May 28, 2010

इस अंक में

वर्ष 2, अंक 10, मई 2010
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संगीत को देवदूतों की भाषा ठीक ही कहा गया है।
- कार्लाइल

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वाह भई वाह

पप्पी का पासपोर्ट
मीकू सरदार-
प्पी जी... ये खड्डा किसलिए खोदा जा रहा है? पप्पी - ओ...कुछ नहीं जी मुझे अमेरिका जाना है ना...इसलिए। मीकू सरदार- अमेरिका जाना है? पप्पी- हां जी!.. मीकू सरदार- अमेरिका जाने के लिए खड्डा खोदना जरूरी है? पप्पी- ओ...कर दी ना तूने अनाडिय़ों वाली गल्ल, बेवकूफ पासपोर्ट बनवाने के लिए फोटो चाहिए होती है कि नहीं? मीकू सरदार- फोटो तो चाहिए होती है लेकिन... फोटो से खड्डे का क्या कनेक्शन है? पप्पी - अरे बेवकूफ...पासपोर्ट फोटो में कमर के ऊपर का हिस्सा आना चाहिए ना ... इसलिए कमर तक गहरे खड्डे खोद रहा हूं, ताकि नीचे का हिस्सा कैमरे में न आए मीकू सरदार- लेकिन यहां तो आप ऑलरेडी तीन खड्डे पहले ही खोद चुके हो...फिर यह चौथा क्यों? पप्पी- बेवकूफ पासपोर्ट में 4 फोटो लगानी पड़ती हैं।
एसएमएस शगुन
पत्नी - सुनो जी, आज पड़ोस में लड़की की शादी है। तुम शगुन में क्या दोगे ?
पति- आज मैं कुछ देने की हालत में नहीं हूं। तुम ऐसा करो 5100 रुपए लिखकर एसएमएस भेज दो।

May 25, 2010

चल उड़ जा रे पंछी अब ये देस हुआ बेगाना ...

बचपन की सबसे खूबसूरत यादों में से एक है आंगन में गौरैया को चहचहाते फुदकते देखकर अपने मन का फुदकना। अधिकांश घरों की तरह हमारे शहर वाले घर के आंगन में भी गमलों और गौरैया के रूप में प्रकृति अपनी उपस्थिति दर्ज कराती थी।

गौरैया को दाना डालकर हम रिझाते थे। जब गौरैया चहचहाते हुए फुदक- फुदक कर दाना चुगती थी तो हम भाई- बहन उन्हें पकडऩे दौड़ते थे। गौरैया फुर्र से उड़कर छत की मुंढेर पर बैठकर चिचियाते हुए हमें चिढ़ाती थी। हम पीछे हटते थे वे फिर नीचे आकर दाना चुगने लगती। कभी- कभी गौरैया गमले में भरे पानी से नहाती। वास्तव में इस तरह नित्य ही प्रकृति हमसे लुका- छिपी खेलती थी। लेकिन ये खूबसूरत यथार्थ शहरी बच्चों के जीवन का अनिवार्य अंग पांच- सात दशक पहले था। जब शहरों में भी अधिकांश मकानों में छज्जे होते थे और छतें, खपरैल या लकड़ी की शहतीरों से बनी होती थी। ऐसे मकानों में घोंसले बनाने के लिए छतों और छज्जों में अनेक स्थान होते थे।
आज के शहरी बच्चों के जीवन से गौरैया लुप्त है। आज गौरैया सिर्फ उनके दादा- दादी, नाना- नानी के बचपन की मधुर स्मृतियों के रूप में शेष हैं। बचपन के इस खूबसूरत यथार्थ के शहरों से लुप्त हो जाने का मुख्य कारण है, मकानों का लोहे, क्रांकीट के बंद डिब्बों में परिवर्तित हो जाना, जिनमें न आंगन है न घोंसले बनाने की कोई जगह।
गौरैया जैसे सर्वप्रिय प्राकृतिक यथार्थ का शहरों से लुप्त हो जाने की कसक दशकों से सालती रही है। यही कारण है कि प्रकृति प्रेमियों की पहल पर 20 मार्च 2010 की तारीख को विश्व गौरैया संरक्षण दिवस के रूप में हर वर्ष मनाने की घोषणा हुई है। इस दिवस को मनाने के लिए गुजरात के प्रकृति प्रेमियों ने अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है। अहमदाबाद व गुजरात के अन्य शहरों में गौरैया के संरक्षण के उद्देश्य सेे लकड़ी के घोंसले बनवाकर अपने घरों की बाहरी दीवार पर लगवाएं हैं। प्रसन्नता की बात ये है कि गौरैयों ने इन घोंसलों को आबाद करना शुरु भी कर दिया है। इस संदर्भ में याद आता है कि गौरैया जैसे निरीह और आनंददायी प्राणी को अपने आंगन से निर्वासित करने के काफी पहले ही हम बाघ के आंगन में अतिक्रमण करके उसे उसी के आंगन से इतनी तेजी से लुप्त करने में जुटे थे कि बाघ दुनिया से ही सदैव के लिए लुप्त होने की कगार पर पहुंच चुका था।
आज से चार दशक पहले प्रकृति प्रेमियों की चीख पुकार पर जब भारत सरकार ने बाघों के संरक्षण के लिए प्रोजेक्ट टाइगर बड़ी धूमधाम से प्रारंभ किया तब बताया गया था कि उस समय भारत के जंगलों में करीब 1800 बाघ थे। चार दशकों से चले टाइगर प्रोजेक्ट नाम के सरकारी तमाशे के बाद पिछले कुछ महीनों से मीडिया में रोज बताया जा रहा है कि अब भारत में सिर्फ 1411 बाघ ही बचे हंै। बाघों के इस सरकारी अभियान के चलते अनेक अभयारण्य घोषित किए गए और इनमें से कम से कम दो अभयारण्यों सरिस्का और पन्ना में से बाघ पूर्णतया लुप्त हो गए। अब सुनने में आ रहा है कि अन्य अभयारण्यों से बाघ लाकर वहां फिर से बसाए जा रहे हंै। ऐसे में ताज्जुब नहीं होना चाहिए कि जब लोग कह रहे हंै कि वास्तव में प्रोजेक्ट टाइगर बाघों के शिकारियों का संरक्षण कार्यक्रम रहा है!
क्या है ऐसा सरकारी कार्यक्रमों में कि जनता से कर के रूप में वसूली रकम के खर्च में तो अनुमान से कहीं अधिक वृद्धि होती है परंतु लक्ष्य की उपलब्धि अनुमान से काफी पीछे रह जाती है?
ऐसा नहीं है कि वन्य जीवों से संबंधित सरकारी कार्यक्रमों में ही वांछितके विपरीत होता है। समाज में नर नारी का संतुलन बनाए रखने के लिए चलाए जा रहे कन्या भू्रण हत्या की कुप्रथा के उन्मूलन कार्यक्रम का भी परिणाम अत्यंत निराशाजनक है। जन्म लेते ही कन्या शिशुओं की हत्या की प्राचीन परंपरा रही है और इसे ईस्ट इंडिया कंपनी के राज्य में ही गैरकानूनी अपराध घोषित कर दिया गया था। दो-तीन दशक पहले वैज्ञानिक प्रगति के फलस्वरूप ऐसे उपकरण आ गए कि गर्भस्थ शिशु का लिंग भी पता लग जाता है। फिर क्या था। कन्या भ्रूणों का ही गर्भपात धड़ल्ले से किया जाने लगा। इसको रोकने के लिए बनाए गए कानून के बावजूद इस जघन्य अपराध में कोई कमी नहीं आई है। इतना ही नहीं शर्मनाक दुर्भाग्य है कि मानवता के मूल स्रोत को ही आहत करने वाली इस कुप्रथा का सबसे अधिक प्रचलन पंजाब, हरियाणा, दिल्ली जैसे देश के समृद्ध क्षेत्रों में है। इसका समाज के लिए घातक दुष्परिणाम है स्त्री- पुरुष अनुपात में असंतुलन जो अनेक सामाजिक अपराध को जन्म देता है।
गौरैया, बाघ और कन्या शिशुओं के बारे में एक साथ चर्चा करने का कारण है कि ये तीनों जीव पर्यावरण के महत्वपूर्ण अंग हैं। पर्यावरण को स्वस्थ बनाए रखना हमारा धर्म है। अतएव पर्यावरण को समग्र रूप में देखने, जानने और संवारने के लिए प्रयत्न करना अनिवार्य है। हमें आशा ही नहीं विश्वास भी है कि हमारे सुधी पाठक पर्यावरण के संरक्षण के प्रति अपने धर्म का निष्ठा एवं लगन से पालन करेंगे।

- रत्ना वर्मा

आओ संवारें अपनी नदियां

- नवनीत कुमार गुप्ता

नदियों की स्वच्छता और पवित्रता को बनाए रखने के साथ ही जल संरक्षण के लिए हमें आपसी सामंजस्य, संयम और सर्वे भवन्तु सुखिन: के मंत्र का अनुसरण करना होगा। साथ ही हमें अपने- अपने क्षेत्रों में बहते वर्षा के पानी को अपने- अपने क्षेत्रों में ही रोकना होगा ताकि जीवन की मुस्कराहट बनी रहे।
पानी की प्रत्येक बूं जीवन का प्रतीक है। पानी संस्कृतियों का ही नहीं वरन् जीवन का भी सर्जक है। हमारा देश तो पूरी तरह से जल संस्कृति में रचा-बसा देश है। बिना बुलाए, बिना सरकारी भत्ते या सुविधा के एक करोड़ से अधिक लोग पवित्र नदियों के तट पर लगने वाले कुं भ जैसे विशेष मेलों में इकट्ठे हो जाते हैं। यह जल संस्कृति का सबसे बड़ा प्रमाण है। नदियों की स्वच्छता और पवित्रता को बनाए रखने के साथ ही जल संरक्षण के लिए हमें आपसी सामंजस्य, संयम और सर्वे भवन्तु सुखिन: के मंत्र का अनुसर करना होगा। साथ ही हमें अपने- अपने क्षेत्रों में बहते वर्षा के पानी को अपने- अपने क्षेत्रों में ही रोकना होगा ताकि जीवन की मुस्कराहट बनी रहे। 21 से 23 मार्च को नर्मदा और तवा नदी के संगम पर आयोजित द्वितीय अंर्तराष्ट्रीय नदी महोत्सव नदियों को प्रदूषण से उबारने और उन्हें सदानीरा बनाए रखने का संदेश देता है।
नदी प्रकृति की विशिष्ट एवं सुरम्य रचना है। प्रकृति की यह अनुपम रचना किसी झील, तालाब, हिमनद के पिघलने से या फिर पहाड़ों से पानी की पतली धारा के रूप में ढलान की ओर बहती है। बहुत- सी पतली धाराएं मिलकर एक बड़ी नदी का आकार लेती हैं। जहां से नदी शुरू होती है वह स्थान नदी का उद्गम कहलाता है। नदियां सैकड़ों या हजारों किलोमीटर बहने के बाद समुद्र या झील में गिरती हंै। प्राय: सभी बड़ी नदियां समुद्र में मिलती हैं। नदियों का प्रवाह सदैव एक समान नहीं होता। उद्गम स्थल से लेकर प्रवाह पथ के दौरान नदी में मिलने वाली जल की मात्रा के साथ ही भौगोलिक कारण भी नदी के प्रवाह को प्रभावित करते हैं। भूगर्भीय हलचलों के कारण पृथ्वी का भूपटल ऊंचा- नीचा होता है, जिसके फलस्वरूप नदी का प्रवाह भी प्रभावित हो सकता है। नदियां सभ्यताओं एवं संस्कृतियों के साथ- साथ विकास की भी जननी रही हैं। सभी प्राचीन सभ्यताओं का विकास नदी तटों के समीप ही हुआ है। करीब साढ़े चार ह•ाार वर्ष पूर्व मिस्र में नील नदी के किनारे मिस्र की महान सभ्यता विकसित हुई। नदियों के किनारे कृषि के लिए आवश्यक जल और उर्वर मिट्टी भी पर्याप्त होती है, इसीलिए सभी प्रमुख सभ्यताओं का उत्थान जल क्षेत्रों के आस- पास ही होता रहा है। मेसोपोटामिया की सभ्यता का विकास ईसा सेे पैंतीस सौ वर्ष पूर्व टिगरिस नदी के तट पर और भारत की प्राचीन मोहनजोदड़ो और हड़प्पा सभ्यता का विकास सिंधु नदी के किनारे हुआ। नदी तटों के समीप विकसित होने के कारण ही इन प्राचीन सभ्यताओं का नामकरण नदी सभ्यताओं के रूप में किया गया है।
नदियां केवल जलधाराएं ही नहीं अपितु उस क्षेत्र के जनजीवन और लोक- संस्कृति का अभिन्न अंग होती हैं। भारत में आदिकाल से ही नदियों के महत्व को समझ लिया गया था। जिसके कारण इन्हें धर्म और जीवन से जोड़ा गया। भारत सहित विश्व भर में नदियां सामाजिक व सांस्कृतिक रचनात्मक कार्यों का केन्द्र रही हैं। भारत में विशेष अवसरों एवं त्यौहारों के समय करोड़ों लोग नदियों में स्नान करते हैं।
यहां समय- समय पर नदियों के किनारे विशेष मेलों का आयोजन किया जाता है जिनमें विभिन्न वर्गों के लोग बिना किसी भेदभाव के हिस्सा लेते हैं। नदियों के तट पर कुं भ, सिंहस्थ जैसे विशाल मेले दुनिया में केवल भारत में ही देखने में आते हैं। इन अवसरों पर विभिन्न स्थानों से आने वाले व्यक्ति अपने विचारों व संस्कृति का आदान-प्रदान करते हैं।
सभ्यता के विकास के साथ नदी और नदी जल के विभिन्न उपयोगों का सिलसिला निरंतर जारी है। नदियों द्वारा न केवल हम पेयजल प्राप्त करते हैं वरन् सिंचाई के लिए भी नदी जल का उपयोग करते हैं। नदियां आवागमन का माध्यम भी हैं। गंगा, ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों में नौकायन की सुविधा उपलब्ध होने से परिवहन में भी आसानी होती है। नावों द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचा जाता है। नाव का उपयोग वस्तुओं के स्थानांतरण के लिए भी किया जाता है। नदियों के किनारे करोड़ों लोग निवास करते हैं, इनमें मछली उद्योग के लिए नदियों पर निर्भर लोग भी शामिल हैं। नदियों से मिलने वाली मछलियां, केंकड़े और रेत अनेक लोगों के जीविकोपार्जन का साधन भी हैं। इस प्रकार करोड़ों लोगों के लिए नदी की परिभाषा जीवनरेखा के रूप में है।
नदियां भारतीय जनजीवन और लोक संस्कृति सेे अभिन्न रूप से जुड़ी हुई हैं। भारत में नदियों के तटों पर विभिन्न सांस्कृतिक उत्सवों का आयोजन किया जाता है। नर्मदा नदी के किनारे होने वाला निमाड़ महोत्सव ऐसा ही एक उत्सव है जो पूरे देश में प्रसिद्घ है। इस अवसर पर विभिन्न क्षेत्रों के रचनाकर्मी व कलाकार अपनी रचनाओं व कलाओं का प्रदर्शन करते हैं। नदियों के नाम से त्यौहार भारत में ही मनाए जाते हैं। गंगादशमी गंगा नदी को समर्पित ऐसा ही एक त्यौहार है। भारत में नदियों की परिक्रमा की प्रथा भी लोगों को एक दूसरे की संस्कृति व रचनात्मकता से अवगत कराती है। भारत में नदियां साहित्य में भी विशिष्ट स्थान रखती हैं। भारत में नदियों पर चालीसा, आरती, भजन लिखे गए हैं। यमुनाष्टक एक प्रसिद्घ रचना है।लेकिन पिछली शताब्दी से अविवेकपूर्ण विकास और लालची प्रवृत्ति के चलते मानव ने नदियों को केवल स्वार्थसिद्घि का माध्यम मान लिया। पूंजीवादी सोच प्रकृति के संसाधनों का भरपूर दोहन कर उस पर एकाधिकार का दावा करती रही है।
भारत में भी इस सोच का विस्तार हुआ और इसके परिणामस्वरूप प्राकृतिक रूप से अविरल बहने वाली नदियों को मानव ने अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए कभी मोड़ा तो कभी उस पर बांध बनाया। जल धाराओं को जैसे चाहे वैसे मोडऩे की प्रवृत्ति ने उस क्षेत्र की पारिस्थितिकी में बदलाव लाने के साथ विस्थापन और भावनात्मक समस्याओं को भी जन्म दिया।
सदियों से निरन्तर बहने वाली गंगा नदी को टिहरी बांध बनाकर रोके जाने की घटना में करोड़ों लोगों की आस्था और विश्वास को ठेस पहुंचाई है। बांधों के निर्माण के बाद अब मानव की स्वार्थी प्रवृत्ति उसके पानी और अन्य लाभों के उपयोग को लेकर अपनी-अपनी दावेदारी जताने लगी है।
भारत में नदी जल के बंटवारे को लेकर अनेक राज्यों में विवाद होते रहे हैं, जिनमें कावेरी नदी जल विवाद अधिक चर्चा में रहा है। यदि हमारा दृष्टिकोण नहीं बदला तो हम पानी और नदियों का कोई भी विवाद हल नहीं कर पाएंगे। हमारे एक प्रदेश का नाम वहां से बहने वाली पांच नदियों के नाम पर है- पंजाब। यहां पर भी पानी की कोई कमी नहीं थी, लेकिन आज पंजाब अपने पड़ोसी राज्य- हरियाणा और राजस्थान के साथ दो घड़ा पानी बांट लेने से कतरा रहा है। नर्मदा के पानी को लेकर मध्यप्रदेश और गुजरात के बीच का विवाद जग जाहिर है।
राजधानी दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के बीच यमुना के पानी को लेकर आए दिन विवाद होते रहते हैं। यदि सूची बनाएं तो उसमें सिर्फ राज्यों के नहीं, एक ही राज्य के दो •िालों के विवाद भी आ जाएंगे। इसलिए कई लोगों को लगता है कि लाख दुखों की एक दवा है- राष्ट्रीयकरण, इसे क्यों न आजमाएं। लेकिन लोग भूल गए हैं कि नदियों का हो या किसी और चीज का, राष्ट्रीयकरण पुरानी दवा थी। यदि नदियों का राष्ट्रीयकरण हो जाए और फिर भी पानी के लिए चलने वाले राज्य स्तरीय विवाद हल न हों तो अगली दवा तो फिर निजीकरण ही सूझेगी।
राष्ट्रीयकरण हो या निजीकरण, ये दोनों इलाज रोग से भी ज्यादा कष्टकारी हो सकते हैं क्योंकि निजीकरण की एक झलक हम बोतलबंद पानी के व्यवसाय के रूप में देख रहे हैं। सदियों से जिस समाज में प्यासे को पानी पिलाना पुण्य और समाज सेवा का कार्य समझा जाता था आज उसी देश में बोतलबंद पेयजल का व्यापार फल-फूल रहा है।
पिछले कुछ वर्षों में हमारे देश में विकास के नाम पर जिन प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन किया गया है, उनमें नदी-जल के साथ भूजल संसाधन भी शामिल है। अविवेकपूर्ण भूजल दोहन से भूजल स्तर में तेजी से कमी आई है, जिससे देश के अधिकांश हिस्सों में पेयजल की समस्या दिनों दिन गहराती जा रही है। अच्छा हो, हमारे सभी प्रदेशों के जिम्मेदार लोग अपने इलाके के पानी को अपने-अपने ढंग से रोकने के तौर-तरीकों को फिर से याद करें। इन तरीकों से बनने वाले तालाब पुराने ढर्रे के न माने जाएं। वे इन इलाकों में लगे आधुनिक ट्यूबवेल को भी जीवन दे सकेंगे। इन सभी इलाकों में भूजल बहुत तेजी से नीचे गिरा है। लेकिन यदि लोग तय कर लें, तो पानी रोकने के ऐसे प्रबंध हजारों- लाखों ट्यूबवेलों को फिर से जिंदा कर सकेंगे और हर खेत को कहीं दूर बहने वाली कावेरी के पानी की जरूरत नहीं होगी। साथ ही समय रहते अपने खेतों को ऐसी फसलों से मुक्त कर लेना चाहिए, जिनकी प्यास बहुत अधिक है, नहीं तो कावेरी का पूरा पानी भी अगर हम एक ही राज्य को सौंप दें तब भी यह प्यास बुझने वाली नहीं है।
असल में मानव की स्वार्थी प्रवृत्ति इस कदर बढ़ रही है कि वह जीवनदायी नदियों के मूल स्वरूप से भी खिलवाड़ करने से नहीं चूकता। यदि यही हाल रहा तो नदियों के प्रवाह के अनियमित होने के परिणाम मानव के साथ- साथ अन्य जीवों- जंतुओं, पेड़-पौधों को भी भोगना होंगे जिससे पारिस्थितिकी- तंत्र में असंतुलन उत्पन्न होगा। ऐसी स्थिति से बचने के लिए समाज को चाहिए कि नदियों की महत्ता को समझे और उनके मूल स्वरूप को बनाए रखने का प्रयत्न करें ताकि धरती पर जीवन अपने विविध रूपों में खिलखिलाता रहे। (स्रोत फीचर्स)

विदेशों में सुरक्षित नहीं हैं भारत की बेटियां

- मनोज राठौर

विदेशों में अधिकांश एनआरआई पति अपनी नवविवाहित पत्नी को छोड़कर भाग जाते हैं। उनके इंतजार में इन महिलाओं की आंख का पानी सूख जाता है, लेकिन जाने वाला लौट कर नहीं आता। वह दूसरी नांव में सवार होकर समुद्र की लहरों का मजा लेता है।
विदेश में रहने वाली भारतीय बेटियों की सुरक्षा के लिए महिला एवं बाल विकास मंत्रालय तथा राष्ट्रीय महिला आयोग ने एक अच्छी पहल की है। अब एनआरआई (अप्रवासी भारतीय) सेल के माध्यम से विदेशी पतियों की काली करतूतें सामने आएंगी। हालांकि व्यापक इंतजाम करने के बाद भी प्रताडऩा की शिकायतें आना बंद नहीं हुए हैं। आंकड़ें बताते हैं कि एनआरआई पतियों के जुल्मों की शिकार महिलाओं की संख्या में वृद्धि हुई है। राष्ट्रीय महिला आयोग द्वारा गठित की गई इस सेल का काम विवाह के बाद एनआरआई पतियों द्वारा छोड़ दी गईं, उनके जुल्म या धोखाधड़ी की शिकार महिलाओं की मदद करना है। अब आयोग का यह सेल शिकायत प्राप्त होने पर ऐसी महिलाओं की सहायता करेगा।
27 अगस्त 2009 को एनआरआई सेल ने अपना काम करना शुरू कर दिया है। छह माह की अवधी में सेल के पास वैवाहिक अनबन जैसी 177 शिकायतें आ चुकी थीं यानी औसतन रोजाना एक शिकायत। सबसे अधिक शिकायत 130 अमेरिका, 44 ब्रिटेन और 37 कनाडा से मिलीं हैं। यह सेल का आंकड़ा है। मगर वास्तविक स्थिति कुछ और ही है। हर मामले की शिकायत सेल में आए, यह संभव नहीं है। जागरूकता के अभाव में और भय के कारण महिलाएं शिकायत करने से कतराती हैं।
राष्ट्रीय महिला आयोग ने केंद्र सरकार से एनआरआई मामलों पर एक विधेयक लाने की मांग की है। इस विधेयक में वैवाहिक अनबन, पत्नियों के लिए गुजारा भत्ता, बच्चों की अभिरक्षा, वैवाहिक संपत्ति के निपटारे पर कानून शामिल है। आयोग ने ऐसी शादियों के रजिस्ट्रेशन को अनिवार्य करने की भी अनुशंसा की है। साथ ही सरकार से अपील की है कि वह दूसरे देशों की सरकारों को प्रवासी शादी संबंधी अंतरराष्ट्रीय कानून को असरकारक ढंग से लागू करने की बात कहे। राष्ट्रीय महिला आयोग का मुख्य जोर इस बिंदु पर है कि किसी एनआरआई से शादी की स्थिति में विवाह का पंजीकरण महिला को उसके पति द्वारा छोड़े जाने की स्थिति में कानूनी रूप से मददगार होगा। विवाह पंजीकरण सभी विकसित देशों में अनिवार्य है और अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मेलनों में भी इस पर सहमति बन चुकी है।
वैसे अभी तक विधेयक पारित नहीं हुआ है। मतलब साफ है कि आयोग के चिंतन करने मात्र से समस्या का हल नहीं निकल जाता। ज्यादातर मामलों में छली गई विवाहित महिलाओं के पास मुकदमा लडऩे के लिए संसाधन नहीं होते, ताकि अपराधी को उसके गलत कार्यों की सजा मिल सके।
अपने देश में अकेले पंजाब प्रांत से ही कई हजार ऐसी महिलाएं हैं, जिन्हें उनके एनआरआई पतियों ने त्याग दिया है। सवाल यह है कि इस दुखद हालात के बावजूद भारतीय लड़किया एनआरआई से शादिया क्यों कर रही हैं? जबकि विदेशों में एनआरआई पति अपनी नवविवाहित पत्नी को छोड़कर भाग जाते हैं। उनके इंतजार में पत्नी की आंख का पानी सूख जाता है, लेकिन जाने वाला फिर लौट कर नहीं आता।

चोपता की वह चांदनी रात... ...

- मुन्ना के. पाण्डेय

इस तीखे मोड़ से मुड़ते ही चोपता अपनी सारी खूबसूरती आपके आंखों में भर देता है, और आप फटी- फटी आंखों और खुले मुंह से इस दृश्य और वहां पसरी अलौकिक शान्ति को बस देखते ही रह जाते हैं।
गढ़वाल वैसे तो अनेकानेक सुंदर-सुंदर जगहों से भरा पड़ा है। पर हम जिस जगह की बात कर रहे हैं वह चोपता है। चोपता गोपेश्वर से 38 किलोमीटर की दूरी पर केदारनाथ वन्य -जीव प्रभाग के मध्य स्थित एक छोटी किंतु बेहद ही खूबसूरत जगह है। यहां पहुंचने के दो रास्ते हैं- पहला जो अधिक आसान और सीधा है वह गोपेश्वर, मंडल होकर तथा दूसरा उखीमठ होकर। उखीमठ केदारनाथ बाबा की शारदीय पीठ है। चोपता को गढ़वाल का चेरापूंजी कहा जाता है। कारण यहां बदल कभी भी आकर आपके ऊपर हलकी- तेज फुहार छोड़ जाते हैं। जैसे ही आप गोपेश्वर की तरफ से आते हैं और जब माईल स्टोन यहां शो करता है कि चोपता 1 किलोमीटर रह गया है तभी आप अपने पैर अपनी गाड़ी के ब्रेक पर तेजी से लगाने को मजबूर हो जाते हैं। ना.. ना.. बात ज्यादा खतरे की नहीं है। दरअसल, इस तीखे मोड़ से मुड़ते ही चोपता अपनी सारी खूबसूरती आपके आंखों में भर देता है, और आप फटी- फटी आंखों और खुले मुंह से इस दृश्य और वहां पसरी अलौकिक शान्ति को बस देखते ही रह जाते हैं।
सामने दूर-दूर तक फैला विराट दुधिया हिमालय अपनी मौन तपस्या करता जान पड़ता है, आ बस इस दृश्य को पूरा जी लेना चाहते हैं। एक सलाह है, जहां तक सम्भव हो, कैमरे की क्लिक के बजाये दिल के कैमरे में इसे पहले क्लिक करें फिर कहीं और क्योंकि, चोपता मन नहीं भरने देता हां,आपकी छुट्टियां ही कम पड़ जाती हैं। यह जगह अपने दूर- दूर तक फैले हरे- हरे बुग्यालों के लिए मशहूर है (बुग्याल- हरे घास के वो मैदान हैं जो उंचाई पर बर्फीली चोटियों से लगे हुए हैं)।
चोपता से 4 किलोमीटर ऊपर पंचकेदारों में से सबसे उंचाई पर स्थित तुंगनाथ का मन्दिर है। यहां तक जाने के लिए बढिय़ा ट्रेल पी.डबल्यू.डी. के सौजन्य से बनी हुई है।
चोपता आपको आम हिल स्टेशनों से अलग इस कारण भी लगेगा क्योंकि यहां टूरिस्टों के झुंड- चौड़े जत्थे उनका कूड़ा- कचरा, पोलीथिन के ढेर नहीं दिखते और एक बात, यहां आज भी दुकान वाला गैस की बजाय लकड़ी पर ही खाना बना कर देता है, वो भी लोकल सब्जियों के साथ। चूंकि यहां साल भर बेहद ठंडा वातावरण होता है तो आप यहां के होटलों में मडुवे की रोटी और लहसन की चटनी की मांग कीजिये (जो सामान्तया मिल जाती है)।
अब, इस जगह के बारे में कुछ बेहद जरुरी। यह क्षेत्र सघन वन क्षेत्र है अत: रात- विरात दे- भाल कर निकलिए। चोपता में इस जगह से लगभग 500 मीटर की दूरी पर एक ऊंचा टॉवर जंगलात विभाग ने बना रखा है, आप यहां से रात में दुर्लभ और लगभग गुम हो चुके जानवरों की प्रजातियां देख सकते हैं, जैसे कि 'कस्तूरी मृग, हिमालयन रीछ, और बाघ इत्यादि, पर इसके लिए चांदनी रात का होना जरुरी है। क्योंकि 'चोपता' की चांदनी रात बेहद खूबसूरत होती है... जिसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है। यहां जब चांदनी हिम, शिखरों पर पड़ती है तब दिमाग की खिड़कियां बंद हो जाती हैं और दिल धड़कना भूल जाता है।
चोपता को एक बेस कैम्प की तरह यूज कीजिये क्योंकि मैं जिस चांदनी की बात कर रहा हूं वह केवल शरद पूर्णिमा के चांद की है। इस समय यहां का सारा इलाका बर्फ की सफेद चादर ओढ़ लेता है और जब बर्फ की इन चादरों पे चांदनी पसरती है... जी चाहता है कि बस सारी कायनात यहीं रुक जाए । वैसे भी इस पूर्णिमा में चांद का दीदार चोपता के ऊपर लगभग 4200 मी. पर स्थित चंद्रशिला से करना अधिक ठीक होता है जो तुंगनाथ मन्दिर से सीधी 1 किलोमीटर की चढ़ाई पर है। एक रात यहां गुजार लेने का दम सभी के बूते के बाहर की ची•ा है। और यह शौक अच्छी तैयारी और साजो- सामान की मांग करता है। इस मौसम में जबकि ऊपर कुछ भी नहीं मिलता खाने और गाईड के बगैर जाना जान- जोखिम में डालना है। यह वह मौसम होता है जब कई ट्रैकर्स गोपेश्वर से लगभग 23 किलोमीटर की ट्रेकिंग करके सीधे तुंगनाथ मन्दिर के सामने पहुंचते हैं। मन्दिर के कपाट शीतकाल के लिए पहले ही बंद कर दिए जाते हैं, और आपके पास इस चांदनी रात में चांद को निहारने का सुख पाने के लिए अपने साथ लाये टेंट या फिर मन्दिर के पीछे बनी एक छतरी के इर्द- गिर्द अपने को पूरी तरह बंद और अपने साथ लाए गर्म भारी कपड़ों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। यह पूरी रात एक ऐसी याद दिल में छोड़ जाती है जिसे ना आप भूल पाते हैं ना ये खुद को आपको भूलने देती है।
अगले दिन चांद की पहाड़ी यानी चंद्रशिला से सूर्योदय देखिये। यह रात से कम खूबसूरत किसी भी सूरत में नहीं होती। सूर्य की पहली किरण जब सामने दूर- दूर तक पसरे चौखम्बा, गंगोत्री, केदार डोम, सतोपंथ नंदा घुंटी के शिखरों पर पड़ती है तो लगता है जैसे इन शिखरों ने स्वर्ण मुकुट धारण कर लिया है और सूर्य ने अपनी स्वर्ण- रश्मियों से इनका अभिषेक कर दिया है... पर जल्दी कीजिये यहां बादल शीघ्र घिर आते हैं...
तो फिर सोचना क्या है... हो आइये एक बार चोपता... फिर बताइए कैसी कही आपकी चांदनी रात?
वहां जाने के लिए ऋ षिकेश से एन.एच. 58 के साथ- साथ देवप्रयाग, नन्द प्रयाग, रुद्र प्रयाग, चमोली गोपेश्वर होते हुए मंडल के रास्ते 'चोपता' और क्या...।
संपंर्क- सेक्टर 41, माल अपार्टमेंट (गेट नं.-1) माल रोड (दिल्ली यूनिवर्सिटी के पास) दिल्ली-110 054 , मोबाइल: 09968734648,
Email- kunal23rs@gmail.कॉम, jaaneanjaane.blogspot.com


वनों की रक्षक भील महिलाएं

- सुभद्रा खापर्डे

अपनी सफलता से प्रोत्साहित होकर, अट्टा की महिलाओं ने एक और संरक्षण गतिविधि शुरू की। छोटी टामों ने समूहों में अपने सदस्यों के खेतों में काम करना शुरू किया। खेतों के बीच की गलियों को पत्थरों से भरा ताकि बारिश के पानी के साथ बहने वाली मिट्टी और कुछ पानी को रोका जा सके।

किस बात ने उन्हें अपने वनों की रक्षक बनने और इतना हरा बनाने के लिए प्रेरित किया- इस एक प्रश्न के जवाब में मध्य प्रदेश के अलीराजपुर जिले के अट्टा गांव की एक भील महिला, दहेली बाई ने कहा, 'मुझे बहुत गुस्सा आया कि शहरों में लकड़ी की पूर्ति के लिए हमारे सारे जंगलों के काटने के बाद, वन विभाग जगंल के विनाश के लिए हमें दोषी ठहरा रहा है। तो मैंनें अपने गांव की महिलाओं को इकट्ठा किया और इन पहाडि़यों की सुरक्षा करना शुरु किया। अब कोई हम पर आरोप नहीं लगा सकता'।
गुजरात में भड़ौच के मैदानों में प्रवेश करने से पहले विंध्याचल की वृहद आखिरी श्रृंखला को बनाता हुआ अलीराजपुर का सौंदवा ब्लॉक नर्मदा नदी के एक किनारे पर्वतीय इलाका है। ढलानों में पलती लाल मिट्टी के साथ घाटी की संकरी पट्टियों में मध्यम गहराई वाली कुछ काली मिट्टी होती है। खराब भूमिगत जलदायी गुणों के साथ इसके नीचे हैं असिताश्मिी (बसॉल्टिक) सख्त पत्थर। औसत वार्षिक वर्षा 900 मिलीमीटर है, जो बारिश के मौसम (मध्य जून से मध्य अक्तूबर) में होती है। भील आदिवासियों ने इस अर्धशुष्क पर्यावरण तंत्र को घाटी में जैविक कृषि द्वारा अपना लिया है और इसकी पूर्ति वे जंगलों से एकत्रित उत्पादों से करते हैं जिसमें पतझड़ी पेड़ जैसे टीक, शीशम, अंजान तथा सलाई और प्रचुर मात्रा में घास, जड़ी और बूटियां शामिल हैं। नीचे सख्त पत्थर होने के बावजूद, जंगल की हरियाली सुनिश्चित करती है कि पत्थरों की दरारों के माध्यम से बारिश के पानी से पर्याप्त प्राकृतिक पुन: पूर्ति होती रहे। फलस्वरुप, झरनों में पूरे साल पानी रहता था।
1956 में राज्यों के पुनर्गठन और मध्यप्रदेश के गठन से चीजों मेंबहुत अधिक परिवर्तन आया। अलीराजपुर पर पहले एक सामंती युवराज का शासन था, जिसका आदिवासियों पर बहुत अधिक नियंत्रण नहीं था और वे अधिकतर मिलकर श्रम करने की परम्पराओं से काफी नजदीकी से जुड़े समुदाय के रूप में रहते थे। जब यह क्षेत्र वन विभाग को सौंपा गया तब से लकड़ी उत्पादन के लिए इसका वाणिज्यिक शोषण आरंभ हुआ।
इससे नाजुक पर्वतीय पर्यावरण-तंत्र बिगड़ गया और जंगलों के खत्म होने से जल्दी ही मिट्टी की पतली परतें बह गईं और बारिश की प्राकृतिक पुनपूर्ति भी काफी हद तक घट गई, जिसके परिणामस्वरुप झरने सूख गए। हां, सबसे अधिक प्रभाव भीलों की आजीविका पर हुआ चूंकि उनकी जमीनों की उर्वरता के साथ- साथ वन उत्पादों की आपूर्ति भी गंभीर रूप से घट गई। इसके साथ, भारतीय वन अधिनियम के प्रावधानों ने सुनिश्चित किया कि उन्हें उनके ही घर में अपराधी माना जाए और उन्हें जंगल में पहुंच के लिए वन अधिकारियों को रिश्वत देने के लिए मजबूर होना पड़ा।
फिर 1983 में, आदिवासियों ने अपने अधिकारों, विशेषकर जंगलों की सुरक्षा के अधिकार की मांग करने के लिए स्वयं को संगठित करना आरंभ किया, जो उनका जीवन है। उन्होंने मजदूर चेतना संगठन का गठन किया और जंगलों की सुरक्षा आरंभ की दी, जोकि सौंदवा ब्लॉक के करीब 50 गांवों में निरावृत हो चुके थे। दहेली बाई के नेतृत्व में, अट्टा गांव की महिलाओं ने संघर्ष शुरू किया और जल्द ही पास के गांवों में फैल गया। वेस्ती बाई के साथ दहेली बाई, नदिका के साथ ऊपर की ओर गईं जो उनके गांव से होते हुए गेंद्रा और फदतला गांव को जाती है और वहां महिलाओं को समझाया कि चूंकि यह धारा फदतला से शुरू होती है, मिट्टी, पानी और वन उत्पादों की उपलब्धता के रूप में वन सुरक्षा का पूर्ण लाभ तभी मिलेगा जब वे भी अपने जंगलों की सुरक्षा करना आरंभ करेंगीं। बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई के कारण अट्टा की नदी गर्मियों में सूखने लगी। इस प्रयास का शुक्र है, 10 वर्षों में- 1990 के आरंभ से- नदी फिर से बाहरमासी हो गई।
इस संरक्षण का अनोखापन है, इसकी भीलों की पारम्परिक मिलकर श्रम करने की प्रथा पर निर्भरता- जो पैसों की अर्थव्यवस्था के अंदर आने और प्राकृतिक संसाधनों के आधार के विनाश से फीकी पड़ती जा रही थी। हालांकि, दहेली बाई के नेतृत्व में, अट्टा की महिलाओं ने पांच या छह का समूह बनाया और जंगल की रखवाली शुरू की ताकि यह सुनिश्चित हो कि जंगलों को चरा नहीं गया और जड़ों का पुनर्जीवित होने दिया जाए। इसके बाद, उन्होंंने सुनिश्चित किया कि कुछ पेड़ों को न काटा जाए। घास केवन मानसून के बाद ही काटी जाए और सुरक्षा करने वाले परिवारों में बराबर बांटी जाए जिसे जानवरों के चारे के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
अपनी सफलता से प्रोत्साहित होकर, अट्टा की महिलाओं ने एक और संरक्षण गतिविधि शुरू की। छोटी टामों ने समूहों में अपने सदस्यों के खेतों में काम करना शुरू किया। खेतों के बीच की गलियों को पत्थरों से भरा ताकि बारिश के पानी के साथ बहने वाली मिट्टी और कुछ पानी को रोका जा सके। डेढ़ दशक की अवधि में, 1990 के मध्य से, सैंकड़ों ऐसी गलियों को भरा गया जिसके परिणाम स्वरूप गहरी मिट्टी के साथ कई सारे छोटे भूमि के टुकड़ों का निर्माण हुआ जिससे गांव की पैदावार में वृद्घि हुई। यह अभ्यास भी अलीराजपुर के कई अन्य गांवों में दोहराया गया।
नर्मदा नदी के किनारे पर बसे ककराना गांव की महिलाओं ने अपने जंगलों की सुरक्षा करते हुए अनुकरणीय हिम्मत दिखाई। चूंकि वे अलीराजपुर की सीमा पर हैं उन्हें गैर कानूनी रूप से उनकी लकड़ी चुराने वालों का लगातार सामना करना पड़ता है। अंतत: उन्हें निर्णय लेना पड़ा किकिसी को स्थायी रूप से जंगल के अंदर ही रहना पड़ेगा ताकि वह लकड़ी चुराने वालों के आते ही सावधान कर सकें। रैजा बाई, और उनके पति डीलू, ने इस चुनौती को उठाने का फैसला किया और उन्होंने जंगल में अपनी झोपड़ी बनाई। वे वहां अकेले अपने बच्चों के साथ रहते हैं।
जब रैजा बाई से जंगल में अकेले रहने के खतरों के बारे में पूछा गया, उन्होंने कहा, 'मैंने जंगल में इस झोपड़ें में एक दशक गुजारा है और जब से मैं यहां आई हूं मेरी जिंदगी गांव से बेहतर रही है'। झनदना, सुगत, ककराना और चमेली गांव के लोगों को भी शुरुआत में अपने गांव की सीमा पर एक अन्य जंगल की सुरक्षा में परेशानी हुई जो कि पहाड़ी पर था। हालांकि, काफी जद्दोजहद के बाद, केएमसीएस के सदस्यों की मदद से वे अपने अंतरों को सुलझाने में सफल रहे। आज, यह जंगल भी देदीप्यमान और दूर से नजर आता है।
राहुल बैनर्जी, जिन्होंने ढाई दशक इस क्षेत्र में रिसर्च और प्राकृतिक संसाधन प्रबंध प्रोजेक्ट के कार्यान्वयन में बिताया है, उनका मत है कि, 'जंगल, जमीन और पानी के संरक्षण के लिए समुदाय द्वारा सामूहिक कार्यवाही ही एकमात्र दीर्घोपयोगी तरीका है जिसमें देश के पर्वतीय, अर्धशुष्क और सख्त पथरीले क्षेत्रों के नाजुक पर्यावरण-तंत्रों की उत्पादकता को सुनिश्चित किया जा सकता है'।
बैनर्जी, जो भारतीय तकनीकि संस्था, खडग़पुर से सिविल इंजीनियरिंग में ग्रेजुएट हैं, आगे कहते हैं, कि 'इस वर्ष नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वालों में से एक, एलिनोर आस्ट्रॉम, को बिल्कुल इसीलिए, दीर्घोपयोगी प्राकृतिक संसाधन प्रबंध के लिए सामुदायिक सामूहिक कार्यवाही की व्यवहार्यता स्थापित करने के सैद्घांतिक और प्रयोगाश्रित कार्य के लिए सम्मान दिया गया है। इस प्रकार यह अलीराजपुर में केएमसीएस की महिलाओं द्वारा किए गए अनुकरणीय कार्य पर मुद्रण- अनुमति के समान है। बढ़ते जंगल, बहते पानी की अधिक उपलब्धता के परिणामस्वरूप कृत्रिम ऊर्जा की मांग में कमी और जैविक तरीकों से प्राप्त बेहतर कृषि उत्पादकता, ये सभी जलवायु परिवर्तन के समाप्त करने में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं'।
और जब यह सब सामुदायिक सामूहिक कार्यवाही के माध्यम से किया जाता है, विशेषकर महिलाओं द्वारा, तो सामाजिक न्याय के रूप में लाभ एक अतिरिक्त फायदा होता है। (विमेन्स फीचर सर्विस)

आप कितना पानी पीते हैं?

एक औसत पुरुष को रोज करीब दो लीटर और महिला को 1800 मि.ली. तरल की जरूरत होती है। यदि मौसम गर्म हो या आप अधिक दौड़धूप कर रहे हैं ते इसकी ज्यादा खपत कर सकते हैं।
अब तक तो यही माना जाता रहा है कि त्वचा के निखार के लिए अधिक से अधिक पानी पीना आवश्यक होता है लेकिन एक ताजा अध्ययन में सामने आया है कि कि त्वचा के निखार का शरीर में पानी की मात्रा से संबंध नहीं है। ब्रिटिश न्यूट्रीशन फाउंडेशन ने हाल ही में जारी एक रिपोर्ट में खुलासा किया है कि यह सब बेकार की बातें हंै।
'फूड फार द स्किन' नामक रिपोर्ट में कहा गया है कि पानी की खपत का त्वचा की नमी के साथ संबंध होने या ज्यादा पानी पीने से त्वचा में निखार आने का कोई वैज्ञानिक सुबूत नहीं है। इस बात का भी कोई सुबूत नहीं है कि इससे सरदर्द दूर होता है और भूख कम लगती है या कि पानी शरीर से जहर को बाहर निकाल फेंकता है।
पैंसिल्वैनिया यूनिवर्सिटी में मैडिसिन के प्रोफैसर स्टैनले गोल्डफार्ब ने कहा कि जहरीले पदार्थो को किडनियां बाहर निकालती हैं। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कितना पानी पीते हैं। पिछले साल जापान में हुए एक अध्ययन में भी यह पता चला था कि जो महिलाएं वजन कम करने के लिए बहुत पानी पीती हैं वे सिर्फ अपना समय बर्बाद कर रही हैं! तात्पर्य ज्यादा पानी से न चेहरा निखरेगा और न ही मोटापा कम होगा।
एक औसत पुरुष को रोज करीब दो लीटर और महिला को 1800 मि.ली. तरल की जरूरत होती है। यदि मौसम गर्म हो या आप अधिक दौड़धूप कर रहे हैं ते इसकी ज्यादा खपत कर सकते हैं। ब्रिटिश डायटिक एसोसिएशन के प्रवक्ता सायन पोर्टर ने कहा आप जो भी खाते- पीते हैं इनमें बहुत सी चीजें आपकी रोजाना की जरूरत पूरी करते हैं। सूप जैसे गरम पेय, जूस, फल, सब्जियों, मीट और ची•ा में पानी की काफी मात्रा होती है। चाय और कॉफी भी पानी की कमी पूरी करते हैं। कई लोग सोचते हैं कि कैफीन से बार-बार पेशाब आता है और शरीर में पानी की कमी हो सकती है। लेकिन रिसर्च में पाया गया है कि कैफीन से पानी की कमी होने का कोई खतरा नहीं है।
अब यदि इन सब अध्ययनों की बात मानें तो पानी पीने को लेकर बहुत से लोगों की धारणाएं गलत साबित होंगी। क्योंकि अब तक के अनुभव और डॉक्टरी सलाह तो यही कहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा पानी पीओ और स्वस्थ और सुंदर रहो। अपने चेहरे की चमक को बनाए रखने या मोटापा कम करने के लिए जो महिलाएं ज्यादा पानी पीती हैं उन्हें इस अध्ययन से खुश होना चाहिए या दुख मनाना चाहिए यह हम उनपर ही छोड़ते हैं। परंतु यदि हम भारत की गर्मी संदर्भ में बात करें तो यहां इन दिनों जैसी गर्मी पड़ रही है और देश भर में 40- 45 डिग्री में जिस गति से पसीना शरीर से बाहर निकल रहा है ऐसे में यदि हम कम पानी पीने लगें या यह सोचें कि पानी पीना जरुरी नहीं है तो लू और डिहाइड्रेशन होते देर नहीं लगेगी। तो जरा सोच समझ कर....(उदंती फीचर्स)


आईपीएल बोले तो...

- अविनाश वाचस्पति
खिलाडिय़ों को तो नोट मिल रहे थे जिससे इनके दिल रबर की गेंद के माफिक बल्लियों उछाल रहे थे क्योंकि उछलने उछालने में रबर की गेंद में ही बेहतरी पाई जाती है। फिर चाहे उसे बल्लियों उछालो या डबल-ट्रिपल बल्लियों की ऊंचाई तक उछालो, अगर आपमें उनकी वापसी में संभालने का गुर आता है तो आप सफल हैं, आपने मनी मंत्र सिद्घ कर लिया है।
डूबती क्रिकेट विधा को बचाने का श्रेय पहले वन डे मैचों को गया और स्टेडियम फुल रहने लगे थे। उसके बाद आईपीएल इस विधा का सच्चा तारणहार बना। तीन बरस पहले क्रिकेट खिलाडि़यों की यूं बोली लगाई जा रही थी मानो खिलाड़ी न हुए प्रोफेशनल पशु हो गए। पशु भी आम नहीं खास। खास मतलब जो सब्जी मंडियों में विचरण करते हैं। खाते पीते तो सब्जियां ही हैं और सड़ी गली, दुर्गन्धयुक्त सब्जियों का भाग्य संवारते विचरते हैं वैसे उसमें से भी बेहतर की तलाश में जुटे रहते हैं जैसे इंसान सबसे बेहतर पा लेना चाहता है और उसके लिए सब कुछ कर गुजरता है। सब्जी मंडी की गंदगी पटी रहती है सब्जियों की लाश से क्योंकि सब्जियां लाश होने पर ही दुर्गंध छोड़ती हैं। दुर्गंध छोडऩा किसी भी लाश का स्वाभाविक गुण है। पर इस दुर्गंध में ही इन पशुओं को महक मिलती है और इनकी तृप्ति होती है। शहर के पशु तो दूर की बात है, गांव में भी पशुओं को अच्छी सब्जियों की ओर निगाह भी नहीं डालने दी जाती है। वे या तो अपने चारे में खुश रहें और स्वाद बदलना चाहें तो कचरे में तलाशें।
आईपीएल भी कचरे में नोट बटोरने जैसा है क्योंकि तलाशने की जरूरत यहां नहीं है। यहां तो सब पूर्व नियोजित है। सट्टा भी, खेलना भी, बिकना भी और खरीदना भी। जो नियत नहीं है वो नीयत है कि न जाने कब बिगड़ जाये।
पशु मेले में पशुओं की बोलियां लगती हैं इसमें अंतर सिर्फ यही था कि सब्जियां और पशु जिस तरह से इस मौके पर अपनी बोलियों पर खुशी या दुख जाहिर नहीं कर पाते हैं, खिलाड़ी अपने खिलंदडे अंदा में कर जाते हैं। ये लोग कह सकते हैं- दुख तो खैर क्यों होता, इन्हें तो नोट मिल रहे थे जिससे इनके दिल रबर की गेंद के माफिक बल्लियों उछाल रहे थे क्योंकि उछलने उछालने में रबर की गेंद में ही बेहतरी पाई जाती है। फिर चाहे उसे बल्लियों उछालो या डबल-ट्रिपल बल्लियों की ऊंचाई तक उछालो, अगर आपमें उनकी वापसी में संभालने का गुर आता है तो आप सफल हैं, आपने मनी मंत्र सिद्घ कर लिया है। वापसी में वे गेंदे नोट बनकर बिखरती नहीं हैं, विदेशी खातों में समा जाती हैं। उछलने के बाद विदेशी खातों में समाना फिक्सिंग का ही एक अन्य रोचक पहलू है।
मन से पशु हैं पर तन से नहीं इसलिए नोट पाने पर, बोली लगने पर दुम हिलाकर अपनी
कृतज्ञता ज्ञापित नहीं कर पाते हैं। सिर्फ अंखियां नचा- मटकाकर ही दुदुंभियां बजाते हैं। वैसे दुदुंभियों और दुरभि- संधियों में इन्हें महारत हासिल होती है। इसी फिक्सिंग की बदौलत सट्टे का बेरूका रट्टा चलायमान है और चियर्स बालाओं ने अपने हुस्न के जलवे लुटा- लुटा कर इनमें रोमांच की रवानगी तक बिठाया और लिटाया है। इनके खरीददार इनके गले, गले नहीं बदन पर चिपका देते हैं अपना विज्ञापन, कमीज की शक्ल में, टोपी पर, पैंट पर, बैट पर और जहां- जहां उनका बस चलता है, वे विज्ञापन फहरा देते हैं। वही विज्ञापन इनकी अक्ल पर पड़े पत्थरों की कहानी गाते हैं। सामान्य तौर पर गीत गाए जाते हैं जबकि विशेष तौर पर कहानी गाई जा सकती है। आजकल वही कहानी गाई जा रही है। सुर भी अनेक हैं किसी के लिए नेक और बाकियों के लिए देख भाई देख।
क्या हुआ गर कहानी में ऐसे मोड़ आते हैं कि बिना मोड़े ही सब मुड़ जाते हैं जबकि इनमें कुछ तो एकदम से तुड़ जाते हैं। कोई निलंबित हुआ, कोई सस्पेंड हुआ, क्या फर्क पड़ता है इनकी साख ही नहीं होती है जिन पर आंच आए। इनकी साख नोट होते हैं वे ही इनको गरमी पहुंचाते रहते हैं। जिनको नहीं मिलते वे इन नोटों को राख मानते हैं। पर उनके राख मानने से नोटों का गुण राख नहीं होता, उसका गुण सदा कंचन है और कंचन की तरह ही निखरता रहता है।
यह सत्य है कि धन से ही पशुता का उन्नयन होता है। जिससे सब मान- मर्यादाएं भुलाना या बहाने करना सहज हो जाता है। धन का नहीं पशुता का साम्राज्य बढ़ रहा है और बढ़ रहे हैं पशु। आप सिर्फ बोलियां लगाने भर की घोषणा कर दीजिए एक से एक नायाब बोलियां लगवाने के लिए हाजिर मिलेंगे। लगाने वाले तो पशुत्व को पहले ही सिद्घ कर चुके हैं।
इंडियन पालतू लीग में पालतू बनाने की प्रक्रिया सदा चलती रहती है जिसमें पैसे की अहम भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता है, सरेआम लगती सार्वजनिक बोलियां इसमें डेमोक्रेसी की अद्भुत मिसाल हैं। पालतू बनना पालना से बिलकुल भिन्न है जबकि पालतू बनाना पालना का ही समदर्शी बोध है। जिसे पालेंगे पालतू वही हो सकता है उसे ही पाला जाता है। पर कई बार पालने पर भी खूंखारत्व सक्रिय हो उठता है जैसे नौकरों द्वारा स्वामी के साथ दगा करना क्योंकि अपवाद तो प्रत्येक के अनेक मिलते हैं। असल में पालतू बनाने की बोली प्रक्रिया से गुजर कर खिलाड़ी जो सोचता है कि जब इतना पशु बनना ही पड़ा है तो थोड़ा सा भी चूका क्यों जाए और वो फिक्सिंग से जुड़ जाता है।
इसी प्रकार प्रकारांतर में इंडियन पशु लीग अंत में इंडियन पैसा लीग में समृद्घि को प्राप्त होती है। पालतू जिसमें बेईमानी है। इसे पछतावा लीग भी कहा जा सकेगा पर किसी को पछतावा हो तो अपने पाप पर, अंत में पछताना पब्लिक को ही पड़ता है। इंडियन पिटाई लीग में खिलाडि़यों की चाहे कितनी ही पिटाई हो जाए फिर भी इंडियन पापी लीग इंडियन पवित्र लीग बनने की ओर अग्रसर है।
देखने में गरूर वाला खेल लगता है पर वे जरूर जानते हैं कि इसमें कितना ललित शेष है। सरूर इसमें सिर्फ पैसे का है-इसी खेल के कारण पैसे को पाप समझा जाने लगा है। पैसे और खेल भावना की जितनी दुर्गति इस खेल के जरिए पैदा हुई है उसकी कहीं कोई दूसरी मिसाल हाल-फिलहाल नहीं है।
यहां प्यार सिर्फ पैसे से है। पैसे के सामने पैसे बढ़कर कुछ नहीं है। शक्ल जरूर भोली दिख रही हैं पर मन में फिक्सिंग के गोले फूट रहे, आवाजें कैद हैं। सबको लाभ मिलना है। सब सच है। पब्लिक के विश्वास को इस खेल ने इतना बेरहमी से छला है कि नेताओं की छलावट भी छोटी पड़ गई है। यह छलछलाहट प्यार की नहीं, पैसे की है। स्वार्थ की है, लोभ और लालच की है। इंडियन लीग अब पैसे की है, पाप की है, पंगे की है, पतन की है। लीग तो पागल है रे मतलब आई पी एल वही मतबल इंडियन पागल लीग।
संपर्क : साहित्यकार सदन, पहली मंजिल, 195 सन्त नगर, नई दिल्ली 110065 मोबाइल 09868166686/ 09711537664
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May 24, 2010

कहां गई आंगन में फुदकने वाली गौरैया?

- कृष्ण कुमार मिश्र

घरेलू गौरैया अब एक दुर्लभ पक्षी बन गई है और पूरे विश्व से तेजी से विलुप्त होती जा रही है। हमारे घर- आंगन में फुदकते हुए चहलकदमी करने वाली घरेलू गौरैया जो हम सबके जीवन का एक हिस्सा थी अब दिखाई नहीं देती। कई बड़े शहरों से तो गायब ही हो गई हैं, हां छोटे शहरों और गांवों में अभी भी इन्हें देखा जा सकता है। देर से ही सही इसके विलुप्त होने के खतरे की ओर ध्यान तो गया।
कभी सामान्यत: दिखाई देने वाली गौरैया अब शहरों गांवों से नदारत हो रही है, इस प्रजाति के साथ भी कहीं ऐसा हो जैसा गिद्धों के साथ हुआ, एक दशक पूर्व गिद्ध सामान्यत: दिखाई देते थे आज वह विलुप्ति के कगार पर हैं।
घर, आंगन, दालान में गौरैया का चहचहाना किसे अच्छा नहीं लगता, लेकिन घरों में उनके लिए कोई जगह नहीं होने, के कारण आधुनिकीकरण की इस अंधी दौड़ ने इस प्यारे से पक्षी के अस्तित्व पर संकट खड़ा कर दिया है। मनुष्य की बदलती जीवन- शैली ने गौरैया के आवास, भोजन घोंसलें, बनाने वाले स्थानों को नष्ट कर दिया है। यदि जल्दी ही मानव- समाज ने अपने अनियोजित विकास को गति देना बन्द नहीं किया तो यह कालान्तर में एक भयानक विभीषिका होगी मानव समाज के लिये, जिसे वह स्वयं तैयार कर रहा है।
शहरीकरण में और भीषण बदलाव आया है, लॉन, बगीचों और गमलों से हमारी देशी प्रजातियों के पेड़- पौधे गायब हो गये और उनकी जगह ले ली विदेशी प्रजातियों ने। नतीजा ये है, कि वे पौधे तो ऐसे पुष्प देते हैं जिनमें मीठा रसीला मकरन्द हो और ही खाने योग्य फल। ऐसी कटीली झाडिय़ों बिना घनी पत्तियों डालों वाले पेड़ों से जिनमें तो छाया है और ही सुन्दरता, और ही ऐसी टहनियां हैं जिन पर ये आसमान के बंजारे अपना घोंसला बना सके, या यूं कह लें कि कुछ पल ठहर कर सुस्ता सकें। हालांकि आधुनिकता के इस बदलाव में बेचारे इन जीवों ने भी अपने आप को ढालने की कोशिश तो की जैसे हरी टहनियों के बजाय तारों पर बैठना सीख लिया, घास के छप्पर नहीं मिले तो छतों में टंगे पंखों के ऊपरी हिस्से में घोंसला बना लिया, पर इन्हें वहां भी सुरक्षा नहीं मिली। आखिर अब ये क्या करें। ये एक सवाल है जिसका जबाव हम- आप ही दे सकते हैं और उसी जवाब में छुपा है, इन पक्षियों की बेहतरी का राज।
कभी नहीं हुई गिनती
घर, दरवाजे, चौखठ और खेत खलिहानों को अपना आशियाना बनाने वाली गौरैया की कभी गिनती तो नहीं हुई लेकिन सत्य तो यही है कि अब यह बिल्कुल दिखाई नहीं देती।
गिनती नहीं होने का कारण यह कि इसका घोंसला अक्सर घरों में बना करता है। पेड़ों पर इसके घोंसले कम ही बनते हैं इसलिए इस छोटी- सी चिडिय़ा की कभी गिनती नहीं की गई। पूर्व में यह सोचा भी नहीं गया था कि घर, आंगन में चहचहाने वाले इस छोटे से सुंदर पक्षी के अस्तित्व पर भी कभी संकट आएगा। एक अनुमान के अनुसार गौरैया की संख्या में करीब 90 प्रतिशत की कमी गई है, क्योंकि यह घरों में तो दिखाई नहीं देती है। इसके अलावा खेतों में भी दाना चुगते इसे अब नहीं देखा जाता है। उत्तर प्रदेश के पूर्व वन्यजीव संरक्षक राम लखन सिंह कहते हैं कि अब घर ऐसे बनने लगे हैं कि गौरैया के घोसले के लिए कोई जगह ही नहीं बचती है। बहुमंजिली इमारतों में बननेवाले फ्लैटों में एक-एक इंच का उपयोग कर लिया जाता है। ऐसे में बेचारी गौरैया जाए तो जाए कहां।
शहरों से गायब होने का कारण
शहरों से इसके गायब होने का एक कारण मोबाइल फोन के बने टॉवर भी हैं। इन टॉवरों से ऐसी तरंगें निकलती हैं जो गौरैया के लिए घातक हैं। टॉवरों के पास से गुजरते ही निकलने वाली तरंग इसे अपनी चपेट में ले लेती है और इसकी जीवन लीला खत्म हो जाती है। खेतों में इस्तेमाल होन वाला कीटनाशक भी इनके लिए जानलेवा साबित हुआ है। खेतों में कटाई के बाद दाना चुगने के दौरान यह छिड़काव किए गए कीटनाशकों की चपेट में भी जाती हंै।
अब प्रश्न यह उठता है कि क्या करें ताकि ये खूबसूरत परिन्दे आपके आस- पास रहें चलिए इसी बहाने कोई बेहतर कार्य किया जाय, क्योंकि जो जीवों से प्रेम करते हैं, ईश्वर उन्हें पसन्द करता है।
-शहरों में पत्थरों के ही मकान बनें, लेकिन उसमें एक कोना ऐसा छोड़ा जाना चाहिए, जिसमें गौरैया अपना घोंसला बना सके। घर के बाहर रोशनदान के लिहाज से इसके लिए कुछ जगह छोड़ी जा सकती है। लकड़ी आदि बक्सों का इस्तेमाल भी कर सकते हैं, ताकि गौरैया उनमें अपना घोंसला बना सके।
-उसके बचे रहने का साधन घर- आंगन में धोने के बाद सुखाए जाने वाले अनाज भी नहीं रहे हैं। पहले घरों की छत पर दाल और गेहूं को धोने के बाद सुखाया जाता था, लेकिन अब सब कुछ डिब्बा बंद आता है। दाल प्लास्टिक में पैक बाजार में बिकती है। उसके आहार का यह साधन भी खत्म हो गया।
कभी नहीं हु गिनती
घर, दरवाजे, चौखठ और खेत खलिहानों को अपना आशियाना बनाने वाली गौरैया की कभी गिनती तो नहीं हुई लेकिन सत्य तो यही है कि अब यह बिल्कुल दिखाई नहीं देती।
गिनती नहीं होने का कारण यह कि इसका घोंसला अक्सर घरों में बना करता है। पेड़ों पर इसके घोंसले कम ही बनते हैं इसलिए इस छोटी- सी चिडिय़ा की कभी गिनती नहीं की गई। पूर्व में यह सोचा भी नहीं गया था कि घर, आंगन में चहचहाने वाले इस छोटे से सुंदर पक्षी के अस्तित्व पर भी कभी संकट आएगा। एक अनुमान के अनुसार गौरैया की संख्या में करीब 90 प्रतिशत की कमी गई है, क्योंकि यह घरों में तो दिखाई नहीं देती है। इसके अलावा खेतों में भी दाना चुगते इसे अब नहीं देखा जाता है। उत्तर प्रदेश के पूर्व वन्यजीव संरक्षक राम लखन सिंह कहते हैं कि अब घर ऐसे बनने लगे हैं कि गौरैया के घोसले के लिए कोई जगह ही नहीं बचती है। बहुमंजिली इमारतों में बननेवाले फ्लैटों में एक-एक इंच का उपयोग कर लिया जाता है। ऐसे में बेचारी गौरैया जाए तो जाए कहां।
शहरों से गायब होने का कारण
शहरों से इसके गायब होने का एक कारण मोबाइल फोन के बने टॉवर भी हैं। इन टॉवरों से ऐसी तरंगें निकलती हैं जो गौरैया के लिए घातक हैं। टॉवरों के पास से गुजरते ही निकलने वाली तरंग इसे अपनी चपेट में ले लेती है और इसकी जीवन लीला खत्म हो जाती है। खेतों में इस्तेमाल होन वाला कीटनाशक भी इनके लिए जानलेवा साबित हुआ है। खेतों में कटाई के बाद दाना चुगने के दौरान यह छिड़काव किए गए कीटनाशकों की चपेट में भी जाती हंै।
अब प्रश्न यह उठता है कि क्या करें ताकि ये खूबसूरत परिन्दे आपके आस- पास रहें चलिए इसी बहाने कोई बेहतर कार्य किया जाय, क्योंकि जो जीवों से प्रेम करते हैं, ईश्वर उन्हें पसन्द करता है।
-शहरों में पत्थरों के ही मकान बनें, लेकिन उसमें एक कोना ऐसा छोड़ा जाना चाहिए, जिसमें गौरैया अपना घोंसला बना सके। घर के बाहर रोशनदान के लिहाज से इसके लिए कुछ जगह छोड़ी जा सकती है। लकड़ी आदि बक्सों का इस्तेमाल भी कर सकते हैं, ताकि गौरैया उनमें अपना घोंसला बना सके।
-उसके बचे रहने का साधन घर- आंगन में धोने के बाद सुखाए जाने वाले अनाज भी नहीं रहे हैं। पहले घरों की छत पर दाल और गेहूं को धोने के बाद सुखाया जाता था, लेकिन अब सब कुछ डिब्बा बंद आता है। दाल प्लास्टिक में पैक बाजार में बिकती है। उसके आहार का यह साधन भी खत्म हो गया।
गौरैया बहुत ही नाजुक चिडिय़ा होती है तथा इसकी जन्म और मृत्यु दर दोनों ज्यादा होती है, लेकिन इसके अंडे को अगर छू लिया जाए तो वह उसकी देख-भाल बंद कर देती है। ऐसे में अंडे में पल रहा उसका बच्चा जन्म नहीं ले पाता और अंदर ही मर जाता है। यदि घरों का बचा अन्न कूड़ेदान में डालने के बजाय उसे खुली जगह पर रखा जाए तो यह गौरैया के खाने के काम सकता है। लॉन, बगीचे और गमलों में देशी पौधे लगाए जाने चाहिए, ताकि वह इनमें अपना घोंसला बना सके।
तराई की अनुकरणीय पहल
दुनिया बदली तो प्रकृति के स्वरूप को भी बदल डाला या यूं कहें की गंदा कर डाला, फलस्वरूप सरंक्षण वादियों की एक खेप उत्पन्न हो गयी, किन्तु नतीजा सिफर ही है अब तक, यदि सामुदायिक सरंक्षण के सफल उदाहरणों को छोड़ दिया जाय तो सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों द्वारा किए गये तमाम भागीरथी प्रयास विफल ही रहे हैं, वसुन्धरा के अंग-प्रत्यंगों की रक्षा में। जब 20 मार्च 2010 को विश्व गौरैया दिवस के रूप में मनाया गया तब निबन्ध प्रतियोगितायें, भाषण-बाजी, पोस्टर-लोगो और तस्वीरों का प्रदर्शन आदि कई आयोजन हु किन्तु अब शायद ये दिवस मात्र एक औपचारिकता नहीं रहेगा, क्योंकि खीरी जनपद के लोगों ने इसे एक आंदोलन का रूप देने की तैयारी कर ली है, ताकि सदियों से हमारे साथ रहती आई यह प्रजाति (गौरैया) का सरंक्षण संवर्धन हो सके। इसी प्रयास में पूरे जनपद में जगह- जगह गौरैया के महत्व और गौरैया से हमारे सदियों पुराने रिश्तों का जिक्र किया जाएगा, और इसे एक बार फिर साहित्य, धर्म और विज्ञान के पटल पर सुसज्जित करने की कोशिश।
दुधवा लाइव पर प्रकाशित गौरैया दिवस के संबध में हिन्दुस्तान अखबार में रवीश कुमार नें जब इस सुन्दर पक्षी की उन यादों कों उकेरा जो वक्त की भागम- भाग में कही धूमिल हो चुकी थी, और यही कारण बना उन तमाम लोगों के अन्तर्मन की सोई हुई उन यादों का, जिन्हें उन्होंने अपने बचपन में जिया था, गौरैया के साथ। कभी इसे दाना चुगा कर तो कभी रंगों में रंग कर। आज वे सब इस पक्षी को अपने घरों में फिर से वापस देखना चाहते हैं, अपने बचपन की तरह और शायद अपने बच्चों को वह विरासत भी देना चाहते है, जो कहीं खो गयी थी या खोती जा रही हैं, यानी इस चिडिय़ा का हमारे घरों में आना-जाना, बसना, घोंसला बनाना और हमारी दीवारों पर टंगें आईने में अपनी ही शक्ल देखकर चोंचे लड़ाना।
दुधवा लाइव की इस पहल में खीरी जनपद के सामाजिक कार्यकर्ता रामेन्द्र जनवार ने गौरैया सरंक्षण के लिए एक आंदोलन की रूपरेखा तैयार कर ली है, प्रसिद्ध कथाकार डा. देवेन्द्र जिन्होंने जाने कितनी बार गौरैया का जिक्र अपनी रचनाओं में किया है, अब इस खूबसूरत चिडिय़ा के वजूद की लड़ाई लडऩे की तैयारी में हैं, तो महिला संगठन सौजन्या की प्रमुख डा. उमा कटियार अपनी लिखी हुई रचनाओं का जिक्र करती हैं, और गौरैया को दोबारा अपने घरों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने के लिए महिलाओं की भागीदारी सुनश्चित कर ली है।
मां और गौरैया का रिश्ता
ये चिडिय़ा भी मेरी बेटी से कितनी मिलती- जुलती है, कहीं भी शाख़े- गुल देखे तो झूला डाल देती है।
जब गौरैया दिवस मनाने की बात चली तो लोगों के दिलों से वह सारे जज्बात निकल कर बाहर गये, जो इस खूबसूरत चिडिय़ा को लेकर उनके बचपन की यादों में पैबस्त थे! उन्हीं यादों के झरोंखो से कु विगत स्मृतियों को आप सब के लिए लाया हूं, क्या पता आप को भी कुछ याद जाए।
जब हम परंपराओं की बात करते हैं, तो मां उस परिदृश्य में प्रमुख होती है, क्योंकि परंपराओं का पोषण और उसका अगली पीढ़ी में संस्कार के तौर पर भेजना, मां से बेहतर कोई नहीं कर सकता, गौरैया भी हमारी परंपरा का हिस्सा रही, और हम सब जब भी इस परिन्दें का जिक्र करते हैं तो मां बरबस सामने होती है।
डा. धीरज जयपुर में रहती हैं, इनकी स्मृतियों में गौरैया की बात करते ही, पूरे परिदृश्य में मां की मौजूदगी होती है। इनकी मां ने इन्हें बचपन से ये बताया कि इनकी नानी को गौरैया बहुत पसन्द थी और वह कहती रहती थी कि मैं मरने के बाद गौरैया बनना चाहूंगी, और यही वजह थी की धीरज के घर में गौरैया को हमेशा दुलार मिलता रहा, खासतौर से एक टूटी टांग वाली गौरैया को, जिसको इनकी मां कहती थी कि बेटा ये तुम्हारी नानी ही हैं। भारत की संस्कृति में जीवों के प्रति प्रेम- अनुराग का यह बेहतरीन उदाहरण है, और उन मान्यताओं का भी जो पुनर्जन्म को परिभाषित करती हैं।
सीतापुर जिले की रहने वाली गिरजेश नन्दिनी ने जब दुधवा लाइव पर रामेन्द्र जनवार की कविताएं पढ़ीं जो गौरैया और मां के संबधों को जाहिर करती हैं, तो उन्हें लगा कि जैसे ये कविता मानों उन पर ही लिखी गयी है। क्योंकि सीतापुर शहर में वो किराये के मकान में जहां- जहां रही गौरैया का एक कुनबा उनके साथ रहा। वह जब भी मकान छोड़ कर नये मकान में जाती यह चिडिय़ां उन्हें खोज लेती हैं। इनकी मां आजकल इस बात से परेशान हैं कि चिडिय़ों के उस कुनबे में एक गौरैया कहीं खो गयी है। और उसकी फिक्र इन्हें हमेशा रहती है।
मेरे बचपन में मेरी मां मुझे जब खाना खिलाती और मैं नहीं खाता तो वो गौरैया से कहती कि चिर्रा ये खाना तू खा ले... मां ने अपनी विगत स्मृतियों के पुलिन्दे से गौरैया की यादों को निकालते हुए बताया कि बचपन में वे भाइयों के साथ अपने घर में गौरैयों को पकड़ती और उन्हें रंगों से रंग देती, और जब ये गौरैया इन्हें दिख जाती तो अपने रंग से रंगी हुई गौरैया को देखते ही सब खुश होकर शोर मचाते कि ये मेरी गौरैया है.....मेरी......
मां और गौरैया का रिश्ता सदियों से मानव समाज में पोषित होता आया, इसने हमारे बचपन में रंग भरे। आकाश में उडऩे की तमन्ना की किन्तु अब ये आकाश के बन्जारे हमारी करतूतों से ही हमारे घरों से गायब और ारों से ओझल हो रहे हैं। नतीजतन अब कोई मां अपने बच्चे की यादों में गौरैया के रंग नहीं भर पायेगी।
( कृष्ण कुमार मिश्र के वन्य जीवन से संबंधित अन्य लेख के लिए आप देख सकते हैं www.dudhwalive.com )

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