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Sep 22, 2010

मासूम सिसकियां

- देवी नागरानी
'मां तुम भैया को लेकर कब आओगी? जल्दी आओ ना!' तीन साल की वो नन्हीं सी कली प्लास्टिक के फोन पर कहे जा रही है। हां! वह प्राची है।
और नील नम आंखों से शून्यता के उस पार देख रहा है जहां उसे अपना अस्तित्व, अपने आस पास का घर- संसार और उसमें बसने वाले लोग एक स्वप्न से लग रहे हैं। सिर्फ प्राची का लगातार फोन पर बात का सिलसिला जो अपनी मां को बार- बार आवाज देती रही, वही उसे हकीकत की दुनिया में ला रही है। सुनने वाला दर्द को जानता है, पहचानता है, पर उस दर्द को आंसुओं के साथ पी जाना अब उसके बस में नहीं।
'पापा मां को अस्पताल से ले आओ ना। मुझे मां पास जाना है पापा...पा...' और उसकी आवाज सुबकती सिसकियों की धारा बनकर आस पास के गूंजती रही पल पल, हर पल। आज चौथा दिन था, पर नील और उसके माता- पिता ख़ुद को असमर्थ पा रहे हैं, उस नन्हीं जान को यह बताते हुए कि स्नेहिल उसकी मां अब नहीं रही। वह हर बन्धन की डोर को तोड़ कर चली गई है और अपने पीछे छोड़ गई है एक बिलखता हुआ क्रंदन!!!
कितने खुश थे वो दोनों- नील और स्नेहिल सबके साथ अपने घर संसार में। प्राची उनकी बगिया की पहली कली, जिसको साढ़े तीन साल से अपने आंचल की ठंडी छांव में प्यार से सींचा, पाला और महकने का मौका दिया।
'प्राची अपने भाई को अगले साल राखी बांधेगी ना?' कहती हुई स्नेहिल खुशी से विभोर हो उठती थी। बस अब नौ महीने पूरे होने को थे और उन्हें पता था की आने वाला नया मेहमान लड़का है। एक सम्पूर्ण परिवार का स्वप्न और अपने आने वाले भविष्य से अनजान वे खुशी के सागर पिए जाते थे, सपनों के नए जाल बुनते जाते थे। बच्चे के जन्म की तारीख जुलाई 25 या 26 की मिली हुई थी, पर 23 तारीख को घर में तहलका सा मचा हुआ था। स्नेहिल बिन- जल मछली की तरह मचल रही थी, परिवार के सभी लोग उसे सहलाने की, पुचकारने की कोशिश में लगे थे। अस्पताल फोन लगाया, गाड़ी स्टार्ट हुई और स्नेहिल की जिंदगी की रफ्तार, गाड़ी की रफ्तार से मेल जोल न खाकर हिचकोले खाने लगी। पिछली सीट पर बेचैनियों से घिरी स्नेहिल को बीच राह में छाती में दर्द का अहसास हुआ, पर नील की माता जी को लगा कि वह प्रसव पीड़ा का अंश है, सो सहलाते पुचकारते अस्पताल पहुंचे, जहां वह तुरंत डाक्टरों के हवाले कर दी गई, जहां उसे अब आई.सी.यू. में ऑक्सीजन दिया जा रहा था। बस कुछ पलों में दुखद समाचार देते हुए डाक्टर ने समझाया' कार में उसे जो घुटन हो रही थी, वो लंग्स में ब्लाक आने के कारण थी और बच्चा उसी वक्त ऑक्सीजन न मिलने के कारण स्वांस न ले पाया और ...!!!'
नील के पिता जो खुद एक बहुत ही बड़े पद पर नियुक्त एक तजुर्बेकार डॉक्टर थे ने सूचना पाते ही तुरंत आठ दस डॉक्टरों की टीम बुला ली, एक हेलीकाफ्टर भी एमरजेंसी के लिए तैयार करवा लिया। अब सभी डॉक्टर स्नेहिल को बचाने की कोशिश में जुट गए। शायद किसी अन्य अस्पताल ले जाना पड़स्नेहिल को, यही सोच कर सब तैयारियां हुई।
कितने खुश थे नील और स्नेहिल सबके साथ अपने घर संसार में। प्राची उनकी बगिया की पहली कली, जिसको साढ़े तीन साल से अपने आंचल की ठंडी छांव में प्यार से सींचा, पाला और महकने का मौका दिया। 'प्राची अपने भाई को अगले साल राखी बांधेगी ना?' कहती हुई स्नेहिल खुशी से विभोर हो उठती थी।

'पिताजी, मां को लेकर आप जल्दी आइये, स्नेहिल... ' और भारी आवाज में नील ने स्नेहिल के माता पिता को शिशु के दुखद समाचार के बारे में बताते हुए परिस्थिति से अवगत कराया। वे कैलिफोर्निया में थे और जल्द से जल्द जो फ्लाईट उन्हें मिली उसे लेकर न्यूयार्क के लिए रवाना हुए। आकुल व्याकुल मन मयूर नाना- नानी बनने के सुनहरे स्वप्न जो बुन चुके थे वे वहीं के वहीं बस निराशा के ढेर बनकर टूटकर बिखरते रहे।
'भगवान करे स्नेहिल यह सदमा बर्दाश्त कर पाये और संभल जाए ताकि वह अपनी प्राची को भरपूर प्यार के साथ संभाल सके।' यह प्राची की मां की फुसफुसाती आवाज थी जो शायद भगवान के कानों तक नहीं पहुंची।
स्नेहिल खुद एक रीसर्च साइंटिस्ट थी और 37 साल की उम्र में जो नाम और शोहरत उसने पाई वह पूरे परिवार के लिए गर्व की बात थी। पिता और ससुर दोनों डॉक्टर, नील कंप्यूटर प्रोफेशन का उच्च अधिकारी रहा। घर का माहौल सदा ही खुशियों से महकता रहा और प्राची की तोतली आवाजें और आने वाले बालक की सुखद किलकारियों के आगमन की आशा से सभी बहुत खुश थे और अब...!!
'मां का गर्भाशय निकालना पड़ा। जो नाल मां और बच्चे को जोड़ती रही वह टूट गई और खतरे का कोई अंश बाकी न रहे इसलिए यह कदम जरूरी था' कहते हुए डॉक्टर ललित फिर थियेटर में वापस चले गये। जिंदगी और मौत के झूले में झूल रही थी स्नेहिल और उसके साथ जुड़ी सब की आशाएं। नील साक्षी बना खड़ा है, चिंतन के धुंध में घिरा हुआ, सिर्फ आवाजें, आवाजें और उनकी गूंज थी आसपास।
'मैं भी चलूंगी आपके साथ' प्राची मां का पल्लू पकड़ कर कह रही थी। 'पापा मुझे भी ले चलो, मैं मां के साथ जाऊंगी।'
जब घर से निकल रहे थे तब स्नेहिल ने पुचकारते हुए अपनी जान प्राची से कहा 'बेटा तुम यहीं रहो घर पर, मैं अस्पताल से तुम्हारे भाई को ले आऊंगी।'
और अब प्राची का सामना कैसे होगा? स्नेहिल को कैसे संभाल पाऊंगा? उसके खाली दामन को किस आस से भर पाऊंगा? उलझनों का तांता और नम आंखों में तैरती हुई यादों की परछाइयां दिल की दहलीज पर रूककर भी नहीं रुकी। पत्थरों को शायद किसी ने रोते हुए नहीं देखा है, पर सच मानो उनमें भी धड़कन होती है पर वे खामोशियों से हर सदमे को झेलते हैं...!
नील की सोच के सिलसिले को पिता के स्नेहिल छांव ने पुचकारा। बेटे के दर्द को, उसके अरमानों के घात को समझ पा रहा था वह, पर मजबूर था। डॉक्टर था, समझ रहा था, जो कभी किताब के पन्नों में पढ़ा, आज जमीन बन कर वही केस उसकी बहू स्नेहिल पर पूरा उतर रहा है रफ्ता रफ्ता। 'बेटा ऐसा आज तक नहीं सुना है, और न देखा है कि लंग्स के ब्लाक की वजह से शिशु को और मां को जान से हाथ धोना पड़ता है, पर पुस्तकों में पढ़ा है। अब दुआएं करो की हमारी स्नेहिल को कुछ न हो!' कहते हुए पिता फिर से थियेटर में अंदर चले गए, जहां अभी- अभी डॉ. ललित गए।
नील चौकन्ना हो गया। पिताजी यह क्या कह रहे हैं? और उसे एहसास होने लगा उस बेबसी का जो एक लहूलुहान छटपटाहट सी सिहरन बनकर उसके सीने के हर कोण में समा गई। इतने सारे डॉक्टर मिलकर भी कुछ नहीं कर पा रहे थे, स्नेहिल को बचाने की हर मुमकिन कोशिश नाकाम हुई। हाथ जो दुआओं के दर पर उठ रहे थे अब छाती पीट रहे थे। आशा का दामन थाम कर इन्सान रेत पर घरौंदे बनाता है, उन्हें संवारता है, और फिर जब उन्हें बिखरता हुआ देखता है तो सहरा की तपती धूप सी जलन तड़प बन कर उसकी आत्मा के अधर को भी जला देती है। उससे भी ज्यादा पीड़ा दायक रेगिस्तान के बीचों बीच रेत के ढेर पर बनाया हुआ आशियां एक ऐसे टीले की तरह होता है, जो ढह तो जाता है पर मुट्ठी की पकड़ में नहीं आता। यही बेबसी की चरम सीमा है। आशाओं का दामन हाथ से छूटता चला जाता है, उम्मीदों की सभी किरणें जाने कहां लुप्त हो जाती हैं, और चारों तरफ से घेर लेता है मायूसी का अंधेरा। यही हालत थी उस वक्त नील और उसके माता- पिता की।
'बेटे तुम मां को लेकर घर जाओ और प्राची को जाकर संभालो, मैं एयरपोर्ट से तुम्हारे सास- ससुर को लेकर घर आता हूं।' नील के पिता ने उसे सहलाते हुए कहा। दर्द का सैलाब
जब- जब बहता है तो न जाने क्या क्या डूब जाता है। इन्तिहाये-ग़म अपना चलन नहीं बदलता, हां रुख जरूर बदल कर बस रुलाता चला जाता है। इस हकीकत को कोई झुठला नहीं सकता कि जिंदगी का अंत मौत है, पर ऐसा कठोर उसका मंजर, उफ! देखने पर तो पत्थर भी रो पड़े, दर्द भी सिसकियां लेता रहे।
जब प्राची के नाना- नानी आए तो लोगों का जमघट देखा। यह तो पता था शिशु नहीं रहा, पर देर न लगी यह जानने में कि किस बुरी तरह से जिंदगी ने उनके साथ छल करके उन्हें पछाड़ दिया है, आगे पांव धरते ही जो मंजर आंखों को दिखा... कास्केड में मां -स्वरूप स्नेहिल शांत चित सजी- धजी दुल्हन की वेश भूषा से और उसकी गोद में उसका शिशु जो ममता के बिना जी नहीं पाया, दोनों एक निश्चिंत निद्रा की गोद में विश्राम से लेटे थे। दिल को दहलाने वाला यह दृश्य हर सीने पर एक छाप छोड़ गया और आज दस दिन के बाद भी जब एक छटपटाहट मन को झिंझोड़ रही है तो कलम उठाकर अपनी पीड़ा से राहत पाने के लिए दर्द की परिभाषा की गहराइयों में झांकने की फिर से कोशिश कर रही हूं, जिससे आमना- सामना न जाने कितनी बार होता रहा है। कभी मुझे रुलाने में वो कामयाब रहती है, कभी तो खुद भी इस मानव मन की पीड़ा से परेशां होकर सिसकने लगती है।
'भगवान मेरी ही बेटी की जीवन डोर क्यों काट दी' यह क्रंदन स्नेहिल की मां का था जो वहीं पर बैठी अब अपनी बेटी की छाती पर सोये शिशु को सहलाते हुए अपने जख्म कुरेदने लगी।
आज फोन से पता किया, कि कैसे प्राची आज भी खिलौने वाले फोन से अपनी मां को आवाज दे रही है, बुला रही है। उसे कौन यह समझाए की जिंदगी को छीनने वाली मौत उसकी मां और भाई को उससे दूर, बहुत दूर ले गई है, जहां सिर्फ जाने की राह खुलती है, लौट आने की नहीं। वह तो इंतजार में अब भी आस लगाये कह रही है 'मां भैया को लेकर जल्दी घर आओ, मां आ जाओ, आओ...मां.!!!'
पता- 9, कार्नर व्यू सोसाइटी, 15/33 रोड, बांद्रा,
मुंबई- 50, मोबाइल- 9867855751

उड़कर जाइए ऑफिस

उड़कर जाइए ऑफिस
अब कार चलाते हुए जब ''ट्रैफिक जाम हो जाए तब आपको खीझते हुए हार्न बजाने की जरुरत नहीं पड़ेगी, बल्कि अपनी कार में लगे पंखों को खोल देना होगा और उड़कर आगे बढ़ जाना होगा।
ट्रैफिक की समस्या से आज हर कोई परेशान है जिसकी वजह है दिन-ब-दिन बढ़ते वाहनों की संख्या। ऐसे में अपने कार्यालय समय पर पहुंचना बेहद मुश्किल हो गया है। देर हो जाने पर बीच सड़क में जब ट्रैफिक जाम हो जाता है तो हम कल्पना करने लगते हैं कि काश मेरी कार में हेलीकाप्टर की तरह पंख होते तो मैं समय से काम पर पहुंच जाता। तो जनाब अपनी कल्पना को पंख लगा ही लीजिए क्योंकि अब जल्दी ही आपके लिए आने वाली है उडऩे वाली कार। अमेरिकी उड्डयन विभाग ने हल्के वजन की उडऩे वाली कारों के व्यवसायिक निर्माण की इजाजत दे दी है। इस उडऩे वाली कार को 'टेराफुगिया ट्रांजिशन' नाम दिया गया है।
इसे उड़ान भरने के लिए 1700 फुट लंबी हवाई पट्टी की जरूरत होगी। सीधे शब्दों में कहा जाए तो यह अब तक का सबसे छोटा विमान होगा, जिसका वजन मात्र 650 किलोग्राम होगा।
दो लोगों के बैठने के लिए बनाई जाने वाली यह अद्भुत कार सड़कों पर भी चल सकेगी। इस दौरान इसके पंख सिमटे होंगे लेकिन उड़ान भरने की स्थिति में ये अपने- आप खुल जाएंगे। इसका प्रोपेलर पीछे की ओर लगा होगा। यानी यदि आप सड़क पर कार चलाना चाहते हैं तो सड़क पर उतरने के 30 सेकेंड के भीतर ही वाहन के पंख सिमट जाएंगे और यह एक कार में बदल जाएगी। पंखों के सिमटने के बाद कार किसी भी आम कार जितने स्थान में खड़ी की जा सकती है। हवा में यह कार 115 मील प्रति घंटे (185 किलोमीटर) की रफ्तार से उड़ सकेगी। एक बार ईंधन भरवाने के बाद यह 735 किलोमीटर की उड़ान भर सकेगी। साथ ही इस पर 250 किलोग्राम तक वजन ढोया जा सकता है।
अमेरिकी कम्पनी 'टेराफ्यूजी ट्रांजिशन' वर्ष 2011 तक इस दोहरे उद्देश्य वाली 'उडऩ कार' को लाने की तैयारी में है। शहरी यातायात की भीड़ से बचने के लिए आप इस दो सीटों वाले वाहन से उड़ान भर सकते हैं। टेराफुजिया ट्रांजिशन नाम की कंपनी की इस कार को किसी भी सीधी सड़क पर उड़ाया जा सकता है। लेकिन ऐसा करने के लिए ड्राइवर को पहले पायलट लाइसेंस लेना होगा। उसे स्पोर्ट्स एयरक्राफ्ट उड़ाने का कम से कम 20 घंटे का अनुभव होना चाहिए। परीक्षण उड़ान में पास होने पर इस कार को अगले साल के अंत में सड़क पर उतारा जाएगा।
इसके निर्माता का कहना है कि इस कार का लाइट इतना प्रभावशाली है कि इससे घने बादलों में भी रास्ता आसानी से नजर आएगा। इस कार को बनाने का अधिकार हासिल करने वाली कंपनी-टेराफुगिया का कहना है कि अब तक 70 लोग इसके लिए बुकिंग करा चुके हैं। इसके लिए उन्होंने 10,000 डॉलर की आरक्षित राशि जमा कराई है। इस कार की कीमत लगभग 194,000 डॉलर होगी।

हिन्दुस्तान में दोहे की समृद्ध परंपरा

हिन्दुस्तान में दोहे की समृद्ध परंपरा 
चांदनी रात में इक बार तुझे देखा है।
खुद पे इतराते हुए, खुद से शरमाते हुए

- देवमणि पाण्डेय
हिन्दी में 'गज़ल' और उर्दू में 'दोहा' कभी- कभी विवाद का विषय बन जाते हैं। इस मुद्दे पर बहस, तकरार और झड़पें हो चुकी हैं। मुझे लगा कि क्यों न इस मुद्दे पर बुजुर्गों की राय ले ली जाए। मुंबई में ज़फर गोरखपुरी और नक्श लायलपुरी का शुमार सबसे वरिष्ठ शायरों में किया जाता है। दोहे पर इनकी राय पेश करते हुए मैं सभी पाठकों, कवियों और शायरों से अनुरोध करता हूं कि कृपया मिलजुल कर इस चर्चा को आगे बढ़ाएं। मगर इसके लिए अपनी उत्तेजना पर काबू रखते हुए सहृदयता, विनम्रता और धीरज से काम लें ताकि रचनात्मकता का भला हो सके।
दोहे में दोहे का अनुशासन जरुरी है- •ज़फर गोरखपुरी
हिंदुस्तान में कबीर, रहीम, मीरा, तुलसी आदि के दोहों की एक समृद्ध परंपरा है। अमीर खुसरो ने भी दोहे लिखे हैं मसलन-
गोरी सोवे सेज पर, मुख पर डारे केस।
चल खुसरो घर आपने रैन हुई चहुं देस।।
दोहे का छंद तेरह और ग्यारह मात्राओं में बंटा हुआ है। अगर इसमें एक भी मात्रा कम या ज़्यादा होती है तो वह दोहा नहीं रह जाता। पाकिस्तान में शायरों ने दोहा लिखने के लिए अलग बहर (छंद) का इस्तेमाल किया। उसमें तेरह और ग्यारह मात्राओं का अनुशासन नहीं है। हिंदुस्तान में भी कई शायरों ने उनका अनुकरण किया। मगर वैसी रचनाओं को 'दोहा' घोषित कर देने से उन्हें 'दोहा' नहीं माना जा सकता। उन्हें दोहा घोषित करने के बजाय मतला, मुखड़ा, मिनी कविता या मुक्तक जैसा ही कोई नाम देना ठीक होगा।
दोहा बहुत खूबसूरत विधा है। हमें इसकी शुद्धता बरकरार रखनी चाहिए। दोहे में छंद के अनुशासन के साथ ही प्रभावशाली कथ्य और आम फहम भाषा का भी होना जरुरी है। अरबी, $फारसी या संस्कृत के कठिन शब्दों में दोहा लिखना दोहे के साथ अन्याय करना है। सहजता, सरलता और तर्क संगत बात दोहे में जरुरी है और यह बात तेरह- ग्यारह मात्राओं की बंदिश के साथ होनी चाहिए।
ज़फर गोरखपुरी के दोहे
कौन बसंती धो गई, नदी में अपने गाल ।
तट खूशबू से भर गया, सारा पानी लाल ।।
मेंहदी ऐसी रच सखी, आज हथेली थाम।
लाल लकीरें जब मिलें, उभरे पी का नाम ।।
पी ने भीगी रैन में, आज छुआ यूं अंग।
नैनों में खिल खिल गए, धनक के सातों रंग ।।
साजन को जल्दी सखी, मन है कि उमड़ा आय।
कांटा समय के पांव में, काश कोई चुभ जाय।।
आंगन चंचल नंद-सा, घर है ससुर समान।
भीत अंदर दो खिड़कियां, ज्यों देवरान जेठान।।
जन गणना के काम से, अ$फसर आया गांव।
लाज आए लूं किस तरह, सखी मैं उनका नांव।।
रैन सखी बरसात की, निंदिया उड़ उड़ जाय।
थमें ज़रा जो बूंदिया, चूड़ी शोर मचाय।।
साजन ने तन यूं छुआ, जैसे कोई चोर।
सुन पाई न मैं सखी, सांसों का भी शोर।।
मन में पिय के नेह का, चुभा ये कैसा तीर।
मैके जाने की घड़ी, और आंखों में नीर ।।
गुज़रा घर के पास से, कौन सज़िल सुकुमार।
बिन होली के दूर तक, रंगों की बौछार।।
दोहे पर बंदिश परवाज़ को रोकने की कोशिश है -
नक्श लायल पुरी
दोहा हिन्दी की देन है जिसमें तेरह और ग्यारह मात्राएं होती हैं। मैंने जानबूझकर इस रवायत से अलग हटकर नई बहर में दोहे लिखे। गज़ल में भी जो रवायती बहरें हैं लोगों ने उनसे अलग नई बहरें ईज़ाद करके गज़लें कहीं और उन्हें स्वीकार किया गया। दोहा नई बहर में भी हो सकता है मगर दोहे में मौलिकता का ध्यान रखना जरुरी है। उसमें गज़ल की जबान और गज़ल का कंटेंट नहीं चलता।
शायर किसी बंदिश को तस्लीम नहीं करता। काफिया-रदीफ की बंदिश तो हुनर है। शायर किसी विधा के लिए नई बहरें क्यों नहीं तराश सकता? दोहे को इस दौर में तेरह-ग्यारह की बंदिश में बांधना शायरी की परवाज़ को रोकने की कोशिश है। गज़ल फारसी से आई मगर हिंदुस्तान में जल्दी लोकप्रिय हुई क्योंकि यहां दोहे में यानी दो मिसरों में बात कहने की परंपरा मौजूद थी। पुरानी परंपरा में विकास लाने के लिए बदलाव ज़रुरी है। मैंने फिल्मों के पारंपरिक मुखड़े को भी बदलने की कोशिश की और यह कोशिश कामयाब हुई। मसलन मेरे दो गीत के मुखड़े हैं-
न जाने क्या हुआ, जो तूने छू लिया।
खिला गुलाब की तरह मेरा बदन।।
चांदनी रात में इक बार तुझे देखा है।
खुद पे इतराते हुए, खुद से शरमाते हुए ।।
इन मुखड़ों में पारंपरिक तुकबंदी नहीं है। समय आ गया है कि हम नई बहर में दोहे लिखें और विकास का रास्ता रोशन करें।
नक्श लायलपुरी के दोहे
अपना तो इक पल न बीते, हाथ पे धर के हाथ
दिन मेहनत मज़दूरी का है, सैंयाजी की रात
नैनों में सपनों की छाया, हर सपना अनमोल
साजन के संग सभी बहारें, कहूं बजाकर ढोल
पेड़ों से पत्ते झड़ जाएं, पेड़ न खोएं धीर
धूप सहें, सर्दी में सिकुड़े, खड़े रहें गंभीर
आंखों को लगते हैं प्यारे प्रेम के सारे रुप
प्रेम चैत की कभी चांदनी, कभी जेठ की धूप
दर्द न जब तक छेदे, दिल में छेद न होने पाए
छेद न हो तो कैसे मोती, कोई पिरोया जाए
तेरे हाथ में देखी मैंने, अपनी जीवन रेखा
मैंने अपना हर सपना, तेरी आंखों से देखा
किसी की पूजा निष्फल जाए, किसी का पाप फूले
हाथ किसी के चांद को नोचें, कोई हाथ मले

पता : ए-डब्ल्यू, हैदराबाद स्टेट, नेपियन सी रोड
मुम्बई 400036 मोबाइल : 9821082126
Email : devmanipandey@gmail.com
Blog:http://devmanipandey.blogspot.com

40 लाख की साड़ी

40 लाख की साड़ी
चौंकिए मत। चित्र में आप जिस मोहतरमा को साड़ी का पल्लू दिखाते हुए देख रहे हैं उसकी कीमत एक हजार, दो हजार, पांच हजार या दस हजार नहीं है, बल्कि पूरे 40 लाख रुपए है। इस साड़ी को तैयार किया है चेन्नई की एक सिल्क की साड़ी बनाने वाली कंपनी ने। अपनी तरह की अनोखी व महंगी साड़ी होने के कारण इसे गिनीज बुक ऑफ़ वल्र्ड रिकार्ड्स में दर्ज करने का प्रयास किया जा रहा है।
आप सोच रहे होंगे की आखिर इस साड़ी की खासियत क्या है? इस साड़ी को बनाते समय बारह बेशकीमती पत्थरों का प्रयोग किया गया है। इस साड़ी में पन्ना, पीली नागमणि, नीलम, रूबी के अलावा सोने, हीरे, प्लेटिनियम और चांदी का काम किया गया है। इसके अलावा इस साड़ी पर कैट्स आई (बिल्ली की आंख की तरह चमकने वाला बहुमूल्य पत्थर) के साथ पुखराज व मोती का भी काम किया गया है। साड़ी के पल्लू पर प्रसिद्ध चित्रकार राजा रवि वर्मा की एक लोकप्रिय पेंटिंग को उकेरा गया है, जिसमें एक महिलाओं का समूह लोक गीत प्रस्तुत कर रहा है। साड़ी के पूरे बार्डर पर भी कलात्मक चित्र बनाए गए हैं। इस कीमती साड़ी के बनने में 4,680 घंटे लगे हैं।

लघुकथाएँ

एक सच्ची रिपोर्ट
- महेश राजा
हमारे यहां के वीडियो हॉल में चलती हुई नीली फिल्मों की शिकायत लोगो ने पुलिस को की। एस.पी. साहब ने थानेदार को तुरंत जांच के आदेश देते हुए लिखा- तुरंत छापा मारो और मालिक को गिरफ्तार कर लो।
थानेदार साहब दो आरक्षकों के साथ पहुंचे। अंदर फिल्म चल रही थी। कुछ देर उन्होंने सेक्स के दृश्य देखे और फिर मालिक को बुलवाया।
वीडियो हॉल के साथ लगे हुए आफिस में आकर बैठ गए। नौकर तुरंत ठंडे की चार बोतलें ले आया। तब तक मालिक भी आ गए।
मालिक ने कहा - आपने क्यों कष्ट किया साहब... हमको बुलावा लिया होता।
थानेदार बोले - नगर में आपके खिलाफ बड़ी शिकायतें हैं... आज एसपी साहब ने छापे का आदेश दे दिया तो आना पड़ा। जब्ती तो बनाना ही पड़ेगी।
मालिक ने पूछा - फिल्म बंद करवा दूं?
थानेदार बोले - नहीं चलने दो... चार नीली फिल्मों के कैसेट निकाल दो... हम जब्ती बना देते हैं... और आप तो आराम करो... मैनेजर को थाने भेज दो... उसकी गिरफ्तारी दिखा देते हैं... बड़े साहब का आदेश है तो कुछ तो करना ही होगा... और हां, एक जमानतदार भी भेज देना... तुरंत मैनेजर को छोड़ दूंगा।
थोड़ी देर इधर- उधर की बातें करने के बाद थानेदार बोले - यह तो बताओ कि ऐसे कैसेट कहां छिपाकर रखते हो?
मालिक ने मैनेजर को बुलाया और कहा - साहब को चार कैसेट अच्छे वाले दे दो।
आफिस की दीवार पर एड्स से बचने के लिए बहुत बड़ी फोटो लगी थी। उसके पीछे से मैनेजर ने चार कैसेट निकालकर दे दिए।
मालिक ने कहा - एकदम लेटेस्ट हैं... इन दिनों खूब चल रहे हैं... और हां, इस बार जरा लेट हो गया...मुख्यमंत्री जी ने बुलवा लिया था... एड्स के खिलाफ बहुत बड़ा शिविर लगाने की योजना शासन की है... जिम्मेदारी मुझ पर ही डाल दी। इसलिए आपका हिस्सा भिजवाने में जरा देर हो गई... लीजिए, रख लीजिए।
सभी पुलिसकर्मी प्रसन्नमुद्रा में बाहर निकले। थानेदार ने बड़े साहब को रिपोर्ट दी -
श्रीमानजी,
आपके आदेशानुसार वीडियो हॉल में छापा मारा गया। मालिक को चेतावनी दी गई और मैनेजर को गिरफ्तार कर उचित कार्यवाही की जा रही है। आपके अवलोकन के लिए दो कैसेट रिपोर्ट के साथ प्रस्तुत हैं। वीडियो मालिक राजधानी गए थे इसलिए मैनेजर को कड़ी चेतावनी दी गई कि भविष्य में नीली फिल्मों का प्रदर्शन वीडियो हाल में न करे।
भूकंप पीडि़त
सेठजी भूकंप में बे-घरबार होने वाले लोगों के लिए बड़े चिंतित थे।
मैंने पूछा- सेठजी, आपने भूकंप पीडि़तों के लिए अब तक क्या किया है?
वह बोले- बहुत किया जी... पांच हजार का चेक तो आज ही भिजवाया... माल और बिकेगा तो फिर भेजेंगे... हमने तो पहले से ही स्टाक भर लिया था ... जानते थे कि माल की कीमतें भूकंप के बाद बढ़ेगी... इसलिए उधर भूकंप आया और इधर हमने डबल रेट में माल निकाल दिया। इस कमाई में दस परसेंट का हक तो भूकंप वालों को जाना ही चाहिए।