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Sep 15, 2019

लौटते हुए तुम


लौटते हुए तुम 

- सुदर्शन रत्नाकर


लौटते हुए तुम
अपने साथ
मेरे गाँव की थोड़ी मिट्टी ले आना
जिसमें सावन माह की
पहली वर्षा की बूँदों की
सोंधी गंध आती हो।
थोड़े संस्कारों के बीज ले आना
थोड़े चंपा गुलाब के फूल लाना
जिनमें बचपन के प्यार की
महक आती हो।
मेरी माँ के हाथों की बनी
थोड़ी पंजीरी ले आना
जिसमें उसकी ममता का स्पर्श हो मुझे
पिता की ख़ामोश आँखों का जादू ले आना
जिनसे मैं आज भी डरता हूँ
मेरे गाँव के पीपल की छाँव ले आना
लोगों का अपनापन और संवेदनाओं का
उपहार ले आना
रिश्तों की गरिमा लाना
जिन्हें मैं अपने दिल की
बंजर भूमि पर उगाऊँगा
जो आज भी मेरी यादों में बसी है।

सम्पर्क: ई-29, नेहरू ग्राउण्ड, फरीदाबाद 121001, मो.न. 9811251135

छूटा हुआ सामान

छूटा हुआ सामान


-डॉ. शील कौशिक 
 विवाह के बाद ससुराल से पहली बार मायके लौटी तनुजा का मन उड़ा जा रहा है। पहले दिन वह माँ-बाबूजी के ढ़ेरों प्रश्नों के उत्तर देती रही,कुछ छुपाती रही, कुछ मन खोल कर बताती रही आस-पड़ोस की ताई-चाची से आसीसें बटोरती रही। दूसरे दिन सुबह उठते ही माँ शुरू हो गई, “तनु बेटा! आज दामाद जी आने वाले हैं, अपने बैग में सामान जमा लो, जल्दी में कुछ छूट जागा
तनुजा को शीघ्रता से दरवाजे से बाहर निकलते देख माँ ने टोका, “ कहाँ जा रही है तनु?”
अभी आई माँ,” यह कह कर वह निकल गई, अपने मोहल्ले में रह रही सहेली मीना के घर की तरफ रास्ते में पड़ोस की ताई ने रोक लिया, “बिटिया कल तो तू ससुराल चली जाएगी...आ...मैंने खीर बनाई है...तुझे तो बहुत पसंद है ना...कहते हुए ताई हाथ पकड़कर ले गई।
मीना उसे देखते ही फूल सी खिल उठी। खट्टी-मीठी बातें करते कब दो घंटे बीत गये, पता ही न चला। घर वापिस आई तो माँ रसोई में उसकी पसंद की हरी मैथी वाली मट्ठियाँ बना रही थी।
बेटी अपना सामान इकठ्ठा कर लो, कुछ छूट गया तो तुम्हें ही परेशानी होगी।
माँ एक बार बाजार से जरूरी सामान लेने जा रही हूँ,” कह कर तनुजा बिना उत्तर सुने घर से बाहर निकल ही गई। बाजार में उन दुकानों पर पहुँची ,जहाँ से वह हेयर पिन व क्लिप, रबर बैण्ड, रिबन, चूड़ियाँ आदि खरीदती थी।
अरी बिटिया! बहुत दिन बाद दिखाई पड़ी हो, बताओ तुम्हें क्या चाहिए?” दुकान वाले काका बोले।
काका ,अब मेरी शादी हो गई है, दो क्लिप, हेयर बैण्ड दे दीजिए।
बस यही, यह लो। और ये चूड़ियाँ हमारी तरफ से शादी का तोहफ़ा समझो बिटिया।उसके बाद तनुजा ने सामने वाली दुकान से वही पेन खरीदा ,जो वह कॉपी-किताबों के साथ यहाँ से अक्सर खरीदा करती थी।
वापिस आई, तो माँ ने फिर याद दिलाया, “बेटी अपना सामान अटैची में जमा लो, दामाद जी ज्यादा देर नहीं रुकने वाले।
अच्छा माँ!कहकर वह तुरंत पलटी और फिर दरवाजे से बाहर हो गई। उन गलियों से गुजरती हुई जहाँ वह छुपम-छुपाई व उछल-कूद करती थी, नीम के उस विशाल वृक्ष के पास पहुँचीI यहाँ वह सहेलियों संग झुला झूलती और सबसे ऊँची पींघ लेने के लिए मचल जाया करती थी। कितनी ही देर तक निहारती रही उस खामोश खड़े पेड़ को और यादों के झूलों में झूलती रही तनुजा। माँ के कठोर चेहरे की याद आते ही वह फिर घर की तरफ भागी।
 रसोई से उठती हुई खुशबू से पता लगा कि माँ रसोई में दामाद के लिए जरूर कोई पकवान बना रही है। वह चुपके से रसोई में गई। माँ साड़ी के पल्लू से आँखें पोंछ रही थी। उसे देखते ही माथे पर त्योंरियाँ  चढ़ाकर गुस्से में बोली, “तेरे पाँव में टिकाव ना है, यहाँ-वहाँ उड़ती फिर रही है छोरी।
फिर उसके मासूम से चेहरे को देखकर माँ की आँखें नम हो गई व भर्राई आवाज में बोली,
कितनी बार कहा है तुझे, अपना सामान समेट ले बेटा!
माँ सुबह से छूटा हुआ सामान ही तो बटोर रही हूँ,” कह कर वह फफक-फफककर रो पड़ी और माँ के गले में झूल गई।

प्रेरक

तीन संत

एक दिन एक औरत अपने घर के बाहर आई और उसने तीन संतों को अपने घर के सामने देखा। वह उन्हें जानती नहीं थी। औरत ने कहा –“कृपया भीतर आइ और भोजन करिए।
संत बोले – “क्या तुम्हारे पति घर पर हैं?”
औरत ने कहा – “नहीं, वे अभी बाहर गए हैं।
संत बोले – “हम तभी भीतर आएँगे जब वह घर पर हों।
शाम को उस औरत का पति घर आया और औरत ने उसे यह सब बताया।
औरत के पति ने कहा –“जाओ और उनसे कहो कि मैं घर आ गया हूँ और उनको आदर सहित बुलाओ।
औरत बाहर गई और उनको भीतर आने के लिए कहा।
संत बोले –“हम सब किसी भी घर में एक साथ नहीं जाते।
पर क्यों?” - औरत ने पूछा।
उनमें से एक संत ने कहा– “मेरा नाम धन है”– फ़िर दूसरे संतों की ओर इशारा कर के कहा – “इन दोनों के नाम सफलता और प्रेम हैं। हममें से कोई एक ही भीतर आ सकता है। आप घर के अन्य सदस्यों से मिलकर तय कर लें कि भीतर किसे निमंत्रित करना है।
औरत ने भीतर जाकर अपने पति को यह सब बताया। उसका पति बहुत प्रसन्न हो गया और बोला– “यदि ऐसा है, तो हमें धन को आमंत्रित करना चाहिए। हमारा घर खुशियों से भर जाएगा।
लेकिन उसकी पत्नी ने कहा –“मुझे लगता है कि हमें सफलता को आमंत्रित करना चाहिए।
उनकी बेटी दूसरे कमरे से यह सब सुन रही थी। वह उनके पास आई और बोली –“मुझे लगता है कि हमें प्रेम को आमंत्रित करना चाहिए। प्रेम से बढ़कर कुछ भी नहीं हैं।
तुम ठीक कहती हो, हमें प्रेम को ही बुलाना चाहिए”– उसके माता-पिता ने कहा।
औरत घर के बाहर गई और उसने संतों से पूछा- “आप में से जिनका नाम प्रेम है ,वे कृपया घर में प्रवेश कर भोजन ग्रहण करें।
प्रेम घर की ओर बढ़ चले। बाकी के दो संत भी उनके पीछे चलने लगे।
औरत ने आश्चर्य से उन दोनों से पूछा -“मैंने तो सिर्फ़ प्रेम को आमंत्रित किया था। आप लोग भीतर क्यों जा रहे हैं?”
उनमें से एक ने कहा– “यदि आपने धन और सफलता में से किसी एक को आमंत्रित किया होता तो केवल वही भीतर जाता। आपने प्रेम को आमंत्रित किया है। प्रेम कभी अकेला नहीं जाता। प्रेम जहाँ-जहाँ जाता है, धन और सफलता उसके पीछे जाते हैं। (हिन्दी ज़ेन से )

यदि आपके बच्चे सब्ज़ियाँ नहीं खाते


यदि आपके बच्चे सब्ज़ियाँ नहीं खाते

डॉ. विपुल कीर्ति शर्मा

सभी माँओं की एक ही कहानी है -मेरा बच्चा सब्ज़ियाँ नहीं खाता। उसे तो केवल क्रीम बिस्किट्स, चॉकलेट और आईसक्रीम ही चाहिए। और फिर शुरू होता है धमकी और रिश्वत का एक सौदा। माँ अपने बच्चे से कहती है कि जब तक तुम सब्ज़ी नहीं खाओगे, तब तक मिठाई नहीं मिलेगी। इस रणनीति में कुछ बच्चे आलू और भिंडी तो खाने के लिए  हाँ कर देते हैं और बाकी बेचारों को पालक, गिलकी, लौकी-कद्दू और टिण्डों की ज़बरदस्ती स्वीकार करते बड़ा होना पड़ता है।
हम सभी को मीठा पसंद है। मीठे की ओर आकर्षण हमें हमारे पूर्वज प्रायमेट्स से विरासत में मिला है। उस समय हमारे पूर्वज भी आज के बंदरों और वनमानुष की तरह खुशबूदार पके मीठे फलों को खोजते दिन बिताते थे। अधिक ऊर्जा और पानी के लिए पके और मीठे फल को कच्चे और कड़वे फल पर प्राथमिकता मिलती थी। पेड़ों पर पके मीठे फल मिलने पर पानी की खोज भी पूरी हो जाती थी।
तो आपका बच्चा अगर मिठाई की ओर ललचाई निगाह से देखता है ,तो इसमें बच्चे का दोष नहीं है। दोष है हमारे प्रायमेट पूर्वजों और उनको मिली परिस्थितियों का और हमारे आनुवंशिक लक्षणों का।
आज भी हमारे नज़दीकी रिश्तेदार चिम्पैंज़ी जंगलों में जब भी मधुमक्खी के छत्ते को देखते हैं, तो सैकड़ों मधुमक्खियों के दंश की परवाह न करते हुए शहद खाने के मौके को कभी भी हाथ से जाने नहीं देते। शहद को खाने की उत्कंठा चिम्पैंज़ियों में इतनी तीव्र होती है कि अफ्रीका के विभिन्न स्थानों पर पाए जाने वाले स्थानीय चिम्पैंज़ियों ने शहद को खाने के लिए उपयुक्त तरीके भी निकाल लिये हैं। पूर्वजों के समान अगर हम भी मीठे की ओर आकर्षित होते हैं , तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। यही कारण है कि मानव के पूर्वजों ने गन्ने को पूरे विश्व में फैला दिया है।
अधिकतर ज़हरीले भोज्य पदार्थ कड़वे होते हैं और हमारे पूर्वजों ने भी कड़वे पदार्थों से दूरी बनाना सीख लिया था। मीठे, खट्टे और नमकीन की तुलना में कड़वे पदार्थों के स्वाद के लिए मनुष्यों में अन्य सभी प्राणियों से 25 जीन्स अधिक पाए जाते हैं।
तो माँओं की यह चिन्ता  जायज़ है कि बच्चे सब्ज़ियाँ  नहीं खाते जो स्वास्थ्य के लिए आवश्यक हैं। कई प्रकार के खाद्य पदार्थ तो अधिकता में शरीर के लिए नुकसानदेह होते हैं। वसा एवं शर्करा ज्यादा मात्रा में लेने पर वे चयापचय को धीमा करते हैं, वज़न बढ़ाते हैं तथा धमनियों में जमा होकर उन्हें कठोर कर देते हैं, खासकर जब बच्चे खेलना-कूदना छोड़ देते हैं। तो क्या हम बच्चों को मिठाई की बजाय सब्ज़ी खाने के लिए तैयार कर सकते हैं। उत्तर है, हाँ।
विज्ञान की नई शाखा ऑप्टोजेनेटिक्स इसमें बहुत उपयोगी होगी। ऑप्टोजेनेटिक्स एक ऐसी तकनीक है जिसमें प्रकाश द्वारा जीवित ऊतक, खासकर जेनेटिक तौर पर बदले गए न्यूरॉन्स को प्रकाश संवेदी बनाकर कार्य करने के लिए उकसाया जाता है।
ऑप्टोजेनेटिक्स के भोजन सम्बन्धी कुछ प्रयोग फलों पर पाई जाने वाली छोटी एवं लाल आंखों वाली फ्रूट फ्लाय (ड्रॉसोफिला) पर किए गए हैं। मनुष्य को मीठे लगने वाले विभिन्न प्रकार के रसायन अन्य प्रजातियों के प्राणियों को भी मीठे लगें, यह ज़रूरी नहीं है। उदाहरण के लिए मनुष्यों द्वारा मीठे के लिए उपयोग किया जाने वाला रसायन एस्पार्टेम चूहों और बिल्लियों को मीठा नहीं लगता। आश्चर्यजनक रूप से मीठे के मामले में ड्रॉसोफिला एवं मानव की पसंद एक जैसी ही है। दोनों की पसंद इतनी मिलती है कि हमारे नज़दीकी रिश्तेदार कई बंदरों को भी वे चीज़ें मीठी नहीं लगती जो हमें और ड्रॉसोफिला को मीठी लगती हैं। यह भी पता लगा है कि मनुष्य एवं ड्रॉसोफिला दोनों के पूर्वज सर्वाहारी एवं मुख्य रूप से मीठे फल खाने वाले थे।
मीठे की तुलनात्मक अनुभूति कराने वाले रसायन में से 21 पोषक और अपोषक रसायन जो मानव को मीठे लगते हैं वे मक्खियों को कैसे लगते हैं यह जानने के लिए प्रयोग किए गए।
क्या स्वाद ग्रंथियाँ सब्ज़ियों का स्वाद लेने पर भी मस्तिष्क को मीठा खाने जैसी अच्छी अनुभूति दे सकती है? हाँ। इसे सिद्ध करने के लिए ड्रॉसोफिला पर एक प्रयोग किया गया। मक्खियों के उपयोग में लाए जाने वाले आयपैड (जिसे फ्लायपैड कहते हैं) का उपयोग किया गया। पैड के दो कक्षों में से एक में हरी ब्रोकली तथा दूसरे में केले का गूदा रखा गया। अब मक्खियों को छोड़कर यह देखा गया कि वे किस प्रकार का खाद्य पदार्थ पसंद करती हैं। मक्खी जिस खाद्य पदार्थ की ओर जाती थी फ्लायपैड उस परिणाम को आँकड़े के रूप में एकत्र कर लेता था। निष्कर्षों में यह पता चला कि मक्खियों ने भी बच्चों की तरह ब्रोकली की बजाय केले को मीठे स्वाद के कारण ज्यादा पसंद किया। ऐसा इसलिए हुआ ; क्योंकि मानव में जीभ पर पाए जाने वाली स्वाद कलिकाएँ  स्वाद ग्राहियों से बनी होती है ,जो विशेष न्यूरॉन्स होते हैं। जब भी जीभ पर भोज्य पदार्थ लगता है तो स्वाद ग्राही मस्तिष्क तक एक संदेश भेजते हैं। मीठे पदार्थ के अणु मीठे स्वाद ग्राहियों से जुड़कर तुरंत संदेश को मस्तिष्क में पहुँचाते हैं जिससे सुखद अनुभूति होती है। किन्तु ड्रॉसोफिला में ब्रोकली पदार्थ के अणु मीठे स्वाद ग्राहियों से नहीं जुड़ते। इस कारण मस्तिष्क को संदेश नहीं मिलते हैं। हम ब्रोकली के जीनोम में कुछ जीन जोड़कर उन्हें ऑप्टोजेनेटिक्स से ब्रोकली खाने पर भी मीठे होने जैसी अनुभूति दे सकते हैं।
नए जीन डालने पर ड्रॉसोफिला के स्वाद ग्राही के न्यूरॉन्स प्रकाश के प्रति संवेदी हो जाते हैं। अब प्रयोग में एक परिवर्तन किया गया। जब भी ड्रॉसोफिला ब्रोकली खाने के लिए आती है तभी एक लाल लाइट के जलने से मीठे स्वाद ग्राही मस्तिष्क को संदेश भेजते हैं। ब्रोकली खाने पर भी ड्रॉसोफिला को मीठे खाने जैसी ही अनुभूति होती है। प्रयोगों द्वारा पाया गया कि जीन परिवर्तित ड्रॉसोफिला अब ब्रोकली को भी केले के बराबर पसंद करने लगी थी।
क्या ऑप्टोजेनेटिक्स के द्वारा आपके बच्चे भी मिठाई की बजाय सब्ज़ियाँ  पसंद करने लगेंगे? कही नहीं जा सकता। लेकिन ऑप्टोजेनेटिक्स की सहायता से अब दृष्टिबाधित भी देखने लगे हैं और आने वाले समय में भूलने की समस्या का निदान भी ऑप्टोजेनेटिक्स द्वारा संभव हो जाएगा। (स्रोत फीचर्स)

गुरु पर करें गर्व

गुरु पर करें गर्व
- विजय जोशी
(पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल)
       भारतीय दर्शन में गुरु एक बहुत पवित्र शब्द है तथा इसे ईश्वर से भी ऊपर का दर्जा प्राप्त है। गुरु का पदप्रतिष्ठापैसा या ऊपरी तामझाम या आडंबर से कोई सरोकार नहीं। यह तो ज्ञानअनुभवआचरण एवं सदाशयता से जुड़ा पावन माध्यम है मंज़िल तक पहुँचने का। इसे केवल वही जानता या अनुभव कर पाता है जिसके जेहन में जिज्ञासा का भाव हो। इस संदर्भ में हाल ही में मेरे विद्वान् मित्र  ने एक पौराणिक प्रसंग साझा किया हैजो इस प्रकार है।
       नारद की भगवान्  विष्णु के बड़े भक्तों में गणना की जाती है। यदा कदा उन्हें भी अपनी भक्ति पर गर्व हो जाया करता था। यह बात विष्णु ली-भाँति जानते थे। एक बार उनके जाते ही भगवान्  विष्णु ने लक्ष्मी से नारद के बैठे स्थान को गोबर से लीपने को कहा। प्रस्थान कर रहे नारद ने यह बात सुन ली और अपना अप्रत्यक्ष अपमान समझते हुए जब कारण जानना चाहा, तो उत्तर मिला कि आप तो निगुरे यानी गुरु रहित हो। इसलिए ऐसा कहा।
       नारद ने सहमत होते हुए कहासत्य वचन प्रभु। पर मैं गुरु बनाऊँ तो बनाऊँ किसे।
       विष्णु ने कहाधरती पर जाओ और जिस व्यक्ति से सर्वप्रथम भेंट हो, उसे ही अपना गुरु मान लो।
       यह बात सुनकर नारद जब धरती पर पधारे, तो उनका सबसे पहले सामना हुआ एक मछुआरे से। नारद निराश होकर फिर विष्णुजी  के पास पहुँचे और कहाभगवन् ! वह तो कुछ भी नहीं जानता। उसे कैसे अपना गुरु मानूँ।
       विष्णु ने कहा-पहले अपना प्रण पूरा करो।
       नारद लौट आ और किसी तरह से बड़ी मुश्किल से उसे राजी करने के बाद फिर भगवान् विष्णु के पास पहुँचे तथा कहाहे भगवान् ! उसे तो कुछ भी नहीं आता। अब क्या करूँ। यह सुनते ही विष्णु को क्रोध आ गयानारद तुम्हारा अहंकार अभी गया नहीं। गुरु की निंदा करते हो। जाओ शाप है -अब तुम्हें 84 लाख योनियों में घूमना पड़ेगा।
       नारद घबरा गए– भगवन स्वीकार पर साथ ही मुक्ति का उपाय तो बतलाइए।
       विष्णु ने कह -उपाय तो अपने गुरु से ही पूछो।
       नारद लौट ग और सारी बात अपने गुरु से साझा करते हुए उपाय पूछा, तो गुरु रूपी मछुआरे ने कहायह तो बड़ा सरल है। आप 84 लाख योनियों की तस्वीर बनाकर उन पर लेट कर गोल घूम लेना और जाकर अपने भगवान् को बता देना।
       नारद ने ठीक ऐसा ही किया और फिर विष्णुजी के पास उपस्थित होकर सारी बात बताते हुए अपनी मुक्ति निवेदन दुहराया। यह सुनकर विष्णुजी ने कहादेखा तुमने, जिस गुरु की निंदा की उसी ने तुम्हें शाप से बचाया। अब समझे गुरु महिमा अपरंपार है।
       बात भले ही पौराणिक कल्पना की कड़ी हो; पर सारगर्भित है। गुरु का आकलन गुणों से करते हुए उनका पूरा सम्मान करना चाहिए। इसमें शिष्य का कल्याण है। गुरु के वचन पर विश्वास रखने वाले का सदा भला होता है।
गुरु गूँगे गुरु बावरे गुरु के रहिए दास,
गुरु जो भेजे नरकहींस्वर्ग की रखि आस।
सम्पर्क: 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास), भोपाल- 462023, मो. 09826042641, E-mail- v.joshi415@gmail.com