April 08, 2015

पर्यावरण विशेषः भारत के महानगरों को मारेगा मौसम

कुछ यूं कि आधा किलो डब्बे में
 दो किलो सामान
मैपलक्रोफ्ट ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, 'इन शहरों में बढ़ती जनसंख्या का खराब प्रशासन, गरीबी, भ्रष्टाचार सहित अन्य सामाजिक आर्थिक कारण हैं जो निवासियों और व्यवसाय के लिए बड़ा खतरा हैं।'
जलवायु परिवर्तन का बुरा असर तेजी से बढ़ रहे शहरों पर पड़ सकता है। जलवायु परिवर्तन के खतरों को आंकने वाली संस्था की नई रिपोर्ट में यह कहा गया है। भारत, बांग्लादेश और अफ्रीका के बड़े शहर बहुत ज्यादा प्रभावित होंगे।
एशिया और अफ्रीका में तेजी से बढ़ती हुई मेगा सिटीज में जलवायु परिवर्तन से खतरे के बारे में मैपलक्रॉफ्ट कंपनी ने रिपोर्ट जारी की है। सर्वे में 200 देशों पर जलवायु परिवर्तन के असर को आंका गया है।
यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब एक ओर दुनिया की जनसंख्या सात अरब तक पहुंच गई है और दूसरी तरफ थाइलैंड के कई हिस्से और राजधानी बैंकॉक में डूबे हुए हैं।
दुनिया के तेजी से बढ़ रहे टॉप 20 देशों में भी उन्होंने जलवायु परिवर्तन के खतरे को आंका है। साल 2020 तक जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले देशों में हैती है जबकि थाइलैंड 37वें नंबर पर है।
बांग्लादेश की राजधानी ढाका सबसे ज्यादा खतरे में हैं। जबकि मनीला, कोलकाता, जकार्ता, किंशासा, लागोस, दिल्ली और गुआंगझू एक्सट्रीम से हाई रिस्क में हैं।
मैपलक्रोफ्ट ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, 'इन शहरों में बढ़ती जनसंख्या का खराब प्रशासन, गरीबी, भ्रष्टाचार सहित अन्य सामाजिक आर्थिक कारण हैं जो निवासियों और व्यवसाय के लिए बड़ा खतरा हैं।'
इसका मतलब है कि मूलभूत संरचना को और विकसित करने की कोई जगह नहीं है। और अगर इन शहरों में जनसंख्या बढ़ जाती है तो आपात प्रणाली को प्रभावी नहीं बनाया जा सकेगा खासकर तब जब मौसम की मार अक्सर पडऩे लगेगी।
मैपलक्रोफ्ट की मुख्य पर्यावरण विश्लेषक चार्ली बेल्डन कहती हैं, 'इसका असर काफी आगे तक होगा। सिर्फ वहां के निवासियों कि लिए ही नहीं बल्कि व्यापार, राष्ट्रीय विकास और निवेश पर भी गहरा असर पड़ेगा। आर्थिक व्यवस्था गड़बड़ा जाएगी और इन देशों का आर्थिक महत्व प्रभावित होगा।'
मैपलक्रोफ्ट दुनिया भर में पर्यावरण से जुड़े मुद्दों का विश्लेषण करता है और लोगों पर उसके प्रभाव और गंभीरता पर नजर रखता है।
उदाहरण के लिए मनीला और फिलीपीन्स व्यावसायिक केंद्र हैं और चूंकि यहां जनसंख्या बहुत ज्यादा और यह लगातार बढ़ ही है तो उस पर बाढ़ और तूफान का असर भी तुलनात्मक रूप से ज्यादा होगा। वैज्ञानिकों का कहना है कि एशियाई क्षेत्रों में बारिश बहुत ज्यादा होगी। बताया जा रहा है कि 2010 से 2020 के बीच इन शहरों में और 22 लाख लोग और जुड़ जाएंगे।
बेल्डन के अनुसार, 'सिर्फ विकासशील देशों के शहर जलवायु परिवर्तन से प्रभावित नहीं हैं। उदाहरण के लिए ऑस्ट्रेलिया में आई बारिश के कारण हुई तबाही दिखाती है कि विकसित देशों के विकसित शहर भी बुरी तरह प्रभावित हो सकते हैं।'
मायामी आज भी उतने ही खतरे में है जितना सिंगापुर है। जबकि न्यूयॉर्क और सिडनी मध्यम रिस्क की श्रेणी में हैं। लंदन एकदम कम खतरे (लो रिस्क) पर है। बैंकॉक एक्सट्रीम रिस्क की कैटेगरी में है।
मुंबई, दिल्ली, कोलकाता और चेन्नई चारों हाई रिस्क में हैं। तेजी से बढ़ते इन शहरों में मकान बन रहे हैं, लेकिन रास्ते और बाकी सुविधाएं नहीं। जरा बारिश आई नहीं कि सड़कें लबालब हो जाती हैं। जनसंख्या बढ़ रही है और संरचना वैसी ही, कुछ यूं कि आधा किलो के डब्बे में कोई दो किलो सामान भर दे।

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