- कृष्णा वर्मा
कई बार बाँधने का प्रयास किया
मन के आवारा पैरों को
लेकिन दिल है कि टिकने ही नहीं देता
सतत भटकाता है दिशा-दिशा
मासूम मन बड़ी ताबेदारी से सिर झुकाकर
मान लेता है उसकी बात
दिमाग परेशान रहता है सोच-सोचकर
क्यों मचा है हर ओर पैसे-पैसे का शोर
रिश्ते-नातों रस्मों-रिवाज़ों की
क्यों टूट रही है डोर
संबंधों को नाम तो दे देते हैं
पर निभाने की रस्म क्यों हो गई है ग़ायब
प्रेम प्यार नफ़रत की दुनिया में
नफ़रत हो गई है ठेकेदार और
दूरियाँ हो गई हैं वफ़ादार
प्यार जताते हैं पर दूरियाँ मिटाने से
करते हैं परहेज़
मिट्टी कि दुनिया में जब
सबका अंत है मिट्टी
तो फिर क्यों औकात की
नुमाइश करने से बाज़ नहीं आते लोग।

सार्थक सुंदर भावाभिव्यक्तिं। हार्दिक बधाई कृष्णा जी। सुदर्शन रत्नाकर
ReplyDeleteदिल को छू लेने वाली कविता
ReplyDeleteheart touching poem
ReplyDeleteकृष्णा जी बहुत सुन्दर कविता। जीवन की सच्चाई के प्रति आगाह करती कविता ।
ReplyDeleteस्मृति शुक्ल
मन के आवारा पैर कहां टिकते हैं, कहाँ कहाँ नहीं पहुँच जाते और फिर प्रेम और पीड़ा की दलदल में डूबने लगते हैं। हर बार आप की लेखनी सोचने पर विवश कर देती है 🙏
ReplyDeleteबहुत ही मार्मिक भावपूर्ण रचना है बधाई आदरणीय
ReplyDeleteबहुत बढ़िया 👌👌
ReplyDeleteबहुत सुंदर रचना।
ReplyDeleteजीवन के कटु सत्य का उद्घाटन करती भावपूर्ण कविता
ReplyDelete👌🏾 रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
सुंदर भाव अभिव्यक्ति। आज हम गिला कर रहे हैं, लेकिन समाज बदल गया है। कुछ भी तो पहले जैसा नहीं है। फिर भावनाएं कहां से आएंगी? साधुवाद
ReplyDeleteआज की तस्वीर खींचती मर्मस्पर्शी कविता। संवेदनशीलता का ह्रास हुआ है।
ReplyDeleteविभा रश्मि
बहुत ही मार्मिक, सार्थक और भावपूर्ण अभिव्यक्ति मैम 🙏💐
ReplyDelete