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Jul 14, 2019

देश बन रहा है डंपिंग ग्राउंड

देश बन रहा है डंपिंग ग्राउंड
संध्या रायचौधरी
इंटरनेशनल टेलीकम्यूनिकेशंस यूनियन (आईटीयू) के आंकड़ों के अनुसार भारत चीन और कुछ अन्य देशों में मोबाइल फोन की संख्या इंसानी आबादी को पीछे छोड़ चुकी है। सिर्फ़ भारत और चीन में मोबाइल फोन का आँकड़ा 8 अरब पार कर चुका है। चीन की तरह भारत में भी सस्ते से सस्ता फोन उपलब्ध है। लेकिन गंभीर और खतरनाक बात यह है कि इससे इलेक्ट्रॉनिक क्रांति में खतरे ही खतरे उत्पन्न हो जाएँगे जो इस धरती की हर चीज़ को नुकसान पहुँचाएँगे।
फिलहाल भारत में एक अरब से ज़्यादा मोबाइल ग्राहक है। मोबाइल सेवाएँ शुरू होने के 20 साल बाद भारत ने यह आँकड़ा इसी साल जनवरी में पार किया है। फिलहाल चीन और भारत में एक-एक अरब से ज़्यादा लोग मोबाइल फोन से जुड़े हैं। देश में मोबाइल फोन इंडस्ट्री को अपने पहले 10 लाख ग्राहक जुटाने में करीब 5 साल लग गए थे, पर अब भारत-चीन जैसे आबादी बहुल देशों की बदौलत पूरी दुनिया में मोबाइल फोन की संख्या इंसानी आबादी के आँकड़े यानी 8 अरब को भी पीछे छोड़ चुकी है। ये आँकड़े बताते हैं कि अब गरीब देशों के नागरिक भी ज़िंदगी में बेहद ज़रूरी बन गई संचार सेवाओं का लाभ उठाने की स्थिति में हैं, वहीं यह इलेक्ट्रॉनिक क्रांति दुनिया को एक ऐसे खतरे की तरफ ले जा रही है जिस पर अभी ज़्यादा ध्यान नहीं दिया जा रहा है। यह खतरा है इलेक्ट्रॉनिक कचरे यानी ई-कचरे का।
सालाना 8 लाख टन
आईटीयू के मुताबिक, भारत, रूस, ब्राज़ील समेत करीब 10 देश ऐसे हैं जहाँ मानव आबादी के मुकाबले मोबाइल फोनों की संख्या ज़्यादा है। रूस में 25 करोड़ से ज़्यादा मोबाइल हैं ,जो वहाँ की आबादी का 1.8 गुना है। ब्राज़ील में 24 करोड़ मोबाइल हैं, जो आबादी से 1.2 गुना हैं। इसी तरह मोबाइल फोनधारकों के मामले में अमेरिका और रूस को पीछे छोड़ चुके भारत में भी स्थिति यह बन गई है कि यहाँ करीब आधी आबादी के पास मोबाइल फोन हैं। भारत की विशाल आबादी और फिर बाज़ार में सस्ते से सस्ते मोबाइल हैंडसेट उपलब्ध होने की सूचनाओं के आधार पर इस दावे में कोई संदेह भी नहीं लगता। पर यह तरक्की हमें इतिहास के एक ऐसे विचित्र मोड़ पर ले आई है, जहाँ हमें पक्के तौर पर मालूम नहीं है कि आगे कितना खतरा है? हालांकि इस बारे में थोड़े-बहुत आकलन-अनुमान अवश्य हैं जिनसे समस्या का आभास होता है। जैसे वर्ष 2015 में इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्निकल एजूकेशन एंड रिसर्च (आईटीईआर) द्वारा मैनेजमेंट एंड हैंडलिंग ऑफ ई-वेस्ट विषय पर आयोजित सेमिनार में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के विज्ञानियों ने एक आकलन करके बताया था कि भारत हर साल 8 लाख टन इलेक्ट्रॉनिक कचरा पैदा कर रहा है। इस कचरे में देश के 65 शहरों का योगदान है पर सबसे ज़्यादा ई-वेस्ट देश की वाणिज्यिक राजधानी मुंबई में पैदा हो रहा है। हम अभी यह कहकर संतोष जता सकते हैं कि नियंत्रण स्तर पर हमारा पड़ोसी मुल्क चीन इस मामले में हमसे मीलों आगे है।
बैटरी और पानी प्रदूषण
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक चीन दुनिया का सबसे बड़ा ई-वेस्ट डंपिंग ग्राउंड है। उल्लेखनीय यह है कि जो टीवी, फ्रिज, एयर कंडीशनर, मोबाइल फोन, कंप्यूटर आदि चीन में बनाकर पूरी दुनिया में सप्लाई किए जाते हैं, कुछ वर्षों बाद चलन से बाहर हो जाने और कबाड़ में तब्दील हो जाने के बाद वे सारे उपकरण चीन या भारत लौट आते हैं। निसंदेह अभी पूरी दुनिया का ध्यान विकास की ओर है। टेक्नॉलॉजी की तरक्की ने हमें जो साधन और सुविधाएँ मुहैया कराई हैं, उनसे हमारा जीवन पहले के मुकाबले आसान भी हुआ है। कंप्यूटर और मोबाइल फोन जैसी चीजों ने हमारा कामकाज काफी सुविधाजनक बना दिया है। हम फैक्स मशीन, फोटो कॉपियर, डिजिटल कैमरों, लैपटॉप, प्रिंटर, इलेक्ट्रॉनिक खिलौने व गैजेट, एयर कंडीशनर, माइक्रोवेव, कुकर, थर्मामीटर आदि चीजों से घिर चुके हैं। दुविधा यह है कि आधुनिक विज्ञान की देन पर सवार हमारा समाज जब इन उपकरणों के पुराना पड़ने पर उनसे पीछा छुड़ाएगा, तो ई-कचरे की विकराल समस्या से कैसे निपट पाएगा। यह चिंता भारत-चीन जैसे तीसरी दुनिया के मुल्कों के लिए ज़्यादा बड़ी है ;क्योंकि यह कचरा ब्रिटेन-अमेरिका जैसे विकसित देशों की सेहत पर कोई असर नहीं डाल रहा है। इसकी एक वजह यह है कि तकरीबन सभी विकसित देशों ने ई-कचरे से निपटने के प्रबन्ध पहले ही कर लिये हैं, और दूसरे, वे ऐसा कबाड़ हमारे जैसे गरीब मुल्कों की तरफ ठेल रहे हैं। अर्थात् हमारे लिए चुनौती दोहरी है। पहले तो हमें देश के भीतर पैदा होने वाली समस्या से जूझना है और फिर विदेशी ई-कचरे से निपटना है। हमारी चिंताओं को असल में इससे मिलने वाली पूँजी ने ढाँप रखा है। विकसित देशों से मिलने वाले चंद डॉलरों के बदले हम यह मुसीबत खुद ही अपने यहाँ बुला रहे हैं।
-कचरा पर्यावरण और मानव सेहत की बलि भी ले सकता है। मोबाइल फोन की ही बात करें, तो कबाड़ में फेंके गए इन फोनों में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक और विकिरण पैदा करने वाले कलपुर्जे सैकड़ों साल तक ज़मीन में स्वाभाविक रूप से घुलकर नष्ट नहीं होते। सिर्फ एक मोबाइल फोन की बैटरी 6 लाख लीटर पानी दूषित कर सकती है। इसके अलावा एक पर्सनल कंप्यूटर में 3.8 पौंड घातक सीसा तथा फास्फोरस, कैडमियम व मरकरी जैसे तत्त्व होते हैं, जो जलाए जाने पर सीधे वातावरण में घुलते हैं और विषैले प्रभाव उत्पन्न करते हैं। कंप्यूटरों के स्क्रीन के रूप में इस्तेमाल होने वाली कैथोड रे पिक्चर ट्यूब जिस मात्रा में सीसा (लेड) पर्यावरण में छोड़ती है, वह भी काफी नुकसानदेह होता है।
कानून
समस्या इस वजह से भी ज़्यादा विनाशकारी है क्योंकि हम सिर्फ अपने ही देश के ई-कबाड़ से काम की चीज़ें निकालने की आत्मघाती कोशिश नहीं करते, बल्कि विदेशों से भी ऐसा खतरनाक कचरा अपने स्वार्थ के लिए आयात करते हैं। पर्यावरण स्वयंसेवी संस्था ग्रीनपीस ने अपनी रिपोर्ट टॉक्सिक टेक: रीसाइक्लिंग इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट्स इन चाइना एंड इंडियामें साफ किया है कि जिस ई-कचरे की रीसाइक्लिंग पर युरोप में 20 डॉलर का खर्च आता है, वही काम भारत-चीन जैसे मुल्कों में महज चार डॉलर में हो जाता है। वैसे तो हमारे देश में ई-कचरे पर रोक लगाने वाले कानून हैं। खतरनाक कचरा प्रबंधन और निगरानी नियम 1989 की धारा 11(1) के तहत ऐसे कबाड़ की खुले में रीसाइक्लिंग और आयात पर रोक है, लेकिन कायदों को अमल में नहीं लाने की लापरवाही ही वह वजह है, जिसके कारण अकेले दिल्ली की सीलमपुर, जाफराबाद, मायापुरी, बुराड़ी आदि बस्तियों में सम्पूर्ण देश से आने वाले ई-कचरे का 40 फीसदी हिस्सा रिसायकिल किया जाता है।
हमारी तरक्की ही हमारे खिलाफ न हो जाए और हमारा देश दुनिया के ई-कचरे के डंपिंग ग्राउंड में तब्दील होकर नहीं रह जाए; इस बाबत सरकार और जनता, दोनों स्तरों पर जागृति की ज़रूरत है। (स्रोत फीचर्स)

प्रेरक

खुशियों के लकी नंबर 


एक अकेले दिन में ही आपको अपने फिटनेस गोल्स को पूरा करना है, घर और ऑफिस के ज़रूरी काम निपटाने हैं, और खुद को तरोताजा रखने के लिए थोड़ा मनबहलाव भी करना है. लेकिन आज के माहौल में एक दिन पूरा नहीं पड़ता. ऐसा लगता है कि थोड़ा सा वक्त और मिलता तो बहुत कुछ किया जा सकता था. ऐसे में थोड़े से सुकून के लिए मैं आपको कुछ ऐसे लकी नंबर देती हूँ- जिनसे आपको बहुत मदद मिलेगी. मैं इन्हें लकी नंबर इसलिए कहती हूँ; क्योंकि ये आपको कोई ज़रूरी काम कर डालने के लिए बहुत प्रोत्साहित करते हैं. कई विशेषज्ञों ने लम्बी-चौड़ी रिसर्च और खोजबीन के बाद इन्हें आजमाया है और ये अपना काम बखूबी करते हैं. ये हैं वे लकी नंबरः
लकी नंबर 2 –
प्रसिद्ध पुस्तक गेटिंग थिंग्स डन” (Getting Things Done) के लेखक डेविड एलन कहते हैं कि यदि आपको लगता है कि आप किसी काम को 2 मिनट में पूरा कर सकते हैं तो उसे तुरंत कर डालिए! ये “Two-Minute Rule” आपको बहुत से छोटे लेकिन ज़रूरी कामों को झटपट पहली फुर्सत में पूरा कर देने में मदद करेगा और आपके कामों की फेहरिस्त कुछ छोटी तो हो ही जाएगी.
लकी नंबर 5 –
यदि आप घर या दफ्तर में किसी कठिन चीज से जूझ रहे हैं तो “Five-Minute Rule” का प्रयोग करें. काम को ऊबकर या खीझकर टालें नहींबल्कि खुद से कहें, “मैं इस काम को करने के लिए अच्छे से पूरे 5 मिनट दूँगा और उसके बाद यदि मेरा मन रुकने को कहेगा तो ही रुकूँगा.अपने मन में लगन विकसित करने के लिए इस नियम का अभ्यास करें और खुद से कहें, “मैं इस प्रोजेक्ट पर कम-से-कम 5 मिनट काम करने के बाद ही उठूँगा.आप 5 मिनट के बाद भी आप काम करते रहना चाहें तो अच्छी बात है. यदि आप रुक भी जाएँतो भी आपने काम को 5 मिनट तो दे ही दिएअब आपको काम को 5 मिनट कम देने हैं. लेखक एम जे रायन ने अपनी किताब “This Year I Will” में इसपर बहुत विस्तार से लिखा है.
लकी नंबर 11 –
आप स्वस्थ रहना और लम्बी आयु पाना चाहते हैं; लेकिन इसके लिए हल्की-फुल्की एक्सरसाइज़ या वॉक करने के लिए एक घंटा भी समय नहीं निकाल पा रहेतो यह टिप आपके काम की है. हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के रोगविज्ञानी आई-मिन ली ने लम्बी रिसर्च के बाद यह निष्कर्ष निकाला है कि स्वस्थ रहने और लम्बी आयु के लिए रोज़ाना कम-से-कम 11 मिनट की एक्सरसाइज़ करने वाले लोग एक्सरसाइज़ नहीं करनेवालों से औसतन 1.8 वर्ष अधिक जीते हैं. रोज़ाना थोड़ी सी शारीरिक कसरत करने से ही स्वास्थ्य पर इतना प्रभाव पड़ता है. इससे भी अधिक व्यापक प्रभाव डालनेवाली बात के बारे में अंत में लिखा गया है.
लकी नंबर 15 –
आप अच्छे स्वास्थ्य के लिए या किसी बीमारी या परहेज के कारण बहुत सी चीजों के खाने या पीने पर नियंत्रण रखना चाहते हैं लेकिन कभी-कभी आपका मन ललचा जाता है. आपका मन भी थोड़ी -सी और चटपटी चाट या आइसक्रीम खाने को करता है न? या शायद आपको सिगरेट की तलब से निजात नहीं मिल पा रही हो. ऐसी छटपटाहट होने पर लकी नंबर 15 को याद रखें. इस विषय पर की गई रिसर्च से पता चला है कि हमारी अधिकतर उत्कट इच्छाएँ लगभग 15 मिनट तक प्रबल बनी रहती हैं. वैज्ञानिक एलन मार्लेट बताते हैं कि ऐसी इच्छाएँ लहरों के समान होती है- ये अपनी उठान तक पहुँचती हैं और फिर गिरने लगती हैं. ऐसे में आपके लिए ज़रूरी होगा कि आप इस लहर का शिकार बनने की बजाय, उनकी सवारी करें. इस बात को ध्यान में रखें कि आपकी लालसा को कमज़ोर होने में लगभग 15 मिनट का वक्त लगेगा और अपने किसी संकल्प को बनाए रखने के लिए हम 15 मिनटों तक तो कष्ट झेल ही सकते हैं.
लकी नंबर 20 –
आप किसी समस्या के समाधान में जी-जान से जुटे हैं लेकिन कोई हल नहीं निकल रहा. आप ठहरिए, थोड़ा सुस्ताइए. एक ब्रेक ले लीजिए और लगभग 20 मिनटों के लिए कोई बिल्कुल अलहदा चीज कीजिए. कहीं टहल आइए, दो-तीन गाने सुन लीजिए, आँखें बंद करके लेट जाइए या अपने किसी दोस्त से बातें कर लीजिए. फिर आप अपने काम की ओर लौटिए. बहुत संभव है कि आपको समस्या का हल एक झटके में कौंध जाए. हो सकता है कि हल आपके सामने ही मौजूद रहा हो और आप काम के दबाव में उसे देख नहीं पाए हों. कई बार क्रासवर्ड या सुडोकू करते वक्त आपके सामने ऐसे अहामौके आए होंगे. काम के बीच में छो़टे-छोटे ब्रेक्स लेने का यही फायदा है. असल में जब कभी आप अपने काम के तयशुदा पैटर्न को बदलते हैं तो आपका दिमाग तनाव से मुकाबला करनेवाले रसायनों को सक्रिय कर देता है. दिमाग में आनेवाला यह रासायनिक परिवर्तन आपको राहत देता है और आपकी रचनाशीलता में वृद्धि करता है, जिसके कारण आपको उपाय रहस्यमयी रूप से सूझने लगते हैं. अनुसंधानकर्ता द्वय हर्बर्ट बैंसन और विलियम प्रोक्टर ने इसे the breakout principleका नाम दिया.
लकी नंबर 43 –
यदि रोज़ाना 11 मिनट का एक्सरसाइज़ प्रोग्राम आपको बहुत कम लगता है और आपके पास थोड़ा अतिरिक्त समय है तो एक्सरसाइज़ का अधिकतम लाभ उठाने के लिए आपको रोज़ाना औसतन 43 मिनट अपने स्वास्थ्य के लिए समर्पित करने होंगे. ऐसा पाया गया है कि रोज़ाना इतने मिनटों तक एक्सरसाइज़ करनेवालों की औसत आयु दूसरों की तुलना में 4.2 साल अधिक होती है. यदि 43 मिनट कुछ ज्यादा लग रहे हों तो आपके पास 22 मिनटों का विकल्प है जो आपकी जिंदगी में 3.4 साल जोड़ सकता है (हिन्दी ज़ेन से)

छोड़ आया था जिसे

छोड़ आया था जिसे
विजय जोशी
(पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल)


छोड़ आया था जिसे
एक सुंदर मोड़ पर
स्वप्न बनकर सो गया
अब कहाँ वो गाँव है.

छाँह में जिसके तले
बैठते थे सब भले
उस रक्तवर्णी गुलमुहर की
अब बची कब छाँव है
अब कहाँ..

रही अमराई नहीं
पुरवा तक बही नहीं
मोर भी हैरान हैं
गुम गया जो ठाँव है
अब कहाँ..


मौसम भी रूठा है
अपनों से टूटा है
नदियाँ  हैरान हैं
अब कहाँ वो नाव है
अब कहाँ..

शहरों की चाल है
अब कहाँ चौपाल है
संगी सब बिेछड़ गए
अब कहाँ वो चाव है
अब कहाँ..


सज गईं हैं मंडियाँ
खो गईं पगडंडियाँ
दौड़ मिल जाएँ गले
अब कहाँ वो पाँव हैं
अब कहाँ..

सूनापन उतरा है
जीवन भी बिखरा है
खो गया सब कुछ यहाँ
अब कहाँ वो भाव है
अब कहाँ..


सम्पर्क: 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास), भोपाल- 462023
मो. 09826042641, E-mail- v.joshi415@gmail.com

देहरी छूटी, घर छूटा

 देहरी छूटी, घर छूटा
-लोकेन्द्र सिंह
काम-धंधे की तलाश में
देहरी छूटी, घर छूटा
गलियाँ  छूटी, चौपाल छूटी
छूट गया अपना प्यारा गाँव
मिली नौकरी इक बनिए की
सुबह से लेकर शाम तक
रगड़म-पट्टी, रगड़म-पट्टी
बन गया गधा धोबी राम का।

आ गया शहर की चिल्ल-पों में
शांति छूटी, सुकून छूटा
साँझ छूटी, सकाल छूटा
छूट गया मुर्गे की बांग पर उठना
मिली चख-चख चिल्ला-चौंट
ऑफिस से लेकर घर के द्वार तक
बॉस की चें-चें, वाहनों की पों-पों
कान पक गए अपने राम के।

सीमेन्ट-कांक्रीट से खड़े होते शहर में
माटी छूटी, खेत छूटा
नदी छूटी, ताल छूटा
छूट गया नीम की  छाँव का अहसास
मिला फ्लैट ऊँची इमारत में
आँगन अपना न छत अपनी
पैकबंद, चकमुंद दिनभर
बन गया कैदी बाजार की चाल का।

लेखक के बारे मेंः माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में  सहायक प्राध्यापक। काव्य संग्रह- ‘मैं भारत हूँ’ सहित अन्य पुस्तकें प्रकाशित।

Jul 11, 2019

भय को दूर भगाओ

भय को दूर भगाओ
-विजय जोशी
 अंतस् में भय एक जन्मजात एवं स्वाभाविक प्रवृत्ति है लेकिन जीवन में विकास हेतु इसका सीमा में रहना ही सर्वोत्तम प्रयोजन है। पर वास्तविक जीवन में कई बार ऐसा हो नहीं पाता। अच्छी घटना या प्रसंग से हमारा मनोबल उतनी मात्रा में नहीं बढ़ पाता, जितना कि विपरीत परिस्थिति या भय की दशा में गिर जाता है। हम आगत अनिष्ट के डर से कई बार शुतुरमुर्गी अवस्था अपना लेते हैं, जो आँधी आने पर सिर रेत में सिर घुसाकर सोचता है कि कोई संकट सामने नहीं है। यह प्रवृत्ति व्यक्तिगत रूप से बहुत घातक है और जीवन की गति को अवरूद्ध करती है।
एक बार बनारस में स्वामी विवेकानंद एक मंदिर से निकल रहे थे कि वहाँ मौजूद बहुत से बंदरों ने उन्हें घेर लिया और नजदीक आकर डराने लगे। स्वामीजी कुछ सोचकर पीछे हटने लगे, तो बंदर और नज़दीक आकर उनके पीछे ही पड़ गए।
वहाँ से गुजर रहे एक संन्यासी ने यह देखकर स्वामी विवेकानंद से कहा - डरो मत, रुको और उनका सामना करो।
स्वामी जी तुरंत बात का मर्म समझ गए, त्वरित पलटे और बिना एक भी क्षण नष्ट किए उन बंदरों की ओर बढऩे लगे। ऐसा करते ही बंदर भाग खड़े हुए। इसी बात से स्वामीजी को एक सीख मिली, जिसे बाद में उन्होंने अपने संबोधन में भी सदा कहा - पलटो और सामना करो।
बात का सारांश इतना मात्र है कि कई बार भय बहुत छोटा होता है, लेकिन अपने मानस में हम उसे कई गुना बड़ा आकार प्रदान कर देते हैं और यहीं से समस्या की शुरूआत होती है। भयग्रस्त मानस हमारे मनोबल को प्रभावित करते हुए अंतत: हमारी सुचारु रूप से कार्य कर पाने की प्रणाली को शिथिल कर देता है। हमारी उमंग, उत्साह  को हत्सोसाहित करते हुए हमें धीरे धीरे अवसाद की गर्त में डुबोने लगता है। भय से भय की कोई आवश्यकता नहीं । उसे तो फ्रंट फूट पर खेलकर अपने आत्म विश्वास रूपी बल्ले से आसमान में छक्का लगाइए और तब देखिए वह कैसे काफूर हो जाता है। अज्ञात भय की कल्पना कर उसे सीने से लगाकर जीने की अपेक्षा उसे उपक्षित करने की मनोवृत्ति तथा मनोबल उसे धराशायी कर देता है। साहस रूपी संकल्प ही हमें सफलता के प्रशस्ति पथ की ओर ले जाता है.
भय के आगे आग जलाओ,
कद्दावर शब्दों को लाओ
फिर देखो अपनी जमीन का
कितना बड़ा जिगर लगता है
तुमको नाहक डर लगता है
सम्पर्क: 8/सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास), भोपाल- 462023, मो. 09826042641,  
E-mail- v.joshi415@gmail.com