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Sep 3, 2021

नवगीत - होम करते हाथ जलें

-क्षितिज जैन अनघ


यज्ञ नहीं रुकना

चाहिए, चाहे होम

करते हाथ जलें।

 

पूरी प्रजा का डाल

दिया, कुछेक

अभागों पर भार

और मढ़ दिए

माथे पर,दान

और परोपकार।

 

समझ नहीं आता

बेचारें, भार उठाएँ

या आगे चलें?

 

जिनका धर्म बन

चुका, जीवन

भर त्याग

उन्हें मिलती बस

ताड़ना, दूभर

कोई अनुराग।

 

देश के स्तम्भ

बनकर,गए हैं

केवल छलें।

 

सरकार आजतक

एक ही, बात  

कहती है आई

समाज की संपत्ति

है बस,उनकी

गाढ़ी कमाई।

 

मुफ्तखोरों से तो

लेकिन, ये लाख

गुना हैं भलें।

बाल कहानी- चोरनी

-सुधा भार्गव

  सुंदर सी  एक खंजन चिड़िया थी। बड़ी रंगबिरंगी! काली, सफेद, भूरी। उसकी सुंदरता का रहस्य उसकी चंचल आँखें थीं। उसे  नदी- तालाब का किनारा बहुत अच्छा लगता। जब देखो वहाँ बैठी पूँछ हिलाती रहती। उसके चलने का तरीका भी अजीब था। फुदकती नहीं बल्कि दौड़कर चलती।  खेतों में खूब मस्ती से दौड़ लगाती, कीड़े -मकोड़े गपक गपक खाती। उसके डर से कीड़ों में भगदड़ मच जाती पर वह तो उड़ते कीड़ों को भी लपक लेती।  ठंडी हवा में उसकी लहराती उड़ान देखते ही बनती। इतराती  हुई चिटचिट करती सुरीली आवाज में उसका स्वर गूँजता तो खंजन चिड़ा बड़ा खुश होता और उस पर ढेर सा  प्यार उमड़ पड़ता।  

    फुर्सत में वह नदी के घाट पर उतर पड़ती जहाँ धोबिनें कपड़े धोतीं। वह मजे से उनके बीच टहलने लगती और छेड़ देती अपनी मधुर तान। बेचारा चिड़ा उसका इंतजार करता रहता। जब बहुत देर हो जाती तो झुँझलाकर चिल्लाता  अरे धो लिए बहुत कपड़े ..अब आजा धोबिन।’ 

   चिड़िया तुरंत उड़कर प्यालेनुमा घोसले में पहुँच जाती। जहाँ चिड़ा उसके इंतजार में आँखें बिछाये रहता।

     खंजन चिड़िया को गर्मी बहुत लगती थी। गरम हवा चलने पर वह बेचैन रहने लगी। 

एक दिन खंजन चिड़ा से बोली – तू  मुझे बहुत प्यार करता है ?’

हाँ इसमें पूछने की क्या बात है ?’

जो मैं कहूँगी मेरे प्यार की खातिर करेगा ?’

यह तिरवाचा क्यों भरवा रही है ? जो कहना है सीधी तरह बोल दे।’ 

मुझे तो कश्मीर जाना है। सुना है वहाँ फूलों से ढकी घाटियाँ हैं। खुशबू भरी हवा सब समय बहती है। बीच बीच में पानी के झरने फूट पड़ते हैं। तुझे तो मालूम ही है मुझे पानी का किनारा बहुत अच्छा लगता है। झरने के किनारे बैठकर उसका ठंडा  मीठा पानी पीऊँगी और पानी से भी मीठा गाना गाकर तुझे खुश कर दूँगी।चिड़ा उसकी बात पर हंस पड़ा। 


    अगले  दिन सुबह ही दोनों कश्मीर की ओर उड़ चले। वहाँ पहुँचते ही खंजन चिड़ा ने सबसे पहले अपनी चिड़िया के लिए हरे भरे पेड़ पर सुंदर सा घोंसला बनाया। वह पेड़ एक झील के  किनारे था। झील की लहरें जब पेड़ के लंबे मजबूत तने से टकरातीं तो  घोंसले में बैठी खंजन चिड़िया का  पंख फैला कर ठुमकने का मन होता।     

    कुछ दिनों बाद खंजन चिड़िया सलोने से दो बच्चों की माँ बन गई। वे बड़े ही नाजुक थे। उनके पँख भी नहीं निकले थे। दोनों पीले थे। इसलिए एक का नाम निबुआ  और दूसरे का नाम पिलुआ  रख दिया । चिड़िया उनकी देखभाल करती और चिड़ा उनके लिए दाना लेने जाता। चिड़िया अपनी चोंच में दाना लेकर बच्चों की चोंच में डालने की कोशिश करती पर वे तो अपनी चोंच ठीक से खोल ही नहीं पाते थे। इसलिए दाना अंदर न जाकर  बार बार बाहर की ओर लुढ़क पड़ता । लेकिन चिड़िया अपनी कोशिश नहीं छोड़ती  । अपने प्यारे बच्चों को भूखा कैसे देख सकती थी! बच्चों का पेट भर जाता तब कहीं उसकी आँखों में चमक आती। 

   एक दिन खंजन चुग्गे की तलाश में गया। लौटते समय बरसते पानी में भीग गया। घोंसले में आते ही आंक्ची.. आंक्छी शुरू हो गई। सुबह देर से उसकी नींद खुली।  बुखार के कारण उसके सिर में  इतना दर्द कि उससे उठा ही नहीं गया। इधर -उधर आँख  घुमाई चिड़िया कहीं नजर न आई । समझ गया वह दाना लेने जा चुकी है।

   खंजन माँ  एक खेत में उतरी कुछ दाने खाकर अपना पेट भरा और कुछ दाने अपनी चोंच में भर लिए। वह उड़ने ही वाली थी कि एक किसान ने दूर से उस पर एक अंगोछा फेंक दिया । वह उसकी लपेट में  आ गई। अँगोछे को  उठाते हुए किसान चिहुँक पड़ा –पकड़ लिया.. पकड़ लिया  चोरनी को। न जाने कब से चोरी चोरी मेरा अनाज खा रही है और ढेर सा चुराकर ले जाती है। आज तुझे नहीं छोडूँगा।’ 

  चिड़िया गिड़गिड़ाई –किसान भाई मेरे बच्चे भूखे होंगे। मुझे दाने ले जाने दे । उन्हें खिलाकर वापस आ जाऊँगी। तब चाहे तुम सजा दे देना। मैं सब भुगतने को तैयार हूँ।’ 

   ‘मुझे क्या पागल कुत्ते ने काटा है जो तुझे छोड़ दूँ। एक बार गई तो क्या लौटकर आने वाली है। चोरनी कहीं की।उसने आँखें तरेरीं।   

   चिड़िया गुस्से से भर उठी और बोली-देख किसान गाली तो दे मत।  मैं चोरनी किस बात की! तेरे खेत के कीड़े खा- खा कर फसल को बचाती हूँ। वरना वो कीड़े तेरी फसल को सफाचट कर के रख दें। एक तरह से तेरे खेत के लिए तो काम ही करती हूँ। उस मेहनत के बदले तू मुझे क्या देता है? इस फसल पर मेरा भी तो हक है। चोर तो तू है जो मेरा हक मारे बैठा है। मैंने चार दाने क्या खा लिए मुझे चोरनी कहता है। तू तो न जाने मेरे हिस्से का  कितना  अनाज  हजम कर चुका है। अब बता चोर तू है या मैं।’ 

  ‘ज्यादा बढ़ बढ़कर मत बोल । मैंने कहा था क्या ..मेरे खेत के कीड़े -मकोड़े साफ कर दे। कल से आने की जरूरत नहीं।

   चिड़िया की चीं-चीं और किसान की टै-टै सुन चिड़ियों के झुंड आकाश से उतर  पड़े और उन्हें घेर लिया। एक बूढ़ी समझदार चिड़िया आगे आकर बोली – खंजन बिटिया चिंता न कर। हम सब तेरे साथ हैं। कल से कोई चिड़िया किसी खेत की तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखेगी। और किसान तू भी सुन ले। जब तक तू और तेरे साथी हमें नहीं बुलाएँगे  हममें से कोई इधर झाँकेगा भी नहीं।

     कुछ दिन किसान बड़े खुश रहे चलो चोरनियों से छुटकारा मिला। लेकिन ज्यादा दिनों तक यह खुशी न रही।  कुछ महीने में ही खेतों में छोटे -छोटे कीड़े रेंगने लगे। पत्तों में सफेद सफेद फुनगी सी जम गई। पत्ते काले से हो गए। वे बीमार नजर आने लगे। यह देख किसान घबरा गए। अब उन्होंने समझा कि चिड़ियाँ कीड़े -मकोड़े खाकर उनका कितना उपकार करती थी। 

    एक सुबह किसान के बच्चों का कोलाहल सुनाईं  दिया।  वे मुट्ठी भर  दाना बिखेरते हुए चिल्ला रहे थे ..

आओ री चिड़िया  

चुग्गो री खेत 

खाओ री दाना 

भर -भर पेट 

जल्दी ही आकाश पंखों की सरसराहट से भर उठा। भोले-भाले  बच्चों के बुलाने  पर चिड़ियाँ  अपने को रोक न सकीं। मन की सारी कड़वाहट घुल गई।  झुंड के झुंड चिड़ियों के धरती पर उतर पड़े। इस बार उन्हें कोई चोरनी कहने वाला न था। सारे किसान और बच्चे उनको चुगता देख बहुत आनंदित हो रहे थे।

 

सम्पर्क: जे. 703स्प्रिंग फील्ड्स17/20 अम्बालिपुरा  विलेजबल्लान्दुर गेटसर्जापौरा रोडबंगलौर 560102Email-subharga@gmail.com


व्यंग्य- शब्द सुधार गृह

  -अख़्तर अली

यहाँ शब्दों की धुलाई और रंगाई की जाती है। आड़े तिरछे शब्दों को सीधा किया जाता है। शब्दों में धार लगाईं जाती है। पीतल के शब्दों में सोने का पानी चढ़ाने का यह एकमात्र स्थान है। यहाँ शब्दों में जमा कार्बन साफ़ किया जाता है। यहाँ शब्दों की नाक छेदी जाती है, शब्दों के पैरों में घुँघरू बाँधे जाते हैं। शब्दों की कूलिंग कम हो गई है तो यहाँ उसमें गैस भरी जाती है। यहाँ शब्दों में ऑयल डाला जाता है, शब्दों की सर्विसिंग की जाती है, शब्दों को थ्रू किया जाता है, शब्दों की तुरपाई, रफ़ू होती है। शब्दों की ड्रायक्लीन और इस्तरी करने का यह एक  मात्र स्थान है।

पुराने शब्द लाइए नये शब्द ले जाइए। हमारे यहाँ शब्दों में कलफ़ चढ़ाया जाता है। अब पाइए एक किलो शब्द लेने पर बीस प्रतिशत अतिरिक्त शब्द। काँच जैसे शब्द, रुई जैसे शब्द, गुलकंद जैसे शब्द, बारूद जैसे शब्द, कारतूस जैसे शब्द।

ज़बानी जंग में घायल शब्दों की यहाँ मरहम पट्टी की जाती है, उनकी सोनोग्राफ़ी और एक्सरे रिपोर्ट निकाली जाती है। शब्दों के घुटने बदले जाते है, शब्दों के सीने में जमा कफ़ सिकाई पद्धति से निकाला जाता है, शब्दों की किडनी ट्रांसप्लांट की जाती है।

बिन शब्द सब सून। शब्दों से समझौता मत करिये। जब इंसान नहीं रहेगा तब वह शब्दों में ही बचा रहेगा। आपके पास सौ पचास शब्द हमेशा ज़हन में रहना चाहिए। शब्द किसी भी भाषा के हों अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम होते है।

शब्दों से फूलों की बारिश भी की जा सकती है और शब्दों के पथराव से किसी को लहूलुहान कर देना भी मुमकिन है। ज़बान के गमले में शब्दों के फूल उगाइए या विचार की गुलेल में रख कर शब्द चलाइए।

क्या कहा, उपन्यास लिखने के बाद कुछ शब्द बच गये हैं , अब पड़े- पड़े उनका दम घुट रहा है ? यहाँ ले आइए उन शब्दों में आक्सीजन भर कर उन्हें तरोताज़ा कर देंगे, इतना महीन और पारदर्शी कर देंगे कि लगेगा ही नहीं कि यह उपन्यास का शब्द है, हर कोई यही कहेगा यह कविता से निकल कर आया हुआ शब्द है।

क्या कहा, आपको पटकथा लिखना है और आपके पास कहानी के शब्द है ? नहीं- नहीं श्रीमान ऐसा अनर्थ नहीं करना। कहानी के शब्द पटकथा के लिये किसी काम के नहीं। हर माध्यम के अपने शब्द अपनी भाषा होती है। आप एक काम कीजिए कहानी वाले शब्द लेकर आ जाइए और यहाँ से पटकथा के उपयुक्त शब्द ले जाइए। कहानी के शब्द हम कही और खपा देंगे।

अगर आप रचनाकार हैं, गीत, कविता, लघुकथा, निबंध, कहानी, नाटक, उपन्यास, संस्मरण, यात्रा वर्णन, आत्मकथा, समाचार लेखन करते हैं तो आपको यहाँ आना ही चाहिए। यहाँ न सिर्फ़ शब्दों की विशाल रेंज मिलेगी बल्कि इस्तेमाल की आधुनिक तकनीक भी मालूम पड़ेगी।

अरे- अरे जनाब उसे हाथ मत लगाइए, वह आपके काम के शब्द नहीं है। आपकी पसंद इधर रखी है। मैं ग्राहक का चेहरा देख कर ताड़ जाता हूँ कि उसकी ज़रूरत क्या है। आपको लिखना है प्रेम पत्र और उस पैकेट में है विरह गीत के शब्द। विरह के शब्दों से मिलन का संदेश लिखोगे तो प्यार परवान चढ़ने के पहले ही खत्म हो जायेगा।

कुदरत ने हमें बहुत सी नैमते दी हैं उनमें एक नैमत शब्द है। यह शब्द साधक का गोदाम है यहाँ हर भाव के हर तेवर के शब्द मिल जाएँगे, पैसों की कोई बात नहीं, आप तो शब्द ले जाइए पैसे कहाँ जाएँगे ?

बस इतना ध्यान रखना यह शब्द बहुत साधना के बाद प्राप्त हुए हैं। इसमें एक ख़ास बात है, अगर इन शब्दों से झूठ, अश्लील, भ्रामक और देशद्रोह की बातें लिखोगे तो यह शब्द अपना प्रभाव तुरंत खो देगे, पाठकों पर इन शब्दों का कोई असर नहीं होगा, संपादक की खेद की टिप्पणी के साथ रचना लौट आयेगी।

मैं समझ गया आप सोच रहे है मैं तो ऐसी बात कर रहा हूँ मानो शब्दों का बहुत बड़ा जानकार हूँ, भाषा का पंडित हूँ। बिलकुल ठीक सोच रहे हैं आप। मेरे पास शब्दों का कोई वर्कशाप नहीं है, लेकिन मेरे को विश्वास है कि ऐसा एक वर्कशाप आपके अंदर मौजूद है, मैं उसी बंद पड़े वर्कशाप को एक्टिव करना चाहता था, लगता है मेरा काम हो गया।

अब शब्दों से समझौता करने की कोई आवश्यकता नहीं है। जहाँ जिस शब्द की ज़रूरत है वहाँ  वही शब्द रखिए, उपयुक्त शब्द को तलाशिए। बहुत समृद्ध होती है भाषाएँ इसमें शब्दों की कमी नहीं होती। रचना में एक शब्द बैठा दिया गया तो फिर वह अनंतकाल तक वहीं उसी रूप और रंग में मौजूद रहेगा। कई पीढ़ी पढ़कर जाती रहेंगी पर शब्द अपने स्थान पर डटा रहेगा, क्योंकि शब्द कभी मरते नहीं।

सम्पर्कः निकट मेडी हेल्थ हास्पिटल, आमानाका, रायपुर (छत्तीसगढ़), मो.न. 9826126781

दो ग़ज़ल

- विज्ञान  व्रत


1.        

उनकी   आँखों    में   चिंगारी

लेकिन   बातों   में    गुलबारी

 

उनसे   मिलकर    बैरागी   हूँ

छूट    गयी    है    दुनियादारी

 

कोई    हुक्म    नहीं    मानेगा

उनका  हुक्म  हुआ   है  जारी

 

गर मुझको आज़ाद  किया  है

फिर   क्यों   इतनी   पहरेदारी

 

दरिया  में  जब  कूद  गया  हूँ

अब   दरिया  की   ज़िम्मेदारी

 

2.

पागल   क्या   दीवाना   क्या

इनमें   फ़र्क़    बताना    क्या

 

मुझको    कोई    याद    नहीं

अपना   क्या    बेगाना   क्या

 

मुझको  तुम   क्या   दे   पाये

तुमको   फिर  लौटाना   क्या

 

ख़ुद ही  सब कुछ  जान  गये

फिर  तुमको   बतलाना  क्या

 

तुम   जन्मों   से   मुझमें   हो

फिर  तुमको  अपनाना   क्या

 

सम्पर्कः एन - 138 , सैक्टर - 25 , नोएडा – 201301, मो .  09810224571