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Mar 1, 2026

अनकहीः विरोध प्रदर्शन की यह कैसी परंपरा?

डॉ. रत्ना वर्मा
जब हम किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर होने वाली घटना की बात करते हैं, तो बात केवल एक कार्यक्रम या कुछ लोगों की हरकत तक सीमित नहीं रहती। वह सीधे-सीधे देश की छवि से जुड़ जाती है। हाल में एआई समिट के दौरान जो फूहड़ प्रदर्शन हुआ, उसे देखकर एक सामान्य नागरिक के मन में यही सवाल उठता है- क्या विरोध जताने का यही तरीका बचा है? क्या कपड़े उतारकर या मंच की मर्यादा तोड़कर अपनी बात रखना हमारी परंपरा है?
हम सब जानते हैं कि भारत में विरोध दशाने की परंपरा कोई नई परंपरा नहीं है। यहाँ आंदोलन हुए, धरने हुए, जेल यात्राएँ हुईं। हमारे स्वतंत्रता आंदोलन में विरोध की सबसे सशक्त धारा सत्याग्रह रही, जिसका नेतृत्व महात्मा गांधी ने किया। उनका विरोध तीखा था, पर शालीन और संयमित उद्देश्य स्पष्ट था।  यही परंपरा लोकतंत्र की आत्मा है- विचारों का टकराव, पर आचरण में मर्यादा। जो आज के लोगों में तो है ही नहीं।

 पर उनमें भी एक सीमा होती थी। लोग अपनी बात पर अडिग रहते थे; पर व्यवहार में एक शालीनता, एक मर्यादा दिखाई देती थीं। आज अगर किसी को सरकार की नीति से शिकायत है, किसी निर्णय पर गुस्सा है, तो विरोध जताना उनका लोकतांत्रिक अधिकार है; पर सवाल यह है कि क्या उस विरोध को इस तरह कपड़े उतारकर दिखाना जरूरी है कि पूरी दुनिया उसे देखे और भारत के बारे में गलत धारणा बनाए?

एआई समिट कोई सामान्य राजनीतिक सभा नहीं थी। वहाँ दुनिया के कई देशों के प्रतिनिधि, विशेषज्ञ और निवेशक मौजूद थे। ऐसे मंच पर अगर कोई समूह अचानक अशोभनीय तरीके से प्रदर्शन करे, तो चर्चा मुद्दे से हटकर उसी घटना पर आ जाती है। तकनीक, विकास और सहयोग की बात पीछे छूट जाती है और सुर्खियाँ बनती हैं- “भारत में ऐसा हुआ।” यह चिंता की बात है।

कुछ अख़बारों ने लिखा कि यह सीमित लोगों का प्रदर्शन था, इसे बढ़ा-चढ़ाकर राष्ट्रीय संकट की तरह पेश नहीं करना चाहिए। उनकी बात में भी एक तर्क है। किसी देश की छवि इतनी कमजोर नहीं होती कि कुछ लोगों के व्यवहार से हमेशा के लिए खराब हो जाए। दूसरी ओर कई अख़बारों और चैनलों ने इसे शर्मनाक बताया और कहा कि अंतरराष्ट्रीय मंच की गरिमा का ध्यान रखा जाना चाहिए था। सच शायद इन दोनों के बीच कहीं है। घटना छोटी हो सकती है, पर मंच बड़ा था; इसलिए असर भी बड़ा लगा।

अब सवाल उठता है- क्या केवल गिरफ्तारी, धरपकड़ और सजा देने से बात खत्म हो जाएगी? कानून अपना काम करेगा, करना भी चाहिए। अगर किसी ने नियम तोड़े हैं तो कार्रवाई होना स्वाभाविक है। पर क्या इससे सोच बदल जाएगी? अगर राजनीतिक दल अपने कार्यकर्ताओं को यह नहीं समझाएँगे कि देश की छवि सबसे ऊपर है, तो ऐसी घटनाएँ फिर हो सकती हैं।

हम अक्सर कहते हैं कि देश की संस्कृति महान है; पर संस्कृति केवल त्योहार मनाने से नहीं दिखती, वह सार्वजनिक व्यवहार में भी दिखती है। जब हम वैश्विक मंच पर होते हैं, तो हम किसी एक पार्टी या नेता का नहीं, पूरे भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे होते हैं। ऐसे में थोड़ा संयम, थोड़ा धैर्य, थोड़ा सोच-विचार बहुत मायने रखता है।

यह भी सही है कि लोकतंत्र में विरोध को देश विरोधी कह देना भी ठीक नहीं। हर असहमति राष्ट्रद्रोह नहीं होती। सरकार की आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है; पर उसी तरह यह भी सही है कि विरोध के नाम पर ऐसा व्यवहार, जो देश को असहज स्थिति में डाल दे, वह भी ठीक नहीं कहा जा सकता। दोनों पक्षों को संतुलन सीखना होगा।

मीडिया की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण है। अगर हर घटना को सनसनी बनाकर दिखाया जाएगा, तो वह और फैलती है। कभी-कभी संयमित रिपोर्टिंग भी देशहित में होती है। वहीं राजनीतिक बयानबाजी से आग और भड़कती है। एक घटना को लेकर दिनों तक आरोप-प्रत्यारोप चलते रहते हैं और असली मुद्दे पीछे छूट जाते हैं।

हम आम नागरिक के तौर पर क्या चाहते हैं? बस इतना कि अगर आपकी किसी बात पर असहमति है, तो उसे दर्शाने का तरीका मर्यादित हो; ताकि दोनों पक्षों की गरिमा भी बनी रहे। देश की छवि किसी दल की जीत या हार से बड़ी है। दुनिया हमें हमारी उपलब्धियों से पहचाने, न कि हमारे विवादों से।

शायद हमें फिर से अपने आप से पूछना चाहिए- क्या हम ऐसी राजनीति चाहते हैं, जिसमें ध्यान खींचने के लिए किसी भी हद तक जाया जाए? या हम ऐसी राजनीति चाहते हैं, जिसमें विचारों की टकराहट हो; पर आचरण में शालीनता हो? अगर हम दूसरी राह चुनें, तो लोकतंत्र भी मजबूत होगा और देश की प्रतिष्ठा भी बढ़ेगी।
आखिरकार देश हम सबका है। सरकारें आती-जाती हैं, पार्टियाँ बदलती रहती हैं, नेता बदलते रहते हैं; पर देश की छवि और सम्मान महत्त्वपूर्ण हैं। इसलिए जब भी हम किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर खड़े हों—चाहे सरकार की तरफ से हों या विरोध में- यह याद रखना चाहिए कि हम सबसे पहले भारतीय हैं। बाकी सब उसके बाद।

एक और बात, यदि भारत से बाहर के कुछ देशों में टकराव हो, तो उसकी प्रतिक्रिया में देश की सम्पत्ति में आग लगा देना सरासर देशद्रोह है। इस तरह के  नकारात्मक आन्दोलनजीवियों को कठोरतम सजा मिलनी चाहिए।

1 comment:

  1. Anonymous02 March

    रत्ना जी आपने एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय पर लेखनी चलाई है । सरकार और सरकार की नीतियों पर सवाल उठते हैं, उठने भी चाहिएँ।सहमत होना या न होना विपक्ष का अधिकार है, लेकिन असहमति या विरोध का तरीक़ा मर्यादित होना चाहिए, आचरण में शालीनता होनी चाहिए।पर आज न तो मर्यादा रह गई है और न शालीनता। विरोध नीतियों का न रहकर व्यक्ति का होने लगा है। अंतर्राष्ट्रीय मंच पर ऐसी अशोभनीय हरकतों से देश की छवि और सम्मान को धूमिल करने वालों को सज़ा तो मिलनी ही चाहिए ताकि फिर कोई ऐसी ओछी हरकत न करे। समसामयिक सम्पादकीय। साधुवाद सुदर्शन रत्नाकर । होली के पावन पर्व की हार्दिक बधाई

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