन राज्यों के अपने स्थानीय प्रभाव बढ़े हैं और बिहारी प्रभाव धूमिल हुआ है।
पहली बार दीदी के घर यहाँ आया था तब जीजाजी पोस्ट मास्टर थे अम्बिकापुर में। कुछ दिनों बाद ही वे अवकाश ग्रहण कर चले गए थे। रायपुर में बस गए थे। अब जीजाजी रहे नहीं। यहाँ पोस्ट आफिस भवन के ऊपर जिस मकान में थे उस मकान को खोजा, मिल जाने के बाद दीदी को मोबाइल लगाया 'दीदी! मैं उस मकान के सामने खड़ा हूँ जहाँ बीस साल पहले आप जीजाजी के साथ थीं।तब दीदी की सिसकारी भरी आवाज सुनाई दी थी।
यह पहली बार देखा जब किसी साहित्य सम्मेलन का आयोजन केमिस्ट व ड्रगिस्ट भवन में रखा गया है। शायद इसका कारण यह हो कि यहाँ के कुछ लेखक बन्धु इस व्यवसाय से जुड़े हुए हैं। वैसे भी इलेक्ट्रानिक मीडिया की मार ने साहित्य को कुछ बीमार व शिथिल-सा कर दिया है। तब ऐसे में इस तरह के आयोजन स्थल हो भी सकते हैं। कविता के ग्लूकोस और विचारों के टॉनिक से शायद रुग्ण होती साहित्य की दुनिया को कुछ आसरा मिले।  इस बार यह आसरा मिला था केमिस्ट व ड्रगिस्ट भवन में।
मुझे सरगुजा की सरजमीं पुकार रही थी। मैं बाहर चला आया महल की ओर। शाम के धुन्धले में जो सफेदी उभर रही थी वह महल की प्राचीर थीं। चारों तरफ ऊँची-ऊँची प्राचीरें। कहीं मजबूत और कहीं धसकती हुई। खण्डहर होते महल को देखना अपने में एक विलक्षण अनुभूति है। अपने समृद्ध अतीत और विखण्डित वर्तमान के साथ उपस्थित इन महलों में एक किस्म का तिलस्म होता है। कोई रहस्यमय स्वर लहरी तैर रही होती है इनकी चहारदीवारी में। उन बूढ़े दरख्तों को देखना जो कभी साक्षी थे इस महल के वैभव और उसकी मायावी दुनिया के, अब जहाँ मकडज़ालों के भीतर चमगादड़ों का बसेरा है।  महल परिसर के जिन मन्दिरों में कभी घण्टियों के साथ आराधना के स्वर गूँजा करते थे वहाँ अब निस्तब्धता है। जहाँ राग रंग थे वहाँ अब सन्नाटे का शोर है। महल का मुख्य प्रवेश द्वार बन्द है। द्वार के बाहर बैठा हुआ है कोई बूढ़ा चौकीदार अपनी जर्मन की पतीली में भात और साग खाते हुए। सरगुजिया बोली में बोल पड़ता है 'राजा महराजा अब इहाँ नाई रहे।
ज्यादातर महलों की अब यही नियति है कि उसके सामन्त कहीं पलायन कर जाते हैं और सेवक रह जाते हैं। उनके टूटे- फूटे घर रह जाते हैं और उनमें रह जाती है फटेहाली और बदहाली की जिन्दगी। एक ऐसी जिन्दगी जो सामन्तों की देन होती है। यहाँ भी वैसी ही जिन्दगी थी। जहाँ हाड़ मांस के बने इन्सान थे ,काठ के पुतलों की तरह। मुक्तिबोध की कहानी की तरह उनके 'काठ के सपनेथे। ऐसे ही किसी महल के अँधेरे में मुक्तिबोध ने गुजारी थी अपनी बेहाल जिन्दगी और सामन्तों द्वारा छोड़ गए सेवकों को शायद धीरज बँधाते हुए कहा होगा कि-
'झील के उस पार हमारा साथी लश्कर मुहैया कर रहा होगा
वह हमारी हार का बदला लेगा और हम जीतेंगे!
भीतर बेचैनी थी... अच्छा तब लगा जब रामगढ़ की पहाडिय़ों में जाने का कार्यक्रम बना। यहाँ के लेखक मित्रगण अपने परिजनों को लेकर बस में आ गए थे। जिसमें दोपहर के भोजन की व्यवस्था कर ली गई थी।  साहित्य की गंभीरता हटा दी गई थी और पारिवारिक वातावरण से बस चहचहा उठीथी। मंच की एक भारी-भरकम कवयित्री के बैठते ही खिड़की का एक शीशा चकनाचूर हो गया जिससे हास-परिहास की स्थिति बनी। मैं भी मंचीय अन्दाज में उनसे कह उठा  'मोहतरमा..जरा सम्हल के बैठिएगा.. मेरा दिल भी शीशे जैसा है।यह सुनकर महिलाओं की रुमानी हँसी गूंज उठी। सावन का महीना था बस के हिचकोले से बस में बैठी भद्र महिलाएँ सावन के झूले को याद कर मंद-मंद मुस्कुरा रहीं थीं। उनकी गोद में किलकते हुए बच्चे थे ,जिन्हें माँ की गोद के सामने आकाश तुच्छ नजर आ रहा था।
कहते हैं कि कालीदास के 'मेघदूतमें कुछ ऐसी पहाडिय़ों की चर्चा है जो रामगढ़ से मिलती हैं जिससे इस स्थान को मेघूदत के रचनाकाल से भी जोड़कर देखा जाता है। पहाडिय़ों में इसकी एक खोह को विश्व की सबसे प्राचीन नाट्यशाला के रुप में भी प्रचारित किया गया है। प्राकृतिक खोह आकर्षक बन पड़ी है।  खोह के सामने का विशाल प्रस्तर चौरस है जिससे देखने में लगता है कि वह दर्शक दीर्घा के बैठने की जगह रही होगी। खोह के भीतर दाँये- बाँये और भी खोह बने हैं जिस तरह मंचों के अगल बगल में ग्रीन रुम होते हैं। सुतानुका नामक किसी देवदासी और मूर्तिकार देवदत्ता की प्रणय गाथा भी यहाँ प्रचलित है। किवदंतियां चाहे जो भी हों पर यह जगह बड़ी रुमानी और रमणीय जान पड़ती है और इसलिए अब यहाँ सरकारी महोत्सव होने लगे हैं। 'हिन्दुस्तान की खोजमें नेहरू ने इस स्थान का जिक्र छोटा नागपुर के पठार के करीब बताते हुए किया है।
पहाड़ी के नीचे हाथी खोह है जहाँ से सरगुजा के स्वच्छंद हाथी गुजरते है। इनमें कितने ही हाथियों के पागल हो जाने की खबर भी इस इलाके के मुख्य समाचार होते हैं। तब जंगल के नन्हें गाँवों में होती है बड़ी तबाही इन पगला गए हाथियों से। इन हाथियों को केले के गुच्छे का लोभ दिखाकर अपने अपने गाँवों से बाहर करते हैं कुछ अनुभवी लोग...पर रात में ऐसे पागल हाथियों की चिंघाड़ सुनाई दे, तब कोई क्या करे!
सरगुजा, बस्तर की तरह का प्राकृतिक सौन्दर्य लिये हुए है, बावजूद इसके यह छत्तीसगढ़ की मुख्यधारा में बस्तर की तरह शामिल नहीं हो पाया है। पर्यटन के नाम पर पूरा छत्तीसगढ़ और शेष भारत बस्तर की तरफ भागते हुए दिखते हैं पर सरगुजा की ओर बिरले ही पहुँच पाते हैं। पर्यटन की कुछ सुविधाएँ बस्तर में हैं। औद्योगीकरण का फैलाव बस्तर की ओर ज्यादा है। केन्द्र व राज्य सरकारों के भारी भरकम प्रशासनिक अमले बस्तर में भरे पड़े है। इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज बस्तर में खोले जा रहे हैं पर सरगुजा की नयी पीढ़ी के लिए उच्च शिक्षा एक समस्या है। इन इलाकों में प्रगति की आकुलता मुखरित नहीं हुई होगी ,तो एक कारण यह भी रहा होगा कि सरगुजा की सीमा में एम.पी, यू.पी और बिहार जैसे बीमार पड़ोसी राज्य रहे हैं। जबकि बस्तर की सीमा में महाराष्ट्र, आन्ध्र और उत्कल प्रदेश रहे हैं, जो अपेक्षाकृत ज्यादा जाग्रत और कलाबोध से भरे पड़ोसी राज्य रहे हैं। यद्यपि नक्सलवाद की समस्या बस्तर और सरगुजा दोनों में रही है - एक तरफ आन्ध्र-तेलंगाना के कारण और दूसरी ओर बिहार-झारखण्ड के कारण पर इनमें बस्तर का नक्सलवाद ज्यादा अनियंत्रित और भयावह हो गया है। यह सवाल उठता है कि देश के आदिम जन-जातियों वाले जितने राज्य हैं ,वे सब के सब आतंकवाद के साये में कैसे आ गए हैं? चाहे उत्तरांचल हो या पूर्वांचल, बस्तर हो या सरगुजा! जवाब केवल एक है- जनजातियों के अनुकुल विकास की अनदेखी। इन पर विचार कौन करे? क्योंकि नियामक शक्तियाँ तो धर्म और राजनीति हैं। कभी अपने अंतिम समय से कुछ पहले रायपुर पहुँचे यायावर कथाकार निर्मल वर्मा ने अपनी स्वप्निल आँखों से झरते उद्बोधन में कहा था कि 'जब धर्म और राजनीति अपने रचनात्मक अभिप्राय से चूक जाते हैं, तब साहित्य की अकेली आवाज होती हैशोर मचाता इलेक्ट्रानिक मीडिया तथाकथित धर्म गुरुओं और राजनेताओं का प्रचारक बन रहा है, जबकि यह साहित्य ही है जो मनुष्य को जोड़ने और देश के हर अलगाव वाद के खिलाफ आवाज उठाने में निरन्तर जुटा हुआ है।
सरगुजा की सरजमीं भौगोलिक दृष्टि से लैण्ड लॉक प्रदेश भले ही हो पर विकास की दृष्टि से लैण्ड लॉक प्रदेश न हो।  अवरुद्धता का ताला टूटे और कोई रास्ता खुले.. ऐसी कामना तो है।

सम्पर्क: मुक्तनगर, दुर्ग 491001, मो. 9407984014
Email- vinod.sao1955@gmail.com

लहरों की ताल पे

लहरों की ताल पे

डॉ. कुँवर दिनेश सिंह

1
ये अम्बरी है
नारी सावन नीर
कादम्बरी है।
2
धुँध हर सू
अपने ही ख्यालों में
गुमसुम भू।
3
बुंदियाँ झरें
समेटती जा रहीं
प्यासी लहरें।
4
सावन झरी
लहरों की ताल पे
बने घुमरी।
5
अल्हड़ बूँदें
रिमझिम ताल पे
नाचती बूँदें।
6
चाँदनी रात
ओस बना रही है
चाँदी के पात।
7
सावन तारी
बादलों से उलझी
धूप बेचारी।
8
नाचे सारंग
बादलों को कीलते
पंखों के रंग।
9
धँधेरी उठी
धरा के हृदय में
है धुकधुकी।
10
तनाव भंग
सूरज-मेघा सन्धि
वर्णाली रंग।
11
चीड़ों के बीच
पगडण्डी अकेली
लेती है खींच।
12
राह एकान्त
पथिक को जोहती
हुई अशान्त।
13
समता- भरी
आकाश की आँखें  हैं
ममता-भरी।
14
रंग बदले
आसमान रँगीला
ढंग बदले।
15
खड्ड में पानी
अश्मों से टकराता
गाए रागिनी।
16
सलिल जीता
सिल से जो भी भिड़ा
आया न जीता।
17
जल-प्रवाह
परकोटे में रूँधा
खोजता राह।
18
आती है पौन
दर को खटकाती
रहती मौन।
19
डगर सूनी
जी बहलाने आई
हवा बातूनी।
20
वन-अनल
चिल्लाते रहे वृथा
मृगों के दल।
21
चीड़ जलते
जंगल की आग में
चुप्प बलते।
22
किरने ढोएँ
थका -माँदा सूरज
पूछे न कोए।
23
मेघों का राग
भर रहा है देखो
पानी में आग।
24
पावस-रात
खेले आँख-मिचौली
जुगनू साथ।

लेखक के बारे में: डॉ. कुँवर दिनेश सिंह शिमला, हिमाचल प्रदेश के निवासी हैं। ये हिन्दी व अंग्रेज़ी के जाने माने कवि, कहानीकार, लेखक, आलोचक एवं अनुवादक हैं। अब तक इनके अंग्रेजी में 15 काव्य संग्रह, हिन्दी में 7 काव्य संग्रह एवं अंग्रेजी में 5 आलोचना ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हैं। इन्हें कई साहित्य सम्मान प्राप्त हैं। हिमाचल प्रदेश साहित्य अकादमी पुरस्कार से अलंकृत हो चुके हैं। सम्प्रति महाविद्यालय में अंग्रेजी भाषा एवं साहित्य के एसोसिएट प्रोफेसर के रुप में कार्यरत हैं।


सम्पर्क- संपादकः हाइफन, 3 सिसिल क्वार्टज़, चौड़ा मैदान, शिमला-171004, हि.प्र.,              मो. 09418626090, Email- kanwardineshsingh@gmail.com