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Oct 3, 2021

कविता- स्त्री

- दिव्या शर्मा

असफल प्रेम में

स्त्री व्यभिचारिणी घोषित होती है

क्योंकि पुरुष, स्त्री के चरित्र तले

खुद को छिपा लेता है।

 

असफल विवाह में

स्त्री दोषी घोषित होती है

क्योंकि पुरुष, स्त्री के अवगुण तले

खुद को छिपा लेता है।

 

असफल संस्कारों में

स्त्री दोषी घोषित होती है

क्योंकि पुरुष, स्त्री के आँचल तले

खुद को छिपा लेता है।

 

धर्म के पतन के लिए

स्त्री दोषी घोषित होती है

क्योंकि पुरुष, स्त्री के अधर्म तले

खुद को छिपा लेता है।

 

स्त्री ढक दी जाती है

पुरूषों की निगाहों से बचाने के लिए

क्योंकि पुरुष, स्त्री की देह तले

खुद को छिपा लेता है।

 

कुरीतियों को बचाने के लिए

खींच ली जाती है स्त्री की चादर

क्योंकि पुरुष,परंपरा के बोझ तले

खुद को छिपा लेता है।

 

डायन होती हैं यह स्त्रियाँ

इसलिए नग्न घुमाई जाती हैं

क्योंकि पुरुष, समाज के रिवाज तले

खुद को छिपा लेता है।


सम्पर्कः मकान नंबर- 4,गली नंबर-9 ,अशोक विहार फेज -2,गुरुग्रामहरियाणा--122001

मोबाइल नंबर -7303113924

लघुकथा- फ़र्क

कृष्णा वर्मा

दिन भर की थकी माँदी सिर के दर्द से परेशान ज़ोया घर लौटी।

आते ही माँ बरस पड़ी। रात के नौ बज रहे हैं, यह कौन सा वक़्त है दफ़्तर से घर लौटने का?

क्या हो गया अम्मी, बताया तो था आज बहुत ज़रूरी मीटिंग है। फिर आप तो जानती हैं कि पिछले कई दिनों से दिन-रात मैं इसी मीटिंग की तैयारी में जुटी हुई थी। अगर यह क्लाइंट कम्पनी को मिल गया, तो मेरी तरक्की कोई नहीं रोक सकता।

हाँ-हाँ सुन लिया। नौकरी की इजाज़त देने का यह कतई मतलब नहीं कि तुम वक़्त-बेवक़्त घर लौटो। लड़की की ज़ात हो, यूँ देर से आता देख कर लोग बातें बनाने में देर नहीं लगाएँगे।

यह सुन कर ज़ोया बिफर पड़ी- आपने कभी साहिल से भी पूछा कि रोज़ दफ़्तर से इतनी देर से क्यों घर लौटता है।

झल्लाकर अम्मी बोली- वह ऑफ़िस की ज़िम्मेदारी न निभाए क्या? और फिर वो लड़का है, देर रात भी घर लौटे तो कोई बातें नहीं बनाएगा।

भरे गले से- लड़का हो या लड़की ऑफ़िस में अपने काम की ज़िम्मेदारी सबको निभानी पड़ती है।

फिर लड़की होना कौन गुनाह है, जो हर वक़्त आप मुझे लड़की होने का अहसास दिलाती रहती हैं। पता नहीं माँ-बाप की सारी हमदर्दियाँ और प्यार लड़कों के लिए ही क्यों होता है, कहते-कहते फूट पड़ी।

तल्ख़ आवाज़ों को सुन कर अब्बू कमरे से बाहर आए। ज़ोया को समझाने के लहजे में बोले- ऐसा नहीं है बिटिया। औलाद बेटा हो या बेटी, माँ-बाप के लिए दोनों बराबर होते हैं। वह उनसे प्यार और हमदर्दी में कोई फ़र्क नहीं करते।

शिकायती लहजे में ज़ोया बोली- बस रहने ही दें अब्बू, यह तो कहने भर की बात है। अगर माँ-बाप ने उनके प्यार और हमदर्दी में फ़र्क न किया होता, तो क्या आज दोनों की रस्सी की लम्बाई बराबर न होती।

लघुकथा - जेनरेशन गैप

- डॉ. जेन्नी शबनम 

रोज-रोज क्या बात करनी है, हर दिन वही बात - खाना खाया, क्या खाया, दूध पी लिया करो, फल खा लिया करो, टाइम से वापस आ जाया करो।आवाज में झुँझलाहट थी और फोन कट गया। 

वह हत्प्रभ रह गई। इसमें गुस्सा होने की क्या बात थी। आखिर माँ हूँ, फिक्र तो होती है न। हो सकता है पढ़ाई का बोझ ज्यादा होगा। मन ही मन में बोलकर खुद को सांत्वना देती हुई रंजू रजाई में सिर घुसाकर अपने आँसुओं को छुपाने लगी। यूँ उससे पूछता भी कौन कि आँखें भरी हुई क्यों हैं, किसने, कब, क्यों मन को दुखाया है। सब अपनी-अपनी जिन्दगी में मस्त हैं। 

दूसरे दिन फोन न आया। मन में बेचैनी हो रही थी। दो बार तो फोन पर नंबर डायल भी किया फिर कल वाली बात याद आ गई और रंजू ने फोन रख दिया। सारा दिन मन में अजीब-अजीब-से खयाल आते रहे। दो दिन बाद फोन की घंटी बजी। पहली ही घंटी पर फोन उठा लिया। उधर से आवाज आईमाँ, तुमको खाना के अलावा कोई बात नहीं रहती है करने को। हमेशा खाने की बात क्यों करती हो? तुम्हारे कहने से तो फल- दूध नहीं खा लेंगे। जब जो मन करेगा, वही खाएँगे। जब काम हो जाएगा लौटेंगे। तुम बेवजह परेशान रहती हो। सच में तुम बूढ़ी हो गई हो। बेवज़ह दखल देती हो। खाली रहती हो, जाओ दोस्तों से मिलो, घर से बाहर निकलो। सिनेमा देखो, बाजार जाओ।

रंजू को कुछ भी कहते न बन रहा था। फिर भी कहा -अच्छा चलो, खाना नहीं पूछेंगे। पढ़ाई कैसी चल रही है? बियत ठीक है न?’

ओह माँ, हम पढ़ने ही तो आए हैं। हमको पता है कि पढ़ना है। और जब तबियत खराब होगी, हम बता देंगे न।

रंजू समझ गई कि अब बात करने को कुछ नहीं बचा है। उसने कहाठीक है, फोन रखती हूँ। अपना खयाल रखना।उधर से जवाब का इंतजार न कर फोन काट दिया रंजू ने। सच है, आज के समय के साथ वह चल न सकी थी। शायद यही आज के समय का जेनरेशन गैप है। यूँ जेनरेशन गैप तो हर जेनरेशन में होता है परन्तु उसके जमाने में जिसे फिक्र कहते थे आज के जमाने में दखलअंदाजी कहते हैं। फिक्र व जेनरेशन गैप भी समझ गई है अब वह। 

सम्पर्कः 5/ 7, द्वितीय तल, सर्वप्रिय विहार, नई दिल्ली- 110016  ई मेल- jenny.shabnam@gmail.com

कहानी- टूटे सपने

- विनय कुमार पाठक

टीं......... डोरबेल की आवाज सुन बालकेश्वर प्रसाद उठे लगता है कमलेश बाबू आ गए, कहते हुए वे उल्लासपूर्वक दरवाजे की ओर बढ़े आखिर पुराने परिचित, बल्कि मित्र से मुलाकात होने वाली थी उनकी

दरवाजा खोला तो देखा, कमलेश बाबू नमस्कार की मुद्रा में हाथ जोड़े खड़े हैं बालकेश्वर जी ने भी दोनों हाथ जोड़कर नमस्कार किया फिर बड़े प्यार से उनका हाथ पकड़ कर उन्हें ड्राइंग़ रूम के अंदर लाए बालकेश्वर जी की पत्नी ललिताजी ने भी उनका हाथ जोड़कर अभिनंदन किया- “नमस्ते भाई साहब

“नमस्ते! भाभी जी, नमस्ते!”

“और भाभीजी बच्चे कैसे हैं ललिताजी ने पूछा

“ठीक हैं सभी कमलेशजी ने कहा

“और बताइए कैसे हैं कमलेश बाबू, कैसा चल रहा है बालकेश्वर जी ने पूछा ललिता जी ने दोनों को बातों में मशगूल देखा तो रसोई की ओर बढ़ गईं  कमलेश बाबू के लिए कुछ मीठा-नमकीन-चाय आदि का प्रबंध करने

“बिल्कुल ठीक ठाक चल रहा है काफी दिनों के बाद इधर आने का मौका मिला तो सोचा सभी परिचितों से मिल लूँ मुझे तो आपके यहाँ मिलने की उम्मीद न थी इसलिए फोन कर आपसे पूछ लिया अकि आप कहाँ हैं

“उम्मीद क्यों नहीं थी, हमे कहाँ जाना है?”- दोनों हाथों से ट्रे पकड़े ललिताजी रसोई से वापस आईं और पानी का गिलास तथा बिस्किट का प्लेट टेबल पर रखा

“आप लोगों ने तो मुंबई में अपने बेटे के साथ रहने की योजना बना रखी थी न? आशीष तो शायद वहीं रह रहा है अपने फ्लैट में?”

“हम छोटे शहरों में रहने वाले हैं मुंबई में हमारा मन कहाँ लगेगा!”- बालकेश्वर जी ने हँसते हुए कहा

“हाँ! बात तो सही है, बड़े शहरों में अलग ही जीवनशैली है लोगों की किसी को किसी के लिए समय नहीं है पर आपने ही बताया था कि आपका एक ही लड़का है इसलिए आप कहीं और घर न बना कर सेवानिवृत्ति के बाद अपने बेटे के साथ ही रहेंगे इसलिए पूछा था

“समय के साथ योजना बदलती भी तो रहती है- बालकेश्वरजी ने ठहाका लगाते हुए कहा- “हम यहीं छोटे-से शहर में किराये के मकान में ही ठीक हैं मियाँ बीवी मिल-जुलकर काम कर लेते है और समय आराम से बीत जाता है

“कभी पोते को देखने की इच्छा नहीं होती? मैं तो अपने पोते के बिना रह ही नहीं पाता कमलेश जी ने कहा

“इच्छा होती है तो साल में एक दो दिनों के लिए चले जाते हैं यह कौन सी बड़ी बात है, वे भी पर्व त्योहार में कभी- कभार दो चार दिनों के लिए आ जाते हैं

इस प्रकार काफी दिनों के बाद मिले दो परिचितों के बीच तरह-तरह की बातें होती रहीं थोड़ी देर बाद कमलेश जी उठकर चले गए

“क्या जवाब देता कमलेश बाबू के सवाल का? सोचा तो सचमूच हमने यही था कि बेटे के साथ रह लेंगे रहने की कोशिश भी की पर किस्मत में ऐसा नहीं लिखा था बालकेश्वर प्रसाद ने बड़े उदास स्वर में पत्नी से कहा

“बहू का जो रवैया है उसे देख बेटे के साथ हमारा रह पाना नामुमकिन है हम ऐसे ही सही हैं”- ललिताजी ने टेबल से गिलास प्लेट वगैरह समेटते हुए ठंढी उच्छास के साथ कहा

सिंक में बरतन धोते हुए उनके मानसपटल पर उनकी पूरी जिंदगी एक एक कर घूमने लगी

 एक बेटा और एक बेटी तथा पति- पत्नी बस चार लोग थे परिवार में बेटी को शादी के बाद अपने घर चले जाना था ऐसे में उन्होंने बेटे के साथ ही रहने का मन बनाया था बेटा एमबीए करने के बाद मुंबई में एक निजी कंपनी में काम करता था और अच्छा वेतन-भत्ता पाता था बड़े अरमान से दोनों ने बेटे की शादी की थी बहू अपने माता पिता की बड़ी लाडली थी कुछ इतनी लाडली कि उसके माता पिता ने उसे हर प्रकार की छूट दे रखी थी कब सोना है कब जगना है इसकी कोई बंदिश नहीं थी इसी प्रकार खाना बनाना उसके लिए शौक था अनिवार्य नहीं शुरु-शुरु में ललिताजी काफी टोका- टाकी करती थीं पर बहू पर उनकी बातों का कोई असर नहीं पड़ता था बहू का सुबह काफी देरी से जगना बालकेश्ववरजी को भी बिल्कुल नहीं सुहाता था यह उनके रहन- सहन और सोच के बिल्कुल विपरीत था बहू के देरी तक सोए रहने के कारण कई बार उन्होंने मेन स्वीच ऑफ कर दिया था ताकि पंखा रुकने पर बहूरानी की नींद खुल जाए पर बहूरानी पंखा बंद होने पर भी अपनी जिद में देर तक सोई रहती

बाद में बहू जब बेटे के साथ मुंबई चली गई तो वहाँ भी उसका वही रवैया चालू रहा बेटे को आठ बजे ऑफिस के लिए निकलना पड़ता था बहू चूंकि सोई रहती अतः वह खुद हल्का फुल्का कुछ खा कर ऑफिस के लिए निकल जाता था कुछ दिनों के लिए ललिताजी और बालकेश्वरजी मुंबई गए तो बहू का रवैया और बेटे की बदकिस्मती देख उन्हें बड़ा दुख हुआकई बार छुट्टियों के दिनों में बेटा और बहू शाम को घूमने निकलते तो बाहर से ही खा पी कर लौटते उसके बाद रात का खाना बनाने की जरूरत बहू को महसूस नहीं होती थी ललिता जी को मन मारकर इस उम्र में भी खाना बनाना पड़ता था कहाँ उन्होंने सोच रखा था कि बेटे बहू के साथ ही वे रहेंगे कहाँ दो चार दिन उनके साथ बिताना भारी पड़ रहा था वापस आने पर बहू के माता- पिता से जब इसकी चर्चा की गई तो उन्होंने सिर्फ इतना ही कहा कि उनकी बेटी नाजो में पली है और यह उसका स्वभाव हो गया है उन्होंने ऐसा व्यवहार किया मानो यह कोई बड़ी बात नहीं है

ग्लास प्लेट धोने के बाद उसे करीने से सजाने के बाद ललिताजी ड्राइंग रूम में आईं बालकेश्वरजी से कहा- “लगता है, कमलेश जी के बेटे- बहू उनका काफी खयाल रखते हैं बड़े नसीब वाले हैं वे

बालकेश्वर जी ने पत्नी को ओर देखा वे समझ सकते थे पत्नी की व्यथा और पत्नी की ही क्यों, यह उनकी अपनी भी व्यथा थी चुपचाप टेबल पर रखी पत्रिका को उठाकर यूँ ही उसके पन्ने पलटने लगे

सम्पर्कः 605, सेम-ए, शिप्रा सृष्टि, इंदिरापुरम, गाजियाबाद -201014, मोबा. 9001895412, 9425083335

व्यंग्य- घटनाओं की सनसनी

- बी. एल. आच्छा

      इलेक्ट्रॉनिक चैनल के मुख्य संपादक से मैंने ऐसे ही पूछ लिया-आपने मिडल ईस्ट में राकेटों की वर्षा खूब दिखाईपर आप आकाशगंगा में छिटकते-  टूटते- वर्षा से बरसते सितारों को खबर क्यों नहीं बनातेकभी ट्यूलिप के खिलते फूलों और कचनार की कलियों के सौंदर्य से दर्शकों को क्यों नहीं महकाते?’ वे हँसने लगे- यह सब तो कविता की दुनिया के सितारे हैं‌ । चैनल कभी एक झलक  दे भी जाए तो न्यूज़ हंट नहीं बनते।

       मैंने फिर सवाल किया-पर जब शनि और मंगल आमनेसामने भयानक ग्रह योग बनाते हैंतब तो आप सुबह से शाम ....।

ठहाका लगाते वे बोले- हम लोगों के मनोविज्ञान को समाचारों का बाजार क्यों न बनाएँ ? खगोलीय घटना है। भय के मनोविज्ञान से सभी को सचेत तो करना होगा ना?’

मेरा सवाल फिर जोर मारने लगा-इन घटनाओं को दिखाते समय कुछ ऐसे दृश्य और प्रभाव खड़े कर देते हैं कि....‌। वे बोले-अरे भाईचैनल की दुनिया कोई किसी कवि की अनुभूति तो है नहीं कि किताब में छपकर आ जाए और परम तुष्टि‌। अब तो किताब छपने से पहले ही कवर पेज की नुमाइश से दर्शकों की आँखों की रौशनी पहले बढ़ाते हैं। लाइक और कमेंट्स में ।

मैंने कहा-आखिर खुद कवि ही अपनी किताब की सोशल मीडिया पर नहीं नचाएगा तो बिकेगी कैसे?’

         चेहरे की मुस्कान और जबान के समीकरण में वे बोले-जनाब! कितना जरूरी है! अब आत्मा की आवाज की जगह बॉडी लैंग्वेज कितनी असरदार होती हैसमाचार वाचक-वाचिका की केश- राशि के साथ उँगलियों- हथेलियों के साथ नाचती हुई आँखों से भी अपना बाजार बनता है‌।

मैंने कहा- जरूरी है।

वे बोले-यही तो मैं कह रहा हूँ । संतों की कथाएँ  कितनी सादी होती थीं। जब से सारे वाद्ययंत्र गायकी के साथ आ जाते हैं , तो बात ही कुछ और! कितने सादे से लगते थे ज्योतिषी। अब उनके फेशियलरत्न- हार ,ज्योतिषाना वेशभूषा के कट्स देखिए। और दूर क्यों जाएँ ? गरीबी और मजदूरी पर कविता सुनानेवाला कवि भी कुछ ऐसे- वैसे ही नहीं आता। लकदक दिखकर ही भूख की व्यथा गा जाता है।

       मैंने कहा-आपने तो सारे  चैनल को हाथहिलाऊ मुद्राओं का थिएटर बना दिया हैमगर आजकल युद्धों के समाचारों में भी आपके वीडियो राग कोमल गांधार और भीमपलासी को छोड़कर मालकौंस को भी युद्धकौंस बनाते जा रहे हैं ।

वे बोले-अरे भाई आप तो महासागर में छुपी परमाणु पनडुब्बी की तरह मुझसे सारे छुपे अंदाज उगलवा रहे हैं ।

मैंने कहा- मन में सवाल तो आते हैं। अमेरिकी बेड़ा प्रशांत महासागर में पहुँचने के लिए लहरों को चीरना शुरू ही करता  है कि राग मालकौंस युद्धकौंस में आग उगलने लगता है‌ । मिसाइलें सप्तम आलाप के बजाय  इक्कीसवें सुर में लंबे समय तक हूँ ..ऊँ... ऊँ ...ऊँ अलापने लगती है। राग हिंडोल भी फीका पड़ जाता है। कई कई टैंकों के साथ राग टेंकेश्वरी का आलाप। परमाणु युद्ध की आशंकाओं में आकाश में काले स्याह बादलों के बीच राग ज्वालेश्वरी की टंकार बजने लगती है। सुपर सोनिक का घड़घड़ाट राग। कभी राग राफैली। दुनिया भर के धड़ामधड़ूम रागों का महानाद। और थोड़ी सी सफलता मिले तो राग जयजयवंती ।

     हँसते हुए मेरी बात काट दी-अरे आप तो हमारे लिए नए संगीत राग रच रहे हैं भाई ! बहुत खूब ।आप भी जानते हैं कि महाभारत में युद्ध की शस्त्रलीला ने कितना दर्शकों का कितना बड़ा बाजार बना दिया। चलोवो तो ऐतिहासिक ग्रंथ था आस्था और न्याय का ।पर हमारे पास तो बाजार है। आप कितना ही कोसें, टीआरपी को लेकर ।लेकिन हवाओं में सनसनी न हो और टी वी के दंगलों में  राग गुत्थमगुत्था न हो तो दर्शक आएगा ही क्यों ?’

मैंने भी तीर मार दिया –फिर तो इन दंगलों में भी जब वक्ता का सुर पंचम -सप्तम में हो तो तबले पर थापहद से बाहर हो तो नगाड़े पर डंका और जब बात हाथापाई पर आ जाए तो राग तुरही ....!

वे बोले –भाईजरा व्यंगैले हो रहे होथोड़ा ...!

  मैंने कहा-चलिए छोड़िए मेरा अंतिम सवाल है । जब घटनाओं की सनसनी नहीं होती तो चैनलों के उठाव के लिए क्या .‌‌..।

वे बोले- आजकल यह दिक्कत नहीं होती । कहीं न कहीं से चैनलों की भूख को बढ़िया सा परोसा मिल ही जाता है ।


सम्पर्कः  फ्लैटनं-701, टॉवर-27, नॉर्थ टाउन अपार्टमेंटस्टीफेंशन रोड (बिन्नी मिल्स), पेरंबूर, चेन्नई (तमिलनाडु)-600012, मो.