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Aug 20, 2009

गंगू बाई हंगल

शास्त्रीय संगीत के एक युग का अंत
गंगूबाई हंगल की गायकी की कई खास बेमिसाल बातों में से एक यह थी कि वे हर राग को धीरे- धीरे खोलती थी... बिल्कुल, जैसे सुबह की हर किरण पर एक-एक पंखूड़ी खुलती हो। भारतीय शास्त्रीय संगीत की सुप्रसिद्ध गायिका गंगूबाई हंगल का 21 जुलाई 2009 को  97 वर्ष की अवस्था में निधन हो गया है। उन्होंने 50 साल से अधिक समय तक संगीत की सेवा की और इस दौरान भारतीय शास्त्रीय संगीत को नई ऊंचाई तक पहुंचाया।  गंगूबाई ने अपनी कला के प्रदर्शन की शुरुआत किशोरावस्था में मुंबई में स्थानीय समारोहों और गणेश उत्सवों में गायकी से की थी। शास्त्रीय संगीत को बेहतरीन योगदान के लिए उन्हें अनेक सम्मान और पुरस्कार मिले जिनमें पद्म भूषण, तानसेन पुरस्कार, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार प्रमुख हैं।
गंगूबाई हंगल का जन्म 5 मार्च, 1913 कर्नाटक के धारवाड़ जिले के शुक्रवारादापेते में देवदासी परंपरा वाले केवट परिवार में हुआ था। उनका संगीतमय जीवन लंबे संघर्ष की कहानी है। गंगूबाई का नाम गंगूबाई की क्यूं पड़ा इसके पीछे भी एक कहानी है। उनका वास्तविक नाम गान्धारी था पर उनके संगीत को जनता के सामने पहुंचाने का जिम्मा जिस कंपनी ने सबसे पहले लिया उसके अधिकारियों का मानना था कि उस ज़माने का श्रोता वर्ग सिर्फ नाचने गाने वाली बाइयों के ही रिकार्ड खरीदता है। इसीलिए उन्होंने गान्धारी हंगल जैसे प्यारे नाम को बदल कर चलताऊ गंगूबाई हंगल कर दिया।
गंगूबाई को बचपन में अक्सर जातीय टिप्पणी का सामना करना पड़ा और उन्होंने जब गायकी शुरू की तब उन्हें उन लोगों ने 'गानेवाली' कह कर पुकारा जो इसे एक अच्छे पेशे के रूप में नहीं देखते थे। अपनी आत्म कथा में वे लिखती हैं कि किस तरह लोग उन्हें गानेवाली कह कर ताने मारा करते थे ...कैसे उन्होंने जातीय और लिंग बाधाओ को पार किया और किराना उस्ताद सवाई गंधर्व से हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की तालीम ली।
उन्होंने स्वतंत्र भारत में खयाल गायिकी की पहचान बनाने में महती भूमिका निभाई। छोटी कद काठी की गंगूबाई की आवाज इतनी वजनदार और ठहरी हुई थी कि एक- एक स्वर और कान पर हाथ रखकर खींची गई तान आसमान को भेद देते थे। भारतीय शास्त्रीय संगीत की नब्ज पकड़कर और किराना घराना की विरासत को बरकरार रखते हुए परंपरा की आवाज का प्रतिनिधित्व करने वाली गंगूबाई हंगल ने लिंग और जातीय बाधाओं को पार कर व भूख से लगातार लड़ाई करते हुए भी उच्च स्तर का संगीत दिया। उनकी आत्मकथा मेरे जीवन का संगीत शीर्षक से प्रकाशित हुई है।
पुरानी पीढ़ी की एक नेतृत्वकर्ता गंगूबाई ने गुरु-शिष्य परंपरा को बरकरार रखा। उनमें संगीत के प्रति जन्मजात लगाव था और यह उस वक्त दिखाई पड़ता था जब अपने बचपन के दिनों में वह ग्रामोफोन सुनने के लिए सड़क पर दौड़ पड़ती थी और उस आवाज की नकल करने की कोशिश करती थी।
अपनी बेटी में संगीत की प्रतिभा को देखकर गंगूबाई की संगीतज्ञ मां ने कर्नाटक संगीत के प्रति अपने लगाव को दूर रख दिया। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि उनकी बेटी संगीत क्षेत्र के एच कृष्णाचार्य जैसे दिग्गज और किराना उस्ताद सवाई गंधर्व से सर्वश्रेष्ठ हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत सीखे।
गंगूबाई ने अपने गुरु सवाई गंधर्व की शिक्षा के बारे में एक बार कहा था कि मेरे गुरूजी ने यह सिखाया कि जिस तरह से एक कंजूस अपने पैसों के साथ व्यवहार करता है, उसी तरह सुर का इस्तेमाल करो, ताकि श्रोता राग की हर बारीकियों के महत्व को संजीदगी से समझ सके।
गंगूबाई की मां अंबाबाई कर्नाटक संगीत की ख्यातिलब्ध गायिका थीं। इन्होंने प्रारंभ में देसाई कृष्णाचार्य और दत्तोपंत से शास्त्रीय संगीत सीखा, इसके बाद इन्होंने सवाई गंधर्व से शिक्षा ली। संगीत के प्रति गंगूबाई का इतना लगाव था कि कंदगोल स्थित अपने गुरु के घर तक पहुंचने के लिए वह 30 किलोमीटर की यात्रा ट्रेन से पूरी करती थी और इसके आगे पैदल ही जाती थी। यहां उन्होंने भारत रत्न से सम्मानित पंडित भीमसेन जोशी के साथ संगीत की शिक्षा ली। किराना घराने की परंपरा को बरकार रखने वाली गंगूबाई इस घराने और इससे जुड़ी शैली की शुद्धता के साथ किसी तरह का समझौता किए जाने के पक्ष में नहीं थी।
गंगूबाई को भैरव, असावरी, तोड़ी, भीमपलासी, पूरिया, धनश्री, मारवा, केदार और चंद्रकौंस रागों की गायकी के लिए सबसे अधिक वाहवाही मिली। उनके निधन के साथ संगीत जगत ने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के उस युग को दूर जाते हुए देखा, जिसने शुद्धता के साथ अपना संबंध बनाया था। यह मान्यता है कि संगीत ईश्वर के साथ अंतरसंवाद है जो हर बाधा को पार कर जाती है।
उन्होंने एक बार कहा था कि मैं रागों को धीरे-धीरे आगे बढ़ाने और इसे धीरे- धीरे खोलने की हिमायती हूं ताकि श्रोता उत्सुकता से अगले चरण का इंतजार करे। किराना घराना के ही जाने-माने गायक पंडित छन्नूलाल मिश्र उन्हें याद करते हुए कहते है, 'मुझे बहुत दुख है कि इतनी महान कलाकार गुजर गईं। वे बहुत पुरानी कलाकार थीं। उनकी गायकी का अंदाज बहुत बेहतरीन था। बहुत अलग.. सबसे खास बात तो ये कि उनके गाने का और प्रस्तुति का तरीका बहुत गंभीर था। गंभीर और मर्दाना आवाज में वो गाती थी। उनको सुनते हुए ऐसा लगता था कि कोई पुरूष गा रहा है। उन्होंने बड़ी तपस्या की और इस मुकाम पर पहुंचीं'। (उदंती फीचर्स)

चंद्रमा में इंसानी फतह के 40 बरस

- रमेश शर्मा
चंद्रमा, जिसको बुढिय़ा के बाले, स्वर्गलोक की सीढ़ी और न जाने किन- किन मिथकों के सहारे परिभाषित किया जाता था, वह अब इंसान के लिए 'चंदा मामा दूर के' नहीं रह गया है। चंद्र अभियान ने लोगों की सोच को परिष्कृत किया, वैज्ञानिक चेतना प्रखर हुई और अब दुनिया मंगल की तरफ बढ़ रही है।
समूची मानव सभ्यता को वैज्ञानिक चेतना के लिए यह सचमुच गौरवमय उपलब्धि है कि हम चांद पर पहुंचने की चालीसवीं वर्षगांठ पूरी कर रहे हैं। 20 जुलाई 1969 को अमरीका के तीन चंद्रयात्री 'अपोलो-1' नामक अंतरिक्षयान में बैठकर चंद्रमा के लिए रवाना हुए थे और कुल 3.88 लाख किलोमीटर का लंबा सफल चार दिनों में तय करके उनका चंद्रयान (ईगल) चंद्रमा में उतरा था।
ईगल के चंद्रतल पर उतरने का टीवी प्रसारण 66 देशों में किया गया था। चंद्रमा की धरती पर पहला कदम रखते हुए चंद्रयात्री नील आर्मस्ट्रांग ने कहा था- यह इंसान का छोटा सा एक कदम है लेकिन 
समूची मानवजाति के लिए एक बड़ी छलांग है। सचमुच चंद्रमा को फतह करते हुए मानव सभ्यता ने एक बड़ी छलांग लगाकर चंद्रमा से जुड़ी कपोल कल्पनाओं और मिथकों की अनेक सदियों को बदल कर रख दिया था। दुनिया ने देख लिया था कि रात अंधेरे में सिर उठाकर देखने पर जो बड़ा सा दूधिया अंतरिक्ष पिंड नजर आता है वह कोई अजूबा नहीं है बल्कि जैसे हमारी पृथ्वी पर धूल, गड्ढे, पर्वत और लंबे खड्ड हैं वैसे ही चंद्रमा पर भी सब कुछ पृथ्वी सरीखा ही है। सिर्फ एक चीज जो वहां नहीं है वह है पृथ्वी सरीखा वातावरण और सबसे जरुरी ऑक्सीजन जो हमारे लिए प्राणवायु का काम करती है। चंद्रमा का गुरुत्व बल भी पृथ्वी के मुकाबले 1/5 है। अर्थात पृथ्वी की किसी चीज का वजन 50 किलो है तो चंद्रमा पर उसका वजन सिर्फ 10 किलो रह जाएगा। यही वजह है कि वहां के चंद्रयात्रा विचरण करते हुए अपने शरीर पर भारी- भरकम 'स्पेससूट' के बावजूद उड़ते हुए से लगते हैं।
जब 1960 के दशक में रूस और अमरीका के बीत शीतयुद्ध चला और दुनिया भर की बड़ी लड़ाइयां थमी हुई थी तब विज्ञान के जरिये सोच की दिशा बदलने के लिए दोनों मुल्कों ने अंतरिक्ष कार्यक्रम चलाए थे। एक किस्म की होड़ चली थी जिसमें बाजी अमरीका के हाथ लगी थी। तब छह अरब डॉलर खर्च करने चंद्रमा मिशन जारी रखने के लिए तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति निक्सन को कड़ी आलोचना झेलनी पड़ी थी। एक तर्क था कि इस फिजूलखर्ची को रोककर गरीबी उन्मूलन के कार्यक्रम हाथ में लिए जाने चाहिए मगर अमरीकी जनता की भारी रूचि और दुनिया में अपनी नाक सदैव ऊंची रखने की अमरीकी शासकों की सोच के चलते अपोलो मिशन सफलता से पूरे हुए। शुरुआत में ही अपोलो के चंद्रयात्री उड़ान भरते ही काल- कवलित हो गए। मिशन को ग्रहण लगा। जांच में सुधार के लिए 1700 सुझाव आए। इन पर अमल हुआ। विमान का ढांचा बदला गया। मिशन सफल हुआ।
भारत जैसे विकासशील मुल्क भी अब चंद्रमा फतह की दौड़ में शरीक हो चुके हैं। हमारा कोई चंद्रयात्री कभी चंद्रमा के टै्रंक्विलिटी बेस पर जाकर अपने हाथों से हमारा झंडा गाड़ेगा? इस बात पर फिलहाल शुभकामनाएं ही दी जा सकती है। अब यहां भी सवाल उठ रहे हैं कि इतना खर्च करने की 'इसरो' को क्या जरूरत है? ऐसी ही किरकिरी अमरीका के 'नासा' को भी झेलनी पड़ी थी। यह तो दुनिया का दस्तूर है। आविष्कार और निहित स्वार्थों का विरोध सतत साथ चलते है। 1909 में जहां महान अविष्कारक गैलीलियो ने दूरबीन का अविष्कार किया था तब उनको चर्च ने इस 'पाप' के लिए बाकायदा सजा दी थी। कहा गया था कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा नहीं करती बल्कि सूर्य पृथ्वी की परिक्रमा करता था। तब गैलीलियो को माफी मांगकर जीवन रक्षा करनी पड़ी थी मगर उनका शोध जारी रहा।
आज दुनिया जानती है कि कौन किसका चक्कर लगाता है। दरअसर रूढि़वाद, पोंगापंडित वाद और दकियानूसी सोच ही विज्ञान के कदमों में रोड़ा अटकाते रहे हैं और चंद्रमा को फतह करने की पहली वर्षगांठ पर यह उपलब्धि ही महत्वपूर्ण है कि चंद्रमा, जिसको बुढिय़ा के बाले, स्वर्गलोक की सीढ़ी और न जाने किन- किन मिथकों के सहारे परिभाषित किया जाता था, वह अब इंसान के लिए 'चंदा मामा दूर के' नहीं रह गया है। चंद्र अभियान ने लोगों की सोच को परिष्कृत किया, वैज्ञानिक चेतना प्रखर हुई और अब दुनिया मंगल की तरफ बढ़ रही है। सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण को लोकर भी वैज्ञानिक नजरिया बहुमान्य हुआ है। विज्ञान के सार्थक इस्तेमाल ने चंद्रमा को हमारे और नजदीक ला दिया है।
Email- sharmarameshcg@gmail.com

भोजली

देवी गंगा, देवी गंगा, लहर तुरंगा
 - प्रो. अश्विनी केशरवानी
छत्तीसगढ़ में मनाया जाने वाला भोजली का त्योहार मित्रता का वह पर्व है जिसे जीवन भर निभाने का संकल्प लिया जाता है। अपनी लहलहाती फसल को देखकर किसान एक ओर जहां प्रकृति के प्रति कृतज्ञयता ज्ञापन करता हैं तो दूसरी ओर गांव की बालाएं इस हरियाली को देखकर गीत गाती हैं, उसकी सेवा करती हैं।
श्रावण मास में जब प्रकृति अपने हरे परिधान में चारों ओर हरियाली बिखेरने लगती है तब कृषक अपने खेतों में बीज बोने के पश्चात् गांव के चौपाल में आल्हा के गीत गाने में मगन हो जाते हैं। इस समय अनेक लोक पर्वो का आगमन होता है और लोग उसे खुशी- खुशी मनाने में व्यस्त हो जाते हैं। इन्हीं त्योहारों में भोजली भी एक है। कृषक बालाएं प्रकृति देवी की आराधना करते हुए भोजली त्योहार मनाती हैं। अपने अपने घरों में वे टोकनी में मिट्टी भरकर भोजली उगाती हैं।  जिस प्रकार भोजली एक सप्ताह के भीतर खूब बढ़ जाती है, उसी प्रकार हमारे खेतों में फसल दिन दूनी रात चौगुनी हो जाये... कहते हुए जैसे वे भविष्यवाणी करती हैं कि इस बार फसल लहलहायेगी। और वे सुरीले स्वर में गा उठती हैं - 
अहो देवी गंगा ! देवी गंगा, देवी गंगा, लहर तुरंगा,
हमर भोजली दाई के भीजे आठों अंगा।
अर्थात् हमारे प्रदेश में कभी सूखा न पड़े। वे आगे कहती हैं-
आई गईस पूरा, बोहाइ गइस कचरा।
हमरो भोजली दाई के, सोन सोन के अचरा।।
 गंगा माई के आगमन से उनकी भोजली देवी का आंचल स्वर्ण रूपी हो गया। अर्थात् खेत में फसल तैयार हो रही है और धान के खेतों में लहलहाते हुए पीले-पीले बाली आंखों के सामने नाचने लगती है। कृषक बालाएं कल्पना करने लगती हैं-
आई गईस पूरा, बोहाइ गइस मलगी।
हमरो भोजली दाई के सोन सोन के कलगी।।
यहां पर धान के पके हुए गुच्छों से युक्त फसल की तुलना स्वर्ण की कलगी से की गई है। उनकी कल्पना सौष्ठव की पराकाष्ठा पर पहुंच जाती है। फसल पकने के बाद क्या होता है देखिये उसकी एक बानगी -
कुटी डारेन धाने, छरी डारेन भूसा।
लइके लइके हवन भोजली झनि होहा गुस्सा।।
अर्थात् खेत से धान लाकर कूट लिए, इससे हरहर चांवल और भूसा अलग अलग कर लिए हैं। चंूकि यह नन्ही-नन्ही बालिकाओं के द्वारा किया गया है, अत: संभव है कुछ भूल हो गई हो? इसलिए नम्रता पूर्वक वे क्षमा मांग रही हैं। 'झनि होहा गुस्सा' (गुस्सा मत होना) और यह भी कि बांस के कोठे में रखा हुआ अनाज कैसा है इसके बारे में वे कहती हैं-
बांसे के टोढ़ी मा धरि पारेन चांउर,
महर महर करे भोजली के राउर।
समस्त फसलों के राजा धान को बालिका ने बांस के कोठे में रख दिया है जिसके कारण उनकी सुंदर महक चारों ओर फैल रही है। छत्तीसगढ़ में कृषकों का जीवन धान की खेती पर ही अवलंबित होता है अत: यदि फसल अच्छी हो जाये तो वर्ष भर आनंद ही आनंद होगा अन्यथा दुख के सिवाय उनको कुछ नहीं मिलेगा। फिर धान केवल वस्तु मात्र तो नहीं है, वह तो उनके जीवन में देवी के रूप में भी है। इसीलिए तो भोजली देवी के रूप में उसका स्वागत हो रहा है -
सोने के कलसा, गंगा जल पानी,
हमरों भोजली दाई के पैया पखारी।
सोने के दिया कपूर के बाती,
हमरो
भोजली दाई
के उतारी 
आरती।।
अर्थात सोने के कलश और गंगा के जल से ही कृषक बाला उनके पांव पखारेंगी। जब जल कलश सोने का है तो आरती उतारने का दीपक भी सोने का होंना चाहिए। कल्पना और भाव की उत्कृष्टता पग पग पर छलछला रही है... देखिये उनका भाव -
जल बिन मछरी, पवन बिन धान,
सेवा बिन भोजली के तरथते प्रान।
जब भोली देवी की सेवा-अर्चना की है तो वरदान भी चाहिये लेकिन अपने लिए नहीं बल्कि अपने भाई और भतीजों के लिए, देखिये एक बानगी -
गंगा गोसाई गजब झनि करिहा,
भइया अऊ भतीजा ला अमर देके जइहा।
भारतीय संस्कृति का निचोड़ मानों यह कृषक बाला है,    
भाई के प्रति सहज, स्वाभाविक, त्यागमय अनुराग की प्रत्यक्ष मूर्ति! 'देवी गंगा देवी गंगाÓ की टेक मानों वह कल्याणमयी पुकार हो जो जन-जन, ग्राम ग्राम को नित 'लहर तुरंगाÓ से ओतप्रोत कर दे। सब ओर अच्छी वर्षा हो, फसल अच्छी हो और चारों ओर खुशहाली ही खुशहाली हो...!
छत्तीसगढ़ में भोजली का त्योहार रक्षा बंधन के दूसरे दिन मनाया जाता है। इस दिन संध्या 4 बजे भोजली लेकर गांव की बालिकाएं गांव के चौपाल में इकट्ठा होती हैं और बाजे गाजे के साथ वे भोजली लेकर जुलूस की शक्ल में पूरे गांव में घूमती हैं।
वे गांव का भ्रमण करते हुए गांव के गौंटिया/ मालगुजार के घर जाते हैं जहां उसकी आरती उतारी जाती है फिर भोजली का जुलूस नदी अथवा तालाब में विसर्जन के लिए ले जाया जाता है। नदी अथवा तालाब के घाट को पानी से भिगोकर धोया जाता है  फिर भोजली को वहां रखकर उनकी पूजा-अर्चना की जाती है और तब उसका जल में विसर्जन किया जाता है। इस अवसर पर ग्रामीण बालाएं नये-नये परिधान धारण कर भोजली को हाथ  अथवा सिर में टोकनी में रख कर लाती हैं। वे मधुर कंठ से भोजली गीत गाते हुए आगे बढ़ती हैं। भोजली की बालियों को मंदिरों में चढ़ाया जाता है।
 इस दिन की खास बात यह है कि वे अपनी समवयस्क बालाओं के कान में भोजली की बाली (खोंचकर) लगाकर 'भोजली' अथवा 'गींया' (मित्र) बदने की प्राचीन परंपरा है। जिनसे भोजली अथवा गींया बदा जाता है उसका नाम वे जीवन भर अपनी जुबान से नहीं लेते और उन्हें भोजली अथवा गींया संबोधित करके पुकारते हं। माता-पिता भी उन्हें अपने बच्चों से बढ़कर मानते हैं। उन्हें हर पर्व और त्योहार में आमंत्रित कर सम्मान देते हैं।
मित्रता के इस महत्व के अलावा वे घर और गांव में अपने से बड़ों को भोजली की बाली देकर उनका आशीर्वाद लेती हैं तथा अपने से छोटों के प्रति अपना स्नेह प्रकट करती हैं। भोजली, छत्तीसगढ़ में मैत्री का ऐसा सुंदर और पारंपरिक त्योहार है, जिसे आज के युवाओं द्वारा मनाए जाने वाले फ्रेंडशिप डे के मुकाबले कई सौ गुना बेहतर कहा जा सकता है। भोजली बदकर की गई दोस्ती मरते दम तक नहीं टूटती जबकि फ्रेंडशिप डे मात्र एक दिन के लिए मौज- मस्ती करने वाली दिखावे की दोस्ती होती है।
संपर्क- प्रो. अश्विनी केशरवानी, राघव, डागा कालोनी,
चांपा-495671(छग)

तीन लघुकथाएँ

1. आधुनिकता
- रचना गौड़ 'भारती'
  गांव में भी अब पढ़ी-लिखी बहुओं का आगमन होने लगा है। गांव के लोग शहरी लोगों से अपने आपको ज्यादा एडवांस यानि आधुनिक समझतें हैं। ऐसे ही किशोरीलाल जी के घर का माहौल था। नौकरी पर आते जाते सारे परिवार के सदस्य उनके आगे पीछे रहते कोई उनके जूते लाता कोई उनका गिलास, कोई दौड़कर गरमागरम चाय की प्याली।
बेटे की शादी के बाद नौकरी करती बहू घर में आई। सास की आशाएं, ननदों की उम्मीदें और पति धर्म का कत्र्तव्य सभी कुछ जुड़ा था उसके साथ। लिहाजा दफ्तर जाने से पूर्व सारे घर का काम करके जाती और लौटकर थकीहारी जैसे ही घर में घुसती उसके कानों में आवाज पड़ती 'आ गई बहू जल्दी करो खाना बनाने का समय होने वाला है।' परम्पराओं के वृक्ष के पत्ते मात्र ही आधुनिकता की हवा हिला पाई है जड़ें तो जहां की तहां ही हैं। 
2. समाज सुधार
शहर का जाना माना रईस था, जो कभी कबाड़ी हुआ करता था। प्रॉपर्टी खरीद फरोख्त ने उसे शायद 
यह ऊंचाई दिखाई थी। शहर के हर कोने में बनी जाने कितनी बिल्डिंग का मालिक। समाज सेवक के रूप में पूजा जाने वाला बशेशर प्रसाद पैसा दानखाते में पानी की तरह बहाता। गरीब अविवाहित लड़कियों के धन देकर विवाह कराता। ताश की महफिलों में उठना बैठना उसकी दिनचर्या में शामिल था। महफिल से तभी उठता जब गड्डियों का भार उसके हाथों में होता। एक हाथ से पैसा लेता दूसरे हाथ से गरीब लड़कियों के परिवारों पर खर्च करता। उसका रवैया सामान्य जन की समझ से बाहर था। एक दिन श्यामा की मां को उसके बारे में पता चला और वो उससे मिलने उसके घर गईं। बशेशर प्रसाद उस समय अपने बैडरूम में था, उसे भी वहीं बुला लिया। श्यामा की मां की नजर दो नवयुवतियों पर पड़ी जो उसके बैड के पास बैठी थीं ये देख उसकी उदारता से वह गद्गद् हो उठीं कि गरीबों का कितना ख्याल रखता है बशेशर प्रसाद। अपने आराम के समय में भी दुखियों का दुख दर्द सुन रहा है। खैर! श्यामा की मां बोलीं-'नमस्ते साहब! मैं एक गरीब दुखिया हूं मेरी जवान व खूबसूरत बेटी हाथ पीले करने लायक हो गई है आप थोड़ी सहायता करते तो हम पर उपकार होता।
बशेशर-'उपकार कैसा? यह तो मेरा धर्म है कल से उसे यहां दो घण्टे के लिए भेज देना। मैं देखूंगा जो बन पड़ेगा करूंगा।
श्यामा की मां घर लौट आयी घर आकर खुशी खुशी श्यामा को अगले दिन बशेशर प्रसाद के घर खुद छोडऩे गई। बशेशर प्रसाद के पी.ए. ने उसका नाम नोटबुक में लिखा और उसे बशेशर के बेडरूम में ले गया। मां देखती रह गई कमरे का दरवाजा बन्द हो गया। बशेशर के समाज सुधार कार्य में एक और पुण्य कार्य जुड़ गया, तो क्या हुआ? शबरी भी तो झूठे बेर राम जी को खिलाती थी।
3. कुर्सी का नशा 
आज रमेश के दिल को गहरी ठेस लगी थी। ऑफिस के जरूरी कागजात की फाइल जिस सेक्शन में पास होनी थी वहां के ऑफिसर वीरेन्द्र राठौड़ ने उसे असंतुष्ट कर देने वाला जवाब दिया। रमेश खिन्न हो, अपने केबिन में बड़बड़ाने लगा-'पता नहीं लोगों को कुर्सी का इतना नशा होता है कि इंसान की परेशानी और जरूरत को भी नहीं समझते। उनके लिए तो साधारण सी बात है, मगर मेरी तो रातों की नींद पर बनी है। खैर! देर- सबेर रमेश का काम हो गया और कुछ समयान्तराल पश्चात् प्रमोशन के बाद वह भी सीनियर ऑफिसर की गिनती में आने लगा।
अचानक फोन बजा-'हैलो! रमेश जी, पहचाना मुझे, आपका पुराना पड़ोसी अंकुर जैन बोल रहा हूं। यार! मेरा काम जल्दी करवा दो, फाइल आपके पास अटकी पड़ी है।'
रमेश ने जवाब दिया-'अरे भई! यहां काम के लिए हर व्यक्ति पहचान लेकर आ जाता है। हमारी परेशानी तो कोई समझता नहीं, सारा दिन लोगों को डील करते-करते दिमाग पक जाता है। आप समय का इंतजार करें अभी मैं व्यस्त हूं। फोन कट गया। माहौल खामोश था। परिस्थितियां वहीं थीं बस कुर्सी के आगे-पीछे के लोग परिवर्तित हो गए थे और कुर्सी का नशा ज्यों का त्यों बरकरार था।

आधार

प्रेमचंद के उपनाम से लिखने वाले धनपत राय श्रीवास्तव प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के निकट लमही गाँव में हुआ था। आधुनिक हिन्दी कहानी के पितामह प्रेमचंद ने हिन्दी कहानी और उपन्यास की एक ऐसी परंपरा का विकास किया जिस पर पूरी शती का साहित्य आगे चल सका। तैंतीस वर्षों के रचनात्मक जीवन में वे साहित्य की ऐसी विरासत सौंप गए जो गुणों की दृष्टि से अमूल्य है और आकार की दृष्टि से असीमित। उन्होंने कुल 15 उपन्यास, 300 से कुछ अधिक कहानियां,  3 नाटक, 10 अनुवाद, 7 बाल पुस्तकें तथा हजारों पृष्ठों के लेख, सम्पादकीय, भाषण, भूमिका, पत्र आदि की रचना की।  जीवन के अंतिम दिनों में वे गंभीर रुप से बीमार पड़े। उनका उपन्यास मंगलसूत्र पूरा नहीं हो सका और लंबी बीमारी के बाद 8 अक्टूबर 1936 को उनका निधन हो गया। देखा जाए तो भारतीय साहित्य का बहुत सा विमर्श जो बाद में प्रमुखता से उभरा चाहे वह दलित साहित्य हो या नारी साहित्य उसकी जड़ें कहीं गहरे प्रेमचंद के साहित्य में दिखाई देती हैं। प्रेमचंद के पात्र सारे के सारे वो हैं जो कुचले, पिसे और दुख का बोझ सहते हुए हैं। 

आधार
- मुंशी प्रेमचन्द
 सारे गांव में मथुरा का सा गठीला जवान न था। कोई बीस बरस की उमर थी। मसें भीग रही थी। गउएं चराता, दूध पीता, कसरत करता, कुश्ती लड़ता था और सारे दिन बांसुरी बजाता हाट में विचरता था। ब्याह हो गया था, पर अभी कोई बाल-बच्चा न था। घर में कई हल की खेती थी, कई छोटे-बड़े भाई थे। वे सब मिलजुलकर खेती-बारी करते थे। मथुरा पर सारे गांव को गर्व था, जब उसे जांघिये-लंगोटे, नाल या मुग्दर के लिए रूपये-पैसे की जरूरत पड़ती तो तुरन्त दे दिये जाते थे। सारे घर की यही अभिलाषा थी कि मथुरा पहलवान हो जाय और अखाड़े में अपने सवाये को पछाड़े। इस लाड़-प्यार से मथुरा जरा टर्रा हो गया था। गायें किसी के खेत में पड़ी है और आप अखाडें में दंड लगा रहा है। कोई उलाहना देता तो उसकी त्योरियां बदल जाती। गरज कर कहता, जो मन में आये कर लो, मथुरा तो अखाड़ा छोड़कर हांकने न जायेंगे! पर उसका डील-डौल देखकर किसी को उससे उलझने की हिम्मत न पड़ती । लोग गम खा जाते
गर्मियों के दिन थे, ताल-तलैया सूखी पड़ी थी। जोरों की लू चलने लगी थी। गांव में कहीं से एक सांड आ निकला और गउओं के साथ हो लिया। सारे दिन गउओं के साथ रहता, रात को बस्ती में घुस आता और खूंटों से बंधे बैलों को सींगों से मारता। कभी-किसी की गीली दीवार को सींगो से खोद डालता, घर का कूड़ा सींगों से उड़ाता। कई किसानों ने साग-भाजी लगा रखी थी, सारे दिन सींचते-सींचते मरते थे। यह सांड रात को उन हरे-भरे खेतों में पहुंच जाता और खेत का खेत तबाह कर देता। लोग उसे डंडों से मारते, गांव के बाहर भगा आते, लेकिन जरा देर में गायों में पहुंच जाता। किसी की अक्ल काम न करती थी कि इस संकट को कैसे टाला जाय। मथुरा का घर गांव के बीच में था, इसलिए उसके खेतों को सांड से कोई हानि न पहुंचती थी। गांव में उपद्रव मचा हुआ था और मथुरा को जरा भी चिन्ता न थी।
आखिर जब धैर्य का अंतिम बंधन टूट गया तो एक दिन लोगों ने जाकर मथुरा को घेरा और बोले—भाई, कहो तो गांव में रहें, कहो तो निकल जाएं। जब खेती ही न बचेगी तो रहकर क्या करेगें? तुम्हारी गायों के पीछे हमारा सत्यानाश हुआ जाता है, और तुम अपने रंग में मस्त हो। अगर भगवान ने तुम्हें बल दिया है तो इससे दूसरों की रक्षा करनी चाहिए, यह नहीं कि सबको पीस कर पी जाओ। सांड तुम्हारी गायों के कारण आता है और उसे भगाना तुम्हारा काम है, लेकिन तुम कानों में तेल डाले बैठे हो, मानो तुमसे कुछ मतलब ही नहीं।
मथुरा को उनकी दशा पर दया आयी। बलवान मनुष्य प्राय: दयालु होता है। बोला—
अच्छा जाओ, हम आज सांड को भगा देंगे।
एक आदमी ने कहा—दूर तक भगाना, नहीं तो फिर लौट आयेगा।
मथुरा ने कंधे पर लाठी रखते हुए उत्तर दिया— अब लौटकर न आयेगा।
चिलचिलाती दोपहरी थी। मथुरा सांड को भगाये लिए जाता था। दोंनों पसीने से तर थे। सांड बार-बार गांव की ओर घूमने की चेष्टा करता, लेकिन मथुरा उसका इरादा ताड़कर दूर ही से उसकी राह छेंक लेता। सांड क्रोध से उन्मत्त होकर कभी-कभी पीछे मुड़कर मथुरा पर तोड़ करना चाहता लेकिन उस समय मथुरा सामना बचाकर बगल से ताबड़-तोड़ इतनी लाठियां जमाता कि सांड को फिर भागना पड़ता कभी दोनों अरहर के खेतो में दौड़ते, कभी झाडिय़ों में । अरहर की खूटियों से मथुरा के पांव लहू-लुहान हो रहे थे, झाडिय़ों में धोती फट गई थी, पर उसे इस समय सांड का पीछा करने के सिवा और कोई सुध न थी। गांव पर गांव आते थे और निकल जाते थे। मथुरा ने निश्चय कर लिया कि इसे नदी पार भगाये बिना दम न लूंगा। उसका कंठ सूख गया था और आंखें लाल हो गयी थी, रोम-रोम से चिनगारियां सी निकल रही थी, दम उखड़ गया था, लेकिन वह एक क्षण के लिए भी दम न लेता था। दो ढाई घंटों के बाद जाकर नदी आयी। यहीं हार-जीत का फैसला होने वाला था, यहीं से दोनों खिलाडिय़ों को अपने दांव-पेंच के जौहर दिखाने थे। सांड सोचता था, अगर नदी में उतर गया तो यह मार ही डालेगा, एक बार जान लड़ा कर लौटने की कोशिश करनी चाहिए। मथुरा सोचता था, अगर वह लौट पड़ा तो इतनी मेहनत व्यर्थ हो जाएगी और गांव के लोग मेरी हंसी उड़ायेगें। दोनों अपने-अपने घात में थे। सांड ने बहुत चाहा कि तेज दौड़कर आगे निकल जाऊं और वहां से पीछे को फिरूं, पर मथुरा ने उसे मुडऩे का मौका न दिया। उसकी जान इस वक्त सुई की नोक पर थी, एक हाथ भी चूका और प्राण भी गए, जरा पैर फिसला और फिर उठना नसीब न होगा। आखिर मनुष्य ने पशु पर विजय पायी और सांड को नदी में घुसने के सिवाय और कोई उपाय न सूझा। मथुरा भी उसके पीछे नदी में पैठ गया और इतने डंडे लगाये कि उसकी लाठी टूट गयी।
अब मथुरा को जोरो से प्यास लगी। उसने नदी में मुंह लगा दिया और इस तरह हौंक-हौंक कर पीने लगा मानों सारी नदी पी जाएगा। उसे अपने जीवन में कभी पानी इतना अच्छा न लगा था और न कभी उसने इतना पानी पीया था। मालूम नहीं, पांच सेर पी गया या दस सेर लेकिन पानी गरम था, प्यास न बुझी, जरा देर में फिर नदी में मुंह लगा दिया और इतना पानी पीया कि पेट में सांस लेने की जगह भी न रही। तब गीली धोती कंधे पर डालकर घर की ओर चल दिया।
लेकिन दस की पांच पग चला होगा कि पेट में मीठा-मीठा दर्द होने लगा। उसने सोचा, दौड़ कर पानी पीने से ऐसा दर्द अक्सर हो जाता है, जरा देर में दूर हो जाएगा। लेकिन दर्द बढऩे लगा और मथुरा का आगे जाना कठिन हो गया। वह एक पेड़ के नीचे बैठ गया और दर्द से बैचेन होकर जमीन पर लोटने लगा। कभी पेट को दबाता, कभी खड़ा हो जाता कभी बैठ जाता, पर दर्द बढ़ता ही जाता था। अन्त में उसने जोर-जोर से कराहना और रोना शुरू किया, पर वहां कौन बैठा था जो, उसकी खबर लेता। दूर तक कोई गांव नहीं, न आदमी न आदमजात। बेचारा दोपहरी के सन्नाटे में तड़प-तड़प कर मर गया। हम कड़े से कड़ा घाव सह सकते है लेकिन जरा सा-भी व्यतिक्रम नहीं सह सकते। वही देव का सा जवान जो कोसो तक सांड को भगाता चला आया था, तत्वों के विरोध का एक वार भी न सह सका। कौन जानता था कि यह दौड़ उसके लिए मौत की दौड़ होगी! कौन जानता था कि मौत ही सांड का रूप धरकर उसे यों नचा रही है। कौन जानता था कि जल जिसके बिना उसके प्राण ओठों पर आ रहे थे, उसके लिए विष का काम करेगा।
संध्या समय उसके घरवाले उसे ढूंढते हुए आये। देखा तो वह अनंत विश्राम में मग्न था।
एक महीना गुजर गया। गांव वाले अपने काम-धंधे में लगे। घरवालों ने रो-धो कर सब्र किया; पर अभागिनी विधवा के आंसू कैसे पुंछते। वह हरदम रोती रहती। आंखे चाहे बन्द भी हो जाती, पर हृदय नित्य रोता रहता था। इस घर में अब कैसे निर्वाह होगा? किस आधार पर जिऊंगी? अपने लिए जीना या तो महात्माओं को आता है या लम्पटों ही को। अनूपा को यह कला क्या मालूम? उसके लिए तो जीवन का एक आधार चाहिए था, जिसे वह अपना सर्वस्व समझे, जिसके लिए वह जिये, जिस पर वह घमंड करे। घरवालों को यह गवारा न था कि वह कोई दूसरा घर करे। इसमें बदनामी थी। इसके सिवाय ऐसी सुशील, घर के कामों में कुशल, लेन-देन के मामलो में इतनी चतुर और रंग रूप की ऐसी सराहनीय स्त्री का किसी दूसरे के घर पड़ जाना ही उन्हें असह्य था। उधर अनूपा के मैकेवाले एक जगह बातचीत पक्की कर रहे थे। जब सब बातें तय हो गयी, तो एक दिन अनूपा का भाई उसे विदा कराने आ पहुंचा ।
अब तो घर में खलबली मची। इधर कहा गया, हम विदा न करेंगे। भाई ने कहा, हम बिना विदा कराये मानेंगे नहीं। गांव के आदमी जमा हो गये, पंचायत होने लगी। यह निश्चय हुआ कि अनूपा पर छोड़ दिया जाय, जी चाहे रहे। यहां वालो को विश्वास था कि अनूपा इतनी जल्द दूसरा घर करने को राजी न होगी, दो-चार बार ऐसा कह भी चुकी थी। लेकिन उस वक्त जो पूछा गया तो वह जाने को तैयार थी। आखिर उसकी विदाई का सामान होने लगा। डोली आ गई। गांव-भर की स्त्रिया उसे देखने आयीं। अनूपा उठ कर अपनी सांस के पैरो में गिर पड़ी और हाथ जोड़कर बोली—अम्मा, कहा-सुना माफ करना। जी में तो था कि इसी घर में पड़ी रहूं, पर भगवान को मंजूर नहीं है।
यह कहते- कहते उसकी जबान बन्द हो गई।
सास करूणा से विहृवल हो उठी। बोली—बेटी, जहां जाओ वहां सुखी रहो। हमारे भाग्य ही फूट गये नहीं तो क्यों तुम्हें इस घर से जाना पड़ता। भगवान का दिया और सब कुछ है, पर उन्होंने जो नहीं दिया उसमें अपना क्या बस, बस आज तुम्हारा देवर सयाना होता तो बिगड़ी बात बन जाती। तुम्हारे मन में बैठे तो इसी को अपना समझो, पालो-पोसो बड़ा हो जायेगा तो सगाई कर दूंगी।
यह कहकर उसने अपने सबसे छोटे लड़के वासुदेव से पूछा—क्यों रे! भौजाई से शादी करेगा?
वासुदेव की उम्र पांच साल से अधिक न थी। अबकी उसका ब्याह होने वाला था। बातचीत हो चुकी थी। बोला— तब तो दूसरे के घर न जायगी न?
मां— नहीं, जब तेरे साथ ब्याह हो जायगी तो क्यों जायगी?
वासुदेव- तब मैं करूंगा।
मां—अच्छा,उससे पूछ, तुझसे ब्याह करेगी।
वासुदेव अनूप की गोद में जा बैठा और शरमाता हुआ बोला— हम से ब्याह करोगी?
यह कह कर वह हंसने लगा, लेकिन अनूप की आंखें डबडबा गयीं, वासुदेव को छाती से लगाते हुए बोली.. अम्मा, दिल से कहती हो?
सास— भगवान जानते हैं!
अनूपा— आज यह मेरे हो गये?
सास— हां सारा गांव देख रहा है ।
अनूपा— तो भैया से कहला भेजो, घर जायें, मैं उनके साथ न जाऊंगी।
अनूपा को जीवन के लिए आधार की जरूरत थी। वह आधार मिल गया। सेवा मनुष्य की स्वाभाविक वृत्ति है। सेवा ही उसके जीवन का आधार है।
अनूपा ने वासुदेव का लालन-पोषण शुरू किया। उबटन और तेल लगाती, दूध-रोटी मल-मल के खिलाती। आप तालाब नहाने जाती तो उसे भी नहलाती। खेत में जाती तो उसे भी साथ ले जाती। थोड़े ही दिनों में उससे हिल-मिल गया कि एक क्षण भी उसे न छोड़ता। मां को भूल गया। कुछ खाने को जी चाहता तो अनूपा से मांगता, खेल में मार खाता तो रोता हुआ अनूपा के पास आता। अनूपा ही उसे सुलाती, अनूपा ही जगाती, बीमार हो तो अनूपा ही गोद में लेकर बदलू वैध के घर जाती, और दवायें पिलाती।
गांव के स्त्री-पुरूष उसकी यह प्रेम तपस्या देखते और दांतों उंगली दबाते। पहले बिरले ही किसी को उस पर विश्वास था। लोग समझते थे, साल-दो-साल में इसका जी ऊब जाएगा और किसी तरफ का रास्ता लेगी, इस दुधमुंहे बालक के नाम कब तक बैठी रहेगी, लेकिन यह सारी आशंकाएं निमूर्ल निकली। अनूपा को किसी ने अपने व्रत से विचलित होते न देखा। जिस हृदय में सेवा का स्रोत बह रहा हो— स्वाधीन सेवा का— उसमें वासनाओं के लिए कहां स्थान? वासना का वार निर्मम, आशाहीन, आधारहीन प्राणियों पर ही होता है चोर की अंधेरे में ही चलती है, उजाले में नहीं।
वासुदेव को भी कसरत का शौक था। उसकी शक्ल सूरत मथुरा से मिलती-जुलती थी, डील-डौल भी वैसा ही था। उसने फिर अखाड़ा जगाया। और उसकी बांसुरी की तानें फिर खेतों में गूंजने लगीं।
इस भांति 13 बरस गुजर गये। वासुदेव और अनूपा में सगाई की तैयारी होने लगी।
लेकिन अब अनूपा वह अनूपा न थी, जिसने 14 वर्ष पहले वासुदेव को पति भाव से देखा था, अब उस भाव का स्थान मातृभाव ने लिया था। इधर कुछ दिनों से वह एक गहरे सोच में डूबी रहती थी। सगाई के दिन ज्यों- ज्यों निकट आते थे, उसका दिल बैठा जाता था। अपने जीवन में इतने बड़े परिवर्तन की कल्पना ही से उसका कलेजा दहक उठता था। जिसे बालक की भांति पाला- पोसा, उसे पति बनाते हुए, लज्जा से उसका मुख लाल हो जाता था।
द्वार पर नगाड़ा बज रहा था। बिरादरी के लोग जमा थे। घर में गाना हो रहा था! आज सगाई की तिथि थी।
सहसा अनूपा ने जा कर सास से कहा— अम्मां मैं तो लाज के मारे मरी जा रही हूं।
सास ने भौंचक्की हो कर पूछा—क्यों बेटी, क्या है ?
अनूपा— मैं सगाई न करूंगी।
सास— कैसी बात करती है बेटी ? सारी तैयारी हो गयी। लोग सुनेंगे तो क्या कहेगें ?
अनूपा— जो चाहे कहें, जिनके नाम पर 14 वर्ष बैठी रही उसी के नाम पर अब भी बैठी रहूंगी। मैंने समझा था मरद के बिना औरत से रहा न जाता होगा। मेरी तो भगवान ने इज्जत आबरू निबाह दी। जब नयी उम्र के दिन कट गये तो अब कौन चिन्ता है! वासुदेव की सगाई कोई लड़की खोजकर कर दो। जैसे अब तक उसे पाला, उसी तरह अब उसके बाल-बच्चों को पालूंगी।