मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।

Nov 25, 2016

कहाँ गए माँजरी और बिन्ने बुनने वाले हाथ

         कहाँ गए माँजरी 
        और बिन्ने बुनने वाले हाथ
                        - पवन चौहान
आधुनिक जीवन शैली बहुत-सी पारंपरिक चीजों को काफी पीछे छोड़ आई है। मशीनीकरण के इस युग ने आज हर वस्तु को नए अंदाज, नए फैशन और चमक-दमक व सस्ते दाम में पेश करके हाथ से बनी वस्तुओं का जैसे वजूद ही मिटाकर रख दिया है। इसी चकाचौंध में दम तोड़ चुका है हमारे हाथों का हुनर दर्शाने वाले पारंपरिक बिन्ने’ (बैठकु) और माँजरी’ (चटाई)।
बिन्ने का प्रयोग सिर्फ एक व्यक्ति के बैठने के लिए होता है जबकि मांजरी (जिसे कई जगह पंदके नाम से भी जाना जाता है) का प्रयोग एक से अधिक लोग बैठने या फिर सोने के लिए करते है। बिन्ना बनाने के लिए मुख्यतया कोके’ (मक्की का बाहरी छिलका) का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन इसके अलावा बिन्ने को बनाने के लिए हल्दी के पत्ते या पराली का इस्तेमाल भी किया जाता है। बिन्ने को आमतौर पर गोल आकार दिया जाता है। लेकिन इसे और आकर्षक और फैशनेबल बनाने के लिए चौरस, तिकोना या अन्य आकार में भी ढाला जाता है। एक बिन्ने को बनाने में लगभग चार से पाँच घंटे तक का समय लग जाता है। बिन्ने को सुंदर व आकर्षक बनाने के लिए इसमें लगने वाली सामग्री को अलग-अलग प्रकार के रंगों में रंगकर इस्तेमाल किया जाता है। यदि कोके को रंगना न हो तो इसके बदले रंग-बिरंगे प्लास्टिक को कोके के ऊपर लपेटकर इसे तैयार किया जाता है।

माँजरी को बनाने के लिए मुख्यतया पराली, हल्दी के पत्ते तथा खजूर के पत्तों (पाठे) का इस्तेमाल किया जाता है। माँजरी के लिए कोके का प्रयोग नहीं किया जाता। माँजरी लंबी और चौरस होती है। पाठे की माँजरी में पहले पाठे के पत्तों को एक विशेष तकनीक से आपस में हाथ से बुनकर कम चौड़ी लेकिन एक माँजरी के आकार के अनुसार बराबर लम्बी पट्टी तैयार की जाती है। पराली की माँजरी को समतल जमीन पर चार खूंटियाँ गाड़ कर और उनमें सेबे या प्लास्टिक की पतली डोरियों को समान दूरी में बाँधकर फिर थोड़ी-थोड़ी पराली लेकर सेबे या प्लास्टिक की डोरी से गाँठे देकर तैयार किया जाता है। आजकल बनने वाली माँजरियों में महिलाएँ रंग-बिरंगे प्लास्टिक के रैपर लगाकर उन्हे एक नए रुप में पेश कर रही हैं। ये माँजरियाँ लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। पराली की माँजरी को बनाने में पाँच से छ घंटे तक का समय लग जाता है। पाठे की माँजरी के लिए पहले पाठे की लगभग चार ईंच चौड़ी लेकिन कई मीटर लम्बी (माँजरी के साइज के अनुसार) पट्टी एक विशेष तकनीक द्वारा पाठों को आपस में बुनकर तैयार की जाती है। फि र इस पट्टी को माँजरी के आकार के अनुरूप पाठे से ही सीकर जोड़ा जाता है। पाठे की माँजरी बनाने के लिए लगभग एक सप्ताह तक का समय आराम से लग जाता है। पाठे की माँजरी पतली लेकिन पराली की माँजरी मोटी व नरम होती है। हिमाचली लोकगीतों में माँजरी का बखान बहुत ही सुंदर तरीके से प्रस्तुत किया जाता है। जो इस तरह से है-
आया हो नंलारिआ, जाया हो नंलारिआ
बैठणे जो देंदीओ तिजो पंद, पंद ओ नंलारिआ हो।
इस गीत के जरिए नंलारी की अमर प्रेम कहानी का बखान लोगों की जुबानी किया जाता है।
इस तरह से बने बिन्ने व माँजरी आज सिर्फ गाँव में ही देखे जा सकते हैं। लेकिन इस आधुनिक युग के आरामपरस्त माहौल के चलते इसे बनाने वाले हुनरमंद हाथ भी अब पीछे सरकने लगे हैं। वे अब इसके बजाय रेडीमेड बैठकु या कुर्सियाँ आदि खरीदना ही ज्यादा पसंद करने लगे हैं। गाँव में पहले बिन्ना व माँजरी बुनने का हुनर हर परिवार की औरतें जानती थींलेकिन अब यह हुनर कुछ एक औरतों तक ही सीमित रह गया है। जो इन चीजों के ज्यादा इस्तेमाल न होने के कारण जंग खाता-सा प्रतीत होता है। यह एक गंभीर चिंता का विषय है, पर बिन्ना व माँजरी बनाने में जिस मेहनत, प्यार, लगन और अपनेपन का अहसास झलकता है वह बाजार से खरीदी चीजों में कहाँ। गाँव में आज भी लड़की की शादी में घर की अन्य चीजों के साथ बिन्ने और मांजरी अवश्य ही दी जाती है।
महादेव गाँव की सौजी देवी आज भी अपने घर के लिए अपने हाथ से हर बर्ष बिन्ने व माँजरियाँ तैयार करती है। वह कहती हैं-  ‘हम चाहे मशीनों से बनी साजो-समान व आराम की कितनी भी चीजें घर में सजा लें ; लेकिन अपने हाथों से बनाई गई चीजों का कोई मुकाबला नहीं कर सकता। इन चीजों को बनाने से जहाँ खाली समय आराम से कट जाता है , वहीं अपने हुनर की क्रियाशीलता भी बनी रहती है। इस तरह की चीजों से दूर होने का साफ मतलब यह है कि हम अपनेपन से दूर भाग रहे हैं।
यह बात काफी हद तक सही भी है। पहले जब भी कोई मेहमान घर आता था तो उसे बिन्ने या माँजरी पर बिठाया जाता था। लेकिन बदलते परिवेश में इन चीजों का स्थान धरती से दो फुट ऊँची कुर्सी, बैठकु या फिर अन्य चीजों ने ले लिया है। यदि वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो बिन्ना या माँजरी में बैठकर खाने से या बैठने-उठने से शारीरिक व्यायाम हो जाता है जो स्वास्थ्य की दृश्टि से लाभदायक है। यूँ भी धरती पर भोजन करना मेज पर या खड़े होकर भोजन करने से ज्यादा बेहतर माना जाता है। तो आइए चलें, बिन्ने और माँजरी के दौर में एक बार फिर से वापिस ताकि हमारा हुनर जिंदा रह सके, स्वास्थ्य बना रहे और बची रह सकें हमारी पीढिय़ों की यादें। 
सम्पर्क: तहसील- सुन्दरनगर, जिला-मण्डीहिमाचल प्रदेश- 175018,  
मो. 098054 02242, 094185 82242, Email: chauhanpawan78@gmail.com

पर्यावरण को सहेजना हम सबकी जिम्मेदारी है

      पर्यावरण को सहेजना हम सबकी जिम्मेदारी है
     कोई और इसे बचाने नहीं आगा
                         - वैभव अग्रवाल  
राबर्ट स्वान ने कभी कहा था कि हमारे ग्रह (पृथ्वी) को सबसे बड़ा खतरा, हमारी इस मानसिकता से है कि कोई और इसे बचा लेगा। ये कथन हमारे लिए चेतावनी के साथ साथ सलाह भी है कि हम सब मिल कर ही अपने ग्रह पृथ्वी को बचा सकते है। ये हम सब का दायित्व है कि पृथ्वी के वातावरण को बचाने में हम सब सहयोग दे, चाहे छोटा सहयोग या बड़ा। क्योंकि कहा भी गया है कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता।
जैसा सुकरात ने कहा है कि वो ही अमीर है जो प्रकृति के संसाधनों का कम से कम उपयोग करता हैअर्थात हमें अपनी आवश्यकता अनुसार ही प्रकृति के संसाधनों का उपयोग करना चाहिए। जैसे कि हम व्यर्थ में पेड़ ना काटें, जल व्यर्थ ना करें, वायु को कम से कम प्रदूषित करें, विद्युत् का उपयोग आवश्यकता अनुसार करे। वैसे भी कहा गया है कि प्रकृति हमार। हमारे प्राचीन ऋषि- मुनियों ने प्रकृति के महत्त्व को समझा था इसी लिए हमारे भारत में नदियों, वृक्षों, पर्वतों को देवता स्वरुप मानकर उनकी पूजा करते थे ताकि हम उन्हें गन्दा एवं अपवित्र ना करें।
आजकल हम देख रहे है कि पृथ्वी के संसाधनों का बहुत दुरुपयोग हो रहा है। आजकल दिखावे की प्रथा दिन पर दिन बढ़ती जा रही है। जहाँ हम एक कार में  5-6 लोग जा सकते है ; वहीं पर हर आदमी शान के लिए अलग गाड़ी का प्रयोग कर रहा है। और तो और शहरों में लोग सैर के लिए भी शहर से दूर गाडिय़ों में जाते हैं ; क्योंकि अंधाधुँध आधुनिकरण ने शहरों में स्वच्छ वायु वाला स्थान ही नहीं छोड़ा। ज्यादा मोटर गाडिय़ों से सड़क पर यातायात अवरुद्ध हो जाता है और दुर्घटनाओं की संख्या में बहुत बढ़ोतरी हो रही हैं। पेट्रोल की खपत दिन- पर- दिन  बढ़ रही है जिससे वायू प्रदूषण बढ़ रहा है। पर्यावरण खऱाब हो रहा है जिसके कारण तरह तरह के रोग बढ़ रहे हैं ।
आजकल हम देख रहे है कि विवाह, जन्मदिन आदि समारोह में भी खाने कि बहुत ज्यादा बरबादी हो रही है। एक ही समारोह में 10-15 तरह के व्यंजन बनते है और अंतत: बहुत ज्यादा अन्न व्यर्थ जाता है। अन्न को उगाने में कितनी मेहनत, खाद, पानी, समय और बिजली आदि लगते हैं, तो किसान ही जानता है और हम उसको कितनी आसानी से बरबाद कर देते हैं। एक तरफ तो विश्व में अनेकों लोग भूख से मर रहे हैंं और एक तरफ अन्न की बरबादी बहुत ही तकलीफदेह है। भगवान कृष्ण ने भी दौपदी को अक्षय पात्र के एक चावल के दाने से अन्न का महत्त्व समझाया था। अत: हम सबको अन्न व्यर्थ ना करके उसका सदुपयोग करना चाहिए ; जिससे हमारा पर्यावरण भी सुरक्षित रहेगा।
अभी कुछ समय पहले भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने स्वच्छ भारत की योजना चलाई है। स्वच्छ भारत की योजना केवल सरकार के प्रयासों से सफल नहीं हो सकती। जब तक प्रत्येक नागरिक इसमें अपना सहयोग नहीं देगा तब तक ये योजना सफल नहीं हो सकती। स्वच्छता से ही हम पृथ्वी को बचा सकते है। स्वच्छता होगी तो कई बीमारियाँ तो वैसे ही समाप्त हो जाएगी जिन पर हमें और सरकार को बहुत सा धन खर्च करना पड़ता। वो ही धन अगर देश के विकास में लगे तो कितना अच्छा हो। सभी नीरोग जीवन जिएँ। स्वच्छता तब ही होगी , जब हम ठीक से कचरे का प्रबन्धन रेंगे। कम से कम कचरा पैदा करेंगे और उस कचरे का दोबारा अन्य कामों में प्रयोग करेगे। इससे हमारे पर्यावरण की सुरक्षा होगी और हमारी पृथ्वी सुन्दर होगी।
आजकल विभिन्न देशों में हथियारों की होड़ लगी हुई है। ऐसे ऐसे घातक हथियार विकसित किए जा रहे है जो पृथ्वी को नष्ट कर सकते है। एक तरफ तो हम दूसरे ग्रहों पर जीवन की संभावना तलाशते हुए घूम रहे हैं और दूसरी तरफ हम अपनी स्वर्ग से भी सुन्दर पृथ्वी को बरबाद करने पर तुले हुए हैं जो हम सबको जीवन देती है। ये कैसी विडम्बना है?
अभी पिछले दिनों देश में सूखे जैसे हालत हुए, हमने देखा कि महाराष्ट्र, बुंदेलखंड आदि जगहों पर लोगों के लिए पीने तक का पानी नहीं था और दूसरी तरफ हम पानी को व्यर्थ करते रहते हैं। ये हम सबका कर्तव्य है कि हम पानी का संरक्षण करे और उसका सदुपयोग करे;क्योकि जल ही जीवन है।
जैसे जैसे द्योगीकरण हो रहा है वायु प्रदूषण बढ़ रहा है, नदियों का पानी दूषित हो रहा है, जंगल के जंगल काटे जा रहे है। जिससे पर्यावरण को भयंकर नुकसान हो रहा है। इसका एकमात्र विकल्प है कि हम ज्यादा से ज्यादा वृक्ष लगाये।
अंधाधुध द्योगीकरण से विश्व का तापमान साल दर साल बढ़ रहा है जिसके कारण ग्लेशियर पिघल रहे है। समुद्र का जल स्तर बढ़ता जा रहा है जिससे कई द्वीप तो समुद्र में पहले ही  समा चुके है। कई जीव जंतु विलुप्त हो चुके हैं।
कुल मिलाकर देखा जाये तो स्थिति बहुत भयावह है।  अगर हम अभी भी सचेत नहीं हुए तो हमारा भविष्य अंधकारमय ही है। हम अपने ग्रह पृथ्वी को तब ही बचा सकेगे; जब हर व्यक्ति अपना कर्तव्य समझकर तथा छोटी- छोटी बातों पर ध्यान देकर प्रकृति के स्रोतों की रक्षा करेगा और उनका सदुपयोग करेगा। ऐसे समय में राबर्ट स्वान का ये कथन कि हमारे ग्रह (पृथ्वी) को सबसे बड़ा खतरा, हमारी इस मानसिकता से है कि कोई और इसे बचा लेगाबहुत सार्थक लगता है। हम सबको मिलजुल कर अपने ग्रह पृथ्वी को बचाना है कोई दूसरा इसे बचाने नहीं आयेगा।
सम्पर्क- 181/ lll स ला ई ट, लोंगोवाल जिला संगरूर, 148106, Email- aggarwalramnik@gmail.com

धरोहरः छत्तीसगढ़ की महानदी

          अति पुण्या चित्रोत्पला
                     - प्रो. अश्विनी केशरवानी
 मानव सभ्यता का उद्भव और संस्कृति का प्रारम्भिक विकास नदी के किनारे ही हुआ है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में नदियों का विशेष महत्त्व है। भारतीय संस्कृति में ये जीवनदायिनी माँ की तरह पूजनीय हैं। यहाँ सदियों से स्नान के समय पाँच नदियों के नामों का उच्चारण तथा जल की महिमा का बखान स्वस्थ भारतीय परम्परा है। सभी नदियाँ भले ही अलग अलग नामों से प्रसिद्ध हैं लेकिन उन्हें गंगा, यमुना, सरस्वती, नर्मदा, महानदी, ताप्ती, क्षिप्रानदी के समान पवित्र और मोक्षदायी माना गया है। कदाचित् इन्हीं नदियों के तट पर स्थित धार्मिक स्थल तीर्थ बन गये..। सूरदास भी गाते हैं:
हरि-हरि-हरि सुमिरन करौं।
हरि चरनार विंद उर धरौं।
हरि की कथा होई जब जहाँ,
गंगा हू चलि आवै तहँ।।
जमुना सिंधु सरस्वति आवै,
गोदावरी  विलंबन लावै।
सब तीरथ की बासा तहाँ,
सूर हरि कथा होवै जहाँ।।
भारत की प्रमुख नदियों में महानदी भी एक है। इसे 'चित्रोत्पला-गंगाभी कहा जाता है। इसका उद्गम सिहावा की पहाड़ी में उत्पलेशवर महादेव और अंतिम छोर में चित्रा-माहेश्वरी देवी स्थित हैं। कदाचित् इसी कारण महाभारत के भीष्म पर्व में चित्रोत्पला नदी को पुण्यदायिनी और पाप विनाशिनी कहकर स्तुति की ग है:
उत्पलेशं सभासाद्या यीवच्चित्रा महेश्वरी।
चित्रोत्पलेति कथिता सर्वपाप प्रणाशिनी।।
सोमेश्वरदेव के महुदा ताम्रपत्र में महानदी को चित्रोत्पला-गंगा कहा गया है:
यस्पाधरोधस्तन चन्दनानां
प्रक्षालनादवारि कवहार काले।
चित्रोत्पला स्वर्णावती गताऽपि
गंगोर्भि संसक्तभिवाविमाति।।
महानदी के उद्गम स्थल को विंध्यपादकहा जाता है। पुरूषोत्तम तत्व में चित्रोत्पला के अवतरण स्थल की ओर संकेत करते हुए उसे महापुण्या तथा सर्वपापहरा, शुभा आदि कहा गया है:
नदीतम महापुण्या विन्ध्यपाद विनिर्गता:।
चित्रोत्पलेति विख्यानां सर्व पापहरा शुभा।।
महानदी को गंगाकहने के बारे में मान्यता है कि त्रेतायुग में शृंगी ऋगी का आश्रम सिहावा की पहाड़ी में था। वे अयोध्या में महाराजा दशरथ के निवेदन पर पुत्रेष्ठि यज्ञ कराकर लौटे थे। उनके कमंडल में यज्ञ में प्रयुक्त गंगा का पवित्र जल भरा था। समाधि से उठते समय कमंडल का अभिमंत्रित जल गिर पड़ा और बहकर महानदी के उद्गम में मिल गया। गंगाजल के मिलने से महानदी गंगा के समान पवित्र हो गयी। कौशलेन्द्र महाशिवगुप्त ययाति ने एक ताम्रपत्र में महानदी को चित्रोत्पला के नाम से संबोधित किया है:
चित्रोत्पला चरण चुम्बित चारुभूमो
श्रीमान कलिंग विषयेतु ययातिषुर्याम्।
ताम्रेचकार रचनां नृपतिर्ययाति
श्री कौशलेन्द्र नामयूत प्रसिद्ध।।
17 वीं शताब्दी के महाकवि गोपाल ने भी महानदी को अति पुण्या चित्रोत्पलामाना है:
पाप हरन नरसिंह कहि बेलपान गबरीस,
अतिपुण्या चित्रोत्पला तट राजे सबरीस।
इसी प्रकार स्कंध पुराण में पुरूषोत्तम क्षेत्रकी स्थिति को स्पष्ट करने के लिए महानदी को माध्यम बनाया गया है:-
ऋषिकुल्या समासाद्या दक्षिणोदधिगामिनीम्।
स्वर्णरेखा महानद्यो मध्ये देश: प्रतिष्ठित: ।।
अर्थात् पुरूषोत्तम क्षेत्र स्वर्णरेखा से महानदी तक विस्तृत रूप से फैला है, उसके दक्षिण में ऋ षिकुल्या नदी स्थित है।
महानदी के सम्बंध में भीष्म पर्व में वर्णन है जिसमें कहा गया है कि भारतीय प्रजा चित्रोत्पला का जल पीती थी। अर्थात् महाभारत काल में महानदी के तट पर आर्यो का निवास था। रामायण काल में भी पूर्व इक्ष्वाकु वंश के नरेशों ने महानदी के तट पर अपना राज्य स्थापित किया था। मुचकुंद, दंडक, कल्माषपाद, भानुमंत आदि का शासन प्राचीन दक्षिण कोसल में था। डॉ.विष्णुसिंह ठाकुर लिखते हैं: 'चित्रोत्पलाशब्द में दो युग्म शब्द है-चित्र और  उत्पल । उप्पल का शाब्दिक अर्थ है- नीलकमल, और चित्रा गायत्री स्वरूपा महाशक्ति का नाम है। चित्रा को ऐश्वर्य की महादेवी भी कहा जाता है। राजिम क्षेत्र कमल या पद्मम क्षेत्र के रूप में विख्यात् है। राजिम को श्री संगमकहा जाता है। श्रीका अर्थ ऐश्वर्य या महालक्ष्मी जिसका कमल आसन है। महानदी के तट पर श्रीसंगमराजिम में स्थित विष्णु भगवान का प्रतिरूप राजीवलोचनया राजीवनयन विराजमान हैं।  राजीव का अर्थ भी कमल या उप्पल होता है। यहां स्थित कुलेश्वर महादेवउत्पलेश्वर कहलाते हैं। शब्द कल्पदुम के अनुसार महानदी के उद्गम को पद्माकहा गया है- सा पद्मया विनिसृता राम पुराख्याग्रामात पश्चिम उत्तर दिग्गता।
मार्कण्डेय और वायु पुराण में महानदी को 'मंदवाहिनी' कहा गया है और उसे शुक्तिमत पर्वत से निकली बताया गया है। लेकिन महानदी धमतरी जिलान्तर्गत सिहावा (नगरी) से निकलकर 858 कि. मी. की दूरी तय करके बंगाल की खाड़ी में गिरती है। यह नदी छत्तीसगढ़ और उड़ीसा की सबसे बड़ी और प्राचीन नदी है। इस नदी के उपर गंगरेल और हीराकुंड बांध बनाया गया है। इन बाँधों के पानी से लाखों हेक्टेयर भूमि की सिंचाई होती है, साथ ही बुरला-संबलपुर में बिजली का उत्पादन भी होता है। महानदी के रेत में सोना मिलने का भी उल्लेख मिलता है। इस नदी में अस्थि विसर्जन भी होता है। गंगा के समान पवित्र होने के कारण महानदी के तट पर अनेक धार्मिक, सांस्कृतिक और ललित कला के केंद्र स्थित हैं। सिरपुर, राजिम, मल्हार, खरौद, शिवरीनारायण, चंद्रपुर और संबलपुर प्रमुख नगर हैं। सिरपुर में गंधेश्वर, रूद्री में रूद्रेश्वर, राजिम में राजीव लोचन और कुलेश्वर, मल्हार पातालेश्वर, खरौद में लक्ष्मणेश्वर, शिवरीनारायण में भगवान नारायण, चंद्रचूड़ महादेव, महेश्वर महादेव, अन्नपूर्णा देवी, लक्ष्मीनारायण, श्रीराम लक्ष्मण जानकी और जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा का भव्य मंदिर है। गिरौदपुरी में गुरू घासीदास का पीठ और तुरतुरिया में लव कुश की जन्म स्थली बाल्मिकी आश्रम स्थित था। इसी प्रकार चंद्रपुर में माँ चंद्रसेनी और सलपुर में समलेश्वरी देवी का वर्चस्व है। इसी कारण छत्तीसगढ़ में इन्हें काशी और प्रयाग के समान पवित्र और मोक्षदायी माना गया है। शिवरीनारायण में भगवान नारायण के चरण को स्पर्श करती हुई रोहिणी कुंडहै जिसके दर्शन और जल का आचमन करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। सुप्रसिद्ध प्राचीन साहित्यकार पंडित मालिकराम भोगहा इसकी महिमा गाते हैं:
रोहिणि कुंडहि स्पर्श करि चित्रोत्पल जल न्हाय।
योग भ्रष्ट योगी मुकति पावत पाप बहाय।।
प्राचीन कवि बटुकसिंह चौहान ने तो रोहिणी कुंड को ही एक धाम माना है। देखिए एक बानगी:
रोहिणी कुंड एक धाम है, है अमृत का नीर,
बंदरी से नारी भई, कंचन होत शरीर।
जो कोई नर जाइके, दरशन करे वही धाम,
बटुक सिंह दरशन करी, पाये पद निर्वाण।।
भारतेन्दु युगीन रचनाकार पंडित हीराराम त्रिपाठी शिवरीनारायण माहात्म्यमें लिखते हैं:
चित्रउतपला के निकट श्री नारायण धाम।
बसत सन्त सज्जन सदा शिवरिनारायण ग्राम।।
ऐसे पवित्र नगर शिवरीनारयण, जांजगीर-चाम्पा जिलान्तर्गत महानदी के तट पर स्थित है और 'गुप्तधाम' कहलाता है। इसे छत्तीसगढ़ का प्रयाग और जगन्नाथ पुरी भी कहा जाता है। माघ पूर्णिमा को प्रतिवर्ष यहाँ भगवान जगन्नाथ पधारते हैं। इस दिन महानदी स्नान कर उनका दर्शन मोक्षदायी होता है। इसी प्रकार राजिम में भगवान राजीव लोचन का दर्शन साक्षी गोपालके रूप में किया जाता है। खरौद में भगवान लक्ष्मणेश्वर का दर्शन काशी के समान फलदायी होता है। इसी प्रकार चंद्रपुर की चंद्रसेनी और संबलपुर की समलेश्वरी देवी का दर्शन शक्ति दायक होता है।
प्राचीन काल में महानदी व्यापारिक संपर्क का एक माध्यम था। बिलासपुर और जांजगीर-चांपा जिले के अनेक ग्रामों में रोमन सम्राट सरवीरस, क्रोमोडस, औरेलियस और अन्टीनियस के शासन काल के सोने के सिक्के मिले हैं। इसी प्रकार महानदी सोना और हीरा प्राप्ति के लिए विख्यात् रही है। आज भी सोनाहाराजाति के लोग महानदी के रेत से सोना निकालते हैं। सोनपुर नगर का नामकरण सोना मिलने के कारण है। संबलपुर के हीरकुंड क्षेत्र में हीरा मिलने की बात स्वीकार की जाती है। वराहमिहिर की बृहद संहिता में कोसल में हीरा मिलने का उल्लेख है जो शिरीष के फूल के समान होते हैं:- 'शिरीष कुसुमोपम च कोसलम्Ó मिश्र के प्रख्यात् ज्योतिषी टालेमी ने कोसल के हीरों का उल्लेख किया है। रोम में महानदी के हीरों की ख्याति थी।.... तभी तो पंडित लोचनप्रसाद पाण्डेय छत्तीसगढ़ की वंदना करते हुए लिखते हैं:
महानदी बोहै जहाँ होवै धान बिसेस।
जनमभूम सुन्दर हमर अय छत्तीसगढ़ देस।।
अय छत्तीसगढ़ देस महाकोसल सुखरासी।
राज रतनपुर जहाँ रहिस जस दूसर कासी।।
सोना-हीरा के जहाँ मिलथे खूब खदान।
हैहयवंसी भूप के वैभव सुजस महान।।
कहा गया है कि महानदी के जल का स्पर्श करके पितृ देवों का तर्पण करना चाहिए। ऐसा करने से उन्हें अक्षय लोकों की प्राप्ति होती है और उसके कुल का उद्धार हो जाता है। सुप्रसिद्ध कवि बुटु सिंह चौहान भी गाते हैं:
दोहा  
शिव गंगा के संगम में, कीन्ह अस पर वाह।
पिण्ड दान वहाँ जो करे, तरो बैकुण्ठ जाय।।
चौपाई
वहां स्नान कर यह फल होई।
      विद्या वान गुणी नर सोई।।
एक सौ पितरन वहां पर तारे।
      पितरन पिण्ड तहां नर पारै।।
गाया समान ताही फल जानो।
      पितरन पिण्ड तहां तुम मानो।।
मानो पितर गाया करि आवे।
      पितरन भूरि सबै फल पाये।।
जो कोई जायके पिण्ड ढरकावहीं।
      ताकर पितर बैकुण्ठ सिधावहीं।।
दोहा
क्वाँर कृष्णो सुदि नौमि के, होत तहाँ स्नान।
कोढ़िन को काया मिले, निर्धन को धनवान।।
महानदी गंग के संगम में, जो किन्हे पिण्ड कर दान।
सो जैहैं बैकुण्ठ को, कहीं बुटु सिंह चौहान।।
शिवरीनारायण में महानदी के तट पर स्थित माखन साव घाट और राम घाट में अस्थि विसर्जन के लिए कुंड बने हुए हैं। माखन साव घाट में रेत के नीचे दबे चट्टान में भी एक अस्थि विसर्जन के लिए कुंड है लेकिन यह कुंड रेत के हटने के बाद दृष्टिगोचर होता है। कदाचित यही कारण है कि यहाँ सज्जनों का वास है जो सदा हरि कीर्तन में रत रहते हैं। भारतेन्दुकालीन कवि पंडित हीराराम त्रिपाठी भी गाते हैं:
दोहा
चित्रउतपला के निकट श्रीनारायण धाम।।
बसत सन्त सज्जन सदा शिवरीनारायणग्राम।। 1 ।।
सवैया
होत सदा हरिनाम उच्चारण रामायण नित गान करैं।
अति निर्मल गंगतरंग लखै उर आनंद के अनुराग भरैं।
शबरी वरदायक नाथ विलोकत जन्म अपार के पाप हरैं।
जहाँ जीव चारू बखान बसैं सहजे भवसिंधु अपार तरैं।।
महानदी से संस्कारित मेरी यह काया शिवरीनारायण और छत्तीसगढ़ का ऋणी है। जब भी मैं महानदी घाटी के ग्राम्यांचलों में चित्रित भित्ति चित्र को देखता हूँ ,तो पत्रकार भाई श्री सतीश जायसवाल की बात याद आती है। इसे उन्होंने महानदी घाटी की सभ्यता’  कहा है। कदाचित् महानदी छत्तीसगढ़ और उड़ीसा की सांस्कृतिक परम्परा को जोड़ने का एक माध्यम है। छत्तीसगढ़ शासन द्वारा महानदी के तट पर स्थित राजिम, सिरपुर, खरौद, चंद्रपुर और शिवरीनारायण जैसे अनेक नगरों को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने का निर्णय उचित और स्वागतेय है।             सम्पर्क: राघव’, डागा कालोनी, चांपा- 495671 (छत्तीसगढ़)
Email: ashwinikesharwani@gmail.com

संस्मरण

 ज़बान सँभाल के 
  - प्रियंका गुप्ता  
बहुत पुरानी कहावत है...ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोए...औरन को सीतल करे, आपहुँ सीतल होए...। वैसे कहावत तो ये कटु बोली के लिए कही गई है, पर अगर किसी की बोली तो मधुर हो, पर अपनी भुलक्कड़ आदत के चलते वो अक्सर गड़बड़ियाँ करता रहे, तो ऐसे में कौन सी कहावत कही जानी चाहिए...?
बात मैं यहाँ अपनी माँ की कर रही...। मेरी माँ, यानी कि प्रेम गुप्ता मानी’...उनके हिसाब से नहीं, पर मेरे और बाकी भी कइयों के हिसाब से लब्ध-प्रतिष्ठित लेखिका...। जब वो लिखती हैं, तो कुछ नहीं भूलती...पर जब बतियाती हैं ,तो अक्सर कब कहाँ, क्या भूल जाएँ...कोई भरोसा नहीं...। एक टॉपिक से शुरू हुई बात बीच रास्ते में कौन से भूले-बिसरे टॉपिक की किस मंजिल पर जा पहुँचे, इसका भी कोई भरोसा नहीं...। अक्सर उनसे बात करते समय मुझे बीच में हिसाब लगाना पड़ता है कि चीन के रास्ते पर चले थे, अचानक जापान कैसे आ गया...? जब वो अपनी यादें आपके साथ बाँटती हैं, तो तैयार रहिए...कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा...भानुमती ने कुनबा जोड़ा...कहावत को बीच-बीच में बुदबुदाते रहने के लिए...। बातों तक तो तब भी ठीक है, उन्हें आप छूटा सिरा पकड़ा दीजिए, तो वो सही दिशा में चलने लगेंगी...पर शक्लें भूलने का क्या कीजे...? जब तक वो किसी को जल्दी-जल्दी आठ-दस बार मिल न लें...हर बार उससे नए सिरे से परिचय पूछ सकती हैं...। मिलने वाला  कई बार हैरान-परेशान...। अभी तो उस दिन अपने घर में इतने अच्छे से स्वागत किया था...आज फिर...आप कौन...? यकीनन ऐसे में उसको हम आपके हैं कौनकी बड़ी याद आती होगी...? या याद करने को कोई और भी पिक्चर याद आ जाती हो...क्या मालूम...? मैने कभी पूछा नहीं...।
अमूमन सावधानीवश अब वो हर नए मिलने वाले को इस बारे में बता देती हैं...अगर अगली बार न पहचानूँ, तो प्लीज...खुद परिचय दे दीजिएगा...। अब घर का दरवाजा बाद में खोलती हैं, आने वाला खुद ही एक बड़ी- सी मुस्कराहट के साथ बोल देता है...नमस्ते, मैं फलाँ-फलाँ...। हाँ, कुछ लोग जो नहीं वाकिफ़ थे, उनकी इस बात से, वो हमेशा के लिए बुरा भी मान चुके हैं...।
चेहरा भूलना भी चलो ठीक...होता है...पर ये जो मौके-बेमौके ज़बान फिसल जाती है, उसका क्या करूँ...? जाने कौन से ग्रह हैं उनके, वो बिना सोचे-समझे अक्सर कोई ऐसी बात बोल जाती हैं जो किसी और सन्दर्भ में किसी और पर बड़े ही भयानक ढंग से फिट बैठ जाती है...। कुछ ऐसी ही बातें आज भी जब याद आती हैं तो हँसते-हँसते पेट में बल पड़ जाता है...। कुछ नमूने आपके साथ भी बाँट रही हूँ, ताकि जब आप उनसे मिलें और ऐसे कुछ हादसे आपके साथ भी हो जाएँ, तो कृपया हँसने में हमारा साथ अवश्य दें...।
सबसे पहली घटना जो याद आ जाती है, वो तब की है जब मैं सात-आठ साल की या शायद उससे भी छोटी थी। हम लोगों ने दूसरा मकान लिया था किराए का...। उस समय मेरी तबियत बहुत खराब हो गई थी। हमारी मकान-मालकिन को जब पता चला, तो वो नीचे आई मुझे देखने, कुछ हाल-चाल लेने...। खाने में मैं वैसे ही माशा अल्लाह थी, बीमारी में तो जैसे पूरा उपवास कर लेती थी। सो आण्टी ने बड़े गम्भीर भाव से कहा- इसे दूध में कच्चा अण्डा डाल कर दो...बहुत ताकत आएगी...।
माँ उनसे बात करते-करते मुझे अपने हाथ से खिलाने में भी लगी थी। उन्होंने भी उतने ही गम्भीर भाव से कहा- नहीं भाभी जी, नहीं पिएगी...। उल्टी कर देगी सब...अण्डे में लाश होती है न...।
आण्टी इस अचानक हुए करमचंदीय रहस्योघाटन से दुविधा में पड़ गई। शायद अगर उस समय करमचन्द आता होता या वो देखती होती तो पक्का वो कहती, यू आर जीनियस...। पर दुविधा बहुत गहरी थी। माँ खाने के लिए मेरा मनौना करने में लगी थी और आण्टी इस सोच में थी कि शायद माँ चूजे के लिए द्रवित हैं...। सो उन्होंने ही हल निकाला- नहीं, चूज़े वाला लाने की क्या ज़रूरत है...। फार्म वाला लाओ न...उसमें से लाश नहीं निकलेगी...।
माँ को अब तक याद भी नहीं रहा था कि क्या हुआ...। सो उन्होंने आण्टी से भी ज्यादा भौंचक तरीके से उनकी ओर देखा...। बाद में कई दिनों तक दोनों एक-दूसरे की मानसिक अवस्था को लेकर समान रूप से संशय में रही...। पर आखिरकार मामला सा हुआ और ये घटना आज तक दोनों लोगों के बीच पारिवारिक मनोरंजन का साधन बनती है...।
दूसरी घटना इसके कुछ साल बाद की है...। इस बार हादसे का शिकार हुए पापा के एक सहकर्मी, जो इत्तफ़ाक से एक अच्छे समीक्षक भी हैं। यथार्थकी गोष्ठी में एक-दो बार आ भी चुके थे। पापा का एक्सीडेण्ट हुआ था, अस्पताल में ये अंकल पापा को देखने आए...। जितनी इज्जत से वो पेश आ रहे थे, उससे ज्यादा खातिरदारी (अपने स्वभाव के अनुसार) करने में माँ जुट गई थी। पर किसी को बहुत परेशान करना माँ को कभी पसन्द नहीं रहा, सो बार-बार एक बात उन्हें खटक रही थी, सो कहे बिना चैन नहीं मिला- भाई साहब, आज फिर से क्यों परेशान हुए इतनी दूर से...। कल तो आप देख ही गए थे न...।
अंकल थोड़ा सोच में पड़ गए...। उन्हें याद नहीं आ रहा था कि कहीं इस दुनिया में उनका कोई जुड़वा भी है, जिसके बारे में उनको भी नहीं पता। फिर पूरी तरह से सोच-विचारकर  उन्होंने कहा- नहीं मानी जी, मैं तो कल नहीं आया था...। वो तो सोच-विचार कर बोले, माँ ने बिना सोचे-विचारे पापा की ओर देख कर दिल के उद्गार प्रकट कर दिए- अच्छा, लेकिन ऐसे ही तो काले से थे...। 
यहाँ पर एक बात स्पष्ट कर दूँ...। माँ के दिल की इस भावना के पीछे किसी भी तरह का रंगभेद, जातिभेद या यहाँ-वहाँ का कोई भी भेदभाव नहीं था...। उस दिन वाले और उससे भी एक दिन पहले वाले, दोनो अंकल थोड़े से रंग के मामले में समान थे, और शक्ल...नाम सब भूल जाने वाली मेरी माताजी को अचानक कोई और समानता नहीं याद आई अपना ये संशय दूर करने के लिए...।
उस समय तो अंकल सनाका खा गए। अपने रंग-रूप को लेकर शायद पहले कभी उन्हें इतना नहीं सोचना पड़ा होगा, जितना उस दिन...। हाँ, यह बात और है कि वक़्त बीतने के साथ उन्हें माँ की इस आदत का पता चल गया और आज भी उनसे हम सब के मधुर और पारिवारिक सम्बन्ध हैं।
तीसरा हादसा कानपुर के कथाकार दीप अंकल के साथ हुआ। वो यथार्थकी गोष्ठियों में तो नियमित रूप से आते ही थे, पारिवारिक रूप से रविवार को आने वाले कुछ गिने-चुने लेखकों में भी वो शामिल हो चुके थे। एक दिन वो जब आए, माँ ने कचौरियाँ बनाई हुई थी। माँ की  मेहमाननवाज़ी बहुत प्रसिद्ध हुआ करती थी। सो लाज़िमी था कि दीप अंकल को भी कचौरियाँ ऑफ़र की जाती। प्लेट परोसकर उनके आग्रह पर माँ भी ड्राइंगरूम में बैठ गई...। मैं उस दिन साहित्यिक बातचीत में शामिल होने के मूड में नहीं थी, कोई मज़ेदार कॉमिक्स पढ़ रही थी शायद...। माँ ने अंकल के लिए पानी लाने को कहा, पर उम्र के हिसाब से मुझे कॉमिक्स छोडऩा गवारा नहीं था। सो उठकर बाहर बरामदे में आ गई। माँ कुछ पल तो धैर्य से प्रतीक्षा करती रही, पर जब इंतज़ार बर्दाश्त से बाहर हो गया तो बड़े ही गुस्से में उन्होंने ज़ोरदार आवाज़ लगाई- दीऽऽऽप, डिम्पल के लिए पानी लाओ...। (यहाँ बता दूँ, डिम्पल मेरा घरेलू नाम है...।) दीप अंकल बेचारे हाथ का कौर हाथ में ही थामे बैठे रह गए। उनको ज़रा भी अन्दाज़ नहीं था कि चार कचौरियों के बदले उनसे
बेगार भी करवाई जा सकती है...। बेगार भी कोई ऐसी-वैसी नहीं, सीधे बच्ची के लिए पानी लाना...उफ्फ़...। बाहर मैं भी कॉमिक्स छोड़ उछल चुकी थी। जल्दी से दौड़कर पानी ले आई। हमेशा की तरह मम्मी को नहीं पता चला कि उन्होंने आवाज़ लगाई भी तो किसे लगाई...। वो अब भी आग्रह कर रही थी- दीप जी, एक कचौरी और ले लीजिए...। पर दीप अंकल किसी तरह राज़ी नहीं हुए। चार कचौरी के बदले पानी मँगवा रही थी, ज्यादा खिलाकर जाने पूरे दिन की नौकरी न करवा लें...। बाद में फ़ुर्सत में उनसे भी मामला साफ़ किया गया...। बरसों बाद जाकर उन्होंने फिर से एक दिन खाना खाने की हिम्मत दिखाई, पर सौभाग्यवश कुछ गड़बड़ नहीं हुई...। मैंने पहले ही पानी-वानी लाकर रख दिया था।
ऐसे हादसे तो बहुत हुए, पर एक बार जो हुआ, उससे सच में एक रिश्तेदार ऐसा बुरा मान गए कि लाख कहने के बावजूद लौटकर नहीं आए आज तक...। हुआ यूँ कि एक गर्मी की भरी दोपहरी पापा के एक दूर के रिश्ते के भाई हमारे घर अचानक आ गए। उस दिन नल न आने से पानी की भयानक तंगी हो गई थी। सारा काम फैला पड़ा था। ज़रूरत वक्त के लिए माँ रसोई के एक कोने में जितने भी संभव हो पाते, उतनी चीजों में पानी का स्टॉक रखती थी। सुबह से बाकी पानी तो इस्तेमाल हो चुका था, बस एक बड़े से टब में पानी भरा था। जाने कहाँ से दुर्भाग्य का मारा एक चूहा उसमें आत्महत्या कर बैठा। माँ नाश्ता बनाने रसोई में आई ही थी कि मैंने उन्हें चूहे के अवसान की दु:खद ख़बर दे दी। सारी बुरी स्थितियों से झल्लाई माँ ने बड़ी तल्ख़ी से कहा- आज वैसे ही सुबह से पानी नहीं आया, इसको भी अभी ही आकर मरना था...।
चूहे के लिए कही गई वो बात किराये के उस छोटे मकान में गूँजती-सी मेहमान के कानों तक भी पहुँच गई थी शायद...। उन्होंने जाहिर तो नहीं किया, पर लाख आग्रह करने के बावजूद वे बिना कुछ खाए-पिए, माँ को अपने अप्रत्याशित व्यवहार से हैरान-परेशान छोड़ कर चले गए। बहुत दिन बाद जब किसी और के माध्यम से यह बात पता चली, तब भी माँ को सब याद दिलाने में मुझे बहुत मेहनत करनी पड़ी थी, क्योंकि अपनी आदत से मजबूर माँ सब कुछ भूल चुकी थी।
आज हालाँकि माँ की यह आदत बहुत हद तक कम हो चुकी है, पर आज भी अगर कभी कोई नया परिचित घर आने वाला होता है या फिर किसी से उनकी फोन पर बात करवानी होती है, तो मैं पहले ही उनसे हाथ जोड़कर विनती कर देती हूँ...माते...कृपया ज़बान सँभाल के...।
सम्पर्क: एम.आई.जी.-292, कैलाश विहार,आवास विकास योजना संख्या- एक, कल्याणपुर, कानपुर- 208017 (उ.प्र.)      

चल पड़े हैं

  चल पड़े हैं
- मंजूषा मन  

चल पड़े हैं हम भँवर में
काग़जों की नाव ले।

राह में काँटे बिछे हैं
हम हैं नंगे पाँव ले।

फ़ौज तूफानों की आए
चाहे मेरे सामने,
कोई न साथी सर में
आये मुझको थामने।
अब चलो तन्हा चलें हम
आप अपने घाव ले।
चल पड़े है.....

काग़जों की कश्तियों का
क्या भरोसा हम करें,
ज़िन्दगी होती यही है
क्यों भला हम ग़म करें।
स्वप्न को नौका बना चल
हौसलों का ताव ले।
चल पड़े हैं हम भँवर में
काग़जों की नाव ले।

सम्पर्क: म्बुजा सिमेंट फॉउनडेशनग्राम पोस्ट रवान, ,   
जिला बलौदा बाजार, छत्तीसगढ़ -493331