July 25, 2017

दोहे:

 काग़ज़ की ये कश्तियाँ 
- आभा सिंह

छरर छरर रेले बहें, भीत झरे दिन रात,
धूल भरे दुखड़े धुले, उजले निखरे पात।

बरखा की आहट सुनें, लेटे आँखें मूँद,
भावों की उमड़न झड़े, छलकी ढलकी बूँद।

धुले- धुले पादप हुए, बरखा झूमी सींच,
जैसे माँ धो-पोंछ शिशु, गोदी भर ले भींच।

बादल जी भर शगुन के, बजा रहा है थाल,
ये तो है उद्घोषणा, सुन रे, भाग अकाल।

भादों की बदली घिरी, बरखा बनी बहार,
आँगन चुल्लू भर रहे, छज्जे ढोलें धार।

नंग -धड़ंग नहा रहे, उछल-कूद भरपूर,
मुखड़े पर उल्लास का, चमक रहा है नूर।

कागज़ की ये कश्तियाँ, सपने लिये हज़ार,
बच्चों की नज़रें लदी, जाना सागर पार।

नभ दमामे कड़कते, चपला तमके पार,
पलक झपक अँधियार है, पलक झपक उजियार।

बिना समय की बारिशें, फिर ओलों की मार,
किसान बेबस घूँटता, दैवी दुख का भार।

गहरी- गहरी बदलियाँ, ख़ूब थपेड़े ढोल,
प्यासी आँखों उमगती, बुँदियों की कल्लोल।


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1 Comment:

Vibha Rashmi said...

बहुत सुंदर बरखा के दोहे ।बधाई ।

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