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Feb 25, 2009

समाज

पुणे में गोगापीर कहाँ से आये?
- संजीव खुदशाह
पुणे की एक विशेषता मुझे अच्छी लगी वह यह की यहां एक भी भिखारी नहीं है। लोग कहते है पूना बुद्धिमानों का शहर है भिखारी के भेष में अमीरी की उसे परख है, शायद इसलिए यहां भीख देने का रिवाज नहीं है। यहां सफाई कामगार बहुत बड़ी संख्या में रहते है।
नवंबर 2008 में एक एनजीओ के बुलावे पर मैं पुणे गया। वहां का कार्यक्रम सफाई कामगारों के उत्थान के लिए समर्पित था, किन्तु वहां के सफाई कामगारों की बस्तियों में घुमना तथा अपने पाठकों से मिलना बेहद रोमांचक यादगार पल था। पाठकों का मेरे प्रति प्रेम सम्मान एवं अपनापन के बीच मुझे पुणे में नया जैसा कुछ भी नहीं लग रहा था। पूणे की आबो-हवा एवं वहां के लोगों का बर्ताव बेहद सरल है। पुणे की एक विशेषता मुझे अच्छी लगी वह यह की यहां एक भी भिखारी नहीं है। लोग कहते है पूना बुद्धिमानों का शहर है, भिखारी के भेष में अमीरी की उसे परख है, शायद इसलिए यहां भीख देने का रिवाज नहीं है।
यहां सफाई कामगार बहुत बड़ी संख्या में रहते है। इनकी लगभग 20 से 25 बस्तियां है। ज्यादातर कामगार गुजराती तथा राजस्थानी मूल है, कुछेक यूपी से भी आये है। इनका रहन सहन का स्तर (पुणे के बारे में जैसा माना जाता है) तुलनात्मक अच्छा नहीं है, लेकिन गुजरात जैसे राज्य के बनिस्पत ठीक है। इसीलिए गुजरात से आये कुछ मानव-अधिकार कार्यकर्ताओं को यह जानकर आश्चर्य हुआ कि यहां के सफाई कामगार अच्छी स्थिति में रह रहे है।
दरअसल गुजरात जैसे कट्टरपंथी एवं परंपरावादी राज्य में, जहां सफाई कामगार आज भी नरक सी सामाजिक स्थिति में जीवन-यापन कर रहे हैं, पर नवसृजन नाम का एक एनजीओ कार्य कर रहा है। ऐसी असामान्य स्थिति में काम करना अपने आपमें एक साहस का कार्य है। जब वहां के कार्यकर्ताओं ने पहली बार यहां के कामगारों की स्थिति देखी तो उनका आत्मविश्वास ठहर सा गया। उन्होंने यह स्वीकार किया कि वहां और ताकत से कार्य किये जाने की जरूरत है। चूंकि मैं मध्यभारत के अन्य शहरों में जाकर इनकी स्थिति से परिचित था, इसलिए मेरे लिए कोई नई बात नहीं थी।
असल में इन कामगारों का आर्थिक स्तर तो सुधरा है, लेकिन सामाजिक स्तर (जिसे सामाजिक चेतना भी कहते है) वहीं का वहीं है। आर्थिक स्थिति ठीक होने के बाद भी लोग सफाई पेशा छोडऩे को तैयार नहीं हैं।
मैंने इनके सदस्यों से मुलाकात की। यह आत्मीय मुलाकात सचमुच अविस्मरणिय है इनकी यहां स्थानीय पंचायत भी है। इसी पंचायत के प्रबंध सदस्य श्री खेमचंद बाबू साउके ने गोगापीर के बारे में जानकारी मिथक के रूप में दी। वे बड़े ही रोचक ढंग से बताते हैं कि गोगापीर नाथसंप्रदाय के गुरू श्री गोरखनाथ के शिष्य थे। मैं यहां पर जानकारी देना आवश्यक समझता हूं कि बौद्ध धर्म के पतन के समय जब हीनयांन-महायान की उत्पत्ति हो चुकी थी, उसी समय कुछ पंथ भी तैयार हुए। ये पंथ बौद्ध भिक्षुओं से ही टूटकर बने थे। इन्ही में एक पंथ नाथ सम्प्रदाय था, जिसमें बौध्द धर्म के अवशेष नाम-मात्र के थे। भंगी जाति के लोग यह मानते हैं कि गोगापीर चुहड़ा जाति के हंै लेकिन सच्चाई कुछ और है।
ऐसा कहा जाता है कि मारवाड़ क्षेत्र में एक राजपूत राजा थे, जिनका नाम जेवर तथा उनकी रानी का नाम बाचल था। रानी लंबे समय से संतानहीनता का दंश झेल रही थी। इन्हें एक साधु ने आर्शीवाद के साथ गोगल (सर्प के जहर से बना लुगदीनुमा मणी जैसा) भी दिया। उस रानी ने इस गोगल के पांच भाग किये तथा चार भाग अपनी सेविकाओं को भी दे दिया जो संतानहीन थीं। उनमें से एक भाग मेहतरानी (चुहड़ी) को तथा एक टुकड़ा घोड़ी को भी दिया। एक भाग स्वयं रानी ने भी खाया। रानी से जो पुत्र पैदा हुआ वह गोगापीर कहलाये। कहीं कहीं इन्हें गोगावीर भी कहते हैं। जो पुत्र मेहतरानी से हुआ वे रत्नाजी चावरिया कहलाये चूंकि गोगल के रिश्ते से दोनों भाई थे, इसलिए चूहड़ा समाज के लोगों ने इन पर विशेष श्रध्दा दिखाई। कहा जाता है कि गोगापीर विशेष चमत्कारी व्यक्तित्व के थे। इनके मानने वाले कहीं कहीं कालबेलिया भी कहलाते है।
जैसा कि अन्य चमत्कारियों के हाथ पांव सफाई कामगीरों को उबारने के मामले में ठंडे पड़ जाते हैं, उसी प्रकार गोगापीर की भी चमत्कारिक शक्तियां अपने गोगली भाईयों को मैला ढोने की संस्कृति से निजात दिलाने के मामले में जवाब दे बैठी।
लेकिन ये सफाई करने वाली जातियां जोर-शोर से इनकी रैलियां निकालती हंै। वे उसे भगवान मानते हैं। उनके शिष्यों के आगमन पर पुणे में भव्य स्वागत किया जाता है। ऐसा नहीं है कि सभी लोग दलित चेतना से विमुख हंै। कुछ लोग तो हंै, लेकिन उन्हें उंगलियों में गिना जा सकता है। अम्बेडकरी धारा में आने के सम्बन्ध में उनका कहना है कि नये ब्राम्हणों ने भी हमारा खूब शोषण किया है। उनका सभी दलित संस्थाओं में कब्जा है। अपने शोषकों के साथ हम कैसे हो सकते हैं।
यहां की बहुसंख्यक दलित जाति के बारे में वे राय रखते हैं कि हमें मिलने वाली सभी सुविधाएं ये ले लेते है और हमसे छुआछूत बरतते हैं। ऐसे में दलित चेतना गंजे के सिर में पानी डालने जैसा है। जब तक यहां की बहुसंख्यक संगठित जातियां हमसे समानता का व्यवहार नहीं करेंगी, तब तक हम कैसे इनके साथ दलित चेतना से जुड़ पायेंगे। माणुस्कि जैसे कुछ एनजीओ के कार्यकर्ता ऐसा प्रयास कर रहे है जो सराहनीय हैं, इसलिए कुछेक व्यक्तियों का रूझान दलित चेतना की ओर हुआ है, किन्तु बैठकों में भंगी-भंगी की पुकार एवं अलग से पहचान करवाये जाने के कारण वे कुण्ठा के शिकार हो जाते हैं। कुछ तो इस दंश के कारण वापस आने से भी परहेज करते हैं। दरअसल दलित संस्थानों में सफाई कामगारों को वाल्मीकि पुकारना भी एक अटपटा अनुभव है। आखिर कब तक सभी दलित जातियां अपने दासत्व बोधी नाम से छुटकारा पायेंगी?
जब दलित आंदोलन से जुड़े लोग भी ऐसा करते है तो दुख होता है। क्या ऐसी दिशाहीन संस्थाएं समाज को दिशा दिखा सकेंगी?

लघुकथाएँ

  - अख़्तर अली
डर
दंगाइयों से किसी तरह अपनी जान बचा कर वह भाग निकली । भागते-भागते वह एक जंगल में पहुंच गई। जंगल बहुत सुनसान था लेकिन उसे डर नहीं लगा। फिर रात हो गई और अंधेरा छा गया लेकिन उसे अंधेरे से डर नहीं लगा। अंधेरी रात में जंगली जानवरों की आवाजे आने लगी लेकिन उसे डर नहीं लगा। चलते-चलते वह एक बस्ती में पहुँच गई, वहां उसे कुछ आदमी दिखाई दिये जिन्हें देखते ही वह डर से कांपने लगी और वापस जंगल की तरफ भाग गई ।
आंखे
मरीज ने आंख के डॉक्टर से कहा- डॉक्टर साहब इन आंखों से बहुत परेशान हूं इनका कुछ ठीक ईलाज कीजिये ।
डॉक्टर ने आंख चेक कर कहा - दिखाई भी ठीक देता है, आंखे जलती भी नहीं है, पानी भी नहीं बहता, दिखने में भी लाल नहीं है , आखिर आंखों से आपको समस्या क्या है ?
मरीज ने कहा - ये सपने बहुत ज्यादा देखती है।
प्रेम कथा
लडक़ी का नाम - खामोशी।
लडक़े का नाम - चुप ।
गाँव का मुखिया - शोर ।
कहानी का अंत - पारंपरिक ।

यह खामोशी बहुत बोलती है

- डॉ. शोभाकांत झा
कम बोलकर अधिक ध्वनित करने की नियति के कारण कविता हमेशा से व्याख्या को पूरी पकड़ में आने से बिछलती रही है, इसलिए एक ही पुस्तक की अनेक समीक्षाएं की जाती रही हैं, की जा सकती हैं। इस छूट को पाकर संदर्भित कृति विषयक कुछ टिप्पणी यहां दर्ज हैं। कवि विश्वरंजन की ये निम्नांकित पक्तियां एक साथ कविता को 'कम बोलकर अधिक ध्वनित' करने वाली प्रवृत्ति और कवि की विश्वजनीन संवेदना का भी इजहार करती है-
भूखे लोगों की आंखों में
जमी हुई चुप्पी
यह चुप्पी
यह ख़ामोशी
बहुत बोलती है
इसकी भाषा बहुत डरावनी है
विश्वरंजन का कवि भेंटवार्ता में खुले मन से स्वीकारता है कि 'मुक्तिबोध मेरे प्रिय कवि हैं। आज भी मैं उनके पास बार-बार जाता हूं।....जब आप मुक्तिबोध दृष्टि से चीज़ों को देखेंगे तो चीज़ों को उद्घाटित करने के लिए कविता को बहुत बार फ़ैन्टेसी शिल्प का सहारा लेना एक गहरी अनिवार्यता हो जाती हैं।' इस अनिवार्यता का प्रमाण उनकी कई रचनाएं देती है-
नये अन्दाज़े बयां के साथ
और तभी सहसा
तिलिस्मों को फाडक़र
दूर बहुत दूर से आती है
एक भूखे बच्चे की रोने की आवाज़
और मैं भागता हूं वापस


हताश/ क्योंकि मैं जानता हूं
लाल बत्तियों वाले शहर से
उसकी मां
फिर नहीं लौटी है आज ।
भूख, अंधेरा, तिलिस्म, रोशनी, स्वप्न, सीढिय़ां, परतों का उखडऩा, डर, रात सन्नाटा, ख़ामोशी आदि अनेक प्रतीकात्मक प्रयोगों से मुक्तिबोध का प्रभाव आभासित है। प्रभाव हर छोटे-बड़े रचनाकारों के ऊपर देखा जा सकता है, जो अपने किसी-न-किसी प्रिय साहित्यकारों से अभिप्रेरित होते हैं। कवि विश्वरंजन की कविता के बारे में भी यही सत्य है। इनका अपना अन्दाज़े बयां है।
कवि विश्वरंजन जनतंत्र के संवेदनशील नागरिक और महत्वपूर्ण सरोकारी अधिकारी भी है। ऐसे अधिकारी हैं, जहां संवेदनशीलता का दम घुटना ही घुटना है, किन्तु उनका कवि अपनी संवेदनशीलता पर उनके अधिकारी को कभी हावी होने देता। वह दोनों में भरसक ताल-मेल बिठाता हुआ अपनी प्रतिपक्ष वाली भूमिका को बराबर निभाता है। लेखक अपने मन्वत्य और साहित्य की नियति के अनुरूप रचनाधर्मिता का निर्वाह करता है। 'रात की बात' या 'वह लडक़ी बड़ी हो गई है' और मेरी बच्ची डरकर रोने लगती है, बाज़ार के इर्द-गिर्द घूमती कुछ चन्द कविताएं इस संग्रह की ऐसी रचनाएं हैं, जो कवि की संवेदनशीलता और मन्तव्य के दस्तावेज़ हैं। दूसरी विधाओं में तो रचनाकार अलग से कुछ बोल भी लेता है, किन्तु कविता में उसे ऐसा अवसर प्राप्त नहीं होता। कविता ही बोलती है।
कवि अपने समय की वास्तविकताओं, विसंगतियों, विद्रपताओं, सपने, अन्तर्विरोधी-सबसे रु-ब-रु होता है, और कलात्मक संश्लिष्टता के साथ उन्हें अभिव्यक्त करता है। भाषा का बड़ा सतर्क और संतुलित प्रयोग के द्वारा कविता वह सब कुछ कह देती है, जो वह कहना और गुंजाना चाहती है-
इस देश के राज्य मंच पर


यही तो हो रहा है पचास वर्षों से


हाशिये के उस पार के लोग देख रहें हैं


और तालियां बजा रहे हैं
रचनाकार की संवेदना इलेक्ट्रानिक मीडिया से ज़्यादा संवेदनशील होती है । मीडिया तो दृश्य को ही पकड़ पाता है जबकि कवि की संवेदना अदृश्य और भविष्य को भी ऋ षि दृष्टि से देख लेती है। कवि भी ऋ षि होता है । आर-पार देख लेता है। देखकर चुप नहीं रहता। वह चुप्पी साध नहीं सकता।
अपने या किसी के विरुद्ध खड़ा होना प्रकारान्तर से उससे प्रेम करना है। मां बेटे-बेटियों से स्नेह करती है तभी तो वह उन्हें ताना दे पाती है। निंदक भी अपने पात्र से किसी-न-किसी रूप में जुड़ाव रखता है तभी तो उसकी निंदा करता है, अन्यथा दुनिया में तो बहुत सारे लोग हैं, जो ग़लत काम करते होंगे, उनकी निन्दा वह क्यों नहीं करता? इस संग्रह की कविताओं में जो विरोध, जो आक्रोश, जो व्यंग्य आदि अभिव्यक्त हुए हैं, वे सब मानवीय प्रेम के ही विविध रूप हैं। निराला के 'राग विराग' में निहित अध्यात्म की नाईं विश्वरंजन का भी यह अध्यात्म है-'साधो प्रेम में ही सब कुछ संभव है।' मनुष्य से प्रेम करो। मनुष्य बनो। ढाई आखर प्रेम का पढ़ो ।
रामहि केवल प्रेम पियारा ।


जानि लेहु जो जाननि हारा ।।
एक नई पूरी सुबह फिऱाक़ गोरखपुरी के नाती और कवि विश्वरंजन के रूप में किसी समकालीन हस्ताक्षर के गद्य और पद्य कर्म की तहकीकात करती किताब है। संपादक जयप्रकाश मानस की पैनी दृष्टि रचनाओं के चयन में, खरी साबित हुई है।
पता: कुशालपुर, रायपुर, छत्तीसगढ़

पिछले दिनों

मुक्तिबोध नाट्य समारोह और आसिफ के चित्र
पिछले माह इफ्टा और प्रगतिशील लेखक संघ रायपुर के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित 12 वें मुक्तिबोध नाट्य समारोह एवं कला उत्सव में चित्रकार स्वर्गीय आसिफ की एकल चित्रकला प्रदर्शनी का प्रसिद्ध आलोचक डॉ. नामवार सिंह ने उद्घाटन किया। आसिफ के इन चित्रों में प्रकृति की सुंदरता और ग्रामीण पृष्ठभूमि के विभिन्न आयाम नजर आ रहे थे। आसिफ की गहरी संवेदनशीलता को उसकी गतिशीलता के साथ हम आज भी समझ सकते हैं।
नाट्य समारोह के अवसर पर नामवर जी ने कहा कि - मुक्तिबोध ने अंधेरे में कविता लिखी। अंधेरा आज और गहरा हो गया है, इस अंधेरे के कई रूप हैं। यह सब कुछ मुक्तिबोध ने पहले देख लिया था। जो बारात अंधेरे में दिखती थी वह अब दिन दहाड़े दिखती है। यह दूरदृष्टि जिस कहानीकार या कवि में मिल सकती है वह मुक्तिबोध है। अंधेरा गहरा होता जा रहा है जिस अंधेरे का जिक्र उन्होंने अपनी रचनाओं में किया था उस लड़ाई से संघर्ष की ताकत और जीतने का विश्वास मुक्तिबोध से मिल सकता है। कार्यक्रम में प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव प्रभाकर चौबे, इप्टा के अध्यक्ष मिनहाज असद, राजेश श्रीवास्तव, आनंद हर्षुल, आलोक वर्मा, रवीन्द्र शाह और संयोजक सुभाष मिश्रा के साथ आमंत्रित रचनाकार एवं संस्कृतिकर्मियों ने प्रदर्शनी का अवलोकन करते हुए आसिफ को याद किया।
चिरंजीव दास स्मृति व्याख्यान माला
संस्कृति विभाग छत्तीसगढ़ शासन के सहयोग से 21 जनवरी को प्रतिवर्ष रायगढ़ में होने वाले चिरंजवी दास स्मृति व्याख्यान माला एवं एकल काव्य पाठ्य में देश के शीर्षस्थ कवि जिन्हें हाल ही में उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा भारत भारती पुरस्कार से सम्मानित केदारनाथ सिंह का काव्य पाठ हुआ। उन्होंने लगभग एक घंटे तक अपनी कविताओं से श्रोताओं को अभिभूत किया। तथा चिरंजीव दास को एक महत्वपूर्ण कवि बताते हुए कहा कि यह क्षेत्रीय स्तर का बहुत बड़ा काम है इसकी गूंज राष्ट्रीय धारा तक पहुंचे ऐसा प्रयास किया जाना चाहिए।
इस अवसर पर केदारनाथ सिंह के काव्य व्यक्तित्व को रेखांकित करते हुए आलोचक प्रभात त्रिपाठी ने कहा कि केदारनाथ सिंह की कविता पिछले 50 वर्षों के इतिहास का एक प्रमाणित दस्तावेज है। उनकी कविता ग्रामीण जीवन से जुड़ी हुई होकर भी आधुनिक सभ्यता के संघर्षों को केंद्र में रखती है।
व्याख्यान माला के अंतर्गत इस वर्ष साहित्य अकेदमी से पुरस्कृत संस्कृत कवि तथा विद्वान प्रोफेसर अभिराज राजेन्द्र मिश्र ने भारतीय समाज का दर्पण- संस्कृत वाग्डमय पर अपना व्याख्यान दिया। प्रो मिश्र ने चिरंजीवदास को एक महान संस्कृत सेवी बताते हुए कहा कि संस्कृत का साहित्य पांच हजार वर्षों का साहित्य है तथा जब तक संस्कृत का वर्चस्व है तब तक भारत राष्ट्र की अस्मिता बनी हुई है।
पुस्तक लोकार्पण एवं काव्य पाठ
छत्तीसगढ़ लोक संस्कृति अनुसंधान संस्थान के तत्वाधान में पिछले माह रायपुर छत्तीसगढ़ में आयोजित समारोह में नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया द्वारा प्रकाशित रमेश अनुपम की पुस्तक, छह सौ वर्षों की सुदीर्घ काव्य यात्रा का संचयन 'जल भीतर इक बृच्छा उपजै' का लोकार्पण किया गया। इस अवसर पर केदार नाथ सिंह, विनोद कुमार शुक्ल, ज्ञानेन्द्रपति, विश्वरंजन, सुधीर सक्सेना, स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी, जगदीश उपासने, अजय कुमार, देवी प्रसाद वर्मा, राजेन्द्र मिश्र जैसे प्रसिद्ध साहित्यकार उपस्थित थे।
इसी मंच पर मेधा बुक्स दिल्ली से प्रकाशित तीन काव्य संग्रहों का भी आमंत्रित अतिथियों ने लोकार्पण किया- 'उठाता है कोई एक मुट्ठी ऐश्वर्य' (जया जादवानी) 'सफेद से ही कुछ दूरी पर पीला रहता था' (संजीव बख्शी) तथा 'लौटता हूं मैं तुम्हारे पास' (रमेश अनुपम)। उपरोक्त कार्यक्रम में मेधा बुक्स से प्रकाशित किताबों पर चर्चा हुई एवं केदारनाथ सिंह, विनोद कुमार शुक्ल ज्ञानेन्द्र पति, विश्व रंजन तथा सुधीर सक्सेना की कविताओं का काव्य पाठ हुआ।

मुझे भी आता है गुस्सा

अपनी जिम्मेदारी से मुँह न मोड़ें
- रश्मि वर्मा
'अस्पताल' अपने आप में कष्टप्रद शब्द है उस पर किसी अपने को लेकर जाना और वहां इलाज के लिए इधर से उधर भटकना, डॉक्टर के इंतजार में आते जाते मरीजों को देखना और इन सबके साथ अस्पताल के आस- पास फैली गंदीगी तो जैसे अस्पताल की पहचान होती है। अस्पताल में प्रवेश करते ही मरीजों की लाईन और दर्द को देखकर घबराहट वैसे ही बढ़ जाती है जो अच्छे भले स्वस्थ इंसान को बीमार कर देता है।

मुझे समझ नहीं आता हमारे देश में अस्पताल के माहौल को इतना मनहूसियत भरा बना कर क्यों रखा जाता है। प्राईवेट क्लिनिक तुलनात्मक रुप से जरुर साफ नजर आते हैं वहां के वातावरण को भी कुछ हल्का करने की कोशिश की जाती है। जहां इंतजार में बैठे मरीजों के लिए कुछ पत्रिकाएं होती हैं। टीवी लगाकर भी मरीज के इन कष्टप्रद क्षणों को कम करने की कोशिश की जाती है। कई जगह मधुर संगीत भी सुनाई देने लगा है। यदि सभी अस्पतालों में सफाई और मन को शांत रखने वाला वातावरण मिले तो फिर कहना ही क्या? मरीज वहां से आधा स्वस्थ होकर निकलेगा और आधा दवाई खाने के बाद ठीक हो जाएगा।

परंतु अस्पताल के माहौल और व्यवस्था को लेकर जिस तरह के अनुभवों से मैं गुजरी हूं आप भी अनुभव कर चुके होंगे। एक बार मैं अपने परिवार के बीमार सदस्य को लेकर अस्पताल पहुंची। नंबर लगा कर मैं अपनी बारी के आने का इंतजार करने लगी, मेरे आगे अभी दो मरीज और थे। मैं कुछ समझ पाती कि अचानक एक वार्डबॉय के साथ दो सज्जन डॉक्टर के केबिन में धड़धड़ाते हुए घुस गए। गुस्सा तो बहुत आया कि यह क्या बात हुई हम घंटों लाइन लगाए बैठे हैं और ये वीआईपी आते ही अंदर चले गए। लेकिन मैं अपना गुस्सा पी गई, क्योंकि मेरे साथ एक बीमार व्यक्ति था। ऐसे माहौल में यदि मैं लडऩे लगती या गुस्सा जाहिर करती तो उस बीमार की मन:स्थिति क्या होती। सो चुपचाप बैठी रही। बाद में जब पता चलता है कि डॉक्टर की केबिन में इस तरह अंदर जाने वाला, नगर का प्रभावशाली व्यक्ति है या डॉक्टर का परिचित अथवा अस्पताल को मोटी रकम दान देने वाला, तब मन होता कि उनसे जाकर पूछूं- क्या आपकी तकलीफ हमारी तकलीफ से ज्यादा है?

लेकिन अस्पताल का दर्द सिर्फ इतना ही नहीं होता। इस लम्बे इंतजार में और भी कई तरह के अनुभवों से गुजरना होता है। इन दिनों हर रोज एक नया अस्पताल खुल रहा है तो क्या हुआ, उससे दोगुनी गति से मरीजों की संख्या भी तो बढ़ती ही जा रही है। जब भी अस्पताल जाओ खासकर सरकारी अस्पताल वहां आस-पास इतनी अधिक गंदगी होती है कि सांस लेना दूभर होता है। अस्पताल का वातावरण घुटन भरा होता है कि यह सब अच्छे भले इंसान को बीमार कर देता है।

प्रश्न यह उठता है कि ये गंदगी करने वाले होते कौन हैं, हम ही ना? अस्पताल मेनेजमेंट सफाई की व्यवस्था नहीं करवाता होगा ऐसा तो हो नहीं सकता, और जहां ऐसा नहीं होता तो इसके लिए भी वहां शिकायत की जा सकती है। पर अस्पताल की सफाई क्या केवल अस्पताल मैनेजमेंट की ही जिम्मेदारी है? क्या इस सफाई में हम अपना योगदान नहीं कर सकते? क्या यह हमारी भी जिम्मेदारी नहीं है कि हम अस्पताल को स्वच्छ रख सकें। हम यह सोच कर क्यों कुछ नहीं करते कि हमें क्या करना है सिर्फ एक दिन ही तो यहां आना है उसके लिए कौन मुसीबत मोल ले। यही वजह है कि बहुत कुछ गलत होते हुए देखकर भी हम अनदेखा कर जाते हैं।

इसी तरह डॉक्टर कब मिलेंगे, कौन से नंबर के कमरे में मिलेंगे जैसी सतही जानकारी न मिलने के कारण भी मरीज को लिए- लिए इधर से उधर और कभी- कभी कई- कई मंजिल तक ऊपर से नीचे होते रहना पड़ता है। ऐसे में अस्पताल प्रशासन की पूछताछ वाली व्यवस्था जिम्मेदार होती है। हम क्यों नहीं इन सबकी शिकायत करते।

जिम्मेदारी से भागना तो समस्या का हल नहीं है। हमें पहल तो करनी ही होगी, कि जब डॉक्टर से मिलने कोई वीआईपी लाईन तोड़े तो खड़े होकर उनसे कह सकें कि हम दो घंटे से बैठे हैं या तो आप भी लाईन में लग जाईए या फिर डॉक्टर से अलग से समय लेकर आईए, जनता के समय में आकर उनकी बद्दुआएं क्यों लेते हैं। सीधे डॉक्टर के पास जाकर भी इसकी शिकायत करें।

कहने का तात्पर्य यह कि सिर्फ गुस्सा करने से काम नहीं बनने वाला। उस गुस्से को खतम करने के लिए आगे आना होगा ताकि कोई लम्बी लाइन तोडक़र आपके समय को छीनने की कोशिश न करे। तो आईए जाग जाएं और इस गुस्से को जागरुकता में बदल लें।