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Nov 23, 2008

बिन फेरे हम तेरे

बिना मूल्य अमूल्य सेवा- संस्था की अनूठी पहल

बिन फेरे हम तेरे
बदलती सामाजिक व्यवस्था कई तरह की नई परंपराओं को जन्म देती है। इसी परिपेक्ष्य में ही पिछले दिनों अहमदाबाद की एक संस्था च्बिना मूल्य अमूल्य सेवाज् ने वरिष्ठ नागरिकों के लिए एक स्वयम्वर का आयोजन किया था। जिसमें देश भर से 40 से 80 वर्ष की उम्र के स्त्री पुरूषों ने भाग लिया। इस अनोखे स्वयंबर में गुजरात के अलावा पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र के साथ इंग्लौंड और अमरीका से भी प्रतिभागी शामिल हुए थे।
ये सभी प्रतिभागी विधवा, विधुर या अविवाहित थे। अधिकांश स्त्री पुरुष या तो अपनी संतान द्वारा उपेक्षित थे या पत्नी / पति के देहांत के बाद अकेलेपन की पीड़ा झेल रहे थे। उनको इस अकेलेपन की व्यथा से छुटकारा दिलाने के लिए ही यह स्वयम्वर रचा गया था।
इस आयोजन में सभी प्रतिभागियों को मंच पर आकर अपना जीवन परिचय अर्थात अपनी आर्थिक स्थिति, अभिरुचियां आदि के बारे में जानकारी देनी होती थी। इस स्वयंबर में खास बात यह थी कि साथी चयन के मामले में स्त्रियों को प्राथमिका दी गई थी। स्त्रियां इसमें जितने चाहे पुरुषों को बातचीत के लिए चुन सकती थीं। उपस्थित स्त्रियों में से किसी स्त्री ने चार पुरुष छांटा तो किसी ने बारह।
इनमें से अधिकांश प्रतिभागी ऐसे थे जो जीवन की संध्या में अपने सीने में न जाने कितना दर्द छुपाए जी रहे थे। ऐसे ही कमजोर होते नेत्र ज्योति वाले 79 वर्षीय बाबू भाई चावड़ा ने बताया कि उनके पुत्रों ने उनकी सब संपत्ति हड़प ली है और अब उनके पास सिर्फ एक छोटा सा मकान तथा बीस हजार रूपए नगद ही बचे हैं। उनकी आंखों में दवा डालने वाला भी कोई नहीं है। उन्हें उम्मीद है कि इस उम्र में इस आयोजन के चलते उनकी आंखों में दवा डालने वाला एक साथी मिल जाएगा साथ ही अकेलेपन को दूर करने के लिए एक जीवन संगिनी भी।
यह एक कटु सत्य है कि पिछले एक दो दशकों से वृद्धावस्था में संतान द्वारा उपेक्षित या परित्यक्त माता- पिता की संख्या तेजी से बढ़ रही है। दरअसल हमारा समाज कन्ज्यूमरिज्म की आंधी की गिरफ्त में है । कन्ज्यूमरिज्म का मूल मंत्र है कि जिस किसी वस्तु की उपयोगिता समाप्त हो जाए उसेे कूड़ेदान में फेंक दो। इस आंधी में माता- पिता को भगवान मनने वाली हमारी सामाजिक परंपरा और उससे जुड़े सामाजिक मूल्य भी तेजी से लुप्त हो रहे हैं। इसी के चलते जैसे ही संतान कमाने योग्य होती है, उनके आधुनिक नजरिए में माता-पिता की उपयोगिता समाप्त हो जाती है। अत: वे उन्हें अपने जीवन से निर्वासित कर देते हैं। लेकिन इन सबके बावजूद पारंपरिक सामाजिक मूल्यों में जन्मे पले माता- पिता, संतान के मोह में अपने सीने में दर्द छुपाए मौन ही घिसटते रहते हैं।
भारत में इस तरह के स्वयम्वर का आयोजन करने की पहल गुजरात में होने के पीछे भी कुछ तथ्य छिपे हैं। गुजराती समाज पारंपरिक रुप से प्रगतिशील रहा है, इसके भौगोलिक और सांस्कृतिक कारण भी रहे हैं। भारत में सबसे लंबा समुद्र तट गुजरात का ही है। इसी कारण प्राचीन काल से ही गुजराती व्यापारियों ने समुद्री मार्ग से, पश्चिमी देशों से व्यापार और संपर्क बनाए रखा। पुर्तगाली, डच, अरब और अंग्रेजों ने भी सबसे पहले सूरत में ही कदम रखा। पारसी, टाटा, गोदरेज आदि के पूर्वजों ने भी ईरान से निर्वासित किए जाने पर गुजरात में ही आश्रय पाया। इस तरह हम पाते हैं कि प्राचीन काल से ही विभिन्न संस्कृतियों से निरंतर संपर्क समाज को प्रभावित करता है। जिसका सकारात्मक प्रभाव उस क्षेत्र में रहने वालों के रहन सहन और सोचने के नजरिए पर भी पड़ता है। अत: जाहिर है कि वरिष्ठ नागरिकों के लिए स्वयम्वर का आयोजन करने के बारे में गुजरात के लोगों ने ही सोचा।
इस स्वयम्बर का सबसे चौकाने वाला तथ्य यह है कि अपने अपने साथी का चुनाव करने के बाद अधिकांश स्त्री पुरुषों ने पारंपरिक रुप से विवाह बंधन में बंधने के बजाय बिना विवाह किए हुए ही साथ- साथ जीवन यापन का निर्णय लिया। दरअसल इन सभी ने कई दशकों तक विवाहित जीवन का अनुभव कर चुकने के बाद अब बिन फेरे हम तेरे , जिसे आजकल च्लिविंग टुगेदरज् कहते हैे, का निर्णय लेकर निश्चय ही समाज को एक संदेश दिया है।
जीवन की संध्या में पंहुच चुके इन नागरिकों ने समाज को यह भी बताने का प्रयास किया है कि स्वार्थी परिवार द्वारा परित्यक्त किए जाने पर मुंह छुपा कर रोते हुए मौत का इंतजार करने से कहीं बेहतर है कि एक मनपसंद साथी का हाथ पकड़ कर उससे सुख दुख बांटते हुए जिन्दगी जीना।
अहमदाबाद की इस बिना मूल्य अमूल्य सेवा संस्था द्वारा आयोजित स्वयम्वर का तो निश्चित ही स्वागत किया जाना चाहिए। (उदंती फीचर्स )
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सभी प्रतिभागी विधवा, विधुर या अविवाहित थे। अधिकांश स्त्री पुरुष या तो अपनी संतान द्वारा उपेक्षित थे या पत्नी / पति के देहांत के बाद अकेलेपन की पीड़ा झेल रहे थे। उनको इस अकेलेपन की व्यथा से छुटकारा दिलाने के लिए ही यह स्वयंवर रचा गया था।
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अपने अपने साथी का चुनाव करने के बाद अधिकांश स्त्री पुरुषों ने पारंपरिक रुप से विवाह बंधन में बंधने के बजाय बिना विवाह किए हुए ही साथ- साथ जीवन यापन का निर्णय लिया। दरअसल इन सभी ने कई दशकों तक विवाहित जीवन का अनुभव कर चुकने के बाद अब बिन फेरे हम तेरे, जिसे आजकल च्लिविंग टुगेदरज् कहते हैं, का निर्णय लेकर निश्चय ही समाज को एक संदेश दिया है।
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सफलता का रहस्य

सफलता का रहस्य है कि दिन में आठ घंटे काम के लिए निकालना और आठ घंटे सोने के लिए...... और इस बात का ध्यान भी रखना कि इन दोनों समयों में टकराव न होने पाए।

सपने

सपने वे नहीं होते जिन्हें हम सोते हुए देखते हैं,

सपने वे होते हैं जो हमें सोने नहीं देते।

बिल गेट्स

0 बिल गेट्स हर सेकेण्ड में 250 डॉलर कमाता है और

इस हिसाब से हर दिन 20 मिलियन डॉलर और हर

वर्ष 7.8 बिलियन डॉलर।

0 अगर उसके हाथ से 1000 डॉलर का नोट गिर जाये

तो वह उसे उठाने का कष्ट नहीं करेगा क्योंकि अगले

चार सेकेण्ड में वह 1000 डॉलर फिर से कमा चुका

होगा।

0 अमेरिकी सरकार पर 5.62 ट्रिलियन डॉलर का कर्ज

है। अगर बिल गेट्स इसे चुकाना चाहे तो 10 बरस में

अकेले ही पूरा कर्ज चुका सकता है।

0 बिल गेट्स अगर दुनिया के हर आदमी को 15 डॉलर

का दान दे तो भी उसके पास 5 मिलियन डॉलर बच रहेंगे।

0 माइकल जोर्डन दुनिया का सबसे अमीर एथलीट है लेकिन वह अगर कुछ भी खाये पीये नहीं और अपनी 30 मिलियन डॉलर

की आमदनी को बचा कर रखे तो भी उसे उतना अमीर बनने में 277 बरस लगेंगे जितना अमीर बिल गेट्स आज है।

0 अगर बिल गेट्स की सारी कमाई को एक एक डॉलर के नोटों में बदल दिया जाये तो उन नोटों से धरती से चंद्रमा तक 28

बार सडक़ बनायी जा सकती है।

0 लेकिन उस सडक़ को बनाने में लगातार 1400 बरस लगेंगे और कुल 713 विमान उन नोटों को ढोने के लिए लगाने पड़ेंगे।

0 बिल गेट्स की उमर 44 बरस है। अगर वह 30 बरस और जीता है तो उसे हर रोज 6.78 मिलियन डॉलर खर्च करने होंगे।



लेकिन . . .

0 लेकिन अगर माइक्रोसॉफ्ट का इस्तेमाल करने वाले सभी लोग हर बार कम्प्यूटर हैंग होने पर एक डॉलर की भी मांग करें तो बिल गेट्स तीन बरस में दिवालिया हो जायेगा।

समाचार चैनलों का प्रदूषण

समाचार चैनलों का प्रदूषण
अक्टूबर अंक में प्रकाशित विकल्प ब्यौहार ने च् हंसी का पिटारा बनते हमारे न्यूज चैनल को चाहिए सिर्फ सनसनीज् के माध्यम से इलेक्ट्रानिक मीडिया के सच को उजागर किया है। आज के समाचार चैनल 24 घंटे मनोरंजन को समाचार के रूप में परोसते हैं। सभी हिंदी समाचार चैनल में इन दिनों 50 प्रतिशत से अधिक समय अपराधों के समाचार दिखाए जाते हैं। लगता है कि जैसे हमारे समाज की मुख्य क्रिया अपराध-सेक्स सनसनी और स्कैंडल ही हैं। सबसे ज्यादा ध्यान देने की बात यह है कि टेलीविजन रखने वाले 99 प्रतिशत से अधिक घरों में एक ही टेलीविजन होता है जिसे वयस्क और बच्चे साथ-साथ ही देखते हैं। अपराधों को मिर्च मसाला लगाकर प्रस्तुत करने का क्या प्रभाव बच्चों और किशोरों के मस्तिष्क पर पड़ता है यह सभी को पता है। किशोर वर्ग की अपरिपक्व मानसिकता का इस प्रकार का निरंतर प्रसारण समाज के लिए बहुत ही घातक है। अत: आवश्यक है कि समाज के प्रबुद्ध वर्ग को समाचार चैनलों द्वारा फैलाये जा रहे इस प्रदूषण के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए और इसके लिए एक स्वतंत्र नियामक संस्था की स्थापना करने प्रयत्न करना चाहिए, जिससे कि ऐसे घातक प्रसारणों पर रोक लगाई जा सके।
-अशोक, फतेहगढ़ (उ. प्र.) से
पत्रिका में छत्तीसगढ़ दिखाई दे रहा है
दुनिया के नक्शे पर छत्तीसगढ़ जैसी छोटी सी जगह से वेब पत्रिका का प्रकाशन जैसा महत्वपूर्ण काम हो रहा है, उसके लिए बधाई। पत्रिका में छत्तीसगढ़ दिखाई दे रहा है यह अच्छी बात है। और अधिक अच्छी बात यह भी है कि छत्तीसगढ़ के जन- जीवन और सांस्कृतिक परिदृश्य को जानने में यह पत्रिका एक महत्वपूर्ण कार्य काम कर सकती है, जिसकी झलक इसके पहले अंक से ही दिखने लगी है। बधाई।
-विजय गौड़, देहरादून से
(संपादक -लिखो यहां वहां ब्लाग पोस्ट)
यूं ही प्रवाहित होती रहे
उदंती का सितंबर और अक्टूबर अंक, दोनों बहुत बढिय़ा। छत्तीसगढ़ के लिए यह पत्रिका एक सौगात लेकर आई है। पत्रिका में प्रस्तुत रचनाएं तो पठनीय हैं ही साथ ही पत्रिका की छपाई उसका प्रस्तुतिकरण भी बहुत ही आकर्षक एवं कलात्मक है। मेरी शुभकामना है कि उदंती की धारा यूं ही प्रवाहित होती रहे।
-श्रिया, रायपुर (छ. ग.) से

आप तो बस बोलते जाइए

आप तो बस बोलते जाइए
कम्प्यूटर टाइप करता चला जाएगा !

जी हां, अब बाजार में एक ऐसा औजार आ गया है कि आप बोलेंगे हिन्दी में और कम्प्यूटर टाइप करेगा। आपसे बोलने में गलती होगी तो उसे दोबारा बोलने पर ठीक भी कर देगा। इतना ही नहीं, आपके प्री रिकार्डेड संदेश, भाषण या बोले गये टैक्स्ट को भी उसी बहादुरी के साथ टाइप करके आपको थमा देगा। ये पैकेज आपके लिए एडिटिंग करेगा, अलाइनमेंट करेगा, आउटपुट में मूल डॉक्यूमेंट का फार्मेट बनाये रखेगा शब्द जोडऩे, हटाने देगा, अपडेट करने देगा, और आपको शब्देकोश की सुविधा के अलावा पर्यायवाची शब्द भी देगा।

है ना मजेदार ख्याल कि आप चांदनी रात में अपनी बाल्कनी में अकेले बैठे मौसम का आनंद ले रहे हैं और हैड फोन लगाये अपनी कहानी, गज़़ल, उपन्यास या कुछ भी अपने पीसी को डिक्टेशन दे रहे हैं। एक नज़ारा और भी हो सकता है कि जो कुछ कहना है हमें हैड फोन लगा कर पीसी के सामने कह दें। एडिटिंग बाद में होती रहेगी।

और भी कई नज़ारे हो सकते हैं, सारे प्रेम वार्तालाप, मंत्री जी के भाषण, संतों की वाणी, बीवी या हस्बैंड के गुस्से भरे अलफाज़ जस के तस बोलते हुए टाइप होते चलें। न मुकरने की आशंका न भूलने का डर। वाह क्या बात है अब हिन्दी टाइप करने के लिए लिखना पढ़ऩा आना जरूरी नहीं। कोई भी अपने पीसी से ये काम ले सकता है। सेक्रेटरी नहीं आयी तो परवाह नहीं, वाचांतर पैकेज है ना....

ये वाचांतर पैकेज आपके लिए कई बरस की रिसर्च के बाद ले कर आये हैं पुणे की सीडैक के वैज्ञानिक, कीमत पूरे सेट की सिर्फ 5900 रुपये। मंगाने या ज्यादा जानकारी के लिए देखें www.cdac.in या सम्पर्क करें अजय जी से ajai@cdac.in पर या उनसे फोन 9371034560 पर बात करें।