March 10, 2013

कविता



सखी री...                 बस ऐसो फाग
खिला दे
- वंदना गुप्ता
सखी
सुना है फाग है आया
पर मेरा मन न हर्षाया
प्रीतम मेरे पास नही हैं
कहो कैसे फाग मनाऊँ
प्रीत की होरी में सखी री
कौन सा रंग भरूँ
जो रच बस जाए
उनके अंतरपट पर
छूटे ना सारी उमरिया
मैं दीवानी उनके दीदार की
मैं मस्तानी उनके प्यार की
किस विधि खेलूँ होरी
सखी री
कोई संदेसा तू ही ला दे
मोहे उन संग फाग खिला दे
प्रेम रस में मैं भीज जाऊँ
ऐसो मो पे रंग वो डार दें
सखी री ....
कोई ऐसो जतन  करा दे
पाँव पडूँ तोरे, करूँ  निहोरे
मुझे पी से मेरे मिला दे
मुझमे प्रेम रस छलका दे
मुझे उनकी दीवानी बना दे
जो कोई देखे मुझको सखी री
मुझमे उनकी सूरतिया दिखा दे
मोहे ऐसो फाग खिला दे
अबकी मोहे ऐसो फाग खिला दे
तन मन भीजे
प्रेम ना छीजे
कोई ऐसो चूनर ओढ़ा दे
सखी री .....प्रीतम से मिलवा दे
सखी री .....प्रेम झांझरिया बजा दे
सखी री .....रंग मुझमे है मैं रंग में हूँ
कोई पता ना पावे
मो पे ऐसो रंग चढ़ा दे ....
सखी री .....मुझे उनकी बावरिया बना दे
सखी री ....मेरो फाग रंगों से महका दे
मेरो सांवरिया मिलवा दे
चाहे कौड़ी को बिकवा दे ....मोहे
सखी री .....अब की ऐसो फाग खिला दे
जन्म जन्म की साध पूरी करवा दे
मोहे श्याम रंग में रंगवा दे ....
सखी री ....बस ऐसो फाग खिला दे
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