मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।

Feb 22, 2012

नाव से दुनिया का अकेले चक्कर लगाने वाली किशोरी लारा डेक्कर

अगर हौसलों में दम हो तो कोई आपको अपने सपनों को पूरा करने से नहीं रोक सकता। नीदरलैंड की 16 वर्षीय लारा डेक्कर ऐसी ही युवती है जिसने अपना सपना पूरा किया। उसने 518 दिनों में नाव से अकेले पूरी दुनिया का चक्कर लगाया और ऐसा करने वाली सबसे कम उम्र की युवती होने का रिकॉर्ड बनाया। लारा ने अपनी यह यात्रा 38 फीट लंबी नौका 'गुप्पी यॉट' में 20 जनवरी 2011 को प्रारंभ की थी। वास्तव में लारा यह यात्रा 14 साल की उमर में ही करना चाहती थी परंतु लॉरा तब उसे समुद्री सफर की घोषणा के बाद कई कानूनी अड़चनों का सामना करना पड़ा था। उस समय अदालत ने उसकी कम उम्र को देखते हुए उसके अकेले नौका से दुनिया की यात्रा करने के अभियान पर रोक लगा दी थी। लेकिन लारा ने हार नहीं मानी और अब उसने अपनी यह यात्रा पूरी कर ली है।
खास बात यह है कि लॉरा डेक्कर का जन्म 20 सितंबर 1995 नीदरलैंड में अपने माता-पिता की बोट पर ही हुआ था। बचपन से ही उसने नाविक के तौर पर पूरी दुनिया घूमने का सपना देखा था। वे इस सफर में कैनरी द्वीप, पनामा, फिजी, बोरा बोरा, आस्टे्रलिया, दक्षिण अफ्रीका और सेंट मार्टिन से गुजरीं हैं। लारा से पहले यह रिकॉर्ड लारा की उम्र से कुछ बड़ी आस्ट्रेलिया की जेसिका वाटसन के नाम रहा है जिसने नाव से 210 दिनों में दुनिया का चक्कर लगाया था।

विज्ञान की रक्षक भूमिका

- भारत डोगरा
जलवायु बदलाव की समस्या बहुत आगे जा चुकी है व संतोषजनक समाधान के लिए बहुत कम समय बचा है, अत: वैज्ञानिकों से कुछ अधिक सक्रिय रक्षक भूमिका निभाने की उम्मीद है।
जैसे- जैसे पर्यावरण विनाश व उसमें भी विशेषकर जलवायु बदलाव के संकट की गंभीरता और स्पष्ट होती जा रही है, वैसे- वैसे यह एहसास भी बढ़ रहा है कि आगामी दिनों में विज्ञान व वैज्ञानिकों को बहुत गंभीर चुनौतियों का सामना करना होगा। तेजी से विकट होते पर्यावरणीय संकट के इस दौर में धरती पर जीवन की रक्षा ही सबसे बड़ी चुनौती बनने वाली है और इस चुनौती का सामना करने में वैज्ञानिकों की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण होगी।
निश्चय ही वैज्ञानिकों ने जलवायु बदलाव पर गहराते संकट के बारे में चेतावनी देकर धरती पर जीवन को बचाने के प्रयास में एक महत्त्वपूर्ण रक्षक की भूमिका निभाई है। यह एक उपलब्धि तो है, पर यदि वैज्ञानिक यह चेतावनी दो- तीन दशक पहले दे देते तो जलवायु बदलाव के संकट को समय पर नियंत्रित कर पाने की संभावना बढ़ जाती।
वैज्ञानिक अपनी इस उपलब्धि पर गर्व कर सकते हैं कि उन्होंने जलवायु बदलाव के बड़े खतरे के बारे में चेतावनी देकर दुनिया को ग्रीनहाऊस गैसों के उत्सर्जन को कम करने की जरूरत के बारे में सचेत किया, पर साथ ही वैज्ञानिक समुदाय को इस बारे में आत्म- मंथन भी करना होगा कि आखिर यह चेतावनी देने में उन्हें देरी क्यों हुई? ऐसे आत्म- मंथन में कहीं न कहीं यह निष्कर्ष निकलने की संभावना है कि जन- हित व धरती पर तरह- तरह के जीवन के हित के मामलों के प्रति विज्ञान व वैज्ञानिकों में और प्रतिबद्धता की जरूरत है। यदि तरह- तरह के व्यावसायिक व अन्य संकीर्ण हितों के स्थान पर विज्ञान की इस रक्षक भूमिका को उच्चतम प्राथमिकता दी जाए तो इसके बहुत सार्थक परिणाम मिलेंगे। यह तो सब जानते हैं कि ग्रीनहाऊस गैसों के उत्सर्जन को कम करने सम्बंधी जरूरी निर्णय विभिन्न देशों के नेतृत्व को विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय समझौतों के अनुसार करने हैं। इसमें बहुत समस्याएं आ रही है। ऐसा नहीं है कि वैज्ञानिक समुदाय सर्वसम्मति से कोई महत्त्वपूर्ण सिफारिश करे तो उसे मान लिया जाएगा।
इसके बावजूद वैज्ञानिकों की भूमिका कुछ महत्त्वपूर्ण है चूंकि यह सारा मामला मूलत: विज्ञान का ही है। अत: इस विषय के विशेषज्ञ वैज्ञानिक कुछ भी सर्वसम्मति से कहेंगे तो उसकी उपेक्षा करना आसान नहीं होगा। एक अच्छी बात तो यह हो ही चुकी है कि जलवायु बदलाव पर एक अंतर्राष्ट्रीय पैनल बन चुका है जिसकी रिपोर्ट समय- समय पर आती रही है। कभी- कभी इन रिपोर्टों पर कुछ विवाद भी उठे हैं, पर कुल मिलाकर इन रिपोर्टों ने इस मुद्दे पर विश्व चेतना जगाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अब समय आ गया है कि ऐसी रिपोर्टों को और भी अधिक मेहनत व निष्ठा से, और भी अधिक सावधानी व निष्पक्षता से तैयार किया जाए ताकि विश्व को बहुत स्पष्ट व विश्वसनीय चेतावनी मिल जाए कि इस सर्वाधिक चिंताजनक समस्या के समाधान के लिए हमारे पास कितना समय बचा है। चूंकि जलवायु बदलाव की समस्या बहुत आगे जा चुकी है व संतोषजनक समाधान के लिए बहुत कम समय बचा है, अत: वैज्ञानिकों से कुछ अधिक सक्रिय रक्षक भूमिका निभाने की उम्मीद है। इसकी बहुत जरूरत भी है। यदि वैज्ञानिक व्यापक सहमति के आधार पर अपनी ओर से ठोस समाधान प्रस्तुत करेंगे तो यह काफी उपयोगी हो सकता है। उदाहरण के लिए वैज्ञानिक ऐसी रिपोर्ट तैयार कर सकते है कि यदि हथियारों का उत्पादन रोक दिया जाए तो इससे ग्रीनहाऊस गैसों का उत्सर्जन जितना कम होगा या यदि विलासिता की वस्तुओं का उत्पादन आधा कर दिया जाए तो इससे जीवाश्म र्इंधन का उपयोग व इसके साथ ग्रीनहाऊस गैसों का उत्सर्जन कितना कम होगा। वरिष्ठ वैज्ञानिकों की हस्ताक्षर वाली ऐसी रिपोर्ट आएगी तो अनुकूल जनमत तैयार करने में कुछ मदद मिलेगी। जनमत तैयार करने में पर्यावरण आंदोलनों की बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका है। अत: वैज्ञानिकों को पर्यावरण आंदोलन के और नजदीक आना चाहिए। इस तरह उनकी रक्षक भूमिका और मजबूत हो सकेगी। केवल जलवायु बदलाव के संदर्भ में ही नहीं, अनेक अन्य संदर्भो में भी वैज्ञानिकों के सहयोग से व उनकी सक्रिय भूमिका से पर्यावरण आंदोलन को बहुत मदद मिल सकती है। दूसरी ओर, पर्यावरण आंदोलन जो व्यापक जनमत व जनशक्ति तैयार करते हैं, उससे वैज्ञानिकों को अपनी निष्पक्ष सलाह स्वतंत्रता से देने में मदद मिलती है।

रंग- बिरंगी दुनिया

मकड़ी के सिल्क से बना अनूठा लबादा
मकडिय़ों के जाले से बने गोल्डन सिल्क को हाथ से बुनकर बनाया गया यह संभवत: दुनिया में अपनी तरह का अनूठा बेशकीमती लबादा है। यह वस्त्र हथकरघे पर मैडागास्कर में पाए जाने वाले आर्ब नामक मकड़े से मिलने वाली रेशम से बुना गया है। इस वस्त्र को बनने में आठ वर्ष का समय लगा है।
इस लबादे का प्रदर्शन पिछले दिनों न्यूयार्क के संग्रहालय में किया गया था। शाल के लिए सिल्क निकालने में दस लाख गोल्डन आर्ब मकडिय़ों इस्तेमाल में लाई गईं। ये मकडिय़ां मेडागास्कर द्वीप में पाई जाती हैं। गोल्डन आर्ब प्रजाति की मादा मकडिय़ां ही सिल्क का उत्पादन करती हैं। इस सिल्क का धागा सुनहरा और बेहद मजबूत होता है।
गोडली ने कहा, मुझे लगता है हमने दुनिया के समक्ष कला और इंसानी कोशिशों का बेहतरीन नमूना पेश किया है। यह मकड़ी जहरीली नहीं होती। इस कारण इन्हें पालना आसान होता है। बुनकर इनके जालों को अलग कर सिल्क का धागा तैयार करते हैं। एक मकड़ी चार सौ यार्डस (करीब 365 मीटर) सुनहरा धागा बनाने में सक्षम होती है। गोडली ने बताया कि 14 हजार मकडिय़ां मिलकर 2.6 पाउंड (करीब सवा किलो) धागा तैयार करती हैं। पीयर्स ने बताया कि उनकी जानकारी में मकड़ी के सिल्क से आज तक सिर्फ दो वस्त्र बनाए गए हैं जो सिर्फ कुछ सेमी लंबे हैं। वे फ्रांस के लियोंस संग्रहालय में रखे हुए हैं।

...और बदल गई भिखारी बच्चे की तकदीर!

कभी रेलगाडिय़ों में झाडू लगाकर भीख मांगने वाले बच्चे शेरू की तकदीर ने ऐसी करवट ली कि घर से बिछड़ कर वह ऑस्ट्रेलिया के एक करोड़पति दंपत्ति के घर गोद चला गया। 25 साल में उसने वह सब कुछ पाया, जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी लेकिन कमी थी तो सिर्फ अपनी माँ की। माँ की ममता उसे सात समंदर पार महलों से अपने झोपड़े में खींच लाई।
खंडवा के गणेशतलाई क्षेत्र की गरीब बस्ती में फिल्मों की तर्ज पर हुए इस वाकये ने सबको अचंभे में डाल दिया। हुआ यूँ कि फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाला एक विदेशी युवक महंगा मोबाइल और एक पुरानी तस्वीर हाथ में लिए फातमा बी यानी अपनी माँ का घर ढूंढ रहा था। उस युवक और फातमा का क्या सम्बन्ध है यह किसी को भी समझ नहीं आया...इस बीच लोगों ने उसे फातमा के घर पहुंचा दिया। जैसे ही मां- बेटे आमने सामने हुए पच्चीस साल पहले बिछड़े बच्चे ने अपनी माँ को तुरंत पहचान लिया, वहीं माँ को भी अपने कलेजे के टुकड़े को पहचानने में कोई देर नहीं लगी।
माँ कमला उर्फ फातमा का कहना है कि हमारे दिन बहुत गरीबी में गुजरे। उसके पिता मुंशी खान ने उसे बच्चों सहित छोड़ दिया था। बेहद गरीबी में बच्चे ही टे्रन में झाड़ू लगाते हुए भीख मांगकर परिवार का पेट पाल रहे थे। एक दिन ट्रेन में शेरू को पता नहीं कब झपकी लग गई और नींद में वह कलकत्ता चला गया, इधर उसका बड़ा भाई गुड्डू बुरहानपुर के पास ट्रेन से गिरकर कट गया।
शेरू को कलकत्ता में नवजीवन नामक संस्था ने नया जीवन दिया उसे कुछ दिन वहां रखने के बाद ऑस्ट्रेलिया की एक करोड़पति संतानहीन दंपत्ति को गोद दे दिया। उसका नाम शेरू से सारू ब्रिएर्ले हो गया। केनबेरा विश्वविद्यालय से ग्रेजुएट होने के बाद सारू ने अपने पिता जॉन ब्रिएर्ले की अग्रोबेस इंडस्ट्री का कामकाज संभाला।
इतना सब बदल जाने के बाद भी सारू के दिमाग में खंडवा की यादें बराबर बनी हुई थीं। सारू ने गूगल पर खंडवा को खोज निकाला। अपनी माँ और परिवार से मिलना यकीनन ऊपर वाले का चमत्कार ही है। आज सारू के पास सुख- सुविधाओं की कोई कमी नहीं है उसका आलीशान बंगला है, महंगी निसान कार है और ब्रिएर्ले दंपत्ति का भरपूर प्यार भी पर जन्म देने वाली माँ से मिलने की छटपटाहट ही थी कि उसे खंडवा खींच ही लाई।

Feb 2, 2012

बांसुरी की तान

-   चाँद  शेरी
इरादे की अटल चट्टान देगा,
हमें खुद हौसला तूफान देगा।
वो दिन कब आएगा जब वक्त हमको,
हमारी गुमशुदा मुस्कान देगा।
मेरे मोती से जानो- दिल के बदले,
मुझे अश्कों का वो वरदान देगा।
कहां अब पॉप म्यूजि़क का जमाना,
किशन की बांसुरी की तान देगा।
धरम कोई भी हो देगा मुहब्बत,
मुहब्बत ही हमें ईमान देगा।
उसे हम अमन का पैगाम देंगे,
हमें जो जंग का मैदान देगा।
लहू बहता है जो दुनिया में 'शेरी'
वो तेरी नज्म को उनवान देगा।
लम्बी कतार
एक लम्बी कतार बाक़ी है,
मुफलिसों की पुकार बाक़ी है।
सूद ही सूद में बिका सब कुछ,
जो लिया था उधार बाक़ी है।
कत्ल मासूम हो गए लाखों,
फिर भी खन्जर की धार बाक़ी है।
नींद तो उड़ गई धुआं बन कर,
जलती बुझती सिगार बाक़ी है।
बस यही गम गुसार है मेरा,
हाथ में जो सितार बाक़ी है।
रौनकें कारवां के साथ गईं,
धूल उड़ाता गुबार बाक़ी है।
आदमीयत तो मर गई 'शेरी'
अब तो उसका मज़ार बाक़ी है।
संपर्क- के-30, आई.पी.आई.ए., रोड नं.1
कोटा 324005 (राज) मो. 09829098530
Email. chandsheri@yahoo.com.in

बूंद-बूंद से बना 'समंदर'

आगरा की एक युवती ने इस पुरानी कहावत को सही साबित कर दिखाया कि बूंद-बूंद से समंदर बनता है। दो साल पहले उसने 500 गुल्लक आगरा की इतनी ही दुकानों पर रखे थे और सभी से सिर्फ एक रुपये प्रतिदिन इसमें डालने का अनुरोध किया था। एक-एक रुपये से आज उनके पास करीब ढाई लाख रुपये एकत्र हो चुके हैं।
उनका मकसद इन पैसों से एक ऐसे अस्पताल का निर्माण करना था, जहां गरीबों को उचित चिकित्सा सुविधा मिल सके। उनका यह सपना हालांकि अब तक पूरा नहीं हो सका है, लेकिन वह अपने इस प्रयास से पहले ही एक जिंदगी बचा चुकी हैं। यह कारनामा कर दिखाने वाली हैं आईटी पेशेवर सपना अग्रवाल, जिनकी उम्र अभी 30 साल भी पूरी नहीं हुई है।
सपना ने 'माले वेलफेयर सोसाइटी' नाम से अपना गैर- सरकारी संगठन बनाया और एक- एक सिक्के के रूप में मिले अनुदान को एकत्र करना शुरू किया। सपना का कहना है कि सिर्फ एक बूंद नाकाफी हो सकती है, लेकिन जब कई बूंद मिल जाती है तो वे बारिश की तरह खुशी व जीवन के लिए सहायक साबित होती हैं। सपना को इस काम की प्रेरणा दो साल पहले तब मिली थी जब उनके माता- पिता बीमार थे और शहर में खराब चिकित्सा व्यवस्था की वजह से उन्हें समुचित इलाज नहीं मिल पाया। इसके बाद उन्होंने आगरा में विश्वस्तीय अस्पताल बनाने का निर्णय लिया, जहां गरीबों को नि:शुल्क इलाज मिल सके।
उनका यह सपना हालांकि अब तक पूरा नहीं हो पाया है, लेकिन पिछले दो साल में एकत्र हुए करीब ढाई लाख रुपये से वह एक गरीब परिवार की युवती को बचा चुकी हैं, जो हृदय रोग की वजह से पिछले करीब आठ साल से बिस्तर पर थी। 20 वर्षीया कंचन के हृदय के बाल्व में गड़बड़ी थी। उसकी मां कमलेश बेटी को बचाने के लिए हर जगह गईं लेकिन उन्हें मदद मिली तो सपना से। सपना ने अपने गैर सरकारी संगठन के जरिये कंचन के इलाज के लिए वित्तीय सहायता मुहैया कराई। परिणामस्वरूप उसका ऑपरेशन हो सका। लेकिन बेटी को पूरी तरह ठीक रखने के लिए कमलेश को और पैसों की जरूरत है, जिसके लिए सपना ने लोगों से मदद का आह्वान किया है। हमें विश्वास है सपना का सपना जरूर पूरा होगा।