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Jun 12, 2009

फूलों और तितलियों के संग बतियाते

फूलों और तितलियों के संग बतियाते
-अनिल खोब्रागड़े
उदंती.com के इस अंक में किसी एक कलाकार को प्रस्तुत करने की श्रृंखला में इस बार हमने अनिल खोब्रागड़े के चित्रों को विभिन्न पन्नों पर प्रकाशित किया है। अनिल के चित्रों में एक ओर जहां क्षेत्रीय संस्कृति की छाप हैं वहीं वे प्रकृति के रंगों को चुरा कर वर्तमान में रंग भरने का खूबसूरत प्रयास करते हैं। रंग बिरंगे फूल और तितली के साथ उन्होंने बस्तर के जीवन को रेखाओं में उतारा है।
बैलाडीला में स्कूली शिक्षा प्राप्त अनिल खोब्रागड़े को पेंटिंग में रुचि बचपन में अपने दोस्त की बहन को कढ़ाई बुनाई करते देख कर हुई। अनिल कहते हैं रंग बिरंगे धागों से उनकी कढ़ाई को देखकर मैंने भी एक ग्रीटिंग कार्ड बनाया। संयोग देखिए दोस्त की उस बहन की शादी एक आर्टिस्ट जितेन्द्र साहू से हो गइ, जब उन्हें मेरी रुचि के बारे में पता चला तो उन्होंने मुझे खैरागढ़ में इसकी शिक्षा के लिए प्रोत्साहित किया।  मैं पहले तो इस क्षेत्र को समझ नहीं पाया फिर धीरे-धीरे मेरे सीनियर्स व गुरुओं के प्रोत्साहन से काम करने लगा।
चूंकि मेरा जन्म बस्तर में हुआ है तो मैंने पहले बस्तर की संस्कृति को अपनी पेटिंग्स में तराशा।  जैसे बस्तर के आदिवासी किस तरह जंगल में मशरूम चुनते हैं, किस तरह गोदना गुदाते हैं।  इसी तरह सल्फी जो बस्तर के जीवन  का अनिवार्य अंग है, को चित्रित किया। मैंने अपनी पेटिंग में इमेजिनेशन को अधिक महत्व दिया।
 बाद में मैंने महसूस किया कि आदिवसियों के जीवन में बदलाव आने लगा  है। उनपर आधुनिकता का असर तो हुआ पर वे पूरी तरह उसे अपना नहीं पाए- जैसे वे चप्पल तो जान गये पर उसे वे पहन नहीं पाए। उनके पास चप्पल  तो होता है पर जब वे हाट से घर की ओर लौटते हैं तो उनका चप्पल पैरों में नहीं डंडे में लटका होता है। इस तरह के दृश्यों को भी मैंने अपने चित्रों में उतारने की कोशिश की।
मैंने पिछले कुछ वर्षों में देखा कि आदिवासी पहले खुश व संतुष्ट होकर अपना जीवन जीते थे पर अब विकास के नाम पर वह दुखित हो गया है। उनके जीवन में आए इस बदलाव पर भी मैंने काम किया है।
बस्तर के जीवन को अपना विषय बनाने के साथ अनिल ने  बच्चों के मूड पर काम किया  है। नेहरू आर्ट गैलरी में बच्चों के विभिन्न मूड वाली उनकी पेटिंग्स अवार्ड के लिए चुनी गई थी। इसके बाद उन्होंने तितली और फिर फूलों के सीरीज पर काम किया।
चित्र प्रदर्शनी के कुछ अनुभव सुनाते हुए अनिल ने बनारस के अस्सी घाट में लगाए गये एक ओपन एक्जीबिशन को अपने जीवन की  शानदार प्रस्तुतियों में से एक बताया, इस प्रदर्शनी में  हम सीधे जनता के साथ रुबरु थे। इस प्रदर्शनी के लिए कला कम्यून संस्था ने हमें आमंत्रित किया था।  अस्सी घाट की उस चित्र प्रदर्शनी ने मुझे बहुत कुछ सिखाया। घाट में तो हमारी पेंटिंग्स प्रदर्शित थी ही हमने बांस व लकड़ी के सहारे नदी में भी अपनी पेंटिंग का प्रदर्शन किया था जो अद्भुत था। अनिल ने कविता पोस्टर भी किया है। भिलाई, खैरागढ़ आदि कई स्थानों में  भी अनिल की कई प्रदर्शनी लग चुकी हैं।
ठंड, बाजार, बारिश और ओस पर भी अनिल ने बेहतरीन काम किया है। लेकिन अनिल ने गत वर्ष  फूलों को लेकर जो श्रृंखला बनाई है वह उनके किए गए पूर्व के कार्यों से कुछ हट कर है। अपने फ्लावर सीरीज के बारे में अनिल का कहना है कि - मैंने महसूस किया कि हम सब फूल के बाहरी स्वरुप को ही देखते हैं पर मैंने सोचा कि इन फूलों के साथ यदि उन्हें जीवन देने वाले पानी के साथ मिला दिया जाए तो उस फूल का क्या रूप होगा, यही कल्पना करके मैंने इस सीरीज को शुरु किया। मेरे इन चित्रों में फूल और पानी का समावेश नजर आता है। फूल श्रृंखला के अंतर्गत  अनिल ने  200-300 के लगभग पेंटिंग बनाई है। 2008 में ललित कला आर्ट एकेडमी दिल्ली ने पहली बार इस सीरीज को प्रदर्शित किया।
पेटिंग बिकती है पर संतुष्टि नहीं आर्ट का मार्केट स्ट्रगल का काम है कर्मिशियल मार्केट में आर्टिस्ट को उतना नहीं मिल पाता। हमें प्लेटफार्म नहीं मिलता। यह सीरीज मैंने इतना कर लिया कि अब बंद कर दिया।
अपनी आगे की योजना के बारे में अनिल का कहना है कि वे फूलों पर ही आगे भी काम करना चाहते हैं मैं फूलों को हर मौसम में जैसे बारिश में, ठंड में, धूप में उसकी भावनाओं को व्यक्त करना चाहता हूं। मेरे मन में फूलों को लेकर एक विचार- मंथन चल रहा कि  हम फूलों को तभी देख कर खुश होते हैं जब तक वह खिलता है, लेकिन मुरझाते ही उसकी उपेक्षा कर देते हैं अत: मैं सोच रहा हूं कि फूल के उस अनुभव को अपने चित्रों में उतारने की कोशिश करुंगा। (उदंती फीचर्स)
अनिल खोब्रागड़े
जन्म- 5 जुलाई 1978 में बस्तर छत्तीसगढ़ में शिक्षा- बीएफए, एमएफए (पेटिंग) इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ (छ.ग.)। भिलाई, खैरागढ़, भोपाल, मुजफ्फरनगर, मुम्बई व दिल्ली में कई चित्र प्रदर्शनी। साथी समाज सेवी संस्था कोंडागांव द्वारा आयोजित आर्टिस्ट कैंप में भागीदारी। वाराणासी, जगदलपुर, मलाजखंड (मप्र) खैरागढ़ ओपन एक्जीबिशन। पता- c/o श्री एम आर खोब्रागड़े, क्वाटर नं. टी/सी-188, पोस्ट- किरंदुल, जिला दंतेवाड़ा (बस्तर) छत्तीसगढ़ - 494556 मोबाइल- 09926469545.

बेआबरू होकर कूचे से निकलना

बेआबरू होकर कूचे से निकलना
- डॉ. सिद्धार्थ खरे
एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अगले तीन से पांच साल में एक लाख भारतीय पेशेवर और इतने ही चीनी मूल के लोग अमेरिका छोडऩे को विवश होंगे।
हम इस चिंता में भी घुले जाते रहे हैं कि देश से प्रतिभा पलायन होता है और इस चिंता में भी छाती पीटने लगते हैं कि जिन्होंने बेहतर भविष्य कि प्राथमिकता के चलते भारत माता कि छाती रौंदकर पलायन किया, उन्हें नियोक्ता देश छोडऩा होगा।
इन भगोड़ों को लेकर ताजी चिंता का कारण आर्थिक मंदी है। अमेरिका में आब्रजन पर अध्ययन करने वाली Duke and Barkle University एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अगले तीन से पांच साल में एक लाख भारतीय पेशेवर और इतने ही चीनी मूल के लोग अमेरिका छोडऩे को विवश होंगे। यह भी कह सकते हैं इन्हें 'बेआबरू होकर कूचे से निकलना' होगा।
कूचे को इस बात कि कतई कोई चिंता नहीं कि इस स्थिति का उस पर क्या प्रभाव पड़ेगा। उसे इस बात कि भी कोई चिंता नहीं है कि इन पेशेवरों का भविष्य क्या होगा। मगर उक्त विश्वविद्यालय की अध्ययनकर्ता दल के नेता विवेक वाधवा बेहद दुखी हैं। दु:ख इस बात का अधिक है कि इससे अमेरिका को नुकसान होगा क्योंकि ये लोग उसकी अर्थव्यवस्था मजबूत करने के साथ ही उसके विकास में भागीदार भी हैं। वधावा का ये दावा भी है कि इन प्रतिभाओं के कारण ही अमेरिका तकनीक के मामले में इतना आगे है।
एक देश जो गिरगिट कि तरह रंग बदलने में माहिर है जो कभी भारत का खुले दिल से स्पष्ट मित्र नहीं रहा उसके इन शुभचिंतकों के दर्द से हमारा दिल क्यों फटा जा रहा है? क्या इसलिए कि संयोग से इन्होंने भारत में जन्म लिया? क्या जन्म लेने मात्र से वे भारतीय हो गए? सवाल यह भी पूछा जाना चाहिए कि इतनी ही बेकरारी के साथ उनका दिल भारत कि तरक्की के लिए कभी क्यों नहीं धड़का?
तर्क दिया जाता रहा है कि देश में अवसर होते तो विदेशों की खाक क्यों छानते! मां बाप पर नालायकी का तोहमद लगाकर वल्दियत बदलने वाले इन जांबाजों को एक गलतफहमी यह भी है कि संदर्भित स्थिति के चलते भारत और चीन प्रतिस्पर्धात्मक रूप से मजबूत होंगे। वास्तव में यह बात कह कर उक्त रिपोर्ट के जरिये नए जमीन तलाशी जा रही है।
भारतीय होने के नाते मेरी चिंता यह नहीं कि इतनी बड़ी संख्या में भारतीय मूल के जांबाजों को बेआबरू होकर अमेरिका से निकलना होगा। मेरी चिंता यह भी नहीं कि इनका भविष्य क्या होगा। मेरी वास्तविक चिंता यह है कि इनकी वापसी से उन भारतीय पेशेवरों के भविष्य पर आंच न आए जो भारत में रहकर भारत की प्रगति में लगे रहे। तमाम कठिनाइयां सहकर भी भगोड़े साबित नहीं हुए। वास्तव में अव्वल दर्जे की प्रतिभा तो वह है जो देश में रहकर देश के काम आए।  वधावा ने जिन प्रतिभाओं के स्वदेश लौटने और उसकी तरक्की का आधार बनने की बात कही है उससे इन्हें 'आन गांव का सिद्ध' मान लिए जाने का खतरा है। वास्तव में यह स्थिति किसी खतरे से कम नहीं है। देश में वोटों कि राजनीति के चलते इन सूरमाओं के लिए लाल कालीन भी बिछाया जा सकता है। इन महानुभावों की जितनी चिंता कि जानी है, उसकी एक चौथाई चिंता भी भारत के काम आने वाली प्रतिभाओं की करती तो आज देश का नक्शा बदला होता।
यह ध्यान रखना सरकार की पहली प्राथमिकता होना चाहिए की अमेरिका या किसी भी अन्य देश के विकास को प्राथमिकता देने वालों की वापसी पर उन्हें ऐसा कोई दर्जा नहीं दिया जाए जो देश की प्रतिभाओं को प्राप्त दर्जे से ऊंचा हो। ध्यान रखने की बात यह भी है कि इनके देश छोडऩे के बाद भी देश की प्रगति न तो पंगु हुई और न ही लौटने पर कोई 'सुरखाब के पर' ही लग जायेंगे।
कुल मिलाकर पांच सालों में एक लाख भारतीयों के अमेरिका छोडऩे की स्थिति उनका दुर्भाग्य हो सकती है लेकिन ऐसा कोई फैसला न होने पाए जो भारत के लिए दुर्भाग्यपूर्ण हो।

कालजयी कहानी

उद्धार
- रवीन्द्रनाथ ठाकुर
विश्व के महान साहित्यकार रवीन्द्रनाथ ठाकुर ऐसे अग्रणी लेखक थे, जिन्हें नोबेल पुरस्कार जैसे सम्मान से विभूषित किया गया। उनकी अनेक कृतियां प्रमुख भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनूदित होकर चर्चित हुईं। बंगला साहित्य में छोटी कहानियों का सूत्रपात करने वालों में रवीन्द्रनाथ ठाकुर का नाम लें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। कम शब्दों में बड़ी बात कहने की कला बिरले के पास होती है। रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कविताएं तो कालजयी हैं ही, उनकी कहानियां भी अपने दौर के समाज की सच्ची तस्वीर प्रस्तुत करती हैं।

गौरी पुराने धनाढ्य घराने की बड़े लाड़-प्यार में पली सुन्दर लड़की है। उसके पति पारस की हालात पहले बहुत ही गिरी हुई थी, पर अब अपनी कमाई के बूते पर उसने कुछ उन्नति की है। जब तक वह गरीब था तब तक उसके सास-ससुर ने इस ख्याल से कि लड़की तकलीफ पाएगी, बहू की विदा नहीं की। गौरी कुछ ज्यादा उमर  में ससुराल आई।
शायद इन्हीं कारणों से पारस अपनी सुन्दरी युवती स्त्री को सम्पूर्णत: अपने हाथ की चीज नहीं समझता था। और मिजाज में वहम तो उसके बीमारी बनकर समा गया था।
पारस पछांह के एक छोटे-से शहर में वकालत करता है। घर में अपने कुटुम्ब का कोई न था, अकेली स्त्री के लिए उसका चित्त सदा उद्विग्न बना रहता बीच-बीच में वह अचानक असमय में अदालत से घर चला आता शुरु-शुरु में पति के इस तरह आकस्मिक आगमन का कारण गौरी की कुछ समझ में न आया। बाद में वह क्या समझी सो वही जाने।
बीच-बीच में वह बिना कारण घर का नौकर भी छुड़ा देने लगा। किसी नौकर का ज्यादा दिन तक बना रहना उसे बर्दाश्त नहीं होता। खासकर काम की परेशानी का ख्याल करके गौरी जिस नौकर को रखने के लिए ज्यादा आग्रह करती उसे तो वह फौरन ही निकाल बाहर करता। तेजस्विनी गौरी को इससे जितनी चोट पहुंचती, उसका पति उतना ही चंचल होकर कभी-कभी ऐसा विचित्र बर्ताव कर बैठता कि जिसका ठीकाना नहीं।
अन्त में जब वह अपने को सम्हाल न सका और दासी को एकान्त में बुलाकर उससे तरह-तरह के वहम के सवाल करने लगा तब सब बातें गौरी को भी मालूम होने लगीं। अभिमानिनी स्वल्पभाषिणी नारी अपमान की चोट खाकर सिंहिनी की तरह भीतर ही भीतर उफनने और घुमडऩे लगी, और इस उन्मत्त सन्देह ने दम्पत्ति के बीच में पड़कर खंडप्रलय की तरह दोनों को बिलकुल विच्छिन्न कर दिया।
गौरी के आगे अपना गहरा सन्देह प्रकट करने के बाद पारस की झिझक और शरम जब बिलकुल ही जाती रही तब वह रोजमर्रा कदम-कदम पर साफ-साफ सन्देह प्रकट करके स्त्री से लडऩे लगा, और गौरी जितनी ही गम खाकर मौन अवज्ञा और पैनी निगाहों के तेज तीरों से नीचे से लेकर ऊपर तक उसके सारे बदन में लहूलुहान करने लगी, उसका सन्देह का पागलपन मानो उतना ही बढ़ता चला गया।
इस तरह, दाम्पत्य सुख से वंचित उस पुत्रहीन तरुणी ने अपना सम्पूर्ण अन्त:करण धर्म की चर्चा में लगा दिया। हरिभजन सभा के नवीन प्रचारक ब्रह्माचारी परमानंद स्वामी को बुलाकर गौरी ने उनसे दीक्षा-मन्त्र लिया और 'भागवत' की व्याख्या सुनने लगी। नारी हृदय का सम्पूर्ण व्यर्थ स्नेह एकमात्र भक्ति के रूप में इकट्ठा होकर गुरुदेव के चरणों में लोटने लगा।
परमानंद के साधुचरित्र के संबंध में किसी को भी कोई सन्देह न था। सभी उनकी पूजा करते थे। किन्तु पारस उनके संबंध में मुंह खोलकर सन्देह प्रकट न कर सकने के कारण अत्यंत व्याकुल हो उठा और उसका सन्देह अदीठ फोड़े की तरह क्रमश: खुद उसी के मर्मस्थल को कुरेद-कुरेदकर
खाने लगा।
एक दिन जरा-सी किसी बात पर जहर बाहर निकल आया। स्त्री के सामने वह परमानंद को 'दुश्चरित्र, पाखंडी' कहकर गाली देने लगा और कहते-कहते कह बैठा 'तुम अपने शालग्राम को छूकर धर्म से बताओ तो, उस बगुला-भगत को तुम मन-ही-मन प्यार करती हो या नहीं?'
गौरी, पांव-तले दबी नागिन की तरह, एक क्षण में उग्र रूप धारण करके झूठी स्पर्धा से पति को छेदती हुई रूंधे हुए कंठ से फुंकारती हुई बोल उठी, 'हां, करती हूं! तुम्हें जो कुछ करना हो सो कर लो।'
पारस उसी वक्त घर में ताला लगाकर,  स्त्री को ताले में बंद करके, अदालत चला गया।
असह्य रोष में आकर गौरी ने किसी तरह दरवाजा खोल लिया, और उसी वक्त वह घर से बाहर निकल गई।
परमानंद अपनी एकांत कोठरी में बैठे शास्त्र पढ़ रहे थे। वहां और कोई भी न था। सहसा गौरी अमेघवाहिनी विद्युल्लता की तरह ब्रह्मचारी के शास्त्राध्ययन के बीच जाकर टूट पड़ी।
गुरु ने कहा, 'यह क्या!'
शिष्या ने कहा, 'गुरुदेव, इस अपमान-भरे संसार से उद्धार करके मुझे और कहीं ले चलो। अब मैं तुम्हारी ही सेवा में अपना जीवन न्यौछावर करना चाहती हूं।'
परमानंद ने बहुत डांट-फटकारकर गौरी को घर वापस कर दिया। किन्तु हाय, गुरुदेव, उस दिन का तुम्हारा वह अकस्मात टूटा हुआ अध्ययनसूत्र क्या फिर पहले जैसा जुड़ सका!
पारस ने घर आकर दरवाजा खुला पाया। स्त्री से पूछा, 'कौन आया था यहां?' स्त्री ने कहा, 'कोई नहीं आया, मैं खुद गुरुदेव के घर गई थी।'
पारस का चेहरा सफेद फक पड़ गया, और दूसरे ही क्षण लाल-सुर्ख होकर बोला, 'क्यों गई थी?'
गौरी ने कहा, 'मेरी तबीयत!'
उस दिन से घर पर पहरा बिठाकर स्त्री को कोठरी में बन्द करके पारस ने ऐसा उपद्रव शुरु कर दिया कि सारे शहर में बदनामी हो गई। इन सब कुत्सित अपमान और अत्याचारों की खबर पाकर परमानंद का हरिभजन बिलकुल ही जाता रहा। इस शहर को छोड़कर वे अन्यत्र कहीं जाने की सोचने लगे, किन्तु बेचारी गौरी को इस दशा में छोड़कर उनसे अन्यत्र कहीं जाते न बना।
और, सन्यासी के इन दिन-रातों का इतिहास अन्तर्यामी के सिवा और कोई भी न जान सका।
अन्त में, उस अवरोध की अवस्था में ही गौरी को एक पत्र मिला। उसमें लिखा था - 'वत्से, मैंने काफी विचार किया है। पहले अनेक साध्वी-साधक रमणियां कृष्ण-प्रेम में अपना घर संसार सबकुछ त्याग चुकी हैं। यदि संसार के अत्याचारों से तुम्हारा चित्त हरि के चरणकमलों से विक्षिप्त हो गया हो, तो मुझे खबर देना। भगवान की सहायता से उनकी सेविका का  उद्धार करके उसे मैं प्रभु के अभय पदारविन्द में न्यौछावर करने का प्रयास करूंगा। फाल्गुण शुक्ला त्रयोदशी बुधवार को दिन के दो बजे, तुम चाहो तो, अपने तालाब के किनारे मुझसे भेंट कर सकती हो।'
पति उस पत्र को पढ़कर भीतर-ही-भीतर जल भुनकर खाक हुए जा रहे होंगे, यह सोचकर गौरी मन-ही-मन जरा खुश हुई, किन्तु साथ ही उसका शिरोभूषण 'पत्र' पाखंडी के हाथ पड़कर लांछित हो रहा होगा, यह बात भी उसे सहन नहीं हुई।
वह तेजी से पति के कमरे में पहुंची।
देखा तो पति जमीन पर पड़ा हुआ बुरी तरह तड़प रहा है, मुंह से उसके झाग निकल रहा है और आंखों की पुतलियां ऊपर चढ़ गई है।
पति के दाहिने हाथ की मुट्ठी में से उस पत्र को निकालकर गौरी ने जल्दी से डाक्टर बुलवाया।
डाक्टर ने आकर कहा, 'ऐपोप्लेक्सी, मिरगी है।'
रोगी तब मर चुका था।
उस दिन पारस को किसी जरुरी मामले की पैरवी के लिए बाहर जाना था और, संन्यासी का यहां तक पतन हुआ था कि उस समाचार को पाकर वे गौरी से मिलने के लिए तैयार थे।
सद्य-विधवा गौरी ने खिड़की में से देखा कि उसके गुरुदेव पिछवाड़े के तालाब के किनारे चोर की तरह छिपे खड़े हैं। सहसा उस पर बिजली-सी टूट पड़ी, उसने आंखें नीची कर ली। उसके गुरु कहां से कहां उतर आए हैं, सहसा एक ही क्षण में उसका वीभत्स चित्र उसकी आंखों के सामने नाचने लगा।
गुरु ने पुकारा, 'गौरी!'
गौरी ने कहा, 'आई, गुरुदेव!'
मरने की खबर पाकर पारस के मित्र वगैरह जब घर के भीतर पहुंचे, तब देखा कि गौरी भी पति के बगल में मरी पड़ी है।
उसने जहर खा लिया था और, आधुनिक काल में इस आश्चर्यपूर्ण सहमरण के दृष्टान्त ने सती के माहात्म्य से सबको दंग कर दिया।
(मूल रचना: श्रावण, 1967)

जूते की जंग

- अविनाश वाचस्पति
जूता पहले काटने के लिए खूब कुख्यात रहा है परन्तु अपने नएपन में। जैसे नया आया कुत्ता सभी को काटने के लिए उद्यत मिलेगा। उसी तरह नया नया जूता पैर की खूब किसिंग करता है पर आजकल ब्रांडिड जूतों में यह गुण नहीं पाया जाता है। आज कल के जूते में नए गुणों की भरमार हो गई है। जूते की मार व्यापार हो गई है। जूते की मार से चैनलों की टी आर पी बढ़ती है।
जूता एक बारहमासी उपयोगी मस्त चीज है। पहना जाता है पर वस्त्र नहीं है। चमकाया जाता है पर आईना नहीं है। इसके बिना चलना दूभर है, बिना इसके पैरों के तलवे पर संकट है। कड़ी धूप, कड़ाके की ठंड, रेतीला सफर और पथरीला मार्ग इस पर सवार होकर यानी इन्हें धारण करके सरलता से पार किए जा सकते हैं। जूता पहले काटने के लिए खूब कुख्यात रहा है परन्तु अपने नएपन में। जैसे नया आया कुत्ता सभी को काटने के लिए उद्यत मिलेगा। उसी तरह नया नया जूता पैर की खूब किसिंग करता है पर आजकल ब्रांडिड जूतों में यह गुण नहीं पाया जाता है। आज कल के जूते में नए गुणों की भरमार हो गई है। जूते की मार व्यापार हो गई है। जूते की मार से चैनलों की टी आर पी बढ़ती है। अखबारों की जगह घिरती है। सुर्खियां बनती हैं। जूता आजकल चुनाव की नाव को डुबोने में सक्षम हो चुका है।  कुत्ते के तरह जूते के काटने की पर इंजेक्शन नहीं लगवाए जाते क्योंकि इससे रैबीज नामक बीमारी नहीं होती।
जूते को पैरों में पहने जाने के कारण नीचे दर्जे का माना गया है। जूते की मरम्मत के काम को पहले से ही दोयम दर्जे का माना जाता रहा है। पर अब जूते के नए कर्मों को पत्रकार, नाखुश पार्टी सदस्य इत्यादि अंजाम तक पहुंचा रहे हैं। जूते पैर नीचे होने पर भी उपर ले जाने का काम करते हैं। यदि आदमी चल ही न पाए तो सारी प्रगति धरी रह जाए। बढऩे, चढऩे, लडऩे और अंगद की तरह अडऩे के लिए पैर जरूरी हैं। पैरों की उपयोगिता पर सवाल उठाना भी बेमानी है। पैरों के बिना इधर से उधर और उधर से इधर होना सरकना संभव नहीं है। पैर न हों तो बचपन में घुटनों के बल सरकने का आनंद नहीं लिया जा सकता जो कि चलने की पहली सीढ़ी है। बिना पैर न तो आदमी खुद ही चल सकता है और न किसी प्रकार का वाहन ही चला सकता है, चलवाने की बात छोडि़ए। अगर जानवरों द्वारा खिंचित सवारी को वाहन न माना जाए। उसके उपर तो किसी को भी पटक दो तो ले ही जाएगा।
पैर भी उपयोगी और उसमें पहने जाने वाले जूते और उपयोगी अब तो उसके चलने से असंभव कार्य भी सहजता से संपन्न होने लगे हैं। जूतों पर बने हुए सभी मुहावरों और लोकोक्तियों को दोबारा से सृजित करना पड़ेगा। जूते के संबंध में होती प्रगति जूता जनार्दन की आवाज को अमली जामा पहना रही है। नेताओं को धमकिया रहा है। उनके सपनों में आ रहा है। पर जूते वाली जफ्फी से नेता वंचित हैं। लगता है जूतों को नेता नहीं भा रहे हैं। इसलिए नेता के अगल-बगल से सरक जाते हैं। एक भी वाक्या ऐसा नहीं हुआ कि जूता नेता के गले मिला या मुंह चढ़ा हो। ऐसा लगता तो नहीं है कि जूता अपनी साख बचा रहा हो। जूता नेताओं के लिए खौफ का पर्याय हो गया है।
कहा तो यह भी जाता है कि नेता तो कर्म ही ऐसे कर रहे हैं कि उन्हें जूते खाने चाहिए। पर जूते खाने की चीज न होते हुए भी खूब खाए जा रहे हैं और खाते हुए भी बेखाए हुए हो रहे हैं। जूता और नेता का चोली दामन का अनचाहा साथ हो गया है।
जूता कंपनी का उद्घाटन भविष्य में जूता खाकर ही करना अनिवार्य होने वाला है। इससे रिहर्सल भी हो जाएगी और बचने के गुर भी सीखे जा सकते हैं। जूते के निशाने से बचने के गुर सिखाने के लिए किसी जूता विश्वविद्यालय में जूता डिप्लोमा या जूता कोर्स आरंभ किया जा सकता है। जूता खा चुके नेताओं के भाषण सत्र आयोजित किए जा सकते हैं। दोपहिये पर सवारी करने पर हेलमेट पहनने की अनिवार्यता अब ट्रांसफर होकर भाषण या प्रेस कांफ्रेंस करने वाले के लिए आवश्यक होती दिखलाई दे
रही है।
जूता पर राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार शुरू करने की मांग की जा रही है। जूता मंत्रालय की स्थापना का मुद्दा घोषणापत्र में स्थान पा चुका है। जूते के जलवे पर शोध प्रबंध लिखवाए जा रहे हैं। जूते की जवानी पर, उसकी रवानी पर और जूते का जश्न मनाया जा रहा है। जूते के हुस्न के चर्चे विषय पर कविता प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जा रहा है। जूता चेहरे के आगे दौड़ के बोलता है। भाषण देते समय नेता की आंखों में जूते के खौफ का जायजा लिया जा सकता है। आतंकवादी जूता बम बना सकते हैं। जूते के कहर के आगे जूता बम का भविष्य सुनहरा है। जूते की सदाबहार जंग चुनावों में विजयी रही। क्या विदेश क्या देश सब कुछ जूतामय हो गया है। जूते की एक नई संस्कृति जन्म ले चुकी है जिसके विकास की भरपूर संभावनाएं हैं। आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि लोकतंत्र बदलकर जूतातंत्र के रूप में ख्याति पा जाए। जबकि सूरते हाल यही बयां कर रहे हैं।

फूल को देखने का सुख

फूल को देखने का सुख
- अख्तर अली
फूल हमें आस्तिक बनाते है उससे बड़ी बात ये है कि फूल हमें बेहतर इंसान बनाते है। फूल प्रेम को जगाते है, प्रेम का अहसास कराते है, दो हृदय को जोड़ते हैं। रिश्तों की नदी पर पुल बन जाते है फूल।
जिस समय हम फूल को देखते है उस समय हमारे अंदर एक बाग खिल रहा होता है। फूल संसार में हर आदमी को सुंदर नहीं लगते, इस संसार में हर आदमी फूलों को देखता भी नहीं है। फूलों को वही निहारता है जो स्वयं अंदर से कोमल हो। क्रोधी और जिद्दी इंसान को फूल कभी प्रभावित नहीं करते। फूलों की सुंदरता आप के भीतर पहले से मौजूद होनी चाहिये। फूलों को देखने का नियम है कि इन्हें आंख से नहीं मन से देखा जाता है। आंख का कोई मन नहीं होता लेकिन मन की अपनी आंखें होती है। जो व्यक्ति अंदर से सूखा है उसे नदी का प्रवाह कभी गीला नहीं करता। अर्थशास्त्र का छात्र फूल को तोड़ता है, दर्शनशास्त्र का छात्र उसे दूर से निहारता है। कुछ लोग ऐसे होते है जिन्हें राह चलते किसी घर की मुंड़ेर पर खिला फूल दिखाई दे देता है और कुछ लोग ऐसे होते है जिन्हें बाग में भी फूल दिखाई नहीं देता। बगीचे में उन्हें कीचड़ दिखाई देता है, टूटी हुई बेंच दिखाई देती है, फैला हुआ कचरा दिखाई देता है,फल्ली वाला दिखाई देता है, फुग्गे वाला दिखाई देता है, अंधेरे में बैठा जोड़ा तक दिखाई दे देता है लेकिन फूल जो वहां सबसे ज्यादा मात्रा में है वे दिखाई नहीं देते। यह देखने का संकट सम्पूर्ण विश्व में तेजी से पैर पसार रहा है। दरअसल वास्तव में यह विचारधारा का संकट है। विचार हीन व्यक्ति बाग में भी फूलों की सुंदरता को नहीं देख पाता है जबकि विचारवान व्यक्ति के अंदर ही एक बाग मौजूद रहता है जिसमें सोच के फूल खिले रहते हैं।
खिला हुआ फूल प्रकाशित कविता है जिसके रचियता भगवान है, यह ऐसी रचना है जिसकी समीक्षा तो की जा सकती है लेकिन आलोचना नहीं। बनावट, आकार, रंग, सुगंध इन सब का मिश्रण फूल में इतना जबरदस्त होता है कि कला प्रेमियों को चाहिये कि वे सामूहिक रूप से पौधों के सामने खड़े होकर भगवान के सम्मान में ताली बजाये। फूल कुदरत के कारखाने का अद्भुत प्रोडक्ट है, लेकिन बाजार का आयटम नहीं। इसे मन के गमले में उगाया जाता है पैसे देकर खरीदा नहीं जाता। उगाया गया फूल प्रेमिका है और खरीदा गया फूल वेश्या। बनावट, आकार, रंग और सुगंध के आगे भी फूल की और बहुत से विशेषतांए है जो उसके फूलपन को बरकरार रखती है। फूल पाठशाला है, जहां सुगंध फैलाने का पाठ पढ़ाया जाता है। फूल को देखने का सुख, सब सुखों में श्रेष्ठतम सुख है। जिस समय हम फूल को देखते हंै उस समय हम भगवान का ध्यान कर रहे होते हैं। जब हम कोई अच्छी फिल्म देख रहे होते हैं तब हमारे जेहन में उसके निर्देशक का विचार भी आता रहता है। कविता पढ़ते समय उससे कवि को अलग नहीं किया जा सकता। फूल को देखना एक सुंदर अहसास है और फूल को देखते हुए आदमी को देखना सुंदरतम। फूल लघु पत्रिका है, कला फिल्म है। जाकिर हुसैन का तबला है, बिसमिल्ला खां की शहनाई है फूल। समय के जिस क्षण में हम फूल को देख रहे होते हैं वह क्षण जीवन के तमाम क्षणों में सबसे महत्वपूर्ण और कीमती क्षण होता है क्योंकि उस क्षण हम जरा रूमानी हो जाते हंै, लचीले हो जाते हैं, भावुक हो जाते हैं, उस समय हमारा दंभ मर चुका होता है हमारी लालच मिट चुकी होती है, आंखों से गुस्सा गुम हो चुका होता है और होंठो पर मुस्कान विराज चुकी होती है। यही तो वो भाव है जो हमारे इंसान होने को सार्थक करते है। बगीचे में टाईम पास करने के लिये आते है वे आदमी है लेकिन उन में जो फूल से जुड़ जाते है वे इंसान है। हम पैदा भले आदमी के रूप में हो पर मरना इंसान बन कर चाहिये।
ऊपर चांद और नीचे फूल। भगवान की ये दो अनुपम कृति आस्था के सेंसेक्स में जबरदस्त उछाल दर्ज कराती है। अरबों-खरबों की लागत से भी ऐसा कारखाना स्थापित नहीं किया जा सकता जिसमें फूलों का उत्पादन हो सकता हो। फूल हमें आस्तिक बनाते है उससे बड़ी बात ये है कि फूल हमें बेहतर इंसान बनाते है। फूल प्रेम को जगाते है, प्रेम का अहसास कराते है, दो हृदय को जोड़ते हैं। रिश्तों की नदी पर पुल बन जाते है फूल। फूल खिल खिल कर कह रहे है - कोमल बनिये, सुगंध बिखेरिये। फूलों की इस अपील पर गंभीरता पूर्वक विचार किया जाना चाहिये, उनके आह्वान पर चल पडऩा चाहिये। कोमलता फूल की वाणी  है, सुगंध उसकी भाषा। फूलों की भाषा सीखना होगा क्योंकि इसमें रस है। मंच पर किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति का सम्मान उसे फूल देकर किया जाता है। गांव की लड़की सज संवर कर एक फूल अपने बालों में लगा लेती है ये फूल का सम्मान है। फूल की व्याख्या उतनी आसान नहीं है जितनी उसकी उपलब्धता हैं। फूलों की अपनी दुनियां है, अपना इतिहास है, अपना अनुशाासन है, अपना संविधान है। फूलों की संसद कभी प्रस्ताव पारित कर खुश्बू के संविधान में संशोधन नहीं करती। ये फूलों का चरित्र ही है जिसने गुलशन को शोहरत दिलाई है। नफरत के अनेकों कारणों का जवाब है फूल।
फूल लयात्मक गीत है, तुकान्त कविता है, मौसम के पन्ने पर लिखा नवगीत है। गुलशन के दफ्तर में फूल की नियुक्ति ने सुगंध को अंतराष्ट्रीय पहचान दिलाई है। अगर आपने कभी फूल को फूल के अंदाज में नहीं देखा होगा तो आज ही यह सौभाग्य प्राप्त करिये, समय का कोई भरोसा नहीं। इससे पहले की लोग आप पर फूल डाले आप फूल पर न्योछावर हो जाईये। उठिये और बिना समय गंवाए नजदीक के बाग में जाईये, और अनेको बार देखे हुए उन फूलों को मेरी नजर से देखिये आपको फूल मंगल गीत गाते हुए दिखाई देंगे। फूल बोलते हुए, झूमते हुए, नाचते हुए दिखाई देंगे। उस समय आपको सब बदला बदला दिखाई देगा। दरअसल यह परिवर्तन उस समय आपके अंदर हो रहा होगा। कुछ ही क्षण में आपको ऐसा लगेगा कि आप स्वयं एक फूल हो गये हंै।
जिस समय आप फूल को देख रहे होते हैं उस समय आप वो नहीं रहते हैं जो आप हैं, बल्कि उस समय आप जो नहीं हैं वो हो जाते हो। नहीं होने का हो जाना ही क्रंाति है और ये क्रांति एक क्षण में हो जाती है। एकाएक आपको पूरी दुनियां सुंदर महसूस होने लगती है, सब से प्रेम करने का मन करने लगता है। लालच आस पास भी नहीं फटकती। भाषा एकदम शालीन हो जाती है। बच्चों और नौकरों पर चीखने वाला व्यक्ति गाने लगता है। जीवन के चित्र में फूल रंग भर देते है। फूलों में सिर्फ शिल्प ही नहीं है उनका कथ्य भी है। फूल जीवन की सार्थकता समझा जाते हैं। आप महसूस करिये ये समूचा विश्व एक बगीचा है इसमें रंग-रंग के फूल खिले हैं और आप इसके माली हैं। आप उन पौधों को सीचो जिसमें फूल खिलते हैं, एक दिन आप महसूस करोगे कि आपके अंदर एक उपवन आकार ले रहा है। आपकी सोच बदल जायेगी, आपके शब्द नये अर्थ देने लगेंगे, आप जहां भी जाओगे वातावरण को सुगंधित कर दोगे। आप ऐसे मुकाम पर पहुंच जाओगे जहा फूलों की भाषा समझ में आने लगेगी। तब आप आंख बंद किये बैठे रहोगे और फूल आपको संबोधित करेंगे। फूलों का व्याख्यान आपको ऐसा इंसान बना देगा जिसकी दुनियां को बहुत जरूरत है। आप अपना सब कुछ औरों को दे दो और उसके बदले कोई कामना मत करो, आप देखोगे कि देने के बाद भी आपका खजाना भरा का भरा रहेगा, ये मानव के लिये फूलों का पैगाम है। ये मात्र उपदेश नहीं बल्कि फूलों का भोगा हुआ यथार्थ है। फूलों का तो बस यही काम है कि जहां रहो उस जगह को महका दो। फूलों की कोई पार्र्र्टी नहीं होती, कोई घोषणा पत्र नहीं होता, कोई प्रशिक्षण शिविर नहीं होता। इन्हें सिर्फ देना आता है, इनके पास जो भी होता है वह उसे औरो पर उंडेल देते है और खाली होते ही पुन: भर जाते है। वही भरायेगा जो खाली है। खाली होकर भर जाने का यह फार्मूला हर क्षेत्र में लागू होता है।
फूलों की सफलता उनके स्वभाव में छिपी है। फूलों के स्वभाव में सबसे महत्वपूर्ण यह है कि इनमें नरमी बहुत सख्ती के साथ शामिल है। अपने इस स्वभाव को फूल कभी नहीं छोड़ते चाहे जो हो जाये और दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि ये सिर्फ देना जानते है, औरो के काम आना जानते है उसके बदले में ये कोई आशा नहीं करते। डाल पर खिला फूल सिर्फ फूल नहीं है बल्कि वह मंच पर बैठा संत है जो प्रवचन दे रहा है। हमें उससे लौ लगानी होगी, उसको आत्मसात करना होगा, उसकी खुशबू में सराबोर हो जाना होगा, उसके रंग में रंग जाना होगा, खुद को उसके स्वभाव में ढालना होगा, दूसरे के काम आने के लिये अपनी डाल से बिछड़ जाना होगा।
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