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Aug 1, 2026

कविताः ठहरा हुआ पल

  - भावना सक्सैना

मन उदास है

क्यों, पता नहीं

कुछ चाहिए

क्या? ये पता नहीं


ये दुख भी नहीं कि रोकर बह जाए

ये ख़ुशी भी नहीं कि हँसकर जी जाए


बस एक ठहरा हुआ- सा पल है

जो दिन भर चुप रहता है

और रात होते ही

अपना हिसाब खोल देता है


रात आती है

तो अनकिए की आहट लाती है

कुछ सपने

जो बस सोचे गए

कुछ रास्ते

जो छूटते चले गए


कोई मलाल भी नहीं

कोई संतोष भी नहीं

बस एक हल्की- सी कसक

जिसका कोई नाम भी नहीं


वक़्त के साथ तहें जमती जाती हैं

बिना शोर, बिना शिकायत

हर तह में, थोड़ा- सा मैं हूँ

थोड़ा सा वो, जो कभी थी


और कुछ खाली जगहें भी

जहाँ होना था कुछ;

पर रह गया… बस ‘शायद’


मैं अकेली नहीं

पर कोई पास भी नहीं

भीड़ में चलती हूँ;

पर लगता है कदम अपने नहीं


जो है

उसे सहेज पाने का भरोसा नहीं

जो नहीं है

उसके मिल जाने  की आस भी नहीं


फिर भी,

कहीं बहुत भीतर

थोड़ी- सी गर्माहट है


जैसे ठंडी राख में

धीमी- सी आग

जो बुझी नहीं है पूरी


शायद यही काफ़ी है अभी

कि सब ख़त्म नहीं हुआ


कि इन जमी हुई तहों के बीच

कहीं एक साँस चल रही है


धीरे-धीरे ही सही

पर ये परतें खुलेंगी कभी

और उस दिन,


मैं खुद से कह पाऊँगी

कि ठहरना भी एक सफ़र था

और मैं…

रुकी नहीं थी

बस…

थोड़ा-थोड़ा खुद को 

समेट चलती रही।


2 comments:

  1. Anonymous02 August

    बहुत सुंदर रचना।

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  2. Anonymous12 August

    बहुत सुंदर सकारात्मक सोच। हार्दिक बधाई । सुदर्शन रत्नाकर

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