1. आखिरी तारीख
“वर्माजी!” उसने पुकारा।
बड़े बाबू की मुद्रा में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। उनकी आँखें बंद थीं और दाँतों के बीच एक बीड़ी दबी हुई थी। ऐश-ट्रे माचिस की तीलियाँ और बीड़ी के अधजले टुकड़ों से भरी पड़ी थी।
सुरेश को आश्चर्य हुआ। द्फ्तर के दूसरे भागों से भी लड़ने-झगड़ने की आवाज़ें आ रही थीं। बड़े बाबू की अपरिवर्तित मुद्रा देखकर वह सिर से पैर तक सुलग उठा। उसकी इच्छा हुई एक मुक्का उनके जबड़े पर जड़ दे ।
“वर्माजी, आपने आज बुलाया था!” अबकी उसने ऊँची आवाज में कहा।
बड़े बाबू ने अपनी लाल सुर्ख आँखें खोल दीं। सुरेश को याद आया- पहली दफा वह जब यहाँ आया था तो बड़े बाबू के व्यवहार से बहुत प्रभावित हुआ था। तब बड़े बाबू ने आदर के साथ उसे बिठाया था और उसके पिता की फाइल ढ़ूँढ़कर सारे कागज़ खुद ही तैयार कर दिए थे। दफ्तर के लोग भी एकाग्रचित् हो काम कर रहे थे।
बड़े बाबू अभी भी उसकी उपस्थिति की परवाह किए बिना टेबल कैलेंडर पर एक तारीख के इर्द-गिर्द पेन से गोला खींच रहे थे। उसने बड़े बाबू द्वारा दायरे में तारीख को ध्यान से देखा तो उसे ध्यान आया, आज महीने का आखिरी दिन है और पिछली दफा जब वह यहाँ आया था, तब महीने का प्रथम सप्ताह था। बड़े बाबू के तारीख पर चलते हाथ से ऐसा लग रहा था मानो वे इकतीस तारीख को ठेलकर आज ही पहली तारीख पर ले आना चाहते थे।
एकाएक उसका ध्यान आज सुबह घर के खर्चे को लेकर पत्नी से हुए झगड़े की तरफ चला गया। पत्नी के प्रति अपने क्रूर व्यवहार के बारे में सोचकर उसे हैरानी हुई। अब उसके मन में बड़े बाबू के प्रति गुस्सा नहीं था बल्कि वह अपनी पत्नी के प्रति की गई ज्यादती पर पछतावा हुआ। वह कार्यालय से बाहर आ गया।
2. खरबूजाबड़े साहब आफिस से घर लौटे तो काफी थके हुए लग रहे थे। चपरासी ने उनके सूटकेस के साथ-साथ एक पुराना टू इन वन और प्रेशर कुकर भी भीतर रखा तो मेम साहब चौंक पड़ीं।
“ये सब किसका है?” उन्होंने साहब से पूछा ।
“वही---चीफ साहब,” वे चिढ़कर बोले, “मीटिंग के बाद चलने लगा तो बोले-हमारा टू इन वन और प्रेशर कुकर कई दिनों से खराब पड़ा है, तुम्हारे शहर में अच्छी दुकानें हैं, रिपेयर कराकर भेज देना।”
“अपना टेप रिकार्डर भी महीनों से खराब पड़ा है, उसे भी साथ भेजना न भूलिएगा,” मेम साहब ने कहा,---“हाँ, याद आया, राम खिलावन पर सख्ती कीजिए---चोरी करने लगा है।”
“मैं आज विरमानी स्टोर्स गई थी, मैंने बातों ही बातों में उससे कहा कि मिक्सी की मरम्मत के बहुत पैसे ले लिये। तब उसने मुझे बताया कि राम खिलावन ने ही वाउचर में कुछ रुपये बढ़वाए थे।”
“राम खिलावन!” बड़े साहब ने सख्त आवाज़ में कहा, “कब से कर रहे हो चोरी?”
“मैं कुछ समझा नहीं, हुजूर!” वह बिना घबड़ाए बोला।
“विरमानी कह रहा था, तुमने उस ट्यूब लाइट वाले वाउचर में कुछ रुपए बढ़वाए थे?”
“अच्छा, वो” राम खिलावन ने कहा, “आपने उस दिन शाम को मिक्सी रिपेयर करवाने को दी थी, स्टोर बद हो चुका था इसलिए मैं मिक्सी घर ले गया था। हुजूर! मेरी घरवाली थोड़ी तेज है, पूछने लगी-यह क्या है, किसका है। मुझे ‘सबकुछ’ बताना पड़ा। बस, फिर क्या था, पीछे पड़ गई । कहने लगी-साहब लोग दफ्तर के खर्चे से न जाने क्या-क्या घर ले जाते हैं, मुझे भी एक सिलबट्टा चाहिए। हुजूर आपकी मिक्सी रिपेयर के वाउचर में उसी सिलबट्टे के लिए कुछ रुपए बढ़वाए थे।” राम खिलावन ने रुककर बारी-बारी से साहब और मेम साहब की ओर देखा, फिर ढिठाई से बोला, “इसे चोरी तो नहीं कहेंगे, साहब!”
“तू बहुत बातें बनाने लगा है। चल जा---काम कर्।” इस बार बड़े साहब की आवाज़ खोखली थी।


अति उत्तम अभिव्यक्ति, हमाम में सब नंगे है। पूरा सिस्टम ही धो डाला। शिकायत भी किससे करें सब लिप्त हैं अपनी अपनी चोरी में। बहुत बढ़िया
ReplyDeleteमध्यम वर्गीय परिवारों की विवशता मन को छू गई ।
ReplyDeleteसरकारी तंत्र में सभी चोरी में लिप्त है, छोटा हो या बड़ा । दोनों लघुकथा बहुत सुंदर हैं। सुदर्शन रत्नाकर
शुक्रिया रत्ना जी!
ReplyDeleteपहली कथा में मध्यम वर्ग की दुश्वारियां! कितनी खूबसूरती सी उभर कर आई हैं! जहां पहली तारीख का इंतज़ार करते करते उम्र गुजर जाती है,महीने का आखिरी सप्ताह अक्सर जिनके घरों में लड़ाइयों के बीच ही गुजरता है। बहुत शानदार लघुकथा है आखिरी तारीख। नमन आपकी लेखनी को सर🙏
ReplyDeleteदूसरी कथा खरबूजा कितना गहन शीर्षक है,बहुआयामी
खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदल रहा है। एक का रंग दूसरे पर चढ़ रहा है। साहब का असर रामखिलावन पर भी दिखाई देने लग गया। बहुत बहुत बधाई इन दोनों कथाओं के लिए
दोनों लघु कथाएं उम्दा हैं 👌👌
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ReplyDeleteयह लघु कथा केवल एक सरकारी दफ्तर की नहीं है, बल्कि आज के पूरे सिस्टम और मानवीय मनोविज्ञान की कहानी है। लघु कथा छोटी है, पर इसका संदेश बहुत बड़ा है।
लघु कथा का नायक सुरेश एक आम आदमी है जो अपने काम से दफ्तर आता है। बड़े बाबू की लापरवाही और भ्रष्टाचार देखकर उसे गुस्सा आता है। पर लघु कथा का सबसे सुंदर मोड़ अंत में आता है। जब सुरेश देखता है कि बड़े बाबू कैलेंडर पर 31 तारीख को घसीट कर 1 तारीख पर लाने की कोशिश कर रहे हैं, तब उसे समझ आता है कि ये बाबू भी महीना खत्म होने से परेशान हैं। इनकी भी तनख्वाह देर से आती है, घर में खर्चे को लेकर इनका भी झगड़ा होता है।
लेखक ने यहाँ बहुत गहरी बात कही है - हम अक्सर सामने वाले के गुस्से और लापरवाही को देखते हैं, पर उसके पीछे की लाचारी और मजबूरी को नहीं देखते।
दफ्तर में बीड़ी, ऐश-ट्रे में अधजली तीलियाँ, लाल आँखें - ये सब शब्द एक पूरा माहौल बना देते हैं।
नायक का गुस्सा अचानक पश्चाताप में बदल जाता है। यह बदलाव उसे अपने घर में पत्नी से किए गए झगड़े की याद दिलाता है। यह दिखाता है कि इंसान का व्यवहार उसके घर की परिस्थितियों से जुड़ा होता है।
कैलेंडर पर गोला खींचना इस कहानी का सबसे सशक्त प्रतीक है। यह केवल तारीख नहीं, बल्कि एक गरीब कर्मचारी की बेबसी है जो चाहता है कि महीना जल्दी खत्म हो और तनख्वाह आ जाए।
यह लघु कथा हमें सिखाती है कि हर कठोर चेहरे के पीछे एक मजबूर इंसान होता है। गुस्से से नहीं, बल्कि संवेदना और समझ से ही व्यवस्था को समझा जा सकता है। भाषा सरल, सहज और प्रभावशाली है।
यह एक उत्कृष्ट और विचारोत्तेजक लघु-कथा है।
समीक्षक डॉ वंदना शर्मा
ReplyDeleteबड़े साहब ऑफिस से लौटते हैं तो उनके साथ चीफ साहब का टू इन वन और प्रेशर कुकर रिपेयर के लिए आता है। यह पहला व्यंग्य है - बड़े अफसर अपना निजी काम सरकारी चपरासी और अधीनस्थों से करवाते हैं।
फिर मेम साहब कहती हैं - "अपना टेप रिकॉर्डर भी भिजवा देना और राम खिलावन पर सख्ती कीजिए, चोरी करने लगा है।" यहाँ से कहानी का असली चेहरा सामने आता है।
जब राम खिलावन से पूछा जाता है कि उसने ट्यूब लाइट के वाउचर में पैसे क्यों बढ़ाए, तो उसका जवाब इस लघु कथा की आत्मा है। वह कहता है - साहब, आप दफ्तर की मिक्सी घर ले गए थे, मेरी घरवाली ने देख लिया और उसे भी सिलबट्टा चाहिए था, इसलिए मैंने वाउचर में पैसे बढ़ाए।
लेखक ने यहाँ दिखाया है कि भ्रष्टाचार ऊपर से नीचे आता है।
छोटा कर्मचारी चोर पैदा नहीं होता, उसे बड़ा साहब चोर बनाता है। जब साहब लोग दफ्तर के खर्च से मिक्सी, कुकर, टू-इन-वन घर ले जाते हैं, तो चपरासी क्यों न ले जाए?
संवाद बहुत चुटीले हैं। "मेरी घरवाली थोड़ी तेज है" - इस एक लाइन में लेखक ने पूरे मध्यमवर्गीय परिवार की मजबूरी और इच्छा को दिखा दिया है।
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
बहुत सुन्दर लघुकथाएँ।
ReplyDeleteBahut achhi kahaniyan
ReplyDeleteदोनों लघुकथाएँ मध्यम वर्ग के आर्थिक स्तर और उसे निभाए जाने के लिए किया गया मैनीप्यूलेशन , थोड़ी सी हेर फेर को जायज़ ठहराने का है । सभी ऐसा करते हैं , कोई हर्ज नहीं । सभी की मानसिकता एक जैसी । सुकेश साहनी जी की बेहतरीन लघुकथाएँ। हार्दिक बधाई।
ReplyDeleteविभा रश्मि
बहुत सही...सामयिक कथाए..
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