November 24, 2012

पर्व- संस्कृति



तीन दिन का महापर्व देवारी
-डॉ.  परदेशीराम वर्मा
गुसाई तुलसीदास जी ने लंका विजय के बाद श्रीराम के अवध आगमन पर उल्लास का अद्भुत चित्र खींचा है।
नाना भाँति सुमंगल साजे, हरषि नगर निसान बहु बाजे।
छत्तीसगढ़ ही नहीं, देश के सभी प्रांतों में न केवल नगर बल्कि गाँव-गाँव दीपावली में उल्लास का ऐसा ही वातावरण रहता है। छत्तीसगढ़ में दीपावली त्योहार, विशेषकर गाँवों में देखते ही बनती है। यूँ समझिए कि दशहरे के बाद लगातार दीवाली की प्रतिदिन तैयारी चलने लगती है। घरों की छबाई, छुई से पुताई से लेकर सफाई का काम लगातार चलता है। एक दिव्य रोशनी जल उठती है, दियों के भीतर। यह रोशनी लगातार प्रकाशमान होकर सुरहुती अर्थात गौरा-गौरी पूजन के दिन पूरे प्रभाव के साथ परिव्याप्त होती है।
दशहरे के बाद गाँवों में अगासदिया (आकाश दीप) टाँगने की परंपरा आज भी यथावत है। मान्यता है कि भगवान श्रीराम जब रावण वध कर अयोध्या लौटे तो अवध में श्रीराम की विजय को दीपोत्सव के माध्यम से सबने अविस्मरणीय बनाने का प्रयास किया। एक दिव्य परम्परा इस तरह शुरू हुई। दिये न केवल जमीन पर जले बल्कि अगास (आकाश) में भी जलाकर टाँगे गए। बाँस के सहारे दिये को एक विशेष प्रकार के सज्जित बेदी में सजाकर ऊपर ले जाया गया। घर-घर में ऊपर बाँस की पुलगी पर टँगा यही आकाशदीप छत्तीसगढ़ी में अगासदिया कहलाता है। यह अगासदिया जठौनी अर्थात देव-उठनी तक उसी तरह रोज रात को ऊपर आसमान में जलता है।
अगासदिया दशहरा के दूसरे दिन से जलता है, उसी तरह इसी दिन से कार्तिक स्नान भी शुरू होता है। गाँव में कार्तिक स्नान 40 दिन तक चलता है। इसमें 5 दिन कुवाँर के, तीस दिन कार्तिक के एवं 5 दिन अगहन के होते हैं। यह 40 दिन स्वास्थ्य की दृष्टि से भी बेहद महत्त्वपूर्ण माने गए हैं। ऋ षियों और पुरखों ने इसी ढंग से इन परम्पराओं को निर्धारित किया है।
इसी बीच में दीपावली का पर्व आता है। ठीक बीसवें दिन उसके बाद बीस और स्नान का समय रहता है।
दीपावली के तीनों दिन गाँवों में लगातार नाचने-गाने, मिलने-जुलने के होते हैं। दीपावली से जो महाउल्लास का वर्ष प्रारंभ होता है वह लगातार चलता है। होली तक इसी तरह उल्लासमय वातावरण बना रहता है। दीपावली फिर जेठौनी और फिर गाँव-गाँव मेला मड़ई।
इस दोहे में इसका सुन्दर वर्णन है.......
आवत देवारी लुहि लुहिया, जाबत देवारी बड़ दूर।
जा-जा देवारी अपन घर, फागुन उड़ावै धूर।।
देवारी तिहार: तीन दिन का महापर्व
दीवाली त्योहार को छत्तीसगढ़ी में देवारी तिहार कहते हैं।
छत्तीसगढ़ में दीवाली का त्योहार तीन दिनों का होता है। और यह महज रोशनी का त्योहार बनकर नहीं आता बल्कि यादों के चिराग को रोशन करने का अवसर बनकर आता है। परम्परा है कि छत्तीसगढ़ी व्यक्ति दीवाली में सौ योजन लाँघकर भी अपने गाँव जरूर पहुँचता है। शहर में जा बसा बड़ा से बड़ा व्यक्ति अगर दिवाली में अपने मूल गाँव में गैरहाजिर रहा तो समझिए साल भर उसे उलाहना किसी न किसी माध्यम से मिलेगा- 'अब तो तुमन बड़े आदमी हो गेव ग, गाँव ल भुला देवÓ। इस उलाहने के डर से भी शहरी मनुष्य गाँव जरूर पहुँचता है।
सुरहुत्ती अर्थात लक्ष्मीपूजन का पहला दिन गाँव के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है। शाम होते न होते गाँव के बेटे पहुँचने लगते हैं। अब तो हर गाँव में कारों से आने वाले सपूत भी पाये जाने लगे हैं। अलबत्ता हर गाँव में घर के आगे चौंरा बनाने और बढ़ाने की गंवइहा प्रवृत्ति के कारण उनकी कारें घरों तक नहीं पहुँच पा रही हैं। लेकिन गाँव का बेटा कार वाला हो गया है, इस सुख को वे लोग भी महसूस करते हैं जिनके घरों में बेकार जवान बेटे बैठे-बैठे बुढ़ा रहे हैं। शाम ढलते ही जगमग-जगमग माटी के गोड़ी दिये जलने लगते हैं।
सुरहुत्ती अर्थात दीप पर्व के प्रथम दिन गीत गूँज उठता है गाँव में...
करसा सिंगारौं मइया रिगबिग रिगबिग
यह करसा गौरा पूजा का करसा होता है जिसे इसर राजा अर्थात भगवान शिव की अभ्यर्थना के पर्व गौरा-गौरी पूजा के अवसर पर गोंड़ समाज की बहनें अपने भाई के घर आकर तैयार करती हैं। छत्तीसगढ़ में गौरा-गौरी की पूजा गाँव के गोंड़ पारा के गौरा चौंरा में सप्ताह भर पहले शुरू हो जाता है। वे बाजे-गाजे के साथ मिट्टी लाने जाते हैं। उसी मिट्टी से कलाकार शिव-पार्वती अर्थात गौरा-गौरी की मूर्ति बनाता है। इसमें मुखाकृतियाँ नहीं होती; बल्कि प्रतीक के रूप में गौरा-गौरी को पघराया जाता है। पन्नियों से सजी गौरा-गौरी की पिढु़ली देखते ही बनती है।
रात्रि के प्रथम प्रहर में गाँव भर के भक्तजन गौरा-गौरी को चौंरा में पघराते हैं। रात भर गीतों के माध्यम से आराधना की जाती है। अंतिम प्रहर में गौरा-गौरी भक्तों के सिर पर चढ़कर गाँव भर घूमते हैं। फिर उन्हें गाँव के तालाब में सिराया जाता है। दूसरा दिन राउतों का दिन होता है। साल भर जो राउत मालिकों के पशुओं को चराते हैं; उन्हें दीवाली के दिन मालिक स्वयं जाकर घर से निकालते हैं। पूरे सम्मान के साथ। बाजे- गाजे के साथ सभी राउतों को घरों से निकाला जाता है फिर, सब मिल-जुल कर गोबर-धन खुंदाने जाते हैं। गोबर के टीके लगाकर सभी छोटे बड़े एक दूसरे का जय-जोहार करते हैं और इस तरह पुन: अखाड़ची जवान अपना करतब दिखाते हुए वापस गाँव की ओर लौटते हैं।
तीसरा दिन ठेठवारों का होता है। यह मातर तिहार कहलाता है। गाँव भर के लोग मातर जमाने मैदान में जाते हैं। जहाँ पशुओं को डाँड़ खेलाया जाता है।
शाम को पुन: ठेठवारों का काछन निकलता है। मस्ती में झूमते ठेठवार मैदान की ओर जाते हैं। वहाँ ठेठवारों  और ग्वाल-बालों की ओर से मालिकों को दूध पिलाया जाता है। इसके बाद कृष्ण-लीला का अंश प्रस्तुत किया जाता है। रुष्ट इंद्र से गाँव की रक्षा करने वाले भगवान कृष्ण की लीला होती है। इन्द्र का मानमर्दन होता है और सभी मिलजुल कर गाँव लौटते हैं।
दीपावली त्योहार  में छत्तीसगढ़ अल्पवृष्टि और अतिवृष्टि की मार भी भूल जाता है। छत्तीसगढ़ विरागी जनों की धरती है। भाव में डूबे हुए संतों की धरती। लेकिन अब संतों की धरती भी अँगड़ाई ले रही है। कल तक के दोहों में मालिकों की स्तुतियाँ हुआ करती थीं; लेकिन अब राउतों के दोहों में उनकी जिन्दगी का संघर्ष और दु:ख भी प्रकट होने लगा है। व्यंग्य बने दोहे की एक झलक से हम परिवर्तन की आहट पा सकते हैं...
जेखर हाथ म लउठी भइया,
ओखर हाथ म भंइसा।
बघवा मन सब कोलिहा होगे,
देख तमाशा कइसा।
  हमारा यह रोशन प्रदेश
नए राज्य पर प्रकृति की भरपूर कृपा हो रही है। छत्तीसगढ़ आपदाओं  और प्राकृतिक प्रहार से बचा रहता है। सुरक्षित शांत यह प्रदेश अपनी विशेषताओं के कारण सबको अपनी ओर खींचता है। यह सबको आगे बढ़कर गले लगाने वालों का प्रदेश है। संभवत: इसी लिए सब इसे भी भरपूर मान देते हैं। अगर नक्सल समस्या से हमारा प्रदेश मुक्त रहता तो देश के इस अनोखे प्रदेश की गतिशीलता नया इतिहास रचती।
तमाम अंतर्विरोधों और जकड़ के बावाूद छत्तीसगढ़ प्रगति की ओर लगातार अग्रसर है। दीपावली का पर्व छत्तीसगढ़ के लिए प्रति वर्ष नई आशा का संदेश लेकर आता है। दीपावली के ठीक बाद छत्तीसगढ़ का किसान फसल काटता है। फिर उसे खलिहान लाता है। इस तरह अपने घर की कोठी तक अन्न को लाकर सहेजने का क्रम शुरू हो जाता है। दीपावली मनाता हुआ किसान खेत में लहराते धान और पशु-शाला में पगुराते अपने संगी बैल और भैंसा का भी भरपूर मान -सम्मान करता है।
साल भर में एक फसल लेने की छत्तीसगढ़ में परम्परा रही है। अल्प-संतोषी छत्तीसगढिय़ा लगातार उपार्जन कर केवल आर्थिक सम्पन्नता के लिए प्रयास नहीं करता। आज प्रदेश में धान का रकबा तो नहीं बढ़ा है; लेकिन फसल उत्पादन बढ़ गया है। गाँवों के पास तक उद्योग चले आये हैं। गाँव वाले छोटे किसान मजदूर की कमी से त्रस्त हैं। फिर भी अपनी जिजीविषा के बल पर वे धरती का उसी तरह शृंगार कर रहे हैं।
दीपावली अँधेरे से उजाले की यात्रा का पर्व है। देखें यह अर्थपूर्ण लोकरंजक पद, जिसमें दीपों की जगमगाहट है...
भाग जागे रे आगे देवारी,
गँउरा चँवरा मा कुचरागे अँधियारी।
जगमगावत हे दीया घर दुवारी,
   भाग जागे रे आगे देवारी। 

संपर्क: एल.आई.जी.-18, आमदीनगर, हुडको, भिलाई-490009, छत्तीसगढ़, मो.-9827993494, Email- harijoshi2001@yahoo.com

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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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