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Dec 2, 2009

प्रेम की निर्मल गंगा बहाती मीरा


- डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव
ब दलते परम्परा के प्रतिमानों में मध्यकाल की कवयित्री मीरा अपनी लोकप्रियता में बेमिसाल हैं। इनका महत्व उस विद्रोही चेतना की अभिव्यक्ति में है जो उस समय सामन्तवाद के विरुद्ध पनप रहा था। मीरा अपनी जीवनचर्या और कविता दोनों से परम्परावादी, सनातनी व्यवस्था की जड़ता, थोथी कुल मर्यादा और जाति-पांति की जकड़बन्दी को तोड़ती हैं। सामन्ती आभिजात्य को ठोकर मारकर विद्वतजनों का सत्संग करती है और जनसाधारण के बीच बेधड़क विचरण करती हैं। मीरा की असाधारण लोकप्रियता का रहस्य जनसाधारण से तादात्म्य में है। जनसामान्य मीरा के गीतों में अपनी भावनाओं की सीधी-सच्ची अभिव्यक्ति पाता है। मीरा की लोकप्रियता का आलम यह है कि उनके नाम पर हजारों पद भक्तों ने रच डाले हैं। निर्गुण पंथ के अनुयायियों ने क्षेपक डालकर अपने सम्प्रदाय के अनुकूल अर्थापन करने की कोशिश की है, जबकि मीरा साम्प्रदायिक आग्रहों से एकदम मुक्त हैं। उनकी विद्रोही चेतना को अपने साम्प्रदायिक घेरे में बांधने की कोशिश निर्गुणमार्गी रैदास और नाथपंथी योगी ही नहीं करते, चैतन्य महाप्रभु के भक्त उनको 'गौरांग कृष्ण की दासी' बनाने की कोशिश करते हैं तो बल्लभ सम्प्रदाय के अनुयायी पुष्टिमार्ग पर लाने और महाप्रभु की सेविका बनाने का प्रयत्न करते हैं और असफल होकर 'वात्र्ता साहित्य' में ऊलजलूल बातें उनके खिलाफ लिखते हैं। मीरा सफलतापूर्वक इन साम्प्रदायिक सीमाओं का अतिक्रमण करती हैं। उनकी विद्रोही चेतना किसी ढ़ांचे में नहीं बंधती। भक्ति के मार्ग में मीरा कुल मर्यादा और अभिमान को काई की तरह चीरकर प्रेम की निर्मल गंगा बहाती है जिसमें पूरी जातीय अस्मिता सराबोर हो जाती है। सन्त-सम्प्रदाय विश्व-सम्प्रदाय है और उसका धर्म विश्व धर्म है। इस विश्व धर्म का मूलाधार है, हृदय की पवित्रता। पवित्रता-सम्मत स्वाभाविक और सात्त्विक आचरण ने ही यहां धर्म का बृहत रूप गृहण किया। समस्त वासनाओं, इच्छाओं एवं द्वेषों से रहित हृदय की नि:सीमाओं में विशाल धर्म का प्रवेश और समावेश सम्भव है।'
सामाजिक परिप्रेक्ष्य में मीरा की भूमिका का जब हम मूल्यांकन करते हैं तो मीरा की पहली टकराहट सामाजिक रूढिय़ों से होती है। वे सती प्रथा का वैयक्तिक स्तर पर विरोध करती हैं। इससे पूरा परिवार उनके खिलाफ हो जाता है। पारिवारिक प्रताडऩाओं से तंग आकर मीरा वृन्दावन चली जाती हैं। वहां विपत्तियां और बढ़ जाती हैं। वहां राणा के आदमी पीछे पड़े रहे और उनको सही रास्ते पर लाने की कोशिश करते रहे। चैतन्य महाप्रभु और बल्लभाचार्य के शिष्य अपने-अपने सम्प्रदायों में खींचने की जबर्दस्त कोशिश
करते हैं। मध्यकाल में स्त्री की दयनीय स्थिति और निरीहता मीरा में साकार है। राणा सामंती दंभ और अहंकार का प्रतीक है, महाप्रभुओं के सेवक साम्प्रदायिक पाखंड और संकीर्णता के प्रतीक हैं। मीरा के पदों में विह्वल भाव से गिरधर नागर की पुकार सांसारिक विपत्तियों से उन्मोचन के लिए है। मीरा की जीवनगाथा भारतीय स्त्री पर होने वाले अत्याचारों की जीवन्त करुण कथा है। जीव गोस्वामी का स्त्रीमात्र को न देखने का प्रण छुड़वाना, कई अर्थों का संकेत करता है। 'नारी महाविकार' वाली दृष्टि अधूरी, एकांगी और नारी जाति का अपमान करने वाली है। किसी कृष्ण भक्त का ऐसा कहना तो और ज्यादा अनुचित है। मीरा के जीवन का यह प्रकरण जीवन को उसकी सम्पूर्णता में देखने का आग्रह करता है तथा साधु-सन्यासियों और विरक्तों के मानसिक स्तर का भी बोध कराता है।
मीरा को वापस राजमहल लौटा लाने की कोशिशों में किसी प्रकार लगाव-जुड़ाव नहीं, झूठी मान मर्यादा की सामंती रूढि़वादी जकडऩ है। अंतिम समय में रणछोड़ जी में समा जाने का संकेत आत्महत्या का है जिस पर आध्यात्मिकता का रंग चढ़ाया गया है। मीरा के विद्रोह की करुण परिणति भारतीय जीवन में स्त्री की दुखद, हीन और दयनीय स्थिति को भरपूर प्रमाणित एवं प्रकाशित करता है।
निर्णुण भक्ति के संतों का सबसे महत्वपूर्ण आयाम एकत्व की भावना थी जिसमें 'मानव को एक ऐसे विश्वव्यापी धर्म के सूत्रों में निबद्ध करना जहां जाति, वर्ग और वर्ण सम्बन्धी भेद न हो। साधना का यह द्वार सब के लिए उन्मुक्त था, इस क्षेत्र में हिन्दू-मुसलमान का भेद भी विलुप्त हो गया और भक्ति के क्षेत्र में सब समान प्रभावित हुए। निर्गुण भक्ति का पंच तत्व है-सहज साधना। सन्तों की भक्ति-प्रणाली आनन्द और शान्ति में संयुक्त शुद्ध अन्त: करण की वह स्वाभाविक शक्ति है जहां कृत्रिमता स्वत: विलीन हो जाती है सहज साधना का यह मार्ग सर्वथा अभिनव और क्रान्तिकारी था-इसने धार्मिक-जीवन की दुरुहताओं को सदैव के लिए हटा दिया।
मीरा ने भक्ति को एक नया अर्थ दिया। समूचे भक्तिकाल में उनका व्यक्तित्व सबसे विलक्षण है। केवल चैतन्य महाप्रभु से उनकी तुलना हो सकती है। भाव विभोर होकर कीत्र्तन करना, नाचते हुए होशो-हवास खो देना। भक्तिकाल मीरा से एक नया अर्थ पाता है। उनके काव्य में जहां कृष्ण का रसमय प्रेम है परम्परा से हटकर देखें तो मीरा के काव्य में वही सांसारिक विपत्तियों और विडम्बनाओं से मुक्ति के लिए व्याकुल, भयातुर पुकार भी है। जैसे मीरा की भक्ति वैयक्तिक है, पीड़ाएं और कष्ट भी वैयक्तिक हैं। उनकी अपार लोकप्रियता का एक कारण यह भी है कि जनसाधारण उनकी वैयक्तिक पीड़ाओं और कष्टों से आसानी से जुड़ जाता है और उसे अपने कष्टों से मुक्ति का रास्ता भी उनके पदों में दिखता है।
मीरा ने अपने काव्य और आचरण के द्वारा पारम्परिक सामाजिक ढांचे और सामन्ती मूल्यों को जबर्दस्त चुनौती दी। परम्परावादी पुरुषतंत्रात्मक समाज और खोखला सामंती अहंकार कितना क्रूर और अमानवीय हो सकता है, यह मीरा की दारुण शारीरिक-मानसिक पीड़ा के चीत्कार में समाहित है। आध्यात्मिक तड़प के समानान्तरण सांसारिक ताप उनको दग्ध करता रहा और मीरा गिरधर नागर की पुकार लगाती रहीं। पारिवारिक और सामाजिक स्तर पर मीरा द्वारा रूढिय़ों को दी गयी चुनौती सामाजिक एवं ऐेतिहासिक महत्त्व रखती है। मेवाड़ के राणाओं के प्रशस्तिगीत गाने के प्रति हिन्दी कवियों की उपेक्षा और उदासीनता का एक यह भी कारण हो सकता है। साम्प्रदायिक कट्टरता और सामंती क्रूरता का सफल प्रतिरोध करते हुए मीरा ने जीवन की अर्थवेत्ता मानवीय प्रेम और कृष्ण भक्ति में तलाशा। दुनियावी चकाचैंध की निस्सारता का संकेत उनकी कविताएं करती हैं। उसमें आध्यात्मिक संकेत के साथ सामाजिक संदर्भ भी गुंथे हैं। यह दुनिया झूठी मान-मर्यादा और आदर्शों को लेकर चल रही है जिससे अपना तथा दूसरों का जीवन नरक हो गया है। सांसारिक चकाचौंध में खोये हुए व्यक्ति की समझ में केवल संसार की बात आती है। मनुष्य धरती पर विचरण करता है जिसे मूलाधार चक्र कहा गया है। सहस्त्रदल कमल वाला चक्र सातवां है जो गगन मंडल है। ये साधना की गूढ़ और रहस्यात्मक बातें हैं। चेतना के चतुर्थ आयाम में प्रविष्ट होने पर इनकी प्रतीत होती है। वैसे मीरा की साधना सगुण परम्परा ही है पर संत मन की पारिभाषिक शब्दावली का उन्होंने बेहिचक प्रयोग किया है। इस संसार के सारे नाते-रिश्ते झूठे हैं, मिट जाने वाले हैं। केवल कृष्ण जीवन-मरण का साथ निभाने वाला सच्चा साथी है।
संसार दुनियादारी और दुनियावी रिश्तों में नहीं, इस आशा में है कि कल सुख मिलेगा। यह संसार का विज्ञान है। मनुष्य निरंतर इसी के कारण द्वन्द्व की स्थिति में है। यह दुविधा ही माया है। यही भीतर तनाव और शोर पैदा करती है, जिसमें परमात्मा खो जाता है। साधना निद्र्वन्द्व होने का नाम है तभी भीतर परमात्मा प्रकट होता है, मीरा के गीतों में भक्ति का पूरा शास्त्र छिपा है। हृदय के माध्यम से प्रवेश करने पर इन पदों के अर्थ खुलते हैं। एक अन्य पद में मीरा कहती हैं-मूझे नींद नहीं आती। यह सामान्य नींद नहीं है। न तो यह काम- वासना की विकलता है। यह जागरण है। 'तडफ़ै बिन बालम मोर जिया' जब कबीर कहते हैं तो वह इसी तरफ संकेत करते हैं। जो जाग गया है उसकी समझ में संसार का विज्ञान आ गया। यह संसार आकांक्षाओं से भरा है। मनुष्य सपनों और आकांक्षाओं की मृगमरीचिका के पीछे निरंतर दौड़ रहा है। यही वास्तविक नींद है। इस नींद से जाग जाना असाधारण है। गीता में श्रीकृष्ण का कथन 'या निशा सर्व भूतायां तस्य जागर्ति संयमी' का संकेत इसी तरफ है। मीरा कहती हैं- 'मैंने इस संसार के मर्म को उसकी वास्तविकता में पहचान लिया है। अब सोना मेरे लिए संभव नहीं है। प्रियतम का रास्ता देखते- देखते रात का अंधेरा छंट गया- सवेरा हो गया। जैसे मछली जल के बिना तड़पती है वैसे ही उस कृष्ण के लिए मैं तड़प रही हूं।'
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ख्वाहिश


- आशीष दशोत्तर
ठोकर खाकर भी समझे हैं खुद को लोग सयाने कुछ,
लो, ऐसे ही लोग चले हैं दुनिया को समझाने कुछ।

पनघट, पीपल, कच्चे घर, कुछ गलियां छोटी-छोटी सी,
आंखों में यूं आ जाते हैं चलकर ख्वाब पुराने कुछ।

आजादी भी अब तो कितनी दूर तलक फैली देखो,
घर में यूं ही आ जाते हैं हरदम लोग डराने कुछ।

राम अगर हैं हमें बचा ले पल-पल होते दंगों से,
ऐसा ही तो कहती होंगी शायद रोज अजाने कुछ।

अपनी- अपनी ख्वाहिश को हर कोई पूरा कर माना,
उसके हिस्से में आए हैं घरवालों के ताने कुछ।

झण्डे, बैनर, जलसे, जमघट, बड़े- बड़े जयघोष हुए,
बीती रात सुलगते देखी हमने वहीं दुकाने कुछ।

मोटी सुई और पक्का धागा घर में हो तो ले आओ,
इसकी- उसकी और उसकी भी सिल दो आज ज़ुबाने कुछ।

इस अंक के लेखक

अभिषेक ओझा
बलिया (उत्तर प्रदेश) में पैदा हुआ और रांची (झारखण्ड) में पला बढ़ा। किस्मत अब तक जहां भी ले गई... लगता है उसी के लिए बना था। फिलहाल एक इनवेस्टमेंट बैंक में कार्यरत।
पढऩे की बीमारी जो बचपन में लगी वह अब तक जारी है। काम के बाद घूमने-फिरने, फिल्मों और पुस्तकों से जो समय बच जाता है वो हिन्दी प्रेम में व्यतीत होता है... उसी प्रेम की कुछ झलकियां मेरे ब्लाग ojha-uwaach.blogspot.com में भी नजर आ जाती हैं।
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आशीष दशोत्तर
5 अक्टूबर 1977 को रतलाम में जन्मे आशीष दशोत्तर ने एमएससी (भौतिकी) एमए (हिन्दी) एलएलबी तक की शिक्षा प्राप्त की है। उनके प्रकाशित काव्य संग्रह हैं नन्हीं बूंदों का समंदर तथा खुशियां कैद नहीं होती, इसके साथ ही एक गजल संग्रह प्रकाशनाधीन है।
संपर्क : 39, नागर वास
रतलाम 457001 (मप्र)
मो. 098270 84966
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दीपाली शुक्ला
इटारसी में जन्मी 31 वर्षीय दीपाली शुक्ला ने एल.एल.एम. की शिक्षा के बाद पत्रकारिता में कैरियर की शुरूआत नवभारत में बतौर उपसंपादक के रूप में की। वर्तमान में एकलव्य के साथ जुड़ी हैं। विभिन्न विषयों पर लेख और कहानियां अनेक पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित।
संपर्क- फ्लैट नं. टी-1
अमरज्योति अपार्टमेंट,
बी-218, शाहपुरा,
भोपाल म.प्र.-462039
मोबाइल- 9977277425
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चलता रहेगा आत्महत्याओं का दौर

निर्माण की निरंतर बहती एक नदी में स्वराज्यजी ने आंकड़ों के साथ अपनी बात रखने का प्रयास किया है। आंकड़ों पर बहस हो सकती है लेकिन बदलाव की बयार की बात एकदम सही है। इस बदलाव की क्रांति को अब धूर- नक्सली क्षेत्रों तक ले जाने की चुनौती सरकार के सामने है। देखना यह होगा कि मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह इसमें कितना सफल होते हैं। कर्ज माफी के फरेब में किसानों को छत्तीसगढ़ सरकार ने नहीं उलझाया वरन उनके लिए सिंचाई, कम ब्याजदर में कर्ज की उपलब्धता आदि उपाय किेए। परिणाम सामने है। पड़ोसी राज्य के विदर्भ क्षेत्र में कर्ज माफी से उपजी अंतरिम राहत अब दम तोड़ चुकी है। सिंचाई सुविधाओं के अभाव में किसानों की आत्महत्या बदस्तूर जारी है। अब तो कोई चुनाव भी सामने नहीं है, इसलिए कहा जा सकता है कि कम से कम अगले तीन साल और इस क्षेत्र में आत्महत्याओं का दौर चलता रहेगा।
- अंजीव पांडेय, डिप्टी सिटी एडीटर दैनिक 1857,नागपुर, panjeev@gmail.com
बाबू मानसिकता
सरकार की सारी योजनाओं को पलीता लगाने में एक वर्ग पूरी तरह कमर कसकर जुटा है- वह वर्ग है बाबू मानसिकता वाली टीम। दोनों में सांठ-गांठ हो जाए तो इन्हें ब्रह्मा भी नहीं तोड़ सकता है। इनका बस चले तो ये सब कुछ बेच डालें।
अनकही: भ्रष्टाचार और गरीबी का घातक गठबंधन पर प्रतिक्रिया
- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' rdkamboj@gmail.com
भावभीनी विदाई
मुन्ना पाण्डेय जी के लेख बहादुर कलारिन एक जीवंत दस्तावेज के द्वारा हबीब साहब को एक भावभीनी विदाई दी गई है, कहा जा सकता है। हालांकि रंगमंच, हिंदी साहित्य, और लेखन से मेरा कोई गहरा जुड़ाव नहीं है और ना ही इन सबका कोई अनुभव है लेकिन हबीब साहब जैसे रंगधुनी से वाकिफ होना और प्रभावित होना कोई अचरज की बात नहीं। बहादुर कलारिन नाटक और रचनात्मकता को बहुत सलीके से दर्शाया गया है। इस लेख को पढ़ कर मुझे अपने भीतर एक नयी उर्जा, नयी सोच और नयी दिशा का अहसास हुआ इसके लिए मैं मुन्नाजी और उदंती.कॉम का आभारी हूं।
- मनोज मीना, a-vella-label-Ø blog
साफ-सुथरी पत्रिका
उदंती का नवम्बर अंक प्राप्त हुआ। पत्रिका मैंने पहली बार देखी और यह देखकर प्रसन्नता हुई कि आपने किसी भी अखिल भारतीय स्तर की पत्रिका के अनुरूप यह पत्रिका प्रकाशित की है। पत्रिका का कागज, छपाई और सामग्री सभी कुछ स्तरीय और पठनीय है। अनकही के अंतर्गत आपके विचार देश की ज्वलन्त समस्या पर प्रकाश डालते है। पर्यावरण, आपदा प्रबंधन, रंगमंच, पुरातन, वन्य जीवन, लघु कथाएं ये सभी स्तंभ पत्रिका के स्तर को ऊंचा उठाते है। इस अंक में मुझे विशेष रूप से खलील जिब्रान की कहानी महत्वाकांक्षी फूल और लियो तोल्स्तोय के संस्मरण बहुत पसंद आये। इसके साथ ही रंग बिरंगी दुनियां के अंतर्गत दोनों रंगबिरंगे समाचार अच्छे लगे। अभियान के अंतर्गत हैली जी लेख पसन्द आया। एक साफ-सुथरी पत्रिका के प्रकाशन के लिए बधाई।
- संतोष खरे, राजेन्द्र नगर, सतना (मप्र)
सुंदर समायोजन
उदंती डॉट काम पर इतनी दमदार सामग्री का इतने सुन्दर ढ़ंग से आपका समायोजन निश्चित ही पाठकों पर अपना प्रभाव छोड़ता है। रचनाओं का चयन पत्रिका के स्तर के अनुरूप होता है, यह एक बड़ी बात है। आपकी लगन और आपका श्रम निरर्थक नहीं जाएगा, मुझे पूरा विश्वास है।
-सुभाष नीरव, subhneerav@gmail.com
आग को जलाए रखना
आग के ऐसे न जाने कितने दावानल हैं जो हमारे देश के हर इंसान के हृदय में धधक रहा है, लेकिन यह दुखद है कि हम अफसोस मनाते रह जाते हैं। जैसे ही आग बुझती है, यह दावानल भी कहीं दफऩ हो जाता है। लेकिन आप जैसे लिखने वालों की लेखनी में यह दावानल धधकते रहना चाहिए। संतोष कुमार जैसे पत्रकार ही इस आग को जलाए रख सकते हैं। आपके इस आग के लिए आपको बधाई।
- एसएन राणा, रायपुर
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ग्लू ने बचा ली एलाग्रेस की जिंदगी


यह बात आपको अटपटी लग सकती है कि दिमाग के अंदर स्थित रक्त के रिसाव को रोकने के लिए एक खास किस्म के गोंद (ग्लू) का सफलता पूर्वक प्रयोग किया जाए। जी हां, बीते दिनों अमेरिकन सर्जनों ने मात्र 11 महीने की बच्ची की जान बचाने के लिए उसके मस्तिष्क के अंदर स्थित सूक्ष्म रक्तवाहिनियों से होने वाले रक्त के रिसाव को रोकने के लिए एक खास किस्म के गोंद का प्रयोग किया। यह प्रयोग सफल रहा। ब्रिटिश मूल की इस लड़की का नाम है- एलाग्रेस हनीमन। बच्ची के पैदा होने के बाद डॉक्टरी परीक्षणों से यह पता चला कि इसके दिमाग की रक्त वाहिकाओं में छोटे-छोटे छेद हैं। इस बच्ची को जो तकलीफ थी उस तरह के मामलों की संख्या दुनियाभर में प्रतिवर्ष चंद सैकड़ा से ज्यादा नहीं है। डॉक्टरों की राय में एला ग्रेस सिर्फ कुछ महीने ही जिंदा रह सकती थी। कारण, रक्त वाहिनियों से रक्त बाहर रिसकर कपाल या खोपड़ी की सूक्ष्म कैविटी में प्रवेश करने लगा था, इस कारण बच्ची के दिमाग की धमनी असाधारण रूप से फूल गयी थी। इस स्थिति को चिकित्सकीय भाषा में एन्यूरिज्म कहते है। यह स्थिति बच्ची की जिंदगी को संकट में डाल रही थी। इसलिए इस नाजुक हालत में डॉक्टरों ने जोखिम लेकर एला का ऑपरेशन करने का फैसला किया और इस खास किस्म के ग्लू ने उसे बचा लिया।
बिना तेल से जब उड़ेंगे विमान
दुनिया में बढ़ते वाहन प्रदूषणों से बचने के लिए अब ईधन के विकल्प के बारे में सोचे जाना लगा है। सड़कों पर चलने वाली कई गाडिय़ां अब सौर ऊर्जा और बैटरी से चलने लगी हैं, इसी तरह विमान को उड़ाने के लिए ईधन का विकल्प ढूंढा गया है।
जरा सोचिए, अगर बिना तेल की टंकी भरे कोई विमान आसमान में उड़ता नजऱ आए तो कैसा लगेगा। जी हां, अब एक ऐसे विमान को उड़ाने की तैयारी की जा रही है। ईधन की ज़रूरत को पूरा करने के विकल्प के तौर पर इस विमान में सौर ऊर्जा का इस्तेमाल किया जाएगा।
सौर ऊर्जा से चलने वाले विमान का मॉडल पूरी दुनिया का चक्कर लगाने के लिए उड़ चुका है। इस विमान की वास्तविक उड़ान फरवरी में प्रस्तावित है और इसका अंतिम स्वरूप 2012 में अटलांटिक महासागर को पार करने की कोशिश करेगा।
विमान की चौड़ाई हालांकि जंबो जेट विमान जितनी है लेकिन इसका वजन मात्र 1,500 किलोग्राम है और इसके चालक हैं स्वीडन के पायलट बर्टेंड पिकार्ड। सोलर इंपल्स के मुख्य अधिशाषी एंड्रे बोर्शबर्ग का कहना है, 'ये बहुत ही रोमांचक है, हम अब काफी ठोस स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं। आपको इस विमान की खूबियों को महसूस करना चाहिए और अब इसे ज़्यादा देर तक ज़मीन पर खड़ा नहीं रखा जा सकता।' बोर्शबर्ग ने कहा कि अगर सब कुछ संतोषजनक रहता है तो हम इसे फरवरी में कऱीब दो घंटे की उड़ान के लिए इजाज़त देंगे। लेकिन हरेक स्तर पर काफी सावधानी बरती जाएगी।