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Feb 25, 2009

मुझे भी आता है गुस्सा

अपनी जिम्मेदारी से मुँह न मोड़ें
- रश्मि वर्मा
'अस्पताल' अपने आप में कष्टप्रद शब्द है उस पर किसी अपने को लेकर जाना और वहां इलाज के लिए इधर से उधर भटकना, डॉक्टर के इंतजार में आते जाते मरीजों को देखना और इन सबके साथ अस्पताल के आस- पास फैली गंदीगी तो जैसे अस्पताल की पहचान होती है। अस्पताल में प्रवेश करते ही मरीजों की लाईन और दर्द को देखकर घबराहट वैसे ही बढ़ जाती है जो अच्छे भले स्वस्थ इंसान को बीमार कर देता है।

मुझे समझ नहीं आता हमारे देश में अस्पताल के माहौल को इतना मनहूसियत भरा बना कर क्यों रखा जाता है। प्राईवेट क्लिनिक तुलनात्मक रुप से जरुर साफ नजर आते हैं वहां के वातावरण को भी कुछ हल्का करने की कोशिश की जाती है। जहां इंतजार में बैठे मरीजों के लिए कुछ पत्रिकाएं होती हैं। टीवी लगाकर भी मरीज के इन कष्टप्रद क्षणों को कम करने की कोशिश की जाती है। कई जगह मधुर संगीत भी सुनाई देने लगा है। यदि सभी अस्पतालों में सफाई और मन को शांत रखने वाला वातावरण मिले तो फिर कहना ही क्या? मरीज वहां से आधा स्वस्थ होकर निकलेगा और आधा दवाई खाने के बाद ठीक हो जाएगा।

परंतु अस्पताल के माहौल और व्यवस्था को लेकर जिस तरह के अनुभवों से मैं गुजरी हूं आप भी अनुभव कर चुके होंगे। एक बार मैं अपने परिवार के बीमार सदस्य को लेकर अस्पताल पहुंची। नंबर लगा कर मैं अपनी बारी के आने का इंतजार करने लगी, मेरे आगे अभी दो मरीज और थे। मैं कुछ समझ पाती कि अचानक एक वार्डबॉय के साथ दो सज्जन डॉक्टर के केबिन में धड़धड़ाते हुए घुस गए। गुस्सा तो बहुत आया कि यह क्या बात हुई हम घंटों लाइन लगाए बैठे हैं और ये वीआईपी आते ही अंदर चले गए। लेकिन मैं अपना गुस्सा पी गई, क्योंकि मेरे साथ एक बीमार व्यक्ति था। ऐसे माहौल में यदि मैं लडऩे लगती या गुस्सा जाहिर करती तो उस बीमार की मन:स्थिति क्या होती। सो चुपचाप बैठी रही। बाद में जब पता चलता है कि डॉक्टर की केबिन में इस तरह अंदर जाने वाला, नगर का प्रभावशाली व्यक्ति है या डॉक्टर का परिचित अथवा अस्पताल को मोटी रकम दान देने वाला, तब मन होता कि उनसे जाकर पूछूं- क्या आपकी तकलीफ हमारी तकलीफ से ज्यादा है?

लेकिन अस्पताल का दर्द सिर्फ इतना ही नहीं होता। इस लम्बे इंतजार में और भी कई तरह के अनुभवों से गुजरना होता है। इन दिनों हर रोज एक नया अस्पताल खुल रहा है तो क्या हुआ, उससे दोगुनी गति से मरीजों की संख्या भी तो बढ़ती ही जा रही है। जब भी अस्पताल जाओ खासकर सरकारी अस्पताल वहां आस-पास इतनी अधिक गंदगी होती है कि सांस लेना दूभर होता है। अस्पताल का वातावरण घुटन भरा होता है कि यह सब अच्छे भले इंसान को बीमार कर देता है।

प्रश्न यह उठता है कि ये गंदगी करने वाले होते कौन हैं, हम ही ना? अस्पताल मेनेजमेंट सफाई की व्यवस्था नहीं करवाता होगा ऐसा तो हो नहीं सकता, और जहां ऐसा नहीं होता तो इसके लिए भी वहां शिकायत की जा सकती है। पर अस्पताल की सफाई क्या केवल अस्पताल मैनेजमेंट की ही जिम्मेदारी है? क्या इस सफाई में हम अपना योगदान नहीं कर सकते? क्या यह हमारी भी जिम्मेदारी नहीं है कि हम अस्पताल को स्वच्छ रख सकें। हम यह सोच कर क्यों कुछ नहीं करते कि हमें क्या करना है सिर्फ एक दिन ही तो यहां आना है उसके लिए कौन मुसीबत मोल ले। यही वजह है कि बहुत कुछ गलत होते हुए देखकर भी हम अनदेखा कर जाते हैं।

इसी तरह डॉक्टर कब मिलेंगे, कौन से नंबर के कमरे में मिलेंगे जैसी सतही जानकारी न मिलने के कारण भी मरीज को लिए- लिए इधर से उधर और कभी- कभी कई- कई मंजिल तक ऊपर से नीचे होते रहना पड़ता है। ऐसे में अस्पताल प्रशासन की पूछताछ वाली व्यवस्था जिम्मेदार होती है। हम क्यों नहीं इन सबकी शिकायत करते।

जिम्मेदारी से भागना तो समस्या का हल नहीं है। हमें पहल तो करनी ही होगी, कि जब डॉक्टर से मिलने कोई वीआईपी लाईन तोड़े तो खड़े होकर उनसे कह सकें कि हम दो घंटे से बैठे हैं या तो आप भी लाईन में लग जाईए या फिर डॉक्टर से अलग से समय लेकर आईए, जनता के समय में आकर उनकी बद्दुआएं क्यों लेते हैं। सीधे डॉक्टर के पास जाकर भी इसकी शिकायत करें।

कहने का तात्पर्य यह कि सिर्फ गुस्सा करने से काम नहीं बनने वाला। उस गुस्से को खतम करने के लिए आगे आना होगा ताकि कोई लम्बी लाइन तोडक़र आपके समय को छीनने की कोशिश न करे। तो आईए जाग जाएं और इस गुस्से को जागरुकता में बदल लें।

आपके पत्र

जनता का संदेश

उदंती से जुड़े प्रकाशन मंडल के सभी सदस्यों को नववर्ष की बधाई, रमन सरकार के दोबारा आने का सबसे बड़ा कारण मेरे विचार से शिक्षाकर्मियों की ईमानदारी से की गई भर्ती है, साथ ही उनको दिया जाने वाला वेतनमान भी स्वागत योग्य कदम है,बेरोजगारों को रोजगार देने वाली सरकार ही सत्ता पाने की हकदार होगी, यह संदेश जनता ने दे दिया है, जोगी जी जैसे प्रतिभाशाली प्रशासक ने मुख्यमंत्री रहकर रोजगार जैसे संवेदनशील मुददे को गंभीरता से न लेकर गलती की और पद से बाहर हो गए...

- अजय साहू, शिलांग, मेघालय से

भीड़ से अलग

दिसम्बर 08 अंक देखने को मिला। ऐसी आकर्षक और सारगर्भित पत्रिका देखकर भला किसका मन प्रसन्न न होगा? इसे यह आकार देकर, आप संपादित कर रही हैं यह भी मेरी खुशी को और अधिक बढ़ाने के लिए पर्याप्त है। आपकी कला-दृष्टि और सूझबूझ इस पत्रिका को भीड़ से अलग करती है।

- कवि मुकुन्द कौशल, पद्मनाभपुर, दुर्ग (छ.ग.)

कमी को पूरा करने का प्रयास

उदंती जैसी सुरुचि सम्पन्न पत्रिका कस्बाई शहरों में नहीं मिलती है। कभी-कभार महानगरों में उदंती मिल जाती है। देर सबेर ही पढऩे को मिलता है। पत्रिका में शामिल विभिन्न विषयों को देखकर पता चलता है कि आपने धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान जैसी अच्छी पत्रिकाओं की कमी को पूरा करने का प्रयास किया है। बधाई।

- रामजन्म मिश्र, सकरुगढ़ साहिबगंज, झारखंड

शुचिता, सत्यता, सभ्यता की बातें

उदंती का अंक पढ़ा। आपको बधाई। चेतना की अभिव्यक्ति का एक हिस्सा बन रही उदंती को मेरा असीम प्रेम, आज शुचिता, सत्यता और सभ्यता की बातें कहने वाले उचित माध्यम तक नहीं पहुंच पाते। उम्मीद है उदंती वह माध्यम बनेगी...।

- विकल्प ब्यौहार, रायपुर से

सुनीता के बेहतरीन चित्र

जनवरी का उदंती अंक प्राप्त हुआ। विविधतापूर्ण रचनाओं से समृध्द यह पत्रिका बहुत अच्छी लगी। गोविंद मिश्र की 'सतपुड़ा' पर यात्रा कथा सचमुच में ऊष्मा से भर गई। मधु अरोड़ा की बातचीत में महेश भट्ट की साफगोई के साथ अन्य रचनाएं भी अच्छी लगीं। सुनीता वर्मा के चित्र ने पत्रिका की सुंदरता में चार चांद लगा दिए हैं। मेरी गज़़लों की ख़ूबसूरत प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत शुक्रिया। इतनी सुंदर पत्रिका पाठकों तक पहुंचाने के लिए उदंती परिवार को बधाई।

-देवमणि पाण्डेय, मुम्बई

सतपुड़ा... लंबा पर रोचक

सतपुड़ा यात्रा वृत्तांत लंबा पर रोचक लगा, चित्र भी सुंदर लगे। पहला चित्र संभवत गलत लग गया है यह भीमबेटका का है। आभार।

- पी.एन. सुब्रमण्यिम, पल्लीकारा (त्रिशुर), केरल

तुम मुझे भूल भी जाओ तो ये हक है तुमको...

-.सिराज खान

भारतीय फिल्म संगीत के क्षेत्र में प्रभावशाली गायिका बहनों लता मंगेशकर और आशा भोंसले की लंबी उपस्थिति के कारण अनेक महान गायिकाओं का गायन कैरियर सिमटकर रह गया। इनमें से कुछ गायिकाओं ने सामान्य और अपेक्षाकृत मुश्किल जीवन अपना लिया। फिर भी 1940 से अब तक के हिन्दी फिल्म संगीत के समृद्घ रंगपटल पर शमशाद बेगम, सुधा मल्होत्रा, कमल बारोट, उषा मंगेशकर, रूमा गुहा ठाकुरता और मुबारक बेगम जैसी पाश्र्वगायिकाओं का योगदान अविस्मरणीय रहा है।
शमशाद बेगम
निश्चित रूप से इनमें से संगीत की रानी शमशाद बेगम हैं। वे अब अपनी इकलौती बेटी और दामाद के साथ मुंबई के उपनगर स्थित अपने घर में शांत और आरामदायक जीवन बिता रही हैं। यह वयोवृद्घ महिला 89 साल से ज्यादा उम्र की है। हाल ही तक वे लोगों की निगाहों से दूर जीवन बिता रही थीं जब एक प्रमुख भारतीय पत्रिका ने उनका साक्षात्कार लिया तब आखिरी बार लगभग 50 साल पहले उन्होंने किसी बाहरी व्यक्ति को अपना फोटो खींचने की इजाजत दी थी। इसीलिए उनका यह साक्षात्कार सचमुच एक ऐतिहासिक दस्तावेज है।
शमशाद बेगम ने 1937 में लाहौर रेडियो स्टेशन पर गाना गाकर अपने कैरियर की शुरुआत की थी। अमृतसर में जन्मी इस गायिका ने अपनी आवाज से श्रोताओं का ध्यान तुरंत आकर्षित कर लिया और उन्होंने 40 के पूरे दशक से लेकर 60 के दशक के अंत तक अपने प्रशंसकों के दिलों पर राज किया। सैंया दिल में आना रे... (बहार-1951), बूझ मेरा क्या नाम रे... (सीआईडी-1956), तेरी महफिल में किस्मत आजमाकर हम भी देखेंगे... (मुगल-ए-आजम-1960) शमशाद बेगम के जबरदस्त लोकप्रिय गीतों में से कुछ गीत हैं।
उनका गाया अंतिम गीत कजरा मोहब्बत वाला ... (किस्मत) 1968 में रिकार्ड किया गया था जिसमें प्रसिद्घ संगीतकार ओ.पी. नैय्यर ने कभी आर कभी पार... (आर पार-1954) जैसा प्रभाव एक बार फिर पैदा कर दिया था। ताजगी से भरा हुआ कभी आर कभी पार... उनका गाया एक और लोकप्रिय गीत है। यह गीत आज भी उतना ही लोकप्रिय है जितना 40 साल पहले था जब उन्होंने पाश्र्वगायन को अलविदा कहा था। उनके सदाबहार लोकप्रिय गीतों के लिए लॉग ऑन करें।
http://www.youtube.com/watch?v=eVGyT7AVxMw
http://www.youtube.com/watch?v=o8CqqmvwniY
http://www.youtube.com/watch?v=LLnJfodDTSw
सुधा मल्होत्रा


सुधा मल्होत्रा एक और कलाकार हैं जिनके गले में जादू है। नई दिल्ली में 1936 में जन्मी इस गायिका को मास्टर गुलाम हैदर, 40 के दशक के एक प्रमुख संगीतकार जो अपने गीतों में लोकप्रिय रागों को पंजाबी धुनों के साथ जोडऩे के लिए जाने जाते हैं, ने एक बाल कलाकार के रुप में ढंूढ निकाला था। पाश्र्वगायिका के रुप में गीत मिल गए नैन... से उन्हें पहला ब्रेक मिला जिसे फिल्म 'आरजू-1950' के लिए अनिल विश्वास ने संगीतबद्घ किया था। फिल्म 'कालापानी' -1956 का भजन ना मैं धान चुनूं..., सलाम-ए-हसरत कुबूल कर लो... (बाबर-1960) और किशोर कुमार के साथ गाया युगल गीत कश्ती का खामोश सफर है... (गर्लफ्रेंड-1960) कुछ अन्य गीत हैं जिनके लिए उन्हें अक्सर याद किया जाता है।
सन् 1980 में तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह द्वारा कलाभूषण पुरस्कार, जिसे पाने की तमन्ना हर कलाकार को रहती है, दिए जाने के अलावा उनके जीवन के दो अन्य उल्लेखनीय पहलू भी हैं। वे उन दुर्लभ पाश्र्वगायिकाओं में से हैं जिन्होंने अपना ही संगीतबद्घ किया हुआ गीत गाया है। सन् 1956 की फिल्म 'दीदी' का गीत तुम मुझे भूल भी जाओ... को सुधा ने न केवल संगीतबद्घ किया बल्कि मुकेश के साथ गाया भी। कहा जाता है कि जिस दिन यह गीत रिकार्ड होना था संगीतकार एन. दत्ता बीमार पड़ गए। रिकार्डिंग आगे नहीं बढ़ाई जा सकती थी क्योंकि गीत का फिल्मांकन रोका नहीं जा सकता था। यह सुनकर सुधा ने प्रस्ताव रखा कि वे इसे संगीतबद्घ करेंगी। यह निश्चित रूप से उनके महान कैरियर का सबसे दिलचस्प पहलू है।
सुधा का नाम अक्सर प्रसिद्घ गीतकार साहिर लुधियानवी के साथ भी जोड़ा जाता था जिनके बारे में कहा जाता था कि वे सुधा से प्रेम करते थे। दुर्भाग्य से उनके प्रेम को प्रतिदान नहीं मिलना था और यही वह निराशा है जो चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं... (गुमराह-1963) गीत में अविस्मरणीय बन गई। सुधा अब 72 साल की हैं और शमशाद बेगम की तरह ही हिन्दी फिल्म उद्योग के घर मुंबई में रहती हैं। कभी-कभार गजल और भजन के किसी स्टेज प्रोग्राम के अलावा शायद ही वे कभी दिखाई देती हैं या उनकी आवाज सुनाई देती है। उनकी विशिष्ट गायन शैली को
जानने  लिए लॉग ऑन करें।
http://www.youtube.com/watch?v=BA41alxY758

http://www.youtube.com/watch?v=_rNUcRz6Tdc
कमल बारोट
इसी तरह प्रतिभाशाली गायिका कमल बारोट हैं जिन पर किसी कारणवश सहयोगी गायिका का ठप्पा लगकर रह गया। दरअसल उन्होंने सहयोगी गायिका के रूप में अनगिनत युगल गीत और कव्वालियां गाई हैं। बरसात की रात-1960 में सुमन कल्याणपुर के साथ गरजत बरसत सावन आयो रे..., (घराना-1961) में आशा भोंसले के साथ दादी अम्मा दादी अम्मा मान जाओ..., (पारसमणि-1963) में लता मंगेशकर के साथ हंसता हुआ नूरानी चेहरा... सूची बहुत लंबी है। लेकिन उनके दुर्लभ एकल गीत भी विशिष्ट रहे हैं। बादशाह का गीत आज हमको हंसाए न कोई... भुलाए नहीं भूलता है।
रोचक बात यह है कि अपने परिवार में कमल बारोट अकेली नहीं हैं जो फिल्मी दुनिया से जुड़ी हुई हों। उनके भाई चंद्रा बारोट ने अमिताभ बच्चन और जीनत अमान के अभिनय से सजी मूल डॉन 1978 का निर्देशन किया था। कमल जो अब 70 साल से ऊपर की हो चुकी हैं, लंदन और मुंबई के बीच अपना समय बिताती हैं। लेकिन हाल ही में उन्होंने कुछ गाया हो इसकी कोई जानकारी नहीं मिलती। उनकी उत्कृष्ट गायकी सुनने के लिए लॉग ऑन करें -
http://www.youtube.com/watch?v=F9HoeRfvfJ0
http://www.youtube.com/watch?v=bjzvKib1RFw

उषा मंगेशकर
आप मानें या न मानें लेकिन मंगेशकर उपनाम हिन्दी फिल्म संगीत के क्षेत्र में हमेशा महान व प्रसिद्घ कलाकार बनना सुनिश्चित नहीं कर सकता है और सिर्फ उषा मंगेशकर यह बहुत अच्छी तरह से जानती होंगी। भारतीय फिल्म संगीत के प्रमुख परिवार से संबंधित होने के बावजूद हिन्दी और मराठी की इस कुशल पाश्र्वगायिका ने शायद अपना पूरा जीवन अपनी सुप्रसिद्घ बहनों लता और आशा की छाया तले बिताया है। कमल बारोट की तरह उन्होंने भी अनेक युगल गीतों में सहयोगी कलाकार के रूप में अपनी बहनों का साथ दिया है। आशा भोंसले के साथ गाए उनके गीत काहे तरसाए...(चित्रलेखा-1964) और देखो बिजली डोली... (फिर वही दिल लाया हूं-1963) बेहतरीन हैं। उनका एकल गीत सुल्ताना सुल्ताना... (तराना-1979) और लता मंगेशकर के साथ गाया गीत अपलम चपलम...(आजाद-1955), ऊंचे सुर में गाने की उनकी क्षमता को दर्शाता है। यहां तक कि ये गीत आज भी लोकप्रिय हैं। दरअसल वे जब भी स्टेज प्रोग्राम करती हैं ये गीत जरूर गाती हैं। अब 73 साल की हो चुकी इस गायिका ने सार्वजनिक रूप से गाना लगभग बंद कर दिया है। हालांकि 2006 में 'जय संतोषी मांÓ के गीत गाकर उन्होंने सभी को आश्चर्यचकित कर दिया था। उनके गीत सुनने के लिए लॉग ऑन करें -
http://www.youtube.com/watch?v=ZHwyhRIVyI
http://www.youtube.com/watch?v={PUbSyLzBiA

रूमा गुहा ठाकुरता

एक ऐसी गायिका जो अपनी विभिन्न उपलब्धियों से श्रोताओं का दिल जीत सकती है वह है रूमा गुहा ठाकुरता। सन् 1934 में जन्मी रूमा में अभिनेत्री, गायिका, नर्तकी और नृत्य निर्देशक मानो एक ही व्यक्तित्व में समाहित हैं। सन् 1951 में रूमा ने प्रख्यात गायक किशोर कुमार से विवाह किया और अगले ही साल अमित कुमार का जन्म हुआ। सन् 1958 में किशोर कुमार से तलाक लेने के बाद वे कोलकाता में बस गईं जहां उन्होंने संगीतकार सलिल चौधरी और फिल्म निर्माता सत्यजीत रे के साथ मिलकर 'कलकत्ता यूथ क्वाइयर', सीवायसी चर्च में गाने वाली गायन मंडली की स्थापना की। वे जरूर कुछ महत्वपूर्ण कार्य कर रही होंगी क्योंकि इस साल 2 मई को 'सीवायसी' ने अपनी स्वर्ण जयंती मनाई। 'सीवायसी' को क्वाइयर संस्कृति का प्रचलनकर्ता माना जाता है और इसे डेनमार्क में आयोजित कोपेनहेगन यूथ फेस्टिवल में प्रथम पुरस्कार सहित अनेक अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं। रूमा, मदर टेरेसा के साथ काम कर चुकी हैं। उन्होंने मन्ना डे, हेमंत कुमार और किशोर कुमार के साथ गीत गाए हैं। साथ ही 100 से ज्यादा हिन्दी और बंगाली फिल्मों में अभिनय किया है। उन्होंने सन् 1989 में ऑस्कर पुरस्कार के लिए नामांकित फिल्म 'घनशत्रु' में मुख्य भूमिका निभाई है। सन् 2006 में मीरा नायर की फिल्म 'द नेमसेक' में अभिनय करने के बाद 74 साल की उम्र में भी जीवन के प्रति रूमा का उत्साह उतना ही स्पष्ट है जितना पहले था। उनकी उपलब्धियों को जानने के लिए लॉग ऑन करें।
http://www.youtube.com/ watch?v=FkLGfr4o4DY

http://www.youtube.com/watch?v=hPEMo4_ATV0

मुबारक बेगम

भारतीय फिल्म संगीत की इन शानदार और प्रशंसनीय उम्रदराज महिलाओं के बारे में कोई भी लेखन संपूर्ण नहीं हो सकता है अगर उसमें मुबारक बेगम का जिक्र न हो जिनकी वापसी की कहानी भारतीय फिल्म संगीत में ही नहीं विश्व संगीत के वृतांत में भी अद्वितीय है। कभी तनहाईयों में हमारी याद आएगी...1961, मुझको अपने गले लगा लो...(हमराही-1963) और कुछ अजनबी से आप हैं... (शगुन-1964) जैसे अविस्मरणीय गीतों को अपनी आवाज देने वाली इस गायिका ने 1968 के बाद से कोई गीत नहीं गाया क्योंकि उन्हें दरकिनार कर दिया गया और दिल को छू लेने वाली उनकी आवाज को लोगों ने तवज्जो देना बंद कर दिया। इस साल की शुरुआत में मैंने उन्हें ढंूढने में सफलता पाई और उनके जीवन तथा गायन कैरियर को पुनर्जीवित करने की प्रक्रिया शुरु कर दी। लगता है मुबारक बेगम ने ठीक वहीं से अपना कैरियर फिर शुरु कर दिया है जहां से उन्होंने 40 साल पहले छोड़ा था और स्पष्ट है कि उनकी आवाज ने अपना जादू और उल्लास नहीं खोया है। मंच पर उनकी उपस्थिति दूसरों को भी तुरंत प्रभावित करती है। पिछले छह महीनों में वे पुणे, मुंबई, बड़ौदा और नई दिल्ली हाल ही में 17 जुलाई (कोद्घ)..... में दो-दो बार प्रस्तुति दे चुकी हैं। साथ ही कोलकाता और चेन्नई में उनके शो प्रस्तावित हैं। आप वापसी की बात करते हैं! वास्तविकता में किसी कल्पनाशील निर्माता या संगीतकार के थोड़े से प्रयास से वे रिकार्डिंग स्टूडियो में भी लौट सकती हैं। मुबारक बेगम की सुरीली आवाज सुनी जा सकती है-
http://www.youtube.com/watch?v=~-FuMAFtw~o


http://www.youtube.com/watch?v=hCayLzdwhvU
ये महिलाएं राष्ट्रीय खजाना हैं। दशकों बीत गए हैं जब इन महिलाओं ने अंतिम बार रिकार्डिंग स्टूडियो में कदम रखा था। लेकिन उनके गाए गीत आज भी दिलों को छू जाते हैं। शायद यही वक्त है जब उन्हें अहसास दिलाया जाए कि उन्हें भुलाया नहीं गया है। (विमेन्स फीचर सर्विस )

हम कितने जिम्मेदार हैं?

हम कितने जिम्मेदार हैं?
- उमेश चतुर्वेदी
टीवी को गैर जिम्मेदार ठहराए जाने के बीच इसकी असल वजहों पर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। टीवी वाले नाटकीय और सनसनीखेज रिपोर्टिंग के लिए जिम्मेदार तो हैं, इसे अब टेलीविजन के न्यूजरुम में काम करने वाले लोगों का एक बड़ा वर्ग भी मानने लगा है। 
उदारीकरण और बाजारवाद के दौर में जिस तरह अंधाधुंध टीवी का विस्तार हुआ है उसमें बौद्धिकता के लिए खास गुंजाइश की जगह नहीं रही.. लिहाजा टीवी माध्यम सहज ही बुद्धिजीवी वर्ग के निशाने पर आ गया है। इसके साथ ही इस माध्यम को गैर जिम्मेदार ठहराए जाने का दौर तेज हो गया है। चूंकि प्रभावशाली प्रिंट मीडिया और बौद्धिक तबका इस आक्रमण अभियान में शामिल है इसलिए सरकार को भी मौका मिल गया है और उसने कुछ चैनलों को कारण बताओ नोटिस जारी करने में देर नहीं लगाई।
टीवी को गैर जिम्मेदार ठहराए जाने के बीच इसकी असल वजहों पर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। टीवी वाले नाटकीय और सनसनीखेज रिपोर्टिंग के लिए जिम्मेदार तो हैं, इसे अब टेलीविजन के न्यूजरुम में काम करने वाले लोगों का एक बड़ा वर्ग भी मानने लगा है। इसके बावजूद ना सिर्फ मुंबई हमले- बल्कि दूसरी ऐसी घटनाओं की भी ऐसी रिपोर्टिंग जारी है। इस मसले पर पूरी पड़ताल करने से पहले एक बार हमें समानांतर सिनेमा के दौर में जारी साहित्य और सिनेमा के आपसी रिश्ते और उसे लेकर जारी विवाद को भी याद कर लेना जरूरी होगा। पिछली सदी तीस के दशक में हिंदी कहानी के सबसे महत्वपूर्ण शिल्पकार प्रेमचंद ने मायानगरी में नया कैरियर बनाने को लेकर पांव रखे थे- लेकिन उन्हें मायावी दुनिया रास नहीं आई और वे बनारस लौट आए थे। पचास के दशक में मुंबई गए अमृतलाल नागर का भी वैसा ही अनुभव रहा। ये बात अलग है कि उन्हीं दिनों साहित्य की दुनिया से फिल्मी दुनिया में गए पंडित नरेंद्र शर्मा ने साहित्य से इतर फिल्मी दुनिया में नया मुकाम रचा। सातवें दशक में यही काम कमलेश्वर ने किया। लेकिन प्रेमचंद और अमृतलाल नागर के दौर में सिनेमा को लेकर साहित्यिक हलकों में जो पूर्वाग्रह पनपा, वह कमोबेश आज भी जारी है। शायद यही वजह है कि कमलेश्वर रहे हों या फिर नरेंद्र शर्मा... उन्हें साहित्यिक जगत में वह सम्मान और आदर नहीं मिला जिसके वे हकदार रहे। कुछ ऐसा ही संबंध आज आज प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों के बीच भी है। इसीलिए जब भी टेलीविजन की दुनिया में मुंबई जैसी घटनाओं की गैरजिम्मेदार रिपोर्टिंग होती है पूरा का पूरा प्रिंट माध्यम उस पर पिल पड़ता है।
ऐसा नहीं कि 27 नवंबर 2008 को हुए मुंबई हमले की ही टीवी ने अतिरेकी रिपोर्टिंग की। 13 दिसंबर 2001 को संसद पर हमले की भी ऐसी ही रिपोर्टिंग हुई। जयपुर और अहमदाबाद धमाके को लेकर भी इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों ने ऐसा ही कदम उठाया। आलोचना तब भी हुई, लेकिन इस बार ज्यादा बावेला इसलिए मचा क्योंकि एक चैनल ने ना सिर्फ एक कथित आतंकवादी का फोनो चलाया बल्कि अपने इस काम को सही साबित करने की कवायद में भी जोरशोर से जुट गया है। ऐसे में ये सवाल उठना लाजिमी है कि कोई आतंकवादी किसी चैनल पर आकर ये प्रस्ताव रखे कि वह देश को उड़ाने या प्रधानमंत्री पर ही हमला बोलने का ऐलान करने वाला है तो क्या उसे टीवी अपना स्टूडियो और अपना पैनल कंट्रोल रूम इसके लिए मुहैय्या कराएगा। सवाल ये भी है कि क्या किसी पत्रकार के पास किसी मासूम लडक़ी या महिला से बलात्कार का फुटेज है तो उसे भी बिना सेंसर्ड और बिना संपादन दिखा दिया जाएगा। करीब छह साल पहले आगरा में एक अध्यापिका का उसके ही कुछ छात्रों ने बलात्कार किया। इसकी फुटेज किसी के पास क्या होती, लेकिन अपने दर्शकों को ये घटना दिखाने के लिए एक प्रमुख चैनल ने बाकायदा इस रेप कांड का नाट्य रूपांतरण कराया और उसे खबर में वांछित जगह पर संपादित करके चलाया भी। उसका भी तब विरोध हुआ था।
टेलीविजन चैनलों में एक वर्ग ऐसा भी है जिसका मानना है कि खबर की सच्चाई दिखाने के लिए उसका ये कदम जायज है। इसी आधार पर 2004 में गुजरात के एक खास संप्रदाय के साधुओं की यौन लीला को एक चैनल ने बाकायदा बिना किसी संपादन के दिखाया था। लेकिन हकीकत ये थी कि न्यूज रूम में काम करने वाले अधिकांश पत्रकार इससे सहमत नहीं थे। महिला पत्रकारों की न्यूज रूम में हालत क्या थी उन्हें ही पता है, जो उस समय न्यूज रूम में थीं।
बहरहाल जो ये चैनल मान रहे हैं कि सच्चाई के लिए ये सारी चीजें उन्हें दिखाने का हक है । पत्रकारिता में बुराई को उजागर करने के लिए बुराई को ज्यों का त्यों दिखाने का एक वर्ग तेजी से इन दिनों बढ़ा है। बुराई दिखाई जाए... उसे लेकर दर्शकों और पाठकों का आगाह किया जाए- इससे शायद ही किसी को एतराज होगा। लेकिन इसकी सीमा क्या होगी? यह तो कहीं न कहीं उन्हें तय करना ही होगा। अन्यथा उन्हें अमेरिका के नैकेड न्यूज नामक चैनल को भी दिखाने से गुरेज नहीं होगा। इंटरनेट पर भी वह चैनल मौजूद है। नेकेड न्यूज नाम के इस चैनल के सारे एंकर बिल्कुल नंगे इंटरव्यू लेते या लेती हैं। खबरें भी नंगे बदन ही पढ़ी जाती हैं। दरअसल बहस और आलोचना की वजह भी यही है कि अगर ऐसा किया गया तो औरों से अलग और बौद्धिक दिखने वाले पत्रकार वर्ग और बाकी लोगों के विवेक में फर्क कहां रह जाएगा।
मार्च 2002 में गुजरात दंगों में खुलेआम लोगों को जलाने की घटनाओं की रिपोर्टिंग को लेकर भी विवाद हुआ था। लेकिन तब इसकी मुखालफत नहीं हुई थी। प्रिंट मीडिया और बुद्धिजीवियों के एक बड़े वर्ग ने इसका समर्थन किया था। इसकी रिपोर्टिंग करने वाले लोगों ने तब के विरोधियों के तर्कों को सिरे से खारिज कर दिया था। विरोधियों का तर्क था कि इससे हिंसा को और बढ़ावा मिला। लेकिन मुंबई पर आतंकी हमले के बाद चीजें बदल गईं हैं। पूरे देश में इस घटना को लेकर विरोध के सुर उठ रहे हैं। लिहाजा टीवी में काम करने वाले लोगों का बड़ा तबका इस घटना को लेकर रक्षात्मक बना हुआ है।
मुंबई हमले पर टीवी ने क्या-क्या किया... इसे तकरीबन पूरे देश ने देखा है। कुछ लोगों का सवाल है कि ताज होटल से छुड़ाए गए बंधकों से टीवी वालों ने पूछा कि आपको कैसा लग रहा है। प्रिंट के कई दिग्गजों ने इसकी भी आलोचना की है कि टीवी पत्रकारों ने सामान्य शिष्टाचार का ध्यान नहीं रखा और बदहवास लोगों का इंटरव्यू करने या उनकी बाइट लेने के लिए दौड़ पड़ा। ये सच है कि टीवी वाले इस सवाल का प्रतिकार नहीं कर रहे हैं, लेकिन क्या यह कार्य इतना गिरा हुआ है कि इसकी आलोचना की जाए। क्या किसी सार्वजनिक माध्यम का यह दायित्व नहीं बनता कि वह दुनिया को यह बताए कि आतंकी हमले के दौरान ताज होटल के अंदर क्या हो रहा था और इसका आंखों देखा हाल बताने के लिए बंधकों के अलावा और दूसरा कौन हो सकता है। ऐसे सवाल तो प्रिंट के पत्रकार भी पूछ रहे थे और केस हिस्ट्री तो अगले दिन के अखबारों में भी इंटरव्यू और बंधकों की आपबीती के रूप में भरी पड़ी थी। लेकिन उस पर सवाल तो नहीं उठा।
यह सच है कि टीवी की अतिरेकी रिपोर्टिंग से शुरू में आतंकियों को मदद मिली। यह गलती इतनी बड़ी है, जिससे इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों को सबक लेना चाहिए। लेकिन कभी किसी ने ये जानने की कोशिश नहीं की कि टीवी के न्यूज रूम में आखिर ऐसा क्यों होता है। ये सच है कि टीवी रिपोर्टर इस दौरान हर गतिविधि पर नजर गड़ाए हुए थे। पल-पल की खबरें अपने पैनल कंट्रोल रूम को भेज रहे थे। लेकिन ये भी उतना ही सच है
कि इसे जनता को दिखाने- अपने चैनल पर चलाने और न चलाने का फैसला उनके आका ले रहे थे। टेलीविजन न्यूज रूम का आज के दौर में जैसा विकास हुआ है और टीआरपी की गलाकाट प्रतियोगिता पर जिस तरह बाजार और विज्ञापनों की दुनिया टिकी हुई है उसके चलते न्यूज रूम का कोई आका अगर दूसरे चैनल पर ऐसी रिपोर्टिंग दिख गई तो अपने चैनल पर जाया करने से रोकने का दुस्साहस नहीं कर सकता। टीवी न्यूजरूम के प्रमुख लोगों की निगाह अपने प्रतिद्वंद्वी चैनलों पर लगी रहती है। अगर सामने वाले चैनल के रिपोर्टर ने अतिरेकवादी भूमिका निभाई तो न्यूज रूम में दहाड़ सुनाई देने लगती है। रिपोर्टर और कैमरामैन को मोबाइल पर निर्देश दिए जाने लगते हैं कि वैसा ही कुछ करके दिखाओ जैसा सडक़ पार या पड़ोस का चैनल करके दिखा रहा है। यही वजह है कि एक दौर में ताज की रिपोर्टिंग कर रही सभी टीमों के रिपोर्टर सोकर रिपोर्टिंग करते दिखे। जबकि उनके कैमरा मैन पहले की ही तरह खड़े थे। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या गोली लगने का खतरा सिर्फ रिपोर्टरों को था और कैमरामैन बुलेटप्रूफ पहनकर महफूज थे। निश्चित रूप से इसका जवाब ना में है। अगले दिन के अखबारों में ये पूरी की पूरी तस्वीर छपी भी और आम लोगों तक ये नाटकीयता पहुंची भी। इन तस्वीरों ने भी टीवी रिपोर्टिंग को लेकर सवाल उठाने का मौका दिया।
लेकिन इस पूरी आलोचना और बहसबाजी के दौर में टेलीविजन न्यूज रूम के असल संकट पर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। एक-दो दशक पहले तक जो लोग पत्रकारिता में आ रहे थे उनके सामने दुनिया को बदलने और कुछ कर दिखाने का जज्बा हुआ करता था। लेकिन बाजारवाद के दौर में ये हकीकत बदल गई है। टीवी के लोग खुद को पत्रकार भले ही कहें लेकिन एक पूरी की पूरी पीढ़ी अब नौकरी करने आई है। गली-मोहल्ले के पत्रकारिता संस्थानों से लाखों रूपए की फीस देकर कथित पढ़ाई के बाद निकले नए लडक़े-लड़कियों का नजरिया साफ है। उनका मानना है कि वे नौकरी करने आए हैं पत्रकारिता करने नहीं। शायद यही वजह है कि उन्हें जब भी पत्रकारिता के नाम पर पत्रकारीय मानदंडों की अवहेलना करने को कहा जाता है, वे वैसा करने में देर नहीं लगाते। लाखों रूपए के कर्ज की रकम पर मिली शिक्षा से निकले पत्रकार ने दम दिखाया तो उसकी नौकरी जा सकती है।
रही बात न्यूज रूम के आकाओं की तो उनकी भी हालत कुछ बेहतर नहीं है- सिवा मोटी पगार के। नौकरी पर लगातार लटकी तलवार के चलते वे भी पत्रकारीय दंभ और मानदंड पर कायम रह नहीं पाते। टीआरपी गिरी नहीं कि नौकरी पर लटकी तलवार और नजदीक हुई। बाजारवाद ने लोगों के सामने आदर्शों के लिए जगह नहीं छोड़ी। ऐसे में चाहे लाख सवाल उठे होना तो वही है जो बाजार चाहता है। टीवी पर सवाल उठाना कुछ वैसा ही है जैसे बाजार में रहकर बाजार का विरोध...
दरअसल हर पेशे की एक नैतिकता भी होती है। आजादी के आंदोलन की कोख से निकली भारतीय पत्रकारिता के लिए पहले इसकी जरूरत नहीं रही। आजादी के आंदोलन का पत्रकारिता भी एक उपादान रही है। चूंकि तब पत्रकारिता का मकसद आजादी पाना था, इसलिए उसमें राष्ट्रीय आंदोलन की वे सारी चीजें समाहित हो गई थीं, जिसके बल पर राष्ट्रीय आंदोलन ने गति पकड़ी और उफान पर रहा। आजादी के बाद के करीब एक दशक तक पत्रकारिता उसी रोमांसवाद से प्रभावित रही। लेकिन नब्बे के दशक में शुरू हुए बाजारवाद के दौर में पत्रकारिता ने अपनी इस नैतिक जिम्मेदारी से पल्ला छुड़ाना शुरू किया। चूंकि टेलीविजन इस बाजारवाद के दौर में ही पनपा, उभरा और विराट बना, इसलिए उसने बाजारवाद की तमाम खासियतें बेरोकटोक खुद में समाहित कर लीं।
अखबार में संपादकीय टीम की मीटिंगों में जहां महंगाई, कानून-व्यवस्था और सुरक्षा की बदहाली सबसे बड़ा मुद्दा रही हैं, टेलीविजन न्यूज रूम की मीटिंगों में नए ब्रांड के कपड़े, फैशन शो और कार की गिरती-बढ़ती कीमतों का मसला छाया रहता है। वैसे टीवी पर सवाल उठाने वाले प्रिंट माध्यमों की बैठकों में धीरे-धीरे ही सही टीवी का ये रोग आता जा रहा है। रही-सही कसर टैम रेटिंग प्वाइंट यानी टीआरपी की माया ने पूरी कर दी है। टैम का जो पैमाना है उस पर भी बाजारवाद की चीजें ही हावी हैं। ऐसे में ये सोचना कि इस व्यवस्था पर टिका टेलीविजन उद्योग और उसके पत्रकार पेशेवर नैतिकता के तहत ही काम करेंगे, बिल्कुल बेमानी है।
वकालत, इंजीनियरिंग और डॉक्टरी जैसे पेशों की नैतिकता निर्धारित करने , उनकी आचार संहिता बनाने के लिए बार कौंसिल और मेडिकल कौंसिल जैसे संगठन हैं। लेकिन मीडिया के लिए ऐसा कोई पेशेवर संगठन नहीं है जिसके जरिए पत्रकारों को नैतिक दायरे में बांधे रखने का काम किया जा सके। मुंबई हमलों के बाद एक बार फिर से मीडिया के लिए ऐसे ही एक पेशेवर संगठन की जरूरत बढ़ती जा रही है। ताकि वह मीडिया और उसमें काम करने वाले लोगों के लिए एक मानदंड तय करे। उनकी आचार संहिता तय करे और उसे लागू करने की नैतिक जिम्मेदारी भी उठाए।
सूचना और प्रसारण मंत्री रहते सुषमा स्वराज ने 2002 में मीडिया कौंसिल के गठन का सवाल जब उछाला था, तब इसका ना सिर्फ इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों और घरानों ने भी विरोध किया था। पत्रकारों का एक तबका तो खैर आगे था ही। लेकिन अब इसे लेकर भी सहमति बनती दिख रही है। टीवी पत्रकारों का एक बड़ा तबका भी मानने लगा है कि कम से कम उन्हें भी पेशेवर नैतिकता और आचार संहिता के दायरे में बंधना ही होगा। पेशेवराना अंदाज को जब तक संरक्षण नहीं दिया जाएगा, टीआरपी के बाजारवादी पैमाने बदले नहीं जाएंगे... टीवी माध्यमों को नैतिकता और देशहित के नाम पर जिम्मेदार ठहराना आसान नहीं होगा। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि आचार संहिता बनाने की वकालत करने वाले दिग्गज पत्रकार और राजनेता इस मोर्चे पर सचमुच तैयार हैं।

भारतीय कारोबार की छवि पर कालिख

भारतीय कारोबार की 
छवि पर कालिख
- डॉ. रत्ना वर्मा
इस समय जब दुनिया भर में आर्थिक मंदी का दौर चल रहा है, ऐसे में देश की चौथी सबसे बड़ी कम्प्यूटर कंपनी सत्यम के शेयर घोटाले का उजागर होना हमारे देश के लिए एक शर्मनाक घटना है। सत्यम द्वारा की गई यह जालसाजी राष्ट्रीय स्तर का धोखा है।
सत्यम के मालिक रामलिंगा राजू ने अपनी ही कंपनी में 7 हजार 800 करोड़ का घोटाला करके असंख्य छोटे शेयर धारकों के साथ धोखा किया है। इस तरह के मामलों से बड़ी कंपनियों की विश्वसनीयता तो घटती ही है देश की अर्थव्यवस्था भी प्रभावित होती है। इस घटना के बाद भारत के प्रधानमंत्री ने कहा कि इस घोटाले से अंतर्राष्ट्रीय जगत में भारतीय कारोबार की छवि पर कालिख लग गई है।
किसी भी बड़ी कंपनी में इस प्रकार की जालसाजी में सबसे बड़ा दोषी वह माना जाता है जो कंपनी का नियामक - वॉचडॉग (पहरेदार) - होता है, जिसका काम ही होता है कंपनी के कारोबार पर निगरानी रखना और उसका सही- सही लेखा- जोखा प्रस्तुत करना। वॉचडॉग को यदि जरा सी भी भनक मिल जाए कि कंपनी में गड़बड़ी की आंशका है तो उसकी पहली जिम्मेदारी बनती है कि वह खतरे की घंटी बजाए, शोर मचाए। बिल्कुल उसी तरह जिस प्रकार घर का पालतू कुत्ता घर की रखवाली करता है, चोरों से मालिक को सावधान करता है। लेकिन यहां उस नियामक को क्या कहिए जिसका मेहनताना पिछले सात वर्षों में बढाक़र तिगुनी कर दी गई हो, वह भला कंपनी की गड़बडिय़ों को उजागर करके अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी क्यों मारेगा। लेकिन जहां लाखों लोगों की पूंजी लगी हो वहां सब कुछ जानते और देखते हुए भी चुप रहना बहुत बड़ा गुनाह है। आम आदमी यह सोचकर किसी भी बड़ी कंपनी के शेयर खरीदता है कि फायदा होने पर कुछ अधिक पूंजी जमा हो जाएगी, जो मुसीबत के समय उसके काम आएगी।
अब प्रश्न यह उठता है कि जो निवेशक इस जालसाजी का शिकार हुए हैं, क्या कानून उन्हें अपने नुकसान की भरपाई के लिए कोई विशेष अधिकार देगा? परंतु सबसे पहले जरुरी यह होना चाहिए कि नियामक यदि बेइमानी करे तो उसे दंड देने के लिए कड़े प्रावधान हों क्योंकि अभी तक नियामक को दंडित करने का कानून बेहद ही लचर... है। जब चोर चोरी करके भागता है तो वह तो अपराधी तो होता ही है पर जब पुलिस चोर को भागते देखकर भी अनदेखी कर देती है तो वह उससे भी बड़ा गुनाहगार होता है। ऐसा ही कुछ सत्यम घोटाले में भी हुआ है।
सत्यम कम्प्यूटर्स में जालसाजी का मामला सिर्फ नैतिक मूल्यों के पतन का मामला नहीं है यह एक बहुत बड़ी आर्थिक, सामाजिक समस्या की ओर इशारा करता है। दरअसल धन कमाने को ही समृद्धि और सफलता का पर्याय मान लेने वाले हम भारतीय और हमारे जैसे अन्य विकासशील देशों का यह दुर्भाग्य है कि वर्तमान उपभोक्तावादी संस्कृति इसी मान्यता को बढ़ावा देने में ही पूरी शक्ति लगा रही है, इसमें साधन चाहे जो भी हो, उद्देश्य पैसा कमाना ही होता है। हमारे देश में भी अब इस बात को ही प्रमुखता से प्रचारित- प्रसारित किया जा रहा है कि जो व्यक्ति जितना ज्यादा अमीर है उतना ही सफल है। हमारी शिक्षा व्यवस्था भी आजकल उसी दिशा की ओर बढ़ रही है। युवा पीढ़ी का उद्देश्य पढ़- लिख कर अधिक धन कमाना भर रह गया है। शिक्षा का मतलब बुद्धि का विकास या ज्ञान प्राप्त करना उनके लिए दकियानुसी बाते हैं।
कुल मिलाकर आज हम एक ऐसे आधुनिक समाज का निर्माण कर रहे हैं जहां भारतीय मूल्य पैसे की चमक के नीचे दबते चले जा रहे हैं। जब अधिक धनी होना ही समाज में प्रतिष्ठा का कारक माना जाएगा तो राजू जैसे व्यक्ति ही पैदा होंगे। अधिक धन कमाना और सफलता की ऊंचाईयों को पाना, दोनों को जब एक ही तराजू पर तौला जाएगा तो हम समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी भला किस तरह से निभा पाएंगे।
व्यवसायिक प्रतिष्ठान या कंपनियां पूंजी से चलती हैं और पूंजी शेयर धारकों की होती हैं, अतएव कंपनी के संचालकों का धर्म हे कि धारकों की अमानत में खयानत न करें।