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Jul 12, 2018

संस्कार हमारी थाती

संस्कार हमारी थाती
चन्द्रप्रभा सूद
संस्कार पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तान्तरित किए जाते रहते हैं। उनसे ही मनुष्य के कुल या परिवार की एक पहचान बनती है। मनुष्य अपने संस्कारों की बदौलत अस्तित्व में आता है। उसके संस्कार ही इस समाज में उसे महान बनाते हैं और एक सुनिश्चित स्थान भी देते हैं। संस्कारों से बढ़कर अन्य कोई और दौलत मनुष्य के लिए महत्त्वपूर्ण नहीँ हो सकती।
कुछ दशक पूर्व तक लोग अपने बच्चों का रिश्ता तय करने के समय उनके संस्कारों को महत्त्व देते थे, धन-सम्पत्ति को नहीं। ऐसे परिवार में सम्बन्ध जोडऩा वास्तव में सौभाग्य मन जाता था। इसका कारण यह था कि ऐसे बच्चे परिवार के विरुद्ध जाकर कुछ अनर्थ नहीं कर सकते। वे बच्चे परिवार की मर्यादा को खण्डित करने वाला कोई कार्य नहीं कर सकते। उन पर परिवार का पूरा दबाव बना रहता है। वे भी अपने बड़े-बुजुर्गों का मान रखने वाले होते हैं।
इस सच्चाई से कदापि मुँह नहीं मोड़ा जा सकता कि संस्कारविहीन मनुष्य को धरातल पर पटक देने में लोग देर नहीं करते। जिन लोगों में सत्सस्कारों तथा आचरण की कमी होती है, वही सामने वाले को किसी--किसी बहाने से नीचा दिखाने का प्रयास करते हैं। वे लोग अपने मिथ्या अभिमान के कारण स्वयं को किसी भी तरह ईश्वर से कम नहीं समझते।
भारतीय संस्कृति के अनुसार घर पर आया हुआ अतिथि ईश्वर का ही रूप होता है, उसका अपमान कभी नहीं करना चाहिए। यदि उसका अपमान कोई मनुष्य करता है ,तब उसका अपमान यह समाज करता है। किसी के भी प्रति अपने मन में दुर्भावना नहीं रखनी चाहिए। अपने मन में जो कुछ है, उसे बिना लाग लपेट के स्पष्ट कह देना चाहिए, तभी मनोमालिन्य दूर होने की सम्भावना रहती है। इसका कारण कह सकते हैं कि सच बोलने से फैसले किए जाते हैं और झूठ बोलने पर धीरे-धीरे फासले बढऩे लगते हैं।
मनुष्य को अपने संस्कारों पर सदा मान और भरोसा होना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति उसे क्रोध दिलाकर संस्कार विमुख करने का प्रयास करे भी, तो उसकी चाल में उसे फँसना नहीं चाहिए। परन्तु यदि उसका विरोधी अपने उद्देश्य में सफल हो जाता हैं, तो समझ लेना चाहिए कि उसके हाथ की कठपुतली बनने में उसे देर नहीँ लगेगी। ऐसी स्थिति वास्तव में बहुत ही दुखदायी होती है।
इसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति जाने-अनजाने नजरअन्दाज कर रहा है तब भी उसका बुरा नहीं मानना चाहिए। यह सब उसकी मजबूरी हो सकती है। इस बात को सदैव स्मरण रखना चाहिए अथवा गाँठ बाँधकर रखना चाहिए कि अपनी हैसियत से बाहर आने वाली प्राय: सभी महँगी वस्तुओं को लोग अनदेखा कर देते हैं। फिर उस व्यक्ति विशेष की महानता के विषय में सोचकर ही शायद उसकी  ओर हाथ नहीं बढ़ाते। इसलिए नाराज होने के स्थान पर उससे सहानुभूति का भाव रखना चाहिए। यदि उचित समझो तो हाथ बढ़ाकर उस इंसान को उपकृत करने का प्रयास स्वयं किया जा सकता है।
संस्कारी या सुसंस्कृत लोग अपनी गलती को स्वीकार करने में कभी देर नहीं करते। उसके लिए किसी बच्चे से भी यदि उन्हें क्षमा माँगनी पड़े, तो वे कदापि संकोच नहीं करते। वे अपने कर्त्तव्यों के प्रति सदा सावधान रहते हैं। यदि उनसे कोई अपराध हो जाए, तो उसे त्यागने में कभी देर नहीँ करते। वे जानते हैं कि यात्रा जितनी लम्बी हो जाएगी, वहाँ से वापसी उतनी ही कठिन हो जाती हैं।
संस्कारी और असंस्कारी लोगों के आचार-व्यवहार में अन्तर बिना प्रयास के ही दिखाई देता है। अपने आसपास ही दोनों प्रकार के लोगों से वास्ता पड़ता ही रहता है। संस्कार कभी मनुष्य को नीचा नहीं देखने देते। वे उत्तरोत्तर उसकी मानसिक तथा आत्मिक उन्नति करते रहते हैं। अच्छे संस्कार मनुष्य की थाती होते हैं। यानी वे उसकी सबसे बड़ी पूँजी होते हैं। इन्हें यथासम्भव सहेजकर रखना चाहिए, इन जीवन मूल्यों को कभी अपने से दूर नहीं होने देना चाहिए।

जीवन यापन की जापानी पद्धति

जीवन यापन की जापानी पद्धति
- विजय जोशी
(पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल)

 जापान जिम्मेदारी, जागरूकता एवं जज़्बे का दूसरा नाम है। एक आम जापानवासी भी अपने ध्येय के प्रति पूरी तरह सतर्क एवं समर्पित रहता है। यही वह विशेषता है जिसके कारण तमाम भौतिक असुविधा और आपदाओं के बीच भी यह देश सिद्धांतों के मामले में भी दुनिया का सिरमौर बनकर उभरा है।
वहाँ की जीवन पद्धति के कुछ सूत्रों को जानने का सौभाग्य मुझे हाल ही में प्राप्त हुआ, जो इस प्रकार हैं -
(1) क्या आप जानते हैं कि वहाँ के बच्चे प्रतिदिन शिक्षकों के साथ मिलकर पहले आधे घंटे साफ सफाई करते हैं। इसी गुण के कारण उस नई पीढ़ी का निर्माण हुआ जो नम्र होने के साथ ही साथ स्वच्छता के प्रति समर्पित भी है।
(2) क्या आप जानते हैं कि जिन जापानियों के पास कुत्ते हैं, वे एक प्लास्टिक का बैग साथ लेकर चलते हैं, ताकि उसमें अपने पालतू का निष्कासन भर सकें। स्वच्छता (Hygiene) स्वच्छता  के प्रति उत्सुकता और समर्पण जापानी आचार व्यवहार (Ethics) का एक अंग है।
(3) क्या आप जानते हैं कि वहाँ सफाई कर्मचारी को हेल्थ इंजीनियर कहा जाता है, जिसकी मासिक आय 5 हजार से 8 हजार अमरीकी डॉलर के समकक्ष होती है तथा उसे लिखित मौखिक परीक्षा से गुजरने पर ही नौकरी मिलती है।
(4) क्या आप जानते हैं कि जापान के पास कोई प्राकृतिक सम्पदा नहीं है तथा उन्हें भूकंप जैसी आपदाओं का खतरा सदैव बना रहता है, लेकिन इसके बावजूद उन्हें संसार की दूसरी सबसे बड़ी अर्थ व्यवस्था बनने से कोई नहीं रोक सका।
(5) क्या आप जानते हैं कि एटमिक त्रासदी को झेलने के बाद केवल एक दशक में जापान पूर्ववत जीवंत (Vibrant) अर्थ शक्ति के रूप में उभर आया।
(6) क्या आप जानते हैं कि जापानियों के लिए ट्रेन, रेस्टोरेंट जैसी सार्वजनिक जगहों पर मोबाइल फोन का प्रयोग प्रतिबंधित है।
(7) क्या आप जानते हैं कि वहाँ कक्षा 1 से 6 तक के छात्रों के लिये मानवीय संबंधों में आचार व्यवहार (Ethics) का ज्ञान आवश्यक है।
(8) क्या आप जानते हैं कि इस समुदाय की संसार के धनी वर्ग में गणना होने के बावजूद उनके घर में कोई नौकर नहीं होता। वे अपने काम स्वयं करते हैं।
(9) क्या आप जानते हैं कि उनके यहाँ प्राथमिक स्तर पर कोई परीक्षा नहीं होती। उनका लक्ष्य तो बच्चों में चारित्रिक गुणों का विकास है।    
(10) क्या आप जानते हैं कि बुफेवाले रेटोरेंट में जाने पर आप पाएँगे कि वहाँ कोई भी जूठा नहीं छोड़ता। वे आवश्यकता से अधिक कभी नहीं लेते ,भले ही वह मुफ्त ही क्यों हो।
(11) क्या आप जानते हैं कि जापान में ट्रेन लेट होने की अधिकतम सीमा मात्र 7 सेकंड प्रति वर्ष है। उन्हें समय की कीमत मालूम है तथा वे समय के मामले में बेहद समयनिष्ठ (Punctual) हैं।
(12) क्या आप जानते हैं कि वहाँ बच्चे स्कूल में भोजन समाप्ति पश्चात् नियमित ब्रश करते हुए दाँत अवश्य साफ करते हैं। वे स्वास्थ्य के प्रति बचपन से ही जागरूक रहते हैं।
(13) क्या आप जानते हैं कि वहाँ बच्चे धीमी गति से लगभग आधे घंटे में अपना भोजन समाप्त करते हैं ,ताकि वह ठीक से पच भी सके। पूछा जाने पर एक जापानी ने उत्तर दिया कि बच्चे हमारी धरोहर तथा हमारे देश का भविष्य हैं।
मित्रो ! यही वहाँ के निवासियों के वे गुण हैं ,जिनके कारण उनका देश महान है। ये पल हमारे लिये आत्म निरीक्षण एवं परीक्षण दोनों के हैं।
सम्पर्कः 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास), भोपाल- 462023, मो. 09826042641, E-mail- v.joshi415@gmail.com