मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।

Feb 11, 2020

कबूतर

कबूतर 
-शबनम शर्मा

धांय’ की आवाज़,
मौत का खौफ़,
तूफान की तरह
सैंकड़ों कबूतर
उस सामने वाली इमारत
की आखिरी मंजिल
से उड़े,
कि आज वो बूढ़ा कबूतर
टस से मस न हुआ,
मैंने उसे इशारा कर
बुलाया, वो सधी हुई
उड़ान में उड़कर
मेरे पास आया।
मैंने पूछा, ‘‘तुम्हें डर नहीं लगा?’’
बोला, ‘‘जानती हो तुम,
बरसों पहले घना जंगल
था यहाँ,
पेड़ों पर थे हमारे आशियाने,
दिन गुटर-गूँ में,
तो रात एक दूसरे से
सटकर सोने में निकल
जाती थी,
सुबह होते ही
देखने जाते थे पास वाले
घर में निकले अंडों से
कबूतरी के बच्चे,
लिवाते थे दाना,
मनाते थे जश्न,
कट गये पेड़,
बन गई अटारियाँ,
रहने लगे लोग
चिपकाकर अपने नाम
की पट्टियाँ।
देखता हूँ मैं, रोता हूँ में,
क्योंकि इन सब कबूतरों
की उड़ान शाम को
यहीं खत्म होती है
ले जाता हूँ किसी
खाली घर की बालकनी में
सुनाता हूँ लोरी व सुला देता हूँ,
पर कब तक......
हर रोज तान देते हैं
ये बंदूक हमारी तरफ
बिन सोचे कि इन्होंने
घर बना हैं
हमारे घर छीन कर,
बदलते-बदलते आशियाँ
थक गया हूँ मैं।’’
दास्तान उसकी सुनकर
मेरा दिल, मेरी आँखें
रो पड़ीं,
पर जैसे ही मैंने उसे
सांत्वना देनी चाही,
झट से उड़ने को तैयार
पंख फैला उसने कहा
‘‘तुम भी तो हमारे
घर में रहती हो
कभी रोका उसे कि
बन्दूक से मत मारे हमें।’’

सम्पर्कः अनमोल कुंज, पुलिस चैकी के पीछे, मेन बाजार, माजरा, तह. पांवटा साहिब, जिला सिरमौर, हि.प्र., मो. – ०९८१६८३८९०९, ०९६३८५६९२३, shabnamsharma2006@yahoo.co.in

विश्व भ्रमण करते घुमक्कड़ परिंदे

 विश्व भ्रमण करते घुमक्कड़ परिंदे
-गोवर्धन यादव         
बच्चो!
 क्या कभी आपने किसी पक्षी को उड़ते हुए देखा है ?
 प्रश्न सुनते ही शायद आपके मन में क्रोध उत्पन्न होने लगेगा और आप झट से कह उठेंगे कि यह भी भला कोई प्रश्न हुआ? हम तो रोज पक्षियों को आसमान में उड़ते हुए देखते हैं।
इसी प्रश्न को पलटते हुए मैं दूसरा सवाल दोहराऊँ कि क्या कभी, आपमें से किसी ने, पक्षी की तरह आसमान में उड़ते हुए बहुत दूर तक जा पाने की कल्पना की है ? तब आप चुप्पी साध लेंगे। क्योंकि आपके मन में कभी भी आकाश में उड़ान भरने की कल्पना तक नहीं जागी। यदि कल्पना जागी होती तो शायद इसके परिणाम कुछ और होते।
बच्चो -आज हम सुगम, सुविधाजनक, आरामतलबी की जिन्दगी जी रहे हैं। हम अधिक से अधिक शौक-मौज से भरे दिन काटना चाहते हैं और विलासिता में निमग्न रहने का साधन ढूँढते रहते हैं। आरामतलबी जीवन जीने के लिए आलीशान बंगलों का निर्माण करते हैं और पूरी जिन्दगी उसी चार-दीवारी में काट देते हें। लेकिन पशु-पक्षी ऎसा कदापि नहीं करते। न तो वे अपने लिए कोई घर बनाने की सोचते हैं और न ही विलासिता की चीजें बटोरकर रखते हैं। शायद यही कारण है कि वे लंबी-लंबी यात्राएँ करते हुए एक देश से दूसरे देश में जा पहुँचते हैं। उन्हें न तो वीजा की जरुरत पड़ती है और न ही पासपोर्ट बनाने की जरुरत। वे खुलकर प्रकृति में आए नित बदलाव का आनन्द उठाते हैं और एक अवधि पश्चात फिर अपने पुराने ठिकाने पर आ पहुँचते है।
आरामतलबी या आलसीपन यह दोनों ही सजीव चेतन प्राणी की अन्तरात्मा की मूल प्रकृति के विपरीत है। यदि हमारे मन से इस दुर्बुद्धि के बादल छँट जाएँ, तो हमारे अन्दर सदा साहसिकता का परिचय देने की- शौर्य प्रवृत्ति उमगती दिखाई देगी। बहादुरी और वीरता का प्रतिल ही सच्चा आनन्द और सन्तोष दे सकते हैं, इस मंत्र को तो छोटे-छोटे कीट-पतंगे और पशु-पक्षी भी भली-भांति जानते हैं।
बहुत- सी ऐसी चिड़ियाँ हैं, जो बदलती हुए ऋतुओं में आनन्द लेने के लिए दुर्गम यात्राएँ करती हैं। उन्हें काफ़ी जोखिम उठानी पड़ती है और काफ़ी श्रम भी करना पड़ता है तथा मनोयोग का प्रयोग भी करना पड़ता है। पर वे बेकार की झंझटों में न पड़ते हुए साहसिकता का परिचय देती हुई, लंबी उड़ान भरते हुए आन्तरिक प्रसन्नता एवं सन्तोष का अनुभव करती है। वे जानती हैं कि पेट तो कहीं भी भरा जा सकता है और रात कहीं भी काटी जा सकती है। मनुष्य भले ही इसे पसन्द न करे; परन्तु पशु-पक्षी से लेकर कीट-पतंगे तक कोई भी एक जगह रुकना पसंद नहीं करते।
इन पक्षियों की लम्बी यात्राएँ, ऊँची उड़ानें आश्चर्यजनक है। बागटेल 2000 मील की लम्बी यात्रा करके मुम्बई के निकट एक मैदान में उतरते हैं और फिर विभिन्न स्थानों के लिए बिखर जाते हैं। गोल्डन फ़्लावर पक्षी अमेरिका से चलते हैं। पतझड़ में विश्राम करते हैं , फिर थकान मिटाकर अटलांटिक और दक्षिण महासागर पार करते हुए दक्षिण अमेरिका जा पहुँचते हैं। आते समय वे समुद्र के ऊपर से उड़ते हैं और जाते समय जमीन के रास्ते लौटते हैं। अलास्का में उनके घोंसले होते हैं और वहीं अंडे देते हैं। हर वर्ष वे दो-ढाई हजार मील की यात्रा करते हैं। पृथ्वी की परिक्रमा केवल तीन हजार मील की है। इस प्रकार वे लगभग पृथ्वी की एक परिक्रमा हर वर्ष पूरी करते हैं।

आर्कटिका टिटहरी इन सब घुम्मकड़ पक्षियों में सबसे आगे है। उत्तरी ध्रुव के समीप उसका घोंसला होता है। पतझड़ में वह दक्षिण ध्रुव जा पहुँचती है। बसन्त में फिर उत्तरी ध्रुव लौट आती है। जर्मनी के बगुले चार माह में करीब 4000 मील का सफ़र पूरा करते हैं। रूसी बतखें भी 5000 मील की लम्बी यात्रा करती हैं। यह पक्षी औसतन 200 मील की यात्रा हर रोज करते हैं। टर्नस्टान इन सबसे अधिक उड़ती है। उसकी दैनिक उड़ान 500 मील के करीब तक होती है। साथ ही उसका 17 हजार फ़ीट ऊँचाई पर उड़ना और भी अधिक आश्चर्यजनक है। हाँ समुद्र पार करते समय उड़ने की ऊँचाई तीन हजार फ़ीट से अधिक नहीं होती।
च्चो!- इन घुम्मकड़ पक्षियों के बारे में जानकारी प्राप्त करने के ठीक बाद, हमारे मन में यह प्रश्न उठना लाजमी है कि आखिर वह कौन सा कारण है कि जिसके चलते ये पक्षी खतरनाक और कष्टदायक उड़ाने भरते हैं ? क्या इनके लिए उड़ान अनिवार्य है ? क्या वे अपने क्षेत्र में रहकर गुजारा नहीं कर सकते ? या वे थोड़ा- सा उड़कर, एक जगह रहकर अपना काम नहीं चला सकते ? आखिर ऐसा कौन सा कारण है कि वे अपनी जान जोखिम में डालने वाला ऐसा कदम, उन्हें क्यों उठाना पड़ता है ?
पक्षी विज्ञान के वैज्ञानियों ने यह पाया है कि बाह्य दृष्टि से उनके सामने कोई कठिनाई नहीं होती, जिसके कारण उन्हें इतना बड़ा जोखिम उठाने के लिए विवश होना पड़े। आहार की- ऋतु प्रभाव की घट-बढ़ होती रह सकती है, पर दूसरे पक्षी तो उन्हीं परिस्थितियों में किसी प्रकार निर्वाह करते हैं। फिर सैलानी चिड़ियों को ही ऐसी विचित्र उमंग क्यों उठती है ? इस प्रश्न का उत्तर उनकी वृक्क ग्रन्थियों में पाए जाने वाले विशेष हारमोन रसों से मिलता है। जिस प्रकार कुछ बढ़े हुए हारमोन उन्हें संतान उत्पत्ति के लिए बेचैनी उत्पन्न करती है, लगभग वैसी ही बेचैनी इस प्रकार की लम्बी उड़ान भरने के लिए इन पक्षियों को विवश करती है। वे अपने भीतर एक अद्भुत उमंग अनुभव करते हैं और वह इतनी प्रबल होती है कि उसे पूरा कि बिना उनसे रहा ही नहीं जाता। यह उड़ान हारमोन न केवल प्रेरणा देते हैं, वरन उसके लिए उनके शरीरों में आवश्यक साधन सामग्री भी जुटाते हैं। पंखों में अतिरिक्त शक्ति, खुराक का समुचित साधन न जुट सकने की क्षतिपूर्ति करने के लिए बढ़ी हुई चर्बी- साथ उड़ने की प्रवृत्ति, समय का ज्ञान, नियत स्थानों की पहचान, सफ़र का सही मार्ग जैसी कितनी ही एक से एक अद्भुत बातें हैं, जो इस लम्बी उड़ान और वापसी के साथ जुड़ी हुई हैं। उन उड़ान हारमोनों को पक्षी के शरीर, मन और अन्तर्मन में इस प्रकार के समस्त साधन जुटाने पड़ते हैं, जिससे उनकी यात्रा प्रवृत्ति तथा प्रक्रिया को सलतापूर्वक कार्यान्वित होते रहने का अवसर मिलता रहे।
प्रकृति नहीं चाहती कि कोई भी प्राणी अपनी प्रतिभा को आलसी और विलासी बनाकर नष्ट करे। प्रकृति इन यात्रा प्रेमी पक्षियों को यही प्रेरणा देती है कि वे विभिन्न स्थानों के सुन्दर दृश्य देखें और वहाँ के ऋतु- प्रभाव एवं आहार-विहार के हर्षोल्लास का अनुभव करें। अपनी क्षमता और योग्यता को परिपुष्ट करें।
मनुष्य में आरामतलबी की प्रवृत्ति इतनी घातक है कि वह कुछ महत्त्वपूर्ण काम कर ही नहीं सकता, अपनी प्रगति के द्वार किसी को रोकने हों तो उसे काम से जी चुराने की आदत डालनी चाहिए और साहसिकता का त्याग कर विलासी बनने की बात सोचनी चाहिए। ऐसे लोगों को मुँह चिढ़ाते हुए- उनकी भर्त्सना करते हुए ही यह उड़ान पक्षी, विश्व-निरीक्षण, विश्व-भ्रमण करते रहते हैं- ऐसा लगता है।
सम्पर्कः 103 कावेरी नगर छिन्दवाडाम.प्र. ४८०००१, 7162-246651,9424356400, goverdhanyadav44@gmail.com

एवरेस्ट की ऊँचाई पर उड़ते पक्षी

एवरेस्ट की ऊँचाई पर उड़ते पक्षी
वर्ष 1953 में, एक पर्वतारोही ने माउंट एवरेस्ट के शिखर पर सिर पर पट्टों वाले हंस (करेयी हंस, एंसर इंडिकस) को उड़ान भरते देखा था। लगभग 9 किलोमीटर की ऊंचाई पर किसी पक्षी का उड़ना शारीरिक क्रियाओं की दृष्टि से असंभव प्रतीत होता है। यह किसी भी पक्षी के उड़ने की अधिकतम ज्ञात ऊंचाई से भी 2 कि.मी. अधिक था। इसको समझने के लिए शोधकर्ताओं ने 19 हंसों को पाला ताकि इतनी ऊँचाई पर उनकी उड़ान के रहस्य का पता लगाया जा सके।
शोधकर्ताओं की टीम ने एक बड़ी हवाई सुरंग बनाई और युवा करेयी हंसों को बैकपैक और मास्क के साथ उसमें उड़ने के लिए प्रशिक्षित किया। विभिन्न प्रकार के सेंसर की मदद से उन्होंने हंसों की  हृदय गति, रक्त में ऑक्सीजन की मात्रा, तापमान और चयापचय दर को दर्ज करके प्रति घंटे उनकी कैलोरी खपत का पता लगाया। शोधकर्ताओं ने मास्क में ऑक्सीजन की सांद्रता में बदलाव करके निम्न, मध्यम और अधिक ऊंचाई जैसी स्थितियाँ  निर्मित कीं।
यह तो पहले से पता था कि स्तनधारियों की तुलना में पक्षियों के पास पहले से ही निरंतर शारीरिक गतिविधि के लिए बेहतर हृदय और फेफड़े हैं। गौरतलब है कि करेयी हंस में तो फेफड़े और भी बड़े व पतले होते हैं जो उन्हें अन्य पक्षियों की तुलना में अधिक गहरी सांस लेने में मदद करते हैं और उनके हृदय भी अपेक्षाकृत बड़े होते हैं जिसकी मदद से वे मांसपेशियों को अधिक ऑक्सीजन पहुंचा पाते हैं।
हवाई सुरंग में किए गए प्रयोग से पता चला कि जब ऑक्सीजन की सांद्रता माउंट एवरेस्ट के शीर्ष पर 7 प्रतिशत के बराबर थी (जो समुद्र सतह पर 21 प्रतिशत होती है), तब हंस की चयापचय दर में गिरावट तो हुई; लेकिन उसके बावजूद हृदय की धड़कन और पंखों के फड़फड़ाने की आवृत्ति में कोई कमी नहीं आई। शोधकर्ताओं ने ई-लाइफ में प्रकाशित रिपोर्ट में बताया है कि किसी तरह यह पक्षी अपने खून को ठंडा करने में कामयाब रहे, ताकि वे अधिक ऑक्सीजन ले सकें। गौरतलब है कि गैसों की घुलनशीलता तापमान कम होने पर बढ़ती है। खून की यह ठंडक बहुत विरल हवा की भरपाई करने में मदद करती है।
हालाँकि पक्षी अच्छी तरह से प्रशिक्षित थे, लेकिन बैकपैक्स का बोझा लादे कृत्रिम अधिक ऊँचाई की परिस्थितियों में कुछ ही मिनटों के लिए हवा में बने रहे। इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि क्या उपर्युक्त अनुकूलन की बदौलत ही वे 8 घंटे की उड़ान भरकर माउंट एवरेस्ट पर पहुँचने में सफल हो जाते हैं। या क्या यही अनुकूलन उन्हें मध्य और दक्षिण एशिया के बीच 4000 किलोमीटर के प्रवास को पूरा करने की क्षमता देते हैं। और ये करतब वे बिना किसी प्रशिक्षण के कर लेते हैं। लेकिन प्रयोग में बिताए गए कुछ मिनटों से इतना तो पता चलता ही है कि ये हंस वास्तव में माउंट एवरेस्ट की चोटी के ऊपर से उड़ सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

प्रेरक



41 साल-10 सबक
-निशांत

मैं आज ही 41 साल का हो गया हूँ, आज मेरा जन्म दिन है। अपने ब्लॉग पर मैंने कुछ साल पहले अपने जन्मदिन के दिन एक पोस्ट लिखी थी, और यह संकल्प लिया था कि हर साल वैसी ही पोस्ट लिखा करूँगा, लेकिन मनुष्य अपने लिए संकल्पों के दस प्रतिशत पर ही क्रियान्वयन कर ले, तो बहुत बड़ी बात होगी... खैर...
मुझे वह दिन याद है, जब मैं 30 साल का हुआ था; तब मेरी पक्की नौकरी लगे ज्यादा अरसा नहीं हुआ था और शादी भी कुछ महीने पहले हुई थी। 30 साल का होने को लेकर मेरे विचार बहुत रोमानी थे। जि़ंदगी में सब बहुत बढिया चल रहा था। प्रचलित मुहावरे में मैं सेटल हो गया था। फ़ैमिली बड़ी हो रही थी। अब 11 साल बाद ये बातें इतनी नई-सी लगती हैं; जैसे कल ही की बात हो।
40 पार कर जाना मध्यकाल की शुरुआत माना जाता है। यह जीवन का वो दौर है, जब आप चीज़ों को अपने अनुभव के दम पर आँकने के योग्य हो जाते हैं। 40 पार कर चुके लोगों से यह उम्मीद की जाती है कि वे खिलंदड़पन न करें। मैं अपने ही अनुभव से यह जानता हूँ कि मुझमें थिरता आ गई है और उम्र के बढ़ते हुए साल मुझे ईश्वर के उपहार की तरह प्रतीत होने लगे हैं। मैं खुशनसीब हूँ कि मुझे बढ़ती उम्र के दुष्परिणामों का सामना नहीं करना पड़ रहा है। मैं स्वस्थ हूँ, सानंद हूँ। मैं अपने हर दिन को समग्रता से जीता हूँ।
आज मेरे मन में कुछ बेतरतीब से खय़ाल आ रहे हैं। अपनी बीती हुई जि़ंदगी को जब मैं पलटकर देखता हूँ, तो पाता हूँ कि मैंने जीवन से बहुत कुछ सीखा है। अपने उन्हीं विचारों को मैं आपसे शेयर करना चाहता हूँ। ये विचार बहुत रैंडम हैं, बेतरतीबी मेरे स्वभाव में है, इसलिए हो सकता है मैं किसी ज़्यादा गहरी बात को पीछे धकेल दूँ। ये हैं मेरे  जि़ंदगी के सिखाए दस सबक:
1. जो मिला है उसके लिए शुक्रगुज़ार रहिए -
मैं बचपन और किशोरावस्था में बहुत बिगड़ैल था। मुझे या तो सब कुछ चाहिए होता था कुछ भी नहीं। मुझमें सही-ग़लत की समझ नहीं थी। कॉलेज की शिक्षा समाप्त होने के बाद जब मेरे सामने 'क्या करेंका सवाल आकर खड़ा हो गया, तब मेरी जि़ंदगी में एक नया मोड़ आया। युवावस्था में मुझमें यह देखने की समझ विकसित हुई कि मेरे पास बहुत कुछ था जिससे मेरे साथ के बहुत लोग वंचित थे। मेरे परिजनों, मित्रों, शिक्षकों और मेरी जि़ंदगी ने मुझे इतना कुछ दिया जिसके लिए मुझे कोटि-कोटि आभारी होना चाहिए, बहुत पहले ही होना चाहिए था; लेकिन मैंने देर कर दी थी।
 तुम्हें भी चाहिए कि तुम्हारे जीवन में जो कुछ भी अच्छा है, जो कुछ भी बेहतर है उसकी पहचान करें और उसके लिए आभारी रहें। जो आपके पास नहीं है उसे पाने का प्रयास करें लेकिन जो है उसे सँजोकर रखें।
2. हर दिन एक बेहतर शख्स बनने की कोशिश करते रहिए -
बाबा रामदेव की लोग कई मामलों में आलोचना करते हैं लेकिन एक बात है जिसे रामदेव बार-बार कहते हैं और बिल्कुल सही कहते हैं, और व यह है कि... करने से होता है- मैं अपनी बात करता हूँ - वर्ष 2000 में जिसे एक ई-मेल भेजना बहुत कठिन काम लगता था वह आज बिना किसी कोडिंग की जानकारी के कई ब्लॉग्स सफलतापूर्वक चला रहा है और रोज़मर्रा में आनेवाली मुश्किलों का हल बिना किसी परेशानी के निकाल लेता है।
हर नया दिन आपके सामने कुछ नया सीखने, करने और बनने के असंख्य मौके लेकर आता है। हर नए दिन में आप अपनी पिछली गलतियों के लिए शर्मिंदा हो सकते हो और उनसे सबक लेकर आगे बढ़ सकते हो। आप कर सकते हो क्योंकि... करने से होता है। यह बात हमेशा याद रखिए कि प्रयास करने पर हो सकता है कि आप असफल हो जाएँ लेकिन यदि कोशिशें नहीं करेंगे तो 100 प्रतिशत असफल हो रहेंगे।
3. अपने अहंकार से छुटकारा पाइए -
हम सभी अपने अहंकार का शिकार बनकर बहुत से मामलों में पीछे रह जाते हैं। हमें कुछ सीखना होता है; लेकिन हमारी आत्म-गुरुता उसके आड़े आ जाती है। अपनी उपलब्धियों पर गर्व होना और आत्मविश्वास होना सकारात्मक चीज़ है लेकिन अहंकार हमारी प्रगति में बाधक है। अहंकार वास्तव में हमारे आत्म रक्षा का तरीका है। यह हमें ठुकराए जाने और असफल होने से तो बचाता है; लेकिन हमारी जि़ंदगी में कुछ जोड़ता नहीं है। मनुष्य दूसरों से तभी प्रेरित हो सकता है जब उसमें विनम्रता हो। किसी को कुछ सिखाने के संबंध में भी यह सही है। जिस व्यक्ति में अहंकार नहीं है, वह खुद से ही आगे बढ़कर दूसरों की सहायता कर सकता है।
जिस व्यक्ति का अहंकार प्रबल न हो, वह आलोचना को सकारात्मकता से लेता है। सच कहूँ तो मैं भी हर कटाक्ष व आलोचना को सकारात्मकता से नहीं ले पाता; लेकिन मैं यह सीख रहा हूँ। आप भी सीखिए- अभी उम्र पड़ी है।
4. अपने भोजन की जाँच-परख करते रहिए -
महानगरीय जीवनशैली का शिकार होकर मैं अपने खान-पान की आदतों को बिगाड़ बैठा। इसका बड़ा ख़ामियाज़ा मुझे इसी वर्ष फरवरी में भुगतना पड़ा, जब मुझे दो सप्ताह से भी ज्यादा समय तक बुखार बना रहा। बुखार के कारण कुछ और रहे होंगे; लेकिन समय-असमय कैसा भी खानपान करने की बुरी आदत का प्रभाव मेरे शरीर पर दो-तीन सालों से ही दिखने लगा था। गले का बार-बार खराब होना और पेट की गड़बडिय़ाँ जैसे गैस मेरे स्वास्थ्य को बिगड़ रही थी।
हाल ही में मैंने अपने खानपान में व्यापक सुधार किया है और उन पदार्थों की पहचान कर ली है, जो मुझे नुकसान पहुँचाते हैं। मैं चाय-कॉफ़ी से परहेज़ करने लगा हूँ और सोडा, ड्रिंक्स का पूरी तरह से परहेज करता हूँ। मैं मानता हूँ कि खानपान का विषय बहुत निजी होता है और आप किसी की भी सलाह आँख मूँदकर नहीं मान सकते। यदि आप अपने स्वास्थ्य को सँजोए रखना चाहते हैं, तो अपने भोजन की परख करते रहिए और इस दिशा में अपनी जानकारी बढ़ाइए। वॉट्सएप के ज़रिए फैलाई जानेवाली हैल्थ-टिप्स को भी प्रामाणिक स्रोतों से जाँच लेने के बाद ही व्यवहार में लाइए।
5. अपने शरीर को चुस्त-दुरुस्त रखिए -
मैं लगभग 15 घंटे कुर्सी पर बैठता हूँ। छुट्टियों के दिन भी मेरा लगभग पूरा दिन कंप्यूटर टेबल पर बीत जाता है। शरीर के हर जोड़ और मांसपेशी को चलायमान रखने के लिए यह बहुत ज़रूरी है कि रोज़ थोड़ा व्यायाम की जाए। बैठे-बैठे शरीर कई तरह के दर्द और अकडऩ का शिकार हो जाता है। मैं बहुत ज्यादा काम करता हूँ और व्यायाम के लिए समय नहीं निकाल पाता; क्योंकि एक थके हुए शरीर और दिमाग को पर्याप्त नींद की ज़रूरत होती है।
ऐसे में मैं अपने काम के दौरान ही छोटे-छोटे ब्रेक लेकर आसपास चहलकदमी कर लेता हूँ। रोज़ाना किसी-न-किसी काम के बहाने अपने ऑफि़स से थोड़ी दूर पैदल चलता हूँ और कभी भी लिफ़्ट का उपयोग नहीं करता। मैं जानता हूँ कि इतना करना ही पर्याप्त नहीं है। मैं अपने फि़टनेस गोल से दरअसल बहुत पीछे हूँ और कोशिश कर रहा हूँ कि अपने व्यायाम का स्कोर बढ़ा सकूँ। मेरा मानना है कि घर के पास ही कई छोटे-मोटे काम करने के लिए कार या बाइक से चल देना खराब पॉलिसी है; इसलिए मैंने साइकल खरीदने का भी निश्चय किया है। यदि आप व्यस्तता के कारण व्यायाम के लिए समय नहीं निकाल पा रहे हों तो साइकल में निवेश करना आपके लिए भी सही रहेगा।
6. अपने लक्ष्य निर्धारित कीजिए-
मैंने अपने लक्ष्य कभी लिखकर नहीं रखे; हालाँकि मुझे ऐसा करना चाहिए था। मेरे साथ सबसे बुरी बात तो यह थी कि बहुत लंबे समय तक मेरे लक्ष्य स्पष्ट ही नहीं थे। मुझे इस बात का ज्ञान नहीं था कि मुझे क्या करना है और कैसे करना है। आज मेरे सामने जो लक्ष्य हैं उन्हें यदि मैंने 20 साल पहले निर्धारित कर लिया होता, तो मैं बहुत दूर तक जा चुका होता; लेकिन ये एक काल्पनिक बात है।
मैंने अपनी ऑनलाइन उपस्थिति को लेकर जो लक्ष्य कुछ समय पहले बनाए थे, उनका परिणाम मुझे अब दिखने लगा है। तय किए गए समय के भीतर अपने गोल्स को प्राप्त कर लेने से बेहतर  कुछ नहीं हो सकता। अपने लिए लक्ष्य निर्धारित करना मेरे लिए एक दृश्य अभ्यास है, जो हमेशा काम करती है। मुझे इसके लिए किसी तरह के नक्शा बनाने की ज़रूरत नहीं है। मैं कुछ करने के बारे में सोचता हूँ और उसमें अपनी पूरी ऊर्जा लगा देता हूँ। कुछ बड़ा करने के बारे में सोचना, और उसे छोटे-छोटे कदमों से प्राप्त करते जाना... यही मेरे लक्ष्य निर्धारित करने के तरीका है। शायद यह उपाय आपके लिए भी काम कर जाए, अन्यथा आप अपना तरीका अपना सकते हैं।
7. दूसरों को आपकी जि़ंदगी के फ़ैसले मत लेने दीजिए -
आपको बहुत से लोग मिलेंगे जो आपको बताएँगे कि आपके लिए क्या करना सही होगा। यह ज़रुरी नहीं कि उनमें से सभी आपको गलत सलाह ही दें। कुछ लोग आपको वाकई सही राह सुझा सकते हैं; लेकिन आपको हर व्यक्ति की बात को किसी विशेषज्ञ के सुझाव की तरह नहीं लेना है। अपनी ऑनलाइन दुनिया में मुझे हर कहीं यही सुनने को मिलता है कि मैं 9 से 5 के अपनी नौकरी में खुद को नष्ट कर रहा हूँ लेकिन मैं अपनी सीमाओं और परिस्तिथियों से बेहतर वाकिफ़ हूँ। मैं अपने अनुभव से यह बेहतर जान पाया हूँ कि मेरे लिए इस समय क्या करना सही है।
आप किसी की भी जीवनशैली को आदर्श मानकर उन्हें आपकी जि़ंदगी के फैसले मत लेने दीजिए। हर व्यक्ति के लिए सफल होने के पैमाने अलग-अलग होते हैं। हर व्यक्ति अपनी मंजिल पर पहुँचने के रास्ते खुद तय करता है। सफल-असफल होना और इसमें लगनेवाला समय बहुत से तथ्यों पर निर्भर करता है। सुनिए सबकी, लेकिन कीजिए वही जो आपका दिल कहे। और हाँ, बहुस्तरीय बाजार करनेवालों के बहकावे में कभी मत आइए।
8. अपने जुनून का पीछा कीजिए -
अपनी चाह, अपनी उम्मीदों, अपनी आकांक्षाओं, अपनी इच्छाओं  को आगे बढ़ाइ। यही एक जीवन है और आपको मौके बार-बार नहीं मिलेंगे।  उस विषय पर, उस दिशा में अपने कैरियर को मोड़ दें, जिसे आप प्यार करते हैं। करोड़ों लोग किसी और शख्स का मुखौटा लगाकर रोज़ काम पर जाते हैं और बोझिल कदमों से वापस घर आते हैं। आप अपने साथ ऐसा मत होने दीजिए। आपको परफ़ॉर्मर बनना है या ग्राफि़क डिज़ाइनरचाहे जो बनना चाहते हों, इंटरनेट के इस दौर में कोई काम छोटा नहीं है। 25 साल पहले स्कूल से बाहर निकलते वक्त मेरी पीढ़ी के बहुत से लोगों के सामने रास्ता साफ नहीं होने का संकट होता था। आज वह दुविधा किसी के मन में नहीं होनी चाहिए; क्योंकि मिलेनियल्स (जिनका जन्म पिछले 20-25 सालों के दौरान हुआ है) के पास विकल्पों की कोई कमी नहीं। अपनी चाहतों को पूरा करना उन्हें अपनी मंजि़ल तक ले जाएगा।
9. अपने डर को पहचानिए और उसका सामना कीजिए -
ऐसा बहुत कुछ है जिससे आप भयभीत होंगे। जब जीवन में सब कुछ अच्छा चल रहा हो, तो किसी अनिष्ट के होने का डर भी विकराल हो जाता है। जब मैं साइकल चलाना सीख रहा था तब गिरने की आशंका से मेरा डर इतना पुख्ता हो जाता था कि नजऱ सड़क के दूसरी ओर पड़े पत्थर पर ही टिकी रहती थी और हैंडल अपने आप ही साइकिल को उस दिशा में ले जाने लगता था। घनीभूत डर इसी तरह आपको बुरी परिस्तिथियों में धकेलता है और आपको पता भी नहीं चलता।
डर सभी को लगता है। कलेजा सभी का काँपता है। अच्छे से अच्छे धावकों की भी फ़ाइनल रेस के वक्त धुकधुकी लगी रहती है; लेकिन वे अपने डर को सकारात्मक ऊर्जा में बदलकर बाजी मार ले जाते हैं। पर्याप्त सावधानी लेकर लिये गए जोखिम व्यक्ति को मंजि़ल तक पहुँचा सकते हैं। बैकअप लिये बिना ब्लॉग की क्रूशियल सैटिंग्स या सी-पैनल में छेड़छाड़ करना कितना बेवकूफ़ी- भरा होता है ये मुझसे बेहतर कोई नहीं जानता। मैंने अपनी कई महीनों की मेहनत कई बार हमेशा के लिए खो दी है। लेकिन थोड़ा सँलकर और सीख-सीखकर तकनीक का डर मैंने अपने दिल से निकाल ही दिया। यदि मैं यह नहीं कर पाता तो इतना लंबा सफऱ तय करना मुश्किल था।
10. बचपन अच्छा था... उसे अतीत   में ही रहने दीजिए -
बचपन हमारे जीवन का सबसे खुशनुमा समय होता है। हमारे व्यक्त्त्वि का सबसे बड़ा अंश हमारे बचपन में ही निर्धारित हो जाता है। बचपन के साथ बहुत सी खट्टी-मीठी यादें जुड़ी होती हैं। मैं भाग्यशाली हूँ कि मुझे स्वर्णिम बचपन जीने का मौका मिला। बचपन में ही मैंने परिष्कृत रुचियाँ विकसित कीं, जिन्हें बहुतेरे लोग हाईस्कूल पूरा करने का बाद जान पाते हैं।
बचपन में बहुत संरक्षित माहौल में पलने-बढऩे के कारण मैं जीवन के कठोर सबक समय रहते नहीं सीख पाया। लोगों के बीच जल्दी खुल नहीं पाना, बहिर्मुखता का न होना, दोस्त जल्दी नहीं बना पाना, भीड़ में बोलने से कतराना जैसे बहुत से व्यक्त्त्वि परीक्षण थे, जो मेरे बचपन से होते हुए युवावस्था में प्रवेश कर गए। इनसे उबरने में मुझे खासा वक्त और हिम्मत लगी है। आज भी में अपने बचपन और गुम हो चुकी मासूमियत को शिद्दत से याद करता हूँ; लेकिन उसकी भरपाई मैंने गंभीरता और परिपक्वता से की है।
अपने बच्चों के साथ बच्चा बनना, खूब ठठाकर हँसना और हरी घास पर सहसा लोटपोट हो जाना, इसका लक्षण है कि आपके भीतर का बच्चा कभी भी जाग्रत हो सकता है। उसे बनाए रखिए पर अपने ऊपर हावी मत होने दीजिए। बच्चों के समान बनिए, बचकाना नहीं। (हिन्दी ज़ेन से)

प्यार का कोई प्रतिदान नहीं

प्यार का कोई प्रतिदान नहीं 
- विजय जोशी 
(पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल)
स्नेह जीवन का सबसे सरल सम्बल या सहारा है। बशर्ते वह निर्मल हो स्वार्थ से परे। पर कई बार यह नसीब होता से भाग्य से। जिसे मिल जाए वह परम सौभाग्यशाली और जिसे न मिल पाए, वह दुर्भाग्यशाली। प्यार अनमोल होता है। पर कई बार प्यार स्वार्थ के धरातल पर उसका मोल लगाते हुए हम असली अर्थ भूल जाते हैं।
एक किसान के पास बहुत सुंदर चार पिल्ले थे; जिन्हें बड़े नाज़ से पाला गया था। उन्हें बेचने की विवशता उसके जीवन में आ गई। उसने एक छोटी सी सूचना एक कागज पर लिखकर खेत की सीमा पर खड़े लकड़ी के खंबे पर कील से टाँगने का जतन किया। जब वह आखरी कील ठोककर हटा, तो देखा छोटे- से बच्चे को समीप ही खड़ा पाया, जिसने किसान से निवेदन किया कि वह उनमें से एक को खरीदना चाहता है।
किसान ने कहा- ठीक। लेकिन क्या तुम्हें मालूम है इनकी नस्ल। ये बड़े मँहगे हैं और इन्हें खरीदने के लिए तुम्हें काफी पैसों की जरूरत पड़ेगी।
बच्चे ने एक पल सोचा और हाथ डालते हुए सारे जमा सिक्के निकालते हुए किसान को सौप दिए- मेरे पास निन्यावे पैसे हैं, क्या ये काफी हैं।
बिल्कुल ठीक -किसान ने ये कहते हुए एक आवाज लगाई। सबसे पहले एक सर्वाधिक सुंदर पिल्ला तेजी से दौड़कर बाहर आया। उसके बाद दूसरा और फिर तीसरा। तीनों सुंदर थे तथा अपने स्वामी के पास आकर उछल -कूद करने लगे। सबसे आखिर में जो पिल्ला निकला, उसकी चाल धीमी थी तथा वह थोड़ा  लँगड़ाकर चल रहा था। बालक ने तुरंत कह दिया- मुझे यही चाहि। बिल्कुल यही।
 किसान ने सहानुभूतिपूर्वक बालक के सिर पर स्नेहपूर्वक हाथ रखते हुए कहा- बेटा मैं जानता हूँ , ये तुम्हें नहीं चाहि । यह न तो दौड़ सकेगा और न ही तुम्हारे साथ खेल पाएगा। बालक थोड़ा पीछे हटा तथा अपने पैर की पतलून ऊपर उठाई। किसान ने देखा कि बालक के पैर कृत्रिम थे तथा शरीर में एक स्टील रिंग की सहायता से जुड़े हुए थे।
 उसने कहा- अंकल मैं स्वयं भी नहीं दौड़ सकता। अतः मुझे ऐसा ही साथी चाहिए, जो मुझे समझ सके। मेरा साथ दे। मुझसे भावनात्मक रूप से जुड़ सके।
किसान की आँखों से अश्रुधारा बह उठी। उसने अपने हाथ से पिल्ले को उठाया तथा पूरी सावधानी के साथ बालक को सौंप दिया और कहा- मुझे कुछ नहीं चाहि। प्रेम और प्यार अनमोल होता है। उसका मोल तो ईश्वर भी नहीं लगा सकते।
मित्रों यही है वह निर्मल, निश्चल स्नेह जिसका सम्मान हम सबको करना चाहि। भावनाहीन इंसान का जीवन भौतिकता के धरातल पर भले ही संपन्न हो, लेकिन अंतस् के धरातल पर शून्य। संवेदना, सद्भावना, स्नेह को बढ़ाइए, सजाइए, सँवारि
प्रेम प्रार्थना की तरह, इक मंदिर का दीप
जिसको यह मोती मिलेवह बड़ भागी सीप
सम्पर्क: 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास), भोपाल-462023,
मो. 09826042641, E-mail- v.joshi415@gmail.com