March 15, 2016

प्रकृति

                 संस्कृत काव्य धारा में 

             प्रकृति की आदिम सुवास 

                                    - गोवर्धन यादव

संस्कृत साहित्य में, विषेशकर उसकी काव्य परम्परा में वेदव्यास, वाल्मिकि, भवभूति, भारवि, श्रीहर्ष, बाणभट्ट, कालिदास आदि महाकवियों ने प्रकृति की जो रसमयी झाँकी प्रस्तुत की है, वह अनुपम-अतुलनीय तथा अलौकिक है। उसकी पोर-पोर में कुदरत की आदिम सुवास है- मधुर संस्पर्श है और अमृतपायी जीवन दृष्टि है । प्रकृति में इसका लालित्य पूरी निखार के साथ निखरा और आज यह विश्व का अनमोल खजाना बन चुका है। सच माना जाय तो प्रकृति, संस्कृत काव्य की आत्मा है, चेतना है और उसकी जीवन शक्ति है। काव्यधारा की इस अलौकिक चेतना के पीछे जिस शक्ति का हाथ है, उसका नाम ही प्रकृति है।
पृथ्वी से लेकर आकाश तक तथा सृष्टि के पाँचों तत्व निर्मल और पवित्र रहें, वे जीव-जगत के लिए हितकर बने रहें, इसी दिव्य संदेश की गूँज हमें पढऩे-सुनने को मिलती है। महाभारत में हमें अनेक स्थलों पर प्राकृतिक सौंदर्य की अनुपम छटा देखाने को मिलती है। महाभारत के आरण्यक पर्व 39/19 की एक बानगी देखिए-
मनोहर अनोपेता स्तस्मिन्नतिरथोर्जुन: 
पुण्य शीतमलजला: पश्यन्प्रीत मनाभवत 
कलकल के स्वर निनादित कर बहती नदियाँ, नदियों में बहता शीतल स्वच्छ जल, जल में तैरते-अलौकिक आनन्द मे डूबे हंस, नदी के पावन पट पर अठखेलियाँ करते सारस, क्रौंच, कोकिला, मयूर, हवा से होड़ लेते मृग, आकाश को छूती पर्वत श्रेणियाँ, सघन वन, वृक्षों की डालियों पर धमाचौकड़ी मचाते शाखामृग, चिंचिंयाते रंग-बिरंगे पंछी, जलाशयों में पूरे निखार के साथ खिले कमल-दल, कमल के अप्रतिम सौंदर्य पर मंडराते आसक्त भौंरों के समूह, तितलियों का फुदकना आदि को पढ़कर आदिकवि के काव्य कौशल को देखा जा सकता है।
तो पश्य मानौ विविधञ्च शैल प्रस्थान्वनानिच
नदीश्च विविध रम्या जग्मतु: सह सीतभा
सार सांश्चक्रवाकांश्च नदी पुलिन चारिण:
सरांसि च सपद्मानि युतानी जलजै खगै:
यूथ बंधाश्च पृषतां मद्धोन्मत्तान्विषाणि न:
महिषांश्च वराहंश्च गजांश्च द्रुमवैरिण:
 (रामायण- अरण्यकांड सर्ग 11 (2-4)
 राम अपने बनवास के समय एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं, तो मार्ग मे अनेक पर्वत प्रदेश, घने जंगल, रम्य नदियाँ, और उनके किनारों पर रमण करते हुए सारस और चक्रवाक जैसे पक्षी, खिले -खिले कमलदल वाले जलाशय और अपने-अपने जलचर, मस्ती मे डोलते हिरणों के झुण्ड, मदमस्त गैंडे, भैंसे, वराह, हाथी, न सुरक्षा की चिन्ता, न किसी को किसी का भय, वाल्मिकी ने रामायण में जगह-जगह प्रकृति के मधुरिम संसार का वर्णण किया है।
भवभूति के काव्य में प्राकृतिक सौंदर्य देखते ही बनता है। लताएँ जिन पर तरह-तरह के खिले हुए पुष्प सुवास फैला रहे हैं। शीतल और स्वच्छ जल की निर्झरियाँ बह रही है। भवभूति ने एक ही श्लोक में जल, पवन, वनस्पति एवं पक्षियों का सुंदर वर्णण प्रस्तुत किया है।
माघ के काव्य में तीन विशिष्ठ गुण है। उसमें उपमाएँ हैं। अर्थ गांभीर्य है और सौंदर्य सृष्टि भी। कहा जाए तो वे उपमाओं के राजा हैं। विशेष बात यह है कि उन्होंने अधिकांश उपमाएँ प्रकृति के खजाने से ही ली है।
शिशुपाल वध में अनेक ऐसे स्थल हैं जिनमें प्राकृतिक सौंदर्य और स्वच्छ पर्यावरण का उल्लेख मिलता है। काली रात के बाद भला प्रकाश आ रहा है। उसके गोरे-गोरे हाथ-पाँव ऐसे लगते हैं मानो अरुण कमल हों। भौंरे ऐसे हैं जैसे प्रभात के नीलकमल नेत्रों के कज्जल की रेखाएं हों। सांध्य पक्षियों के कलरव में मस्त हुई यह भोली बालिका (प्रभात) रात के पीछे-पीछे चलकर आ रही है (शिशुपाल वध 6/28)
महाकवि भारवि के ग्रंथ किरातार्जुनीय में अनेक उपमाएँ, शृंगार प्रधान व सौंदर्यपरक रुपक है। वन में प्रवाहित नव पवन कदम्ब के पुष्पों की रेणु द्वारा आकाश को लाल कर रहा है। उधर पृथ्वी, कन्दली के फू लों के स्पर्श से सुगन्धित हो रही है। ये दोनों दृष्य अभिलाषी पुरुष के मन को का-मनियों के प्रति आशक्त करने वाले हैं। नवीन वनवायु अपने आप ही शुद्ध वायु की ओर संकेत कराने वाला शब्द है। उधर धरती सुगंधित है, मन चंचल हो रहा है। (9)
(9) नवकदम्ब जोरुणिताम्बैर रधि पुरन्ध्रि शिलान्ध्र सुगन्धिभि:
मानसि राग वतामनु रागिता नवनवा वनवायु भिरादे धे !!
 प्रकृति के लाडले कवि कुमारदास द्वारा रचित जानकी हरण प्राकृतिक सौंदर्य एवं उपमाओं के भण्डार से भरा हुआ है। अतीत की निष्कलंक एवं पवित्र प्राकृतिक, प्राय: सभी जगह बिखरी पड़ी है. कई स्थान पर मार्मिक मानवीकरण भी है।
कुदरत की मादक गोद में विचरण करते राजा दशरथ की मन:स्थिति का वर्णन करते हुए कवि लिखता है- राजा ने नदी के उस तट पर विश्राम किया, जहाँ मंद पवन बेंत की लताओं को चंचल कर रहा था। सुखद पवन गंधी की दुकान की सुगंध जैसा सुगंधित था। वह सारस के नाद को आकर्षित करने वाला था। नीलकमल के पराग को उड़ा-उड़ाकर उसने राजा के शरीर को पीला कर दिया, यह पढ़कर लगता है कि हम किसी चित्र-संसार की सलोनी घटना को प्रत्यक्ष देख रहे हैं।
श्रीहर्ष ने अपनी कृति नैषधिय में प्रकृति के सलोने रुप का वर्णन किया है। इस दृष्य को उन्होंने राजा नल की आँखों के माध्यम से देखा था। नल ने भय और उत्सुकता से देखा। क्या देखता है कि जल में सुगंध फैलाने वाला पवन जिस लता को चूम-चूम कर आनन्द लेता है, वही लता (मकरन्द के कण से युक्त है) आज अपनी ही कलियों में मुस्कुरा रही है। एक चित्र और देखिए--
फ लानि पुष्पानि च पल्ल्वे करे क्योतिपातोद गत वातवेपिते
वृक्षों ने अपने हाथों में पुष्प और फ ल लेकर राजा का स्वागत किया। ऊपर की ओर पक्षियों की फड़- फड़ाहट से हवा में होने वाले कम्पन से शाखाएँ हिल रही थीं। पढ़कर ऐसा लगता है कि वृक्षों ने अपने इन्ही हाथों (शाखाओं) में पुष्प और फल लेकर राजा का स्वागत किया हो।
वाणभट्ट ने अपनी कृति कादम्बरी में अगस्त्य मुनि के आश्रम के पास, पम्पा सरोवर का वर्णन करते हुए लिखा ह- सरोवर में कई प्रकार के पुष्प हैं जैसे- कुसुम, कुवलय और कलहार। कमल इतने प्रमुदित हंै कि उसमें मधु की बूंदे टपक रही है। और इस तरह कमल-पत्रों पर चन्द्र की आकृतियाँ बन रही है। सफेद कमलों पर काले भवरों का मंडराना अंधकार का आभास देता है। सारस मस्त हैं। मस्ती में कलरव कर रहे हैं। उधर कमल रस का पान करके तृप्त हुई कलहंस भी मस्ती का स्वारालाप कर रही है। जलचरों के इधर से उधर डोलने से तरंगे उत्पन्न हो रही है। मानो मालाएँ हों। हवा के साथ नृत्य करती हुई तरंगे  वर्षा ऋ तु का सा दृष्य उत्पन्न कर रही है।
सुंदर लवंग लता की शीतलता लिए हुए कोमल और मृदु मलय पवन चलता है। मस्त भौंरों और कोयल वृंदो के कलरव से कुंज- कुटीर निनादित है। युवतियाँ अपने प्रेमियों के साथ मस्त होकर नृत्य करती हैं। स्वयं हरि विचरण करते हैं- ऐसी वसन्त ऋतु, विरहणियों को दु:ख देने वाली है।
वसंत ऋ तु का ऐसा सजीव चित्रण जो मस्ती से लेकर, संताप की एक साथ यात्रा करवाता है।
कालिदास ने कवि और नाटककर दोनों रूपों में अद्भुत प्रतिष्ठा प्राप्त की। उन्होंने प्रकृति के अद्भुत रुपों का चित्रण किया है। सरस्वती के इस वरद-पुत्र ने भारतीय वाड्यगमय को अलौकिक काव्य रत्नों एवं दिव्य कृतियों से भरकर उसकी श्रीवृद्धि की है।
रघुवंश के सोलहवें सर्ग में प्राकृतिक छटा का जो श्लोक है उसका भावार्थ यह है कि वनों में चमेली खिल गई है जिसकी सुगन्ध चारों ओर फैल रही है। भौंरे एक-एक फू ल पर बैठकर मानों फू लों की गिनती कर रहे हैं। वसन्त का चित्रण करते हुए एक कवि ने सजीव एवं बिम्बात्मक वर्णन किया है- लताएँ पुष्पों से युक्त हैं, जल में कमल खिले हैं, कामनियाँ आसक्ति से भरी है, पवन सुगन्धित है, संध्याएँ मनोरम एवं दिवस रम्य है, वसन्त में सब कुछ अच्छा लगता है।
शकुन्तला के बिदाई के समय के चित्र को देखिए- हे वन देवताओं से भरे तपोवन के वृक्षों! आज शकुन्तला अपने पति के घर जा रही है। तुम उसे बिदाई दो। शकुन्तला पहले तुम्हें पिलाए बिना खुद पानी नहीं पीती थी, आभूषणों और शृंगार की इच्छा होते हुए भी तुम्हारे कोमल पत्तों को हाथ नहीं लगाती थी, तुम्हारी फूली कलियों को देखकर खुद भी खुशी से फूल जाती थी, आज वही शकुन्तला अपने पतिगृह जा रही है. तुम उसे बिदाई दो।
संस्कृत काव्यधारा में फूलों की आदिम सुवास का अनमोल खजाना, अपने पूरे लालित्य के साथ समाया हुआ है। प्रकृति के इन विभिन्न आयामों की रचना करने का उद्देश्य ही पर्यावरण संरक्षण रहा है। आज स्थितियाँ एकदम विपरीत है। जंगलों का सफाया तेजी से हो रहा है। विकास के नाम पर पहाड़ का भी अस्तित्व दांव पर लग चुका है। प्रकृति हमारे लिए सदैव पुज्यनीय रही है। भारतीय मुल्य प्रकृति के पोषण और दोहन करने का है, न कि शोषण करने का। वनों ने सदा से ही संस्कृति की रक्षा की है।
पूरे पौराणिक और ऐतिहासिक तथ्य इस बात के साक्षी हैं कि जब तक हमनें वन को अपने जीवन का एक अंग माना, तब तक हमें कभी पश्चाताप नहीं करना पड़ा। आज वनों की अंधाधुंध कटाई से पर्यावरण संतुलन गड़बड़ा गया है। विभिन्न विभाग तथा संस्थाएँ इस प्रयास में लगी तो हैं लेकिन उनमें समन्वय की कमी दिखलाई पड़ती है। काफी प्रचार-प्रसार के बाद भी इच्छित परिणाम नहीं मिल पा रहे हैं। यदि हम पर्यावरण को जन-जन से जोडऩा चाहते हैं तो आवश्कता इस बात की है कि हमें इसे पाठ्यक्रम में उचित स्थान देना होगा।

सम्पर्क:103,कावेरीनगर, छिन्दवाड़ा, (म.प्र) 480001,फोन- 07162-246651, मो. 09424356400, Email- goverdhanyadav44@gmail.com

1 Comment:

Anupama Tripathi said...

लालित्यपूर्ण उत्तम आलेख |प्रकृति से दूर विकृति है |प्रकृति को सहेजना और पोषित करना ही हमारा उद्देश्य होना चाहिए यही आज की ज्वलंत समस्याओं का समाधान है |बहुत अच्छा लिखा ! शुभकामनायें !!

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