April 27, 2009

नदी है भाषा

- अशोक सिंघई
(1)
भाषा को साधना
उतना ही कठिन है
जितना पोटली में
प्रकाश को बांधना
भाषा के तिलिस्म में
कैद हो गई है कविता
या कविता खुद ही तिलिस्म है
भाषा की.
(2)
भाषा मिट्टी है जिसे रौंदकर
गढ़ता है कवि कुछ नया-नया
 रचता नहीं कवि, मूल है मिट्टी
किसी ने नहीं बनाई आज तक
घनानन्द ने कहा है
 कविता ने रचा है उसे
कविता रचने के अहम् से
कविता द्वारा रचे जाने के
विनय तक की यात्रा है
कवित्व की पहली सीढ़ी
और कविता का आधार
होती है भाषा.
(3)
जंगल में पेड़
चाहे हो किसी भी जाति
गुण-धर्म का झाड़ी हो
या हो फूलों की बेल
बालियां हों धान की
या जीवन सी दूब
सबकी जड़ें मिट्टी में होती हैं.
(4)
पानी थमा तो / सड़ा पानी
पथ हुए पग-विहीन तो / खो गए
मिट जाती है वह संस्कृति/सभ्यता और भाषा
जो बदलती नहीं
सीखती नहीं, सदा चलते रहना.
(5)
बने रहने के लिए
अनिवार्य है गत्यात्मकता
कहा है एक महान् चित्रकार ने
ठहर गया धर्म / खो गया ईश्वर
सो गया राज्य / खो गया इंसान
भाषा मिट्टी है / नदी है भाषा
जो रहती है बनती, जो रहती है बहती.
(6)
ईश्वर के समक्ष पहली उद्घोषणा है भाषा
मनुष्य के नियंता और रचयिता होने की
समूची सृष्टि में अपने श्रेष्ठ होने की.

2 Comments:

दीपक said...

बहुत सुंदर कविता !बिल्कुल महानदी की तरह छलछलाती हुयी !!

प्रदीप कांत said...

ईश्वर के समक्ष पहली उद्घोषणा है भाषा
मनुष्य के नियंता और रचयिता होने की
समूची सृष्टि में अपने श्रेष्ठ होने की.

Badhiya

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