मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।

Feb 21, 2013

बहाने बसंत के



 बहाने बसंत के
- सोनल रस्तोगी
अक्सर सोचती हूँ के बसंत मुझे बावरा क्यों करता है, गीतों कविताओ और प्रेम से पहले भी बसंत मन लुभाता था ...पतंगों से घिरा आकाश, तीन दिन पहले से पतंगों में हिस्सेदारी छोटी छोटी चरखियाँ, नशे में झूमती इस छत से उस छत गिरती कागज़ की परियाँ और उनको पाने को लालायित चेहरे, और जिस हाथ में वो परी उतरी उसके चेहरे का विजयी भाव देखने लायक...
बसंत की तैयारी बसंत से एक रात पहले हिस्सा लगता, चोकोर बक्से निकले जाते जो खास तौर पर पतंग रखने के लिए दादाजी और उनके पूर्वजों ने बनवाए थे उसमें विशालकाय अद्धा,पौना पतंगे सारे साल सुकून से सोती उन बड़ी पतंगों को हम हैरत से ताका करते यही हाल चर्खियों के बड़े भाई चरखों को देखकर होता, शीशम और संगमरमर के काम की नक्काशी वाली खूबसूरत ख़ास चरखियाँ जिन्हें हाथ में थामने की हमारी ललक, ललक ही रह जाती, हम हांथों में रंगबिरंगी छोटी-छोटी चरखियाँ थामकर उल्लास में डूब जाते.... फिर आता सबसे कठिन समय जब पतंग-सद्दी-रील का बँटवारा होता, ये सार हिसाब किताब मेरे बड़े ताऊजी के हाथों में था, और उनके फैसले पर कोई उँगली उठा ही नहीं सकता था। सबकी धड़कने तेज,बिना किसी भेदभाव के सारे छोटे बच्चे बराबर पतंगें पाते बड़ों का कोटा ज्यादा था, हमारे भाई बिगड़ जाते ..
ये उड़ाती तो है नहीं फिर इसको इत्ती सारी पतंगें क्यों?
उन्हें ताऊजी आँख के इशारे से कंट्रोल कर देते, आखिर उनकी लाडली भतीजियों से कोई कुछ कैसे कह सकता है, पतंगों के बटवारे के बाद हत्थे पर चरखी रखकर तागा चढ़ाने का काम शुरू होता, और भाई की कोशिश शुरू हो जाती, अरे अपनी गिट्टी मुझे अपनी चरखी में चढ़वाने दे, मैं तुझे पतंग ऊँची करके दे दूंगा, और हम बहल भी जाते। रात को ही फटी-टूटी पतंगों के इलाज का भी इंतज़ाम कर दिया जाता उबले आलू, चावल, लेइ.
 बसंत पंचमी के दिन सुबह कुछ ज्यादा-जल्दी हो जाती आस-पास के घरो में बजने वाला तेज संगीत और वो-काटा का उद्घोष,आप चाहकर भी नहीं सो सकते ...
बसंत की सुबह अक्सर पापा के फरमान से होती ...बिना नहाए कोई छत पर नहीं चढ़ेगा ...जानते थे एक बार जो चढ़ गया वो किसी हालत में नीचे नहीं उतरेगा, वो बालपन का जोश वो उत्साह , बीच-बीच में दादी फ़्लैश बेक में चली जाती घर में इन बच्चों के कुर्ते पीले रंग में रंग देते थे क्या मजाल कोई बच्चा बिना नहाए छत पर चढ़ जाए ...
अपनी अलमारियों में पीले कपड़ों की ढूँढ शुरू हो जाती आखिर ऋतुराज का स्वागत उनके मन-भावन रंग में ही तो करना चाहिए, बचपन से कैशोर्य के बीच छतों पर बहार का त्योहार लगने लगा था हर छत आबाद ,आँखें आकाश की ओर,
 फुर्सत भरा फिर भी बेहद व्यस्त दिन, थकाने वाला पर फुर्तीला दिन जो चेहरे साल भर नहीं दीखते थे वो भी उस दिन नज़र आ जाते, कदम बरबस छत की और चल पड़ते कुछ ख़ास कम्पटीशन होते, सबसे पहली पतंग किसने उड़ाई, सबसे बड़ी पतंग, सबसे ज्यादा पतंगें किसने काटी, किसके म्यूजिक सिस्टम पर सबसे नए गाने बजे, किसकी उँगलियाँ सबसे ज्यादा ज़ख्मी हुई।
 आखिर बसंत के बाद मोहल्ले के मोड़ों पर डिस्कस करने का मसाला भी तो चाहिए।
खैर, वैसे तो सार साल पतंगें आसमान के पहलू में गोते खाती पर तीन दिन इस  त्योहार को ख़ास बना देते पहला छोटा बसंत, बसंत और बूढ़ा बसंत
कितनी तरह की पतंगें सजी धजी, नई पतंगों पर जब कन्ने बाँधे जाते और नजाकत से उनके मुड्ढे मोड़े जाते ताकि हवा का सामना करने को तैयार हो जाएँ।
बसंत की सुबह की सबसे बड़ी चिंता हवा का रुख होती  । आखिर सही हवा के बिना पूरे दिन पतंग कैसे उड़ाई जाएगी, कहीं तूफानी हवा चल गई तो त्यौहार का सत्यानाश। मिन्नतो का दौर चल पड़ता।
बच्चे अल सुबह से छत पर होते बड़े 10-11 बजे तक औरते सारा काम निपटा कर दोपहर में नाश्ता, फल,भुने आलू, मूँगफली, तहरी (पुलाव) से लेकर चाय के कई दौर सब छत पर, हसी ठहाके तो गूंजते पर, कई समझौते भी पड़ोसी छतों से किये जाते ...मसलन तुम मेरी पतंग नहीं काटोगे, लंगर नहीं डालोगे, पंतग कट गई तो डोर नहीं लूटोगे, ये बात अलग है दिन ढलते ढलते सारे समझोते टूट जाते, आखिर आकाश युद्ध में ऐसे समझोते कहाँ चलते है। बड़े बुजुर्गों का छतों पर रहना सुरक्षा और सद्भाव बनाय रखता, थोड़ी तू-तू मैं - मैं  से मामला सुलझ जाता ... सारी रंजिशें पतंगों के साथ कट जाती (हर बार ऐसा नहीं होता एक जनाब हमारी छत पर कट्टा (देसी तमंचा ) लेकर चढ़ आए थे।
सारा दिन तेज़ गीतों के ..कटी  पतंगों के नाम रहता। शाम को आकाश भर आतिशबाजी, एक दूसरे की छत पर जाना लजीज नाश्तों की प्लेटों की अदला बदली और कुछ रंगारंग कार्यक्रम और बसंत बीत जाता। बड़ी पतंगें वापस अपने चौकोर बक्सों में आराम करती, चरखी सारे दिन चक्कर खाने के बाद सुस्ताती, छत अगली सुबह के सन्नाटे को सोच उदास हो जाती, थके हारे नौनिहाल नींद में वो- काटा चिल्लाते या अपनी पतंग काटने के दु:ख में नींद में सुबकते हुए भी पाए जाते, पैरों का दर्द रात को महसूस होता, तेज मांझे से कटी उँगलियाँ टीस मारती पर बसंत से मोहब्बत वैसी ही रहती
लेखक के बारे में: जीवनदायिनी गंगा के तीर फर्रुखाबाद में जन्म। शिक्षा- कंप्यूटर में परास्नातक एवं पत्रकारिता में डिप्लोमा, वर्तमान में गुडग़ाँव में कार्यरत, रुचि- लिखना पढऩा और घूमना।  बचपन में बुआ ने साहित्य के प्रति रूचि को पहचाना तो माँ एवं अध्यापिकाओ ने प्रोत्साहन दिया, हर वक्त मन में कुछ ना कुछ चलता रहता है जब उस पर ध्यान देकर लेखनी थाम लेती हूँ तो माँ शारदा के आशीर्वाद स्वरूप कुछ सार्थक बन जाता है वरना विचार समय की नदी की धार में बह जाते है जो खोजने पर भी नहीं मिलते। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओ में रचनाएँ प्रकाशित व   http://sonal-rastogi.blogspot.in/ कुछ कहानियाँ, कुछ नज्में  ब्लॉग पर नियमित लेखन।
संपर्कः 10/101 heritage city, gurgaon, Email: sonras1 @gmail .com

सेहत

 अलसीः एक चमत्कारी दैविक भोजन
-डॉ. ओ. पी वर्मा
'पहला सुख निरोगी काया, सदियों रहे यौवन की माया। आज हमारे वैज्ञानिकों व चिकित्सकों ने अपनी शोध से से आहार-विहार, आयुवर्धक औषधियों, वनस्पतियों आदि की खोज कर ली है जिनके नियमित सेवन से हमारी उम्र 200-250 वर्ष या ज्यादा बढ़ सकती है और यौवन भी बना रहे। यह कोरी कल्पना नहीं बल्कि यथार्थ है। आपको याद होगा प्राचीन काल में हमारे ऋषि मुनि योग, तप, दैविक आहार व औषधियों के सेवन से सैकड़ों वर्ष जीवित रहते थे ; इसीलिए ऊपर मैंने पुरानी कहावत को नया रूप दिया है। ऐसा ही एक दैविक आयुवर्धक भोजन है 'अलसी' जिसकी आज हम चर्चा करेंगें।
पिछले कुछ समय से अलसी के बारे में पत्रिकाओं, अखबारों, इंन्टरनेट, टी.वी. आदि पर बहुत कुछ प्रकाशित होता रहा है। बड़े शहरों में अलसी के व्यंजन जैसे बिस्कुट, ब्रेड आदि बेचे जा रहे हैं। दिल्ली से कोरोनरी बाईपास सर्जरी करवाकर लौटे एक रोगी ने मुझे बताया कि उसे डॉक्टर त्रेहन ने नियमित अलसी खाने की सलाह दी है ,ताकि वह उच्च रक्तचाप व हृदय रोग से मुक्त रहे। विश्व स्वास्थ्य संगठन (W.H.O.) अलसी को सुपर स्टार फूड का दर्जा देता है। आयुर्वेद में अलसी को दैविक भोजन माना गया है। मैंने कहीं पढ़ा कि सचिन के बल्ले को अलसी का तेल पिलाकर मजबूत बनाया जाता है तभी वो चौके-छक्के लगाता है और मास्टर ब्लास्टर कहलाता है। आठवीं शताब्दी में फ्रांस के सम्राट चार्ल मेगने अलसी के चमत्कारी गुणों से बहुत प्रभावित थे और चाहते थे कि उनकी प्रजा रोजाना अलसी खाए और नीरोगी व दीर्घायु रहे ;इसलिए उन्होंने इसके लिए कड़े कानून बना दिए थे।
यह सब पढ़कर मेरी जिज्ञासा बढ़ती रही और मैंने अलसी से सम्बन्धित जितने भी लेख उपलब्ध हो सके पढ़े व अलसी पर हुई शोध के बारे में भी विस्तार से पढ़ा। मैं अत्यंत प्रभावित हुआ कि ये अलसी जिसका हम नाम भी भूल गये थे, हमारे स्वास्थ्य के लिये इतनी ज्यादा लाभप्रद है, जीने की राह है, लाइफ लाइन है। फिर क्या था, मैंने स्वयं अलसी का सेवन शुरू किया और अपने रोगियों को भी अलसी खाने के लिए प्रेरित करता रहा। कुछ महीने बाद मेरी जिन्दगी में आश्चर्यजनक बदलाव आना शुरु हुआ। मैं अपार शक्ति व उत्साह का संचार अनुभव करने लगा, शरीर चुस्ती फुर्ती तथा गजब के आत्मविश्वास से भर गया। तनाव, आलस्य व क्रोध सब गायब हो चुके थे। मेरा उच्च रक्तचाप, डायबिटीज ठीक हो चुके थे। अब मैं मानसिक व शारीरिक रूप से उतना ही शक्तिशाली महसूस कर रहा था जैसा कि 30 वर्ष पहले था।
अलसी पोषक तत्वों का खजाना:
आइये, हम देखें कि इस चमत्कारी, आयुवर्धक, आरोग्यवर्धक व दैविक भोजन अलसी में ऐसी क्या खास बात है। अलसी का बोटेनिकल नाम लिनम यूजीटेटीसिमम् यानी अति उपयोगी बीज है। अलसी के पौधे में नीले फूल आते हैं। अलसी का बीज तिल जैसा छोटा, भूरे या सुनहरे रंग का व सतह चिकनी होती है। प्राचीनकाल से अलसी का प्रयोग भोजन, कपड़ा, वार्निश व रंग-रोगन बनाने के लिए होता आया है। हमारी दादी माँ जब हमें फोड़ा-फुंसी हो जाती थी तो अलसी की पुलटिस बनाकर बाँध देती थी। अलसी में मुख्य पौष्टिक तत्त्व ओमेगा-3 फेटी एसिड एल्फा-लिनोलेनिक एसिड, लिगनेन, प्रोटीन व फाइबर होते हैं। अलसी गर्भावस्था से वृद्धावस्था तक फायदेमंद है। महात्मा गाँधीजी ने स्वास्थ्य पर भी शोध की व बहुत सी पुस्तकें भी लिखीं। उन्होंने अलसी पर भी शोध किया, इसके चमत्कारी गुणों को पहचाना और अपनी एक पुस्तक में लिखा है, 'जहाँ अलसी का सेवन किया जाएगा, वह समाज स्वस्थ व समृद्ध रहेगा।
आवश्यक वसा अम्ल ओमेगा 36 की कहानी:
अलसी में लगभग 18-20 प्रतिशत ओमेगा-3 फैटी एसिड ALA होते हैं। अलसी ओमेगा-3 फैटी एसिड का पृथ्वी पर सबसे बड़ा स्रोत है। हमारे स्वास्थ्य पर अलसी के चमत्कारी प्रभावों को भली भाँति समझने के लिए हमें ओमेगा-3 व ओमेगा-6 फेटी एसिड को विस्तार से समझना होगा। ओमेगा-3 व ओमेगा-6 दोनों ही हमारे शरीर के लिए आवश्यक हैं यानी ये शरीर में नहीं बन सकते, हमें इन्हें भोजन द्वारा ही ग्रहण करना होता है। ओमेगा-3 अलसी के अलावा मछली, अखरोट, चिया आदि में भी मिलते हैं। मछली में DHA और EPA नामक ओमेगा-3 फेटी एसिड होते हैं, ये अलसी में मौजूद ALA  से शरीर में बन जाते हैं। ओमेगा-6 मूँगफली, सोयाबीन, सेफ्लावर, मकई आदि तेलों में प्रचुर मात्रा में होता है। ओमेगा-3 हमारे शरीर के विभिन्न अंगों विशेष तौर पर मस्तिष्क, स्नायुतंत्र व आँखों के विकास व उनके सुचारू रूप से संचालन में महत्त्वपूर्ण योगदान करते हैं। हमारी कोशिकाओं की भित्तियाँ ओमेगा-3 युक्त फोस्फोलिपिड से बनती हैं। जब हमारे शरीर में ओमेगा-3 की कमी हो जाती है तो ये भित्तियाँ मुलायम व लचीले ओमेगा-3 के स्थान पर कठोर व कुरूप ओमेगा-6 फैट या ट्रांस फैट से बनती है। और यहीं से हमारे शरीर में उच्च रक्तचाप, मधुमेह प्रकार-2, आर्थ्राइटिस, मोटापा, कैंसर, आदि बीमारियों की शुरुआत हो जाती है।
शरीर में ओमेगा-3 की कमी व इन्फ्लेमेशन पैदा करने वाले ओमेगा-6 के ज्यादा हो जाने से प्रोस्टाग्लेन्डिन-ई 2 बनते हैं जो लिम्फोसाइट्स व माक्रोफाज को अपने पास एकत्र करते हैं व फिर ये साइटोकाइन व कोक्स एंजाइम का निर्माण करते हैं। और शरीर में इनफ्लेमेशन फैलाते हैं। मैं आपको सरल तरीके से समझाता हूँ। जिस प्रकार एक अच्छी फिल्म बनाने के लिए नायक और खलनायक दोनों ही आवश्यक होते हैं। वैसे ही हमारे शरीर के ठीक प्रकार से संचालन के लिये ओमेगा-3 व ओमेगा-6 दोनों ही बराबर यानी 1:1 अनुपात में चाहिए। ओमेगा-3 नायक हैं तो ओमेगा-6 खलनायक हैं। ओमेगा-6 की मात्रा बढऩे से हमारे शरीर में इन्फ्लेमेशन फैलते है तो ओमेगा-3 इन्फ्लेमेशन दूर करते हैं, मरहम लगाते हैं। ओमेगा-6 हीटर है तो ओमेगा-3 सावन की ठंडी हवा है। ओमेगा-6 हमें तनाव, सरदर्द, डिप्रेशन का शिकार बनाते हैं तो ओमेगा-3 हमारे मन को प्रसन्न रखते है, क्रोध भगाते हैं, स्मरण शक्ति व बुद्धिमत्ता बढ़ाते हैं। ओमेगा-6 आयु कम करते हैं। तो ओमेगा-3 आयु बढ़ाते हैं। ओमेगा-6 शरीर में रोग पैदा करते हैं तो ओमेगा-3 हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं। पिछले कुछ दशकों से हमारे भोजन में ओमेगा-6 की मात्रा बढ़ती जा रही हैं और ओमेगा -3 की कमी होती जा रही है। मल्टीनेशनल कम्पनियों द्वारा बेचे जा रहे फास्ट फूड व जंक फूड ओमेगा-6 से भरपूर होते हैं। बाजार में उपलब्ध सभी रिफाइंड तेल भी ओमेगा-6 फैटी एसिड से भरपूर होते हैं। हाल ही हुई शोध से पता चला है कि हमारे भोजन में ओमेगा-3 बहुत ही कम और ओमेगा-6 प्रचुर मात्रा में होने के कारण ही हम उच्च रक्तचाप, हृदयाघात, स्ट्रोक, डायबिटीज, मोटापा, गठिया, अवसाद, दमा, कैंसर आदि रोगों का शिकार हो रहे हैं। ओमेगा-3 की यह कमी 30-60 ग्राम अलसी से पूरी कर सकते हैं। ये ओमेगा-3 ही अलसी को सुपर स्टार फूड का दर्जा दिलाते हैं। स्त्रियों को संपूर्ण नारीत्व तभी प्राप्त होता है जब उनके शरीर को पर्याप्त ओमेगा-3 मिलता रहता है।
हृदय और परिवहन तंत्र के लिए गुणकारी:
अलसी हमारे रक्तचाप को संतुलित रखती है। अलसी हमारे रक्त में अच्छे कॉलेस्ट्रॉल की मात्रा को बढ़ाती है और ट्राइग्लीसराइड्स व खराब कॉलेस्ट्रॉल की मात्रा को कम करती है। अलसी दिल की धमनियों में खून के थक्के बनने से रोकती है ओर हृदयाघात व स्ट्रोक जैसी बीमारियों से बचाव करती है। अलसी सेवन करने वालों को दिल की बीमारियों के कारण अकस्मात् मृत्यु नहीं होती। हृदय की गति को नियंत्रित रखती है और वेन्ट्रीकुलर एरिद्मिया से होने वाली मृत्यु दर को बहुत कम करती है।
कैंसर रोधी लिगनेन का सबसे बड़ा स्रोत:
अलसी में दूसरा महत्त्वपूर्ण पौष्टिक तत्त्व लिगनेन होता है। अलसी लिगनेन का सबसे बड़ा स्रोत हैं। अलसी में लिगनेन अन्य खाद्यान्नों से कई सौ गुना ज्यादा होते हैं। लिगनेन एन्टीबैक्टीरियल, एन्टीवायरल, एन्टी फंगल और कैंसर रोधी है और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है। लिगनेन कॉलेस्ट्रोल कम करता है और ब्लड शुगर नियंत्रित रखता है। लिगनेन सचमुच एक सुपर स्टार पोषक तत्त्व है। लिगनेन पेड़ पौधों में ईस्ट्रोजन यानी महिला हारमोन के तरह कार्य करता है। रजोनिवृत्ति के बाद महिलाओं में ईस्ट्रोजन का स्त्राव कम हो जाता है और महिलाओं को कई परेशानियां जैसे हॉट फ्लेशेज, ओस्टियोपोरोसिस आदि होती हैं। लिगनेन इन सबमें बहुत राहत देता है।
लिगनेन मासिक धर्म सम्बन्धी अनियमितताएँ ठीक करता है। लिगनेन हमें प्रोस्टेट, बच्चेदानी, स्तन, आंत, त्वचा आदि के कैंसर से बचाता हैं। यदि मां के स्तन में दूध नहीं आ रहा है तो उसे अलसी खिलाने के 24 घंटे के भीतर स्तन में दूध आने लगता है। यदि माँ अलसी का सेवन करती है तो उसके दूध में प्रर्याप्त ओमेगा-3 रहता है और बच्चा अधिक बुद्धिमान व स्वस्थ पैदा होता है।
एड्स रिसर्च असिस्टेंस इंस्टिट्यूट सन् 2002 से एड्स के रोगियों पर लिगनेन के प्रभावों पर शोध कर रही है और आश्चर्यजनक परिणाम सामने आए हैं। ARAI के निर्देशक डॉ. डेनियल देव्ज कहते हैं कि जल्दी ही लिगनेन एड्स का सस्ता, सरल और कारगर उपचार साबित होने वाला है।
पाचन तंत्र और फाइबर:
 अलसी में 27 प्रतिशत घुलनशील (म्यूसिलेज) और अघुलनशील दोनों ही तरह के फाइबर होते हैं अत: अलसी कब्जी, मस्से, बवासीर, भगंदर, डाइवर्टिकुलाइटिस, अल्सरेटिव कोलाइटिस और आई.बी.एस. के रोगियों को बहुत राहत देती है। कब्जी में अलसी के सेवन से पहले ही दिन से राहत मिल जाती है। हाल ही में हुई शोध से पता चला है कि कब्जी के लिए यह अलसी इसबगोल की भुस्सी से भी ज्यादा लाभदायक है। अलसी पित्त की थैली में पथरी नहीं बनने देती और यदि पथरियाँ बन भी चुकी हैं तो छोटी पथरियाँ तो घुलने लगती हैं।
प्राकृतिक सौंदर्य प्रसाधन:
अलसी त्वचा की बीमारियों जैसे मुहाँसे, एग्जीमा, दाद, खाज, खुजली, छाल रोग, बालों का सूखा व पतला होना, बाल झडऩा आदि में काफी असरदार है। अलसी में पाये जाने वाले ओमेगा-3 बालों को स्वस्थ, चमकदार व मजबूत बनाते हैं। अलसी खाने वालों को कभी भी रुसी नहीं होती है। अलसी त्वचा को आकर्षक, कोमल, नम, व गोरा बनाती है। नाखूनों को स्वस्थ व सुंदर बनाती हैं। अलसी खाने व इसके तेल की मालिश से त्वचा के दाग, धब्बे, झाइयाँ, झुर्रियाँ दूर होती हैं। अलसी आपको युवा बनाये रखती है। आप अपनी उम्र से काफी वर्ष छोटे दिखते हो। अलसी उम्र बढ़ाती हैं।
रोग प्रतिरोधक क्षमता:
अलसी हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है। गठिया, गाउट, मोच आदि में अत्यंत लाभकारी है। ओमेगा-3 से भरपूर अलसी यकृत, गुर्दे, एडरीनल, थायरायड आदि ग्रंथियों को ठीक से काम करने में सहायक होती है। अलसी ल्यूपस नेफ्राइटिस और अस्थमा में राहत देती है।
मस्तिष्क और स्नायु तंत्र के लिए दैविक भोजन:
अलसी हमारे मन को शांत रखती है, इसके सेवन से चित्त प्रसन्न रहता है, विचार अच्छे आते हैं, तनाव दूर होता है, बुद्धिमत्ता व स्मरण शक्ति बढ़ती है तथा क्रोध नहीं आता है। अलसी के सेवन से मन और शरीर में एक दैविक शक्ति और ऊर्जा का प्रवाह होता है। अलसी एल्जीमर्स, मल्टीपल स्कीरोसिस, अवसाद, माइग्रेन, शीजोफ्रेनिया व पार्किनसन्स आदि बीमारियों में बहुत लाभदायक है। गर्भावस्था में शिशु की आँखों व मस्तिष्क के समुचित विकास के लिये ओमेगा-3 अत्यंत आवश्यक होते हैं।
ओमेगा-3 से हमारी नजर अच्छी हो जाती है, रंग ज्यादा स्पष्ट व उजले दिखाई देने लगते हैं। ऑखों में अलसी का तेल डालने से ऑखों का सूखापन दूर होता है और काला पानी व मोतियाबिंद होने की संभावना भी बहुत कम होती है। अलसी बढ़ी हुई प्रोस्टेट ग्रंथि, नामर्दी, शीघ्रपतन, नपुंसकता आदि के उपचार में महत्त्वपूर्ण योगदान देती है।
डायबिटीज और मोटापे पर अलसी का चमत्कार:
अलसी ब्लड शुगर नियंत्रित रखती है, डायबिटीज के शरीर पर होने वाले दुष्प्रभावों को कम करती हैं। चिकित्सक डायबिटीज के रोगी को कम शर्करा और ज्यादा फाइबर लेने की सलाह देते हैं। अलसी व गेहूँ के मिश्रित आटे में 50 प्रतिशत कार्ब, 16 प्रतिशत प्रोटीन व 20 प्रतिशत फाइबर होते हैं। यानी इसका ग्लायसीमिक इन्डेक्स गेहूँ के आटे से काफी कम होता है। डायबिटीज के रोगी के लिए इस मिश्रित आटे से अच्छा भोजन क्या होगा ? मोटापे के रोगी को भी बहुत फायदा होता है। अलसी में फाइबर की मात्रा अधिक होती है। इस कारण अलसी सेवन से लम्बे समय तक पेट भरा हुआ रहता है, देर तक भूख नहीं लगती है। यह बी.एम.आर. को बढ़ाती है, शरीर की चर्बी कम करती है और हम ज्यादा कैलोरी खर्च करते हैं।
डाक्टर योहाना बुडविज का कैंसर रोधी प्रोटोकोल:
डॉ. योहाना बुडविज की चर्चा के बिना अलसी का कोई भी लेख अधूरा रहता है। ये जर्मनी की विश्व विख्यात कैंसर वैज्ञानिक थी, जिन्होंने अलसी के तेल, पनीर, कैंसर रोधी फलों और सब्जियों से कैंसर के उपचार का तरीका विकसित किया। उन्होंने सभी प्रकार के कैंसर, गठिया, हृदयाघात, डायबिटीज आदि बीमारियों का इलाज अलसी के तेल व पनीर से किया। इन्हें 90 प्रतिशत से ज्यादा सफलता मिलती थी। इसके इलाज से वे रोगी भी ठीक हो जाते थे जिन्हें अस्पताल में यह कहकर डिस्चार्ज कर दिया जाता था कि अब कोई इलाज नहीं बचा, सिर्फ दुआ ही काम आयेगी। अमेरीका में हुई शोध से पता चला है कि अलसी में 27 से ज्यादा कैंसर रोधी तत्व होते हैं। डॉ. योहाना का नाम नोबेल पुरस्कार के लिए 7 बार चयनित तो हुआ पर उन्हें मिला नहीं क्योंकि उनके सामने शर्त रखी गई थी कि वे अलसी पनीर के साथ-साथ कीमोथेरेपी व रेडियोथेरेपी भी काम में लेंगी जो उन्हें मंजूर नहीं था।
बॉडी बिल्डिंग के लिए भी नंबर वन:
अलसी बॉडी बिल्डर के लिए आवश्यक व सम्पूर्ण आहार है। अलसी में 20 प्रतिशत आवश्यक अमाइनो एसिड युक्त अच्छे प्रोटीन होते हैं। प्रोटीन से ही मांस-पेशियां बढ़ती हैं। अलसी भरपूर शक्ति देती है। कसरत के बाद मांस पेशियों की थकावट चुटकियों में ठीक हो जाती है। बॉडी बिल्डिंग पत्रिका मसल मीडिया 2000 में प्रकाशित आलेख 'बेस्ट ऑफ द बेस्ट’ में अलसी को बॉडी के लिए सुपर फूड माना गया है। मि. डेकन ने अपने आलेख 'ऑस्क द गुरुमें अलसी को नम्बर वन बॉडी बिल्डिंग फूड का खिताब दिया। अलसी हमारे शरीर को भरपूर ताकत प्रदान करती है, शरीर में नई ऊर्जा का प्रवाह करती है तथा स्टेमिना बढ़ाती है।
सेवन का तरीका:
हमें प्रतिदिन 30-60 ग्राम अलसी का सेवन करना चाहिये। रोज 30-60 ग्राम अलसी को मिक्सी के चटनी जार में पीसकर आटे में मिलाकर रोटी, परांठा आदि बनाकर खायें। इसकी ब्रेड, केक, कुकीज, आइसक्रीम, लड्डू आदि स्वादिष्ट व्यंजन भी बनाये जाते हैं। अंकुरित अलसी का स्वाद तो कमाल का होता है। इसे आप सब्जी, दूध, दही, दाल, सलाद आदि में भी डाल कर ले सकते हैं।  बेसन में भी मिला कर पकोड़े, कु़ी, गट्टे आदि व्यंजन बनाए जा सकते हैं। इसे पीसकर नहीं रखना चाहिये। इसे रोजाना पीसें। ये पीसकर रखने से खराब हो जाती है। बस 30 ग्राम का आंकड़ा याद रखें। अलसी के नियमित सेवन से व्यक्ति के जीवन में चमत्कारी कायाकल्प हो जाता है।
संपर्क: वैभव हॉस्पिटल और रिसर्च इन्स्टिट्यूट, 7-बी-43, महावीर नगर तृतीय, कोटा राजस्थान।  मो. ९४६०८१६३६०
Email- dropvermaji@gmail.com, http://flaxindia.blogspot.in/

वसंत में कहाँ जाएँ?




 वसंत में कहाँ जाएँ?
वसंत ऋतु भारत की 6 ऋतुओं में से एक ऋतु है। अंग्रेज़ी कलेंडर के अनुसार फरवरी, मार्च और अप्रैल माह में वसंत ऋतु रहती है। वसंत को ऋतुओं का राजा अर्थात सर्वश्रेष्ठ ऋतु माना गया है। इस समय पंचतत्त्व अपना प्रकोप छोड़कर सुहावने रूप में प्रकट होते हैं। पंच-तत्व-जल, वायु, धरती, आकाश और अग्नि सभी अपना मोहक रूप दिखाते हैं। आकाश स्वच्छ है, वायु सुहावनी है, अग्नि (सूर्य) रुचिकर है तो जल पीयूष के समान सुखदाता और धरती उसका तो कहना ही क्या वह तो मानों साकार सौंदर्य का दर्शन कराने वाली प्रतीत होती है। ठंड से ठिठुरे विहंग अब उडऩे का बहाना ढूँढ़ते हैं तो किसान लहलहाती जौ की बालियों और सरसों के फूलों को देखकर नहीं अघाता। धनी जहाँ प्रकृति के नव-सौंदर्य को देखने की लालसा प्रकट करने लगते हैं तो निर्धन शिशिर की प्रताडऩा से मुक्त होने के सुख की अनुभूति करने लगते हैं। सच! प्रकृति तो मानों उन्मादी हो जाती है। हो भी क्यों ना! पुनर्जन्म जो हो जाता है। श्रावण की पनपी हरियाली शरद के बाद हेमन्त और शिशिर में वृद्धा के समान हो जाती है, तब वसंत उसका सौन्दर्य लौटा देता है। नवगात, नवपल्लव, नवकुसुम के साथ नवगंध का उपहार देकर विलक्षणा बना देता है।
वसंत में गाँव का मजा
वसंत के सुहाने मौसम में घूमने का मजा कुछ ख़ास ही होता है। इस सुहाने मौसम में अगर आप को कहीं जाने का मन करे तो आप सोचेंगे कहाँ जाएँ, क्या करें? इस मौसम में पर्यटकों को रेतों से चमकते टीले देखने में अच्छे लगते है और पर्यटक खूबसूरत पहाडिय़ों के नज़ारे में मग्न होकर इसके आस-पास के गाँव प्राकृतिक सौन्दर्य में खो जाते है। जहाँ एक तरफ रेतीले मैदान हों, तो दूसरी तरफ बर्फ से ढके पहाड़ या गाँव, जो अपनी इलाज पद्धति के कारण विश्व प्रसिद्ध हैं। बात हो रही है लद्दाख के नुब्रा घाटी के मशहूर गाँव के बारे में। लद्दाख में घूमने को बहुत कुछ है, लेकिन अधिकतर पर्यटक यहाँ के गाँव घूमने आते है। चाहे वह सुमुर गाँव हो या इलाजो के लिए मशहूर गाँव हॉट स्प्रिंग हो या मांनेस्ट्री और खुबानी के खेती के लिए मशहूर गाँव दिसकिप हो। पर्यटकों की खातिरदारी गाँव का आदरपूर्ण माहौल एवं शहर से कही दूर पहाड़ों के बीच प्राकृतिक सौन्दर्य का अनूठा दृश्य पर्यटकों को इन गाँव की ओर आकर्षित करता है।
प्राकृतिक सौ सौन्दर्य  का असली मजा लद्दाख की नुब्रा घाटी में बसा है। अगर आप इस इलाके में वसंत ऋतु में जाये तो माहौल और पावान पर होती है। गाँव के रेतीले रास्तो पर चलते हुए हरी भरी मैदानो का नजारा लेते हुए गाँव के दूसरे ओर स्थित पहाड़ पर नजर दौड़ाना अपने आप में एक मस्त कर देने वाला माहौल पैदा करता है। ईश्वर को याद करने के लिए यहाँ एक बहुत बड़ा प्रार्थनागृह बना हुआ है जो यहाँ आने वाले पर्यटकों को काफी आकर्षित करता है। इस गाँव में 350 साल पुराना एक मांनस्ट्री है , जो पर्यटको को अपनी ओर आकर्षित करती है।
सुमुर गाँव
नुब्रा घाटी में सेमस्टेम लिंग गोपा के नाम से प्रसिद्ध यह गाँव काफी लोकप्रिय हैं। यहाँ सक्युमनी का एक बड़ी मूर्ति है, जिसके आस-पास लगी तस्वीर पर्यटको को आकर्षित करती है। यह इलाका नुब्रो घाटी के मानेंस्टी के नाम से भी जाना जाता है।
हॉट स्प्रिंग
यहाँ गाँव अपनी इलाजी पद्धति के लिए काफी प्रसिद्ध है। यहाँ आने वाले पर्यटक प्रकृति नज़ारों के साथ-साथ त्वचा से जुड़ी परेशानियाँ भी दूर कराते हैं। इस इलाके में इलाज के लिए लोग काफी दूर-दूर से आते हैं।
कहाँ ठहरें
ठहरने के लिए हर गाँव में छोटे से लेकर बड़े होटल एवं रेस्टोरेंट हैं। यहाँ के स्थानीय लोगों ने अपने घर में पर्यटकों के लिए आरामदायक व्यवस्था बना रखी है। सारे गाँव लेह से 110-130 किमी की दूरी पर स्थित है। इन गाँव में पहुँचने के लिए श्रीनगर-लेह-मार्ग और मनाली-लेह-मार्ग से बस एवं छोटी गाडिय़ों से जा सकते हैं। लेह से इस इलाके में जाने के लिए बस एवं छोटी गाडिय़ाँ हर वक्त मिलती रहती हैं। लेह देश के हर महानगर से जुड़ा हुआ है। वायुमार्ग के रास्ते लेह एयरपोर्ट पर पहुँचा जा सकता है। (भारत कोष से)