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Apr 5, 2021

धरोहरः भगवान विष्णु का नारायणपाल मंदिर


जगदलपुर
के उत्तर-पश्चिमी तरफ, चित्रकोट झरने से जुड़ा हुआ, नारायणपाल नाम का एक गाँव है, जो इंद्रवती और नारंगी नदियों के संगम के निकट स्थित है। इस गाँव में एक प्राचीन विष्णु मंदिर है जो 1000 साल पहले बनाया गया था।  1069 ई में चक्रकोट में महाप्रतापी नाग राजा राजभूषण सोमेश्वर देव का शासन था। सोमेश्वर देव का शासन चक्रकोट (बस्तर) का स्वर्णिम युग था। सोमेश्वर देव ने अपने बाहुबल से चक्रकोट के आसपास के राज्यों पर अधिकार कर लिया था। उसके सम्मान में कुरूषपाल का शिलालेख कहता है कि वह दक्षिण कौशल के छ लाख ग्रामों का स्वामी था। उसका यश चारों तरफ फैला था।। नारायणपाल मंदिर पूरे बस्तर जिले का एकमात्र ऐसा मंदिर है, जहाँ भगवान विष्णु की मूर्ति स्थापित है। नारायणपाल मंदिर बस्तर की विरासत में अपने सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक मूल्य के लिए जाना जाता है। पूर्वाभिमुख  यह प्रस्तर मंदिर मध्यम ऊँचाई की जगती पर अवस्थित है।  यह मंदिर 11वीं शताब्दी के वास्तुशिल्प का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसे चक्रकोट के छिंदक नागवंशी शासकों द्वारा बनाया गया जो नागकालीन उन्नत वास्तुकला का बेहतर प्रमाण है।

यह मंदिर वस्तुतः शिव मंदिर था, किन्तु परवर्ती काल में इस मंदिर के गर्भगृह में विष्णु की प्रतिमा प्रतिष्ठापित कराई गई, जिसके कारण इसे नारायण मंदिर कहा जाने लगा। मंदिर की स्थापत्यकला मध्यप्रदेश खजुराहों के मंदिर के सदृश्य है। ऊँची जगती पर स्थित इस मंदिर का शिखर काफी ऊँचा है। मंदिर का मंडप अष्टकोणीय है। मंदिर का द्वार अलंकृत बेशर शैली का है। मंदिर की खास बात यह है कि मंदिर के द्वार और इसकी बाहरी दीवारों पर गणेश की प्रतिमाएँ उकेरी गईं हैं।

नारायणपाल मंदिर का वास्तुकला पर चालुक्य शैली का प्रभाव है। छिंदक राजवंश की रानी सोमेश्वर देव की माता गुंडमहादेवी भगवान विष्णु की परमभक्त थी।  जब उसकी आयु 100 वर्ष से भी अधिक रही होगी तब उसने अपने दिवंगत पुत्र सोमेश्वर देव की याद में भगवान विष्णु का भव्य मंदिर बनवाया।  गुंडमहादेवी के 60 वर्षीय पौत्र कन्हरदेव के शासनकाल 1111 ई में इस मंदिर का निर्माण पूरा हुआ।

मंदिर के मंडप में स्थित आठ फुट ऊँचे शिलालेख में शिवलिंग, सूर्य-चंद्रमा के अलावा गाय और बछड़े की आकृति है उकेरी गई है। वहीं मंदिर में स्थापित शिलालेख यह स्पष्ट करता है कि हजार साल पहले भी बस्तर के रहवासी देवालय निर्माण में राजाओं को धन देकर सहयोग करते रहे हैं। मंदिर निर्माण में जिन लोगों ने सहयोग किया था उनके नाम दर्ज है। अब यह मंदिर भारतीय पुरातत्व विभाग के अंतर्गरत संरक्षित है।

नारायणपाल के आस पास के गाँवों में भी की दुर्लभ मूर्तियाँ भी मिली हैं जो इस बात का प्रमाण है कि बस्तर का समूचा क्षेत्र कितना भव्य रहा होगा कि वहाँ के राजा- महाराजाओँ ने इतने भव्य एवं कलात्मक मंदिरों का निर्माण कराया था। नारायणपाल के पास के एक गाँव कुरूषपाल में एक ग्रामीण बुटुराम के खेत में भगवान आदिनाथ की हजारों साल पुरानी मूर्ति मिली है। ग्रामीण ने सोनारपाल के जैन धर्मावलंबियों की मदद से मंदिर बनवा दिया है। नारायणपाल से मात्र चार किमी दूर पूर्वी टेमरा के जंगल में 11 वीं शताब्दी की गजलक्ष्मी सहित तेरह मूर्तियाँ भी प्राप्त हुई हैं। इसी तरह बोदरागढ़ किला में लज्जागौरी सहित कई दुर्लभ प्रतिमाएँ भी मिली हैं।

नारायणपाल से लगे ग्राम कुरूषपाल में ग्रामीण बुटुराम के खेत में भगवान आदिनाथ की हजारों साल पुरानी मूर्ति मिली है। ग्रामीण ने सोनारपाल के जैन धर्मावलंबियों की मदद से मंदिर बनवा दिया है। नारायणपाल के पास ही तिरथा नामक गाँव है। नारायणपाल से महज चार किमी दूर पूर्वी टेमरा के जंगल में 11 वीं शताब्दी की गजलक्ष्मी सहित तेरह मूर्तियाँ उपेक्षित पड़ी हैं। इसी तरह बोदरागढ़ के किला में दुर्लभ लज्जागौरी सहित कई दुर्लभ प्रतिमाएँ उपेक्षित पड़ी हैं। इसकी जानकारी पुरातत्व विभाग को है लेकिन इन्हे संरक्षण देने इनके पास पिुलहाल कोई प्रोजेक्ट नहीं है। इन मूर्तियों की सुरक्षा के लिए केन्द्र और राज्य सरकार का पुरातत्त्व विभाग कुछ नहीं कर रहा है।

सम्पूर्ण बस्तर के इन कलात्मक मंदिर व अन्य पुराअवशेषों को देखते हुए पर्यटन और पुरात्त्व विभाग को चाहिए कि बस्तर को देश के प्रमुख पर्यटन के नक्शे पर लाएँ और इस क्षेत्र को पर्यटन केन्द्र के रूप में विकसित करें।  सुरक्षित यातायात के साधन के साथ रहने- खाने की पर्याप्त व्यवस्था होने पर ही इन क्षेत्रों में पर्यटकों की संख्या बढ़ेगी।  ( संकलित)

जीवन शैलीः 99.9 प्रतिशत मार दिए, चिंता तो 0.1 प्रतिशत की है

-डॉ. सुशील जोशी

जकल साबुन, हैंड सेनिटाइज़र्स, कपड़े धोने के डिटर्जेंट, बाथरूम-टॉयलेट साफ करने के एसिड्स, फर्श साफ करने, बर्तन साफ करने, सब्ज़ियाँ धोने के उत्पादों वगैरह सबके विज्ञापनों में एक महत्त्वपूर्ण बात जुड़ गई है। वह बात यह है कि ये उत्पाद 99.9 प्रतिशत जर्म्स को मारते हैं। मज़ेदार बात यह है कि सारे उत्पाद जादुई ढंग से 99.9 प्रतिशत जर्म्स को ही मारते हैं। और तो और, ये विज्ञापन आपको यह भी सूचित करते हैं कि ये कोरोना वायरस को भी मार देते हैं।

मेरा ख्याल है कि काफी लोग बहुत खुश होंगे कि चलो, अब जर्म्स से छुटकारा मिलेगा और खुशी-खुशी इनमें से कोई उत्पाद खरीद लेंगे। विज्ञापनों का मकसद इसी के साथ पूरा हो जाता है। दरअसल, ऐसे विज्ञापनों के दो मकसद होते हैं - पहला प्रत्यक्ष मकसद होता है उस उत्पाद विशेष की बिक्री को बढ़ाना। लेकिन दूसरा मकसद भी उतना ही महत्त्वपूर्ण होता है - उस श्रेणी के उत्पादों की ज़रूरत की महत्ता को स्थापित करना। जैसे, गोरेपन की क्रीम के विज्ञापन उस क्रीम विशेष की बिक्री को बढ़ाने की कोशिश तो करते ही हैं, गोरेपन को एक वांछनीय गुण के रूप में भी स्थापित करते हैं। तो जर्म-नाशी उत्पादों के विज्ञापन जर्म-नाश के महत्त्व को प्रतिपादित करते हैं।

इन जर्म-नाशी उत्पादों के 99.9 प्रतिशत के दावों पर संदेह नहीं करेंगे, हालांकि वह अपने आप में एक मुद्दा है। मेरी चिंता तो उन बचे हुए 0.1 प्रतिशत जर्म्स की है, जिन्हें ये उत्पाद इकबालिया रूप से नहीं मार पाते। यहाँ एक बात स्पष्ट कर देना ज़रूरी है कि कोरोना वायरस समेत सारे वायरस निर्जीव कण होते हैं, इसलिए मारने की बात ही बेमानी है। मरे हुए को क्या मारेंगे? लेकिन मान लेते हैं कि ये उत्पाद 99.9 प्रतिशत कोरोना वायरस को भी मार डालेंगे और 0.1 प्रतिशत को बख्श देंगे। सवाल है कि ये 0.1 प्रतिशत क्या करेंगे। इन 0.1 प्रतिशत का हश्र देखने के लिए हमें थोड़ा इतिहास में लौटना होगा।

एलेक्ज़ेंडर फ्लेमिंग ने पेनिसिलीन नामक एंटीबायोटिक औषधि की खोज 1928 में की थी और 1941 में इसका उपयोग एक दवा के रूप में शुरू हुआ। 1942 में पहला पेनिसिलीन-प्रतिरोधी बैक्टीरिया खबरों में आ चुका था। डीडीटी से तो काफी लोग परिचित हैं। यह भी सभी जानते हैं कि मलेरिया मच्छर के काटने से फैलता है। मलेरिया पर नियंत्रण की एक प्रमुख रणनीति यह थी कि मच्छरों का सफाया कर दिया जाए। डीडीटी के छिड़काव से मच्छर तेज़ी से मरते थे। लेकिन कुछ ही वर्षों में स्पष्ट हो गया कि डीडीटी मच्छरों को मारने में असमर्थ हो गया है। मच्छरों में डीडीटी के खिलाफ प्रतिरोध पैदा हो गया था।

प्रतिरोधी जीवों का यह मसला आज एक महत्त्वपूर्ण समस्या है। चाहे जर्म्स हों, फसलों को नुकसान पहुँचाने वाले कीट हों, रोगवाहक मच्छर हों, हर तरफ प्रतिरोधी जीव नज़र आ रहे हैं। सवाल है कि प्रतिरोध पैदा कैसे होता है।

एंटीबायोटिक प्रतिरोध का कारण क्या है? बैक्टीरिया का जीवन चक्र और प्रत्येक पीढ़ी का समय मिनटों और घंटों में होता है। और जब इस तरह की बैक्टीरिया कॉलोनी को एंटीबायोटिक दवा से उपचारित किया जाता है तो कॉलोनी का सफाया (99.9 प्रतिशत!) हो जाता है। लेकिन कॉलोनी में कभी-कभी संयोगवश म्यूटेशन उत्पन्न हो जाता है या उनमें एकाध बैक्टीरिया ऐसा होता है (0.1 प्रतिशत) जो उस एंटीबायोटिक से अप्रभावित रहता है। 99.9 प्रतिशत तो मर गए लेकिन वे 0.1 प्रतिशत संख्या वृद्धि करते रहते हैं, बल्कि प्रतिस्पर्धा के अभाव में और तेज़ी से संख्या वृद्धि करते हैं। इसकी वजह से ऐसी संतति पैदा होती है जो एंटीबायोटिक की प्रतिरोधी होती है। धीरे-धीरे दवा-प्रतिरोधी गुण वाले बैक्टीरिया तेज़ी से वृद्धि करके कॉलोनी पर हावी हो जाते हैं। यह एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी किस्म है। उसी एंटीबायोटिक से इन्हें मारने की कोशिश में सफलता कम या नहीं मिलेगी। इस प्रक्रिया के चलते हमारे द्वारा खोजे गए कई एंटीबायोटिक निष्प्रभावी हो चुके हैं। एंटीबायोटिक-प्रतिरोध की समस्या को स्वास्थ्य जगत में अत्यंत महत्त्वपूर्ण समस्या माना गया है।

यही हाल डीडीटी का भी हुआ था और विभिन्न कीटनाशकों (पेस्टिसाइड्स) का भी। और अब हम घर-घर पर, सतह-सतह पर यही प्रयोग दोहराने को तत्पर हैं। सोचने वाली बात यह है कि यदि एक साथ इतने सारे जर्म-नाशी निष्प्रभावी हो गए तो क्या होगा। (स्रोत फीचर्स)

लघुकथाः चार हाथ

- जानकी वाही

ये क्या समझते हैं? अब इनका हमसे मतलब नहीं पड़ेगा?’ श्याम ने निराशा से क्षितिज को निहारा जहाँ अँधेरा अपनी धमक देने लगा था।

देखो जी! पड़ोसी से तो नून और राख का भी लेन-देन होता है। रशीद भाई क्या अपनी पक्की अटारी में चैन से सो पाएँगे?’ सुनीता ने जल्दी-जल्दी छप्पर छाने के लिए श्याम को लकड़ी पकड़ाते हुए कहा।

हमें तो गरीबी मार देती है मुन्नी की अम्मा। अब देखो, दंगा-वंगा सब खत्म हो गया है मगर हमारे जले घरों की बू को शानदार बँगलों में बैठे नेता क्या महसूस करेंगे?’ श्याम बोला।

हाँ जी! जब हमारी झोंपड़ी जल रही थी, तब रशीद भाई अन्दर छुपे रहे। खुद भीड़ में शामिल नहीं हुए तो क्या? साथ तो दे ही दिया ना अपने धर्म-भाइयों का?’

आवाज में हल्का गुस्सा तो था ही, साथ ही गरीबी में लिपटी बेबसी भी झलक रही थी।

हाँ री! पर चूल्हा तो सबका ही गीला हुआ ना? क्या हिन्दू, क्या मुसलमान! दोनों में से किसके घर देग चढ़ पाई इन दंगों में। गरीब की भी क्या जात!

तभी रशीद मियाँ अपने बेटे के साथ आ गए।

सही बोले श्यामू भाई! चूल्हा क्या जाने मजहब क्या होता है। हम भी जान के डर से छुप गए थे। पर पड़ोसी का रिश्ता तो हर मजहब से बड़ा होता है ना! उनके चेहरे पर थकान के साथ एक मधुर मुस्कान थी।

हाँ काका! दो हाथ आपके, दो हमारे। देखो, ऐसा मजबूत छप्पर बनाएँगे कि अबके कोई ढहा न पाएगा। काकी, अब आप हटिए, हम हैं ना!कहते हुए रशीद मियाँ का बेटा तेजी से श्याम के साथ छप्पर छाने लगा।

E-mail-jankiwahie@yahoo.in

छह कविताएँ

- आनन्द नेमा 


1- प्रतिरूप

जब आखिरी चिड़िया भी

धरती को अलविदा कह

चली जागी किसी नई दुनिया में,

तब उसी के साथ

चले जाएँगे

महकते फूल

डाल पर पके फल।

ठीक उसी समय

सिसकते हुए नदिया भी तोड़ देगी दम।

पर हम,

मना रहे होंगे जश्न

चिड़िया, फूल, फल

नदिया के प्रतिरूपों के साथ,

सम्भव है तब हम

हम नहीं होंगे,

होगा हमारा भी प्रतिरूप।

2-चिड़ियाँ
 

चिड़ियों ने नहीं पढ़ी है किताबें,

वे नहीं जानती शास्त्रों के गूढ़ अर्थ,

इसलिए वे जा सकती है कहीं भी

और रह सकती है कहीं भी

नीले आसमान में वे उड़ लेती है

भाषा, धर्म, राजनीति के बिना भी।

वे,

बिना किसी गिले-शिकवे के

हज़ारो-हज़ार पक्षियों के साथ।

रह लेती है,

दुःख और सुख में।

3- शीर्षक विहीन

जो मारे जा रहे है,

रेल, मोटर-गाड़ियों,

राह चलते या भूख से;

असभ्य हैं वे सभी।

सभ्यता से कोसों दूर।

वे नहीं जानते

सभ्य लोक के शिष्टाचार,

दुनियावी दाँव-पेंच, राग-रंग

यहाँ तक कि मर जाना भी।

वे नहीं जानते

कि उनके इस तरह मर जाने से

पिघलेंगे नहीं हैं  संवेदना के पहाड़,

बदलेंगे नहीं कायदे क़ानून।

न ही राज-धर्म।

वे यह भी कतई नहीं जानते

कि उनके इस तरह मर जाने से

सभ्य लोक में

असभ्यों की मृत्यु पर

आँसू बहाना भी

असभ्यता ही होती है।


4- पुल

पुल बनाते हुए

पूछा जाना था नदी से,

वहाँ की मिट्टी से।

ठीक इसी तरह

पूछा जाना था

बालू और सीमेंट से,

यहाँ तक कि पानी और लोहे से भी।

नदी, सीमेंट, बालू, पानी, लोहे की

असहमति से बना पुल,

तोड़ लेता है तटों से सम्बन्ध

प्रेम, स्नेह को महसूसे बिना।

पुल के इस तरह टूटने से

केवल पुल ही नहीं टूटता

टूट जाती हैं

हमारी संवेदनाएँ व सभ्यता

टूट जाता है व्यवस्था से विश्वास

और टूट जाती हैं

नदी पार होने की संभावनाएँ।

5- पत्थर

पत्थरों पर चाहे बैठ जाएँ कितनी ही

रंग-बिरंगी तितलियाँ,

या दूर से आकर बैठ जाएँ पखेरू

सुरीला गीत गाने,

या ओढ़ा दिए जाएँ खुशबूदार फूल,

पत्थर खिलखिलाकर नहीं हँसेंगे।

यहाँ तक कि

वे मुस्कराएँगे भी नहीं,

पत्थर, पत्थर ही होते हैं,

वे हँसना नहीं जानते,

न ही रोना।

6- समूह गान

उस रात

जब चुपके से

चाँद चला गया था

बिन बताए,

तारे भी हैरान थे।

ढूँढ रहे थे सारे जुगनू मिलकर उसे।

जबकि सूरज को

आने में वक़्त था,

परेशान था खरगोश

कि नहीं आ सकता था

वह बाहर,

उस निर्मम काली रात में

टिटिहरी जो

किलकते- इतराते

नाप रही थी आकाश

चुप बैठ ग थी

कहीं छुपकर।

उधर उलूकों की बस्ती में

छाई थी खुशहाली,

मतवाले हो

गा जारहे थे

कर्कश लयहीन, बेसुरे

समूह गान।

संस्मरणः अंतिम उपहार

- परमजीत कौर रीत’  

वह बहुत छोटी उम्र में ही हमारे घर गाड़ी की ड्राइविंग के लिए आने लगा था, उससे पहली बार कब मिलना हुआ, याद नहीं। बस इतना याद है कि लगभग पाँच वर्ष पहले जब शिक्षा विभाग के  नियमानुसार मेरी पोस्टिंग मिडिल स्कूल से सीनियर सेकेंडरी स्कूल में कर दी गई। तब अनेक अध्यापकों   को इस परिवर्तन का लाभ मिला और उन्हें घर के नजदीक पोस्टिंग मिल गई, लेकिन मेरे लिए यह परिवर्तन कठिन परीक्षा लेकर आया। मैं अपनी अति संवेदनशीलता के कारण नए परिवेश और नए लोगों के बीच असहजता तो महसूस कर  ही रही थी, लेकिन मेरे सामने  सबसे बड़ी चुनौती  मेरे घर से स्कूल की दूरी थी। 60 किलोमीटर की यात्रा करने के लिए वहाँ किसी प्रकार की बस या ट्रेन की सुविधा नहीं थी। गाँव के सब लोग अपने-अपने साधन से ही आना-जाना करते थे। विद्यालय का स्टाफ भी अपने-अपने साधन से ही विद्यालय आता था। लेकिन उस समय मुझे गाड़ी चलानी नहीं आती थी और स्कूटी से इतना लंबा सफर तय करना असुरक्षित और अव्यावहारिक था।

तब मेरी परेशानी को देखते हुए  मेरे पतिदेव ने हमारे फैमिली ड्राइवर धर्मेंद्र को बुलाकर मेरे स्कूल आने-जाने की स्थायी व्यवस्था करवा दी। धर्मेंद्र की उम्र उस समय लगभग 22 वर्ष  थी। इकहरे शरीर और छोटे कद के कारण वह बच्चों  की तरह ही लगता था। मुझसे उम्र  में भी बहुत छोटा था। मैं उसे भैया कहकर पुकारती थी। वह  भी बिल्कुल आज्ञाकारी बच्चे की तरह  मुझे स्कूल ले जाता और वापस ले आता। घर वाले भी मुझे सुरक्षित एवं समय पर घर लौटता देख कर संतुष्ट थे। 

जब कभी वह छुट्टी लेकर चला जाता, तो मैं उसे डाँट और रिक्वेस्ट वाले लहज़े में कहती भैया, आप छुट्टी मत लिया करो। आपके साथ-साथ मुझे भी छुट्टी लेनी पड़ती है। और वह  बात मान जाता। 

एक बार मैंने अपराधबोध से निराश होकर उससे कहा सॉरी भैया, स्कूल के अनुशासन की वजह से आपको बिना किसी सुविधा के गाड़ी में ही बँधकर  बैठे रहना पड़ता है और छुट्टी होने तक मेरा इन्तजार करना पड़ता है।’   उसने बिना आँख उठाए जवाब दिया कोई बात नहीं मैम, इसी बहाने मुझे खाली समय मिल जाता है और मेरी बी.ए की  पढ़ाई पूरी हो रही है।’  उसकी बात सुनकर मुझे  तसल्ली हुई।

इस तरह  लगभग डेढ़ साल बीत गया। फिर मेरी माँ की बीमारी के दौरान और उनकी मृत्यु होने पर  धर्मेंद्र भैया ही गाड़ी  ड्राइव करके लेकर गया।  इस सदमे भरे हालात में उसने एक परिजन की तरह मेरा साथ निभाया।

इस घटना के कुछ महीने बाद एक दिन  मेरे ससुराल पक्ष के किसी रिश्तेदार के यहाँ फंक्शन होने के कारण मेरी सासू माँ ने भैया को स्कूल के बाद रोक लिया , ताकि फंक्शन में उसके साथ जा सकें। वह आज्ञाकारी बच्चे की तरह मान गया। हमने फंक्शन अटैंड करते हुए उसे भी कुछ खाने को कहा; लेकिन उसने कुछ नहीं खाया। जब हमने ज्यादा जोर डाला तो उसने बताया कि आज उसका जन्मदिन है और वह अपने परिवार के साथ ही खाना खाएगा। उसकी बात सुनकर हमारे मुँह से निकला अरे! पहले क्यों नहीं बताया। इसके बाद हम तुरंत घर को रवाना हो गए, ताकि  हमें छोड़कर वो अपने घर जा सके।

घर पहुँचते ही उसने अपने बैग से छोटा- सा मिठाई का डिब्बा हमारी ओर बढ़ाते हुए कहा जन्मदिन की मिठाई लाया था, लेकिन जल्दबाजी में देना भूल गया था। उसका निश्छल स्नेह देखकर मेरी सासू माँ का मन भर आया और  बोली ठहर! जन्मदिन वाले दिन खाली हाथ नहीं जाते। इतना कहकर वो अलमारी में से सीलबंद गिफ्ट पैक ले आई और उसे दे दिया। वह गिफ्ट लेकर चला गया। तब उसे कहाँ पता था कि यह उपहार अंतिम होगा।

इस घटना के बाद वह और भी पारिवारिक सदस्य की तरह लगने लगा। शायद ईश्वर  का खेल ऐसा ही होता है। जिसे हमसे दूर करना होता है, उससे मोह बढ़ा देते हैं।

कुछ समय बाद मैंने किसी कारणवश स्कूल से छुट्टियाँ ले ली। तभी एक दिन, एक फोन आयाहेलो मैडम जी, मैं धर्मेंद्र की बहन बोल रही हूँ। वह हमें छोड़कर चला गया है, हम उसे नहीं बचा सके । ऊं ऊं,,,,’

इससे पहले कि मैं कुछ बोल पाती दूसरी तरफ से फोन कट गया था। मैं खबर सुनकर सन्न सी रह गई। धर्मेंद्र की मृत्यु मेरे लिए एक तरह से झटका ही था; क्योंकि धर्मेंद्र फैमिली ड्राइवर ही नहीं मेरे लिए तो संकट मोचक था । 

उसकी मृत्यु से एक महीना पहले (मेरी छुट्टियों के समय) जब उसका एक्सीडेंट हुआ, तो पता चलते ही मैंने उससे फोन पर बात की थी, तब उसने कहा था कि वह ठीक होकर घर आ गया है ,जल्द ही काम पर वापस आएगा। 

और फिर यह खबर सुनी कि वो नहीं रहाभला 24 साल की उम्र भी कोई मरने की उम्र होती है। न जाने उसके परिवार के कितने ही सपने उसके साथ चले गए। यह सब  सोच-सोचकर मैं उसके घर पर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी; लेकिन दिल पर पत्थर रखकर मैं उसके घरवालों से मिलने गई। उसकी पत्नी ने बताया  ‘वो अपने काम पर लौटना चाहता था। आपका दिया हुआ उपहार भी उसने बड़े ध्यान से संदूक में सँभालकर रख रखा था कि यह मुझे मैडम दीदी ने दिया है। उसकी बात सुनकर मुझे मन ही मन रुलाई आने लगी।  उसके छोटे-छोटे बच्चों को देखकर मन और भी बहुत ख़राब हुआ, मैंने इस बात पर अपने आप को बहुत असहाय महसूस किया कि उन्हें किस तरह दिलासा दूँ उनके जीवन में आई कमी को किसी भी चीज से पूरा  नहीं किया जा सकता था। बस, ‘होनी पर किसका वश चलता है’  हौसला रखने का कहकर  मैं घर लौट आई।

आज  भले ही मैं खुद गाड़ी चलाने लगी हूँ, लेकिन यह बात मुझे हमेशा याद रहती है कि बेहद कठिनाई और अवसाद के दौर में धर्मेंद्र भैया ने मेरा साथ दिया और अपने जीवन का आखिरी डेढ़ साल मेरी सेवा में लगा दिया।

 सम्पर्कः होमलैंड सिटी, श्री गंगानगर (राजस्थान) -335001

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