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Nov 27, 2010

डिजाइनर कपड़ों के युग में कोसा कारीगरी

डिजाइनर कपड़ों के युग में कोसा कारीगरी
- नीलाम्बर प्रसाद देवांगन

छत्तीसगढ़ में कोसा से बने कपड़े का हर साल लगभग 400 से 500 करोड़ का व्यवसाय होता है। राज्य में उत्पादित हो रहे कोसे की खरीदी यदि प्रदेश में ही की जाए तो राजस्व में वृद्धि होने के साथ ही लोगों को कोसा का सही दाम भी मिलेगा।
कोसा से बने वस्त्रों का नाम सुनते ही हर किसी के आंखों की चमक बढ़ जाती है। दरअसल कोसा हमारी परंपरा से जुड़ा हुआ नाम है। ऐसे में कोसा कारीगरी युक्त वस्त्र बाजारों की शोभा बन रहे हैं। आज सबसे ज्यादा किस्में, सबसे ज्यादा डिजाइन, सबसे ज्यादा प्रतिस्पर्धा किसी उद्यम में है तो वह वस्त्र उद्योग में ही है। हर मौसम में हमारा पहनावा बदल जाते है, समुन्दर की लहरों की तरह फैशन आते हंै और चले जाते हैं। यह सिलसिला चलता ही रहता है और चलता ही रहेगा।
हमारे देश में कुटीर उद्योग के रूप में हाथकरघा वस्त्र उद्योग का महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि कृषि के बाद सबसे ज्यादा लोगों के रोजगार का सृजन इसी उद्योग के माध्यम से होता है। किन्तु वैश्वीकरण के युग में यक्ष प्रश्न यह है कि आज गलाकाट प्रतिस्पर्धा एवं बहुराष्ट्रीय कंपनियों के चकाचौंध में हाथकरघा वस्त्र उद्योग को कैसे जीवित रखा जाए। पर खुशी की बात है कि हाथकरघा वस्त्र उद्योग ने कठिनाइयों के दौर से गुजरते हुए भी अपने आप को जीवित रखा है।
हमारे देश में कुटीर उद्योग को संरक्षित कर जीवित रखने रखने का मतलब, देशवासियों को संरक्षित कर जीवित रखना है। हम अपने देश के 100 अरब से भी ज्यादा आबादी को बड़े- बड़े उद्योगों के माध्यम से रोजगार देकर उनका भरण पोषण नहीं कर सकते इसलिए लघु एवं कुटीर उद्योग ही एक ऐसा उद्यम है जिसके माध्यम से हम ज्यादा से ज्यादा लोगों को रोजगार दे सकेंगे और भरण पोषण कर सकेंगे। अत: लघु एवं कुटीर उद्योगों को पर्याप्त संरक्षण एवं सहायता दिया जाना नितान्त आवश्यक है। अन्यथा देश में बेरोजगारी एवं भूखमरी का भयावह संकट पैदा हो जाएगा।
लघु एवं कुटीर उद्योगों को पर्याप्त संरक्षण एवं वित्तीय सहायता देकर ही इस क्षेत्र के उद्यमियों को उन्नत तकनीकी प्रशिक्षण, उन्नत उपकरण द्वारा उत्पादित वस्त्रों के माध्यम से सीधे उपभोक्ताओं से जोडऩा होगा, ताकि उद्यमियों को ज्यादा से ज्यादा लाभ मिल सके। वैसे किसी भी उत्पाद के लिए मार्केटिंग की व्यवस्था सुनिश्चित करना अति आवश्यक होता है। उद्योग में सबसे ज्यादा समस्या मार्केटिंग की होती है यदि छत्तीसगढ़ के कोसा उद्योग की मार्केटिंग की बात करें तो यहां ज्यादा समस्या नहीं है। यहां का कोसा उत्पाद ऐसा है जो हाथों हाथ बिकता है। छत्तीसगढ़ के कोसा वस्त्र देशी और विदेशी बाजार में भी विख्यात है यही वजह है कि कोसा वस्त्रों की मांग अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में भी दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है।
समय के साथ कोसा कपड़ों के डिजाइन में परिवर्तन होने लगा है। कोसा कपड़े में भी सिंथेटिक कपड़ों के समान रंगीन, कसीदाकारी युक्त उडिय़ा बार्डर और ब्लीच्ड कपड़ों का आकर्षण लोगों को कोसा कपड़ों की ओर खींचने लगा है। मौसम कोई भी हो हर मौसम के अनुकूल कोसा का निर्माण हो रहा है इसमें कोसा सूटिंग- शर्टिंग, धोती- कुर्ता, सलवार- सूट और साडिय़ों का विशाल कलेक्शन बाजार में उपलब्ध है। आज कोसा कपड़ा न केवल पूजा- पाठ के समय पहनने वाला कपड़ा माना जाता है वरन अनेक अवसरों, आयोजनों में पहनने का कपड़ा बन गया है। इन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचकर आर्थिक सम्पन्नता हासिल की जा रही है। आज देश के सभी बड़े शहरों दिल्ली, मुम्बई, चेन्नई, कलकत्ता, बेंगलोर, हैदराबाद, सिकंदराबाद, अहमदाबाद, नागपुर, जबलपुर, इंदौर, भोपाल, विशाखापट्टनम, जयपुर, नेपाल आदि में कोसे का व्यवसाय फैला हुआ है। अत: यह कहा जा सकता है कि हाथकरघा वस्त्र उद्योग का भविष्य उज्जवल है।
छत्तीसगढ़ में कोसा से बने कपड़े का हर साल लगभग 400 से 500 करोड़ का व्यवसाय होता है। राज्य में उत्पादित हो रहे कोसे की खरीदी यदि प्रदेश में ही की जाए तो राजस्व में वृद्धि होने के साथ ही लोगों को कोसा का सही दाम भी मिलेगा। इससे उत्साहित होकर कोसा उत्पादक किसान और अधिक मेहनत करेंगे। विभागीय सूत्रों के अनुसार देश में सत्रह हजार लूम हैं जिनमें बुनकर काम करते हैं। इन बुनकरों को प्रतिवर्ष कुल दस करोड़ कोसे की जरूरत होती है, लेकिन उन्हें सिर्फ ढाई करोड़ कोसा ही उपलब्ध हो पाता है। 75 प्रतिशत कोसा धागा यहां के बुनकरों को बाहर से खरीदना पड़ता है। राज्य के छह जिलों वाले बुनकरों को प्रतिवर्ष 18-20 करोड़ का धागा खरीदना पड़ता है। इन बुनकरों को यदि पूरा कोसा यहीं उपलब्ध हो जाए तो उन्हें अपना व्यवसाय करने में आसानी होगी। भले ही उन्हें कोसे से धागा बनाने में समय थोड़ा ज्यादा लगेगा, लेकिन उन्हें काम करने में सुविधा होगा।
विदेशों में भी कोसे के कपड़ों की मांग
खराब कोसे का भी उपयोग- जिस कोसे में छेद हो जाता है उससे पतले और रेशमी धागे नहीं बनते, बल्कि थोड़े मोटे धागे बनते हैं। ऐसे कोसे का उपयोग भी विदेशों में किया जाता है। विदेशों में इससे बनी चादरों को घर की दीवारों पर लगाते हैं। साथ ही उसका उपयोग जमीन पर बिछाने के लिए मेट की तरह भी करते हैं। कोसा वस्त्रों को बनाने के लिए मशीन ज्यादा उपयोगी नहीं है, क्योंकि कोसे का धागा मशीन के झटके नहीं सह पाता।
टसर की मांग- प्योर कोसे से बने कपड़ों की मांग देश के भीतर ही होती है, लेकिन मिक्स कोसे के कपड़ों की विदेशों में सबसे ज्यादा मांग है। इसमें कोसा के धागे में रंगीन और कुछ अन्य धागे मिलाकर बनाया जाता है जो दिखने में काफी आकर्षक और रंगीन होता है।
पता- संचालक, योगिता हैंडलूम, कपड़ा मार्केट, पंडरी, रायपुर (छ.ग.)

एक ही परिवार के तीन सदस्य राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित

एक ही परिवार के तीन सदस्य 
राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित
किसी भी व्यक्ति के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार मिलना कई पीढिय़ों को सम्मानित करने वाला सम्मान होता है। और जब एक ही परिवार की दो पीढिय़ां लगातार देश के इस सर्वोच्च सम्मान से नवाजी जा चुकी हों तो फिर कहना ही क्या। छत्तीसगढ़ राज्य के लिए यह बहुत गौरव की बात है कि जांजगीर जिले के चंद्रपुर ग्राम के बुनकर परिवार के तीन- तीन सदस्यों को कोसा कपड़े में कलाकारी करने और उसकी रंगाई में वनस्पति का उपयोग करने के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार दिया गया है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस परिवार की दोनों पीढिय़ां आज भी अपनी इस परंपरागत कला की सेवा कर रही हैं।
पहली बार यह राष्ट्रीय पुरस्कार परिवार के मुखिया सुखराम देवांगन को इंद्रधनुषी साड़ी बनाने के लिए सन् 1988 में प्रदान किया गया था। इसके बाद उनके बड़े बेटे नीलांबर प्रसाद देवांगन को 1992 में कोसा सिल्क साड़ी में विशेष कलाकारी करने के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया। इसके अगले ही वर्ष 1993 में कोसा मयूरी साड़ी बनाने के लिए परिवार के ही छोटे बेटे पूरनलाल देवांगन को भी राष्ट्रपति पुरस्कार प्रदान किया गया। ऐसे सम्मान पाले वाले परिवार पर भला किसे गर्व नहीं होगा।
पिता घासीदास से विरासत में मिली कला को सुखराम ने आगे बढ़ाया तो उनके पुत्र नीलाम्बर और पूरन भी पीछे नहीं रहे उन्होंने भी अपने दादा व पिता से मिली इस परंपरागत कला में कुछ और नया करते हुए इस कला में अपने हुनर की छाप छोड़ी। दोनों मिलकर कोसा कपड़े पर आज भी नए- नए प्रयोग कर रहे हैं और प्रदेश का नाम रोशन कर सफलता की ऊंचाइयों की ओर बढ़ रहे हैं। वास्तव में छत्तीसगढ़ को इस परिवार पर गर्व है।
नीलाम्बर और पूरन ने मिलकर कोसा सिल्क साड़ी पर बस्तर के जीवन को जीवंत करने वाली कारीगरी की। नीलाम्बर का मानना है कि उनका झुकाव परंपरागत कलाओं की ओर पहले से ही था। इस दिशा में कार्य करते हुए ही उन्होंने एक नया प्रयोग करने की ठानी और कोंडागांव के लौह शिल्प की कला को साडिय़ों पर जीवंत कर दिखाया।
छत्तीसगढ़ में इस तरह का यह पहला और अनूठा प्रयास था। उनके इस प्रयास को पूरे देश में सराहा गया। हम गर्व से कह सकते हैं कि हमारे प्रदेश के एक परिवार ने भारतीय शिल्पकला की प्राचीन परंपराओं को जागृत रखा। श्रेष्ठ शिल्पी के लिए नीलाम्बर देवांगन को यह राष्ट्रीय पुरस्कार 12 दिसंबर 2005 को दिल्ली में राष्ट्रपति डॉ ए. पी. जे. अब्दुल कलाम द्वारा दिया गया। वितरण समारोह में इस विधा में पुरस्कार पाने वाले वे सबसे कम उम्र के युवा थे। (उदंती फीचर्स)

जड़ी- बूटी

अब नहीं कहना पड़ेगा चीनी कम है
लैटिन अमेरिकी देश पराग्वे में पाई जाने वाली स्टेविया नामक जड़ी- बूटी जिसे चीनी के स्थान पर इस्तेमाल किया जा सकता है अब भारत आ रही है। इसकी विशेषता यह है कि यह चीनी से भी अधिक मीठी है और इसे अपने घर की छोटी सी बगिया में भी उगाया जा सकता है।
स्टेविया बायोटेक प्राइवेट लिमिटेड के प्रबंध निदेशक सौरव अग्रवाल के अनुसार 'यदि आपने स्टेविया को चख लिया है, तो आपको इसकी मिठास का अंदाजा होगा। स्टेविया की पत्तियों से निकाला गया सफेद रंग का पाउडर चीनी से लगभग 200 से 300 गुना अधिक मीठा होता है।'
पर आप डरिए नहीं अधिक मीठी होने का मतलब अधिक नुकसानदायक नहीं बल्कि यह शून्य कैलोरी स्वीटनर है और इसका कोई दुष्प्रभाव नहीं है। इसे हर जगह चीनी के बदले इस्तेमाल किया जा सकता है। पराग्वे में स्टेविया को सदियों से स्वीटनर और स्वादवर्धक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
खुशी की बात है कि कंपनी स्टेविया की खेती को बढ़ावा देने हेतु भारतीय कृषि मंत्रालय से संबंधित विभिन्न विभागों से संपर्क किया है।
स्टेविया डॉट नेट के अनुसार, 'स्टेविया का एक सफल उत्पादक बनने के लिए आपको कोई दक्षिण अमेरिकी किसान होना जरूरी नहीं है। हालांकि, इस वनस्पति का मूल स्थान दक्षिण अमेरिका होने के कारण यह कुछ मामले में बाहरी लग सकती है, लेकिन यह साबित हो चुका है कि इसे किसी भी जलवायु में उगाया जा सकता है।'
इन सब बातों से जाहिर है कि हमारे देश की जलवायु इस वनस्पति की खेती के लिए उपयुक्त है। फिर भी कुछ टेस्ट तो करने ही होंगे। स्टेविया की व्यावसायिक खेती के लिए तापमान, मिट्टी की किस्म, पानी की किस्म व उसकी उपलब्धता और अच्छी गुणवत्ता वाली अधिकतम उत्पादन देने वाली स्टेविया जैसे कारक को सुनिश्चित कर लेना जरूरी होता है।
अभी तो सिर्फ बातचीत शुरु की गई है लेकिन यदि इसकी खेती करना भारत में संभव हो पाया तो उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले समय में चीनी की महंगाई से त्रस्त जनता को राहत मिलेगी।

महिला खेल

महिला खिलाडिय़ों का यौन शोषण
- तृप्ति नाथ
भारतीय महिला खिलाडिय़ों द्वारा यौनिक दुव्र्यवहार झेलने की तकलीफ अभी भी असंबोधित है और आमतौर पर जितना बताया जाता है यह उससे कहीं अधिक फैली हुई है।

भारतीय खेल सभी गलत कारणों से सुर्खियों में रहा है। जैसे राष्ट्र मंडल खेलों से जुड़े कुकर्म मीडिया में आने शुरु हुए, अग्रणी भारतीय महिला खिलाडिय़ों द्वारा यौनिक उत्पीडऩ और दुव्र्यवहार की बात सामने आई। महिला हॉकी से जुड़े कुकर्म अचानक सामने आ गए। भारतीय महिला हॉकी टीम की सदस्य, रंजीता ने कड़वाहट के साथ मुख्य कोच, एम.के. कौशिक के खिलाफ शिकायत की। चार पृष्ठों के पत्र में रंजीता ने कौशिक पर यौनिक और अपमानजनक टिप्पणियों का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि कौशिक ने उनसे कहा कि वो बहुत खूबसूरत हैं और उसके दरवाजे उनके लिए हमेशा खुले हैं और वो कभी भी उनके कमरे में आ सकती है। रंजीता की किस्मत अच्छी थी उसे साथियों ने उसका साथ दिया बल्कि हाल ही में मध्य प्रदेश भोपाल में राष्ट्रीय प्रशिक्षण शिविर में उपस्थित सभी 31 महिला हॉकी खिलाडिय़ों ने कौशिक के व्यवहार पर नाराजगी व्यक्त की। फिर मानो ऐसे दुव्र्यवहार की व्यापक प्रकृति को जताने के लिए सिडनी ओलम्पिक कांस्य पदक विजेता कर्णम मालेश्वरी जो इत्तफाक से ओलम्पिक पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला हैं ने भारतीय खेल प्राधिकरण के भारोत्तोलक कोच, रमेश मल्होत्रा पर जूनियर भारोत्तोलकों को यौनिक रूप से उत्पीडि़त करने का आरोप लगाया।
कुछ कार्यवाही तो हुई। जहां भारतीय भारोत्तोलन संघ ने मल्होत्रा को निलंबित कर दिया, भारत हॉकी पैनल ने रंजीता की शिकायत की जांच के बाद कौशिक को प्रत्यक्षत: दोषी पाया और निलंबित कर दिया। अपनी छवि को बचाने और खिलाडिय़ों का विश्वास दोबारा हासिल करने के लिए, भारत के संघ खेल मंत्रालय ने भारतीय पुरुष हॉकी टीम के पूर्व खिलाड़ी, संदीप सोमेश को महिला हॉकी का कोच बनाया। भारतीय खेल प्राधिकरण ने भी महिला टीम की पूर्व कप्तान, प्रीतम रानी सिवाच और पूर्व खिलाड़ी, संदीप कौर- जिन्होंने विश्व कप और एशियाई खेलों में खेला था उन्हें अतिरिक्त कोच के रूप में नियुक्त किया। दोबारा बनी टीम में अब मधु यादव जो टीम मैनेजर थीं उनके स्थान पर महिला हॉकी के लिए पूर्व सरकारी निरीक्षण रूपा सैनी हैं।
परंतु बदलाव कमोबेश केवल प्रबंधकीय स्तर पर हैं। महिला समाजकर्मी और खेल कॉमेन्टेटरों का मानना है कि भारतीय महिला खिलाडिय़ों द्वारा यौनिक दुव्र्यवहार झेलने की तकलीफ अभी भी असंबोधित है और आमतौर पर जितना बताया जाता है यह उससे कहीं अधिक फैली हुई है। दिल्ली स्थित वरिष्ठ खेल पत्रकार एम.एस. उन्नीकृष्णन के अनुसार व्यक्तिगत और टीम खेल, दोनों में कास्टिंग काउच एक वास्तविकता है। आंध्रप्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन की महिला क्रिकेट खिलाडिय़ों द्वारा की गई शिकायत की ओर ध्यान खींचते हुए उन्नीकृष्णन कहते हैं, 'मैंने दूर के और आदिवासी इलाकों में कोच और अधिकारियों द्वारा महिला खिलाडिय़ों सी शोषण के बहुत से मामलों के बारे में सुना है। पिछले साल ही, एक महिला गोल रक्षक द्वारा दुव्र्यवहार कीशिकायत के बाद, महिला हॉकी टीम के गोल रक्षक कोच, एडवर्ड एलोसिअस को हटा दिया गया था। तैराकी और टेनिस जैसे खेल यौनिक शोषण की न सामने आने वाली कहानियों से भरा पड़ा है। बास्केटबॉल, वॉलीबॉल, एथलेटिक्स और भारोत्तोलन का यौन कुकर्मों में अपना अलग योगदान है। महिला क्रिकेट में भी यौन शोषण बेतहाशा फैला हुआ है।' कुछ महीनों पहले, दो महिला क्रिकेट खिलाडिय़ों ने आंध्र प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन के सचिव, वी. चामुण्डेश्वर पर उन्हें तंग करने का इल्जाम लगाया था।
भारत के महानतम एथलीट माने जाने वाले मिल्खा सिंह ऐसे दोषी पाए जाने वाले कोचों को कालीसूची में दर्ज करने के पक्ष में हैं। 'कोच एक गुरू होता है। ऐसे गलत काम निंदनीय हैं और देश में सभी कोचों के नाम को गंदा करते हैं। मैंने इसी तरह के केस एथलेटिक्स में भी सुने हैं। ऐसे परिदृश्य में क्या मां-बाप अपनी बेटियों को कोचिंग के लिए भेजेंगें? यदि महिला हॉकी खिलाडिय़ों द्वारा लगाए गए आरोप सही हैं तो सरकार और भारतीय महिला हॉकी संघ को इन आरोपियों को छोडऩा नहीं चाहिए।' स्वयं एक महिला खिलाड़ी और 1982 एशियाड के दौरान भारतीय महिला हॉकी संघ की पूर्व सचिव उनकी पत्नी निर्मल मिल्खा सिंह कहती हैं, 'खेलों में यौनिक उत्पीडऩ उतना ही सच है जितना कि प्रदर्शन बेहतर करने के लिए निषेध दवाएं लेना!'
दुर्भाग्य से इतने वर्षों में परिदृश्य बदला नहीं है। पूर्व अंतरराष्ट्रीय वालीबॉल खिलाड़ी और भीम पुरस्कार विजेता, डॉ. जगमती सांगवान कहती हैं 'भारतीय महिला खिलाड़ी कम से कम पिछले 3 दशकों से यौनिक उत्पीडऩ का सामना कर रही हैं। बल्कि, भारतीय महिला खिलाडिय़ों की दुर्दशा का जिक्र 'खेलों में महिलाओं की भागीदारी- हरियाणा के विशेष संदर्भ के साथ अंतरराष्ट्रीय महिला खिलाड़ी एक केस स्टडी' शीर्षक से उनकी डॉक्टोरल थीसिस में था'। सांगवान, जो आज महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक के शारीरिक शिक्षा विभाग में सह-प्रोफेसर हैं, उन दिनों को याद करती हैं जब 1974 से 1986 तक वे एक सक्रिय खिलाड़ी थीं। उन्होंने अक्सर कोचों को महिला खिलाडिय़ों पर बिना मतलब भद्दी टिप्पणियां देते हुए देखा। वो बताती हैं 'वे कामुकतापूर्ण थे और उनके इशारे अश्लील थे। लेकिन उस समय की महिला खिलाडिय़ों ने व्यापक हित को ध्यान में रखते हुए इसे चुपचाप झेला।' सांगवान, जो अखिल भारतीय लोकतांत्रिक महिला संघ (एडवा) की रोहतक स्थित सहायक सचिव हैं, हाल ही में संघ खेल मंत्री एम.एस. गिल से महिला खेलों में बदलाव लाने की आवश्यकता पर जोर देने के लिए मिलने गईं।
एडवा उन संस्थाओं में से है, जिनका मानना है कि यौनिक उत्पीडऩ और विशेषकर महिला खिलाडिय़ों के शोषण जैसे व्यापक मुद्दों पर बहुत देर से और बहुत कम काम किया गया। एडवा चाहती है कि सरकार कौशिक के खिलाफ न केवल आपराधिक कार्यवाही करे, उनके द्वारा गिल को दिए गए ज्ञापन में उन्होंने जेंडर संवेदशील खेल नीति और सभी क्षेत्रों में यौनिक उत्पीडऩ शिकायत समितियों के गठन की मांग भी की है। एडवा की कानूनी कनवीनर कीर्ति सिंह ने देखा है, 'खेल के क्षेत्र में इतने व्यापक यौनिक उत्पीडऩ प्रचलन के बावजूद, खेल निकायों के पास ऐसे मामलों से निपटने के लिए शिकायत समितियां नहीं हैं। यह सर्वोच्च न्यायालय के कार्यस्थल पर यौनिक उत्पीडऩ रोकथाम पर मार्गदर्शक सिद्धांतों का पालन न करने के बराबर है।'
उन्नीकृष्णन का तर्क है कि दण्ड अपराध की गंभीरता पर निर्भर होना चाहिए। वे कहते हैं, 'वैसे भी, कोई भी कोच या अधिकारी जिसके नाम पर यौनिक उत्पीडऩ का आरोप है, वो आसानी से बच नहीं सकता। वो कोचिंग का काम तभी कर सकता है जब उसे सारे आरोपों से बरी कर दिया जाए।'
महिला समाजकर्मी महिलाओं के लिए चयन समितियों, खेल समुदायों और संघों में भी 33 प्रतिशत आरक्षण चाहती हैं। उनका मानना है कि जब तब खेल मंत्रालय महिलाओं को चयन समितियों और खेलों की निर्णय समितियों में शामिल करने के लिए अग्रसक्रिय उपाय नहीं करेगा, तब तक यौनिक शोषण चलता रहेगा। एडवा का विचार है कि यौनिक उत्पीडऩ से उदाहरण योग्य तरीके और वांछित तत्परता से निपटने के लिए उचित कानून बनाने का समय आ गया है। संघ खेल मंत्री जेंडर संवेदनशील नीति की मांग को स्वीकार करते हैं परंतु महिला संस्थाओं, जानी-मानी महिला खिलाडिय़ों (वर्तमान और भूतपूर्व) और राष्ट्रीय महिला आयोग के साथ परामर्श करना चाहेगें। उन्होंने एडवा से सभी राज्य सरकारों को खेल निकायों में यौनिक उत्पीडऩ विरोधी समितियां स्थापित करने के लिए सरकुलर भेजने का वादा भी किया है।
दण्ड से छुटकारे की संस्कृति रातों- रात नहीं बदलने वाली। चुनौती है मुद्दे पर फोकस बनाए रखना और सुनिश्चित करना कि सरकार और खेल प्रशासन दोनों संस्थागत बदलाव लाएं ताकि महिला एथलीट कामुकतापूर्ण कोचों और उदासीन प्रशासन से निपटने के बजाय अपने खेल कौशल पर ध्यान केंद्रित कर सकें। (विमेन्स फीचर सर्विस)

जहर की जड़ें

जहर की जड़ें
- डॉ. बलराम अग्रवाल
दफ्तर से लौटकर मैं अभी खाना खाने के लिए बैठा ही था कि डॉली ने रोना शुरू कर दिया।
'अरे-अरे-अरे, किसने मारा हमारी बेटी को?' उसे प्यार करते हुए मैंने पूछा।
'डैडी.....हमें स्कूटर चाहिए।' सुबकते हुए वह बोली।
'लेकिन तुम्हारे पास तो पहले ही बहुत खिलौने हैं!' इस पर उसकी हिचकियां बंध गई, बोली, 'मेरी गुडिय़ा को बचा लो डैडी।'
'बात क्या है?' मैंने दुलारपूर्वक पूछा।
'पिंकी ने पहले तो अपने गुड्डे के साथ हमारी गुडिय़ा की शादी करके हमसे गुडिय़ा छीन ली।' डॉली ने जोरों से सुबकते हुए बताया, 'अब कहती है- दहेज में स्कूटर दो, वरना आग लगा दूंगी गुडिय़ा को।.....गुडिय़ा को बचा लो डैडी....हमें स्कूटर दिला दो...।'
डॉली की सुबकियां धीरे- धीरे तेज होती गईं और शब्द उसकी हिचकियों में डूबते चले गए।
निर्मल खूबसूरती
लड़की ने काफी कोशिश की लड़के की नजरों को नजरअंदाज करने की। कभी वह दाएं देखने लगती, कभी बाएं। लेकिन जैसे ही उसकी नजर सामने पड़ती, लड़के को अपनी ओर घूरता पाती। उसे गुस्सा आने लगा। पार्क में और भी छात्र थे। कुछ ग्रुप में तो कुछ अकेले। सब के सब आपस की बातों में मशगूल या पढ़ाई में। एक वही था जो खाली बैठा उसको तके जा रहा था।
गुस्सा जब हद से ऊपर चढ़ आया तो लड़की उठी और लड़के के सामने जा खड़ी हुई।
'ए मिस्टर!' वह चीखी।
वह चुप रहा और पूर्ववत ताकता रहा।
'जिंदगी में इससे पहले कभी लड़की नहीं देखी है क्या?' उसके ढीठपन पर वह पुन: चिल्लाई।
इस बार लड़के का ध्यान टूटा। उसे पता चला कि लड़की उसी पर नाराज हो रही है।
'घर में मां- बहन है कि नहीं।' लड़की फिर भभकी।
'सब हैं, लेकिन आप गलत समझ रही हैं।' इस बार वह अचकाचाकर बोला, 'मैं दरअसल आपको नहीं देख रहा था।Ó
'अच्छा' लड़की व्यंग्यपूर्वक बोली।
'आप समझ नहीं पाएंगी मेरी बात।' वह आगे बोला।
'यानी कि मैं मूर्ख हूं।'
'मैं खूबसूरती को देख रहा था।' उसके सवाल पर वह साफ- साफ बोला, 'मैंने वहां बैठी निर्मल खूबसूरती को देखा- जो अब वहां नहीं है।'
'अब वो यहां है।' उसकी धृष्टता पर लड़की जोरों से फुंकारी, 'बहुत शौक है खूबसूरती देखने का तो अम्मा से कहकर ब्याह क्यों नहीं करा लेते हो।'
'मैं शादी शुदा हूं, और एक बच्चे का बाप भी।' वह बोला, 'लेकिन खूबसूरती किसी रिश्ते का नाम नहीं है। न ही वह किसी एक चीज या एक मनुष्य तक सीमित है। अब आप ही देखिए, कुछ समय पहले तक आप निर्मल खूबसूरती का सजीव झरना थी- अब नहीं है।'
उसके इस बयान से लड़की झटका खा गई।
'नहीं हूं तो न सही। तुमसे क्या?' वह बोली।
लड़का चुप रहा और दूसरी ओर कहीं देखने लगा। लड़की कुछ सुनने के इंतजार में वहीं खड़ी रही। लड़के का ध्यान अब उसकी ओर था ही नहीं। लड़की ने खुद को घोर उपेक्षित और अपमानित महसूस किया और 'बदतमीज कहीं का' कहकर पैर पटकती हुई वहां से चली गई।
पता : एम -70 , नवीन शाहदरा , दिल्ली -110032, मोबाइल-09968094431