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May 22, 2013

ओडीसी नृत्यकार नित्यानन्द से बातचीत

ओडीसी नृत्यकार नित्यानन्द से बातचीत
- रचना श्रीवास्तव
हिम्मत करे इन्सान तो हर काम है आसां
कहते हैं, जब मनुष्य पर कोई मुसीबत आती है, भगवान उसको सहने की शक्ति पहले ही दे देता है। ओडीसी नृत्यकार  नित्यानन्द इसका जीते जागते उदाहरण हैं। एक पैर कटने के बाद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और इस चुनौती का सामना करते हुए  एक पैर पर नृत्य करके उन्होंने दुनिया को दिखा दिया कि मनुष्य के लिए कुछ भी असम्भव नहीं है। लाखों लोगों के प्रेरणा स्रोत श्री नित्यानन्द जी से पिछले दिनों लम्बी बातचीत करने का मौका मिला। आइये जानते हैं उनकी कहानी उन्हीं के शब्दों में-
 नित्यानन्द जी अपने बारे में कुछ बताइए-
मेरा जन्म 9 मार्च 1975 को हुआ था। मेरी पढऩे में बहुत रुचि नहीं थी; परन्तु मुझे सांस्कृतिक कार्यक्रमों में बहुत रुचि थी। मैं जात्रा पार्टी के कैम्प में बैठता था। मैं गाता था और अभिनय भी करता था। तब सभी ने मुझे पसंद किया और जात्रा में शामिल कर लिया।
आपने नृत्य करना कब से प्रारंभ किया?
 मैं 1991 में  बिदाईपुर से भुवनेश्वर ओडिसी नृत्य सीखने के लिए आया। मैंने गुरु बिम्बाधर दास और गुरु गंगाधर प्रधान से नृत्य सीखा। गुरु के आशीर्वाद से मैं प्रदेश की जात्रा टीम का कोरियोग्राफर बना।
आपके साथ ये हादसा कैसे हुआ?
11 जून 2000 की बात है मैं अपनी नयी मोटरसाइकिल से अपने गाँव भद्रक जा रहा था। रास्ते में तेज गति से आते ट्रक से मेरा एक्सीडेंट हो गया। मेरा दाहिना पैर बुरी तरह से कुचल गया था; अत: मेरा पैर काटना पड़ा। मैं 6 महीने अस्पताल में रहा। जब मै घर आया मेरा सब कुछ खो चुका था।
इतने बड़े हादसे के बाद जब मनुष्य अपनी हिम्मत खो देता है तो फिर आपने कैसे धीरज रखा और हिम्मत का साथ नहीं छोड़ा?
 पहले तो मैं टूट चुका था; फिर  मैंने सोचा मैं तो केवल नृत्य करने के लिए ही पैदा हुआ हूँ । मै जीवित हूँ इसका मतलब उस समय भगवान मेरे पास थे। मैं अपने गुरु जी के पास गया मैंने कहा गुरु जी क्या करूँ मुझे सहारा दो मुझें नृत्य ही करना है। मेरे गुरुजी बिम्बाधर जी ने मुझे बहुत हिम्मत दी और कहा यदि सुधा चंद्रन कर सकती है तो तुम भी कर सकते हो। तुमको एक पैर से नृत्य करके दुनिया को दिखाना है ।
जो कुछ मैने सिखाया है उसी को करो। गुरु जी से हिम्मत पाकर मैने अभ्यास किया और आज नृत्य कर पा रहा हूँ
क्या एक पैर पर नृत्य करना आसान था ?
नहीं, यह बहुत ही कठिन काम था। मैं बार-बार गिर जाता था। एक पैर पर सन्तुलन बनाना बहुत कठिन था। पैर में  उतनी ताकत भी नहीं थी। बस मन में एक विश्वास था और गुरु जी की बात- तुम एक पैर से नृत्य करोगे और लोग तुमको देखेंगे तुम्हारा नाम दुनिया भर में होगा एक पैर से नृत्य करो, यही मेरी गुरु दक्षिणा होगी। मुझे लगा कि मुझे गुरु के लिए नृत्य करना है। बस अभ्यास  करता गया और गुरु के आशीर्वाद से आज यहाँ तक पहुँचा हूँ।
इस घटना के बाद आपने लोगों के सामने अपना पहला नृत्य कब किया?
  गुरु सच्चिदानन्द दास ने एक नृत्य नाटिका बनाई 'पंगु गिरी लंघतेÓ उसको मैंने 2005 में रवीन्द्र मंडप भुनेश्वर में प्रस्तुत किया। बस वहीं से धीरे-धीरे लोग जानने लगे और मैं नृत्य करता गया। जब पैर था तो मैं इतना खुश नहीं था। आज बहुत खुश हूँ कि लोगों का इतना प्यार मिलता है। 2009 में  मैंने जी टीवी पर आशाएँ कार्यक्रम में सुधा चंद्रन जी के साथ नृत्य प्रस्तुत किया था, वह मेरे लिए बहुत आनंद का समय था; क्योंकि सुधा जी हमेशा मेरी प्रेरणा स्रोत रहीं है।
कलाश्रम आपका नृत्य विद्यालय है, इसके बारे में  कुछ बताइए।
जी हाँ भुवनेश्वर में मैंने ये एकेडमी खोली है जहाँ मैं सभी को नृत्य सिखाता हूँ। पैरों की मुद्रा मैं अपने हाथों के जरिये सिखाता हूँ। हम हर साल एक गुरु उत्सव करते हैं। ये उत्सव करते हुए 5 साल हो गए हैं। ये उत्सव मैंने अपने गुरु के लिए प्रारंभ किया था। इस उद्देश्य से कि सारे गुरुओं को याद किया जाए और उनके परिवार को गुरु दक्षिणा दी जाए।
आपने अमेरिका में बहुत- सी जगह पर कार्यक्रम किया है। आपका यह अनुभव कैसा रहा?
बहुत अच्छा अनुभव रहा है। सभी ने बहुत प्यार दिया है। उनका प्यार देख कर मेरी आँखों में आँसू आ जाते हैं।
आपने अमेरिका में अभी तक कौन कौन सी नृत्य नाटिकाएँ  प्रस्तुत की हैं।
साख, पंघु गिरी लंघते और गुरु दक्षिणा नृत्य नाटिकाएँ  प्रस्तुत की है।
आपने बहुत से नृत्य किये हैं कौन-कौन सी नृत्य नाटिका को  लोगों ने बहुत पसंद किया है?
  गुरु दक्षिणा को लोगों ने बहुत पसन्द किया है। यह मेरे जीवन पर आधारित नृत्य है। मेरे सखा विजय भैया उस नित्यानन्द का अभिनय करते हैं जब पैर था और मंै बाद में  स्वयं अपना अभिनय नृत्य करता हूँ।
आज आप अपना प्रेरणा स्रोत किसको मानते हैं?
जब मेरा एक्सीडेंट  हुआ था तो मैं  लोगों से सहायता माँगता रहा किसी ने मेरी सहायता नहीं की। सभी  देख कर  निकल गए  तब सभी ने मुझे किनारे कर दिया था। सबसे पहले मंै अपने माता पिता, गुरु जी, भाई, भाभी इन सभी  लोगों को प्रेरणा स्रोत मानता हूँ; क्योंकि ये हर समय मेरी हिम्मत बढ़ाते रहे।
ओडिसी नृत्य का भविष्य आपको कैसा लगता है ?
भविष्य तो बहुत ही अच्छा है। देश में  और विदेशों में  सभी जगह लोग इस नृत्य  को बहुत पसंद करते हैं  बस स्वयं को ही  इस नृत्य की अहमियत को समझना होगा। अपने प्रदेश में  इसको ऊँचा उठाना होगा।
आपको सभी ने इतना प्यार दिया क्या कहना चाहेंगे ?
आप सभी ने भगवान बनके अपनी शक्ति मुझ में डाली है तभी  मै नृत्य कर पा रहा हूँ। जो भी कोई विकलांग हैं उनको हिम्मत नहीं हरनी चाहिए। मेहनत करते रहना चाहिए। जो विकलांग नहीं है और कोई काम नहीं करते या निराश हंै, उनसे कहना चाहूँगा कि जब मुझ जैसा इन्सान ऐसा कुछ कर सकता है तो आप लोगों के पास तो सब है (शारीरिक रूप से ) फिर आप तो सब कुछ कर सकते हैं।

संपर्क: डलस यू. एस. ए E-mail: rach_anvi@yahoo.com

परंपरा

 छत्तीसगढ़ में गहनों की परंपरा
वैसे तो छत्तीसगढ़ के अधिकांश इलाकों में महिलाएँ गोदना को एक पारंपरिक गहने के रूप में धारण करती हैं और पवित्रता की भावना से अपने सौंदर्य को निखारने के लिए फूल पत्ती, जानवर अपने प्रिय का नाम या अपनी पसंद के दूसरे डिजाइन गुदवाती हैं। गोदना के बारे में आदिवासी अंचल में यह धारणा प्रचलित हैं कि ऊपर से पहने गए गहने तो इस धरती पर ही रह जाएंगे परंतु शरीर में गुदवाया गया गहना हमारी मृत्यु के बाद भी हमारे साथ ही जाएगा
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दुनिया का कोई भी भाग हो हर जगह आभूषणों का अपना अलग ही महत्व रहा है। न जाने कितने वर्षों से महिलाओं द्वारा आभूषणों का प्रयोग अपने को सजाने के लिए किया जाता रहा है। हर प्रांत की अपनी आभूषण संबंधी अलग पहचान होती है जिस प्रकार से अलग-अलग प्रदेशों में अपनी परंपरा के अनुसार विशिष्ट गहनों का प्रचलन है और हम वहां की महिलाओं की वेशभूषा को देखते ही समझ जाते हैं कि वे किस प्रदेश की महिलाएं हैं। उसी प्रकार छत्तीसगढ़ में भी महिलाएं अपने खास आभूषणों के जरिए अपनी अलग पहचान बनाती हैं।
हर प्रदेश में अपनी संस्कृति को सुरक्षित रखने में गहनों का विशेष स्थान है। छत्तीसगढ़ के संस्कृति विभाग ने छत्तीसगढ़ के पारंपरिक गहनों पर एक ब्रोशर प्रकाशित किया गया है। जो प्रदेश के पारंपरिक गहनों के  संरक्षण- संवर्धन की दिशा में एक अच्छा प्रयास है। आभूषणों के संदर्भ में क्षेत्रीय मान्यता के अनुसार अनेक जानकारी दी गई  है। आभूषणों की परंपरा व इतिहास तथा इन्हें बनाने वाले कारीगरों के विषय में और अधिक जानकारी की जरूरत है। 
छत्तीसगढ़ की संस्कृति में आभूषणों की पृथक पहचान है, यहाँ की महिलाएँ जब अपने पारंपरिक आभूषण पहनकर निकलती हैं तो उनका रूप सौंदर्य और अधिक निखर उठता है।
छत्तीसगढ़ में गाए जाने वाले सुआ और ददरिया गीतों में यहां के आभूषणों का खूबसूरती से वर्णन हुआ है- एक गीत है जिसमें एक लड़की अपनी मां से सुआ नाचने जाने के लिए अपनी माँ से आभूषण मांगती है- दे दे दाई तोर गोड़ के पैरी, सुआ नाचे बर जाबोन... गीत में आगे वह अपनी मां से हाथ का बहुंटा, घेंच का सूता, माथे की टिकुली, कान की खूंटी और हाथ की ककनी आदि की मांग करती है।
छत्तीसगढ़ में बनने वाले आभूषणों के लिए सोना, चांदी, काँसा, पीतल, एल्युमिनियम, लोहा, मिश्र धातु, काष्ठ, बाँस, लाख आदि का प्रयोग किया जाता है।
वैसे तो छत्तीसगढ़ के अधिकांश इलाकों में महिलाएँ गोदना को एक पारंपरिक गहने के रूप में धारण करती हैं और पवित्रता की भावना से अपने सौंदर्य को निखारने के लिए फूल पत्ती, जानवर अपने प्रिय का नाम या अपनी पसंद के दूसरे डिजाइन गुदवाती हैं। गोदना के बारे में मान्यता है कि टोने- टोटके, भूत-प्रेत आदि से बचाव के लिए गोदना को आदिवासी अंचल में रक्षा कवच की तरह अनिवार्य माना जाता है। यह धारणा भी प्रचलित हैं कि ऊपर से पहने गए गहने तो इस धरती पर ही रह जाएंगे परंतु शरीर में गुदवाया गया गहना हमारी मृत्यु के बाद भी हमारे साथ ही जाएगा। इसीलिए पुराने जमाने में छत्तीसगढ़ की सभी स्त्रियों के लिए छोटा सा ही सही एक गोदना गुदवाना जरूरी समझा जाता था। 
गोदना के साथ-साथ यहाँ की महिलाएं आभूषणों से अपने आपको सजाने में गर्व का अनुभव करती हैं। यहां की महिलाओं द्वारा आभूषण धारण करने के बारे में खास बात यह है कि एक समय ऐसा था कि वे अपने अधिकांश पारंपरिक गहनों का इस्तेमाल कुछ खास अवसरों पर ही नहीं बल्कि हमेशा धारण करती थीं। यहां तक की खेत-खलिहान में काम करते समय भी वे कमर में करघनी, पैरों में पैरी, तोड़ा तथा हाथों में कड़ा, पहुंनी तथा गले में पुतरी, सुता आदि धारण किए रहती थीं। यह बात और है कि अब आर्थिक परिस्थिति के चलते उनके ये गहने कम होते चले जा रहे हैं। 
गहनों के विभिन्न प्रकार
जूड़े व चोटी के गहने- यहां की महिलाएं बालों को भी विशेष प्रकार के गहनों से सजाती हैं जैसे जूड़े व चोटी में धारण किए जाने वाले कुछ खास गहने हैं जिसमें जंगली फूली, पंख, कौडिय़ां, सिंगी, ककई- कंघी, मांगमोती, पटिया, बेंदी आदि प्रमुख हैं।
माथे पर पहने जाने वाले गहने- माथे पर लगाई जाने वाली टिकुली भी अनेक डिजाइन की होती हैं। महिलाएं माथे को अपनी पसंद से फूल आदि बनाकर तो सजाती ही हैं पर साथ ही धातु से बने टिकुली का प्रयोग गोंद से चिपका कर माथे पर लगाने का प्रचलन यहां बहुत पुराना है।
कान के अनोखे गहने- कान में पहने जाने वाले आभूषणों के तो यहां अनेक प्रकार हैं जैसे- ढार, तरकी, खिनवां, इयरिंग, बारी, फूल संकरी, लुरकी, लवंग फूल, खूंटी, तितरी आदि। ये आभूषण इतने खूबसूरत होते हैं कि आजकल इनकी नकल आधुनिक डिजाइनों में किया जाने लगा है।
नाक के गहने- नाक में पहने जाने वाले आभूषण भी यहां खास प्रकार के होते हैं यहां तक कि उनके प्रकार के आधार पर पहले महिला कौन सी जाति की है इसका पता लग जाता था। यहां नथ, नथनी, लवँग, फुल्ली आदि धारण करने का प्रचलन है।
गले की शोभा बढ़ाने वाले गहने- वर्तमान में तो गले के कई विशिष्ट प्रकार दिखाई ही नहीं देते। आज जरूरत इन्हें बचाए रखने की हैं। गले में पहने जाने वाले आभूषणों में प्रमुख हैं- सूंता, पुतरी, कलदार, सुर्रा, सँकरी, तिलरी, हमेल तथा हँसुली।
बाजू, कलाई और उंगलियों के गहने- हाथ के बाजू में पहने जाने वाले आभूषण भी विभिन्न डिजाइन व विभिन्न प्रकार के प्रचलित हैं। जिनमें प्रमुख हैं चुरी बहुटा, कड़ा हरैया, बनुरिया, ककनी, नाँगमोरी, पटा, पहुंँची, ऐंठी, मुंदरी आदि।
कमर में पहने जाने वाले गहने- चाबी गुच्छ, भारी और चौड़े कमरबंद और करधन पहन कर जब छत्तीसगढ़ की महिलाएँ निकलती है तो उसके कमर की लचक देखते ही बनती है। कहते हैं कि यहां की महिलाएं कमर में चौड़ी- चौड़ी करघनी इसलिए पहनती हैं क्योंकि इससे पानी से भरी मटकी, गगरी अथवा भारी बोझ उठाने में आसानी होती है। जो भी हो कमर के इन आभूषणों की खूबसूरती की कोई सानी नहीं है।
पैरों के रूनझुन करते गहने- नख से शिख तक के श्रृंगार में पैरों में पहने जाने वाले आभूषणों का अपना अलग ही महत्व है।  पैरों में पैरी, तोड़ा, सांटी, कटहर, चुरवा, चुटकी,    बिछिया आदि पहना जाता है।
बच्चों के गहने- यहां के बच्चों को भी आभूषण पहनाने का प्रचलन है। बहुत से आभूषण तो बच्चों को बुरी नजर से बचाने के लिए पहनाया जाता है। जैसे- बघनखा, ठुमड़ा, गठुला, मुंगुवा, ताबीज तथा हाथों व कमर में काला धागा हाथ में काली मोती और पैरों में चूड़ा आदि।
पुरुषों के गहने- आभूषण पहनने में पुरुष भी पीछे नहीं रहते। यहां उनके लिए भी विभिन्न प्रकार के आभूषण प्रचलित हैं। जैसे चुरुवा, कान की बारी और गले में कंठी पहनने का चलन है।
परंतु अब छत्तीसगढ़ के ये पारम्परिक गहने संग्रहालय की वस्तु बनते जा रहे हैं अत: इन्हें सहेजे जाने की जरूरत हैं। अन्यथा एक दिन ऐसा आएगा कि हम भूल जाएंगे कि छत्तीसगढ़ की स्त्रियों के पारंपरिक गहने कैसे होते थे। आज आधुनिकीकरण के प्रभाव में धीरे-धीरे आदिवासी अँचलों को छोड़ कर अन्य इलाकों में गोदना गुदवाने की प्रथा तो लगभग समाप्त ही हो गई है, पारंपररिक गहने भी विलुप्ति की कगार पर हैं।
हाँ छत्तीसगढ़ में पारंपरिक गहनों से सजी स्त्री अब लोक मंचों में ही दिखाई देती हैं। जैसे पंडवानी गायिका तीजन बाई जब मंच पर पंडवानी गाने उतरती हैं तो वे छत्तीसगढ़ के गहनों का प्रतिनिधित्व करती नजर आती हैं। इसी तरह गाँव के हाट बाजार और मेले मड़ई में गहनों का बाजार सजा नजर आता हैं जहाँ सोने, चांदी जैसे महंगे धातु के नहीं बल्कि सस्ती धातुओं से निर्मित विभिन्न प्रकार के गहने देखने को मिल जाते हैं, इनमें आधुनिक डिजाइनों की झलक भी दिखाई देती है। (उदंती फीसर्च)

माँ की ममता

माँ की ममता
- डॉ. मिथिलेश दीक्षित
तुम ही हो माँ
तुमसे ऊँचा कौन
नहीं उपमा।
माँ का आँचल
शीतल सुरभित
मलयानिल।
नहीं समता
सभी गुणों से ऊँची
माँ की ममता।
रिश्ते अनेक
सच्चा है रिश्ता सिर्फ
माता का एक।
हुए रूबरू
हवाएँ भी लाती हैं
माँ की खुशबू।
आतीं बलाएँ
कष्टों से बचा लेतीं
माँ की दुआएँ।
लगाता पार
जीवन के कष्टों को
माता का प्यार।
पाया चरित्र
माता का मिला मुझे
प्यार पवित्र।
माँ के सपने
भरे रंग जिनमें
अब हमने।
१०
तपी न काया
माता की पायी मैंने
शीतल छाया।
११
माँ का आशीष
गर्व से उठाती हूँ
अपना शीश।
१२
रिश्ता है खास
हो रहा एहसास
माँ मेरे पास।
१३
माता लगती
सुरक्षा-कवच-सी
बड़े सच-सी।
१४
देखो संसार
कहीं न मिला मुझे
माता-सा प्यार।
१५
देती जननी
जन्म-प्यार-संस्कार
यह संसार।
१६
जननी-कथा
शब्दों में कैसे कहें
उसकी व्यथा।
१७
पाया है सुख
देखा है जब-जब
माता का मुख।
१८
कैसा अनूप
ममता बिखेरता
माता का रूप।
१९
पाता उल्लास
होता निश्शंक शिशु
माता के पास।
२०
माँ ही थी बस
कौन हुआ अपना
सब सपना।
२१
माँ ही सबमें
सभी जगह हम
माँ के मन में।
२२
कैसा अनूप
ममता बिखेरता
माता का रूप।
२३
घर है खाली
जिसकी करती थी
माँ रखवाली।
२४
बिना ममता
घर भी घर जैसा
कहाँ लगता।

संपर्क: जी-91,सी, संजयगांधीपुरम् लखनऊ-226016, (उ.प्र.)मो. 9412549904, E-mail: mithileshdixit01@gmail.com

व्यथा का सरगम

व्यथा का सरगम
- अमृत राय

बन्नों के भीतर बैठे हुए पशु की आत्मा को गम्भीर सन्तोष मिला, गहरी तृप्ति का सुख... इसे ऐसे ही चीर डालना चाहिए... इसी का खुदा उन जानवरों का भी खुदा है... इसे यों ही चीर डालना चाहिए... बन्नों के भीतर ही भीतर पैशाचिक उल्लास की लहर दौड़ गयी।
है। गहरी। काली। नीरव। नि:स्तब्ध। केवल दूर पर कुत्तों के भूँकने की आवाज और कुछ गीदड़ों की। मनुष्य की आवाज तो गाने की एकाध कड़ी के रूप में कभी-कभी सुनाई पड़ जाती है, किसी रिक्शेवाले के किसी रोमांटिक फिल्मी गाने की एक कड़ी; वर्ना सन्नाटा।
पास के ही किसी घर से शहनाई का व्याकुल स्वर आ रहा है। शहनाई भी अजब-बाजा है जो दुख-सुख दोनों में समान रूप से आदमी का साथ देता है। आज न जाने क्यों सुरेश्वर...
मगर आप उसे क्या जानें। आपने शायद कभी उसे बीन बजाते नहीं सुना। जब वह आँख बन्द करके बीन के तारों पर अपनी उंगलियाँ दौड़ाने लगता है तो विश्वास ही नहीं होता कि यह सुरेश्वर जो सामने बैठा है, उसकी अभी उठान पर की उम्र है, उसने अभी कुल तीस बसन्त देखे हैं। उसके स्वरों से प्रवाहित होने वाली व्यथा की उस सरिता में जिसने भी एक बार नहाया उसका रोम-रोम जैसे काँप उठा और उसे लगा मानो अनेक पतझर और शिशिर बजाने वाले की अस्थि और मज्जा में जाकर बस गये हों।
सुरेश्वर रेलवे के एक आफिस में क्लर्क है। रेलों की घड़घड़ाहट और फाइलों की थकान को अपनी बीन के स्वरों में बाँधकर उसने उन्हें नया ही रूप दे दिया है। दिन-भर की दौड़-धूप के बाद रात को यही उसकी शान्ति का निर्झर है, यही उसका सहारा है, कवच है, मानो यह न हो तो दफ्तर की फाइलें उसे खा जाएँगी। रात को अपना कमरा बन्द करके (जिसमें पड़ोसियों की नींद न खराब हो!) वह अकसर बड़ी देर तक बजाता रहता है। रात को इन घडिय़ों का एकान्त उसे बहुत प्रिय है। वह चाहता है कि जल्दी ही सो जाऐ जिसमें दूसरे रोज तक अपनी बीन में खोया रहता है और समझता रहता है कि किसी बिन्दु पर पहुँचकर घड़ी की सुइयाँ अचल हो गयी हैं।....
सो, आज न जाने क्यों सुरेश्वर का मन उदास है। शहनाई का वह पतला स्वर खंजर की तरह उसके दिल के अन्दर उतरता चला जा रहा है। एक अजीब-सी वेदना, एक अजीब-सा दर्द उसे अपने अन्दर समो रहा है। उसकी बीन आज खामोश है। आज तो वह बस सुन रहा है। शहनाई के स्वर की वह बंकिम कटार उसके अन्दर उतरती ही चली जा रही है। सुरेश्वर जानना चाहता है कि अपने उतार और चढ़ाव में वह उससे क्या कहना चाहती है, पीड़ा की वह कौन-सी अतल गहराई है जिसे छू लेने का उसने संकल्प किया है। शहनाई का स्वर उसके गहरे से गहरे मन में एक अत्यन्त सुन्दरी पार्वत्य युवती का आकार ग्रहण कर रहा है। यह युवती किसी क्रूर दैत्य द्वारा शापित है, उसका सखा खो गया है, उसके परिजनों ने उसे छोड़ दिया है और उसे अकेले ही अपनी व्यथाओं का पर्वत ढोना है। उसकी मुखश्री तुहिनस्नात मटर के फूल के समान है, उसके कपड़े हिम के सदृश धवल हैं। पर उसकी मुखमुद्रा को जैसे किसी गहरी उदासी का धुआँ लग गया हो।
...शहनाई के स्वर को इस मानव-चित्र में बदलकर सुरेश्वर उसी को देखता हुआ खोया-सा, ठगा-सा बैठा था। हठात् जैसे किसी ने उसके कन्धे पकड़कर उसे झ्रझोड़ा और होश में ला दिया। और तब उसे पता चला कि वह अपने-आपको छल रहा था। जो मानस-चित्र उसकी आँखों के आगे आ रहा है वह शहनाई के स्वर का चित्र नहीं है, माँस-मज्जा की एक वास्तविक तरुणी का चित्र है जिसे उसने आज ही शरणार्थियों की गाड़ी से उतरते देखा है। वह हजारा जिले की एक सीमान्तदेशीय हिन्दू पठान तरुणी का चित्र है...जब शहनाई ने किसी भयानक दर्द को अपने स्वरों में बाँधने की कोशिश की तो वह व्यथा-सुन्दरी आपसे-आप उसकी आँखों के आगे आ गयी, समुद्र के फेन से निकलती हुई वीनस के समान...
...हाँ, सचमुच वीनस...उर्वशी...तक्षशिला की सुन्दरी...सरो के पेड़ की-सी सुघड़ लम्बाई, स्वस्थ यौवन से भरपूर छरहरा शरीर, सीमांत के कागजी बादाम जैसी ही आँखें, चन्दन-सा गौर, सुसंस्कृत मुखमंडल, लम्बी-सी वेणी। मगर सबके ऊपर अंगराग के स्थान पर उदासी का एक गहरा लेप जो चेहरे के भाव को आमूल बदल देता है। उसे देखकर कोई उच्छृंखल भाव जैसे पास पर भी नहीं मार सकता; देखने के साथ ही उसे लगातार देखते रहने की इच्छा होती है, एकटक, मगर उसके साथ ही साथ पूरे वक्त जैसे कोई भीतर बैठा एक बड़ी तकलींफदेह कड़ी गुन-गुनाता रहता है...
सुरेश्वर ने आज ही तो उनके रहने की जगह देखी। धन्य भाग जो दूसरा महायुद्ध हुआ, वर्ना न लड़ाई होती, न मिलिटरी की बारकें बनतीं और न आज मनुष्य की पशुता से भागकर शरण माँगन वालों को टिकने का कहीं कोई ठिकाना होता! शरणार्थियों को ये बनी-बनायी बारकें यों मिल गयी गोया इन्हीं के लिए बनाई गयी हों। इन्हीं बारकों में अपने घरबार, खेती-किसानी, दुकानदारी से उखड़े हुए लोग अपना सारा सामान लिये-दिये पड़े थे। टीन के बड़े बक्स, मँझोले बक्स, छोटे बक्स, खाटों के पाये-पाटियाँ, सुतली या बाध, सब अलग-अलग मोड़कर रखी हुईं; चटाइयाँ, एकाध बाल्टी, लोटा, थाली, कनस्तर किसी-किसी के पास अपना हुक्का भी। यही उनकी सारी गिरस्ती थी। इसी गिरस्ती के घिरे-बँधे वे इस नई दुनिया में अपने लिए जगह बना रहे थे। बीविया कुएँ से पानी ला रही थीं या रोटी पका रही थीं और बच्चे धूल में सने, कुछ सहमे-सहमे-से खेल रहे थे, लोहता की खाक का मिलान हजारा की खाक से करके यह पता लगा रहे थे कि पशुता के कीटाणु कहाँ ज्यादा हैं और अपने जहन से उन डरावनी शक्लों को निकालने की कोशिश कर रहे थे जिन्होंने उनकी नादान जिन्दगी को भी चारों तरफ से डर की रस्सियों से कस दिया था।
यहीं इसी नई दुनिया में उस शाम को सुरेश्वर ने उस व्यथा-सुन्दरी को हलके-हलके रोटी सेंकते देखा था...
और उसकी विपत्ति की कहानी सुनी थी एक ऐसे आदमी से जो बन्नो की पुरानी दुनिया में भी उसका पड़ोसी था और आज इस नई दुनिया में भी, जिसकी दीवार उठ ही न पाती थी, क्योंकि वह आदम के बच्चे को हाड़तोड़ ईमानदार मेहनत की पुख्ता नींव पर नहीं बल्कि पब्लिक की दया की थोथी भुस-भुसी नींव पर आधारित थी। सुरेश्वर के यह पूछने पर कि उन्हें यहाँ कैसा लगता है, जिला हजारा की रहनेवाली उस व्यथा-सुन्दरी बन्नों के पड़ोसी उस अधेड़ आदमी ने जो बात कही थी वह सुरेश्वर को भूलती नहीं 'किसी की भीख के टुकड़े पर जिन्दा रहने से ज्यादा लानत की बात दूसरी नहीं होती, बाबूजी!उसी से सुरेश्वर को यह भी पता लगा था कि बन्नों की शादी हाल ही में हुई थी, उसी गाँव में, जब कि काट शुरू हुई। उसके आदमी को कातिलों ने नेजा भोंककर मार डाला और इसे उठाकर ले गये। फिर बन्नों वहाँ क्या देखा और कैसे एक रात जान पर खेलकर वह भाग निकली और छुपते-छुपते दूसरे भागने वालों के संग जा मिली, इसकी एक काफी साहसिक कहानी थी।
वह अधेड़ आदमी जब शाम के धुँधलके में एक छोटी-सी चारपाई पर बैठा वह किस्सा सुना रहा था, उस वक्त उसकी नायिका बन्नों इतने भयानक अनुभवों, पीड़ाओं और साहस को अपने उस नाजुक शरीर में समेटे खामोशी के संग रोटियाँ सेंक रही थी। उसी खामोशी से अपनी तकलींफों को सहते-सहते वह कुछ-कुछ विक्षिप्त-सी हो गयी थी, बोलने या हँसने में भी अब शायद उसे तकलीफ होती थी। उस दुनिया की तमाम और चीजों के संग जिनमें उसकी असमत और उसका पहरेदार भी था, उसका बोलना और हँसना भी जलकर राख हो गया था। पाँच हंजार या पचास हंजार साल पहले आये भूडोल में उसकी जिन्दगी के बिना पलस्तर के, टूटे हुए मकान में (अभी उसकी शादी को हुए ही कै दिन हुए थे!) उसकी उमंगों के पंछी भी जहाँ-तहाँ मरे पड़े थे; जो कभी सर्द लाशें थीं वही अब ठठरियाँ हो गयी थीं और शीशे की तरह चमकीले किसी पत्थर में गोया हँसी बीच में ही रुक गयी थी, मुँह खुला का खुला ही रह गया था।
बारक के पास ही कुआँ था। कुएँ के पास ही एक कोठरी-सी थी। पता नहीं, लड़ाई के दिनों में वह किस काम में आती थी, अब तो वह खाली पड़ी रहती है, लड़के दिन के वक्त उसमें लुकते-छिपते हैं।
आज शाम के साढ़े सात बजे उसमें अचानक बड़ी जान आ गयी थी। बन्नों पानी भरने गयी तो थोड़ी दूर पर ही उस कोठरी से उसे किसी के चीखने या चीख के जबर्दस्ती रूँध दिये जाने की हलकी-सी आवाज आयी, हलकी मगर पैनी। कुछ मर्द आवाजों की फुसफुसाहट भी उसके कानों में पड़ी। उसने तय किया कि पता लगाना चाहिए। पानी लेकर लौटी। पानी रखा। एक ताक पर से अपना खंजर उठाया और चली।
वह कोई दस गज की दूरी पर रही होगी जबकि कोठरी में से किसी आदमी ने कुछ खोजने के लिए एक दिया-सलाई जलायी जो भक् से बुझ भी गयी।
बन्नों ने देखा कि चार-पाँच आदमियों ने एक नौजवान लड़की को जमीन पर दाब रखा है, लड़की चित लेटी हुई है या लिटायी हुई है, उसके तन पर एक भी कपड़ा नहीं है, दो-तीन जवान उसके हाथ-पाँव कसे हुए हैं और वह मादरजाद नंगी लड़की छटपटा रही है...
कुछ खास जोशीले शरणार्थी नौजवानों के एक गिरोह ने आज शिकार किया था। उनका खून भी खून है, पानी नहीं, उन्हें बदला लेना आता है, वह अपनी जिल्लत का बदला लेंगे, अपने धर्म की किसी लड़की की लुटी हुई अस्मत का बदला वो दुश्मन की लड़की की अस्मत लूटकर चुकाएँगे।
पास के एक गाँव से पाँच-छ: नौजवान कुछ चोरी और कुछ सीना-जोरी (यानी एक-दो आदमियों को घायल करके) एक लड़की को उठा लाये थे और इस वक्त बारी-बारी से उसकी अस्मत लूटकर न सिर्फ अपने वहशीपन को खुराक पहुँचा रहे थे बल्कि उसके साथ-ही-साथ अपनी कौम की खिदमत भी कर रहे थे।
एक लम्हे को जो दियासलाई जली थी उसमें बन्नों ने इन कौम के खादिमों को अपने कर्तव्य में रत देख लिया।
उसे बात समझने में जरा भी देर नहीं लगी। एक तो स्थिति यों ही दियासलाई की लाल-सी रोशनी में इनसान की हैवानियत की तरह स्पष्ट थी, दूसरे बन्नों...उसे भी क्या कुछ बतलाने की जरूरत थी। वह जो कि खुद ऐसे ही एक नाटक की नायिका रह चुकी थी!
बन्नों के भीतर बैठे हुए पशु की आत्मा को गम्भीर सन्तोष मिला, गहरी तृप्ति का सुख...इसे ऐसे ही चीर डालना चाहिए...इसी का खुदा उन जानवरों का भी खुदा है...इसे यों ही चीर डालना चाहिए...
बन्नों के भीतर ही भीतर पैशाचिक उल्लास की लहर दौड़ गयी।
मगर कोई डेढ़-दो मिनट के अन्दर ही एक विचित्र मरोड़ के साथ एक दूसरी लहर उठी, साँप काटने पर आदमी को जो लहर आती है वह लहर, उसमें झाग निकलती है!
बन्नों को लगा कि जैसे वह एक बड़े आईने के सामने हो। जो लड़की जमीन पर मादरजाद नंगी, चित लेटी है वो वही है, बन्नों, उसी को आधी दर्जन बाँहें जमीन से चिपकाये हुए हैं और भेडिय़ों जैसी भूखी-भूखी ये आँखें वही हैं जो पहले भी उसे यों ही घूर चुकी हैं...
कौन है, कौन है, यहाँ क्या हो रहा है? चिल्लाती हुई वह खंजर हाथ में लिए तेजी से कोठरी में दाखिल हुई। अन्दर खलबली मच गयी। एक-दो ने पहले भागने की कोशिश की, मगर फिर सबने यही तय किया कि देखना चाहिए मांजरा क्या है, हमारे काम में खलल डालने वाला यह कौन-सा शैतान जमीन पर उतर आया।
बन्नों ने एक-दो जवानों पर हमला किया, मगर वे सधे हुए खिलाड़ी थे, बच गये और बन्नों की तरफ लपके कि उसके हाथ से खंजर छीन लें, मगर इसके पहले कि वे ऐसा कर पाएँ, बन्नों ने बिजली की तेजी से दौड़कर उस लड़की के पेट में खंजर भोंक दिया था और वही खंजर अपने सीने में चुभा लिया था।
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लेखक परिचयः प्रेमचंद के छोटे बेटे अमृत राय का जन्म सन् 1921 में उत्तर प्रदेश के वाराणसी में हुआ था।  पिता की तरह मूलत: कहानीकार व उपन्यासकार। श्रेष्ठ अनुवादक व जीवनीकार के रूप में भी ख्याति। व्यंग्यकार और समालोचक भी। नाट्य-लेखन में भी सक्रिय रहे। अंग्रेजीबंगला और हिन्दी पर समान अधिकार। अमृत राय जी का विवाह सुभद्रा कुमारी चौहान जी की बेटी सुधा चौहान से हुआ था।
 प्रमुख कृतियाँ- साहित्य में संयुक्त मोर्चाएसुबह का रंगलाल धरतीनई समीक्षानागफनी का देशहाथी के दांतअग्निशिखाफांसी के तख्ते सेकस्बे का एक दिनगीली मिट्टीकठघरेजंगलेसहचिंतनभटियालीआधुनिक भावबोध की संज्ञाबतरसचतुरंगसारंग और धुआँ। प्रमुख अनुवाद- स्पार्टाकस का अनुवाद आदिविद्रोहीहैमलेट कासमरगाथा।
देश-विदेश के कई महत्वपूर्ण पुरस्कारों से सम्मानित। प्रेमचंद की जीवनी 'कलम का सिपाही’ नामक पुस्तक पर साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिल चुका है। इनका उपन्यास बीज तथा कहानी-संग्रह तिरंगा कफ़न बहु-चर्चित है। कहानी तथा ललित निबन्ध के लेखन में भारत विख्यात इस लेखक की मृत्यु 14 अगस्त, 1996 ई. में हुई।

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