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Nov 6, 2023

धरोहरः कलचुरी कालीन भगवान शिव का प्राचीन मंदिर देव बलोदा


छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगभग 25 किमी की दूरी पर स्थित है देव बलोदा जो भिलाई रेलवे स्टेशन से लगभग 2 मील की दूरी है। यहाँ भगवान शिव का छह मासी प्राचीन मंदिर है। यह भी कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण सिर्फ 6 महीने में हुआ था इसीलिए इसे छह मासी शिव मंदिर भी कहते हैं। कलचुरी काल में बने ग्यारहवीं
बारहवीं शती के इस शिव मंदिर को प्राचीन स्मारक एवं पुरातात्त्विक महत्त्व का घोषित किया गया है। बलुआ प्रस्तर से बने इस मंदिर में सबसे खास बात कि इस मंदिर का शिखर ही नहीं है। इस मंदिर की तुलना भोरमदेवखजुराहो तथा अजंता की गुफाओं से भी की जाती है। नागर शैली में बने इस मंदिर में विष्णु के दशाअवतारगणेशसरस्वतीशिव-पार्वतीमहिषासुरमर्दिनी सहित पाँच पांडवभैरवकर्ण एवं अर्जुन युद्ध आदि कई विशेष प्रसंगों को मूर्तियों में दर्शाया गया है।
शिव-पार्वतीमहिषासुरमर्दिनी सहित पाँच पांडवभैरवकर्ण एवं अर्जुन युद्ध आदि कई विशेष प्रसंगों को मूर्तियों में दर्शाया गया है।
मंदिर एक ऊंची जगती पर निर्मित है। मंदिर के मंडप में प्रवेश करने के लिए सात सोपानों की व्यवस्था है। मंडप खुले रूप में है। गर्भगृह के बाहर दोनों तरफ दो आले हैं जिसमें अलग-अलग रूप में गणेश जी विराजमान हैं। स्तंभों में भी विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं। मंदिर के द्वार के ऊपर गणेश जी की मूर्ति स्थापित है और उसके ऊपर सरस्वती जी की। ऊपर की ओर सात विभिन्न देवी मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं। गर्भगृह में प्रवेश करने के लिए 5 सोपान नीचे उतरकर पहुँचा जा सकता है। जहाँ बीच में शिवलिंग प्रतिष्ठित है।
गर्भगृह के द्वार के दायीं तथा बायीं तरफ भी शिव की मूर्तियाँ उत्कीर्ण है। शिव की मूर्ति चतुर्भुजी है। एक हाथ में डमरूएक हाथ में त्रिशूलएक हाथ वरद मुद्रा में तथा एक हाथ में आयुध लिये खड़े हैं। सिर पर जटाजूट है।
कानों में कुंडलगले में हार है। पास में नंदी और नाग का अंकन है। मंदिर की बाह्य दीवारों पर एक के ऊपर एक पाँच पंक्तियों में अनेक तरह के दृश्य उत्कीर्ण है। दीवार के सबसे नीचे भाग में हाथियों का अंकन है। इनमें कहीं-कहीं दो हाथी एक दूसरे की तरफ सूँड किए हैं तो किसी दृश्य में एक के पीछे एक हाथी है तो कहीं हाथी एक दूसरे की तरफ पीठ किए हुए हैं।
मंदिर के प्रवेश द्वार पर नंदी की एक मूर्ति है। मंदिर के गर्भगृह में भूरे रंग का शिवलिंग है। मंदिर के भीतर भगवान शिवभगवान गणेश की मूर्तियों के साथ अन्य देवताओं की मूर्तियाँबाहर की दीवारों में योद्धाओं की मूर्तियाँपुरुषों और महिलाओं के नृत्य करती मूर्तियाँजानवरों की मूर्तियाँ भी शामिल हैं। एक स्थान पर रीछ का आखेट करते हुए दिखाया गया है। दीवारों में कई दृश्यों में रीछ का रूप उत्कीर्ण किया गया है जिन्हें मारने के लिए शिकारी हाथों में बरछा लिये हुए हैं। दीवारों पर अनेक मिथुन मूर्तियाँ भी दर्शायी गई हैं। घुड़सवारों के कई दृश्य हैं। एक दृश्य में दो बैलों को लड़ते हुए दिखाया गया है। एक स्थान पर शिव को त्रिशूल और डमरू लिए हुए दिखाया गया है तो गणेश नृत्य मुद्रा में हैं। एक चित्र में रथ पर सवार हाथ में धनुष-बाण लिए योद्धा का है। शिव अनेक स्थलों पर डमरूत्रिशूलकमंडल लिए अंकित है। एक दृश्य में मूर्ति में शरीर मानव का और मुख पशु का है। मंदिर के प्रवेश द्वार के सोपान के दोनों तरफ एक ही तरह के दृश्य दिखाई देते हैं। दोनों तरफ द्वारपाल का अंकन है। एक दृश्य में सोपान के दोनों तरफ पालकी कंधे पर उठाए दो व्यक्ति हैं। एक दृश्य में पालकी में बैठा व्यक्ति स्पष्ट दिखाई दे रहा हैपरंतु दूसरे दृश्य में पालकी में बैठे व्यक्ति का अस्पष्ट अंकन है। पीछे कोई खड़ा है। हर तरफ की दीवार में दो-दो आले हैंजो रिक्त हैं। तीन व्यक्तियों की दृश्यावली रोचक है मध्य में स्त्री खड़ी हैउसके दूसरी तरफ नृत्य करते हुए और एक तरफ डमरू बजाते हुए नृत्य-गान का दृश्य है। उसके पास वाले दृश्य में पाँच व्यक्ति विविध प्रकार के आयुधों को लिये हुए दिखाए गए हैं। इनमें एक का मुख अस्पष्ट है एक का सिर नहीं है। एक मूर्ति पशु पर सवार अष्टभुजी है। ज्यादातर दृश्य नृत्य-गान तथा आखेट के हैं। मंदिर के भीतर चार स्तंभों पर उत्कीर्ण मूर्तियाँ तथा प्रवेश द्वार के चौखट पर शिल्प का श्रेष्ठ काम किया गया है।
मंदिर परिसर में एक बावड़ीनुमा कुंड है। कहते
इस कुंड का पानी कभी नहीं सूखता। कुंड में नीचे जाने के लिए सीढ़ियाँ भी बनी हुई हैं। देवबलोदा के इस मंदिर प्रांगण में प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि में एक बड़ा मेला भरता है।मंदिर के बारे में कई किंवदंतियाँ प्रचलित हैं- कि मंदिर को बनाने वाला शिल्पी इसे अधूरा छोड़कर ही चला गया थाइसलिए इसका गुंबद ही नहीं बन पाया। तथा कुंड के भीतर ऐसा गुप्त रास्ता हैजो आरंग में निकलता है। मंदिर के निर्माण से जुड़ी एक कहानी यह भी है कि जब इस मंदिर का निर्माण किया जा रहा थाउस दौरान छह महीने तक लगातार रात ही थीलेकिन खगोल के इतिहास में ऐसी घटना का कहीं भी उल्लेख नहीं है।
संस्कृतिविद्‌ एवं शिक्षक रामकुमार वर्मा बताते हैं कि शायद मंदिर के निर्माण में लंबा समय लगा होगा और लोगों ने इस लंबे समय की बात को छमासी रात में बदल दिया।
मंदिर के बारे में एक दूसरी किंवदंती भी है कि जब शिल्पकार मंदिर को बना रहा थातब वह इतना लीन हो चुका था कि उसे अपने कपड़े तक की होश नहीं थी। दिन रात काम करते-करते वह नग्न अवस्था में पहुँच चुका था। उस कलाकार के लिए एक दिन पत्नी की जगह बहन भोजन लेकर आई। जब शिल्पी ने अपनी बहन को सामने देखातो दोनों ही शर्मिंदा हो गए। शिल्पी ने खुद को छुपाने  के लिए मंदिर के ऊपर से ही कुंड में छलांग लगा दी। बहन ने देखा कि भाई कुंड में कूद गया तो इस गम में वह बगल के तालाब में कूद गई। आज भी कुंड और तालाब दोनों मौजूद है और तालाब का नाम भी करसा तालाब पड़ गयाक्‍योंकि जब वह अपने भाई के लिए भोजन लेकर आई थीतो भोजन के साथ सिर पर पानी का कलश भी था। तालाब के बीचोबीच कलशनुमा पत्थर आज भी मौजूद है। कुंड के बारे में लोगों का कहना है कि इस कुंड के अंदर एक गुप्त सुरंग हैजो सीधे आरंग के मंदिर के पास निकलती है। वह शिल्पी जब इस कुंड में कूदातब उसे वह सुरंग मिली और उसके सहारे वह सीधे आरंग पहुँच गया। बताया जाता है कि आरंग में पहुँचकर वह पत्थर का हो गया और आज भी वह पत्थर की प्रतिमा वहाँ मौजूद है। इस कुंड में 23 सीढ़ियाँ है और उसके बाद दो कुएँ है। इसमें से एक पाताल तोड़ कुआँ है जिससे लगातार पानी निकलता है। ( उदंती फीचर्स)

प्रेरकः पत्थर और घी

  – निशांत

सदियों पहले किसी पंथ के पुरोहित नागरिकों के मृत संबंधी की आत्मा को स्वर्ग भेजने के लिए एक कर्मकांड करते थे और उसके लिए बड़ी दक्षिणा माँगते थे। उक्त कर्मकांड के दौरान वे मंत्रोच्चार करते समय मिट्टी के एक छोटे कलश में पत्थर भरकर उसे एक छोटी- सी हथौड़ी से ठोंकते थे। यदि वह पात्र टूट जाता और पत्थर बिखर जाते, तो वे कहते कि मृत व्यक्ति की आत्मा सीधे स्वर्ग को प्रस्थान कर गई है। अधिकतर मामलों में मिट्टी के साधारण पात्र लोहे की हथौड़ी की हल्की चोट भी नहीं सह पाते थे और पुरोहितों को वांछनीय दक्षिणा मिल जाती थी।

अपने पिता की मृत्यु से दुखी एक युवक बुद्ध के पास इस आशा से गया कि बुद्ध की शिक्षाएँ और धर्म अधिक गहन हैं और वे उसके पिता की आत्मा को मुक्त कराने के लिए कोई महत्त्वपूर्ण क्रिया अवश्य करेंगे। बुद्ध ने युवक की बात सुनकर उससे दो अस्थिकलश लाने के लिए और उनमें से एक में घी और दूसरे में पत्थर भरकर लाने के लिए कहा।

यह सुनकर युवक बहुत प्रसन्न हो गया। उसे लगा कि बुद्ध कोई नई और शक्तिशाली क्रिया करके दिखाएँगे।  वह मिट्टी के एक कलश में घी और दूसरे में पत्थर भरकर ले आया। बुद्ध ने उससे कहा कि वह दोनों कलश को सावधानी से नदी में इस प्रकार रख दे कि वे पानी में मुहाने तक डूब जाएँ। फिर बुद्ध ने युवक से कहा कि वह पुरोहितों के मन्त्र पढ़ते हुए दोनों कलश को पानी के भीतर हथौड़ी से ठोंक दे और वापस आकर सारा वृत्तांत सुनाए।

उपर्युक्त क्रिया करने के बाद युवक अत्यंत उत्साह में था। उसे लग रहा था कि उसने पुरानी क्रिया से भी अधिक महत्त्वपूर्ण और शक्तिशाली क्रिया स्वयं की है।  बुद्ध के पास लौटकर उसने सारा विवरण कह सुनाया, “दोनों कलश को पानी के भीतर ठोंकने पर वे टूट गए. उनके भीतर स्थित पत्थर तो पानी में डूब गए लेकिन घी ऊपर आ गया और नदी में दूर तक बह गया।”

बुद्ध ने कहा, “अब तुम जाकर अपने पुरोहितों से कहो कि वे प्रार्थना करें कि पत्थर पानी के ऊपर आकर तैरने लगें और घी पानी के भीतर डूब जाए।”

यह सुनकर युवक चकित रह गया और बुद्ध से बोला, “आप कैसी बात करते हैं!? पुरोहित कितनी ही प्रार्थना क्यों न कर लें; पर पत्थर पानी पर कभी नहीं तैरेंगे और घी पानी में कभी नहीं डूबेगा!”

बुद्ध ने कहा, “तुमने सही कहा. तुम्हारे पिता के साथ भी ऐसा ही होगा।  यदि उन्होंने अपने जीवन में शुभ और सत्कर्म किए होंगे, तो उनकी आत्मा स्वर्ग को प्राप्त होगी। यदि उन्होंने त्याज्य और स्वार्थपूर्ण कर्म किए होंगे, तो उनकी आत्मा नरक को जाएगी।  सृष्टि में ऐसा कोई भी पुरोहित या कर्मकांड नहीं है जो तुम्हारे पिता के कर्मफलों में तिल भर का भी हेरफेर कर सके।”

प्रकृतिः तितलियाँ क्यों हैं जरूरी

 - अपर्णा विश्वनाथ

हमारी दुनिया अद्भुत जैव विविधताओं से भरी पड़ी है, हम अपने चारों ओर विभिन्न प्रकार के पक्षी, जानवर और पेड़ पौधों से घिरे हुए हैं। जैव विविधता के संतुलन के लिए हाथी जितने महत्त्वपूर्ण हैं उतनी ही महत्त्वपूर्ण चींटियाँ हैं।

यह विविधता पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखने के लिए जरूरी तो है ही, साथ ही स्वास्थ्य पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने के लिए तथा हमारे जीवन की सम्पूर्ण आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भी उतने ही महत्त्वपूर्ण है। 

इनमें से किसी एक की भी कमी हमारे जीवन को किस हद तक प्रभावित कर सकती है यह हम जानते हुए भी या तो इस बात को नज़र अंदाज़ कर रहे हैं या फिर मतलबपरस्त मनुष्य प्रगतिशीलता में इतने खो गया है कि चाह कर भी नहीं सोच पाने के लिए विवश हो गया है।

आज हम अक्सर सुनते हैं कि फलाँ- फलाँ जीव लुप्त हो चुके हैं या लुप्तप्राय के कगार पर हैं। कुछ जीवों की कुछ प्रजातियाँ लुप्त हो चुकी हैं और कुछ ही बची हैं। । 

ऐसे ही लुप्तप्राय जीवों में तितलियों की कुछ प्रजातियाँ भी शामिल हैं। यह मुद्दा नजरअंदाज करने का नहीं है; बल्कि सोचनीय है।

सोचिए कि जिन तितलियों के पीछे भागते हुए हमारा बचपन बीता है। अब उनमें से कुछ दिखाई नहीं देती हैं, तो कुछ प्रजातियाँ ही खत्म हो गई हैं। क्या हम हमारे बच्चें या आने वाली पीढ़ियों को अधूरा पर्यावरण या एक असंतुलित पारिस्थितिकी तंत्र सौंपेंगे? ज़रा सोचिए! 

क्योंकि इनके लुप्तप्राय होने के पीछे हम मानव और हमारी विकराल रूप से बढ़ती हुई जनसंख्या है। बढ़ती जनसंख्या और मानवीय अतृप्त आवश्यकताओं ने इस कदर अपनी बाहें फैला दी कि धरती पर दूसरे जीवों के हक़ का भी ध्यान नहीं रखा है। इंसानों के बढ़ते हस्तक्षेप के बेहिसाब जंगलों का कटना, शहरों का विकास,  कीटनाशकों का प्रयोग, बेतरतीब वाहन से निकलते प्रदूषण, नदियों में मिलते खतरनाक रासायनिक पदार्थ आदि ने अनेकों जीव के आवास को क्षतिग्रस्त किया। आवास के अभाव में कई जीवों में प्रजनन क्षमता प्रभावित होते होते लुप्तप्राय के कगार पर पहुँच गए हैं।

तितलियाँ सिर्फ हमारे मनोरंजन के लिए, घर में सजाने या खेलने के लिए नहीं है, बल्कि यह हमारे पारिस्थितिकी तंत्र का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। 

यह बात हम और आप सब जानते होंगे कि कि बगैर परागकण के पौधे फल तथा बीज नहीं दे सकते। 

यह पारितंत्र की दूसरी सेवा है जो मधुमक्खी, गुंज, मक्षिका, पक्षी और चमगादड़ के अलावा तितलियों जैसे परागकणकारियों द्वारा की जाती है।

क्या आपने कभी सोचा है कि अगर यह नहीं होंगे तो परागण कौन करेगा?

इनकी अनुपस्थिति में कृत्रिम परागण की लागत कितनी आएगी?

शायद हम अंदाजा भी नहीं लगा सकते हैं। फिर भी जरूर सोचिए। 

इसके अलावा हम प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से सुन्दर तितलियों के मनमोहक रंगों और आकर्षक सौंदर्य प्रकृति का आनंद उठाते हैं। उद्यानों और वनों में घूमते हुए तरह- तरह के नायाब चीजों को देखते हैं। वसंत ऋतु में पेड़ों पर लदे हुए फूलों में इठलाती, मँडराती तितलियों को निहारते हुए, हम जिस अनुभूति से गुजरते हैं वह अवर्णनीय है। क्या इस अनुभव और आनंद की कीमत कोई लगा सकता है? शायद कभी नहीं।

वेबदुनिया.काम की एक रिपोर्ट में भारतीय प्राणी विज्ञान सर्वेक्षण के अनुसार भारत में तितलियों की 1,318 प्रजातियाँ दर्ज की गई हैं। अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आईसीयूएन) के अनुसार भारत में तितलियों की 35 प्रजातियाँ अपने अस्तित्व के लिहाज से गंभीर रूप से संकटग्रस्त हैं। 

अगर तितलियाँ पृथ्वी से खत्म हो जाएँ, तो सेब से लेकर कॉफी तक कई खाद्य फसलों के स्वाद से हम वंचित हो जाएँगे। तितलियाँ जब फूलों का रस पीकर परागण करती हैं तो फूलों का रूपांतरण फल में संभव हो पाता है। संयुक्त राष्ट्र की संस्था फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन के अनुसार दुनिया की 75 फीसदी खेती परागण पर निर्भर करती है। पर्यावरणविदों का मानना है कि तितलियों के खत्म होने का असर दूसरे जीवों पर भी पड़ सकता है; क्योंकि उनके अंडे से बने लार्वा और प्यूपा कई दूसरे जीवों का भोजन होते हैं। 

पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार हमारे आवास को रहने योग्य बनाने के लिए आसपास के वातवरण का इकोसिस्टम को बनाए रखना जरूरी है। इसके लिए जरूरी है कीट- पतंग, तितलियाँ, मकड़ियाँ जैसे कीड़े-मकोड़ों का होना। इसलिए दूसरे देशों की तरह हमारे देश में भी तितली उद्यान बनाए जा रहे हैं, ताकि स्थिर तथा निष्पक्ष इकोलॉजिकल बैलेंस बना रहे। तितलियों कि संख्या सीधे तौर जैव विविधता कि पूरक है। जितनी ज्यादा तितलियाँ हमारे आस-पास होंगी उतना ही अच्छा और मजबूत हमारा पारिस्थितिक तंत्र होगा। 

छत्तीसगढ़ में करीब किलोमीटर के दायरे में फैले कांगेर वैली नेशनल पार्क में छत्तीसगढ़ का दूसरा बड़ा तितली पार्क है, जिसे तितली जोन कहा जाता  है। यहाँ की खासियत यह है कि बारह महीनों यहाँ अलग-अलग प्रजाति के रंग-बिरंगी तितलियों को देखा जा सकता है।

खान- पानः भारी आहार तो बढ़े विकार

 – साधना मदान

बाजार और मॉल की रौनक, रामलीला की रमणीकता, मेले की चमक-दमक, बाज़ार और सड़कों पर आज एक ही लहर का बहाव है और वह है चटखारे और स्वाद की। विद्यालय काल की कक्षा में कभी एक विषय पर भाषण हुआ था- ‘भोजन जीवन के लिए नाकि जीवन भोजन के लिए’। तब तो बस अध्यापिका के बताए तथ्यों पर बेवाक बोलने का अभ्यास ही किया था, पर आज यह विषय स्वास्थ्य और सदाबहार जीवन के लिए विचारणीय है। मैंने बड़े बुजुर्गों को अक्सर यही पूछते देखा है कि खाना खाया या नहीं खाया, नहीं खाया, तो पहले भोजन कर लो। उनके नज़दीक छोटे बच्चे जाएँ, तब भी भई इनको कुछ खिलाओगी भी या नहीं। इतना ही नहीं यह कहते भी सुना जाता है कि अब शादियों के भी क्या मज़े रह गए हैं, न कुछ खा सकते हैं और न ही कुछ पचा सकते हैं। इधर युवा जिह्वा का हाल भी कुछ अच्छा नहीं।‌ देश विदेश के खाने में इंडियन चटोरापन मिला कर एक अलग ही दुनिया का मज़ा लेते हैं। फु़डीज़ की विडियोज़ की तो बात मत पूछें। यह भारी भोगी खाना और न जाने कितने तरह के स्वाद, तरीके और जीभ की ललचाती लार ने जैसे सुखद स्वास्थ्य को चिंदी- चिंदी करके अस्पताल की चौखट पर पटक दिया है।

खाने की आदतें, खाने की वैरायटी, समय बेसमय कुछ भी गटक जाना या देर रात तक की महफ़िलों में खाना और पीना पतित दुनिया से ज़्यादा दूरी पर नहीं है। अंदाज़ अपने हैं, महफ़िल मौज मस्ती है पर बेअंत व्यंजनों का बिखराव, न जाने अब क्यूँ पीड़ादायक लगने लगा है।

खाने के तौर तरीकों से जुड़ते ही मेरी जिह्वा और पाचनशक्ति का विवाद बढ़ने लगा।

जिह्वा…. बत्तीस दाँतों के बीच रहकर अपनी मनमानी करने का हक है मुझे।

पाचनशक्ति…. मनमानी करने का अंजाम कितनी बार देखोगी। खट्टी-मीठी, मिर्च मसाले और तली चीजें तो तुम्हारी दिलकश सहेलियाँ हैं । उन्हें रिझाते रिझाते खट्टे पानी के दरिया में तुम मुझे जबरन जब तक न धकेल दो तो चैन नहीं।

जिह्वा…खिलखिलाती हुई लहरों की तरह अपने मटकते लहज़े में बतियाने लगी।अब छोड़ो भी ये सब ….जब स्वयं आदमी के हाथ ही चाशनी में डूबते-उतरते हैं। जब वे मुट्ठी भर खाने को मेरे तक न लाकर ठसाठस प्लेट भर लाता हैतो भला मेरी क्या मजाल जो ओठों के द्वार से एंट्री न दूँ।

पाचनशक्ति…हम्म..तो इसका मतलब व्यक्ति की आसक्ति और अज्ञानता ही मेरे पाचन-तंत्र को आहत कर रही है।

जी हाँ…  विस्तार की नहीं, सार की आवश्यकता है। आज खाने की ललक, स्वाद की सुरा और रेहड़ी-पटरी से लेकर रेस्तरां तक लपलपाती जीभ ने ही इस अमूल्य शरीर को डॉक्टर और अस्पताल की दलदल में धकेल दिया है। जैसा अन्न वैसा मन… लगता है यह गलत है। होना चाहिए जैसा लोभ, जैसी आसक्ति,जैसी बेपरवाही वैसी तृप्ति। न जाने कितने जिम,कितनी योग शालाएँ और कितने पार्क हैं, लोग सब जगह हैं पर फिर भी ठेलेवालों की और महँगे से महँगे रेस्तरां की जो बहार है वैसा आकर्षण तो कहीं नहीं।

दोस्तों… लगता है जीवन भोजन के लिए विषय पर ज्यादा ही लेखनी फिसल गई है। सुबह से शाम तक …जी हाँ ….शाम तक (रात तक नहीं) की एक अद्भुत लाभकारी खान-पान  प्रक्रिया को अपने रोज़ की दिनचर्या में शामिल करें। अपनी भक्ति, स्वशक्ति, ध्यान योग, योगासन, ज्ञान और प्रसन्न चित्त से स्वयं को समझने का प्रयास करें। योगासन, वर्क आउट, सैर और अन्य यौगिक क्रियाएँ तभी अंजाम देंगी जब हम अपने खान-पान की समझ और नियमित  जीवन शैली पर बल दें। खान-पान को लेकर रोज़ कुछ पल अपनी दृढ़ता, अपनी सूझबूझ और नियंत्रण शक्ति से रूबरू हो जाएँ। अपनी आसक्ति जो भरे-पूरे पेट के बाद भी मेज़ पर माया बन ललचाती है। मीठे की मनाही के बाद भी भंडारा,भोग और प्रसाद के नाम पर फिसल जाती है। सड़कों पर लगी रेहड़ी-पटरी और ठेले देखते ही हम लाखों की कार में बैठे भी ललक उठते हैं।  तो ये समझते देर न लगेगी कि हालात तो अभी भी सुधरे नहीं हैं। बिगड़ती खान-पान की आदतें हमारे आलस्य और भोगी जीवनशैली की ओर इशारा करती हैं।

जब भी भरे पेट के बाद कुछ भी मुख में जाता है वैसे ही समझ में आता है यही तो लपलपाती जीभ है, यही तो कमज़ोरी है, यही तो बीमारी है, यही तो लालच है और यहीं उस पल ये सब न खाने की समझ मेरी जीत है। दिनभर के नफ़ा नुकसान का जायज़ा लेना भी आत्मनियंत्रण का ही तो नाम है। मुख का मौन वाचा से तो होता ही है पर मुख का मौन नपे-तुले भोजन को प्रसन्नता से स्वीकार करने में ही पूरा होता है। किसी की थाली में परोसे गए खाने में या यूँ कहें कि असंख्य खाद्य आकर्षण के बावजूद भी सीमित मात्रा से थाली में रखना भी ...हमारे संपूर्ण व्यक्तित्व का स्वाद दर्शा देता है। कम खाना, क्या खाना और कब-कब खाना भी मेरी आत्मिक संतुष्टि व शक्ति की छाप छोड़ता है। व्रत रखना और फिर खान-पान से दिल्लगी जैसे ये सब कुछ सटकता नहीं है। यह संतुलित आहार शैली का व्रत तो शादी में या मेले ठेले या पांच-सितारा की चमक-दमक में सदाबहार रहना चाहिए। आप स्वयं इस आत्मनियंत्रण की शक्ति से अवश्य वाक़िफ हैं। कम खाना और पौष्टिक आहार …यह पकते भोजन और कढ़ाई की कचौड़ियों से ऊपर की दुनिया का सुखद एहसास है। बस एक बात ज़हन में रहे कि उतना खाएँ कि जब तक है श्वास तब तक स्वस्थ रहें और जब भी मीठा, खट्टा, चटपटा सामने आए तो बस यही याद रहे…

रे मन! खाने की ललक से ऊपर रहूँ मैं, रे मन स्वाद के लगाव से  परे स्वस्थ रहूँ मैं  । रे मन पौष्टिकता की  थाली छप्पन भोग सी सुहाती रहे मुझे। 

संतुलित आहार खाते रहें, तो दूर होंगे सब विकार,

खान-पान अच्छा रहे, तो मन में सदैव भरें सुविचार ।

जीवन दर्शनः 9/11 और ट्वीन टॉवर : एक युद्ध आतंकवाद के विरुद्ध

  - विजय जोशी 

-  किसी भी देश में शहीदों का सम्मान सर्वोपरि होता है, फिर भले ही वह बलिदान देश प्रेम के अंतर्गत किसी युद्ध में हुआ हो या फिर मानवता को कलंकित करती किसी आतंकवादी घटना में। शहादत को प्राप्त ऐसे लोग विदेशों में तो पूजे जाते हैं और मानवता की बलिवेदी पर समर्पित उनकी शहादत का पीढ़ी दर पीढ़ी सम्मान किया जाता है। रूस में तो हर विवाहित जोड़ा सबसे पहले शहीद स्मारक पर जाकर शीश नवाकर अपनी गृहस्थी का श्रीगणेश करता है।

-  हमारे देश की आजादी में भी क्रांतिकारियों के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता, किंतु जिस सम्मान के वे हकदार थे उसे देने में हमने कोताही बरती। कृतघ्नता की जीती जागती मिसाल। बकलम श्रीकृष्ण सरल : 

शहीदों की चिताओं पर लगते नहीं मेले

वतन पे मरने वालों का नहीं बाक़ी निशाँ कोई


- खैर बात का प्रसंग यह है कि अमेरिका के न्यूयॉर्क नगर में 9/11 के ही दिन ट्विन टॉवर ब्लास्ट की आतंकवादी घटना में मानवता को शर्मसार करते हुए आतंकवादियों के एक सरगना द्वारा हजारों निर्दोष लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया था। यह इतिहास का सबसे शर्मनाक काला अध्याय है।

-  अपने अमेरिका प्रवास के दौरान उस स्थल पर जाकर न केवल मेरी आँखें नम हो गईं, अपितु जो अद्भुत हृदयस्पर्शी बात मन को गहराई तक छू गई वह कुछ यूँ थी : 

1- जिस जगह ट्विन टॉवर को ध्वस्त किया गया, अब उस स्थान पर लोगों के अवलोकन के लिए झरना युक्त विस्तृत एवं सुंदर चौकोर कुंड का निर्माण कर दिया गया है। 

2- चारों ओर लगभग 3 फीट ऊँची ग्रेनाइट युक्त पैराफिट वाल पर सभी शहीदों के नाम भी उकेरे गए हैं, ताकि लोग आज भी अपने दिवंगत संबंधियों को श्रद्धांजलि दें सकें।

3- यही कारण है कि यह स्मारक पूरे वर्ष किसी न किसी संबंधी के शहादत स्थल पर आकर फूल अर्पित प्रयोजन के माध्यम से आतंकवाद के विरुद्ध अहिंसात्मक आंदोलन का प्रतीक भी बन गया है।    

4- आश्चर्य की बात यह भी है कि यहाँ न कोई उद्घाटन नुमा शिलालेख है और न ही किसी नेता का नाम। एक ज्वलंत जाग्रत स्मारक जहाँ जाते ही असीम शांति और प्रार्थना का मन हो जाए।

-  काश राजनीति एवं स्वार्थ मुक्त ऐसी किसी परंपरा का सम्मान हम भी कर पाते और फिर से गर्व से कह पाते : 

शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले

वतन पर मरनेवालों का यही बाक़ी निशाँ होगा

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