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Nov 25, 2016

चमत्कारी रात

          एक लोककथा पर आधारित- परिवर्तित रूप में
            चमत्कारी रात
                       - गोवर्धन यादव
शरद पूर्णिमा का दिन था। चाँद अपने पूरे यौवन के साथ आकाश पटल पर चमचमा रहा था। मौसम बड़ा सुहाना हो गया था। रात के बारह बजे सारा जंगल आराम से सो रहा था। चारों ओर शांति का साम्राज्य था।
 पेड़ की एक डाल पर बन्दर और बन्दरिया बैठे जाग रहे थे और दूसरी डाल पर तोता और मैना बैठे हुए थे। यह वह समय था जब पशु-पक्षी एक दूसरे की भाषा समझते थे।
तोता बोला- मैना, रात नहीं कट रही है। कोई ऐसी बात सुनाओ कि वक्त भी कट जाए और मनोरंजन भी हो।
मैना मुस्कुराई और बोली- क्या कहूँ आप बीती या जग बीती। आप बीती में भेद खुलते हैं और जग बीती में भेद मिलते है।
 तोता होशियार था, बोला- तुम तो जगबीती सुनाओ
 मैना ने कह- आज की रात एक चमत्कारी रात है। आज ही के दिन चन्द्रमा से अमृत बरसेगा। अमृत की कुछ बूंदे कमलताल में भी गिरेगी, जिससे इसका पानी चमत्कारी गुण? से युक्त हो जाएगा। यदि कोई प्राणी आधी रात को इस कमलताल में कूद जाए तो आदमी बन जाएगा।।
 तोता बोला, क्या सचमुच में ऐसा हो सकता है।
 मैना ने कहा -जो प्रेम करते हैं, वे सवाल नहीं पूछते, भरोसा करते हैं।
तोते ने मैना से कहा- तो फ़िर देर किस बात की।
चलो हम दोनों तालाब में कूद पते हैं और आदमी बन जाते हैं।
 मैना ने कहा, 'अरे तोता, हम पंछी ही भले। अभी तू आदमी के फेर में नहीं पड़ा है, इसलिए चहक रहा है। हम अपनी ही जात में बहुत खुश हैं।
तोता-मैना की बातें बन्दर और बन्दरिया ने सुनी तो चौंक पड़े। अधीर होकर बन्दरिया ने बन्दर से कहा- साथी आओ। कूद पड़ें।
 बन्दर ने अँगडाई लेते हुए कहा- अरे छोड़ रे सखी, हम ऐसे ही खुश हैं। एक डाल से दूसरी और दूसरी से तीसरी पर छलांग मारते रहते हैं। पेड़ पर लगे मीठे-मीठे फल खाकर अपना गुजर-बसर करते हैं। न घर बनाने की झंझट और न ही किसी बात की चिन्ता। हमें क्या दुख है। अपने दिमाग से आदमी बनने का ख्याल निकाल दे।
 बन्दरिया आह भरकर बोली- ये जीवन भी कोई जीवन है? मैं तो तंग आ गई हूँ इस जीवन से। मुझे यह सब करना अच्छा नहीं लगता। आदमी की योनि में जन्म लेकर मैं दुनिया के सारे सुख उठाना चाहती हूँ। देखो, मैंने अपना मन बना लिया है और मैं अब तालाब में कूदने जा रही हूँ। यदि तुम मुझसे सच्चा प्यार करते हो तो मेरा साथ देना होगा। मैना की  बताई घड़ी बीतने वाली है, सोच क्या रहे हो, आओ पकड़ मेरा हाथ और कूद पड़ें।
 बन्दरिया की बात सुनकर बन्दर हिचकचाने लगा। बोला- तुम भी मैना की बातों में आ गयी।
 पानी में तो कूद पड़ेंगे, लेकिन किसी जहरीले साँप ने काट लिया तो मुफ़्त में जान चली जाएगी।
 बन्दरिया समझ गयी कि बन्दर साथ न देगा। घड़ी बीतने ही वाली थी। बन्दरिया चमत्कार देखने के लिए उत्सुक थी, झम्म से कमलताल में कूद पड़ी।
 आश्चर्य, बन्दरिया की जगह वह सोलह साल की युवती बन गई थी। उसके रुप से चाँदनी रात जगमगा उठी।
 डाल पर बैठे बन्दर ने जब उसका अद्भुत रूप देखा तो पागल हो उठा। उसने तत्काल फ़ैसला लिया कि वह भी कमलताल में कूदकर आदमी बन जाएगा। उसने डाल से छलांग लगाया और तालाब में कूद पड़ा, लेकिन वह शुभ घड़ी कभी की बीत चुकी थी। वह बन्दर का बन्दर ही बना रहा।
दिन निकला।
 थर-थर कांपती युवती, सूरज की गुनगुनी धूप में अपना बदन गर्माने लगी थी।
 तभी संयोग से एक राजकुमार उधर से आ निकला। उसने उस रुपवती युवती को देखा तो बस देखता ही रह गया। उसने अपने जीवन में इतनी खूबसूरत युवती इसके पहले कभी नहीं देखा थी। देर तक अपलक देखते रहने के बाद, वह उसके पास पहुँचा और अपना उत्तरीय उतारकर उसके कंधों पर डाल दिया। फ़िर अपना परिचय देते हुए  कहा हे सुमुखी। सुलोचनी। मैं इस राज्य का राजकुमार हूँ और शिकार खेलने के लिए इस जंगल में आया हूँ। इससे पहले मैंने तुम्हें यहाँ कभी नहीं देखा। तुम्हें देखकर यह नहीं लगता की तुम इस लोक की वासी हो। हे ! त्रिलोकसुन्दरी बतलाओ, तुम किस लोक से इस धरती पर अवतरित हुई हो और तुम्हारा क्या नाम है ?
एक अजनबी और बाँके युवक को सामने पाकर वह शर्म से छुईमुई सी हुई जा रही थी। शरीर में रोमांच हो आया था।
 सोचने- समझने की बुद्धि कुंठित सी हो गई थी। वह यह तय नहीं कर पा रही थी कि प्रत्युत्तर में क्या कहे। क्या उसे यह बतलाए कि कुछ समय पूर्व तक वह बन्दरिया थी और अर्धरात्रि में इस कमलताल में कूदने के बाद एक सुन्दर-सुगढ़ युवती बन गई है? देर तक नजरें नीचे झुकाए वह मौन ओढ़े खड़ी रही थी।
राजकुमार ने दोनों के बीच पसरे मौन को तोड़ते हुए कहा-  मैं भी कितना मूर्ख हूँ, जो ऐसे-वैसे सवाल पूछ बैठा।
 मुझे यह सब नहीं पूछना चाहिए था।
 देवी मा करें। मेरी एक छोटी सी विनती है, उसे सुन लीजिए।
 तुम्हारी यह कमनीय काया जंगल में रहने योग्य नहीं है। तुम्हारे ये नाजुक पैर उबड़-खाबड़ और कठोर धरती पर रखने लायक नहीं है। फ़िर जंगल के हिंसक पशु तुम्हें देखते ही चट कर जाएँगे। मैं नहीं चाहता कि तुम उनका शिकार बनो। तुम्हें तो किसी राजमहल में रहना चाहिए। तुम कब तक इस बियाबान जंगल में यहाँ-वहाँ भटकती रहोगी। मेरा कहा मानो और मेरे साथ राजमहल में चली चलो। मैं दुनिया के सारे वैभव, सुख-सुविधाएँ तुम्हारे कदमों में बिछा दूँगा। तुम्हें अपनी रानी बनाकर रखूँगा। पूरे राजमहल में तुम्हारा ही हुक्म चलेगा। देर न करो और चली चलो मेरे साथ।
शायद सच कह रहे हैं राजकुमार, अब यह कमनीय काया जंगल में रहने लायक रह नहीं गई है। उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि अब वह बन्दरिया नहीं, एक नारी बन गई है और एक नारी को अपना तन कने के लिए कपड़े चाहिए, फ़िर तन सजाने के लिए आभूषण चाहिए। अब वह पेड़ पर नहीं रह सकती। उसे रहने को घर चाहिए और भी वह सब कुछ चाहिए, जिसकी सुखद कल्पना एक नारी करती है। यह ठीक है कि उसका मन अब भी अपने प्रिय में रम रहा है, लेकिन वह उसकी आवश्यक्ता की पूर्ति नहीं कर सकता।
 उसे तो अब चुपचाप राजकुमार का कहा मानकर उसके साथ हो लेना चाहिए इसी में उसकी भलाई है।
यह सोचते हुए उसने राजकुमार के साथ चलने की हामी भर दी थी।
 घोड़े पर सवार होने के पहले उसने अपने प्रिय को अश्रुपूरित नेत्रों से देखा और हाथ हिलाकर बिदाई माँगी।
बन्दर ने देखा कि उसकी प्राणप्रिया राजकुमार के साथ जा रही है, तो उसने उन दोनों का पीछा किया।
 कहाँ घोड़े की रफ़्तार और कहाँ बन्दर की दुड़की चाल।
 भागता भी तो बेचारा कितना भागता।
 दम फूलने लगा था। आँखों के सामने अन्धकार नाचने लगा और अब मुँह से फेन भी गिरने लगा था आखिरकार वह बेहोश होकर गिर पड़ा।
संयोग से उधर से एक महात्मा निकल रहे थे। वे सर्वज्ञानी थे। बन्दर को देखते ही सारा माजरा समझ गए।
उन्होंने अपने कमण्डल से पानी लेकर उसके मुँह पर छींटे मारे।
बन्दर को होश आ गया।
 होश में आते ही बन्दर फफक कर रो पड़ा और उसने महात्माजी से अपना दुखड़ा कह सुनाया।
 महात्मा ने उसे धीरज बँधाते हुए कहा कि तुम्हें अपने साथी पर भरोसा करना चाहिए । यदि तुम भरोसा करते तो ये दिन न देखने पड़ते। खैर जो होना था, सो हो चुका। अब तुम किसी मदारी के साथ हो लो। कुछ दिन बाद तुम्हें तुम्हारी प्रियतमा मिल जाएगी।
संयोग से उधर से एक मदारी निकला। उसने बन्दर को पक लिया। अब वह गाँव-गाँव, शहर-शहर तरह -तरह के करतब दिखलाता घूमने लगा।
इधर, राजकुमार उस युवती से विवाह करने की जिद करने लगा। लेकिन उसका मन तो अब भी अपने प्रिय में ही लगा था।
 राजकुमार के प्रस्ताव को टालने के लिए उसने एक बहाना गढ़ दिया कि उसने कोई एक ऐसा व्रत ले लिया है कि जिसके चलते वह एक साल तक विवाह नहीं कर सकती। साल पूरा होते ही वह  विवाह रचा लेगी।
 राजकुमार मान गया, लेकिन वह हमेशा उदास बनी रहती। उसे उदासी में घिरा देखकर, राजकुमार को बहुत दुख होता, वह अपनी ओर से उसकी उदासी दूर करने का जितना भी प्रयास करता, लेकिन उसके चेहरे पर प्रसन्नता की झलक तक दिखला नहीं देती।
 एक दिन राजकुमार ने उससे कहा कि मैं ऐसा क्या करुं कि तुम खुश हो जाओ।
 बन्दरिया से कमलिनी बनी युवती ने कहा- राजकुमार, यदि आपके राज्य में कोई मदारी-कलावंत अथवा कोई संगीतकार अपनी कला का प्रदर्शन करने आए, तो उसे सबसे पहले मेरे महल में आकर अपनी कला का प्रदर्शन करना होगा।
 युवती की बात मानते हुए उसने पूरे राज्य में डौंडी पिटवा दी कि कोई भी कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करना चाहता है ,तो उसे सबसे पहले कमलिनी के सामने अपनी कला का प्रदर्शन करना होगा।
संयोग से वह मदारी उस राज्य में आ पहुँचा। नियम के मुताबिक उसे उस युवती के सामने अपनी कला का प्रदर्शन करना था। मदारी की रस्सी से बँधे बन्दर को देखते ही उसने पहचान लिया।
 उसने मदारी को कुछ अशर्फ़ियाँ देकर उसे खरीद लिया।
 अब वह दिन भर बन्दर के साथ रहती।
 पुराने दिनों की याद करती और अपना दुखड़ा रोती रहती।
एक दिन, तोता और मैना उड़ते हुए अटारी पर आ बैठे।
 इस समय कमलिनी आराम कर रही थी और बन्दर पास ही बैठा हुआ था।
 तोते ने मैना से कहा-सुनो। इस घड़ी कोई मर जाए और उसे नींबू के पेड़ के नीचे दबा दिया जा तो अगले जनम में वह आदमी बन जाएगा।
 इतना कहकर वे फ़ुर्र से उड गए। बन्दर ने तोते की बात सुन ली थी। उसने उसे जगाते हुए कहा कि मैं अपने प्राण त्यागने जा रहा हूँ।
 तुम मुझे नींबू के पेड़ के नीचे दफ़ना देना। अगले जनम में मैं आदमी बन जाउँगा और तुमसे विवाह रचा, लूँगा। फ़िर हम सदा-सदा के लिए एक दूसरे के हो जाएँगे। इतना कहकर उसने अपने प्राण त्याग दिए।
 राजकुमारी अगली घड़ी का रास्ता देखने लगी।
 रात आ तो उसने राजकुमार से कहा कि मेरा भी अंत समय आ गया है।
 मेरे मरने के बाद तुम मेरे शरीर को नींबू के पेड़ के नीचे दफ़ना देना।
कुछ दिनों बाद दोनों का जन्म हुआ।
 युवती ने एक ब्राह्मण के घर और बन्दर ने एक निम्न जाति के घर मे जन्म लिया।
 दोनों को अपने पूर्व जन्म का पूरा-पूरा ज्ञान था
  पड़ोस के सारे बच्चे मिलकर खेल खेलते और वह बालक अपनी देहरी पर बैठा उनके खेल देखता रहता।
 उसका भी मन होता कि वह भी बच्चों के संग खेले, लेकिन कोई उसे साथ खिलाने को तैयार नहीं होता।
 बच्चों के बीच खेलती कमलिनी उसका दर्द समझती थी, लेकिन समाज के बनाए नियमों को तोडऩे की हिम्मत उसमे न थी।
 एक दिन सारे बच्चे छिपा-छिपल्ली का खेल खेल रहे थे।
 कमलिनी को कहीं छिप जाना था और शेष बच्चों को उसे ढूँढना था।
 यह उसके लिए सुनहरा मौका था।
 उसने देहरी पर बैठे बालक का हाथ पकड़ा और पास के जंगल में जा छिपी।
 सारे बच्चे उसे दिन भर ढूँढते रहे ;लेकिन उसे कोई खोज नहीं पाया।
 वह दिन भर उसके साथ यहाँ-घूमती रही।
 ढेरों सारी बातें करती रही और अपना दुख व्यक्त करने से नहीं चूकती कि निष्ठुर समाज उन्हें कभी एक नहीं होने देगा।
शाम ढलने से पहले वह बच्चों के बीच आ पहुँची।
 सारे बच्चों को इस बात पर आश्चर्य हुआ कि आखिर वह कौनसी जगह पर जा छिपी थी।
- इस तरह दिन पर दिन बीतते रहे और वह लोगों की नजरों से छिपती-छिपाती अपने प्रिय से मिलती रही।
 लेकिन यह खेल ज्यादा दिन तक नहीं चल सका था।
 अब वह जवानी की दहलीज पर कदम रख चुकी थी।
 उसके माता-पिता ने अब उस पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए थे।
 उसका घर से बाहर निकलना तक बंद कर दिया था।
 वह दिन भर अपने घर के भीतर कैदी की भाँति रह रही थी, लेकिन उसका बावरा मन उसके अपने प्रिय के इर्द-गिर्द घूमता रहता था।
 एक दिन, मौका पाकर वह घर से भाग निकली और अपने प्रिय को लेकर जंगल की ओर निकल पड़ी।
 जंगल का एकांत उसे बड़ा प्रिय लग रहा था।
 वह उसके साथ यहाँ-वहाँ विचरती रही, ढेरों सारी बातें करती रही कि किस तरह उनका मिलन हो सकता है, पर गंभीरता से विचार-विमर्श करती रही।
 वे अच्छी तरह जानते थे कि घर से भाग जाने के बाद भी उन्हें खोज निकाला जाएगा और फ़िर उसका निर्दय समाज उनकी किस तरह की दुर्गत बनाएगा, जिसकी कल्पना मात्र से शरीर में सिहरनें होने लगती थी।
 यहाँ-वहाँ विचरते रहने के बाद वे बुरी तरह से थक गए थे और एक विशाल पेड़ के नीचे सो गए थे।
 संयोग से उधर से एक आदमी निकला जो दोनों के माता-पिता को जानता था।
 उसने उन दोनों को कई-कई बार साथ-साथ विचरते देखा था।
 दोनों को साथ सोता देखकर उसका माथा घूमने लगा था।
 उसे तो आश्चर्य इस बात पर हो रहा था कि उच्च कुल ब्राह्मण के घर पैदा हुई लड़की, एक चांडाल के लड़के के साथ आराम फ़रमा रही है।
 उसे क्रोध हो आया और वह सीधे उस ब्राह्मण के घर जा पहुँचा और जोर-जोर से चिल्ला-चिल्लाकर कहने लगा- अरे सुनते हो पंडित।
घोर कलियुग आ गया है घोर कलियुग। 
घर से बाहर निकलकर पंडितजी ने पूछा- अरे यूँ ही चिल्लाते रहोगे या कुछ बतलाओगे भी।हम भी तो सुने कि आखिर माजरा क्या है?
 उस आदमी ने सारा किस्सा एक साँस में कह सुनाया और कहा कि  तुम अभी और इसी समय मेरे साथ चलो और अपनी आँखों से देखो कि तुम्हारी लड़की उस नीच के साथ क्या गुल खिला रही है।
 सुनते ही पंडित का चेहरा क्रोध में तमतमाने लगा था।
 वह उस आदमी के साथ हो लिया।
 वहाँ जाकर उसने देखा कि उस लड़के ने अपनी बाहें फैला रखी थी और उसकी बेटी उसकी बाहों पर अपना सिर रखकर आराम से सो रही थी।
 अब पंडितजी के क्रोध का पारावार देखने लायक था।
 उसने पेड़ से एक टहनी तोड़ी और दोनों को जगाते हुए बेरहमी से पीटने लगा।
 फ़िर लड़के को हिदायत देते हुए कहा कि अगर तुम दोबारा साथ दिखे तो तुम्हारे पूरे परिवार को बस्ती से बाहर निकलवा दूँगा।
दाँत पीसते हुए उसने लड़की की बाहें पकड़ीं और लगभग घसीटता हुआ उसे लेकर अपने घर की ओर चल पड़ा।
 उस दिन के बाद से दोनों का मिलना न हो सका। बावजूद इसके वे इस प्रयास में रहते कि किसी तरह उनका मिलना संभव हो सके।
अचानक एक दिन दोनों की मुलाकात हो गई। दोनों ने तय किया कि जंगल की ओर भाग चलें और वहाँ बैठकर जी भर के बातें करेंगे। बातों ही बातों में दिन कब ढल गया और रात हो आयी, उन्हें पता ही नहीं चल पाया।
 संयोग से उस दिन शरद पूर्णिमा थी। चाँद अपने पूरे यौवन के साथ आकाश पटल पर चमचमा रहा था। तभी तोता और मैंने कहीं से उडते हुए आए और एक डाल पर बैठ गए।
 तोता बोला- मैना, कितनी सुहावनी रात है। ऐसी अद्भुत रात में भला किसे नींद आती है।
 तुम कोई ऐसी बात सुनाओ कि वक्त भी कट जाए और मनोरंजन भी हो।
 मैना मुस्कुराई और बोली- क्या कहूँ। आप बीती या जगबीती।
 आप बीती में भेद खुलते हैं और जगबीती में भेद मिलते हैं।
 तोता होशियार था, बोला - तुम तो जगबीती सुनाओ।
 मैना ने तोते से कहा- तुम्हें याद है कभी इसी पेड़ पर एक बन्दर और बन्दरिया रहा करते थे। उस दिन भी ऐसे ही अद्भुत रात थी।
 उस दिन बन्दरिया मनुष्य योनि में जन्म लेने के चक्कर में कमलताल में कूद पड़ी थी और एक सुन्दर युवती बन गई थी।
 जब  बन्दर ने देखा कि उसकी प्रियतमा नारी बन गई है, तो वह भी आदमी बनने के लालच में कमलताल में कूद पड़ा, लेकिन तब तक वह शुभ घड़ी बीत चुकी थी। वह बन्दर का बन्दर ही बना रहा।
 किसी तरह दोनों की मुलाकात तो हो गई लेकिन अलग-अलग योनियों में जन्म लेने के कारण उनका मिलन नहीं हो सकता था।
 अगले जनम में वे मनुष्य योनि में जनमे तो सही, लेकिन जात-पात के चलते उनका दुबारा मिलना असंभव सा प्रतीत होता है।
 और भविष्य में कभी हो सकेगी, इस बात की संभावना भी दिखाई नहीं देती।
 हाँ, यदि वे अपनी पुरानी योनि में फ़िर से जनम लेना चाहते हैं , तो आधी रात के वक्त कमलताल में कूद पड़ें। यदि ऐसा वे कर सके तो उनका मिलन संभव हो सकता है।
इतना कहकर तोता और मैना फ़ुर्र से उड़ गए।
सुना। सुना तुमने, मैना क्या कह रही थी ? कह रही थी कि यदि हम आधी रात के वक्त कमलताल में कूद पड़ें तो फिर से अपनी पुरानी योनि प्राप्त कर सकते है। क्या तुम मेरे साथ देने को तैयार हो?
पिछली बार तुमने मुझसे कमलताल में कूदने की जिद की थी और मैंने तुम्हारा साथ नहीं दिया था, जिसकी सजा मैं अब तक भुगत रहा हूँ।
 अब मैं तुमसे कह रहा हूँ कि चलो कमलताल में कूद पड़ते है और फ़िर से बन्दर-बन्दरिया बन जाते हैं।अधीर होकर उस युवक ने कमलिनी से कहा।
 कमलिनी इस समय गंभीरता से कुछ और ही सोच रही थी।
 शायद इसलिए उसने उसकी बातों पर ध्यान नहीं दिया था।
 वह तो इस समय, पिछले जनम की बातों को लेकर सोच रही थी कि कितनी स्वछन्दता के साथ वह अपने प्रिय के साथ रहा करती थी, जहाँ न तो जात-पात के बन्धन थे और न ही किसी बात पर टोका-टाकी। न मन में कोई चाहना और न ही कोई अभिलाषा। जब जी चाहा, वहाँ चले गए, और जब जी चाहा, वापिस हो लिये
 नाहक ही उसने मैंना की बातों में आकर मनुष्य बनने की चाहत पाल ली थी और कूद पड़ी थी ताल में।
 क्या मिला उसे मनुष्य योनि में जनम लेकर? सिवाय दुख और परेशानी के वह कुछ भी तो हासिल नहीं कर पा है अब तक।
 कमलिनी अब तक अपनी सोच के घेरे से बाहर नहीं आ पा थी, उधर युवक का दिल जोरों से धड़क रहा था।
 उसे पक्का यकीन हो चला था कि वह उसका साथ नहीं देगी।
 उसने भी तो उस समय उसका साथ देने में हिचकचाहट दिखला थी,
 यदि वह बदला लेना चाह रही है तो ठीक ही कर रही है।
 उसने किसी तरह अपने आप पर काबू रखते हुए, उसके अन्तिम फ़ैसले के बारे में जानना चाहा और उसे लगभग झझकोरते हुए पूछा- तुम कहाँ खोई हुई हो।
तुम्हें कुछ पता भी है कि मैना के द्वारा बतला गई घड़ी बीतने जा रही है और तुम हो कि अब तक फ़ैसला नहीं कर पायी।
 बोलो।  कुछ तो बोलो, आखिर क्या चाहती हो तुम।
 तुम मेरा साथ दोगी या नहीं? एक गहरी उदास भरी नजरें उसके चेहरे पर डालते हुए उसने पूछा और उसके उत्तर का इंतजार करने लगा था।
कुछ चैतन्य होते हुए उसने उस युवक का हाथ पकड़ा और तेजी से दौड़ लगाते हुए उस चट्टान पर जा खड़ी हुई, जहाँ से उसे कमलताल में छलांग लगानी थी।
सम्पर्क: 103, कावेरीनगर, छिन्दवाड़ा (मप्र) 480001
mo. 07162-246651, 09424356400

दोस्त

                दोस्त 
                       - डॉ. दीप्ति गुप्ता
आम के पेड़  का थाँवला बनाता 'गुलाब सिंह, बड़ा मगन हुआ, कुछ  गुनगुनाता सा, अपने काम में लगा हुआ था। कल से उसने लगभग सभी पेड़ों के थाँवले बनाकर, फूलों की क्यारियों की सफाई कर उनकी डौलें भी विशेष रूप से आकर देते हुए बना डाली थीं। आज आलूबुखारे के दो पेड़ों के थाँवले बनाने शेष थे। उसका जोश आसमानी पींगें भर रहा था। वह कभी बगीचे के इस कोने में कुछ सफाई करता दिखता, तो दूसरे ही पल बगीचे के दूसरे सिरे पर अंगूर की बेल को सुलझाता हुआ, आम के तने पर उसकी फुनगियों और पत्तों को ठीक से बैठाता नजर आता। कभी वह एकाएक गायब हो जाता। न इधर नजर आता, न उधर और कभी सहसा ही घनी झाडिय़ों में से पत्तों को खड़खड़ाता प्रट हो जाता। वह माली कम, पेड़ अधिक लगता था- एक चलता-फिरता, हरा-भरा, खिला-खिला, झूमता पेड़! मैंने पेड़-पौधों  का ऐसा  दोस्त, उनसे  इतना अधिक लगाव रखने वाला माली इससे पहले नहीं देखा था। पेड़, पौधों, फूलों में जैसे उसके प्राण बसते थे। इसलिए ही अक्सर मुझे वह पेड़, पौधों और फूलों का प्रतिरूप नजर आता था। खाने पीने की सुध-बुध खोए, जिस तल्लीनता से वह बगीचे में लगा रहता था, उससे वह कभी-कभी मेरे लिए खीझ का कारण भी बन जाता; क्योंकि मुझे उसकी चिन्ता सताती थी कि यदि इसी तरह वह अपनी ओर से लापरवाह रहा, तो शीघ्र ही उसका शरीर जवाब दे जाएगा। एक दिन तो मुझे उस पर इतना क्रोध आया कि मेरा मन किया कि मैं उसे बगीचे में ही एक पेड़ के पास खड़ा करके, चारो ओर थाँवला बनाकर रोप दूँ, उसे वहीं जमा दूँ। क्योंकि शाम के 5 बजे तक उसका खाना बासी होकर, चींटियों की भेंट चढ़ गया था; कपड़े में लिपटी मोटी-मोटी रोटियाँ सूखी कड़क हो गई थी। जब चम्पा किसी काम से, उसके पास गई तो पता चला कि गुलाब सिंह को रोटी खाने की सुध ही नहीं रही और खाना चींटियों की और कुछ चिड़ियों, कौवों की दावत बन गया।
गुलाब सिंह’  का नाम उसके पिता गेंदा ने बड़े चाव से रखा था। जिस दिन वह पैदा हुआ था, ठीक उसी दिन उनके झोपड़े के पीछे की बाड़ी में एक बहुत ही सुन्दर लाल गुलाब खिला था। धरती पर एक साथ दो फूल खिले थे उस दिन! इधर घर में गेंदे के प्यारे बेटे  गुलाब’  ने अपनी नन्ही- नन्ही जुगनू -सी आँखें खोली, उधर बाड़ी में गुलाबने अपनी पँखुडिय़ाँ खोली।
बस, उस दिन से ही वह गुलाब के नाम से पुकारा जाने लगा।
  मैंने बालकनी में कॉफी पीते हुए, गुलाब सिंह की 17 वर्षीय बेटी चम्पा को इशारे से अपने पास बुलाया और खोजबीन करनी चाही कि 'बात क्या है जो गुलाब सिंह जी इतने कूदे-कूदे बगीचे में फिर रहे हैं? यूँ तो रोज ही बगीचे के लिए उसके सेवा भाव में कोई कमी नहीं रहती, पर आज तो सेवा भाव सवासेर बढ़ा चढ़ा है।
 चम्पा ने उचक कर आँखो से बापू की, बालकनी से दूरी की तहकीकात की और फिर रहस्य का पर्दाफाश करती बोली - कल दो नए फूल के पौधों –सूरजमुखीऔर डेहलिया’ - दोनों पर फूली-फूली कलियाँ जो निकल कर आईं है, वे खिलेगीं। बापू उसी की तैयारी में लगा है।’        
 ओह सहसा ही मेरे मुँह से निकला और मैं उत्सुक्ता से भरी, वह सोचने लगी कि कल गुलाब सिंह क्या करेगा? क्योंकि उस तरह की तैयारी मेरे लिए अचरज की ही बात थी। इससे पहले, ट्रान्सफर होकर, मैं जहाँ भी गई और जो भी माली मुझे मिले, मैंने उन्हें फूलों के खिलने पर, कुछ तैयारी करते कभी नहीं देखा था। सो मेरे लिए तो गुलाब सिंहऔर उसकी तैयारियाँलगभग एक अजूबे की तरह थीं। तभी चम्पा पलट कर मेरे पास आई और मुझे सचेत करती बोली -
आप बापू से मत बोलना कि मैंने आपको कुछ बताया। बापू ने घर में भी सबको बोल रखा है कि किसी से कुछ नहीं कहना है। बस, ‘खुसीकी खबर, उसी दिन सबको मिलेगी, जिस दिन खुसीकी बात होगी। वरना सबकी नजर लग जागी पौधों को।
अच्छा ऐसा क्या? बापरे, बड़ा ज्ञानी है तेरा बापू तो’ - मेरे यह कहने पर, चम्पा गुलाबसिंह की तारीफ सुन हाँकहती, खुशी से सिर हिलाने लगी। अपने पिता के ज्ञान पर सकारात्मक रूप से सिर हिलाकर, पक्की मुहर लगाने वाली चम्पा की भोली हरकत पर, मैं खिलखिला कर हँस पड़ी। मेरे हँसने पर उस नादान को लगा कि उसने कोई बड़ी अच्छी हँसी की बात कही है तो वह भी मेरे साथ हँसने लगी। फिर तो मेरी हँसी का ठिकाना ही नहीं रहा।
अगले दिन सुबह 6 बजे क्या देखती हूँ कि गुलाब सिंह एक थाली में हल्दी, कुंकुम, धूपबत्ती, छोटे-छोटे बताशे और पेड़े रखे, मुझे प्रसाद देते हुए; प्रफुल्लता से भरा 'सूरजमुखीऔर डेहलियाके खिलने का शुभ समाचार कुछ इस अन्दाज में मुझे दे रहा था- जैसे धरती ने फूलों को नहीं, वरन् दो नन्हे मुन्ने बच्चों को जन्म दिया हो! मुझे सच में उस पर गर्व हुआ। इसे कहते हैं सम्वेदनशीलता, इसे कहते हैं निष्ठा, लगन, सच्चा प्यार! गुलाब सिंह की सम्वेदनशीलता ने तो फूलों-पौधों में मानो दुगुनी जान डाल दी थी। आज जहाँ लोग इंसान को इंसान नहीं समझते, परस्पर नारकीय व्यवहार करते हैं, वहीं उसी दुनिया में रहने वाला, भौतिक दृष्टि से विपन्न, भावों और सम्वेदनाओं से सम्पन्न, गुलाब सिंह इतना उदात्त मनस है कि फूलों का जन्मोत्सव  मनाता है। बाकायदा हल्दी, कुंकुम और अक्षत से पूजा-अर्चन कर, उनका स्वागत करता है, सबका मुँह मीठा कराता है। उसकी यह सीधी सादी मिठाई उस महँगी, सुसज्जित मिठाई से चौगुनी मीठी और पवित्र भाव पूरित है, जो बेमन से लोग खास-खास मौंकों पर एक दूसरे को  दिखावे की होड़  में देते हैं।                  
 *          *             *                                      आज दीपावली है। माधवीबाई ने घर की जम कर साज सफाई की है। बिजलीवाला घर के बाहर, दरवाजों और खिड़कियों पर नन्हे-नन्हे बल्बों की रंग बिरंगी लड़ें टाँग रहा है। मैंने गुलाबसिंह को एक अप्रत्याशित खुशी देने के लिए बगीचे की झाडिय़ों और पेड़ों पर भी बल्बों की रंगीन लडिय़ाँ लगाने का विशेष आदेश बिजली वाले को दिया है। गुलाबसिंह भी आज अपने घर की सफाई और सजावट के लिए 12 बजे तक बगीचे में सफाई करके व पानी वगैरा देकर चला गया और शाम को फिर छ- सात बजे तक घर के मुख्य द्वार पर फूलों की माला व कमरे में ताजे फूलों के गुलदस्ते सजाने आगा। उस समय रंगीन बल्बों की लडिय़ों से जगमगाते बगीचे के पेड़ों और झाडिय़ों को देखकर गुलाब सिंह के चेहरे की चमक, उसकी खुशी को वह देखना चाहती है। गुलाब सिंह को उस खुशी के रूप में मानो वह दीपावली का तोहफा देना चाहती है। लीक से हट कर ऐसा तोहफा, जो उस अनूठे इंसान के  तन-मन में उत्फुल्लता और सच्ची खुशी के दीप जला दे।          
शाम ठीक छ बजे गुलाब सिंह फूलों की मालाओं के साथ हाजिर हो गया। फूलों और मालाओं से घर को सजाते-सजाते  एक घण्टे  से ऊपर बीत गया। जैसे ही अँधेरा घिरना शुरू हुआ, मैंने लड़ियों के दोनों स्विच दबा दिए। सारा घर और घर के साथ बगीचा भी झिलमिल लडिय़ों से झलमला उठा। गुलाब सिंह तो अपने प्यारे बगीचे को यूँ चकमक, लकदक खूबसूरती से भरा देख, हक्का-बक्का सा रह गया। उससे  खुशी के  मारे न  हँसते  बन पड़ा, न  ही कुछ  बोल उसके मुँह से निकले। बौराया-सा बगीचे में इस पेड़ से उस पेड़, इस क्यारी से उस क्यारी के पास, उस जगमग सौन्दर्य को निहारता घूमता रहा। किन्तु वह अपनी ओर से कुछ अजूबा न करे, भला ऐसा कैसे हो सकता था? अपने साथ लाए, मालाओं के थैले में से उसने दिए, बत्ती और सरसों के तेल की शीशी निकाली और हर क्यारी व पेड़ के पास एक-एक दिया रखकर, एक जलती हुई मोमबत्ती से उन्हें दीपित कर, बगीचे की साज सज्जा को चौगुना करने में तल्लीन हो गया। हाथ जोड़े खुशी से भरा, मेरे पास आकर, मेरे पैरों को श्रद्धा से छूता हुआ बोला -
दीदी जी, आपने तो बगिया को दुल्हिन जैसा सजा दिया। क्या सुन्दर दिख रही है बगिया! बस एक दो फोटू खिंच जाते तो, सदा के लिए याद रह जाती।मुझे उसका सुझाव भा गया। मैंने एक-दो नहीं, बल्कि उसकी कई सारी फोटो बगीचे में खींच डाली। उसके बाद से तो फोटो का विचार ऐसा उसके मन में ऐसा घर कर गया कि वह जब-तब फूल खिलने पर, फल आने पर वह अपनी फोटो खिंचवाता।
जनवरी की कड़ाकेदार सर्दी थी। मैं शॉल में लिपटी किसी काम से बाहर आई तो क्या देखती हूँ कि गुलाब सिंह एक पेड़ के नीचे बैठा रो रहा है खामोश गर्दन झुकाए, आँसू पोंछता, सुबकता, सबसे बेखबर कपड़े से मुँह ढके, चुपचुप रोए जा रहा है। मैंने तुरन्त, उसके पास पहुँच कर, प्यार से पूछा – क्या बात है गुलाब सिंह? घर में सब ठीक तो है?’
वह चौंकता हुआ, धीरे से बोला –जी हाँ दीदी।
तो फिर रो क्यों रहे हो? -  मैंने पूछा।
पहले तो खामोश रहा, फिर अपने को सम्हालते हुए, आसूँ छिपाते हुए बोला –दीदी जी, बगीचे में तीन पौधे मर गए है। हमने तो पूरी तरह उनकी देखभाल की थी, पर पाले ने उन्हें मार डाला।
मैं इधर उधर नजर दौड़ाती बोली -कहाँ है, कौन से पौधे? दिखाओ तो!
तो जवाब में मुँह लटकाए वह बोला –उन्हें तो हमने दफ़ना भी दिया। हम उन्हें उखाड़कर कूड़े कचरे की तरह नहीं फेंकते। जहाँ मिट्टी में उन्हें दबाया है, अब वहाँ कुछ दिन बाद, हम नई पौध लगायेंगे। जब तक वहाँ नए पौधे नहीं जम जाएँगे, तब तक हमें कल नहीं पड़ेगी।
मैंने एक गहरी निश्वास के साथ गुलाब सिंह को समझाने का प्रयास किया कि वह इस तरह रो-रो कर दुखी न होए। ऐसे रोने से मरे हुए पौधे जि़न्दा थोड़े ही हो जाएँगे! धैर्य रखे और खिले फूल, हरे-भरे पौधों  में अपना ध्यान बटा। फिर भी उसकी उदासी नहीं गई। वह मेरे कहने से भारी कदमों से खुरपी हाथ में लिए उठा और क्यारियों की निराई करने लगा। मैं पोर्च की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए सोचने लगी कि यह गुलाब सिंह भी सच में अनोखा ही व्यक्तित्व है, बड़ा ही भला और प्यारा इंसान है। माली तो बहुतेरे मिले, पर गुलाब सिंह जैसा न तो कभी मिला और न ही भविष्य में कहीं मिलेगा। तन, मन से प्रकृति को समर्पित! उसके आँसू, उसकी मुस्कान, उसकी उदासी, उसकी खुशी सब इन पेड़ पौधों और फूलों में समा है। उसकी तो दुनिया इन्हीं में बसी है। कोई पौधा मर जाता है या सूख जाता है तो मिनटों में उसकी दुनिया उजड़ी, उखड़ी हो जाती है। वाह रे, भोले, सरल मनस गुलाब सिंह, तू धन्य है, महान है! मानवता का जीता जागता रूप है, प्यार की प्रतिमूर्ति है, प्रकृति के प्रति समर्पण की प्रतिकृति है, इसके प्रति अनूठे लगाव का प्रतिरूप है !
 *       *        *                                        
भीषण गर्मी ने बड़ी क्रूरता से समूची सृष्टि के मानो प्राण ही खींच लिये थे। पंछी बेजान से तपती दोपहरी में अपने घोंसलों में मुँह डाले पड़े थे। निरीह पशु बेसुध से जगह-जगह पेड़ों की, घरों की छाँह में दयनीय से बैठे थे। हरी, रेशमी घास, गर्मी की तपिश से सूखी और बदरंग नजर आने लगी थी। सभी बौराए से लगते थे। अगर नहीं बौराया था, तो वह था- फलों का राजा आम। अमरायाँ रसीले, पके आमों से लदी पड़ी थीं। तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। मैंने सोचा इस भरी दोपहर में, 1.30 पर, जब गर्मी अपने चरम पर होती है, कौन आया होगा? भला यह भी कोई आने का समय है ! न जाने कौन सिरफिरा है - मन ही मन खीझते हुए जैसे ही मैंने दरवाजा खोला तो पाया कि गुलाब सिंह फलों की टोकरी में बनारसी और दशहरी आमों की सौगात लिए  मुस्कुराता, पसीने में  तरबतर खड़ा है। मैंने आव देखा न ताव और मैं उस पर बरस बुरी  तरह  बरस पड़ी -
तुम्हें इस दोपहरी में भी चैन नहीं है? दो पल आराम के तुम्हें बुरे लगते है? लू लग गई, ताप हो गया तो, हम सबका चैन हराम करके ही तुम्हें सुकून मिलेगा क्या?’ मेरे ये ख्याल और प्यार से भरे तिक्तशब्द सुनकर शान्त भाव को ओढ़े, बिना शिकन डाले, वह बड़ी सहजता से बोला -
दीदी जी, आज ही ये आम पक कर तैयार हुए है, तो पहला भोग भगवान को लगाकर, सीधे आपके पास लेकर आए है। हम इन्हें पानी में भिगो देते है।1-2 घन्टे बाद आप इन्हें फ्रिज में रख देना। वरना ऐसे ही खा लिये तो गर्मी कर जाएँगे।
मैं फिर तड़की- अरे, हमारी गर्मी का तो तुम्हें पूरा ख्याल है, कुछ अपना भी ध्यान कर लिया करो, तुम्हें गर्मी लग गई तो ये आम, बाग- बगीचा, सब आठ-आठ आँसू रोएँगे ! क्या समझे ?’  किन्तु वह  खामोश, गर्दन झुकाए, मुस्कुराता काम में लगा रहा। 
फिर मैंने प्रश्नसूचक दृष्टि से उसे देखते हुए पूछा -
इस कड़कती गर्मी में कौन से मन्दिर में भगवान को भोग लगाकर आ रहे हो? जाने के लिए ये ही समय मिला था ? सुधर जाओ गुलाब सिंह, सुधर जाओ!
मेरे यह पूछने पर जो उसने जवाब दिया, उसे सुनकर तो मैं ऐसी निरुत्तर हुई कि मैंने तौबा कर ली कि इस महारथी महानात्मा से अब कभी कुछ न कहूँगी। इसके साथ कोई डाँट फटकार नहीं करूँगी।
इसके  सोच, इसके  मूल्य, इसके  क्रिया कलाप, सच  में, आम लोगों  से थोड़े नहीं, बल्कि बहुत हटकर हैं। गुलाब सिंह उस चिलचिलाती गर्मी में, मेरे घर से कुछ दूरी पर बने हुए उस छोटे से अनाथ आश्रम में गया था, जहाँ 100 के लगभग बच्चे रहते हैं।
उन्हें बगीचे के  पके आमों का पहला भोग लगाकर वह मानो उन अनाथ बच्चों के रूप में, भगवान को भोग लगाकर आया था। माँ- बाप के  प्यार से वंचित बच्चों को, उनकी इस उम्र में जब, उन्हें अच्छी-अच्छी स्वास्थ्यवर्द्धक चीजें मिलनी चाहिए, बल्कि यदि देखा जाए,तो यही वह उम्र है; जब बच्चों को तरह-तरह की चीजे खाने का चाव होता है, तो ऐसे अनाथ बच्चों को, हर मौसम के फलों का पहला भोग लगाना, दान करना, गुलाब सिंह अपना नैतिक कर्त्तव्य समझता था। उसके अनुसार बगीचे के फल खाकर, वे मासूम-अनाथ बच्चे तो  तृप्त होते ही है, साथ ही फलदाता पेड़-पौधे भी मानों खुश और प्रफुल्लित होते है और गुलाब सिंह के अनुसार ऐसे दान से ही वे वृक्ष दिन दूने और रात चौगुने फलते- फूलते है। गरीब व दीन की सेवा, उनसे प्यार- भगवान की सेवा और भगवान से प्यार होता है -इस जगत् प्रसिद्ध आस्था को गुलाब सिंह ने  सिद्धांत बना कर मात्र दिल में ही नहीं सँजों रखा था, अपितु उसे चरितार्थ भी करता था।भावों  और  सम्वेदनाओं  से  सम्पन्न  मैं तो गुलाब सिंह की  सोचउसके  दर्शनउसके उदार  नजरिएउच्च मूल्यों से  इतनी  अधिक  अभिभूत हुई कि उस दिन से मैंने किसी पर भी अमीर- गरीब, छोटे-बड़े, शिक्षित-अशिक्षित, परिपक्व-अपरिपक्व की मुहर लगाना छोड दिया। उन्हें वर्गीकृत करना छोड दिया। केवल किताबे पढ़ लेने से, डिग्रियाँ हासिल कर लेने से किसी की समझ और सोच जाग्रत नहीं होती। पूँजीपति होते हुए भी व्यक्ति, अनुदार और निर्बुद्धि होने के कारण  गरीब माना जा सकता है। सच्चाई और अच्छाईउदात्तता, समझदारी, दूरदृष्टिबुद्धिमत्ता और शिक्षा -धन और किताबी ज्ञान की मोहताज नहीं  होती। गुलाब सिंह इस सत्य का जीता जागता रूप था। जीवन में सब कुछ पा लेने पर भी, सारी कामनाएँ पूर्ण करने पर भी, अतृप्त रहने वाले, ‘और पाने की’  लालसा में  विघटित मूल्यों वालों के लिए गुलाब सिंह एक करारा जवाब था। समाज के लिए कुछ भी न कर पाने की विवशता  जताने वालों के लिए एक ठोस उदाहरण था। अनुदार  अमीरों  को लज्जित करने वाली  उदारता था। पेड़-पौधों, पशु-पक्षी और जरूरतमन्दों का ममता और प्यार से भरा  दोस्त था। मनुष्यता की, इंसानियत की अनूठी मिसाल था। यदि समाज में  हर दूसरा आदमी गुलाब सिंह हो  जाए  तो सच  में  धरती पर स्वर्ग उतर आए।
सम्पर्कः 2/ए, 'आकाशदूत' 12- ए, नार्थ एवेन्यूकल्याणी नगरपूना- 110006 (महाराष्ट्र), मो. 09890633582

दो लघुकथाएँ

 1.सेतु  
 - अनिता मंडा  
कितनी बार समझाया है इनको, थोड़ा धीरज से काम लिया करो। अब बेटे की शादी हो गई है, घर में बहू है, उनका बच्चा है। वो तो अच्छा है आज विभा गोलू को नानी से मिलवाने लेकर गई हुई थी, नहीं तो क्या सोचती बाप-बेटे की लड़ाई देखकर - बाल सारे सफ़ेद हो गए हैं, लेकिन अकड़ वैसी की वैसी है। क्या फ़र्क पड़ जाता दो बात नीतिन की मान लेते।
सुशीला के मन में विचारों की रेलमपेल चल रही थी। उसे दो पल चैन नहीं पड़ रहा था, बैचेन होकर रसोई में लगी रही।
पता नहीं कब आएँगे दोनों, कुछ खाकर भी नहीं गए। नीतिन भी  पूरी अपनी चलाना चाहता है अभी से, यही नहीं कि कभी पापा की भी सुन ले। विचारों के मंथन के साथ रसोईघर से पकवानों की महक उठने लगी।
अकेला इंसान ज्यादा सोचता है, क्योंकि विचारों की शृंखला में कोई बाधा देने वाला नहीं होता। बड़ी मुश्किल से शाम हुई।
 दरवाज़े की घंटी बजी। नीतिन आया पर उसका मुँह अभी भी फूला हुआ देखकर कुछ नहीं कहा, चुपचाप उसकी टेबल पर दही-भल्ले रखकर मुडऩे लगी तो पीछे से नीतिन का स्वर आया-  सॉरी मॉम मुझे पापा से ऐसे बात नहीं करनी थी।
  पीछे मुड़कर नीतिन से बात करने की भूमिका सोच ही रही थी, इतने में दुबारा दरवाजे की घंटी बजी।
माथे में बल डाले हुए राजेश को देखकर उनसे बात करने की इच्छा नहीं हुई। दाल का हलवा चुपचाप उनकी टेबल पर रखकर मुड़ी तो हाथ थामकर बोले - सुनो मुझे लगता है नीतिन को उसके फैसले खुद लेने का मौका देना चाहिए न मुझे अब!! राजेश की बात सुनकर सुशीला आँखों के आँसू छिपाने के लिए साड़ी के पल्लू से पोंछने लगी।
टोकते हुए राजेश बोले - अरे रे! ये क्या, तुम तो हमारा सेतु हो, सेतु की बुनियाद में इतनी नमी ठीक नहीं भई।

2.ऐसा भी होता है
      पिछले महीने मेरे पति का बंगलौर से दिल्ली ट्रांसफर हो गया। यहाँ आये काफी समय तक तो आस-पड़ोस से जान-पहचान ही नहीं हुई। घर का सामान जुटाने में पूरा दिन निकल जाता। साथ वाले घर की नैय्यर आंटी शाम को पार्क जाते समय आवाज दे देती -चल रही है क्या?-
दो-तीन बार उनके साथ पार्क गई थी।
अब सर्दी थोड़ी बढ़ गई तो मन किया घर से निकल बाहर धूप सेकने चलूँ। पार्क में नैय्यर आंटी भी मिल गई। वो किसी से बतिया रही थी।
उन्होंने मेरा परिचय करवाया। ये निधि मल्होत्रा है। हाथ से  इशारा करके उनके फ्लैट का नम्बर बताया। निधि मुझे थोड़ी जल्दी में लगी, सामान्य परिचय के बाद कहने लगी, मुझे जल्दी घर जाना है, ससुर जी के लंच का समय हो गया है। जरा सा लेट होते ही आसमान सिर पर उठा लेंगे।
नैय्यर आंटी ने बताया कि वो लक्ष्मण प्रसाद जी की बहू हैं।
लक्ष्मण प्रसाद जी से मैं पार्क में दो दिन पहले ही मिल चुकी थी। उस दिन नैय्यर आंटी पार्क में नहीं आई थी, लक्ष्मण प्रसाद जी की बातें मेरे स्मृति -पटल पर चल रही थी। 
 मैंने मन ही मन सोचा, कितनी दिखावा पसंद औरत है निधि जैसे उसके जितना ख्याल तो कोई रखता ही नहीं।
लक्ष्मण प्रसाद जी की उदासी से भरे बोल मेरे कानों में गूँज रहे थे-
 - अपनी मेहनत की पाई-पाई मैंने बेटे को काबिल बनाने में होम कर दी, आज बहू के वश में हो बेटा मुझे आँखें दिखाता है, बहनजी मैं ज्यादा कुछ नहीं चाहता, बस दो वक्त की रोटी शांति से मिल जाये। इस उम्र में बीमारियाँ भी कम नहीं होती, दवा-दारू की तो क्या उम्मीद करूँ।
 मैंने अपने मन की बात नैय्यर आंटी को बतानी चाही। मैंने कहा - हमें लक्ष्मण प्रसाद जी की मदद करनी चाहिए। हम सब चंदा इकट्ठा करके उनका इलाज करवा सकते हैं या कोई वृद्धाश्रम में उन्हें रखवा सकते हैं।
मेरी बात सुनकर नैय्यर आंटी के मुख पर चौंकने के भाव के साथ मुस्कान खेल गई, और मुझे आगाह करते हुए बोली- ओह! तो तुमसे भी लक्ष्मण प्रसाद ने मदद माँगी क्या?
मेरा मुँह देखकर वो समझ गई। आगे मुझे हिदायत देती रही - उन्हें कभी पैसे दे मत देना, बहू-बेटे की बुराई करके दूसरों के मन में अपने लिए सहानुभूति जगाएँगे और फिर अपनी बीमारी का रोना रोकर मदद माँगेगे। खासकर महिलाओं को वो भावुक  मूर्ख समझते हैं, असल में उनको जुआ खेलने की लत है। इनके बेटे -बहू तो बहुत अच्छे हैं। आश्चर्य से मेरी आँखें फटी की फटी रह गई कि ऐसा भी होता है।
सम्पर्क: आई-137 द्वितीय तल, कीर्ति नगर, नई दिल्ली 110015, फोन नं. 8285851482, anitamandasid@gmail.com   

प्रेरक

 बेल्ट
82 वर्षीय वांग त्सिंग अर्जेंटीना में रहते हैं और इस उम्र में भी युवाओं को चीनी मार्शल आर्ट -ताई ची- सिखाते हैं। ताई ची एक प्राचीन मार्शल आर्ट है, जिसमें अनेक शारीरिक क्रियाएँ करते समय सांस पर नियंत्रण रखा जाता है।
वांग त्सिंग के एक शिष्य ने एक बार उनसे यह पूछा - अन्य मार्शल आर्ट पद्धतियों की भांति ताई ची में योद्धा का स्तर प्रदर्शित करने के लिए रंगीन बेल्टों का प्रयोग क्यों नहीं किया जाता?
वांग ने उत्तर दिया- यदि तुम्हारे पास धन हो तो तुम उसे हाथ में लेकर नहीं घूमते हो बल्कि उसे अपनी जेब में रखते हो। यदि तुम्हारे पास बहुत अधिक धन हो तो तुम उसे अपनी जेब में ठूँसकर नहीं रखते बल्कि तिजोरी या बैंक में रख देते हो।

-सभी को प्रत्यक्ष दिखनेवाली बड़ी सी बेल्ट पहनकर घूमने में क्या तुक है? यह सबको बता देती है कि तुम्हारे कौशल की सीमा क्या है। प्रवीण योद्धा यह भलीभाँति जानता है कि रणनीति अधिक महत्त्वपूर्ण है, प्रदर्शन नहीं। (हिन्दी ज़ेन से) 

नियत से नियति तक

 नियत से नियति तक  
 - विजय जोशी (पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक भेल, भोपाल)    
नियत जिसे अंग्रेजी में इंटेन्शन कहा जाता है उसका हमारे जीवन में बेहद महत्त्व है। दरअसल यह हमारे जीवन जीने के तरीकों की प्रतिध्वनि है। कोई भी काम करते समय हमारा जो भी इरादा या मनोभाव रहता है, वही हमारे काम करने के मार्ग तय करता है और अंतत: परिणाम में उभरता है। अच्छी नियत से कि काम के परिणाम भी सकारात्मक तथा बदनियती से किये गये काम के नकारात्मक और कभी कभी घातक परिणाम तक हो सकते हैं। अच्छी नियत से किये कार्य हमेशा सुखदायी होते हैं हमारे लि भी एवं दूसरों के लि भी। आइए अब इसके सोपानों पर गौर करें -
1- विचार - हमारे विचार ही हमारे जीवन की दशा और दिशा दोनों तय करते हैं। स्वस्थ एवं स्वच्छ विचारयुक्त आदमी का जीवन भी बड़ा सरल, सहज और सदाशयतापूर्ण होता है। आपके विचार ही आपको समाज में प्रतिष्ठा प्रदान करते हैं. अत: अपने विचारों पर समुचित ध्यान दें, वे आपके शब्द बनेंगे।
2- शब्द - शब्द विचार का वाहक हैं. आपके विचार मस्तिष्क से शब्दों के माध्यम से ही जन मानस के समक्ष व्यक्त होते हैं। अत: इनके उपयोग एवं प्रयोग में पूरी सावधानी नितांत आवश्यक है। शब्द ही अंतत: विचार को कार्यरूप में परिणित भी करते हैं। अतएव अपने शब्दों पर समुचित ध्यान दें, वे आपके कार्य बनेंगे।
3- कार्य - कार्य ही जीवन का प्रयोजन है। कहा ही गया है कि कर्म प्रधान विश्व रचि राखा, जो जस करहीं सो तस फल चाखा। एक बात और जैसे अच्छे कर्म का फल अच्छा होता है वैसे ही बुरे काम का बुरा नतीजा भी। सो अपने कार्यों पर समुचित ध्यान दें, वह आपकी आदत बनेगी।
4- आदत - आपने देखा ही होगा कि हर दिन एक सा काम करते करते हम उसके आदी हो जाते हैं और उस काम का शुमार हमारी आदत में हो जाता है। यही आदत शनै: शनै: हमारे आचरण में आ जाती है। अत: अपनी आदतों का आत्मविश्लेषण भी हमारी आदत का अंग होना चाहिये। अपनी आदतों पर समुचित ध्यान दें, वह आपका चरित्र बनेगी।
5-चरित्र - चरित्र जीवन में सर्वोपरि है। कहा भी गया है कि यदि धन गया तो कुछ नहीं गया, स्वास्थ्य गया तो कुछ गया, लेकिन यदि चरित्र गया तो सब कुछ चला गया। आपका चरित्र ही अंतत: आपका सर्वस्व तय करता है; इसलि अपने चरित्र पर समुचित ध्यान दें, वह आपकी नियति बनेगी।
याद रखि एक बात तो तयशुदा है कि अंतत: आपकी नियत ही आपकी नियति तय करेगी और उसके लिये अत्यावश्यक है कि न केवल आपके विचारों, शब्दों, कार्यों और आदतों में सामंजस्य हो, अपितु आपके सोच में साफ सुथरे कार्यों के प्रति ललक, लगन और लक्ष्य बोध हो। यही  जीवन का सरलतम सूत्र।
सम्पर्क: 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास) भोपाल- 462023, मो. 09826042641, Email- v.joshi415@gmail.com