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May 1, 2026

लघुकथाः साँझा दर्द

  - सुदर्शन रत्नाकर

आसमान में बादल छाये थे । ठंडी हवा के झोंके अंदर तक कँपा रहे थे । ऐसे मौसम में वह पिछले दो दिन से पूरी कालोनी के कई चक्कर लगा चुका था । लेकिन किसी भी घर से उसे चारपाई ठीक करवाने का बुलावा नहीं आया । एक दो घरों में तो उसने साहस कर के दरवाज़ा खटखटा कर भी पूछ लिया था। लेकिन हर बार उत्तर मिलता," नहीं भैया कोई काम नहीं है चारपाई ही नहीं है तो ठीक क्या करवाएँगे । "

समय के साथ - साथ चारपाइयाँ रखने का चलन ही समाप्त हो गया है । मध्यम वर्ग के लोग एकाध चारपाई रख लेते हैं । कभी - कभार उसे काम मिल जाता था और काम न मिलने का अभिप्राय हुआ भूखे पेट सोना। पहले जवान था,  ख़ूब काम  मिल जाता था  फिर सूत की चारपाइयों का रिवाज ख़त्म हो गया । बाद में उसने नाइलॉन की निवार का काम सीख लिया। बरसों बीत गए हैं । अब बूढ़ी हड्डियों में उतना दम भी नहीं है । टूटी साइकिल पर वह बार - बार उन्हीं गलियों में चक्कर लगाता रहता है । कभी काम मिल जाता है, कभी नहीं ।

वह गंदे नाले के पार की बस्ती में आ गया । आवाज़ लगा ही रहा था कि उसे एक झोंपड़ी के बाहर ही जंग लगी स्टील की चारपाई दिख गई । उसकी बाँछे खिल गईं । जिसकी चारपाई है शायद वह ठीक करवा ही ले। यही सोच कर वह वहाँ पहुँच गया । झोंपड़ी में झाँक कर देखा । कोई सो रहा था । उसने आवाज़ लगाई,"क्यों भाई चारपाई ठीक करवाओगे। "

आवाज़ सुन कर वह व्यक्ति फटा कम्बल हटाकर हड़बड़ा कर उठ बैठा । बोला,"ठीक तो करवानी है, कितने पैसे लोगे । "

उसने निरीक्षण करके बताया,"चालीस रुपया । "

व्यक्ति का चेहरा उतर गया । "नहीं  भाई, इतने पैसे नहीं है रहने  दो । "

"कुछ कम कर दूँगा, ठीक तो करवा लो'," वह बोला

पैसे होते तो नई चारपाई ही ले लेता । सर्दी में ज़मीन पर सोने से ठंड लगती है । मज़दूरी करने गया था, वहीं यह चारपाई देख कर मालिक से माँग ली थी । कई दिन हो गए हैं । इतने पैसे ही नहीं हैं कि ठीक करवा लूँ । सीलन भरी ज़मीन पर सोने से सर्दी हड्डियों तक घुस जाती है । अभी रहने दो भैया फिर ठीक करवा लूँगा ।" कहकर वह कम्बल मुँह पर डाल कर सो गया।  वह वहीं बैठा रहा।  थोड़ी देर में उस व्यक्ति को ज़ोर की खाँसी उठी । वह उठ कर बैठ गया । देखा वह वहीं  बैठा है ।

" भाई क्यों बैठे हो । मैं तो चारपाई ठीक करवा न पाऊँगा । अब तो सर्दी ऐसे ही बीत जाएगी। कौन-सी नई बात है । ज़िंदगी  ऐसे ही निकल गई है, बाक़ी  भी बीत जाएगी ।’’ वह खाँसता हुआ फिर वैसे ही लेट गया । 

उसने चारपाई खोली । कपड़े से साफ़ की । जहाँ - जहाँ से निवार टूटी थी, ठीक की । जहाँ नई की ज़रूरत थी, वह भी लगा दी ।

चारपाई ठीक करके उसने अंदर रख दी थी । भूख के मारे उसे पेट में कुलबुलाहट हो रही थी। पर चेहरे पर गहरा संतोष था ।  वह ‘चारपाई ठीक करवा लो’ की आवाज़ लगाता हुआ आगे बढ़ गया। 

सम्पर्कः ई-29, नेहरू ग्राउंड, फ़रीदाबाद 121001

9 comments:

  1. शिवजी श्रीवास्तव28 May

    मार्मिक, मानवीय मूल्यों को स्थापित करती सुन्दर लघुकथा --शिवजी श्रीवास्तव

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  2. Anonymous28 May

    Bahut pyara

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  3. Anonymous28 May

    गहरी संवेदना व मानवीय मूल्यों से पूरित रचना के लिए सुदर्शन रत्नाकरजी को बहुत-बहुत बधाई
    शीला मिश्रा,भोपाल

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  4. अपने दर्द से दूसरे के दर्द को महसूस करना बड़ी बात है। बहुत अच्छी कहानी। हार्दिक बधाई आपको।

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  5. PRAGATI GUPTA28 May

    मानवीय संवेदनाओं से भरी कथा। हार्दिक बधाई दीदी

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  6. Anonymous28 May

    बहुत अच्छी कहानी है. 👌🙏

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  7. Anonymous28 May

    मेरी लघुकथा पर प्रतिक्रिया देकर मुझे प्रोत्साहित करने के लिए आप सभी का दिल से आभार।🙏🏼 सुदर्शन रत्नाकर

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  8. प्रिय सुदर्शन जी, गहरी संवेदना लिए मार्मिक रचना

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